सोमवार, 13 मई 2024

 


 दूर की कौड़ी

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कुछ खास लोगों के परिजन अपने खास 

के लिए 4 जून से पहले ही कुछ खास 

तरह के अस्पतालों में सीटें रिजर्व करा लें

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सुरेंद्र किशोर

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 ज्ञानपीठ पुरस्कृत कन्नड लेखक यू.आर. अनन्तमूर्ति ने 

19 सितंबर. 2013 को कहा था कि 

‘‘यदि नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बन जाएंगे तो मैं इस देश में नहीं रहूंगा।’’

   26 मई 2014 को मोदी प्रधान मंत्री बन गये।

इसके बावजूद अनन्तमूर्ति जी ने देश नहीं छोड़ा ।

उन्होंने अपना विचार बदल लिया।

पर, मोदी के पी.एम.बनने के तीन ही महीने बाद अनन्तमूर्ति जी का निधन हो गया।

पर,इस बीच इस देश में ‘‘अनन्तमूर्तियों’’ की संख्या बढ़ गयी है।

 विभिन्न क्षेत्रों के आज के अनन्तमूर्तियों के समक्ष 4 जून के बाद और भी अधिक कठिनाइयां उपस्थित होने वाली हैं।

सन 2014 में सत्ता में आने के बाद कई हलकों में यह उम्मीद भी की भी जाती थी कि मोदी अगली बार शायद सत्ता से हट सकता है।

पर तीसरी बार सत्ता में आ जाने के बाद फिलहाल उस उम्मीद की गुंजाइश काफी कम हो जाएगी।

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4 जून 2024 को लोक सभा चुनाव के नतीजे आ जाएंगे।

राजनीति के मौसमी पक्षियों ने हमें पहले ही संकेत दे दिया है कि चुनावी हवा का रुख किधर है।

आपने जरूर ध्यान दिया होगा कि पिछले कुछ महीनों में किस खास दल की ओर अन्य दलों से सबसे 

अधिक महत्वपूर्ण दल बदल हुए हंै। 

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संकेत मिल रहे हैं कि 4 जून और 5 जून 24 को कई जगह ‘‘सीटों’’ की भारी कमी महसूस की जा सकती है।

संभव है कि मेरा यह पूर्व अनुमान गलत निकले।यदि गलत निकलेगा तो मुझे भी खुशी होगी।

पर,संकेत तो गड़बड़ मिल रहे हैं।

आज के अनन्तमूर्तियों के बोल वचन भी ठोस संकेत दे रहे हैं।

जहां -जहां कमी हो सकती है ,उनके नाम हैं--

1.-अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में

2.-इस देश के सामान्य अस्पतालों में

3.-इस देश के वैसे अस्पतालों में जिसकी हृदय रोग 

 की विशेज्ञता है।

4.-मानसिक आरोग्यशालाओं में तो भारी कमी हो सकती है।

क्योंकि पहले से ही वहां जगह की तंगी है।  

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13 मई 24



 जब पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने 1980 के लोक 

सभा चुनाव के लिए जयगुरुदेव से आशीर्वाद मांगा था

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1979 के नवंबर में मथुरा के धार्मिक गुरु जयगुरुदेव से मिलकर पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी भूलों के लिए माफी मांगी।

जानकार सूत्रों के अनुसार लगभग गिड़गिड़ाते हुए लोक सभा के चुनाव (1980)के लिए आशीर्वाद की याचना की।

चर्चित साप्ताहिक ‘रविवार’ (9 दिसंबर 1979)की खबर के अनुसार इंदिरा गांधी ने गुरुदेव से कहा कि मुझे आप पर इमर्जेंसी में हुए अत्याचारों की कोई जानकारी नहीं थी।

