शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

    2024 का लोक सभा चुनाव

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   बेशुमार काले धन के इस्तेमाल की आशंका

     --सुरेंद्र किशोर--

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अगले लोक सभा चुनाव (सन 2024) में काले धन का जितना अधिक इस्तेमाल होगा,उतना अब तक कभी नहीं हुआ था।

क्यांेकि उस चुनाव के नतीजे ऐतिहासिक और युगांतरकारी होंगे।

  उन नतीजों पर न सिर्फ इस देश का भविष्य निर्भर करेगा बल्कि कई बड़े नेताओं व राजनीतिक-गैर राजनीतिक संगठनों के भविष्य का भी फैसला हो जाएगा।

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सन 1972 में बिहार में एक लोक सभा क्षेत्र में उप चुनाव हुआ था।

उसमें एक उम्मीदवार ने रिकाॅर्ड खर्च (करीब 32 लाख रुपए)किया था।

उसके बाद तो चुनावी खर्च बढ़ते चले गये।

1990 के नंदियाल लोक सभा उप चुनाव के लिए तो सिर्फ एक शेयर दलाल ने एक नेता जी को एक करोड़ रुपए दिए थे।

चुनाव खर्चे में बढ़ोत्तरी के साथ साथ 

उसी अनुपात में अधिकतर नेताओं की संपत्ति भी बढ़ती जा रही है।

संपत्तिवानों को बुला-बुला कर चुनावी टिकट दिए जाने लगे हैं।

जेनुइन राजनीतिक कार्यर्ताओं की पूछ घट गयी है।

क्योंकि अधिकतर मामलों में एम.पी.-विधायक फंड के ठेकेदार ही कार्यकर्ता की भूमिका भी निभाने लगे हैं।अनेक नेताओं ने भी देखा कि यदि हम वास्तविक राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बढ़ावा देंगे तो वे टिकट के उम्मीदवार बन जाएंगे।

जबकि, हमें टिकट तो अपने परिवार में ही बनाए रखना है।

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हाल के वर्षों में राजनीति में पैसे की भूमिका बहुत बढ़ गयी है।

अब तो कई राजनीतिक दल खुलेआम टिकट बेच रहे हैं। 

हाल के कर्नाटका विधान सभा चुनाव में करीब 400 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक को,जो उम्मीदवार भी थे, प्रत्येक मतदाता को दो-दो हजार रुपए के नोट थमाते टी.वी.चैनलों पर देखा गया था।वे जीत भी गये।

उस नेता का कुछ नहीं बिगड़ा।

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अगले लोस चुनाव में देसी से अधिक विदेशी पैसे लगंेगे,ऐसे संकेत हैं ।

मीडिया में भारी विदेशी पैसे के ‘आयात’ की खबर आ ही रही है। 

वैसे भी इस देश के सैकड़ों नेतागण अरबपति हो चुके हैं।

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अब देखना है कि सरकारें, चुनाव आयोग या अन्य एजेंसियां चुनाव में पानी की तरह पैसे बहाने की प्रवृति व जिद पर कब तक रोक लगा पाती है।

वैसे तो उम्मीद की कोई रोशनी नजर नहीं आ रही।

जो सिस्टम , संसद व विधान सभाओं के अनवरत हंगामे को नहीं रोक सकता,वह इस तरह के और काम भी नहीं ही कर सकता।

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सुरेंद्र किशोर

11 अगस्त 23



बुधवार, 9 अगस्त 2023

 हर रंग की साम्प्रदायिकता का विरोध जरुरी

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जेहादी पी.एफ..आई. पर चुप्पी और हिन्दू अतिवाद के

खिलाफ हंगामा करके कोई दल मोदी को कमजोर नहीं कर सकता 

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गोधरा टे्रन कार सेवक दहन कांड पर चुप्पी और प्रतिक्रिया में हुए  दंगे पर हंगामा करने से ही मोदी राजनीति के महाबली बने थे

