शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

 जावेद अख्तर और दिग्विजय सिंह का फर्क !

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सुरेंद्र किशोर

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गीतकार जावेद अख्तर ने पाकिस्तान जाकर पाकिस्तानियों से कहा कि जिन लोगों ने 26 नवंबर 2008 को मुम्बई पर हमला किया,वे अब भी यहां आजादी घूम रहे हैं।

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दूसरी ओर, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने तब कहा था कि मुम्बई पर जो हमला हुआ था,वह आर.एस.एस.ने करवाया था।

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कांग्रेस के एक थिंक टैंक मणिशंकर अय्यर ने सन 2015 में 

पाकिस्तान जाकर वहां के 

 एक टी.वी चैनल के जरिए वहां के लोगों से सार्वजनिक रूप से यह यह अपील की थी कि ‘‘आप लोग मोदी को हटाइए और हमें सत्ता में लाइए।’’

मणि शंकर को यह पता होना चाहिए कि इस देश में जावेद अख्तर जैसे लोग भी हैं,जो पाक के कहने पर भारत में किसी को वोट नहीं देते।

बल्कि वे पाकिस्तान में जाकर उनसे यह कहने का साहस  दिखाते हैं कि मुम्बई पर हमला आप लोगों ने ही करवाया था।

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मणि शंकर और दिग्विजय दोनों अब भी कांग्रेस में ही हैं।

ऐसे में राहुल गांधी की ‘‘भारत जोड़ो यात्रा’’ कौन सा राजनीतिक लाभ मिलने वाला है !!!

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22 फरवरी 23


सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

 29 फरवरी, 1896 को जन्मे थे मोरारजी देसाई

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चूंकि इस साल 29 फरवरी आएगी नहीं,इसलिए उन्हें आज ही याद कर लें

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जानिए किस पीएम की जान बचाने के लिए एयरफोर्स के 5 अफसरों ने गंवाई थी अपनी जान

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देश में एक पीएम ऐसे थे जिन्होंने सरकार के पैसे बचाने के लिए छोटे विमान का इस्तेमाल किया और अपनी जान खतरे में डाल दी थी।

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--सुरेंद्र किशोर--

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 4 नवंबर, 1977 को तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई  विमान दुर्घटना में बाल -बाल बचे थे।

दरअसल वायु सेना के चालक दल के पांच सदस्यों ने आत्म बलिदान देकर प्रधान मंत्री को साफ बचा लिया था।

  वायु सेना का वह विमान उस दिन असम में जोरहाट के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।

खराब मौसम और तेल की कमी के कारण विमान का ‘नोज- -डाइव’ कराना पड़ा था।

नोज डाइव यानी, नाक की सीध में विमान को धरती पर गिरा दिया गया।

   दिल्ली से उड़ान भरने से पहले अफसरों ने प्रधान मंत्री देसाई से यह आग्रह किया था कि जोरहाट दिल्ली से काफी दूर है । इस विमान में ईंधन की टंकी छोटी है।

इसलिए आप बोइंग -737 से यात्रा करें।

पर,मोरारजी देसाई ने कहा कि हम सामान्य विमान से ही जाएंगे।उनका आशय यह था कि बोइंग -737 पर खर्च अधिक आएगा।गांधीवादी मोरारजी देसाई अपने प्रधान मंत्रित्व काल में सेवा विमान से ही विदेश यात्रा पर जाते थे,भले वह यात्रा सरकारी होती थी।विशेष विमान से न जाने के कारण कई पत्रकार उनसे नाराज रहते थे।याद रहे कि उनसे पहले

और बाद के प्रधान मंत्री विशेष विमान में बड़ी संख्या में पत्रकारों को अपने साथ विदेश ले जाया करते थे।

 सन 1977 में वायु सेना के जिन अफसरों ने आत्म बलिदान दिया था,उनमें विंग कमांडर सी.जे.डी.लिमा,विंग कमांडर जोगिन्दर सिंह,स्क्वाड्रन लीडर वी.वी.एस.सुनकर,स्क्वाड्रन लीडर एम.सायरिक और फ्लाइट लेफ्टिनेंट ओ.पी.अरोड़ा शामिल थे।

