गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

     हमारे ग्रामीण इलाके की नामी-गिरामी

    दिवंगत हस्तियां जिन्होंने अपनी छाप छोड़ी

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      सुरेंद्र किशोर

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मैं बिहार के सारण जिले के जिस गांव का मूल निवासी हूं,

उस गांव के आसपास कई नामी-गिरामी लोग हुए हैं।

हमें उन लोगों से पे्ररणा मिलती रही।

उनके नाम हैंे-

पृथ्वीनाथ त्रिपाठी-बी.बी.काॅलेजिएट स्कूल,

मुजफ्फरपुर के प्राचार्य

विश्वमोहन कुमार सिन्हा-वाइस चांसलर

राजदेव सिंह-सी.बी.आई.े निदेशक

युगेश्वर पांडेय-बिहार वाणिज्य मंडल के अध्यक्ष

राजेंद्र सिंह,छपरा से 1957 में लोक सभा सदस्य

 और फिरंगी सिंह-स्वतंत्रता सेनानी।

ऐसे अन्य भी होंगे,किंतु मुझे तुरंत उनके नाम याद नहीं।

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ये हस्तियां अब इस दुनिया में नहीं हैं।

मेरी रूचि इस बात में है कि जीवन,संघर्ष और इनकी उपलब्धियों के बारे में संक्षेप में कुछ लिख दूं ताकि नई पीढ़ी जान सके कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकल कर भी किस तरह ये लोग शीर्ष पर पहुंचे।

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 इन्हें करीब से जानने वाले और इनके वंशज इनके बारे में इनके चित्र सहित एक -दो हजार शब्दों में लिखकर मुझे भेजें तो मैं पुस्तक नहीं तो कम से कम सोशल मीडिया के जरिए नई पीढी को इनके बारे में बता सकूंगा।

इससे आज की पीढ़ी को प्रेरणा मिल सकती है। 

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मेरा पता है--

सुरेंद्र किशोर

ग्राम-कोरजी

पोस्ट-मोहम्मद पुर

भाया-खगौल

जिला-पटना

पिन-801105

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 भीषण ठंड के मौसम में बुजुर्गों के 

लिए पुस्तक मेले में जाना कठिन

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सुरेंद्र किशोर

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पटना में दिसंबर में पुस्तक मेला आयोजित करने पर प्रबंधकों को पुनर्विचार करना चााहिए।

 क्योंकि भीषण ठंड के कारण बुजुर्गों व छोटी उम्र के लोगों के लिए पुस्तक मेले में जाना कठिन हो जाता है।

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अक्तूबर या फरवरी में पटना में पुस्तक मेला लगाने के बारे में विचार करना चाहिए।

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8 दिसंबर 22

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सोमवार, 5 दिसंबर 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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 अपराधीकरण पर आयोग की सिफारिश पर गौर 

करे सुप्रीम कोर्ट 

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चुनाव आयोग ने गंभीर अपराधों के आरोप के तहत मुकदमे का सामना कर रहे लोगों को चुनाव नहीं लड़ने देने की सिफारिश की है।

 सन 2013 के नवंबर में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष  इस संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा था।

वह प्रस्ताव अपराधियों को चुनावी राजनीति से दूर रखने के लिए था।

 चुनाव आयोग की राय रही है कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसे मामले में कोर्ट ने आरोप गठित कर दिया है जिसके तहत उसे पांच साल की सजा हो सकती हो,तो उस व्यक्ति को चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाना चाहिए।

 सुप्रीम कोर्ट यदि इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाता है तो वह देश के लोकतंत्र और शांतिप्रिय लोगों के लिए बड़ी राहत की बात होगी।़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़  

पिछले ही महीने सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता की चिंता की है।

उसकी चिंता जायज है।

सबसे बड़ी अदालत की मंशा यह है कि  मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग के अन्य सदस्यों के पदों पर निष्पक्ष लोगों की तैनाती हो।

