रविवार, 24 मार्च 2024

 गोपनीयता के आवरण में चुनावी चंदा

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समय के साथ देश में बहुत कुछ बदल गया,लेकिन चुनावी चंदे 

में पारदर्शिता का अभाव जस का तस कायम है

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सुरेंद्र किशोर

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भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।

लोकतंत्र की सफलता चुनावी प्रक्रिया में स्वतंत्रता ,पारदर्शिता एवं निष्पक्षता से निर्धारित होती है।

 चूंकि चुनाव एक खर्चीली प्रक्रिया भी है तो इस कारण इसमें चुनावी चंदे की भूमिका अहम हो जाती है।

इसी चंदे से जुड़े चुनावी बांड का मुद्दा इन दिनों सुर्खियों में छाया हुआ है।

भारत मेें देसी -विदेशी चुनावी चंदे को लेकर  पर्दादारी की परंपरा दशकों पुरानी है।

विदेशी चंदे के बारे में 1967 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंतराव बलवंतराव चव्हाण ने लोकसभा यह जानकारी दी थी, ‘इस देश के राजनीतिक दलों को मिले विदेशी चंदे के बारे में भारत के केंद्रीय गुप्तचर विभाग की रपट को प्रकाशित नहीं किया जाएगा,क्योंकि इसके प्रकाशन से अनेक व्यक्तियों और दलों के हितों की हानि होगी।’

 इससे पहले विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने उसके प्रकाशन की मांग की थी।

   इस प्रकार उस समय केंद्र में सत्तारूढ़ इंदिरा गांधी सरकार ने यह परंपरा स्थापित कर दी कि सियासी चंदें के मामले में देश को हानि भले हो जाए,लेकिन राजनीतिक दलों और नेताओं को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए।

वह परंपरा कमोबेश आज भी देश में कायम है।

ऐसे में इस पुरानी मांग पर एक बार फिर गौर करने की जरूरत है कि मान्यताप्राप्त राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार के जरूरी खर्चे खुद सरकार उठाये।

 1967 के आम चुनाव में सात राज्यों में कांग्रेस हार गई थी।

 तब तक लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव साथ -साथ ही होते थे। याद रहे कि 1967 में आम चुनाव के कुछ महीनों के भीतर दलबदल के कारण दो अन्य राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकारें भी गिर गई थीं।

 उसके बाद वहां भी गैर कांग्रेसी सरकारें गठित हो गई थीं।

चैथे आम चुनाव में लोक सभा में भी कांग्रेस का बहुमत कम हो गया था।

यानी, आज का यह तर्क सही नहीं है कि विभिन्नताओं वाले इस देश में लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव अलग -अलग ही होने चाहिए ।

जब साथ चुनाव होने पर भी परिणाम अलग -अलग आते ही थे तो एक बार फिर एक ही साथ चुनाव कराने में नुकसान क्या है ?

असल में इसके लाभ अधिक हैं।

  अतीत की ओर देखें तो 1967 की चुनावी हार पर तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी चिंतित हो उठी थीं।

पहले से ही उन्हें यह अपुष्ट खबर मिल रही थी कि इस चुनाव में विदेशी धन का इस्तेमाल हुआ है।

तब इंदिरा गांधी को ऐसा लगा कि विदेशी धन सिर्फ विपक्षी दलों को मिला।

इंदिरा सरकार ने गुप्तचर विभाग को इसकी जांच का जिम्मा सौंपा।

जांच रपट सरकार को सौंप दी गयी,लेकिन रपट को सरकार ने दबा दिया।

ऐसा इसलिए क्योंकि वह रपट सत्तारूढ़ दल के लिए भी असहज करने वाली थी।

जांच के दौरान इस बात के भी सबूत मिले थे कि कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने अमेरिका से तो कुछ दूसरे कांग्रेस नेताओं ने सोवियत संघ से पैसे लिये थे।

इस रपट को बाद में अमरीकी अखबार द न्यूयार्क टाइम्स ने छाप दिया था।

  इस रपट के अनुसार सिर्फ एक राजनीतिक दल को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख दलों ने विदेशी चंदा स्वीकार किया था।

गुप्तचर विभाग की उक्त रपट के अनुसार अमेरीकी गुप्तचर एजेंसी और कम्युनिस्ट दूतावासों ने राजनीतिक दलों को काफी पैसे दिए।