  वे टी.यू.-124 पुष्पक विमान से वहां गए थे।

विमान 4 नवंबर,1977 को दिल्ली से शाम सवा पांच बजे उड़ा।

उसे पौने आठ बजे जोरहाट पहुंचना था।

पर,असम में प्रवेश करने के बाद अचानक विमान का संबंध जमीन से टूट गया।

विमान जोरहाट के पास आकाश में चक्कर लगाने लगा।

ईंधन खत्म होने का डर था।विमान को उसकी नाक के बल पर खेत में यानी बांस के उपवन में गिराना पड़ा।इससे यह हुआ कि विमान के पिछले हिस्से में बैठे महत्वपूर्ण सवारों की जानें बच गई।पर काॅकपीट में पांचों अफसर शहीद हो गए।

साथ चल रहे फ्लाइट लेफ्टिनेंट पी.के. रवीन्द्रण और काॅरपोरल के.एन.उपाध्याय प्रधान

मंत्री और उनके सहयात्रियों को पास के टेकेला गांव ले गए।

प्रधान मंत्री के साथ उनके पुत्र कांति देसाई,सर्वोदय नेता नारायण देसाई और अरूणाचल प्रदेश के मुख्य मंत्री पी.के. थंुगन थे।

 इन्हें चोटें आई थीं।

वायु सेना के एक जवान पास के गांव से एक जीप लेकर वायु सेना के निकट के केंद्र में गए और संबंधित लोगों को जानकारी दी।

यह भी बताया कि प्रधान मंत्री सुरक्षित हैं।

मदद करने वाले ग्रामीण इंन्द्रेश्वर बरूआ को तब प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने आश्वासन दिया था कि इस गांव का विकास किया जाएगा और आपको इनाम दिया जाएगा।

पर,इस संबंध में तैयार फाइल प्रधान मंत्री आॅफिस में 26 साल तक पड़ी रही।

 

हमारी सरकारें किस तरह काम करती हैं,उसका एक और नमूना  3 अप्रैल, 2003 के दिल्ली के एक अखबार में छपी संबंधित खबर से मिला।

  खबर का संबंध 4 नवंबर, 1977 को असम के जोरहाट के पास के एक गांव में हुई चर्चित विमान दुर्घटना से था।

मोरारजी देसाई को बचाने में मुख्य भूमिका तो उन जांबाज विमान चालक दल की थी जिन्होंने अपनी जान देकर प्रधान मंत्री को बचा लिया था।

  पर, दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका उस गांव के इंद्रेश्वर बरूआ की थी जिन्होंने उस अंधेरी रात में मोरारजी की मदद की।

याद रहे विमान बांस के उप वन में गिर गया था।

तब प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने उस गांव के विकास का  घटनास्थल पर ही वादा किया था।साथ ही, बरूआ को इनाम देने का भी वचन दिया था।

 गांव के विकास का क्या हुआ,यह तो पता नहीं चला,पर इनाम की फाइल प्रधान मंत्री आॅफिस में लटक गयी ।सन 1979 में मोरारजी प्रधान मंत्री पद से हट गए।

मोरारजी देसाई के बाद बारी -बारी से सत्तासीन हुए आठ प्रधान मंत्रियों का ध्यान उस फाइल की ओर अफसरों ने नहीं खींचा ।

दरअसल किसी पिछले प्रधान मंत्री के प्रति बाद के प्रधान मंत्री के रुख-रवैये का अनुमान लगा कर ही अफसर ऐसी फाइल की ओर मौजूदा प्रधान मंत्री का ध्यान खींचते हैं। 

जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधान मंत्री बने तो प्रधान मंत्री सचिवालय में धूल खा रही संबंधित फाइल किसी संवेदनशील अफसर ने उन्हें दिखाई।अटल जी ने सन 2003 में यानी 26 साल बाद बरूआ को डेढ़ लाख रुपए इंद्रेश्वर बरूआ को भिजवाए थे। 