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सुरेंद्र किशोर

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नरेंद्र मोदी विरोधी राजनीतिक दल आज भी अपनी वही गलतियां लगातार दुहरा रहे हैं जिन गलतियों के कारण नरेंद्र मोदी आज सत्ता में हैं।ताजा सर्वेक्षण बता रहे हंै कि आगे भी वही रहेंगे।

जो दल वास्तव में मोदी को कमजोर करना चाहते हैं वे दोनों संप्रदायों के बीच के अतिवादी तत्वों का समान रूप से विरोध करंे।

प्रतिबंधित जेहादी संगठन पाॅपुलर

फं्रट आॅफ इंडिया के बारे में आज के दैनिक जागरण में एक सनसनीखेज खबर छपी है।

उस खबर का शीर्षक है--

‘‘युवाओं को बरगला सेना बना रहा था पी एफ आई,

एन.आई की जांच से खुलासा,देश विरोधी षड्यंत्र के लिए सीमा पार की साजिश,

विदेशों से आ रहा था धन’’

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ध्यान रहे कि पाॅपुलर फं्रट आॅफ ने यह लक्ष्य तय किया है कि वह 

हथियारों के बल पर सन 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देगा।इस काम के लिए वह हथ्यिार बांट भी रहा है।

प्रतिबंध के बावजूद उसकी भूमिगत गतिविधियां जारी हैं।

अनेक शांतिपिय लोग डरे हुए हैं।

गृह युद्ध की आशंका है।

कई लोग पूछते हैं कि गृह युद्ध की स्थिति में जेहादियों की सशस्त्र सेना से हमें कौन बचाएगा ?

इस बीच एक अच्छा संकेत है।

 पी.एफ.आई.मुसलमान आबादी के बीच से कम से कम 10 प्रतिशत समर्थन मंाग रहा है।

पर, उतना भी उसे अभी नहीं मिल रहा।

पर,हथियारबंद थोड़े भी क्या कर सकते हैं,यह इतिहास बताता है।

ओवैसी को छोड़कर कोई दूसरा मुस्लिम संगठन पी.एफ.आई. के खिलाफ खुलकर नहीं बोल रहा है।

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दैनिक जागरण की इस सनसनीखेज खबर पर किसी राजनीतिक दल ने पी.एफ.आई.की सार्वजनिक रूप से आलोचना अब तक नहीं की है।

  पी.एफ.आई.पर भाजपा का रुख तो लोगों को मालूम है किंतु अन्य दलों का रुख क्या है ?

इस सवाल का समय रहते जवाब सभी दलों की ओर से मिल जाए तो अगले लोक सभा चुनाव के लिए मन बनाने में लोगों को और भी सुविधा हो जाएगी।

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हाल में कर्नाटका में विधान सभा का चुनाव हुआ।

पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई. ने पहले ही सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर दी थी कि उसका कांग्रेस से तालमेल है।(गूगल पर देख लीजिएगा।)

सन 2018 के विधान सभा चुनाव में भी दोनों दलों का आपसी तालमेल था।

  पी.एफ.आई. की महिला शाखा के सम्मेलन में शामिल होने के लिए पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी 2017 में केरल गये थे।

पी.एफ.आई.जिन अतिवादी संगठनों को मिलाकर बना है ,उसमें सिमी भी शामिल है।

सिमी पर जब प्रतिबंध लगा तो कई तथाकथित सेक्युलर दलों ने प्रतिबंध का विरोध किया था।

उ.प्र.कांग्रेस अध्यक्ष सलमान खुर्शीद तो सुप्रीम कोर्ट में सिमी के वकील  थे।

इस तरह के एकतरफा व्यवहार के अनेक उदाहरण हैं।

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जेहादी संगठनों के साथ देश के अधिकतर तथाकथित सेक्युलर दलों की प्रत्यक्ष-परोक्ष एकजुटता से नरेंद्र मोदी की राजनीतिक ताकत बढ़ी है।

मोदी की दूसरी ताकत है कई दलों में फैले परिवारवाद और भीषण भ्रष्टाचार।

2014 में कांग्रेस की हार पर ए.के एंटोनी ने सोनिया गांधी को यह रिपोर्ट दी थी कि हम इसलिए हारे क्योंकि मतदाताओं को लगा कि हम अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों की तरफ कुछ अधिक ही झुके हुए हैं।

