मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

 8 अप्रैल, 22 के दैनिक भास्कर (पटना) में संवाददाता गिरिजेश की खबर का शीर्षक है-

‘‘24 में 16 सीटों पर जिनके पास ज्यादा पैसा,वही जीते

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जीते प्रत्याशियों की औसत संपत्ति 73 करोड़’’ 

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इस साहसपूर्ण खबर के बारे में मेरा यह कहना नहीं है कि किसी के पास यदि अधिक पैसे हैं तो उसे सदन का सदस्य बनना चाहिए।

बल्कि, पैसे वालों का भी प्रतिनिधित्व होना ही चाहिए।

पर, जरा अनुपात तो देखिए !

असंतुलित अनुपात बोध इस देश की एक बड़ी समस्या है।

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समय बीतने के साथ ही बिहार ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न सदनों में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

सन 2014 में मायावती ने सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया था कि एक निवर्तमान राज्य सभा सदस्य ने राज्य सभा का सदस्य फिर से बना देने के लिए मुझे 100 करोड़ रुपए का आॅफर दिया था।

 हालांकि उस नेता जी ने उल्टे मायावती पर यह कहते हुए पलट वार किया कि मायावती जी ने ही मुझसे उतने रुपए मांगे थे।

उससे देश को यह तभी मालूम हो गया था कि कुछ खास सीटों का ‘रेट’ क्या चल रहा है।

खैर, उस मामले में कौन गलत था,कौन सही,यह जांचने का मेरे पास कोई जरिया नहीं।

किंतु इस देश- प्रदेश की राजनीति को दशकों से करीब से देखने -समझने का अनुभव मुझे जरूर है।

1967 से देख -समझ रहा हूं।

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धीरे -धीरे लोकतांत्रिक संस्थाओं से वैसे छोटे -बड़े नेता गायब होते जा रहे हैं जिनमें सिर्फ ज्ञान,योग्यता ,सेवा भाव किंतु गरीबी है।

हालंाकि अब भी वैसे इक्के- दुक्के सेवाभावी लोग सदन में नजर आ जाते हैं।पर वे भी अगले कुछ साल में गायब हो जाएंगे। 

   देश का दुर्भाग्य है कि अब उनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है जिनके पास पारिवारिक पृष्ठभूमि है, अपार पैसे हैं, जातीय -घार्मिक भावना उभारने का कौशल है और जिन्हें खूंखार अपराधियों व भ्रष्टाचारियों से भी कोई दुराव नहीं है। 

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यदि देश के सदनों की बनावट में तीव्र बदलाव की प्रक्रिया की रफ्तार यूं ही जारी रही तो अगले दो-तीन दशकों में देश की विभिन्न विधायिकाओं का स्वरूप कैसा बनेगा ?

अनुमान लगा लीजिए। 

उसका देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा पर कैसा असर पड़ेगा ?

हां, वैसा तो बिलकुल ही नहीं जिसकी कल्पना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान निर्माताओं ने की थी।

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ताजा खबर यह है कि पांच विधान सभाओं के गत चुनाव में नरेंद्र मोदी ने किसी भाजपा संासद

के पुत्र को टिकट नहीं लेने दिया।

एक कंेद्रीय मंत्री के पुत्र को तो राज्य सरकार में मंत्री नहीं बनने दिया जबकि वे 2017 से ही विधायक रहे हैं।

इसको लेकर भाजपा के वैसे अनेक नेता गण मोदी से सख्त नाराज बताए जा रहे हैं जिनके पुत्र टिकट नहीं पा सके।

  वह नाराजगी आने वाले दिनों में भाजपा के भीतर कौन सा गुल खिलाएगी,वह देखना दिलचस्प होगा।

  क्या मोदी का यह ‘सफाई अभियान’ आगे भी जारी रह पाएगा ?

‘नागपुर’ का उस पर कैसा रुख रहेगा ?

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11 अप्रैल 22. 