उन दिनों विश्व के दो खेमों के बीच शीत युद्ध जारी था।

कम्युनिस्ट और गैर कम्युनिस्ट देशों ने भारत में अपने -अपने खास समर्थक बना रखे थे।

यह किसी से छिपा नहीं रहा कि उस दौर में एक खेमे का नेतृत्त्व अमेरिका और दूसरे खेमे का नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था।

न्यूयार्क टाइम्स की इस सनसनीखेज रपट पर 1967 के प्रारंभ में लोक सभा में बहुत तीखी बहस हुई।

इसके परिणामस्वरूप तमाम भारतीय अखबारों में भी इस खबर को बाद में काफी कवरेज मिला।

जो खबर न्यूयार्क टाइम्स ने ब्रेक की थी, वह खबर भारतीय मीडिया क्यों नहीं ब्रेक कर सका ?

क्या तब भी गोदी मीडिया था ?

इस समय एक तबका गोदी मीडिया का आरोप भारतीय मीडिया को लेकर लगा रहा है,उन्हीं दिनों यह खबर भी आई थी कि इस देश के ही एक बड़े उद्योगपति ने तकरीबन पांच दर्जन सांसदों को अपने ‘पे रोल’ पर रखा हुआ था।

   संसद में स्वतंत्र पार्टी के एक सदस्य ने गृह मंत्री चव्हाण से पूछा कि क्या वह गुप्तचर विभाग की रपट को प्रकाशित करने का बीड़ा उठाएंगे ताकि राजनीतिक दलों को जनता के बीच सफाई पेश करने का मौका मिल सके ?

 रपट के प्रकाशन से इनकार करते हुए चव्हाण ने यह जरूर कहा था कि केंद्र सरकार चुनाव आयोग की मदद से संतानम समिति के उस सुझाव पर विचार कर रही है जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों को हर संभव स्रोतों से प्राप्त होने वाली धन राशि की जांच की बात कही गई है।

इस देश का दुर्भाग्य ही रहा कि जनता आज भी संतानम समिति की रपट को लागू करने की आस लगाए बैठी है।

  समय के साथ राजनीति में काले धन के इस्तेमाल की खबरें बेहद आम होती गयीं।

कई मामलों में तो स्थिति यह हो गयी है कि चुनाव में बाहुबल से अधिक प्रभावी भूमिका धनबल की होती जा रही है।

कुछ समय पहले एक विधान सभा चुनाव में एक उम्मीदवार को दो हजार रुपए के नोट्स मतदाताओं के बीच बांटते हुए टी.वी.पर दिखाया गया था।

अब तो इस देश के छोटे -छोटे दलों के नेता भी र्चाटर्ड प्लेन से घूम रहे हैं।

चुनाव में काले धन के बढ़ते असर से राजनीति की शुचिता प्रभावित हो रही है।

परिणामस्वरूप राजनीतिक कार्यपालिका भी दूषित हो रही है।

प्रशासनिक कार्यपालिका के बारे में तो क्या ही कहा जाए ?

विशेषज्ञ बताते हैं कि एक स्तर पर भ्रष्टाचार, विकास की गति को अपेक्षित रूप से बढ़ने नहीं दे रहा है।

गुणात्मक एवं टिकाऊ

ढांचा निर्माण की कोई गारंटी नहीं है।

चुनावी चंदा भ्रष्टाचार का एक बड़ा स्रोत बना हुआ है।इसी को देखते हुए चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए चुनावी बांड की व्यवस्था की गई थी,लेकिन भली मंशा वाली यह योजना राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में अपेक्षित परिणाम न देकर खुद विवादों के घेरे में घिर गई।

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20 मार्च 24 के दैनिक जागरण और नईदुनिया मे एक साथ प्रकाशित।

      






 भ्रष्टाचार वाद,

परिवार वाद-वंशवाद,

जेहाद वाद और 

बाहुबली वाद 

का भविष्य भी अगला लोक सभा चुनाव रिजल्ट तय कर देगा।

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सुरेंद्र किशोर

24 मार्च 24


शनिवार, 23 मार्च 2024

 अब मत पूछिएगा कि 2 जी में क्या हुआ ?

