मंगलवार, 25 जुलाई 2023

      इस देश में निजी टी.वी. चैनलों पर हो रहे वाद-विवाद का स्तर अधिक ऊंचा है या संसद-विधान मंडलों के वाद-विवाद का स्तर अधिक ऊंचा है ?

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 ऐसे डिबेट्स से हमारी नयी पीढ़ी कैसी शिक्षा ,संस्कृति और जानकारियां हासिल कर रही हैं ?

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इससे नयी पीढ़ी के दिल ओ दिमाग में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति सकारात्मक धारणा बन रही है या नकारात्मक ?

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     --सुरेंद्र किशोर

     25 जुलाई 23



रविवार, 23 जुलाई 2023

    वजन अधिक है तो दुर्घटना होने पर अधिक हड्डियां टूटेंगी

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         सुरेंद्र किशोर

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सड़क दुर्घटनाएं रोकना आपके वश में नहीं होता है।

किंतु अपने बढ़ते वजन पर काबू पाना आपके वश में है।

दुर्घटना होने पर अधिक मोटे लोगों की अधिक हड्डियां टूटती हैं।

सामान्य वजन वालों की कम हड्डियां टूटती हैं।

क्योंकि बढ़े वजन का बोझ हड्डियों को ही झेलना पड़ता है।

जिस करवट गिरोगे,बाकी शरीर का बोझ उसी हिस्से की हड्यिों को ही झेलना पड़ता है।

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सामान्य वजन किसे कहते हैं ?

यदि आपकी लंबाई 65 इंच है और आपका वजन 65 किलो ग्राम है तो उसे सामान्य वजन कहेंगे।

हां, 5 किलो कम या 5 किलो अधिक चलेगा।

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अब आपको ही चुनाव करना है।

भोजन पर कंट्रोल करके और शारीरिक गतिविधियां बढ़ाकर वजन पर काबू रखना है या जीभ का गुलाम बन कर और आलसी जीवन बिता कर अधिकाधिक हड्डियां तुड़वानी हंै ?

इस देश में जितने लोग भूख-कुपोषण से मरते हैं,उससे अधिक लोग अति-भोजन से मरते हैं।वजन बढ़ने का एक कारण अति भोजन भी है।

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23 जुलाई 23



शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

   कैसे चलेगा वह देश जहां बेल 

   नियम और जेल अपवाद हो !

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       सुरेंद्र किशोर

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सुप्रीम कोर्ट के दिवंगत जस्टिस वी.आर.कृष्णा अय्यर ने कहा था कि ‘‘बेल नियम होना चाहिए और जेल अपवाद।’’

तिस्ता सितलवाड और ब्रजभूषण शरण सिंह को मिली जमानत के बाद मुझे कृष्णा अय्यर की वह मशहूर उक्ति याद आ गयी।

न्यायपालिका के भीष्म पितामह कहे जाने वाले कृष्णा अय्यर की उक्ति का अदालतें पालन कर रही हंै।

याद रहे कि जज बनने से पहले कृष्णा अय्यर सन 1957 में गठित ई.एम.एस.नम्बूदरीपाद की कम्युनिस्ट सरकार के मंत्री थे।

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यह संयोग नहीं है ।

 सन 2020 में आई.पी.सी.मामलों में इस देश में 59 प्रतिशत आरोपितों को अदालतों से सजा हुई थी।

पर सन 2021 में सजा की दर में दो प्रतिशत की कमी आ गयी।

सब जानते हैं कि बेल पर बाहर आने के बाद अधिकतर प्रभावशाली आरोपित कौन -कौन से जतन करते हैं।

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जापान में सजा की दर 99 प्रतिशत है और अमेरिका में 93 प्रतिशत।

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सन 2001 में वल्र्ड ट्रेंड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका में पहले से मौजूद संबंधित कानून को और भी कड़ा बनाया गया।