 


शनिवार, 9 अप्रैल 2022

 भीषण टैक्स चोरी में लगे सफेदपोश 

अपराधियों पर कार्रवाई जरूरी 

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कोलकाता की आबादी डेढ़ करोड़ है।

चंडीगढ ़की आबादी मात्र 11 लाख है।

किंतु प्रत्यक्ष कर में चंडीगढ़ कोलकाता से 

ज्यादा हिस्सेदारी करता है।

  ---अभिषेक --दैनिक जागरण-9 अप्रैल 22

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पटना नगर निगम को वित्तीय वर्ष 2015-16 में होल्डिंग टैक्स के मद में करीब साढ़े 32 करोड़ रुपए मिले थे।

जबकि 2021-22 में उसकी आय बढ़कर करीब 98 करोड़ रुपए हो गई।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह काम निजी एजेंसी को दे दिया गया है।

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  मुझे लगता है कि सरकारी करों की वसूली के मामले में केंद्र सरकार व राज्य सरकारों का भी लगभग यही हाल है।

भ्रष्ट अफसरों-कर्मचारियों की मिलीभगत से देश भर में व्यापक कर चोरी हो रही है।

वैसे पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार अधिक कर संग्रह कर पा रही है।

पर, इसे और बढ़ाने की अब भी गुंजाइश बनी हुई है।

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 यदि कर चोरी बंद हो जाए तो कल्याण,विकास और रक्षा-सुरक्षा मद में अधिक खर्च हो सकेंगे।

 नतीजतन कोई बाहरी व भीतरी विरोधी इस देश को नुकसान नहीं पहुंचा पाएगा।

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सोमवार, 4 अप्रैल 2022

 अदालती निर्णय के कारण जब चरण सिंह 

और कलाम साहब का स्मारक नहीं बन सका 

तो पासवान जी का कैसे बन जाता ?

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सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के कारण राम विलास पासवान के सरकारी बंगले को स्मारक नहीं बनाया जा सका।

वह निर्णय सन 2013 का है।

उस निर्णय के बाद स्मारक बनाने पर रोक लग गई है।

इस बीच पूर्व प्रधान मंत्री चरण सिंह और पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के परिजन ने केंद्र सरकार से स्मारक की मांग की थी।

पर केंद्र सरकार उस अदालती आदेश का पालन कर रही है कि दिल्ली के उस सरकारी मकान को स्मारक में नहीं बदला जा सकता जिनमें कोई वी.आई.पी.रहते थे।

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      एक भूली -बिसरी याद

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  नई दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ के 

  8 सितंबर, 1974 के अंक में मुख्य पृष्ठ का शीर्षक था ,

‘‘संसद या चोरों और दलालों का अड्डा ?’’

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इसके साथ दी गई स्टोरी में लाइसेंस घोटाले को उजागर किया गया था।उस घोटाले को पहले दबा दिया गया था।

  ‘प्रतिपक्ष’ की इस धमाकेदार स्टोरी और उसके शीर्षक को लेकर लोक सभा में पीलू मोदी और राज्य सभा में लालकृष्ण आडवाणी ने इस पत्रिका  के खिलाफ विशेषाधिकार हनन के प्रस्ताव पेश किये।

 इसके पीछे विरोधी दलों की एक रणनीति थी ।

वे इसी बहाने दबा दिये गये पांडिचेरी लाइसेंस घोटाले को एक बार फिर उजागर करना चाहते थे। 

 विरोधी दलों की रणनीति को पहले सत्ताधारी कांग्रेस ने नहीं समझा।

 इसलिए अनेक कांग्रेसी सदन में एक साथ खड़े हो गये।

संसद के प्रति अवमाननापूर्ण टिप्पणी पर वे अब तक एक कम चर्चित पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ के खिलाफ, जिस पत्रिका का तब मैं बिहार संवाददाता था, कार्रवाई करने के लिए स्पीकर से मांग करने लगे।

पर इस बीच किसी ने तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को इसके पीछे की रणनीति के बारे में बता दिया।

फिर क्या था !