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सेक्युलर दलों के लिए अब भी समय है।

वे राजनीतिक दल दोनों संप्रदायों के बीच के अतिवादियों का समान रूप से विरोध करंे।

यदि अब भी जेहादियों के पक्ष में कांग्रेस तथा अन्य दल खड़े दिखेंगे तो वे अपनी ही गलती से एक बार फिर नरेंद्र मोदी को तीसरी बार भी प्रधान मंत्री बनने का रास्ता साफ कर देंगे।

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7 अगस्त 23





 आज के प्रभात खबर में प्रकाशित

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यदाकदा

सुरेंद्र किशोर

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 फील्ड से रिटायर अफसर बता सकते हैं अपराध रोकने के उपाय

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बिहार के डी.जी.पी.,आर.एस.भट्टी ने हाल में एक प्रमंडलीय मुख्यालय में थानेदारों से साफ-साफ पूछा कि ‘अपराध नियंत्रण में आखिर दिक्कत क्या है ?’

ठीक ही किया कि पूछ लिया।

  वहां इस समस्या पर कैसी चर्चा हुई ?

पुलिस प्रमुख ने उन्हें क्या सलाह दी ,यह तो नहीं मालूम।

पर,इस गंभीर समस्या के सिलसिले में अनुभवी लोगों की एक राय है।

वह यह कि इस सवाल का बेहतर जवाब हाल में फील्ड से सेवा निवृत पुलिस अफसरों से भट्टी साहब को मिलेगा।

इसलिए फील्ड के काम से हाल में रिटायर पुलिस अफसरों से भी यदि डी.जी.पी.कारण पूछें तो उन्हें वास्तविक दिक्कतों ,उपयोगी जानकारियां और बेहतर सलाह मिल सकती हैं।पर,उनसे उन्हें अलग -अलग अकेले में बातें 

करनी होगी।

सेवारत अफसरों के सामने कुछ कठिनाइयां होती हैं।वे खुलकर सब कुछ नहीं बता पाते।

उनके अपने निहितस्वार्थ भी हो सकते हैं और कुछ मजबूरियां भीं।  

याद रहे कि हाल में मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने अपने दल के मौजूदा सांसदों के अलावा अलग से पूर्व सांसदों को भी बुला कर बारी -बारी से उनसे बातचीत की ।

चीजों को देखने के नजरिए में थोड़ा फर्क आ जाता है जब व्यक्ति सेवा निवृत हो जाता है।

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 रुचि के अनुकूल पढ़ाई 

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जिस छात्र को जो विषय पढ़ने में रुचि हो,उसी को पढ़कर वह जीवन में अच्छा कर सकेगा।

इसके विपरीत कुछ अभिभावकगण अपनी संतान को जबरन डाक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं चाहे उसकी रुचि वैसी पढ़ाई करने में हो या नहीं।

  छात्रों को दूर के शहरों के कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है।

मेडिकल-इंजीनियरिंग विषयों में गहरी रुचि रखने वाले छात्र तो लक्ष्य पाने में सफल हो जाते हैं।किंतु जिनकी रुचि नहीं होती है ,वे वहां पढ़ाई के भारी दबाव को कई बार सहन नहीं कर पाते।

उनमें से कुछ विद्यार्थी आत्म हत्या भी कर लेते हैं।इधर ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं।

राजस्थान के कोटा से हाल में यह खबर आई कि इस साल वहां अब तक 18 विद्यार्थी आत्म हत्या कर चुके हैं।

ऐसी आत्म हत्याएं रोकने में अभिभावकों की बड़ी भूमिका हो सकती है।

कोचिंग मंें भेजने से पहले वे अपनी संतान की रुचि की सही पहचान अच्छी तरह कर लें।अपना विचार उस पर न थोपंे।

डाक्टर या इंजीनियर बनना ही सब कुछ नहीं है।

जान है तो जहांन है !