हां वायु सेना ने रवीन्द्रण और उपाध्याय को शौर्य चक्र देने में कोई देर नहीं की थी।

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मेरे लेख का संपादित अंश वेबसाइट ‘मनी कंट्रोल हिन्दी’ में आज 20 फरवरी 23 को प्रकाशित 


शनिवार, 18 फ़रवरी 2023

 इस देश के राजनीतिक दलों का राष्ट्रहित 

पर भी असंतुलित रवैया चिंताजनक

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   सुरेंद्र किशोर

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बागेश्वर धाम के बड़बोले बाबा पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री कह रहे हैं कि हम ‘‘जनमत और बहुमत के बल पर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे।’’

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दूसरी ओर, प्रतिबंधित जेहादी संगठन पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया कह रहा है कि ‘‘हम हथियारों के बल पर सन 2047 तक भारत को मुस्लिम राष्ट्र बना देंगे।’’

जांच एजेंसी के सूत्रों के अनुसार, इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पी.एफ.आई.बड़े पैमाने पर देश में आग्नेयास्त्र बांट रहा है।

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इन दो पाटों के बीच हमारे जैसे ‘संविधानवादियों’ का अंततः क्या हश्र होगा ?!!

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खैर, हमारा जो भी हश्र हो,वह तो बाद में देखा जाएगा।

पर, पहले इस बात पर गंभीरता से गौर कीजिए कि विभिन्न राजनीतिक दलों का इन दोनों तरह के अतिवादी संगठनों के प्रति मौजूदा रवैए के कारण उनका व देश का 

क्या हश्र हो सकता है !

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जहां तक मेरी जानकारी है,भाजपा के कोई नेता पंडित धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ कोई बयान नहीं दे रहे हैं।

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दूसरी ओर, भाजपा विरोधी दलों के खास कर तथाकथित ‘‘सेक्युलर’’ दलों के कोई नेता या पत्रकार-बुद्धिजीवी पाॅपुलर फं्रट को नाराज करने वाली कोई बात नहीं बोल रहे हंै।

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एक पूर्व उदाहरण,

27 फरवरी , 2002 की सुबह में ही गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन पर मुस्लिम अतिवादियों ने टे्रन के डिब्बे में पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी और 59 कार सेवकों को जिन्दा जला दिया।

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उस दिन पूरे दिन वह खबर चलती रही।

 पर,जहां तक मुझे याद है,किसी ‘सेक्युलर नेता’ ने कार सेवक दहन कांड की निन्दा करते हुए कोई बयान नहीं दिया।

हां, जब गुजरात में हिन्दू अतिवादियों ने जवाबी हिंसा शुरू की तो सभी सेक्युलर दल एक साथ भाजपा और मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी पर टूट पड़े।

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इस पक्षपाती रवैये का नतीजा--

तब से आज तक गुजरात विधान सभा चुनाव में कोई दल भाजपा को हरा नहीं सका।

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काश ! गोधरा कार सेवक दहन कांड और बाद की हत्याओं कीे समान रूप से सेक्युलर दलों ने तब निन्दा की होती।

 मेरी समझ से तब गुजरात में गैर भाजपा दलों की लगातार शर्मनाक पराजय नहीं होती।बल्कि नरेंद्र मोदी का भी राष्ट्रीय फलक पर उदय संभवतः नहीं होता।

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17 फरवरी 23 


शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

    कर्पूरी ठाकुर की पुण्य तिथि पर 

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  26 मार्च, 1972 को कर्पूरी ठाकुर ने मुझसे कहा था,

‘‘आप तेज ,मृदुभाषी और सुशील लड़का हैं।’’

(मेरी निजी डायरी में यह बात दर्ज है) 

तब मैं एक समाजवादी कार्यकर्ता के तौर पर कर्पूरी जी का निजी सचिव था।

उनके बुलावे पर मैं उनसे जुड़ा था।

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कर्पूरी जी इस तरह अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाते थे।