इंदिरा जी के इशारे पर कांग्रेसी सांसदगण स्पीकर जी.एस.ढिल्लो से  यह गुजारिश करने लगे कि पत्रिका के खिलाफ इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।

मामला आगे बढ़ता तो केंद्र सरकार की फजीहत हो जाती।

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आज का ताजा हाल

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स्थानीय निकाय क्षेत्रों से बिहार विधान परिषद की 24 सीटों के  चुनाव के लिए आज वोट डाले जा रहे हैं।

 पटना की चर्चित व साहसी पत्रिका ‘‘समकालीन तापमान’’ ने ‘‘पांच अरब का अदृश्य खेल’’ शीर्षक के तहत इस चुनाव पर 

राजेश पाठक की एक रपट प्रकाशित की है।

 रपट में यह लिखा गया है कि 

‘‘यहां बड़ा सवाल यह भी है कि इस रूप में विधान परिषद की सदस्यता पाने में धन बल का इतना बड़ा खेल क्यों होता है ?

मोटा-मोटी यह माना जा सकता है कि विधान पार्षद

के तौर पर शासन-प्रशासन और समाज में रुतबा -रुआब तो कायम हो ही जाता है,सुख -सुविधाएं इतनी हैं कि उन्हें पाने की लालसा में आठ-दस करोड़ रुपए पानी में बहाने में धन बलियों को कोई दर्द नहीं होता।

वैसे भी ये रुपये पसीने की कमाई के तो होते नहीं हैं !’’

 कल हुई ‘तैयारी’ और आज के मतदान के दौरान इस चुनाव में रूचि रखने वाले पूरे राज्य के जानकार लोग यह जान गए होंगे कि पांच अरब रुपए खर्च हो रहे हंै या कम या फिर कोई खर्च नहीं हो रहा है !

  यदि अपार धन लगाकर सदस्य बनने की बात सही है तो फिर सवाल उठता है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं का स्वरूप कैसा बनता जा रहा है ?

इसका प्रशासन,राजनीति व जन मानस पर कैसा असर हो रहा है ?

क्या ऐसे ही लोकतंत्र के लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने त्याग किए थे,बलिदान दिए थे और कष्ट सहे थे ?

इन सवालों पर विचार करने के लिए आज कितने लोग इस देश में तैयार हैं ?

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सुरेंद्र किशोर

4 अप्रैल 22 


शनिवार, 2 अप्रैल 2022

    डा.लोहिया संपादित पुस्तक ‘एक्शन 

    इन गोवा’ का पुनप्र्रकाशन संभव हुआ 

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      सुरेंद्र किशोर   

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दशकों से सुनता आ रहा हूं कि गोवा मुक्ति आंदोलन में डा.राममनोहर लोहिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

 पर, उस आंदोलन का विवरण अब पढ़ने को मिल रहा है।

इसके लिए डा.राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष

अभिषेक रंजन सिंह और राम मनोहर लोहिया समता न्यास, के मैनेजिंग ट्रस्टी शरद बदरी विशाल पित्ती का आभारी हूं।

  इनके कारण ही ‘एक्शन इन गोवा’ नामक पुस्तक का पुनर्प्रकाशन संभव हो सका है।

‘एक्शन इन गोवा’ के साथ-साथ दो अन्य प्रकाशन भी मेरे

सामने हैं --

1.-क्रांति स्मरण -2021--स्मारिका

2.-सालाजार की जेल में उन्नीस महीने (368 पेज)

पुस्तक लेखक त्रिदिब चैधुरी

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 1947 में प्रकाशित इस पुस्तक का संपादन खुद डा.लोहिया ने किया था।

 यह पुस्तक देश के अनेक शीर्ष पुस्तकालयों में भी उपलब्ध नहीं है।

 अभिषेक जी ने कोलकाता के एक पुस्तकालय से इसे खोज निकाला।

तभी इसका पुनप्र्रकाशन संभव हो पाया।

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गोवा मुक्ति आंदोलन के रचयिता डा.लोहिया के संबंध में मशहूर पत्रकार के. विक्रम राव के दो शब्द--

