बुधवार, 17 मई 2023

    याद कीजिए लोहिया-प्रायेजित रामायण मेला

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   सुरेंद्र किशोर

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जितने लोग ‘‘बागेश्वर बाबा’ को देखने-सुनने गए थे,जरूरी नहीं कि वे सब के सब भाजपा के ही वोटर हैं।

भक्त और वोटर में फर्क करना चाहिए।

किंतु यदि कुछ राजनीतिक दलों ने  धीरेंद्र शास्त्री को अपमानित करना जारी रखा,तो कुछ ‘भक्त’ प्रतिक्रियास्वरूप भाजपा के वोटर भी बन जा सकते हैं।

कर्नाटका चुनाव के लिए मतदान से पहले एक कांग्रेस नेता ने कहा था कि हम पी.एफ.आई.और बजरंग दल दोनों पर प्रतिबंध लगाएंगे।

हालांकि पी.एफ.आई.पर प्रतिबंध पहले ही लग चुका है।

यानी कांग्रेसी होशियार निकले।

उन्होंने एक तरह से संतुलन बनाया,नकली ही सही।

पर, बिहार के जो नेता कभी भूल कर भी पी.एफ.आई.शब्द का उच्चारण तक नहीं करते वे भी ‘बाबा’ पर अभूतपूर्व ढंग से आक्रामक हैं।इतने आक्रामक क्यों हैं,यह बात छिपी हुई नहीं है।

धीरेंद्र बाबा के लिए जुटी  भीड़ भी अभूतपूर्व रही है और किसी अन्य बाबा पर इतना अधिक आक्रमण इससे पहले कभी नहीं हुआ। 

अरे भाई, जिस उद्देश्य से आप आक्रामक हंै,उस उद्देश्य की पूत्र्ति स्वयंमेव होने ही वाली है।

कर्नाटका की तरह बिहार में भी अगले चुनाव में अल्पसंख्यक वोट एक ही दल यानी सिर्फ महा गठबंधन को ही मिलने की पूरी उम्मीद है।

फिर अकारण बागेश्वर बाबा के कुछ भक्तों को भाजपा खेमे में क्यों ढकेल रहे हो ?

क्योंकि लोगबाग देख रहे हैं कि आप सिर्फ बहुसंख्यक साप्रदायिकता के खिलाफ बोलते हैं,अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता के खिलाफ कततई नहीं।

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आजादी के बाद जब डा.राममनोहर लोहिया देश को गरमाने 

के लिए निकले तो उन्हें एक बात देखकर अजीब लगा।

वह यह कि रामलीला में तो बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं किंतु हमारी सभाओं में कम ही लोग आते हैं।

संभवतः उसी के बाद उन्हंे ‘रामायण मेला’ लगवाने का आइडिया आया।लगवाया भी।

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सत्तर के दशक में बिहार माकपा के एक प्रमुख नेता तकी रहीम से मैं यदाकदा मिलता रहता था।

उन्होंने एक संस्मरण सुनाया।

उन्होंने कहा कि मैं पटना के पास के एक राजपूत बहुल गांव में पार्टी के प्रचार के लिए  गया था।

मैंने राजपूतों की बैठकी में कहा कि कम्युनिस्ट और क्षत्रिय एक ही समान हैं।

क्षत्रिय जो वचन देता है,उस पर कायम रहता है।

वचन को पूरा करने के लिए वह कभी -कभी बल प्रयोग भी करता है।

सोवियत संघ के कम्युनिस्टों ने वहां की जनता को वचन दिया कि हम साम्यवाद लाएंगे।

कम्युनिस्टों ने उसके लिए बल प्रयोग भी किया।’’

तकी साहब बोले कि अपनी शौर्य गाथा सुनकर उस गांव के कुछ राजपूत हमारे दल के प्रभाव में आ गए।

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 17 मई 23

 


शनिवार, 13 मई 2023

 40 साल पहले

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10 मई, 1983 को ‘आज’ और ‘प्रदीप’ में छपी  

 बाॅबी हत्या कांड की सनसनीखेज खबर ने 

राजनीति में हलचल मचा दी थी

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उच्चत्तम स्तर से सी.बी.आई.पर दबाव डलवा कर कई प्रमुख 

नेताओं को जेल जाने से बचा लिया गया था

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सुरेंद्र किशोर 

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10 मई 1983 को पटना के दैनिक आज और दैनिक प्रदीप में सनसनीखज खबर छपी थी।