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2 जी घोटाला मुकदमे में ताजा प्रगति जानने के 

लिए आज के अंग्रेजी अखबार पढ़ें

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         --सुरेंद्र किशोर --  

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अक्सर चुनाव प्रचार या व्यक्तिगत बातचीत में कुछ लोग यह सवाल उठा देते हैं कि 

‘‘आखिर 2- जी घोटाले में क्या मिला ?

बोफोर्स मामले का क्या हुआ ? 

कुछ तो नहीं हुआ।’’

खुद ही जवाब भी दे देते हैं।

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यह सवाल जब-जब टी वी डिबेट्स में उठता है कि भाजपा के भी अध-पढ़ प्रवक्ता चुप रह जाते हैं।

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यह सवाल उठा कर प्रकारांतर से वे यह कहना चाहते हैं कि आज जिन नेताओं के खिलाफ मोदी सरकार कार्रवाई कर रही है,उनका भी अंततः कुछ नहीं बिगड़ेगा।

ऐसा कह कर वे सिर्फ संतोष कर सकते हैं।बिगड़ेगा तो जरूर।यदि सरकारें बदलती नहीं रहतीं तो बोफोर्स- 2 जी में भी बहुत कुछ हो जाता।

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फिर भी इन दोनों मामलों में क्या-क्या हुआ,यह जान लीजिए।

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प्रणव मुखर्जी जैसे नेताओं की बातों में भी मत आइएगा जो कह गये हैं कि 

‘‘ बोफोर्स घोटाला सिर्फ मीडिया ट्रायल था।कोई घोटाला था नहीं ।’’

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  दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 मार्च 2024 को कहा कि 2 जी मामले के आरोपितों को दोषमुक्त करने के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई होगी।

 सी.बी.आई.की विशेष अदालत ने सन 2017 में आरोपितों ए.राजा और कनिमोझी आदि को दोषमुक्त करार दे दिया था।

मार्च, 2018 में सी.बी.आई.ने दोषमुक्ति के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।

हाईकोर्ट ने 22 मार्च 2024 को कहा कि अपील सुनवाई योग्य  है।

  याद रहे कि 2 जी मामले में  200 करोड़ रुपए की घूसखोरी के आरोप को लोअर कोर्ट ने नजरअंदाज करते हुए आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया था।

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उधर बोफोर्स मामले में तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी अपील करने में जानबूझकर भारी लापरवाही दिखाई थी।

कई महीने लगा दिए।

उसके बाद सन 2004 में उनकी सरकार ही चली गई।

  हालांकि बोफोर्स मामले में दलाली के पैसे एक बाफोर्स दलाल हिन्दुजा के मुम्बई स्थित फ्लैट की नीलामी करके आयकर ने जरूर वसूले।

  किंतु मनमोहन सरकार ने एक अन्य दलाल क्वाचोचि को दलाली के पैसे के साथ साफ बचकर निकल जाने दिया।

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अस्सी के दशक में जब बोफोर्स घोटाला सामने आया था तो राजीव सरकार ने कहा था कि कोई दलाली नहीं ली या दी गई।जबकि बाद में साबित हो गया कि राजीव सरकार की बात गलत थी।याद रहे कि फ्रांस की सोफ्मा कंपनी चूंकि दलाली नहीं देती थी,इसलिए स्वीडन की बोफोर्स कंपनी से तब तोपें खरीदी गयी थीं।

बोफोर्स कंपनी दलाली देती थी।

बोफोर्स तोप भी अच्छी है,पर सोफ्मा बोफोर्स से बेहतर है।

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   2 जी. स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमे में ए.राजा और कनिमोझी को दोषमुक्त करते हुए दिल्ली स्थित विशेष सी.बी.आई. जज ओ.पी.सैनी ने कहा था कि

 ‘‘कलाइनगर टी.वी.को कथित रिश्वत के रूप में शाहिद बलवा की कंपनी डी.बी.ग्रूप द्वारा 200 करोड़ रुपए देने के मामले में अभियोजन पक्ष ने किसी गवाह से जिरह तक नहीं की।

कोई सवाल नहीं किया।’’

    मान लिया कि कोई सवाल नहीं किया।

  क्योंकि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में सी.बी.आई. के वकील को ऐसा करने की अनुमति नहीं रही होगी।

पर, खुद जज साहब के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम में ऐसे ही मौके के लिए  धारा -165 का प्रावधान किया गया है।

   सवाल है कि  धारा -165 में प्रदत्त अपने अधिकार का सैनी साहब ने इस्तेमाल क्यों नहीं किया।

 संभवतः मुख्यतः इसी सवाल पर अब हाई कोर्ट में विचार होगा कि 

 यानी लोअर कोर्ट के जज ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा -165 में  मिली शक्ति का उपयोग क्यों नहीं किया जबकि उनके पास  यह सूचना थी कि इस घोटाले में 200 करोड़ रुपए की रिश्वत देने का आरोप लगा हैै ?

