गुरुवार, 21 सितंबर 2023

     एक गरीब उम्मीदवार ने गरीबों से वादा किया कि सत्ता में आने के बाद हम गरीबी हटा देंगे।

    पर,अगले चुनाव के समय जब गरीब ने (पांच साल मंे अमीर भए उस) विधायक से सवाल पूछा तो सत्ताधारी ने कहा कि ‘‘संयम रखिए,हम पता लगाएंगे कि गरीबी है कहां ?

मेरे आसपास तो कहीं दिखाई नहीं पड़ रही है।’’

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--सुरेंद्र किशोर

    20 सितंबर 23

 

 


 मिलीजुली सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकती है और

पूर्ण बहुमत वाली एकदलीय सरकार भी बीच में गिर सकती है

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    सुरेंद्र किशोर

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केंद्र में सन 1967 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी थी।

पर,कांग्रेस में महा विभाजन के कारण सन 1969 में वह सरकार अल्पमत में आ गयी।

सन 1971 में लोक सभा का मध्यावधि चुनाव कराना पड़ा।

सन 1977 में भी जनता पार्टी के मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली एक दलीय सरकार बनी थी।

पर,वह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी थी।

सन 1980 में लोक सभा का मध्यावधि चुनाव कराना पड़ा।

पर,सन 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की मिलीजुली सरकार बनी।फिर भी उस सरकार ने अपना पूरा कार्यकाल पूरा किया।

यानी, स्थायित्व के मामले में मिलीजुली सरकारों का अनुभव भी मिला-जुला रहा है।

  वैसे हर लोक सभा चुनाव से पहले यह आशंका जाहिर की जाती है कि यदि सरकार मिलीजुली बनेगी तो उसके स्थायित्व के बारे में कोई गारंटी नहीं।

याद रहे कि सन 2024 में लोक सभा का चुनाव होने वाला है।

  विभिन्न दलों के गंठजोड़ से बनी सरकारों ने  चार दफा अपना कार्यकाल पूरा किया ।

तो अन्य मामलों में इतने ही दफा समय से पहले सरकारें गिर गईं।

   एक बार फिर 2024 के चुनाव के बाद  मिली जुली सरकार बनने की जब संभावना जाहिर की जा रही है तो उसके स्थायित्व को लेकर भी अभी से ही सवाल उठने लगे हैं।

  ऐसे में पिछले रिकाॅर्ड को देख लेना दिलचस्प होगा।

अब तक इस देश में लोक सभा के 16 चुनाव हो चुके हैं।

यदि सभी सरकारों ने अपने कार्यकाल पूरे किए होते तो अब तक मात्र 15 चुनाव होने चाहिए थे।

  अधिकतर मतदाता यही चाहते हैं कि पूर्ण बहुमत की सरकार बने ताकि सरकार बीच में न गिरे और अनावश्यक चुनावों की नौबत न आए।

अब देखना है कि आगे क्या होता है !

कई बार तो बहुमत वाली सरकारों ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया।

सन 1967 और सन 1977 इसके उदाहरण हैं।

सन 1969 में कांग्रेस के महा विभाजन के बाद तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की सरकार अल्पमत में आ गयी थी।

सी.पी.आई. और द्रमुक जैसे कुछ दलों ने सरकार को बाहर से समर्थन किया और सरकार चली।

पर  इंदिरा गांधी ने यह महसूस किया कि उन्हें दबाव में काम करना पड़ रहा है।

नतीजनत  उन्होंने समय से एक साल पहले ही लोक सभा का मध्यावधि  चुनाव सन 1971 में करवा दिया।

  सन 1977 की मोरारजी देसाई सरकार एक दल के बहुमत वाली सरकार थी।पर सत्ताधारी जनता पार्टी में विभाजन के कारण बीच में ही वह सरकार गिर गई।

  सन 1999 में गठित अटल बिहारी वाजपेयी की मिलीजुली सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। 

हां,उस सरकार ने अपनी मर्जी से कार्यकाल पूरा होने के कुछ महीने पहले ही 2004 में चुनाव करवा दिया।

सन 2004 और सन 2009 में गठित मिलीजुली मन मोहन सिंह सरकार ने अपने कार्यकाल पूरे किए।

1991 में पी.वी.नरसिंह राव  के नेतृत्व में गठित सरकार को भी लोक सभा में बहुमत नहीं था।