वह खबर श्वेतनिशा त्रिवेदी उर्फ बाॅबी की रहस्यमय हत्या को लेकर थी।

उससे पहले दो दिनों से पटना के राजनीतिक हलकों में यह सनसनीखेज अफवाह तैर रही थी कि बिहार विधान सभा की एक महिला स्टाफ की हत्या करके उसकी लाश गायब कर दी गई है।यह भी कि उसमें नेताओं का हाथ है।

उस संबंध में न तो कोई एफ.आई.आर.हुई थी और न ही बाॅबी के अभिभावक कुछ कहने को तैयार थीं।अखबार  भी खबर नहीं दे रहा था।

उन दिनों मैं दैनिक ‘आज’ का संवाददाता था।प्रदीप के संवाददाता और अपने मित्र परशुराम शर्मा से मैंने विचार विमर्श किया।हमने तय किया कि 

हम लोग रिश्क लेंगे।

रिश्क लिया।दोनों अखबारों में यह खबर छपी।

संयोग से उन दिनों पटना के डी.एम.,आर.के. सिंह अैार वरीय एस.पी.किशोर कुणाल थे।

दोनों कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर थे।

कुणाल जी ने पहल की।

आज और प्रदीप में छपी खबरों को आधार बना कर प्राथमिकी दर्ज कराई।प्राथमिकी में दोनों अखबारों के नाम दर्ज हैं।

कब्र से लाश निकाली गई।जांच आगे बढ़ी।

जब बड़े -बड़े सत्ताधारी नेता फंसते नजर आए तो मामला सी.बी.आई. को सौंप दिया गया।

उच्चत्तम स्तर से सी.बी.आई.को यह निदेश

मिला कि इस केस को रफा दफा कर दिया जाए।रफा दफा कर दिया गया।

उन दिनों अदालत भी आज की तरह सक्रिय नहीं थी।इसलिए पटना हाईकोर्ट में संबंधित दायर पी.आई.एल.भी अस्वीकृत कर दिया गया।

   कुछ सत्ताधारी नेताओं को बचाने के लिए सी.बी.आई.ने श्वेत निशा त्रिवेदी उर्फ बाॅबी की हत्या को आत्म हत्या करार देकर उस केस को रफा दफा कर दिया था।

 एक कांग्रेसी विधायक ने हाल में यह तर्क दिया है कि ‘‘यदि बाॅबी सेक्स स्कैंडल को हम तब रफा-दफा नहीं करवाते तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता।’’

बिहार विधान सभा सचिवालय की अति सुंदर महिला टाइपिस्ट  बाॅबी को जहर दिया गया जिससे 7 मई 1983 को उसकी मौत हो गयी।

उस समय यह आम चर्चा थी कि किसने जहर दिया।

बाॅबी बिहार विधान परिषद की सदस्य कांग्रेसी नेत्री राजेश्वरी

सरोज दास की,जो विधान परिषद की उप सभापति रह चुकी थीं,गोद ली हुई बेटी थी।

 हत्या उनके पटना स्थित सरकारी आवास में ही हुई।वे ईसाई थे।

हड़बड़ी में लाश को कब्र में दफना दिया गया।  

दो डाक्टरों से निधन के कारणों  से संबंधित जाली सर्टिफिकेट ले लिये गये।एक डाक्टर ने लिखा कि आंतरिक रक्त स्त्राव से बाॅबी की मृत्यु हुई।दूसरे ने लिखा कि अचानक हृदय गति रुक जाने  से मृत्यु हुई।

लाश का पोस्ट मार्टम हुआ । वेसरा में मेलेथियन जहर पाया गया।

 करीब सौ कांग्रेसी विधायकों ने तत्कालीन मुख्य मंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र का घेराव करके उनसे  कहा कि आप जल्द  केस को सी.बी.आई.को सौंपिए अन्यथा आपकी सरकार गिरा दी जाएगी।किशोर कुणाल दबाव में नहीं आ रहे थे।

 राज्य सरकार ने 25 मई 1983 को इस केस की जांच का भार सी.बी.आई.को सौंप दिया था। 

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 अल्पसंख्यक मतों की एकजुटता जारी