अन्य अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहां आपकी संतान बेहतर कर सकती है।

इसलिए जिन विद्यार्थियों की गहरी रुचि डाक्टर-इंजीनियर बनने में है और जिन्हें आत्म विश्वास है कि वे कठिन पढ़ाई के दबाव का भी सामना कर पाएंगे,उन्हें ही वैसी पढ़ाई करने के लिए उनके अभिभावक बाहर भेजें।

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परीक्षा में कदाचार रुके

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झारखंड विधान सभा ने हाल में झारखंड प्रतियोगी परीक्षा विधेयक, 2023 पारित किया है।उसे राज्यपाल के यंहां मंजूरी के लिए भेज दिया गया है।

इस में यह प्रावधान किया गया है कि परीक्षा में कदाचार करते पाए जाने पर एक से तीन साल तक कैद की सजा हो सकती है।

साथ ही,एक से तीन लाख रुपए तक के जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है।

झारखंड शासन का यह कदम सराहनीय है।परीक्षा में कदाचार ने लगभग पूरे देश में महामारी का रुप धारण कर लिया है।

इससे पीढ़ियों के साथ लगातार अन्याय हो रहा है।

क्योंकि पैसे वाले और प्रभावशाली परिवारों के लोगों को तो कदाचार करने की अधिक सुविधा मिल जाती है।अधिकतर मामलों मंे गरीब घरों के उम्मीदवारों की प्रतिभा का हनन हो जाता है।

    उत्तराखंड सरकार ने तो इसी साल वहां की विधान सभा से ऐसा कानून पास करवाया है जिसके तहत अत्यंत कड़ी सजा का प्रावधान है।

 वहां परीक्षा में कदाचार के खिलाफ उम्र कैद की सजा और 10 करोड़ रुपए के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

वह राज्य सरकार अपनी प्रतिभाओं के साथ अन्याय नहीं होने देना चाहती है। उस सरकार को इस बात की भी परवाह नहीं है कि कदाचारियों को सजा दिलवाने से उसके वोटर उनसे बिदक  जाएंगे। 

पर,इधर झारखंड से यह खबर आ रही है कि वहां कुछ राजनीतिक नेता गण झारखंड सरकार के नये विधेयक का विरोध कर रहे हैं।विरोध ठीक नहीं।

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और अंत में

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उदयकांत लिखित मुख्य मंत्री नीतीश कुमार की जीवनी में उनकी एक महत्वपूर्ण बात चतुर्भुज ज्योमेट्री के जरिए समझाई गयी है।

वह भी एक संवाद की शैली में।

वह बात यूं है-‘देखो ,चतुर्भुज की सबसे नीचे वाली लेटी लाइन होती है न,उसे बेस या आधार कहते हैं।

इसे तुम नीतीश के बाबूजी समझ लो।

वही नीतीश के जीवन के आधार हैं।

अब दूसरी ,सबसे ऊपर वाली ,लेटी हुई लाइन देखो।

यह हैं हमारे बापू  यानी महात्मा गांधी।

नीतीश की दुनिया में ही क्यों,पूरे मुल्क में इनसे ऊपर कुछ भी नहीं,कोई भी नहीं।

 अब बची चतुर्भुज की दो खड़ी लाइनें जो एक दूसरे से दूर खड़ी हैं।

 ये हैं लोहिया और जेपी।

इन दोनों को ऊपर से गांधी जी ने जोड़ रखा है।

अब एक ऐसा गोला बनाओ जो इन चारों लाइनों को अंन्दर से छुए।

यही सर्किल है अपना नीतीश।

उसमें चारों के गुण हैं।’

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8 अगस्त 23





सोमवार, 7 अगस्त 2023

   आइडिया आॅफ इंडिया !

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  सीमा पर बाड़ लगाने से कभी इस 

  देश की छवि खराब होती थी !