पर,उसके विपरीत सन 2004 में सत्ता में आने के बाद मनमोहन सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानून को ढीला कर दिया जबकि भारत में भी आतंकवादी घटनाओं की बाढ़ आई हुई थी।

  नाइन एलेवेन की घटना के बाद पटना की एक बड़ी सेक्युलर हस्ती ने एक अखबार में लेख लिखा कि हमला यहूदियों ने किया था जबकि ओसामा बिन लादेन ने कहा कि हमारे आदमियों ने हमला किया है।मुद्दई सुस्त,गवाह चुस्त। 

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नेहरू युग में विदेश सेवा में आए एक रिटायर अफसर को टी.वी.पर एक बार यह बोलते हुए मैंने सुना था कि हमारे देश की  सीमाआंे पर यदि हम बाड़ लगाएंगे तो दुनिया में भारत की छवि खराब होगी।तब उन्हें यही सिखाया गया था।

उस पर टी.वी.डिबेट में शामिल शिवसेना के सांसद ने उनसे सवाल किया--आप भारत के विदेश सचिव थे या बंाग्ला देश के  ?

ध्यान दीजिए आज घुसपैठियों की बाढ़ के कारण भारत में कैसी -कैसी विपत्तियां आ रही हैं।

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जस्टिस संतोष कुमार हेगडे ने कहा था कि इस देश के इस परंपरागत ‘‘न्याय शास्त्र’’ में परिवर्तन किया जाना चाहिए कि 

‘‘भले 99 दोषी छूट जाएं किंतु एक भी निर्दोष को

सजा न मिले।’’

बदली हुई परिस्थिति में अब होना चह चाहिए

कि ‘‘कोई भी दोषी सजा से बच न पाए, भले इस सिलसिले में दो -चार निर्दोष फंस जाएं।’’

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आज हमारे यहां बड़ी -बड़ी शक्तियों सक्रिय हैं जो इस बात की कोशिश करती रहती है कि हमारे यहां सुशासन न आए।

भ्रष्टाचार न रुके।

चाहे सीमाओं की रक्षा का सवाल हो या शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित कराने का प्रयास हो।

परीक्षा में चोरी रोकने पर तो यहां राज्य सरकार (नब्बे के दशक की उत्तर प्रदेश सरकार इसका उदाहरण है।)का ही पतन तक हो जाता है।

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और अंत में

एक स्कूली शिक्षक ने आठवीं कक्षा के छात्र से पूछा--

लोक सभा -विधान सभा के बारे में तुम कितना जानते हो ?

छात्र--ये वैसी जगहें हैं जहां बैठक शुरू होने के तुरंत बाद भारी हंगामा कर देने की मजबूरी होती है ताकि बैठक स्थगित हो जाए।

हम तो आपके क्लास रूम में कदम रखते ही शांत हो जाते हैं।

पर,लोक सभा -विधान सभा के हेड मास्टर लोगों (यानी स्पीकर)को भी वहां कोई कुछ नहीं समझता।

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21 जुलाई 23


  सन 1967 में दक्षिण पटना में साढ़े नौ सौ 

एकड़ में स्थापित लोहिया नगर को अब कोई

 लोहिया नगर नहीं कहता

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   सुरेंद्र किशोर

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पटना स्थित लोहिया नगर पोस्ट आॅफिस का नाम बदल कर अब कंकड़बाग पोस्ट आॅफिस कर दिया जाना चाहिए।

   क्योंकि जिस मुहल्ले में लोहिया नगर के नाम से पोस्ट आॅफिस अवस्थित है,उस मुहल्ले को अब कोई लोहिया नगर नहीं बोलता,न ही लिखता है।

यदि कोई लिखता-बोलता हो तो हमें जरूर बताएं।ं

 सन 1967 में करीब साढ़े नौ सौ एकड़ जमीन में लोहिया नगर बसाया गया था।

तब की महामाया प्रसाद सिन्हा सरकार में कई लोहियावादी मंत्री थे।

कर्पूरी ठाकुर तो उप मुख्य मंत्री ही थे।कट्टर लोहियावादी भोला प्रसाद सिंह एल.एस.जी.मंत्री थे।