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सुरेंद्र किशोर

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हाल के वर्षों में हुए बंगाल,यू.पी. और केरल विधान सभा चुनावों की तरह ही कर्नाटका के ताजा चुनाव में भी मुस्लिम मतदाताओं ने एकजुट होकर मतदान किया है, ऐसा संकेत मिल रहा है।

यह एकजुटता आगे भी जारी रहने की उम्मीद है।

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लगता है कि कर्नाटका विधान सभा के चुनाव में इस बार अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हो गया था।मुस्लिम बहुल और देवगौड़ा के प्रभाव वाले इलाके में जे डी एस को उनके वोट मिलने ही थे।

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इससे पहले गत पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में अल्पसंख्यक मतों का धुव्रीकरण ममता बनर्जी के पक्ष में हुआ था।

नतीजतन माकपा और कांग्रेस शून्य पर आउट हो गए थे।

उस समय अधीर रंजन चैधरी ने कहा था कि मुसलमान मतदाताओं ने कांग्रेस को ं छोड़ दिया।सी.पी.एम.ने अपने प्रभाव वाले मुसलमानों से कहा कि आप लोग भी ममता की 

पार्टी को वोट दे दीजिए।

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उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में अल्पसंख्यकों ने लगभग एकजुट होकर सपा के पक्ष में मतदान किया।नतीजतन बसपा-कांग्रेस की खटिया खड़ी हो गई। 

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इसीलिए तथाकथित सेक्युलर दलों को अल्पसंख्यक मत पाने के लिए कोई विशेष अतिवादी-एकतरफा रुख अपनाने या बयान देने की कोई आवश्यकता नहीं है।

अन्यथा, वह प्रति-उत्पादक साबित हो सकता है। 

अल्पसंख्यक मतदाता ऐसे भी बहुत होशियार होते हैं।इन दिनों कुछ और चतुर हो गए हैं।

वे उसी दल के पक्ष में मतदान कर रहे हैं और करेंगे जो दल या उम्मीदवार भाजपा के खिलाफ सर्वाधिक मजबूत दिखाई पड़ेंगे।

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13 मई 23


शुक्रवार, 12 मई 2023

 एक राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्र में मंत्री रह चुके नेता के 

दल बदल को देख कर आपको कैसा लगता है ?

मुझे तो लगता है कि राजनीतिक क्षेत्र में ‘उपकार’ शब्द के लिए कोई जगह नहीं है।

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दूसरी ओर,

संवैधनिक पद पर रह चुके एक काबिल नेता के राजनीतिक संन्यास को देख कर आपको कैसा लगता है ?

मुझे तो लगता है कि राजनीतिक ‘संग्राम’ के मैदान में एम्बुलेंस नहीं हुआ करता।

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सुरेंद्र किशोर 

12 मई 23


मंगलवार, 9 मई 2023

 सत्तर के दशक में सही साबित हुआ था

जयप्रकाश नारायण का राजनीतिक पूर्वानुमान

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सुरेंद्र किशोर

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    त्रिभाषी साप्ताहिक पत्रिका ब्लिट्ज (25 जनवरी 1975, बंबई )से बातचीत में जयप्रकाश नारायण ने जो राजनीतिक पूर्वानुमान लगाया था,वह सन 1977 के मार्च में सच साबित हो गया।

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नेहरू परिवार के प्रति आम तौर से नरम रहे जेपी ने प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से सिर्फ एक ही मांग की थी।वह यह कि वह बिहार विधान सभा को भंग करके फिर से चुनाव करवा दें।क्योंकि यह विधान सभा जनता का विश्वास खो चुकी है। 

उससे ठीक पहले मोरारजी देसाई के अनशन के दबाव में आकर इंदिरा गांधी गुजरात विधान सभा चुनाव करवा चुकी थीं।

पर,बिहार के मामले में ‘‘एकाधिकारवादी’’ इंदिरा जी जिद्द पर अड़ गईं।उन्होंने भंग करने की मांग ठुकरा दी। 

याद रहे कि जेपी के नेतृत्व में बिहार

में छात्रों-युवकों ने सन 1974 में आंदोलन शुरू किया था।

इस बीच ब्लिट्ज के संवाददाता ए.राघवन और हसन कमाल ने जेपी से लंबी बातचीत की।

उस बातचीत में जेपी ने कहा कि ‘‘बिहार आंदोलन एक सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ चलाया जा रहा है।’’(हालांकि पीछे देखने पर यह तय करना मेरे लिए कठिन जान पड़ता है कि आज की व्यवस्था अधिक सड़ी-गली है या 1975 की !!)