पर,इस मामले में कोई राह तैयार होने से पहले देश की सबसे बड़ी अदालत चुनाव आयोग की पिछली सिफारिशों को लागू कराने का प्रयास कर सकती है।उससे देश के लोकतंत्र का  भला होता।

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गैर जरूरी उप चुनाव 

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सन 2017 और उसके बाद से अब तक उत्तर प्रदेश के रामपुर में लोक सभा और विधान सभा के कुल पांच चुनाव हो चुके है।

इस महीने छठे चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे।

वैसे तो वहां इस अवधि में लोक सभा व विधान संभा के सिर्फ तीन चुनाव ही होने चाहिए थे।

पर, तीन उप चुनाव भी कराने पड़े।

 ऐसा सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं हुआ है।

देश भर में आए दिन ऐसा होता रहता है।

क्यों न उप चुनावों का प्रावधान ही समाप्त कर दिया जाए ?

 यदि कोई सीट खाली होती है तो उसे सदन की अवधि समाप्त होने तक खाली ही रहने दिया जाए।

या, ऐसी संवैधानिक व्यवस्था हो कि संबंधित दल वैकल्पिक व्यक्ति का नाम दे दे।

उसे सदन का सदस्य मनानीत कर दिया जाए।

इसलिए जरूरी है कि निचले सदन में मनोनयन के लिए कुछ सीटें निर्धारित कर दी जाएं।

हां,इसमें एक अपवाद हो सकता है।यदि कोई सरकार मात्र एक या दो विधायक या सांसद के बहुमत से चल रही हो तो वहां का कोई उप चुनाव टाला नहीं जाना चाहिए।  

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 ़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़हत्या के मामलों की केस डायरी

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दंड प्रक्रिया संहिता ,1973 की धारा -172 के तहत प्रत्येक पुलिस अधिकारी अन्वेषण में की गई अपनी कार्यवाही को दिन -प्रतिदिन एक डायरी में लिखेगा।उसमें उस समय का जिक्र होगा,जब उसे घटना की जानकारी मिली।

वह समय लिखेगा जब उसने जांच शुरू की।वह समय जिन स्थानांे पर अन्वेषण अधिकारी गया।

वह समय भी डायरी में लिखेगा जब उसने जांच का काम पूरा किया।

   याद रहे कि किसी मामले में केस डायरी का बड़ा महत्व होता है।

यदि किसी डायरी में जानबूझ कर हेर-फेर कर दी जाए तो अभियुक्त के बच निकलने की आशंका रहती है।

  क्या बिहार राज्य पुलिस मुख्यालय कम से कम हत्याओं के मामलों में पुलिस थानों में लिखी जा रही डायरियों की माॅनिटरिंग नहीं कर सकती ?

याद रहे कि राज्य में हत्या और हत्या के प्रयासों के मामलों बिहार में अदालती सजा का प्रतिशत असंतोषजनक है।

आधुनिक तकनीकी के इस युग में हत्या के अनुसंधान के कम मंें लिखी जा रही डायरियों का विवरण समय -समय पर राज्य पुलिस मुख्यालय चाहंेे तो अपने पास मंगवा सकता है।या मुख्यालय थानों को यह निदेश दे दे कि वे डायरी भेज दिया करे।

इससे यह होगा कि किसी प्रभाव में आकर केस डायरी में परिवर्तन कर देने की आशंका समाप्त हो जाएगी।   

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     भूली-बिसरी याद

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देशरत्न डा.राजेंद्र प्रसाद ने लिखा है कि ‘‘महात्मा गांधी मनुष्य का चरित्र सुधारने के लिए यह जरूरी समझते थे कि नशा छोड़ दी जाये।

  क्योंकि कोई भी जब नशे में होता है तो उसका विवेक नष्ट हो जाता है।

वह भला-बुरा ,पाप-पुण्य और सत्य-असत्य का भेद समझने में असमर्थ हो जाता है।

उसकी शक्ति इतनी क्षीण हो जाती है कि वह अपने को संभाल भी नहीं सकता।

राजेन बाबू लिखते हैं कि ‘‘इसीलिए गांधी जी नशाबंदी को एक आवश्यक और महत्वपूर्ण बात मानते थे।