  नवंबर की मुलाकात के बारे में पत्रकारों ने जब 4 दिसंबर 1979 को लखनऊ में इंदिरा गांधी से पूछा तो पूर्व प्रधान मंत्री ने कहा कि मैंने जयगुरुदेव से कोई राजनीतिक चर्चा नहीं की।मुझे किसी के आशीर्वाद की जरूरत नहीं।हालांकि यह  माना कि मुलाकात हुई थी।दूसरी ओर जयगुरुदेव के शिष्यों ने दोनों (जयगुरुदेव और इंदिरा गांधी )के बीच की बातचीत की टेप रिकाॅंडिंग कर ली थी।

  उससे पहले कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने इंदिरा के लिए जयगुरुदेव से मिलने का समय मांगा था।

  याद रहे कि आपातकाल में जयगुरुदेव को गिरफ्तार करके उन्हें बेड़ी-हथकड़ी लगाई गयी।यह भी आरोप लगा कि बाबा की भक्त सत्संगियों को नंगा करके अपमानित किया गया था।

इसकी चर्चा करने पर इंदिरा गांधी ने जयगुरुदेव से कहा कि (तब के यू.पी.के मुख्य मंत्री )बहुगुणा को यह सब देखना चाहिए था कि न हो। ं 

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 जयगुरुदेव के दुनिया भर में करोड़ों भक्त रहे हैं।

जय गुरुदेव का निधन सन 2012 में हो गया।

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सन 1980 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले अन्य अनेक बड़े नेताओं ने भी उनके आश्रम में जाकर जयगुरुदेव से मुलाकात की और अपने अपने दल के लिए समर्थन मांगा था।

उधर दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम अब्दुला बुखारी से भी चुनाव को लेकर तब इंदिरा गांधी की बातचीत की खबरें आई थीं।

याद रहे कि शाही इमाम ने 1977 के लोक सभा चुनाव में जनता पार्टी का समर्थन किया था।क्योंकि मुसलमान आपात काल में चले परिवार नियोजन कार्यक्रम को लेकर नाराज थे। 

दिल्ली के तुर्कमान गेट पर भी पुलिस ने कार्रवाई की थी।

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13 मई 24


 


 


जो नेता गण हाल के वर्षों में यह आरोप लगाते रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में अघोषित इमर्जेंसी लगा रखी है,वे असली इमर्जेंसी की एक असली कहानी को यहां पढ़ लें।

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सुरेंद्र किशोर

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यह कहानी साप्ताहिक ‘रविवार’ (9 दिसंबर 1979)में छप चुकी है।

कहानी यानी आत्मदाह से ठीक पहले तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के नाम प्रभाकर शर्मा की मार्मिक चिट्ठी में वर्णित  कहानी।

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याद रहे कि शर्मा ने उस पत्र की प्रति ‘सरकारी संत’ विनोबा भावे को भी भेजी थी।

पर विनोबा ने उस पत्र की किसी से चर्चा तक नहीं की।

सरकारी भय का ऐसा ही आतंक था।

याद रहे कि इमर्जेंसी में विनोबा की पत्रिका ‘‘मैत्री’’ को भी महाराष्ट्र पुलिस ने जब्त कर लिया था।विनोबा उसके संपादक थे।

जबकि अभूतपूर्व दमनकारी आपातकाल के समर्थन में विनोबा ने आपातकाल को सार्वजनिक रूप से ‘‘अनुशासन पर्व’’ बता दिया था।

याद रहे कि केंद्र सरकार ने आपातकाल में आम लोगों के जीने तक का अधिकार छीन लिया था।

देश के विभिन्न जेलों में कैद हजारों छोटे-बड़े प्रतिपक्षी नेताओं व पत्रकारों को अदालत जाने की अनुमति नहीं थी।

केंद्र सरकार के इस कदम को भयभीत सुप्रीम कोर्ट का भी पूरा समर्थन मिल गया था।

आपातकाल (1975-77)की क्रूरता के खिलाफ प्रभाकर शर्मा ने  आत्म दाह करने से ठीक पहले प्रधान मंत्री    

इंदिरा गांधी को पत्र लिखा-

‘‘इंदिरा जी,मैं आपके पापी राज्य में (जिन्दा)नहीं रहना चाहता।’’

महात्मा गांधी के आह्वान पर प्रभाकर शर्मा ग्राम सेवा क्षेत्र में कूदे थे।

शर्मा ने यह भी लिखा था--‘‘क्या आपका मीसा (दमनकारी कानून)ईश्वर पर भी लागू होगा ?