जेपी ने कहा कि इसका इंदिरा हटाओ के मामले से कोई संबंध नहीं है।

जेपी ने साफ शब्दों में कहा कि ‘‘लेकिन यदि प्रधान मंत्री अपनी मौजूदा नीति पर अड़ी रहीं ,तो इस आंदोलन का उठता हुआ तूफान दूसरी बहुत सी चीजों के साथ प्रधान मंत्री को भी किनारे कर देगा।यानी आंदोलन उन्हें सत्ता से हटा देगा।’’

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1977 के मार्च में हुए लोक सभा चुनाव में केंद्र से कांग्रेस की सत्ता चली गई।यहां तक कि खुद इंदिरा गांधी रायबरेली और संजय गांधी अमेठी लोक सभा क्षेत्र में बुरी तरह हार गये।

उत्तर भारत की लगभग सभी सीटें कांग्रेस हार गई थी।

जेपी आंदोलन का दक्षिण भारत पर असर नहीं था।

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12 मार्च, 1977 को हमने भी दैनिक ‘आज’ के लिए जे पी का इंटरव्यू किया था।

इस बातचीत में उन्होंने कहा था कि यदि हम लोक सभा चुनाव जीत गए तो बिहार सहित विधान सभाओं को भी भंग कराकर फिर से चुनाव करवाएंगे।

वही हुआ भी।

1977 के मार्च की किसी तारीख को ‘आज’ के पहले पेज पर प्रकाशित इस इंटरव्यू को बी बी सी ने अपने बुलेटिन में उधृत किया था।

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9 मई 23


 


 यह प्रचार गलत है कि सरदार पटेल की अंत्येष्टि 

में प्रधान मंत्री नेहरू शामिल ही नहीं हुए थे

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सुरेंद्र किशोर

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मैं भी इस कुप्रचार में आ गया था।कुप्रचार यह कि सरदार पटेल की अंत्येष्टि में प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू शामिल नहीं हुए थे।

सरदार पटेल का 1950 में निधन हुआ था।

  सन 2013 में ही अंग्रेजी साप्ताहिक आउटलुक ने यह गलतफहमी दूर कर दी थी।

पत्रिका के उस अंक पर तब मेरा ध्यान नहीं गया था।आज गया।

उसके कवर पर तब के टाइम्स आॅफ इंडिया के पहले पेज की फोटो काॅपी छपी है।

सरदार पटेल की अंत्येष्टि की खबर का उप शीर्षक है--राष्ट्रपति प्रधान मंत्री अंत्येष्टि में शामिल हुए

(आउटलुक का वह कवर पेज इस पोस्ट के साथ यहां दिया जा रहा है जिस पर अखबार की फोटोकाॅपी छपी है।)

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दरअसल तब किसी ने अफवाह फैला दी होगी।किसी अन्य ने बाद में कहीं लिख दिया होगा।

 अफवाह तो स्नोबाॅल की तरह होती है।आगे लुढकने के साथ मोटी होती जाती है।

दरअसल नेहरू ने पटेल की, उनके जीवन काल में इतनी उपेक्षा की थी कि ऐसी अफवाह को सच मानने के लिए अनेक लोग तैयार बैठे थे।

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एक अफवाह बिहार को लेकर भी

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1989 के भागलपुर दंगे के समय प्रधान मंत्री राजीव गांधी भागलपुर गए थे।

उस समय सत्येंद्र नारायण सिंह बिहार के मुख्य मंत्री थे।

उस यात्रा के बाद कांग्रेस के (सत्येंद्र बाबू से) दिलजले नेताओं ने यह प्रचार कर दिया कि सत्येंद्र बाबू तो बीमारी का बहाना बनाकर पटना में ही रह गए थे।

वे प्रधान मंत्री के साथ वहां गए ही नहीं।

मैंने हाल में वह कुप्रचार कहीं छपा हुआ देखा।

वैसे तो मुझे सत्येद्र बाबू ने खुद बताया था कि वे उस दिन भागलपुर गए थे।

फिर भी हाल में मैंने तब उनके प्रमुख सचिव रहे आर.यू.सिंह से  पूछा।उन्होंने कहा कि छोटे साहब पी.एम.के साथ उस दिन भागलपुर में थे।