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केंद्र सरकार ने जो पोस्ट आॅफिस स्थापित किया,उसका नाम लोहिया नगर रख दिया।

पर,समय बीतने के साथ यहां के लोगों ने लोहिया नगर का नाम लेना छोड़ दिया।

 उस इलाके में होने वाले शादी-विवाह ,अन्य समारोह ,सरकारी -गैर सरकारी कार्यक्रमों के कार्ड पर लोहिया नगर मैंने नहीं देखा।

अब सवाल है कि जिस मुहल्ले के पोस्ट आॅफिस का नाम लोहिया नगर पोस्ट आॅफिस है,उस मुहल्ले को लोगबाग लोहिया नगर क्यों नहीं कहते ?

क्या लोहिया के नाम से इतना एतराज है ?

यहां तक कि उस मुहल्ले के विकास व निर्माण कार्यों का जो सरकारी टंेडर होता है,उसमें भी कंकड़बाग ही लिखा होता हैंइसलिए सिर्फ पोस्ट आॅफिस ही क्यों ?

यह स्थिति लोहिया की याद को चिढ़ाने वाली है।

यह तो डा.लोहिया का अपमान भी है।

इसलिए पोस्ट आॅफिस का नाम जल्द बदल दिया जाना चाहिए।

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21 जुलाई 23




गुरुवार, 20 जुलाई 2023

      कहीं देर न हो जाए !!

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    सुरेंद्र किशोर

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पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एस.कृष्णमूर्ति ने लिखा है (हिन्दुस्तान-20 जुलाई 23)कि 

‘‘चुनाव के तुरंत बाद या नजीदीकी दिनों में पार्टियों में होने वाली टूट वास्तव में हमारी राजनीति का एक दुखद पहलू है।

यह हमें परिपक्व लोकतंत्रों की सूची से बाहर कर देता है।’’

  कृष्णमूर्ति साहब,अपवादों को छोड़कर आज इस देश की राजनीति ने व्यापार, यूं कहें कि ‘पारिवारिक उद्योग’ का स्वरूप ग्रहण कर लिया है।

उद्योग-व्यापार जगत में क्या होता है ?

होता यह है कि जब किसी कंपनी की तरक्की होने लगती है तो उसके शेयर का भाव बढ़ जाता है।

खरीदार उसी ओर दौड़ पड़ते हैं जिस तरह गुड़ की ओर चिटियां।

आम तौर पर चुनाव से ठीक पहले राजनीति के मौसमी पक्षियों का रुख उसी दल की ओर होता है जिस दल 

का भाव मतदातागण बढ़ा दिए होते हैं।

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दरअसल इसके साथ -साथ देश में दो-तीन अन्य भयंकर बुराइयों के बढ़ते जाने के कारण इस देश का लोकतंत्र भारी खतरे में है।वे बुराइयां हैं भीषण भ्रष्टाचार और व्यापक जेहादी हिंसा का मड़राता खतरा।भ्रष्टाचार से जेहादियों के हाथ मजबूत होते हैं।

सब भारत और इंडिया भक्त लोग मिलजुल कर इन खतरों से देश को  बचाइए अन्यथा आप जाने-अनजाने तानाशाही को बुलावा दे रहे हैं।

तरह -तरह के खतरे हमारे दरवाजों पर लगातार दस्तक दे रहे हैं ,पर अधिकतर लोग ‘स्वार्थ की नींद’ में डूबे हुए हैं।

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20 जुलाई 23

 


 कानून का उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति

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शायद नेहरू-गांधी परिवार इसी भ्रम में है कि वह किसी भी कानूनी कार्रवाई से परे है।