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 --सुरेंद्र किशोर--

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   आजादी के बाद के हमारे हुक्मरानों ने 

ही इस देश को ‘धर्मशाला’ बनाना शुरू कर दिया था।

  अब बी.एस.एफ. के सशक्तीकरण का विरोध हो रहा है।

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    जिस देश के कुछ राजनीतिक दलों के लिए घुसपैठिए ‘वोट बैंक’ हों वहां वही होगा जो आज हो रहा है।

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 कई साल पहले की बात है।

एक निजी टी.वी.चैनल पर मैं डिबेट 

सुन रहा था।

बांग्ला देशी घुसपैठियों पर चर्चा थी।

  एक तरफ सन 1958 बैच के भारतीय विदेश सेवा के एक अफसर थे।

 दूसरी ओर, शिव सेना के राज्य सभा सदस्य थे।

 उस अफसर ने कहा कि 

‘‘यदि हम सीमा पर बाड़ लगाएंगे तो दुनिया में हमारे देश की छवि खराब होगी।’’

  उस पर शिवसेना नेता ने उनसे सवाल किया,

‘‘आप भारत के विदेश सचिव थे या बांग्ला देश के  ?

बेचारे अफसर साहब कोई जवाब नहीं दे सके।

वे बेचारे आखिर क्या बोलते ?

वैसे भी वे व्यवहार में शालीन व्यक्ति हैं। 

आजादी के तत्काल बाद के हमारे हुक्मरानों ने उन जैसे अफसरों को यही निदेश दे रखा होगा।यही आदेश कि वे बाड़ लगाने का विरोध करें।

यही तो था ‘‘आइडिया आॅफ इंडिया का एक नमूना ।’’

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अगस्त 23

   

   


    अपने ही नियमों का पालन 

   करे फिल्म सेंसर बोर्ड

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    सुरेंद्र किशोर

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भाजपा के पूर्व राज्य सभा सदस्य आर.के. सिन्हा ने फिल्म सेंसर बोर्ड के काम काज पर सवाल उठाया है।

आज के दैनिक ‘आज’ में छपे अपने लेख में सिन्हा ने जो मुद्दे उठाए गए हैं,उन पर केंद्र सरकार  को ध्यान देना चाहिए।

केंद्र सरकार आम तौर पर कुल मिलाकर अच्छा काम कर रही है।

किंतु मुझे भी इस बात पर आश्चर्य होता है कि सेंसर बोर्ड से उनके ही नियमों का पालन क्यों नहीं करवा पा रही है !

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि 

‘‘सन 2014 से नरेंद्र मोदी के देश का प्रधान मंत्री बनने की अवधि को भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण काल के रूप में जाना जाएगा।’’

  गृह मंत्री की बात आंशिक रूप से ही सही है।

क्योंकि इस देश की फिल्मी दुनिया पर मोदी का कोई वैसा असर नहीं है।

 मैं फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड की चर्चा करूंगा।

  लगता है कि कि उस बोर्ड पर मोदी सरकार का तनिक भी सकारात्मक असर नहीं है।

इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं।

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मैंने पहली बार सन 1961 में फिल्म देखी थी।

जवाहरलाल नेहरू-लाल बहादुर शास्त्री के शासन काल में ऐसी शालीन

और गरिमायुक्त फिल्म बनती थीं जिन्हें आप परिवार के साथ देख सकते थे।

  उसके बाद सत्तर के दशक में गिरावट शुरू हो गई।

सेक्स-हिंसा प्रधान फिल्में बनने लगीं।

भोजपुरी फिल्मों का तो आज और भी बुरा हाल है।

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नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के प्रारम्भिक वर्षों में सेंसर बोर्ड को सुधारने की कोशिश हुई थी।पर,सुधार नहीं हुआ।

लगता है कि मोदी सरकार ने हथियार डाल दिए।

क्या मुम्बई का फिल्मी जगत भारत में ही है न !!!