कांग्रेस को 1991 के लोक सभा चुनाव में सिर्फ 244 सीटें मिली  थीं।

पर, जोड़़तोड़ कर राव साहब ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया।

नब्बे के दशक में बारी -बारी से एच.डीे. देवगौड़ा और आई.के गुजराल के नेतृत्व में बनी सरकारें अपने कार्यकाल पूरा नहीं कर सकीं।

सन 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठित मिली जुली सरकार भी नहीं चल सकी।

सन 1999 में चुनाव कराना पड़ा।

आजादी के बाद के प्रथम पांच चुनावों में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला था। सरकारें चलती रहीं।

आपातकाल में सन 1976 में लोक सभा की आयु एक साल बढ़ा दी गयी थी।

सन 1989 से इस देश में राजनीतिक अस्थिरता का दौर चला।

राज्यों में तो यह दौर सन 1967 के बाद से ही चल पड़ा था।

केद्र में सन 1984 के बाद पहली बार 2014 और 2019 में किसी दल को लोक सभा में पूर्ण बहुमत मिला।

 2014 की मोदी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया।

 सन 2019 में गठित मोदी सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा करेगी,इसमें कम ही लोगों को शक है।

पर, 2024 के लोक सभा चुनाव के बाद लोक सभा में दलगत स्थिति क्या होगी, इसको लेकर अनुमान लगाए जा रहे हैं।  

दरअसल 2014 और 2019 के लोक सभा चुनावों में कांग्रेस की भारी हार के बाद कांग्रेस के लिए स्थिति अनिश्चित हो गयी है।

बीच के वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता व अनिश्चतता का सबसे बड़ा कारण रहा है कांग्रेस का कमजोर होना।

एक समय ऐसा भी था जब कांग्रेस देश की राजनीति का पर्याय बन चुकी थी।

यह और बात है कि हर बार उसे 50 प्रतिशत से कम ही मत  मिले।

कांग्रेस को लोक सभा चुनाव मंे 6 बार 300 से अधिक सीटें आईं।

3 बार 2 सौ से अधिक सीटें मिलीं।

6 बार 100 से अधिक सीटें आईं।

दो बार तो 50 के आसपास सीटें ही मिल पाईं।

सन 2014 में सबसे कम 44 और सन 1984 में सबसे अधिक 404 सीटें। 

हाल में कांग्रेस की स्थिति में सुधार जरूर हुआ है।

पर, सुधार की रफ्तार इतनी तेज नहीं है कि इस बात का पक्का  अनुमान किया जा सके कि कांग्रेस को अगली बार काफी अच्छा करेगी।

हां,राजनीतिक हलकों में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि मोदी सरकार ने इस बीच कुछ चैंकाने वाले फैसले किए तो उसे पिछले दो चुनावों से भी अधिक बहुमत मिल सकता है।

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 वेबसाइट मनी कंट्रोल हिन्दी पर 27 अगस्त 23 को प्रकाशित





 हिन्दी दिवस पर विशेष

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मेरी कविता खो गयी !

कोई उसे खोज देगा ?!

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सुरेंद्र किशोर

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मैंने जीवन में एक ही कविता लिखी।

उस पर मुझे प्रथम पुरस्कार मिल गया।

असावधानीवश मैंने उसकी काॅपी अपने पास नहीं रखी थी।

मेरे पास अब वह कविता नहीं है।

सन 1970 या 1971 में राजेंद्र काॅलेज पत्रिका ‘राका’ में वह छपी थी।

यदि डा.केदारनाथ लाभ के यहां आने-जाने वाले कोई 

व्यक्ति मेरा पोस्ट पढ़ते हों तो वे उसकी फोटो काॅपी मुझे भेज सकते हैं।

क्योंकि अधिक संभावना है कि लाभ जी के घर में राका की प्रतियां जरूर होंगी।

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अब मूल कहानी पर आता हूं। 

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बिना पूछे ,एक संस्मरण सुनाता हूं।

सन 1970 की बात है।

तब मैं छपरा के राजेंद्र काॅलेज में पढ़ता था।

मैं मूलतः साइंस का छात्र था।

1967 में बी.एससी.परीक्षा छोड़ देने के बाद मैंने वहीं हिस्ट्री आॅनर्स में नाम लिखाया।पास भी किया।