इस केस का यह सबसे प्रमुख सवाल दिल्ली हाईकोर्ट के सामने है।

 बोफोर्स मामले में सुनवाई,यदि सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए राजी होता है तो , के समय यह सवाल

उठेगा कि शासन के दो अंगों ने परस्परविरोधी तरीके से काम क्यों किया ?

  मनमोहन के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अपना प्रतिनिधि लंदन भेज कर स्विस बैंक की लंदन शाखा के उस बंद खाते को चालू करवा दिया जिसमें  बोफोर्स दलाल क्वात्रोचि के पैसे जमा  थे।

वे दलाली में मिले पैसे ही थे।

दूसरी ओर,

 भारत में आयकर महकमे ने उसी केस में दूसरे दलाल हिन्दूजा के फ्लैट को जब्त कर उसे नीलाम पर चढ़ा दिया।

  याद रहे कि आयकर न्यायाधिकरण ने कहा था कि बोफोर्स दलाली के पैसे हिन्दूजा व क्वात्रोचि को मिले थे।

अतः उस पर आयकर बनता है।

 याद रहे कि जब्त खाता खुल जाने के तत्काल बाद क्वोत्रात्रि पैसे निकाल कर भाग चुका था।

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हाल में यह खबर छपी है कि वी.पी.सिंह ने कागज का एक टुकड़ा ,जिसमें बोफोर्स दलाल के बैंक खाते का नंबर था,हवा में लहराया और राजीव गांधी सरकार चली गयी।

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जबकि सच्चाई यह है कि वी.पी.सिंह ने स्विस बैंक के जिस खाते का नंबर बताया था,वही नंबर बोफोर्स मुकदमे के आरोप पत्र में दर्ज है।

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बोफोर्स को लेकर मशहूर  वकील अजय अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट में  याचिका दायर की थी।उसे सुनवाई के लिए मंजूर भी किया गया था।पता नहीं उसका क्या हश्र हुआ।यानी कब सुनवाई होगी !!

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23 मार्च 24


 बेशर्मी की हद

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इस देश में आज बहस इस बात पर हो रही है कि मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल जेल से सरकार चला सकते हैं या नहीं।

एक ने कहा कि संविधान में ऐसी कोई रोक तो है नहीं।

बेशर्मी की हद है !!!

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अधिक दिन नहीं हुए।

सत्तर के दशक में बिहार के एक बड़े नेता के सामने भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाने की नौबत आई थी।

वे शर्म व हया वाले नेता थे।स्वतंत्रता सेनानी थे।

उन्होंने जेल जाने के बदले आत्म हत्या करना बेहतर समझा।

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यदि ऐसी खबर संविधान निर्माताओं को आज परलोक में

पहुंच जाए तो वे भगवान से प्रार्थना करेंगे कि हमारा अगला जनम वैसे नेताओं के देश में नहीं हो।

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सुरेंद्र किशोर

23 उंतबी 24


शुक्रवार, 22 मार्च 2024

 कहां से चलकर कहां पहुंचे केजरीवाल !!!