‘‘भारत तब स्वतंत्र नहीं हुआ था।

उस वक्त यानी 1946 में डा.राममनोहर लोहिया अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की भांति जेल से रिहा हो गए थे।

उधर फ्रांसिसी साम्राज्य भी पाण्डिचेरि छोड़ने का मुहुर्त तय कर रहा था।

  मगर पुर्तगाली प्रधान मंत्री डा.एंटोनियो सालाजार अपने गोवा उपनिवेश को मुक्त करने की कोई योजना के बारे में सोच तक नहीं रहा था।

 उसके इस रवैये पर डा.लोहिया का आक्रोशित होना स्वाभाविक था।

 बाम्बे के साथियों से राय -मशविरा के बाद डा.लोहिया ने गोवा मुक्ति का खाका रचा।

  जवाहरलाल नेहरू तब तक अंग्रेज वायसराय के साथ मिलकर भारत की अंतरिम सरकार के गठन की योजना बना रहे थे।

डा.लोहिया अहमदनगर के किले की जेल में तीन साल से ज्यादा कैद रहे थे।

और, छूटकर बाहर आ गए थे।

 उन्होंने गांधी जी को अपने गोवा संघर्ष की सूचना दी।

 बापू ने अनुमोदन भी किया।

फिर वही हुआ जो प्रत्याशित था।

 नेहरू ने डा.लोहिया की योजना को अनावश्यक और आतिशी कदम बताया।

 पर, लाहौर जेल की कठिन यातना का भोगी यह गांधीवादी संघर्ष से क्यों पीछे हटता ?

 फिर पंजिम में जो हुआ, वह सर्वविदित है।

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‘एक्शन इन गोवा’ के 

पुनर्प्रकाशक का पता

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अभिषेकरंजन सिंह

अध्यक्ष,

डा.राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन

यू-252 ए,दूसरा तल्ला

शकरपुर

बैंक आॅफ बड़ौदा के निकट

दिल्ली-110092

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 क्या ढीली-ढाली लोकतांंित्रक व्यवस्था में     भ्रष्टाचार-आतंकवाद का इलाज संभव नहीं ?।।

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सुरेंद्र किशोर

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कर्नाटका में सरकारी ठेकेदार अफसरों -नेताआंेें को देते  हंै  40 प्रतिशत कमीशन यानी रिश्वत।

देते क्या हैं,देने पड़ते हैं।

वहां के ठेकेदार संघ ने इस संबंध में प्रधान मंत्री को पत्र लिखा है।(द हिन्दू-31 मार्च 22)

लेने वालों में बड़ी हस्तियां भी हैं।

चूंकि बिहार के ठेकेदार संघ ने संभवतः वैसा कोई पत्र कहीं नहीं भेजा है, इसलिए यहां की दर मैं नहीं बता सकता।

हां, बिहार के अधिकतर जन प्रतिनिधियों के क्षेत्रीय फंड में कमीशन की रेट लगभग उतनी ही बताई  जाती है।

पता नहीं सच क्या है !

बाकी जानकार लोग बताएंगे।

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 इस देश में यह सब क्या हो रहा है जबकि हमारा प्रधान मंत्री ईमानदार है !

क्या सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अंततः किसी खूंखार तानाशाह की ही जरूरत पड़ेगी ?