1966-67 के छात्र आंदोलन में कुछ अधिक ही सक्रिय रहने के कारण मेरी पढ़ाई उपेक्षित हो गयी थी।

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 डा.मुरलीधर श्रीवास्तव शेखर,(शैलंद्रनाथ श्रीवास्तव के पिता जी)डा.राजेंद्र किशोर और डा.केदारनाथ लाभ जैसे योग्य शिक्षक वहां हिन्दी पढ़ाते थे।

सर्वाधिक आकर्षण मुरली बाबू की कक्षा में रहता था।

वे राजनीतिक संस्मरण भी सुनाते थे।

कभी उन्होंने गांधी जी के साथ हिन्दी पर काम भी किया था।पर,हिन्दी और हिन्दुस्तानी के सवाल पर गांधी जी से झगड़ा करके वापस आ गए थे।

महान व्यक्तित्व था शेखर जी का। 

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एक बार राजंेद्र काॅलेज मंे कविता प्रतियोगिता हुईं।

मैंने भी एक कविता लिख कर उसे जमा कर दिया।

मुझे पुरस्कार की कोई उम्मीद नहीं थी।

  आश्चर्यजनक रूप से मुझे प्रथम पुरस्कार मिल गया।

पुरस्कार देने के लिए आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा पटना से गए थे।

मेरा नाम मंच से तीन बार पुकारा गया।

मुझे तो उम्मीद ही नहीं थी कि मुझे पुरस्कार मिलेगा,इसलिए मैं उस समारोह में था ही नहीं।

शर्मा जी ने कहा कि कैसा कवि है,जिसे प्रथम पुरस्कार मिला,वह पुरस्कार लेने भी यहां नहीं आया !

खैर, बाद में मैं लाभ जी के घर से पंत जी का कविता संग्रह   ‘‘कला और बूढ़ा चांद’’ले आया जो पुरस्कार के रूप में मुझे मिला था।

वह पुस्तक अब भी मेरे पास है।

हां,उस कविता की कोई प्रति मेरे पास नहीं है।

काश ! उस कविता की प्रति मिल जाती। 

उससे पहले या बाद में मैंने कभी कोई कविता नहीं लिखी।

प्रति मिल जाती तो शायद फिर से कविता लिखने की प्रेरणा मिलती !

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14 सितंबर 23


बुधवार, 20 सितंबर 2023

 जब -जब चुनाव करीब आता है तो 

कांग्रेस, भाजपा से सवाल पूछती है कि आप 

लोग बहुत हल्ला कर रहे थे,पर बोफोर्स मामले 

में क्या हुआ ?!!

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एक बार फिर चुनाव करीब है 

यहां पढ़िए-

बोफोर्स मामले में यह सब हुआ।

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सुरेंद्र किशोर

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दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस जे.डी.कपूर ने 4 फरवरी 2004 को 

बोफोर्स मामले में राजीव गांधी और बोफोर्स दलाल को क्लीन चिट दे दी।

  दिल्ली की तब की शीला दीक्षित सरकार ने रिटायर होने के तत्काल बाद जस्टिस जे.डी.कपूर को 14 जुलाई 2004 को दिल्ली उपभोक्ता आयोग का अध्यक्ष बना दिया।

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(अससी के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने एक कांग्रेसी मुख्य मंत्री को भ्रष्टाचार के मामले में क्लिन चिट दे दी थी।

उस जज को कांग्रेस ने तुरंत राज्य सभा में भेज दिया।

उस मुख्य मंत्री पर चेक से घूस लेने का आरोप प्रमाणित था।)

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उधर बाफोर्स मामले में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति तक नहीं दी।

 जबकि सी.बी.आई.के निदेशक एस.के. शर्मा ने कानूनी सलाह लेने के बाद 24 अप्रैल 2004 को ही अपनी यह राय दे दी थी कि अपील की जानी चाहिए।अपील का केस बनता है। 

पर,अपील के लिए समय रहने के बावजूद अज्ञात कारणों से वाजपेयी सरकार ने अपील की अनुमति नहीं दी।

 अटल बिहारी वाजपेयी सरकार 21 मई, 2004 तक सत्ता में रही।

ऐसी ही कमजोरियां दिखाने के कारण अटल सरकार 2004 के चुनाव के बाद सत्ता में नहीं आ सकी।