आपके पापी शरीर के छूटने पर आपके पिट्ठू और रक्षक साथ नहीं जाएंगे।

अतःअच्छा तो यही है कि आप प्रायश्चितपूर्वक हृदय से भारतीय जनता से अपने अक्षम्य अपराधों के लिए क्षमा मांगें।’’ 

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याद रहे कि आपातकाल की जन विरोधी क्रूरता और सत्ताधारियों के नग्न 

नाच से संतप्तं होकर प्रभाकर शर्मा ने 

14 अक्तूबर 1976 को महाराष्ट्र के वर्धा के निकट सुरगांव में अपने शरीर पर तेल छिड़क कर आत्म दाह कर लिया था।

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8 मई 24



 डी.जे.का भारी शोर बच्चों और 

बूढ़ों के लिए नुकसानदेह 

पड़ोसियों को भी कष्ट

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धीमी आवाज में मधुर संगीत बेहतर

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सुरेंद्र किशोर

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वैसे तो मेरी इस सलाह पर कोई ध्यान नहीं देगा,पर शालीनता से  विरोध दर्ज कराना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं।

आम तौर पर लोग शादी,शादी की साल गिरह या जन्म दिन आदि के अवसरों पर शोर मचाऊ डी.जे.यानी डिस्क जाॅकी का इंतजाम कर देते है।इसमें वे अपनी शान समझते हैं।

  इन अवसरों पर शुरू से अंत तक डी.जे.लगातार भारी व कर्कश शोर मचाता रहता है।

सरकार द्वारा निर्धारित आवाज सीमा का कोई ध्यान नहीं रखा जाता।

नियमानुसार दिन में 45 से 55 डेसिबल आवाज की अनुमति है।

रात में उसकी निर्धारित सीमा और भी कम हो जाती है।

पर,आम तौर पर 100 डेसिबल से कम पर कोई डी.जे.नहीं बजाता।डी.जे. की आवाज में जितनी अधिक कर्कशता होगी,लोग हमें उतना ही बड़ा आदमी मानेंगे,यह मान कर चला जाता है।

किसी समारोह में आप अपने अनेक मित्रों -रिश्तेदारों को बुला ही लेते हैं।ऐसे अवसर कम आते हैं।कई लोग दूर-दूर  से आते हैं।उनमें से कई आपस में भी रिश्तेदार होते हैं।

 बहुत दिनों के बाद आपस में मिलने का उनके लिए वह एक अवसर होता है।

उस अवसर का वे सदुपयोग 

करना चाहते हैं।

आपस में दुख-सुख बतियाना चाहते हैं।

  पर,डी.ज.े के कर्कश शोर के बीच वे आपस में ठीक से बातचीत भी नहीं कर पाते।क्योंकि एक दूसरे की आवाज वे ठीक से नहीं सुन पाते।

  अधिक शोर का कुपरिणाम बच्चों और बूढ़ों के स्वास्थ्य पर अधिक पड़ता है।

ऐसे विशेष अवसरों पर बच्चे तो मां-बाप के साथ जाएंगे ही।

पर,बूढ़ों का जाना कोई जरूरी नहीं है।उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए ऐसे समारोहों में विवेकशील मेजबान किसी उम्रदराज को आमंत्रित न करें।

  क्योंकि मैं जानता हूं कि अनेक असंवदेनहीन लोग बूढ़े और डी.जे.के बीच चुनना हो तो वे किसे चुनेंगे।

  ऊंची आवाज वाला डी.जे.लगवाकर कर्कश शोर मचवाने से आपका निकट का अधिकतर पड़ोसी भी परेशान हो 

जाता है।आपके बारे में उसकी धारणा बदल सकती है।

  पर डर या लिहाज से आपसे कुछ नहीं बोलता। 

अच्छा हो ऐसे शुभ अवसरों पर दूसरों को परेशान करने के बदले आप अपने यहां धीमे स्वर में मधुर संगीत 