वे चाहते थे कि जनता में प्रचार करके नशा छुड़वाया जाए और सरकार भी इसे कानून द्वारा बंद कर दे।

इसीलिए सन 1921 में ही उनके आदेश से शराब,गांजा आदि की दुकानों पर धरना देने का कार्यक्रम प्रारंभ किया गया था।’’ 

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और अंत में

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के.एम.जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश राय के खंड पीठ ने गत 9 नवंबर को एक केस की सुनवाई करते हुए कहा कि ‘‘भ्रष्ट लोग देश को तबाह कर रहे हैं और पैसे की मदद से बच निकलते है।’’

  उससे पहले इसी माह की 3 तारीख को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘‘हमें ऐसा प्रशासनिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता रखता हो।’’

  इन दो शीर्ष हस्तियों की ऐसी टिप्पणियों में भ्रष्टाचार पीड़ित लोगों को उम्मीद की नयी किरण दिखाई पड़ती है।

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प्रभात खबर

पटना

5 दिसंबर 22


   


शनिवार, 3 दिसंबर 2022

 सन 1969 में ‘दिनमान’ में पत्र लिखकर मैंने भी आह्वान किया   था कि सक्रिय राजनीति में ‘‘लौट आओ जयप्रकाश’’

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   सुरेंद्र किशोर

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  वैसे तो जयप्रकाश नारायण ने सन 1974 में ही आंदोलन 

का नेतृत्व करना शुरू किया था।

किंतु उससे पहले मुझ सहित अनेक छोटे-बड़े नेता,कार्यकर्ता,बुद्धिजीवी तथा युवजन उनसे सार्वजनिक रूप से और मिल कर यह अपील करते रहे थे कि आप सक्रिय राजनीति में आ जाइए।

  सबसे गंभीर अपील डा.राम मनोहर लोहिया ने उनसे मिलकर की थी।

जेपी से कहा था कि ‘‘तुम ही इस देश को गरमा सकते हो।’’

वह सच साबित हुआ भी।

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दरअसल जेपी की धर्म पत्नी प्रभावती जी के निधन और उनके मित्र और आजादी की लड़ाई के सहयोगी क्रांतिकारी सूरज नारायण सिंह की निर्मम हत्या के बाद जेपी आंदोलन में कूद पड़ने के लिए उनकी मानसिक पृष्ठभूमि तैयार हो गई।स्वास्थ्य कारणों से प्रभावती जी उन्हें सक्रिय होने नहीं देती थंीं।

सूरज बाबू की हत्या से जेपी के मन में शासन के प्रति क्षोभ  

भर उठा।

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जेपी के ‘‘लौट आने’’ के लिए उससे पहले मैंने दिनमान(18 मई,1969)में एक चिट्ठी लिखी थी।

मैं उन दिनों सुरेंद्र अकेला के नाम से लिखा करता था।

‘दिनमान’ तब की सर्वाधिक लोकप्रिय व प्रतिष्ठित पत्रिका थी।मत-सम्मत यानी संपादक के नाम पत्र भी पढ़े जाते थे।

जिस पत्रिका के संपादक सच्चिदानंद (हीरानंद) वात्स्यायन

(अज्ञेय) हों।

जिस पत्रिका के बिहार संवाददाता फणीश्वरनाथ रेणु हों,उस पत्रिका का भला क्या कहना !

संभवतः खुद जेपी भी उसे पढा कऱते थे।

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रेणु जी बिहार विधान सभा की प्रेस दीर्घा में बैठकर भी रिपोर्टिंग करते थे।

नियम को शिथिल करके पहली बार किसी साप्ताहिक पत्रिका के संवाददाता को विधान सभा की प्रेस दीर्घा का प्रवेश पत्र मिला था।रेणु जी जब संवाददाता बन जाएं तब तो नियम शिथिल होना ही था।

प्रस पास उन्हें मिले भी क्यों नहीं !