नरेंद्र मोदी ऐसी कमजोरी नहीं दिखाते,इसलिए दुबारा सत्ता में आए।

तीसरी बार नहीं ही आएंगे,ऐसी कोई गारंटी नहीं। 

दरअसल इस देश में जब भी कोई सरकार भ्रष्टाचारियों के खिलाफ निर्ममता दिखाती है तो उससे अधिकतर आम जनता खुश हो जाती है। 

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12 सितंबर 23 


 हमारे कुछ नेता अपने जीवन की संध्या बेला में 

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सुरेंद्र किशोर

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1.-‘‘ऐसा आरोप मैंने कभी नहीं लगाया कि राजीव गांधी ने बोफोर्स सौदे में दलाली ली।’’

----पूर्व प्रधान मंत्री वी.पी.सिंह 

       सन 2004

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4 नवंबर, 1988 को वी.पी.सिंह पटना में जन सभा को संबोधित कर रहे थे।  संवाददाता के रूप में मैं वहां मौजूद था।

उन्होंने स्विस बैंक का एक खाता नंबर बताया।

कहा कि उसी खाते में बोफोर्स दलाली का पैसा है।

उन्होंने यह भी कहा कि यह खाता लोटस नाम से है।

लोटस और राजीव का एक ही मतलब है।

(पढ़िए-जनसत्ता-5 नवंबर 1988)

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2.-पूर्व प्रधान मंत्री व कांग्रेस नेता मनमोहन सिंह ने हाल में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की।

जबकि कांग्रेस कभी मोदी की तारीफ नहीं करती।

जीवन की संध्या बेला में कुछ दूसरे ही प्रकार के विचार आते हैं।

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3.-

सन 2019 की फरवरी में सपा नेता मुलायम सिंह यादव ने लोक सभा में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में कहा कि मेरी इच्छा है कि आप फिर से प्रधान मंत्री बनें।

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4.-पूर्व प्रधान मंत्री एच.डी.देवगौडा ने हाल में कहा कि अगला लोक सभा हम भाजपा के साथ मिलकर लड़ंेगे।

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18 सितंबर 23


रविवार, 17 सितंबर 2023

 गुट निरपेक्ष पुस्तक लेखकों से 

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सुरेंद्र किशोर

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1.-पुस्तक लेखन के लिए सिर्फ अखबारों की खबरों व लेखों पर भरोसा मत कीजिए।

ठीक ही कहा गया है कि अखबार रफ हिस्ट्री है।

2.-पुस्तक के लिए सामग्री जुटाने के सिलसिले में जिन जानकार लोगों से बात कीजिए,उनकी बातों को लिखकर उनसे बाद में उसकी पुष्टि करा लीजिए।

या फिर टेप रिकाॅर्डर का इस्तेमाल कीजिए।

यह इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मेरा अनुभव इस संबंध में बहुत खराब रहा है।

3.-कुछ अभियानी पुस्तक लेखकों की किताबों पर भी पूरा भरोसा मत कीजिए।

अन्यथा, आप अपनी किताब में लिख दीजिएगा कि इस देश की राजनीति में परिवारवाद की नींव ग्वालियर के सिंधिया राज परिवार ने डाली थी।

ऐसा लिख मारने वाले एक नेहरू भक्त की किताब मेरे पास है।

पर, मुझे उसका पेज नंबर याद नहीं अन्यथा उस अभियानी लेखक का नाम भी मैं यहां लिख देता।

  दरअसल उस अभियानी लेखक को इस तथ्य पर परदा डालना था कि मोतीलाल नेहरू ने सन 1928 में महात्मा गांधी को बारी -बारी से तीन चिट्ठियां लिखकर जवाहरलाल नेहरू को 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष बनवा दिया था।

दो चिट्ठियों पर गांधी राजी नहीं हुए थे।

तीसरी पर मान गए थे।

नेहरू म्यूजियम में मौजूद मोतीलाल नेहरू पेपर्स को नेहरू भक्त लेखक नजरअंदाज करते रहे हैं।

 वे तीन चिट्ठियां भी

मोतीलाल नेहरू पेपर्स का हिस्सा हंै।

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खैर, अब सन 2005 में एक अखबार में छपे एक लेख पर आते हैं।

आज उसकी कटिंग मेरे हाथ लग गयी।

एक प्रतिष्ठित लेखक ने उस अखबार में लिखा कि इस देश में ‘‘1967 में कोई भी ऐसी पार्टी नहीं थी जो बिना विदेशी मदद के चुनाव मैदान में उतरी हो।