सेंसर बोर्ड का सिने मेटोग्राफी एक्ट, 1952 के तहत गठन हुआ था।

बोर्ड एक वैधानिक संस्था है।

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पचास और साठ के दशकों में बोर्ड के नियमों का पालन करते हुए ही फिल्में बनती थीं 

और उन्हें प्रमाण पत्र मिलते थे।

बहुत पहले मैंने प्रमाण पत्र देने के नियम पढ़े थे।

पूरा तो याद नहीं।

किंतु आज जो फिल्में बन रही हैं,उनमें से शायद ही कोई फिल्म नियम की कसौटियों पर वे खरी उतरती हों।

जहां तक मेरी जानकारी है,सेंसर के नियम बदले नहीं गए हैं।

(नियम गुगल पर उपलब्ध हैं।)हां कभी -कभी एक बात जरूर हो गई लगती है ।

वह यह कि मुम्बई के फिल्म जगत का अधिकांश इस देश की मूल स्थापनाओं को नष्ट-भष्ट करने वाली देसी-विदेशी  ताकतों के हाथों चला गया है।

अपवादस्वरूप ही अब अच्छी फिल्में बन रही हैं।

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इस बीच कुछ साल पहले एक फिल्ल्मी हस्ती आदिल हुसेन ने कहा था कि 

‘‘साठ के दशक में अच्छी फिल्में बना करती थीं।

फिल्मकारों की जिम्मेदारी है कि वे अब भी अच्छी फिल्में दें।’’

  आर्ट सिनेमा,बाॅलीवुड मेनस्ट्रीम सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में अपनी पहचान बनाने वाले आदिल ने कहा  कि ‘‘फिल्मकार यह बहाना न बनाएं कि हम दर्शकों की पसंद की फिल्में बना रहे हैं।’’

आदिल का तो आरोप है कि दर्शकों का मूड हम फिल्म मेकर्स ने ही बदला है।

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  इधर मेरा मानना है कि फिल्मकार सेंसर के उन नियमों का पालन भर करें जो नियम नेहरू के कार्यकाल में बने थे।

मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करे कि सेंसर बोर्ड में नियम पसंद,ईमानदार व निडर लोग ही रखें जाएं। 

‘‘नदिया के पार’’ और ‘‘बागवान’’ जैसी फिल्मों से कहां किसी को एतराज होता है !

 क्या यह उम्मीद की जाए कि कम से कम भाजपा की केंद्र सरकार 

अश्लीलता और अन्य तरह के भटकावों के इस प्रदूषण को रोकने की कोशिश करेगी ?

याद रहे कि यह प्रदूषण पीढ़ियों को बर्बाद कर रहा है।

यदि ऐसा ही जारी रहा कि अमित शाह की सदिच्छा मिट्टी में मिल जाएगी।

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6 अगस्त 23.



 


रविवार, 6 अगस्त 2023

  समस्याग्रस्त मणिपुर की 

एक कहानी यह भी !

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1951 में मणिपुर में 11.84 प्रतिशत ईसाई थे।

2011 में यह संख्या बढ़कर 41.29 प्रतिशत हो गयी।

आज वह जनसंख्या कितनी है,उसका अनुमान लगा लीजिए।

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सांसदों के दल ने वहां से लौट कर यह सूचना लोगों को दी ?

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सुरेंद्र किशोर

1 अगस्त 23 


   नूह से घुसपैठियों की 200 झोपड़ियों को उजाड़ा गया।

  बांग्लादेशियों-रोहिग्याओं की अबाध घुसपैठ जारी रही 

  तो हर प्रदेश में ऐसी पुलिसिया कार्रवाई करनी पड़ेगी

   यह इस देश पर भीषण हमला है जिसमें 

  वोट लोलुप नेतागण ‘बाहरी -भीतरी दुश्मनों के मददगार हैं

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      सुरेंद्र किशोर

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हरियाणा के नूह से अवैध घुसपैठियों की करीब दो सौ झोपड़ियों को शासन ने विरोध के बीच कुछ घंटे पहले उजाड़ दिया।

हाल के साम्प्रदायिक उत्पातों में इन घुसपैठियों का बड़ा हाथ था।

  घुसपैठ की यह समस्या सिर्फ हरियाणा व दिल्ली में ही नहीं है,,बल्कि पूरे देश में है।