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सुरेंद्र किशोर

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आज की ताजा खबर

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दिल्ली के सी.एम.केजरीवाल मनी लांड्रिग मामले में गिरफ्तार

21 मार्च 202

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पहले की खबरों की सूची

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भ्रष्टाचार पर समझौता नहीं।

मैं इससे लड़ने के लिए अपनी पूरी जिन्दगी दांव पर लगा दूंगा--केजरीवाल

---राष्ट्रीय सहारा-6 जनवरी 2013

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दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी आम आदमी सरीखी जीवन शैली के लिए मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं।

------दैनिक हिन्दुस्तान--5 जनवरी 2014

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हां, मैं अराजक हूं,जरूरत पड़ी तो गणतंत्र दिवस परेड भी नहीं होने दूंगा--मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल

----दैनिक भास्कर

21 जनवरी 2014

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32 घंटे बाद दिल्ली की सड़क से केजरीवाल का धरना खत्म

----22 जनवरी 2014--दैनिक भास्कर

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राजनीति की आइटम गर्ल है ‘आप’

देश को दांव पर लगाकर राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हासिल करने में लग गई है आम आदमी पार्टी

--चेतन भगत के लेख का शीर्षक

--दैनिक भास्कर--22 जनवरी 2014

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1984 के सिख दंगों की जांच एस आई टी से हो--केजरीवाल

   30 जनवरी 2014

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आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्य कारिणी

आम चुनाव में क्रांति का एलान

केजरीवाल ने बनायी भ्रष्ट नेताओं की लिस्ट

लिस्ट में राहुल गांधी और 11 केंद्रीय मंत्रियों के नाम हैं।

-----प्रभात खबर--1 फरवरी 2014

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हां,मैं राजनीतिक क्रांतिकारी हूं

--केजरीवाल

---सहारा-10 फरवरी 2014

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देश के लिए अगर जान भी देनी पड़े तो दे दूंगा

----केजरीवाल

--प्रभात खबर-15 फरवरी 2014

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फंड के लिए मफलरमैन के साथ सेल्फी

---22 दिसंबर 2014

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घूसखोरी खत्म करना प्राथमिकता

--अरविंद केजरीवाल

---प्रभात खबर--11 फरवरी 2015

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मुझे एक साल से निशाना बनाया जा रहा था

-केजरीवाल

--30 मार्च 2015

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गुरुवार, 21 मार्च 2024

 आज का वह ऐतिहासिक दिन

जब आपातकाल हटा 

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21 मार्च 1977 को इंदिरा गांधी सरकार ने जाते-जाते 

इमर्जेंसी हटा ली।

जिन लोगों पर इमर्जेंसी का कहर नहीं ढहा और जिन 

सजग पाठकों ने सेंसर का जहर पान नहीं किया,उन्हें इमर्जेंसी के हटने से मिली राहत के सुखद अनुभव का अनुमान नहीं।

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बस एक लाइन में यह समझ लीजिए कि इंदिरा गांधी की सरकार के एटाॅर्नी जनरल ने तब सुप्रीम कोर्ट ने यह कह दिया था कि 

‘‘आज यदि शासन किसी नागरिक की जान भी ले ले,तौभी  उसके खिलाफ अदालत की शरण नहीं ली जा सकती।

क्योंकि संविधान में मिले जीने के अधिकार के साथ-साथ सभी मौलिक अधिकार स्थगित कर दिये गये हैं।सुप्रीम कोर्ट ने अनुशासित बालक की तरह इंदिरा सरकार के उस आदेश पर अपनी मुहर लगा दी थी।

जबकि अंग्रेजों के राज में भी पुलिस की गोली से निर्दोष व्यक्ति की हत्या के खिलाफ अदालत की शरण ली जा सकती थी।आज तो इस देश में किसी जेहादी आतंकवादी के लिए भी सुप्रीम कोर्ट आधी रात में भी खुल जाता है।

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इमर्जेंसी में इस देश का क्या हाल था,खुद मैंने उसे देखा,झेला और महसूस किया था।मैं खुद तब मेघालय में भूमिगत था।

लगता था कि ये अंधेरी रातें कभी समाप्त ही नहीं होंगी।

पर,मेरी बात पर मत जाइए।

अभी नेहरू-इंदिरा के दोस्त देश सोवियत संघ के एक अखबार ने क्या लिखा था-उसे यहां पढ़ लीजिए।

तब दैनिक अखबार ‘‘इजवेस्तियां’’ने लिखा था कि 

‘‘आपात् स्थिति के दौरान सत्ता का दुरुपयोग और लोगों पर ज्यादतियां श्रीमती गांधी के पतन का कारण बनी।’’

मोरारजी देसाई सरकार के गठन के बाद जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि

‘‘नयी सरकार का पहला काम यह होना चाहिए कि पिछले कुछ वर्षों में जनता के मन में जो भय पैदा कर दिया गया है,उसे हटाया जाये।