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ऐसे मामलों में आज के शीर्ष नेताओं का अपने दल के सामान्य कार्यकर्ताओं से ‘व्यवहार’ का मुझे कोई अनुभव या जानकारी नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर

17 फरवरी 23 


मंगलवार, 14 फ़रवरी 2023

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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पाटलिपुत्र विवि को बख्तियारपुर में भूमि देने का प्रस्ताव सही 

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मुख्य पटना नगर से भीड़-भाड़ कम करना समय की सख्त जरूरत है।

  ऐसा जल्द से जल्द नहीं हुआ तो बाद में पछताना पड़ेगा।

न सिर्फ शासन को बल्कि निवासियों को भी।

 समस्या को कम करने के लिए बिहार सरकार ने पाटलिपुत्र विश्व विद्यालय के लिए बख्तियारपुर के पास दस एकड़

जमीन देने की योजना बनाई है।

विश्व विद्यालय के प्रस्तावित स्थानांतरण का विरोध हो रहा है।विरोध के पीछे दूरदृष्टि नहीं है।

मुख्य पटना पर से बढ़ती आबादी का बोझ घटाने के लिए कुछ अन्य संस्थानों को भी आसपास के इलाकों में स्थानांतरित करना पड़ेगा।

गंगा पार सारण जिले में जमीन मिलने में अभी आसानी होगी।

याद रहे कि सारण जिले के कुछ अंचलों को पटना महानगर का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव है।

बढ़ती आबादी के कारण भी नगरों में प्रदूषण की समस्या विकराल होती  जा रही है।यूनाइटेड नेशन्स की डराने वाली एक रपट सन 2019 में आई थी।

उसमें कहा गया कि एशिया और अफ्रीका में पर्यावरण और जल प्रदूषण की समस्या अति गंभीर है।यदि उस पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो  इस सदी के मध्य तक लाखों लोगों की अकाल मृत्यु हो जाएगी।

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पंचायती राज की विफलता

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 शिक्षकों की नियुक्ति का काम पहले ग्राम पंचायतों और नगर निकायों के जिम्मे था।

कटु अनुभवों के बाद अब वह काम आयोग करेगा।

इसके लिए अलग नियम होंगे।

यानी, पंचायतों और नगर निकायों से यह अधिकार वापस लिया जा रहा है।

कई साल पहले जब यह अधिकार पंचायतों और नगर निकायों को दिया गया था तो एक खास तरह की कल्पना राज्य सरकार ने की थी।

माना गया था कि अधिकतर जन प्रतिनिधियों के बाल-बच्चे भी तो उन्हीं स्कूलों में पढ़ते हैं।उनके बेहतर भविष्य की चिंता करते हुए वे योग्य शिक्षक बहाल करेंगे।

पर,पिछले अनुभवों ने बताया कि अधिकतर जन प्रतिनिधियों ने अपने बच्चों के भविष्य के बदले किन्हीं अन्य ‘चीजों’ की ंिचंता की।नतीजतन बड़ी संख्या में अयोग्य शिक्षक बहाल कर लिए गए।हालांकि सारे शिक्षक अयोग्य नहीं हैं।

ठीक ही कहा गया है कि यदि आप अपने अधिकारों का सदुपयोग नहीं करेंगे तो वे अधिकार एक न एक दिन आपके पास नहीं रहेंगे।

अब बिहार सरकार पर जिम्मेदारी है कि वह प्रस्तावित चयन आयोग के काम पर सतत निगरानी रखे।

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  संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण

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गत 8 फरवरी को राहुल गांधी ने लोक सभा में जोरदार भाषण किया।

किंतु अपने भाषण में उन्होंने 18 बार ऐसी बातें कह दीं

 जिन्हें सभाध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही से हटा दिया।

राहुल गांधी ने ऐसी बातें कही थीं जो उन्हें सदन में नहीं कहनी

चाहिए थी।उनकी कुछ बातें असंसदीय थीं।

कुछ ऐसे आरोप थे जिनके बारे में उन्होंने स्पीकर को पहले से नहीं बताई थी।

  ऐसे मामलों में एक प्रश्न खड़ा होता है।क्या अब भी सदन की कार्यवाही को लाइव प्रसारण किया जाना चाहिए ?