स्पीकर के पद उन दिनों लक्ष्मी नारायण सुधांशु विराजमान थे जो खुद साहित्यकार भी थे।

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अब मैं अपनी वह चिट्ठी यहां प्रस्तुत करता हूं।

उस चिट्ठी का शीर्षक था-

   ‘‘लौट आओ जयप्रकाश’’

 पूरा पत्र इस प्रकार है--

 श्री जयप्रकाश नारायण के समय-समय पर व्यक्त विचारों से लगता है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं में आज भी उनकी गहरी रुचि है।

  विनोबा के आदर्शों और कार्य पद्धतियों के औचित्य-अनौचित्य तथा उसमें जयप्रकाश के बहुमूल्य जीवन के सदुपयोग-दुरुपयोग की चर्चा छोड़ भी दी जाए तो भी एक सवाल तो बच ही जाता है कि क्या जयप्रकाश जी ने अपने विचारों के मौलिक पविर्तन के कारण राजनीति को छोड़ देश-सेवा का व्रत लिया है ,या देश की गंदी राजनीति से ऊबकर पलायनवादिता का सहारा लेकर राजनीति से विरत हुए हैं ?

  इसका जवाब उन्हें ही देना है।

 देश जब इस भयंकर आर्थिक संकट ,क्षेत्रीय बिखराव और भावनात्मक विभेद के दौर से गुजर रहा हो,तो जयप्रकाश नारायण तट पर सर्वोदय की छाया में खडे़ हों और ऐसे आदर्शों की बातें करते रहें जिनकी पूर्ति मर कर भूत बन जाने के बाद भी होने की आशा दूर -दूर नहीं दिखाई पड़े तो आनेवाली पीढ़ी कभी उन्हें माफ नहीं करेगी।

   यदि उनके दिल में थोड़ी भी द्विविधा हो तो उन्हें निर्भयतापूर्वक पुनर्विचार करना चाहिए।

  सक्रिय राजनीति में उनके लौटते कदम का स्वागत वे सारे लोग करेंगे जिन्हें देश का समाजवादी -जनतांत्रिक भविष्य धूमिल होता नजर आ रहा है।

  ---सुरेंद्र अकेला,  

   भरतपुर(सारण)

साप्ताहिक दिनमान,18 मई 1969

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(तब का सुरेंद्र अकेला अब का सुरेंद्र किशोर)

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दशकों बाद अपने इस पत्र को दुबारा मैंने पढ़ा है।

मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि मैं उस कम उम्र में भी ऐसी चिट्ठी लिख सका।

हालांकि एक कमी जरूर रही ।वाक्य लंबे थे।

लंबे वाक्य पाठकों के दिमाग पर बोझिल होते हैं

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3 दिसंबर 22





  


गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

 भगवान भी उसी की मदद करता है 

जो अपनी मदद खुद करे !

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 महा कालेश्वर के समक्ष राहुल गांधी का साष्टांग दंडवत

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  सुरेंद्र किशोर

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इस पोस्ट के साथ नीचे ‘इंडियन एक्सप्र्रेस’ की कटिंग है।

उसमें एक चित्र है।

चित्र में यह नजर आ रहा है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के गर्भ गृह के सामने दंडवत प्रणाम कर रहे हैं।

यानी, पेट के बल लेट कर प्रणाम !

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एक कहावत है कि भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है।

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कांग्रेस ने सन 1984 के बाद ‘खुद की मदद करना’ बंद कर दिया है।

कल्पना रहित नेतृत्व इसका सबसे बड़ा कारण है।

उसके कुछ अन्य कारण भी हैं।

उन कारणों को दूर किए बिना महाकालेश्वर भी उनकी मदद नहीं कर सकते।

पर, कांग्रेस नेतृत्व उन कारणों को दूर करने को क्या अब भी तैयार है ?

क्या उसे उन कारणों की पहचान भी है ?