........विदेशी मदद की जांच के लिए तब संसदीय समिति बनी थी।

पर,उसकी रपट सार्वजनिक नहीं हुई।’’

ये दोनों बातें सरसर गलत हैं।

पर उस लेखक की अपने क्षेत्र में इतनी अधिक प्रतिष्ठा है कि कोई भी

पुस्तक लेखक उस लेख को अपनी किताब में उधृत कर देगा।

उस एक दल का नाम भी मुझे मालूम है।

पर मैं लिख दूंगा तो बाकी दल के नेता लोग मुझ पर नाहक नाराज हो जाएंगे।

उन्हीं दिनों के.जी.बी.के अधिकारी मित्रोखिन की चर्चित पुस्तक आई थी।

उस लेख की पृष्ठभूमि वही थी।

(याद रहे कि शीत युद्ध के जमाने में सी.आई.ए. और के.जी.बी. के पैसों पर अनेक भारतीय व संगठन पल रहे थे।) 

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हाल के दिनों में इस संबंध में सावधानी बरतने वाले एक लेखक मुझे मिले जिनमें किसी तथ्य पर शंका होने मूल स्त्रोत तक पहुंचने की बेचैनी रहती थी।

वे लेखक हैं--उदयकांत मिश्र।

उन्होंने नीतीश कुमार पर एक मोटी किताब लिखी है।

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अब मैं सन 1967 वाली बात पर आता हूं।

विदेशी चंदा के बारे में सन 1967 में तत्कालीन गृह मंत्री यशवंत राव बलवंत राव चव्हाण ने लोक सभा में कहा था कि 

‘‘इस देश के राजनीतिक दलों को  मिले  विदेशी चंदे के बारे में भारत के केंद्रीय गुप्तचर विभाग की रपट को प्रकाशित नहीं किया जाएगा।

क्योंकि इसके प्रकाशन से अनेक व्यक्तियों और दलों के हितों की हानि होगी।’’

(ध्यान दीजिए,किस तरह मंत्री जी ने प्रतिपक्ष को भी बचा लिया।

आज भी कांग्रेस यही चाहती है कि मोदी सरकार हमारे नेताओं पर केस न चलाएं ।हम भी सत्ता में आएंगे तो तुम लोगों को बचाते रहेंगे।

नरेंद्र मोदी सरकार से पहले की अधिकतर सरकारों ने बचने-बचाने की परंपरा लगभग जारी रखी थी।उसी परंपरा के तहत  अटल सरकार ने चर्चित बोफोर्स घोटाला केस में ‘‘प्रथम परिवार’’ को बचा लिया था।)

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सन 1967 के आम चुनाव में सात राज्यों में कांग्रेस हार गयी थी ।

  लोक सभा में भी कांग्रेस का बहुमत कम हो गया था।

तब तक लोक सभा व विधान सभाओं के चुनाव एक ही साथ होते थे।

इस अभूतपूर्व हार पर तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार चिंतित हो उठी।

पहले से ही उसे अपुष्ट खबर मिल रही थी कि इस चुनाव में विदेशी धन का इस्तेमाल हुआ है।

इंदिरा गांधी को लगा था कि विदेशी धन सिर्फ प्रतिपक्षी दलों को मिले। 

इंदिरा सरकार ने केंद्रीय गुप्तचर विभाग को इसकी जांच का भार दिया ।

जांच रपट सरकार को सौंप दी गयी।

पर, रपट को सरकार ने दबा दिया।(उन दिनों अपने देश के पत्रकार खबर खोजी नहीं थे या गोदी मीडिया की भूमिका निभा रहे थे ?!!!)

 इस बात के सबूत मिले थे कि कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने अमेरिका से तो उसी दल के कुछ दूसरे नेताओं ने सोवियत संघ से पैसे लिये थे।

पर, उस रपट को बाद में न्यूयार्क टाइम्स ने छाप दिया।

उस अखबार की रपट के अनुसार सिर्फ एक प्रमुख राजनीतिक दल को छोड़ कर  सभी प्रमुख दलों ने विदेशी चंदा स्वीकार किया था।उस खबर पर संसद में हंगामा हुआ।(जिस तरह नब्बे के दशक में जैन हवाला के पैसे कम्युनिस्टों को छोड़ कर सारे दलों ने बड़े नेताओं ने स्वीकार किए थे।)