बड़ी संख्या में लोग उसे देखते हैं।

राहुल गांधी की बातें उन तक तो पहुंच ही गईं।

यानी, कार्यवाही से हटा देने का कितना लाभ हुआ ?

पूरा लाभ तो नहीं हुआ।

ऐसी समस्या अक्सर आती रहती है।

हां,यदि टी.वी.चैनलों पर प्रसारण से पहले संसद की कार्यवाही का संपादन करने का प्रावधान होता तो ऐसी समस्या नहीं आती।

यही समस्या विधान सभाओं के सीधा प्रसारण के दौरान पैदा होती रहती है।  

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भूली-बिसरी याद

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सन 1977 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले की बात है।

जयप्रकाश नारायण प्रतिपक्षी दलों में एकता चाहते थे।

कुछ प्रतिपक्षी दल अपना अलग अस्तित्व बनाए रखने के पक्ष में थे।

जेपी चाहते थे कि सब मिलकर एक दल बनाएं जिससे जनता में उनके प्रति विश्वास बढ़े।

जब दलों के विलयन में देर होने लगी तो जेपी ने कहा कि आपलोग नहीं मिलेंगे तो हम अलग से पार्टी बना लेंगे।इसके बाद राजनीतिक दल ‘लाइन’ पर आ गए।

पर,दो समस्याएं और थीं।कुछ प्रतिपक्षी नेता ये मुद्दे उठाने लगे।

मोरारजी देसाई का अड़ियल स्वभाव और जनसंघ की एक खास तरह की छवि।

इस समस्या का हल कुछ इस तरह हुआ।उन प्रतिपक्षी नेताओं को जेपी ने बताया कि मोरारजी भाई ने एक बार मुझसे एक बात कही थी।वह यह कि ‘जेपी, मैंने विपक्ष में पांच साल रहकर जितना सीखा है,उतना सरकार में रहते हुए 20 वर्षों में भी नहीं सीखा।’

  जेपी की यह राय थी कि ‘जनसंघ अब सांप्रदायिक चरित्र वाला दल नहीं रह गया है।

पार्टी के नजरिए में बदलाव आया है।

जनसंघ एक राष्ट्रीय दल के रूप में उभर सकता है।’

इस तरह कुछ दलों को मिलाकर तब बन पाई थी जनता पार्टी। 

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और अंत में

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मई, 2018 में पटना के जिलाधिकारी कुमार रवि ने यह घोषणा की थी कि 

जिला प्रशासन उन व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बंद करा देगा जहां पार्किंग की व्यवस्था नहीं है।

वैसे प्रतिष्ठानों के मालिकों को दो बार नोटिस दिया जाएगा।बात नहीं मानने पर दो बार जुर्माना लगाया जाएगा।उस पर भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो प्रतिष्ठान बंद कर दिए जाएंगे।

  इस दिशा में क्या प्रगति हुई है,यह किसी को नहीं मालूम। 

वैसे यह समस्या बिहार के सारे नगरों की है।

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12 फरवरी 23


शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

 शराब बंदी को लेकर मुख्य मंत्री 

 की दृढ इच्छा सराहनीय

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कल कहा कि 

‘शराबंदी खत्म नहीं होने देंगे।’

मैंने पिछले कुछ दशकों में अपने पेशे के साथ-साथ विभिन्न पेशों के अनेक परिचितों को शराब के अति सेवन के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त होते देखा है।

  कई प्रतिभाशाली पत्रकार शराब-सिगरेट-गलत खानपान के कारण अपने परिवारों को रोते-कलपते छोड़ असमय गुजर गए।

 सीमित आय वाला व्यक्ति जब शराब पीकर समय से पहले गुजर जाता  है तो अधिकतर मामलों में उसके परिवार को 

भारी कष्ट उठाना पड़ता है।

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  जो लोग यह कहते हैं कि बिहार में शराब बंदी विफल है,उनसे मैं पूछना चाहता हूं कि इस ढीले-ढाले लोकतंत्र में कौन सा अन्य कानून पूरी तरह सफल है ?