शायद नहीं है।

या, है भी तो लगता है कि कांग्रेस अपने-आप को सुधारने की क्षमता भी अब खो बैठी है।

एक लोकतांत्रिक मिजाज का व्यक्ति होने के कारण मेरी यह व्यक्तिगत राय रही है कि कांग्रेस कम से कम एक मजबूत व जिम्मेवार प्रतिपक्ष की भूमिका निभाना सीख जाए।

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अवसान के कारण 

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सन 2014 लोस चुनाव में करारी हार के बाद गठित ए.के. एंटोनी समिति ने कहा था कि ‘‘हम इसलिए हारे क्योंकि मतदाताओं को यह लगा कि कांग्रेस अल्पसंख्यकों की तरफ जरूरत से अधिक झुकी हुई है।’’

एंटोनी ने अन्य बातें भी कहीं।

किंतु कांग्रेस नेतृत्व ने उस रपट पर ध्यान भी नहीं दिया।यानी खुद में सुधार नहीं किया।

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 पराभव के कुछ अन्य ठोस कारण भी हैं।

उन कारणों को समझने,स्वीकारने और उन्हें दूर करने की जरूरत है।

 भ्रष्टाचार,घोटाले-महा घोटाले कांग्रेस के पतन के दूसरे कारण रहे।

टुकड़े -टुकड़े गिरोह तथा अन्य देश तोड़क ताकतों के खिलाफ कांग्रेस डटकर खड़ी नहीं हो पा रही है।

उसकी वोट बैंक की राजनीति उसमें बाधक है।

इस रुख ने कांग्रेस को जनता में काफी कमजोर बनाया।

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 भ्रष्टाचार के प्रति कांग्रेस की क्या राय है ?

क्या वही राय है जो नोबेल विजेता व राहुल गांधी के अघोषित आर्थिक सलाहकार अभिजीत बनर्जी की है जिन्होंने कांग्रेस को ‘‘न्याय योजना’’ का मंत्र दिया है ?

अभिजीत बनर्जी ने 2019 में कहा था कि ‘‘नरेंद्र मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार को देश की अर्थ व्यवस्था से काट कर अलग कर दिया जो अच्छा नहीं हुआ।’’(हिन्दुस्तान टाइम्स)

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एक ही परिवार के तीन अकुशल मांझी डगमगाती नाव को तीन दिशाओं की ओर अनंत काल तक खींचते नहीं रह सकते।

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इस देश के बड़े -बड़े नेता विदेशों में जाकर अपना इलाज तो करवाते ही हैं।

उसी तरह जिन दलों की लोकप्रियता में गिरावट जारी है,वे भी विदेशी विशेषज्ञों को बुलाकर गिरावट के कारणों की जांच करवा लें।

उन कारणों को दूर करने का उपाय करें।

तभी दलों का पुनरुद्धार संभव है।

मेरा मानना है कि कारणों का जो विवरण मैंने यहां दिया है,वैसा ही विवरण किसी विदेशी विशेषज्ञ से भी उन्हें प्राप्त होगा।

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30 नवंबर 22  



 स्वहित,परिवार हित और जाति हित की परवाह किए बिना आबकारी मंत्री जगलाल चैधरी ने कभी लागू कर दिया था बिहार में पूर्ण नशाबंदी  

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सुरेंद्र किशोर

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आजादी के बाद की बिहार सरकार में जगलाल चैधरी आबकारी मंत्री थे।

  वैसे तो वे सन 1937 में गठित राज्य मंत्रिमंडल में भी चार मंत्रियों में एक मंत्री थे।

अन्य तीन थे-डा.श्रीकृष्ण सिंह (प्रीमियर),डा.अनुग्रह नारायण सिंह और डा.सैयद महमूद।

जगजीवन राम उस सरकार के संसदीय सचिवों में से एक थे। 

  चैधरी जी पासी जाति से आते थे।

खुद उनका परिवार ताड़ी के व्यवसाय पर निर्भर था।

 इसके बावजूद आबकारी मंत्री के रूप में जगलाल चैधरी ने नशाबंदी लागू कर दी।

उनका परिवार ताड़ी की आय से ही चैधरी जी को कलकता मेडिकल काॅलेज में डाॅक्टरी पढ़ा रहा था।