 सरकार लोगों को इस बात की पूरी आजादी दे कि उन्हें जो भी कहना हो, वे कहें।

लोग महसूस करें कि यह उन्हीं की सरकार है।’’

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 25 जून, 1975 को प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर दमघोंटू इमर्जेंसी इसलिए लगाई क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली लोक सभा क्षेत्र से इंदिरा गांधी का चुनाव रद कर दिया था।

1971 के चुनाव के दौरान श्रीमती गांधी पर जन प्रतिनिधित्व कानून की दो धाराओं के उलंघन का आरोप साबित हो गया था।

चूंकि उन धाराओं को इंदिरा जी के खिलाफ केस की जरूरत के अनुसार संसद से बदलवा कर उन्हें पिछली तारीख से लागू करवाने का काम इमर्जेंसी लगाकर और सारे प्रतिपक्षी नेताओं को जेलांे में ठूंस कर ही किया जा सकता था।

इसलिए पूरे देश को एक विशाल कारागार बना दिया गया।

तब का सुप्रीम कोर्ट इतना आाज्ञाकारी हो चुका था कि उसने 

जन प्रतिनिधित्व कानून में उस संशोधन को पिछली तारीख से लागू करना भी मंजूर कर लिया ताकि इंदिरा जी की लोस सभा की सदस्यता बरकरार रह जाये।यही हुआ भी।

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21 मार्च 24      


सोमवार, 18 मार्च 2024

 मोदी है तो मुमकिन है

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सांसद फंड की समाप्ति के बिना भ्रष्टाचार 

को काबू में लाना असंभव

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समाप्ति का यह काम नरेंद्र मोदी ही कर सकते हैं।

अटल जी और मनमोहन जी तो चाहते हुए भी इसे 

समाप्त नहीं कर सके थे

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सुरेंद्र किशोर

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  मेरा मानना है कि सांसद क्षेत्र विकास फंड सरकारी व राजनीतिक भ्रष्टाचार का ‘‘रावणी अमृत कुंड’’ है।

  इस फंड के प्रावधान की समाप्ति के बिना शासन व राजनीति से भ्रष्टाचार की समाप्ति कौन कहें,इसे कम करने की भी कल्पना नहीं की जा सकती।

  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी आज इतने लोकप्रिय और ताकतवर हैं कि वे ही इस फंड को समाप्त कर सकते हैं।

अभी लोहा गर्म है।

वैसे भी यह जन कल्याण का काम है।

नब्बे के दशक में भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने के लिए ही इस फंड को शुरू किया गया था। 

खबर मिली थी कि कुछ साल पहले मोदी जी ने इस फंड की समाप्ति को लेकर सांसदों से राय मांगी थी।

पता चला कि सिर्फ 3 सांसदों ने इसकी समाप्ति के पक्ष में राय दी।इसकी ‘ताकत’ तो देखिए !!

अटल बिहारी वाजपेयी जी ,मनमोहन सिंह जी प्रधान मंत्री थे तो वे चाहते हुए भी इसे समाप्त नहीं कर सके थे।

पर मोदी दूसरी ही मिट्टी के बने हैं।मोदी लुंजपुंज नेता नहीं है।

मोदी है तो यह असंभव सा दिखने वाला यह काम भी 

मुमकिन है।इसके बड़े फायदे हैं।किसी अन्य एक काम से इतना फायदा नहीं।

लोक सभा के भाजपा उम्मीदवारों को, जो अपनी जीत के लिए आज मोदी पर ही निर्भर हैं, ‘‘चुनावी टिकट’’ देते समय ही भाजपा नेतृत्व उनसे यह लिखवा लें या उन्हें साफ -साफ कह दे कि नयी लोक सभा के कार्यकाल शुरू होते ही सांसद फंड बंद हो जाएगा।अन्य किसी दल से ऐसी उम्मीद नहीं की सकती।

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अब नहीं तो कभी नहीं मोदी जी !!

सांसद फंड में कमीशनखोरी और न खाएंगे और न खाने देंगे --दोनों बातें एक साथ कैसे चलेंगी ? !!

सांसद शब्द बड़ा पवित्र शब्द है,इसकी गरिमा बढ़ाने का काम तुरंत शुरू हो जाना चाहिए।

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18 मार्च 24