यह प्रवृत्ति इस परिवार और कांग्रेस का भला करने वाली नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर

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कानून और नियमों का उल्लंघन करने के बावजूद उसका परिणाम भुगतने से बच निकलना नेहरू-गांधी परिवार की खास फितरत रही है।

अतीत में यह परिवार इसमें सफल होता रहा है,लेकिन इस बार परिवार खुद को मुश्किल में फंसा देख रहा है।

    ताजा मामला मोदी सरनेम पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की टिप्पणी से जुड़ा है।

यदि राहुल गांधी को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली तो

कानून के शिकंजे से बच निकलने वाली परिवार की परंपरा टूट जाएगी।

इस सिलसिले में शुरुआत प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू 

के दौर से ही हो गई थी।

  नेहरू सरकार के दौर में हुए जीप घोटाले की जांच के लिए बनी समिति ने उसमें गड़बड़ी पाई,लेकिन उस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

बाद में यह जानकारी आई कि जीप आपूर्ति करने वाली ब्रिटिश कंपनी के साथ सौदा संदिग्ध था।

उस कंपनी से जीप खरीद के सौदे का निदेश प्रधान मंत्री कार्यालय से ही सीधे लंदन स्थित उच्चायोग को दिया गया था।

  तब उच्चायुक्त रहे वी के कृष्णमेनन ने अपने दस्तखत से जीप खरीद का सौदा किया,जबकि उस समझौते पर दस्तखत संबंधित अधिकारी के होने चाहिए थे।

उस कंपनी को एक लाख 72 हजार पाउंड एडवांस भी दे दिए गए।

   जब जीप घोटाले पर हंगामा हुआ तो मेनन के खिलाफ कार्रवाई के बजाय 3 फरवरी, 1956 को उन्हें केंद्र में बिना विभाग का मंत्री बना दिया गया।

अगले साल उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया।

  मेनन को संतुष्ट इसलिए रखा गया ताकि जीप घोटाले का दाग किसी अन्य हस्ती पर न लगे।

हालांकि मेनन ने जीप घोटाले की असली कहानी 1969 में एक पत्रकार को बताई जो चुनावी सभाओं में मेनन के लिए दुभाषिए का काम कर रहे थे।

 मेनन तब बंगाल के मिदनापुर से लोक सभा का उप चुनाव लड़ रहे थे।

 प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की कहानी तो बहुत पुरानी भी नहीं है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1975 में उनका लोक सभा निर्वाचन रद कर दिया।

 इंदिरा गांधी ने न्यायालय के आदेश का पालन करने के बजाय ऐसी परिस्थितियां बना दीं कि आपाताकल लगा दिया।

 उस दौरान तमाम ज्यादतियों के बावजूद वह कानूनी शिकंजे से बच निकलीं।

स्पष्ट है कि यह परिवार हमेशा खुद को नियम-कानून से ऊपर मानता रहा,लेकिन अब परिदृश्य बदल रहा है।

पहले कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में रहती थी,मगर अब उसके पास लोक सभा में प्रतिपक्ष का नेता बनाने की पात्रता भी नहीं रही।

 याद रहे कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं।

  इस परिवार के साथ एक रुझान यह भी रहा है कि भले ही उन पर कार्रवाई अदालतें करें ,लेकिन उनके समर्थक उसे सरकारों और विरोधी दलों की साजिश के रूप में प्रचाारित करते आए हैं।

1977 में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के विरुद्ध कांग्रेसियों ने मोरारजी देसाई सरकार के खिलाफ हंगामा किया था।

इसी तरह कांग्रेसियों ने राहुल गांधी के खिलाफ अदालती निर्णय को लेकर  

 मोदी सरकार के खिलाफ हंगामा किया और उसे जारी रखे हुए है।

आपातकाल की ज्यादतियों के खिलाफ मोरारजी देसाई सरकार ने शाह आयोग गठित किया था।

  संजय गांधी और उनके समर्थकों ने शाह आयोग के सुनवाई स्थल पर जाकर भारी तोड़फोड़ की थी।