फिर भी चैधरी जी ने न तो अपने परिवार की आय की परवाह की और न अपनी जाति के आर्थिक हित की।

 बाद में खुद उन्हें नशाबंदी की भारी कीमत चुकानी पड़ी।

कांग्रेस हाईकमान ने चैधरी जी को बाद में कभी 

 मंत्री नहीं बनने दिया।

  दरअसल चैधरी जी कट्टर गांधीवादी थे।

(इस राजनीतिक घटना से भी इस आरोप के बल मिलता है कि आजादी के तत्काल बाद की कांग्रेस व उसकी सरकारों को गांधीवाद से कम ही मतलब रह गया था।) 

दरअसल चैधरी जी नशाखोरी से होने वाले नुकसान को जानते थे।गांधी जी ने उन्हें सिखाया था।

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   आबकारी मंत्री चैधरी ने कहा था कि ‘‘जब मैं अपने बजट को देखता हूं तो मालूम होता है कि इस साल हम पंद्रह करोड़ रुपए खर्च करेंगे।इसमें हम पांच करोड़ रुपए तो गरीबों के पाॅकेट से उन्हें शराब पिला कर लेंगे।’’

(याद रहे कि गांधी ने कहा था कि यदि सरकारी स्कूल का खर्च आबकारी आय से चलता हो तो वैसे स्कूलों का न चलना ही बेहतर है।)

कट्टर गांधीवादी जगलाल चैधरी के नशाबंदी आदेश से सबसे अधिक नुकसान उनकी अपनी ही पासी जाति को हुआ था।पर इस बारे में वे कहते थे कि 

‘‘यह समाज कोई और रोजगार करे।

गरीब -दलित यदि शराब का व्यापार और शराब पीना छोड़ देंगे तो उनकी प्रतिष्ठा भी समाज में बढ़ेगी और उनकी गरीबी भी कम होगी।’’

पर, उनके मंत्री नहीं रहने पर नशाबंदी का आदेश बिखर गया था।

 बाद के मंत्रिमंडल में जब उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया तो राजनीतिक हलकों में यह आम चर्चा थी कि शराबबंदी के पक्ष में  उनके विशेष आग्रह के कारण ही ऐसा हुआ।

 चैधरी जी पर कांग्रेस हाईकमान भी नाराज हो गया था। 

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याद रहे कि गांधी जी से प्रभावित होकर जगलाल चैधरी ने जब आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए पढ़ाई छोड़ दी तब वे कलकत्ता में मेडिकल छात्र थे।

उनका चैथा साल था।

पर , उन्होंने कहा कि अब मेरे लिए इस पढ़ाई का कोई मतलब नहंीं रहा। 

  संयोग से वे उस चुनाव क्षेत्र (गड़खा,सारण)से लड़ते थे जहां मेरा पुश्तैनी गांव है।

उन्हें मैंेने अपने गांव में बचपन में देखा था।

सादगी की प्रतिमूत्र्ति थे।

वे लोगों से कहा करते  थे कि आपलोग अंग्रेजी दवाओं से भरसक दूर रहें।

खेतों में रासायनिक खादों के बदले जैविक खाद डालें।भूजल स्त्रोतों की रक्षा करें।यानी, कम से कम ट्यूब वेल लगवाएं।

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  एक और प्रकरण और !