  (मैंने ऊपर जिस प्रतिष्ठित लेखक के लेख (सन 2005)की चर्चा की है ,उस लेख में किसी दल को अपवाद नहीं बताया गया ।साथ ही उनकी यह बात भी गलत है कि उसकी जांच के लिए संसदीय समिति बनी थी।)

न्यूयार्क टाइम्स की इस सनसनीखेज रपट पर सन 1967 के प्रारंभ में  लोक सभा में गर्मागर्म चर्चा हुई।उस चर्चा की खबर तब की सर्वाधिक प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका ‘‘दिनमान’’ में भी छपी थी जिसकी काॅपी मेरे पास अब भी मौजूद है।

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सुरेंद्र किशोर

17 सितंबर 23

  


 क्या से क्या हो गया देखते-देखते !!!

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कभी पूर्व प्रधान मंत्री चंद्रशेखर पी.एम.सी.एच. में 

अपना आपरेशन कराने आए थे

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सुरेंद्र किशोर

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आज तो बिहार सरकार के बड़े -बड़े अफसरों को 

भी उस अस्पताल पर भरोसा नहीं

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तबियत खराब होने के बाद बिहार के मुख्य सचिव आमिर सुबहानी  को

गुरुवार को पटना के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया।

उससे पहले पटना के कलक्टर भी उसी अस्पताल में भर्ती किए गए थे।

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पूर्व प्रधान मंत्री चंद्रशेखर सन 1962 में पहली बार राज्य सभा के सदस्य बने थे।

उसके बाद की बात है।

उन्हें एक आपरेशन कराना पड़ा था।

वे दिल्ली में भी करा सकते थे।

पर,लोगों ने उन्हें राय दी कि आप पटना मेडिकल काॅलेज अस्पताल में जाकर आपरेशन कराइए।

ठीक रहिएगा।

वहां अच्छे सर्जन हैं।

(डा.शाही या डा.सिन्हा)

 वे पटना आए और स्वस्थ होकर लौटे।

पर,अब सरकारी अस्पताल पी.एम.सी.एच.की स्थिति ऐसी कर दी गयी है कि 

उस पर अपने राज्य के बड़े अफसरों को भी भरोसा नहीं है।

ऐसी खबरें सुनकर आम गरीब मरीजों का दिल बैठ जाता है।

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 एम्स की स्थापना सन 1956 में ही हो चुकी थी।

फिर भी लोगों ने चंद्र शेखर जी पटना क्यों भेजा ?

आज तो दिल्ली का एम्स बेजोड़ है।

पर,क्या तब तक 

पी.एम.सी.एच.की साख उससे बेहतर थी ?

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एम्स में डाक्टरों की नियुक्ति को लेकर एक किस्सा सुनाता हूं।

आपको याद है कि प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के घुटने का आॅपरेशन किस डाॅक्टर ने किया था ?

शायद याद न हो।

उनका नाम था डा.चितरंजन राणावत।

वे तब अमेरिका के नामी डाक्टर थे।

एम्स की स्थापना होने लगी तो जाहिर है कि डाक्टरों की

बहाली शुरू हो गयी।

 डा.राणावत ने भी नौकरी के लिए आवेदन दिया था।

पर, उन्हें नौकरी लायक नहीं समझा गया।

कारण का आप अनुमान लगा लीजिए।

तब वे विदेश चले गये।

अमेरिका में उन्होंने बड़ा नाम किया।

यही कारण था कि उनसे अटल जी मुम्बई के ब्रिच कैंडी अस्पताल में अपना आॅपरेशन करवाया।

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उस जमाने में बिहार में शिक्षा का हाल भी बेहतर था।

श्रीकृष्ण सिंह के शासन काल में पटना विश्व विद्यालय के वाइस चांसलर,सांगधर सिंह ने,जो पटना से सांसद भी थे,

देश भर से उच्च कोटि के शिक्षकों को बुला कर पटना विश्व विद्यालय में बहाल किया था।

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साठ-सत्तर के दशक में मैं समाजवादी आंदोलन के प्रचार के लिए पटना विश्व विद्यालय के छात्रावासों में जाया करता था।

जैसे ही स्टडी आॅवर शुरू होता था,हमारे छात्र मित्र कहते थे कि अब आप जाइए,हमलोगों के पढ़ने का समय हो गया।

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17 सितंबर 23