 1979 में मोरारजी देसाई सरकार गिर गई।

इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चरण सिंह को प्रधान मंत्री बनवाया।

जब इंदिरा गांधी ने चरण सिंह को संदेश भिजवाया कि संजय गांधी के खिलाफ मोरारजी सरकार के दौर में शुरू हुए मुकदमे वापस करा लीजिए तो चरण सिंह इसके लिए तैयार नहीं हुए।

इदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया और चरण सिंह सरकार गिर गई।

फिर 1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं तो संजय के खिलाफ मामलों में अभियोजन पक्ष ने ढिलाई बरतनी शुरू कर दी और और अंततः न केवल संजय बल्कि वीसी शुक्ल जैसे उनके साथी भी बरी हो गए।

  बोफोर्स तोप खरीद में दलाली और घोटाले के दाग भी नेहरू-गांधी परिवार के दामन पर पड़े।

 राजीव गांधी भी इसकी जद में आए।

उस खरीद में दलाली के भुगतान की बात थी जबकि दलाली लेने की भारत सरकार ने पहले ही मनाही कर रखी थी।

 वी पी सिंह सरकार में उस मामले में प्राथमिकी दर्ज हुई।

वी.पी.सरकार गिरने के बाद राजीव के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देकर चंद्रशेखर सरकार बनवाई।

 सरकार बनते ही राजीव गांधी ने चंद्रशेखर पर यह दबाव डलवाया कि वह बोफोर्स केस को ठंडे बस्ते में डाल दें।

 चंद्रशेखर ने ऐसा करने के बजाय प्रधान मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

राजीव गांधी को इसकी कत्तई उम्मीद नहीं थी।

उन्होंने चंद्रशेखर को संदेश भिजवाया कि इस्तीफा वापस ले लीजिए,पर चंद्रशेखर ने यह कहते हुए उनकी बात ठुकरा दी कि ‘राजीव जी,प्रधान मंत्री के पद को मजाक का विषय मत बनाइए।’

 वाजपेयी सरकार के दौरान सी.बी.आई.ने बोफोर्स मामले को लेकर कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल किया।

राजीव गांधी के निधन के बाद उनका नाम आरोप पत्र के दूसरे काॅलम में दर्ज था जैसा कि मृतक आरोपित के साथ होता है।

फरवरी, 2004 में जब दिल्ली हाईकोर्ट ने बाफोर्स मामले में राजीव गांधी तथा अन्य के खिलाफ घूसखोरी के आरोप खारिज कर दिए तो वाजपेयी सरकार ने उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने में देर कर दी।

इस बीच मनमोहन सिंह के नतृत्व में सरकार बन गई।

उस सरकार से अपील की उम्मीद बेमानी ही थी।

इस बीच बोफोर्स मामले में यह उल्लेखनीय घटनाक्रम सामने आया कि नवंबर, 2019 में आयकर विभाग ने बोफोर्स दलाल विन चड्ढा के मुंबई स्थित फ्लैट को करीब 12 करोड़ रुपए में नीलाम कर दिया, क्योंकि आयकर न्यायाधिकरण ने पता लगाया कि बोफोर्स में दलाली ली गई थी।

उस रकम पर भारत में कर देनदारी भी बनती थी।

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका पर नेशनल हेराल्ड मामले में कोर्ट और एजेंसियों ने नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ कार्रवाई शुरू की।

 वास्तव में तो यह पूरा मामला स्वामी,अदालत और परिवार के बीच का है।

फिर भी कांग्रेस इसे राजनीतिक रंग देने से बाज नहीं आ रही।

शायद परिवार इसी भ्रम में है कि वह किसी भी कानूनी कार्रवाई से परे है।

पता नहीं,यह प्रवृति इस परिवार और पार्टी को कहां ले जाएगी ?