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अखबारों को रफ हिस्ट्री कहा जाता है।

फेयर हिस्ट्री तो अलग चीज है।सही इतिहासकार या पुस्तक लेखक अखबारों से मुख्यतः सूत्र ग्रहण करता है।फिर वह तथ्यों की कहीं और से भी पुष्टि करता है।अन्यथा, इतिहास बनेगा कि नेहरू पटेल की अंत्येष्टि में नहीं गए थे।

और,1989 में मुख्य मंत्री बीमारी का बहाना बना कर पी.एम.के साथ भागलपुर नहीं गए।

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3 मई 23  


   

चुनाव नतीजों के बारे में सन 1977 में भी 

  कई बड़े नेता पूर्वानुमान नहीं लगा पाए थे

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1977 के जिस लोक सभा चुनाव में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी तक की पराजय हो गई  थी,उसके बारे में भी चुनाव से पहले यह आशंका जाहिर की जा रही थी कि पता नहीं कैसा नतीजा आएगा।

  चूंकि इमरजेंसी की ज्यादतियों की पृष्ठभूमि में  

 चुनाव होने को थे,इसलिए उसकी निष्पक्षता  को लेकर जयप्रकाश नारायण से लेकर जार्ज फर्नांडिस तक भी आशंकित थे।

आज जब कुछ लोग सन 2024 के लोक सभा चुनाव को लेकर स्पष्ट भविष्यवाणियां कर रहे हैं तो उस पर अचरज होता है।क्या इतना आसान है सटीक चुनावी भविष्यवाणी करना ?  

जनवरी, 1977 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा कर दी।

उन्होंने कहा कि मार्च में चुनाव होंगे ।

चूंकि उन्होंने इमरजेंसी को पूरी तरह समाप्त किए बिना ऐसा किया था,इसलिए  

 प्रतिपक्षी दल थोड़ी देर के लिए हतप्रभ हो गये थे।

  जयप्रकाश नारायण से लेकर जार्ज फर्नांडिस तक 

ने आशंकाएं जाहिर की थी।

चुनाव की घोषणा के बाद जयप्रकाश नारायण ने प्रतिपक्षी दलों से अपील की कि वे आपस में विलयन कर लें।एक दल बना लें।जब इस काम में देरी होने लगी तो जेपी ने धमकी दी कि यदि आपलोग विलयन नहीं करेंगे तो हम नई पार्टी बना लेेंगे।

फिर तो वे लाइन पर आ गए।

  चार गैर कांग्रेसी दलों यथा जनसंघ, संगठन कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय लोक दल के नेताओं  मिलकर जनता पार्टी बना ली ।

  बड़ौदा डायनामाइट षड्यंत्र मुकदमे के सिलसिले में देश द्रोह के आरोप में जेल में बंद जार्ज फर्नांडिस ने तो चुनाव के बहिष्कार के पक्ष में ही एक बार अपनी राय दे दी थी।हालांकि जनता पार्टी कौन कहे सोशलिस्ट घटक के भी अन्य नेता  जार्ज से असहमत थे।

बाद में जनता पार्टी ने जार्ज को बिहार के मुजफ्फरपुर लोक सभा क्षेत्र  से उम्मीदवार बनाया और वे भी भारी मतों से जीते।

चुनाव की घोषणा के बाद प्रेस सेंसरशीप में ढिलाई जरूर दे दी गयी थी।

राजनीतिक बंदियों की रिहाई शुरू हो गयी थी।पर रिहाई की रफ्तार काफी धीमी थी।

याद रहे कि 25 जून 1975 की रात में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो उसके साथ देश भर के करीब सवा लाख राजनीतिक कार्य कत्र्ताओं-नेताओं तथा कुछ अन्य लोगों को किसी सुनवाई के बिना जेलों में ठूंस दिया गया था।कुछ पत्रकार भी बंदी बना लिए गए थे।

लोगों के मौलिक अधिकार कौन कहे,जीने का अधिकार भी छीन लिया गया था।

यानी प्रतिपक्षी दलों के पास  चुनावी  तैयारी के लिए समय बहुत कम था।

  पर जब चुनाव प्रचार शुरू हुआ तो जनता पार्टी के पक्ष में भारी जन समर्थन की खबरें सुदूर जगहों से भी आने लगीं।