  बढ़ती जा रही है।

जिस तरह के साम्प्रदायिक उपद्रव हाल में हरियाणा में हुए,उसी तरह के उत्पातों की झड़ी लग जाएगी,यदि केंद्र सरकार जल्द कड़ी कार्रवाई नहीं करेगी।

सन 2021 में ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि सीमाओं की किलेबंदी अगले साल तक हो जाएगी।

पर,कई कारणों से यह काम अधूरा है।

  सर्वाधिक घुसपैठ पश्चिम बंगाल की सीमा से हो रही है और उस काम में ममता बनर्जी की सरकार सहायक है।

  सीमा पर तैनात केंद्रीय सुरक्षा बल भी क्यों लगभग विफल साबित हो रहा है,इसकी जांच केंद्र सरकार कराए।

  कुछ समय पहले यह खबर आई थी कि सीमा पर बाड़ लगाने के लिए ममता सरकार जमीन अधिग्रहण नहीं कर रही है।

क्या पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए यह कारण पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए, यदि सचमुच भूमि अधिग्रहण में सहयोग नहीं दे रही है ?

वैसे कारण और भी हैं।

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14 जुलाई, 2004 को तत्कालीन गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद को बताया था कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों की संख्या 57 लाख है।

आज तो यह संख्या बहुत बढ़ चुकी है।

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 दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने 4 अगस्त, 2005 को लोक सभा में यह आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने 40 लाख बांग्ला देशी मुस्लिम घुसपैठियों को अवैध ढंग से पश्चिम बंगाल में मतदाता बना दिया है।

  ममता ने सदन में इस पर तुरंत चर्चा की मांग की।

जब उसकी इजाजत नहीं मिली तो ममता ने लोक सभा की सदस्यता से सदन में ही इस्तीफा दे देने की घोषणा कर दी।

उससे पहले इस समस्या पर ममता सदन में ही रो पड़ी थीं।

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पर, जब ममता बनर्जी मुख्य मंत्री बनीं और वही अवैध  घुसपैठी मतदातागण ममता के दल को वोट देने लगे तो वह उनके पक्ष में चट्टान की तरह खड़ी हो गईं हैं।नोबल विजेता अमत्र्य सेन ममता बनर्जी को प्रधान मंत्री बनते देखना चाहते हैं।यदि बन गयीं तो इस देश का क्या होगा ?

 मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने कहा कि यदि घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई होगी तो खून की नदियां बहेंगीं।

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लगातार जारी घुसपैठ के कारण आजादी के बाद 

पूर्वी पाक-बांग्ला देश से सटे भारतीय इलाकों के कई जिलों 

की आबादी का सामाजिक अनुपात पूरी तरह बदल चुका है।

बदलता जा रहा है।

 उन राज्यों में आंतरिक-बाह्य सुरक्षा की भारी समस्या भी उत्पन्न हो चुकी है।गंभीर होती जा रही है।बिहार-झारखंड में भी समस्या बढ़ रही है।

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इस समस्या की जड़ में आजादी के तत्काल बाद की केंद्र सरकार का अदूरदर्शी रवैया रहा है।

  कुछ दशक पहले की बात है।

एक निजी टी.वी.चैनल पर घुसपैठ की समस्या पर चर्चा चल रही थी।

इस देश के विदेश सचिव पद पर रहे एक रिटायर आई.एफ.एस.अफसर ने कहा कि 

‘‘यदि हम बांग्ला देश सीमा पर बाड़ लगाएंगे तो दुनिया में भारत की छवि खराब होगी।’’

(मैं भी वह डिबेट सुन रहा था।)

इस पर शिव सेना के एक राज्य सभा सदस्य ने उस पूर्व सचिव से पूछा कि 

‘‘आप भारत के विदेश सचिव थे या

 बांग्ला देश के ?’’

वे चुप रह गए।

बेचारे उस शालीन पूर्व विदेश सचिव का भला क्या कसूर ?

नेहरू युग में विदेश सेवा में आए थे।

वे जवाहरलाल नेहरू के ‘‘आइडिया आॅफ इंडिया’’ नीति के तहत ही तो बोल रहे थे।

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5 अगस्त 23