 आई.पी.सी.के तहत के अपराधों में सजा की दर इस देश में 56 प्रतिशत है।

बिहार में हत्या के मामले में सजा की दर तो बहुत ही कम है।

तो क्या दफा-302 को समाप्त कर दिया जाना चाहिए ?

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मेरे अनुमान के अनुसार बिहार में शराबबंदी की सफलता की दर लगभग उतनी है जितनी आई.पी.सी.के तहत के अपराधों में सजाओं की दर है।

इस बात का भी अनुमान करिए कि शराब बंदी के कारण नए पियक्कड़ों की ंसंख्या में पहले जैसी बढ़ोत्तरी़ अब नहीं हो रही है।

आम तौर पर कोई पैसे वाला मित्र किसी कम धनी मित्र को अपने पैसे से शराब पिलाना सिखाता है,आगे उसका साथ देने के लिए।

अब तस्करी वाली शराब इतनी हंगी पड़ रही है कि दूसरों को भी पिलाना अब अधिक महंगा शौक बन चुका है।

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3 फरवरी 23 


गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

     कामराज योजना से 1967 के चुनाव में 

  कांग्रेस को नहीं हुआ था फायदा ,

  जानिए कहां चूकी थी सरकार


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        सुरेंद्र किशोर

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सन 1963 की चर्चित कामराज योजना के तहत केंद्रीय मंत्री मोरारजी देसाई से तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि ‘‘आपको इस्तीफा दे देना चाहिए।’’

  उस पर बिना कोई देर किए देसाई ने कहा कि ‘‘मुझे इस्तीफा देकर खुशी होगी।किंतु आप चंदभानु गुप्त से इस्तीफा न लें। 

क्योंकि इससे लोगों को लगेगा कि चूंकि आप उन्हें नापसंद करते हैं,इसलिए उन्हें हटना पड़ा।’’

  प्रधान मंत्री  नेहरू ने मोरारजी देसाई की सलाह नहीं मानी और 

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री चंद्रभानु गुप्त को भी अंततः पद छोड़ना ही पड़ा।

   योजना बनी थी कि देश के कुछ प्रमुख सत्ताधारी सरकार से निकल कर कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाएं।

 कई प्रमुख सत्ताधारियों को केंद्र व राज्य सरकारों से हटा कर संगठन के काम में लगाया गया।

फिर भी 1967 के चुनाव में उसका कोई लाभ कांग्रेस को नहीं मिला ।

लोक सभा में कांग्रेसी सदस्यों की संख्या सन 1962 की अपेक्षा 1967 में घट गई।

बाद में यह चर्चा चली कि राजनीतिक विरोधियों को रास्ते से हटाने के लिए शीर्ष नेतृत्व ने कामराज योजना लाई थी।के. कामराज तब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।

  याद रहे कि संसद का सत्र समाप्त हो जाने के बाद सन 1963 के मध्य में प्रधान मंत्री नेहरू कश्मीर गये थे।

वहां बीजू पटनायक से उनकी मुलाकात हुई थी।वहां से लौटने के बाद श्री पटनायक ने मोरारजी देसाई को जवाहर लाल जी के साथ हुई मुलाकात की बात बताई थी।

  उस बातचीत में पटनायक ने जवाहर लाल जी को एक योजना सुझाई जो बाद में ‘कामराज योजना’ के नाम से मशहूर हुई।कामराज ने अपनी ओर से वह योजना 1963 के जून के अंत या जुलाई में प्रस्तुत की।’

  उसी दौरान लाल बहादुर शास्त्री  ने मोरारजी देसाई से कहा था कि मैंने स्वयं ही पद मुक्त होने का आग्रह किया है।

 इसलिए मैं तो मुक्त होऊंगा ही। पर आपको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है।

आपके ऊपर यह योजना लागू नहीं होनी चाहिए।’’