 उससे पहले चुनाव की घोषणा के तत्काल बाद जयप्रकाश नारायण ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि 

‘‘सरकार सोचती है कि उसे चुनाव में बहुमत मिलेगा।

क्योंकि विरोधी दलों को चुनाव की तैयारी करने के लिए कोई समय नहीं दिया गया है। 

सत्तारूढ़ दल ने आपात स्थिति को पूर्ण रूप से समाप्त न करने और हजारों बंदियों को न छोड़ने 

से अपना इरादा स्पष्ट कर दिया है।

इसलिए यदि कांग्रेस जीत जाती है तो आगे क्या होगा, यह बात भी लोगों के सामने स्पष्ट हो जानी चाहिए।’’

मीडिया से बातचीत में तब के आंदोलन के शीर्ष नेता जेपी ने हालांकि यह

भी कहा कि ‘‘ लोगों को इतनी आसानी से धोखा नहीं दिया जा सकता है।उन्होंने कठिन रास्ते से यह सीख लिया है कि केवल प्रजातांत्रिक तरीके से ही गरीब लोगों के अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं।अधिकारों के दुरूपयोग से लोगों के मन में विरोध की भावना पैदा हो गयी है।इसी कारण उनकी सहानुभूति विरोधी दलों के साथ है।’’

जेपी का यह अनुमान बाद में सही निकला था।

यानी,  1977 के चुनाव  नतीजे ने इसे सही साबित कर दिया था।हालांकि उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में जनता पार्टी को बहुत कम सीटें मिलीं।

  उधर चुनाव की घोषणा कर देने के तुरंत बाद इंदिरा गांधी ने रिक्त स्थानों को देखते हुए कांग्रेस संसदीय बोर्ड को पुनर्गठित किया।राज्यों को निदेश दिया कि वे उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश भेजें।

 प्रधान मंत्री की पहली चुनावी सभा कानपुर में हुई।बहुत बड़ी भीड़ थी।

 इंदिरा गांधी ने वहां लोगों से अपील की कि ‘‘मुझे उम्मीद है कि आप लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संगठनों को नष्ट करने वाली शक्तियों को प्रोत्साहित नहीं करेंगे।

क्योंकि ये शक्तियां आपकी कठिनाइयां बढ़ाएंगी।

प्रगति बाधित  करेंगी।’’

उनका इशारा जेपी और नव गठित जनता पार्टी की ओर था।

जेपी और जेपी के शब्दों के चयन पर ध्यान दीजिए।

नवगठित जनता पार्टी के अध्यक्ष मोरारजी देसाई और उपाध्यक्ष चरण सिंह चुने गए। युवा तुर्क चंद्रशेखर का गुट भी जनता पार्टी में शमिल हो गया था।25 जून 1975 को अपनी गिरफ्तारी तक चंद्र शेखर कांग्रेस में थे।

मोरारजी देसाई ने घोषणा की कि जनता पार्टी अच्छे उम्मीदवार खड़ा करेगी।उसका भरसक पालन हुआ।

जेपी ने लोगों से अपील की थी कि वे जनता पार्टी को उदारतापूर्वक दान दें ताकि चुनाव का खर्च उठाया जा सके।

 इमरजेंसी से ऊबे अधिकतर मतदाताओं में जनता पार्टी के पक्ष में इतना अधिक उत्साह था कि जनता पार्टी का अधिकतर चुनावी खर्च आम जनता ने ही उठा लिया था।

  उस चुनाव में मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ सी.पी.आई.थी तो जनता पार्टी के साथ सी.पी.एम.और अकाली दल।जगजीवन राम के नेतृत्व वाली कांग्रेस फाॅर डेमोक्रेसी ने जनता पार्टी के साथ चुनावी तालमेल किया।जगजीवन राम ने चुनाव की घोषणा के बाद कांग्रेस छोड़ी थी।

 याद रहे कि 1977 के लोक सभा चुनाव में जनता पार्टी को 295 और कांग्रेस को 154 सीटें मिलीं।

मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री बने।

सरकार ठीक-ठाक चल रही थी।पर जनता पार्टी के कुछ बड़े नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण मोरारजी सरकार अपना  कार्य काल पूरा नहीं कर सकी।सन 1980 में आम चुनाव हुआ और इंदिरा गांधी एक बार फिर सत्ता में आ गईं।

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5 मई 23  ़