कई निराश लोग तो कहते हैं कि भारत जैसे एक ढीले-ढाले लोकतंत्र में न तो भ्रष्टाचार का कारगर इलाज संभव है और न ही आतंकवाद का।

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31 मार्च 22 


शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

 पश्चिम बंगाल की समस्याओं का एकमात्र 

हल राष्ट्रपति शासन और राज्य का बंटवारा

अन्यथा, पूरे बंगाल की स्थिति कश्मीर वाली हो जाएगी

कुछ हिस्सों में तो हो ही चुकी है।

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अधिकांश मीडिया की खबरों के अनुसार 

 तृणमूल कांग्रेस के दो परस्पर विरोधी गिराहों के बीच सार्वजनिक संपत्ति की लूट के माल के ‘बंटवारे’ को लेकर विवाद था।

वीरभूम जिले में हाल में हुई हिंसा-प्रतिहिंसा का मुख्य कारण 

यही था।

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पर,मुख्य मंत्री ममता बनर्जी यह कह रही हैं कि उक्त नरसंहार के लिए पुलिस को दोष मत दीजिए।

अब सवाल है कि पुलिस की साठगांठ के बिना न तो बिहार में बालू की लूट होती है न ही पश्चिम बंगाल में।किसी अन्य राज्य में भी नहीं।

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दरअसल शासन के बल पर प्रतिपक्षी दलों को पराजित कर देने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के विभिन्न गिरोह आपस में ही मारकाट कर रहे हैं।

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अप्रैल, 2019 में चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक अजय नायक ने,जो बिहार काॅडर के अफसर रहे, कहा था कि 15 साल पहले बिहार की जो स्थिति थी,वही हालत आज पश्चिम बंगाल की है।

बंगाल के लोगों का पुलिस पर भरोसा नहीं है।इस टिप्पणी को लेकर ममता बनर्जी ने अजय नायक के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की थी।

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  पश्चिम बंगाल में हिंसा कोई नई बात नहीं।

खुद ममता बनर्जी वाम मोर्चा के गुंडे के भीषण हमले का शिकार हुई थी।

मरते -मरते बची थीं।

पर सत्ता में आने पर उसी हमलावर गुंडे को ममता ने अपनी पार्टी में शामिल कर लिया।

ऐसे लोगों की उन्हें जरूरत जो थी !

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‘‘चीन के चेयरमैन हमारे चेयर मैन’’के नारे के साथ 1967 में उभरे नक्सलियों ने बंदूक के बल पर सत्ता पर कब्जे की कोशिश बंगाल में शुरू की थी।

  लंबे समय तक हिंसा जारी रही।

1972 में कांग्रेस के सिद्धार्थ शंकर राय सरकार ने नक्सलियों के सफाये के लिए पुलिस और गुंडों की खूब मदद ली।

नतीजतन अनेक अत्यंत  प्रतिभाशाली छात्र, जो नक्सली बन गए थे,मार डाले गए।

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फिर आया वाम मोरचा का राज।

वाम मोर्चा ,खास कर सी.पी.एम. में सिद्धार्थ के अनेक गुंडे शामिल हो गए।

कांग्रेस जब उनका मुकाबला नहीं कर सकी तो निर्भीक व जिद्दी ममता बनर्जी मुकाबले में आई।

अब सत्ता के बल पर ममता के बाहुबलियों की राज्य में तूती बोल रही है।

32 प्रतिशत मजबूत वोट बैंक का जिसे समर्थन हो,उसे भला जल्दी कौन डिगा सकता है ?

उस वोट बैंक का लक्ष्य और चाह न तो विकास है और न सुशासन, बल्कि ‘‘कुछ और’’ ही है।

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यदि कांग्रेस, नरेंद्र मोदी सरकार को राज्य सभा में साथ देती तो बंगाल में अब तक राष्ट्रपति शासन लागू हो गया होता ।

पर कांग्रेस को डर है कि उससे उसका अन्य राज्यों में अपना वोट बैंक गड़बड़ा जाएगा।जबकि, ममता ने बंगाल में कांग्रेस को समाप्त कर दिया है।1999 में बिहार में राष्ट्रपति शासन का विरोध करके कांग्रेस ने बिहार में अपनी लुटिया डूबो चुकी है।

 यदि आज इंदिरा गांधी सत्ता में होती तो ममता सरकार को तुरंत बर्खास्त कर देती।

इसकी अपेक्षा काफी छोटे ‘अपराध’ के कारण इंदिरा राज में राज्य सरकारें बर्खास्त होती रहीं।

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