का इंतजाम करें।

करके देखिए,लोगबाग आपकी शालीनता की तारीफ करेंगे। 

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13 मई 24


 मां के साथ-साथ आज पिता की याद में भी 

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सुरेंद्र किशोर

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मेरे बाबू जी जब हम दोनों भाइयों को अपनी पुश्तैनी जमीन बेच कर छपरा और पटना रखकर पढ़ा रहे थे तो उसी बीच एक स्थानीय मुखिया मेरे घर आये।

बाबू जी से बोले--‘‘आप सोना जइसन जमीन बेचकर पढ़ा रहे हैं।पढ़- लिखकर उ सब शहर में बस जइहन स,रउआ के ने पूछिहन स।’’

उस पर बाबू जी बोले--‘‘सोना अइसन जमीन बेच के हीरा गढ़त बानी।

ने पूछिहन त कवनो बात नइखे।हमरा खाए -पिए के कवन दिक्कत बा ?तोहरा इ सब ने बुझाई।’’

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बाबू जी खुद सिर्फ साक्षर थे।जमींदारी की मालगुजारी की  रसीद पर कैथी में कुछ लिखकर दस्तखत करते हुए मैं उन्हें देखता था जब मैं छोटा था।

खुद लघुत्तम जमीन्दार थे और एक बड़े जमीन्दार के तहसीलदार थे।मेरे घर में राम चरित मानस,शुकसागर और आल्हा ऊदल की किताब को छोड़कर कोई पठनीय सामग्री नहीं रहती थी।

पर शिक्षा के प्रति बाबू जी को बेहद लगाव था।

मैं 1963 में अपने परिवार में पहला मैट्रिकुलेट हुआ।

आसपास के गांव के किसी ऐसे परिवार को मैं नहीं जानता जो अपने बाल- बच्चों को जमीन बेच कर पढ़ा रहा हो।

मेरे बचपन में मेरे परिवार के पास जितनी जमीन थी,अब उससे आधी से भी कम रह गई है।पर, सड़क-बिजली-बाजार आदि विकसित हो जाने के कारण पहले की अपेक्षा आज की कम जमीन की कीमत भी,पहले की अधिक जमीन की कीमत से कई गुणा बढ़ चुकी है।बढ़ ही रही है।उस इलाकों को न्यू पटना बनाने का नीतीश कुमार का वायदा है।

यानी, मेरे बाबूजी दूरदर्शी थे--परंपरागत विवेक से लैस थे।

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मेरी मां के साथ मेरे बाबू जी जितना आदर से बातें करते थे ,उतना आदर-भाव मैंने किसी अन्य जोड़ी के बीच नहीं देखा।

 मां तो मां ही होती है।

किसी ने ठीक ही कहा है कि चूंकि ईश्वर हर जगह मौजूद नहीं रह सकते, इसलिए उन्होंने घर-घर मां भेज दिया।

मेरे बड़े भाई सौतेले थे।

फिर भी, मेरी मां ने उन्हें अपने पुत्र के समान ही प्यार दिया।

1986 में जब बाबू जी का निधन हुआ तो हमने मां से कहा कि अब आप पटना चल कर हमारे साथ रहिए।उसने कहा कि यह नहीं हो सकता।

लोग क्या कहेंगे ?

कहेंगे कि सौतेले बेटे को छोड़कर पटना चली गयी।मेरी मां नहीं आई। बाद में अपने आखिरी दिनों में पटना आकर मेरे साथ रही थी।

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 मां के साथ संतान के संबंध में कोई स्वार्थ नहीं होता।

यानी, निःस्वार्थ प्यार सिर्फ मां का प्यार ही होता है।

पिता का तो कम से कम यह स्वार्थ रहता ही है कि मेरी संतान मुझसे आगे बढ़ जाए।अधिक तरक्की करे।