चैधरी जी की बेटी की जब शादी थी,तब वे बिहार में मंत्री थे।

उनकी सरकार ने हाल ही में विधायिका से गेस्ट कंट्रोल एक्ट पास करवाया था।

शायद उसके अनुसार अत्यंत सीमित संख्या --तीस या पैंतीस --में ही अतिथियों को बुलाने का नियम बनाया गया।

बारात आई।उतने ही लोगों का खाना बना था।

पर,बिना बुलाए कई अतिथि आ गए।

नतीजतन खुद चैधरी जी के परिवार को उस रात भोजन नहीं मिला।

चैधरी जी ने अतिरिक्त भोजन नहीं बनने दिया था।

शादी को सम्मेलन बनाने वाले नेताओं के आज के दौर में 

जगलाल चैधरी याद आते हैं।

हालांकि गेस्ट कंट्रोल एक्ट आज भी लागू है ,पर सिर्फ कागज पर। 

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एक जगलाल चैधरी थे,और दूसरी ओर आज के अनेक नेता हैं जो बिहार में जारी शराबबंदी को फिर से चालू करवाना चाहते हैं।

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1 दिसंबर 22


 मेरे बारे में आलोक तोमर के तीन वाक्य  

 किसी पुरस्कार से कम नहीं

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सुरेंद्र किशोर

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पत्रकारीय जीवन (1977-अब तक )में कोई भी पद,पुरस्कार,सम्मान या उपहार आदि मेरे नाम दर्ज नहीं है।

या तो मिला नहीं या लिया नहीं !

इस बारे में जिन्हें जो समझना हो,समझ सकते हैं।

हां, एक बात जरूर जहां-तहां दर्ज है।

वह है कि मेरे लेखन के प्रति कुल मिलाकर सराहना के शब्द।

मैंने शुरू से ही यह मानता रहा कि वही मेरे लिए बड़ा से बड़ा पुरस्कार होगा।

बाकी पुरस्कारों में से अधिकतर के पीछे ‘‘कुछ-कुछ होता रहता है।’’

हां,सबके पीछे नहीं।

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 कुछ वैसे ही शब्दों के साथ हिन्दी के चर्चित व अद्भुत पत्रकार आलोक तोमर को मैं आज याद कर रहा हूं।

बात तब की है कि जब आलोक तोमर ग्वालियर में दैनिक ‘स्वदेश’ में काम कर रहे थे।

सन 1983 से पहले की बात है।

मैं पटना में दैनिक ‘आज’ में सेवारत था।

साथ-साथ, अनेक पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ ‘नईदुनिया’ के लिए भी बिहार से खूब लिखता था।

उन दिनों इन्दौर से प्रकाशित दैनिक नईदुनिया देश का सर्वश्रेष्ठ हिन्दी अखबार माना जाता था।राजेंद्र माथुर उसके संपादक थे।वह मध्य प्रदेश का तब सर्वाधिक प्रसार वाला अखबार था।

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आलोक ने मुझे ग्वालियर से लिखा,

‘‘आपका नाम इस इलाके में नईदुनिया के चलते काफी लोकप्रिय है।

एकाध ने तो भरोसा ही नहीं किया कि मैं जो पत्र दिखा रहा हूं ,वह वास्तव में आपका ही है।

 आपके प्रभामंडल का शिकार हो गया मैं।’’

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याद रहे कि बिहार के मूल वासी अंग्रेजी पत्रकार हेमेंद्र नारायण मध्यप्रदेश में तैनात थे और उन्होंने आलोक के बारे में मुझे बताया था।

उस पर मैंने आलोक को एक चिट्ठी थी।

उसी की चिट्ठी की चर्चा कर रहे थे आलोक।

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बाद में आलोक ने नई दिल्ली

में ‘यूनीवार्ता’ ज्वाइन की।

उसके बाद ‘जनसत्ता’।

प्रभाष जोशी के अत्यंत प्रियपात्र रहे आलोक ने ‘जनसत्ता’

में ऐसी रिपोर्टिंग की जो सब लेखन शैली का उदाहरण बन गया।

  आलोक अपने समय के स्टार रिपोर्टर थे।

11 साल पहले उनका निधन हो गया।

उन्होंने जब मुझे चिट्ठी लिखी थी,तब वे अपने पत्रकारीय जीवन के निर्माण काल में थे।

पर,उस समय भी चीजों पर उनकी पकड़ पैनी और मजबूत थी।

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लगता है कि ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को समय से पहले ही ईश्वर अपने पास बुला लेते हैं।

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30 नवंबर 22