मोरारजी देसाई के अनुसार ‘‘दूसरे दिन जवाहर लाल जी ने मुझे बुलाकर ं बातचीत की।उन्होंने कहा कि इस योजना के अंतर्गत अब मैं और आप दो ही वरिष्ठ बच रहे हैं।जिनमें से एक को तो जाना ही चाहिए।

मैं पद से न हटंू ,ऐसा सबका आग्रह है।इसलिए मुझे लगता है कि संगठन के काम के लिए आपको ही पदमुक्त हो जाना चाहिए।आखिर मोरार जी मुक्त हुए भी। ये बातें पूर्व प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने अपनी जीवनी में लिखी हंै।

याद रहे कि ‘कामराज योजना’ के तहत जिन नेताओं को सरकार से हटा कर पार्टी के कामों में लगाया गया,उनमें बीजू पटनायक और मोरारजी देसाई भी शामिल थे।

 सन 1962 में चीन के हाथों भारत की पराजय के बाद यह धारणा बन रही थी कि जनता के बीच कांग्रेस का प्रभाव कम हो रहा था।

फिर से जनता से कांग्रेस को मजबूती से जोड़ने के लिए कुछ बड़े नेताआंे को संगठन के काम में लगाने का निर्णय हुआ था।

मूल योजना यह थी कि दो-तीन मुख्य मंत्रियों और राज्यों के कुछ मंत्रियों को उनके पदों से हटाया जाए।

पर बाद में उस सूची में छह केंद्रीय मंत्रियों के नाम भी जोड़ दिए गए।

 केंद्रीय मंत्रिमंडल से जो नेता हटाए गए,उनमें लाल बहादुर शास्त्री,मोरारजी देसाई,एस.के.पाटील,जगजीवन राम और गोपाल रेड्डी शामिल थे।

इनके अलावा जिन मुख्य मंत्रियों से इस्तीफा लिया गया उनमें कामराज (मद्रास),बी.आर.मंडलोई(मध्य प्रदेश)विनोदानंद झा(बिहार)चंद्र भानु गुप्त(उत्तर प्रदेश)शामिल  थे।

इसके साथ ही एक अनोखी राजनीतिक घटना भी हुई।

उस समय नेशनल कांफ्रेंस के नेता गुलाम मुहम्मद बख्शी कश्मीर के मुख्य मंत्री थे।

यानी, वे कांग्रेस में नहीं थे।

 फिर भी उन्होंने कहा कि ‘चूंकि इस योजना के तहत किसी मुसलमान नेता का इस्तीफा नहीं लिया जा रहा है,इसलिए मैं मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा देता हूं ताकि देश में अच्छा संदेश जाए।’

साथ ही, वे कांग्रेस में शामिल भी हो गए।

उसी दौरान मोरारजी देसाई और लाल बहादुर शास्त्री के बीच की एक दिन हुई बातचीत भी उल्लेखनीय है।

 शास्त्री जी ने मोरार जी देसाई से कहा कि मैंने स्वयं ही पद मुक्त होने का आग्रह किया है । इसलिए मैं तो मुक्त होऊंगा ही। पर आपको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है।

आपके ऊपर यह योजना लागू नहीं होनी चाहिए।

कामराज योजना के लागू होने के बाद सबसे पहला आम चुनाव सन 1967 में हुुआ। उस समय तक लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक ही साथ होते थे।कुछ हलकों में यह उम्मीद की गयी थी कि कामराज योजना से कांग्रेस को चुनाव लाभ मिलेगा।पर ऐसा हुआ नहीं। 

 जिन छह राज्यों के मुख्य मंत्रियों को इस योजना के तहत हटाया गया था, उन राज्यों में भी सन 1967 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से हट गयी। वैसे कुल नौ राज्यों में तब कांग्रेस हार गयी थी।

1963 के बाद कांग्रेस या किसी अन्य दल ने ‘कामराज योजना’ जैसी कोई योजना नहीं चलाई।

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वेबसाइट मनी कंट्रोल हिन्दी (20 जनवरी 2023 )पर प्रकाशित