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यह लेख 15 जुलाई 23 के दैनिक जागरण और दैनिक नईदुनिया में प्रकाशित 


   अखिल भारतीय सेवाओं में कत्र्तव्यनिष्ठ अफसरों 

  की भारी कमी से समस्याएं पैदा हो रही हैं।

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      --सुरेंद्र किशोर--

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 ईडी निदेशक आई.आर.एस.अधिकारी संजय मिश्र और बिहार के अपर मुख्य सचिव के.के.पाठक चर्चा में रहे हैं।

चर्चा में इसलिए रहे क्योंकि ये कर्तव्यनिष्ठ अफसर हैं।वे भ्रष्टाचार और काहिली से समझौता नहीं करते।

जिन अफसरों के आप नाम नहीं जानते,वे ‘‘यथास्थितिवादी’’ हैं।

संजय मिश्र से नरेंद्र मोदी सरकार बेहतर काम लेना चाहती थी,ले भी रही थी। और नीतीश कुमार सरकार के.के.पाठक से लाख बाहरी-भीतरी विरोध के बावजूद बेहतर काम अब भी ले रही है।

ईमानदार अफसर थर्मामीटर की तरह होते हंै।वे जहां जाते हैं भ्रष्टाचार व काहिली के बुखार की गंभीरता का तुरंत पता चल जाता है।

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संजय मिश्र का मामला दूसरा था।

केंद्रीय सेवाओं के अत्यंत ईमानदार अफसरों की भारी कमी के कारण केंद्र सरकार संजय मिश्र का कार्यकाल बढ़ाती जा रही थी तो सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप गलत नहीं था।पर इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका किन-किन नेताओं ने लगाई थी,वह गौर तलब है ?

वे थे--कांग्रेस,और तृणमूल कांग्रेस के नेतागण।

यह अकारण नहीं था।हालांकि केंद्र सरकार ने यह संकेत दे दिया है कि ‘‘बुखार नापने वाले’’ हमारे पास और भी अफसर उपलब्ध हैं।

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कई भाजपा विरोधी दलों के नेतागण आए दिन यह आरोप लगाते रहते हैं कि हमारे खिलाफ मोदी सरकार बदले की भावना से जांच एजेंसियों का लगातार दुरुपयोग करती रहती है।

पर,आरोप लगाने वाले इस शिकायत को लेकर कोर्ट नहीं जाते।क्योंकि वे जानते हैं कि उनके आरोपों में दम नहीं है।

वे नहीं जाते तो अब इन जांच एजेंसियों को ही कोर्ट जाकर ऐसे बयान देने वाले उन नेताओं के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करना चाहिए।

 चाहे तो आरोपकर्ता यह साबित करें कि जांच एजेंसियां अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर रही हैं।

 या, फिर मानहानि के लिए अदालत आरोप लगाने वालों को कठोर सजा दे।

क्योंकि जांच एजेंसियों की प्रतिष्ठा का भी तो सवाल है।

नाहक आरोप लगाने से एजेंसियों पर से जन विश्वास डिगता है जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।

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सन 1996 से 1998 तक केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव रहे टी.एस.आर.सुब्रहमण्यम ने सन 2007 में लिखा था कि 

‘‘मेरे विचार से राष्ट्र के इन तीनों स्तम्भों (कार्यपालिका,न्यायपालिका और विधायिका )का कामकाज अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा।’’

याद रहे कि सन 2007 के बाद से अब तक स्थिति और भी बिगड़ी है।इसे कैसे सुधारा जाए ?

के.के.पाठक और संजय मिश्र जैसे अफसरों की संख्या कैसे बढ़ाई जाए ?

यह यक्षप्रश्न है जिसके जवाब के साथ ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य जुड़ा हुआ है।

अपवाद हर जगह हैं।पर, अपवादों से देश नहीं चलता।

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12 जुलाई 23

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