  पर, मां को इन सबसे भी कोई मतलब नहीं।

बाकी लोगों के साथ तो लोगों का आपसी ‘लेन देन’ का रिश्ता होता है।

जरूरी नहीं कि उससे पैसे ही जुड़े हों।

लेन देन मतलब आप जितना स्नेह दीजिएगा,उतना पाइएगा।

जितना सम्मान दीजिएगा,उतना पाइएगा।

जितना दूसरे का ध्यान रखिएगा,उतना वह आपका ध्यान रखेगा।

अपवाद की बात और है।

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इसलिए विपरीत परिस्थितियों के लिए ठीक ही कहा गया है,

‘कुछ हंस कर बोल दो,

कुछ हंस कर टाल दो।

परेशानियां बहुत हैं,

कुछ वक्त पर डाल दो।’ 

मां के अलावा बाकी लोगों से संबंध निभाते रहने के लिए इस फार्मूले का इस्तेमाल किया जा सकता है।

संबंध तो कच्चा धागा है जिस पर निरंतर प्रेम का मांझा

लगाते रहना पड़ता है।

पर मां के मामले में इसकी भी जरूरत नहीं पड़ती।

और अंत में

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एक बार मेरी पत्नी मेरे नन्हे पुत्र को पीट रही थीं।शिक्षिका हैं,वैसे भी उनका अधिकार था।

तब तक सरकार ने शिक्षकों के हाथों से छड़ियां नहीं छीनी थीं।

खैर ,उन दिनों मेरी मां भी मेरे साथ ही रहती थीं।

उसे पोते  पर दया आ गई।

बोली, क्यों मार रही हो ?

उसने कहा कि ‘होम वर्क नहीं बनाया है।’

 मेरी मां ने कहा कि 

‘मैंने तो कभी एक चटकन भी नहीं मारा,

 फिर भी मेरे दोनों बबुआ कैसे पढ-लिख गए ?’ 

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12 मई 24


 सन 1977 में पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की 

गिरफ्तारी की घटना को याद कर लीजिए

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जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को सिर्फ गिरफ्तार कर सकती है।पर उसे जेल भेजने का काम तो अदालत ही कर सकती है,करती भी हैं।उसे ही वह अधिकार प्राप्त है।

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सुरेंद्र किशोर

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सी.बी.आई. ने 3 अक्तूबर, 1977 को 

भ्रष्टाचार के आरोप में पूर्व प्रधान मंत्री श्रीमती गांधी को उनके समर्थकों के भारी विरोध के बीच गिरफ्तार किया।

तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री चरण सिंह उन्हें जल्द से जल्द जेल भेजने के लिए तत्पर थे।इमर्जेंसी पीड़ित लोगों के बीच इंदिरा जी के खिलाफ भारी गुस्सा था।आपातकाल में जेलों के भीतर और बाहर भारी पीड़ा झेल चुके  लोग सरकार पर खास कर चरण सिंह पर इंदिरा की गिरफ्तारी के लिए दबाव डाल रहे थे।

3 अक्तूबर को इंदिरा जी को अदालत में पेश किया गया।

अदालत ने यह कहते हुए उन्हें तुरंत रिहा कर देने का आदेश दे दिया कि जो कागजात सी.बी.आई.ने यहां पेश किया है उसमें प्रथम दृष्टवा कोई सबूत नजर नहीं आ रहा है।सी.बी.आई.े के वकील ने कहा कि सबूत हम एकत्र कर रहे हैं।इनकी गिरफ्तारी से भी हमें सबूत जुटाने में मदद मिलेगी।पर,अदालत ने सी.बी.आई.के वकील की बात नहीं मानी। 

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ऐसा नहीं है कि इंदिरा गांधी के खिलाफ सबूत नहीं थे।लेकिन तब तक सी.बी.आई.के पास नहीं पहुंचे थे।

 तब तक एकत्र नहीं किये जा सके थे।या कोई अन्य मजबूरी होगी।

कई बार जांच एजेंसी सबूत को समय से पहले जाहिर नहीं करना चाहती।पर,इंदिरा के मामले में ऊपरी आदेश से सी.बी.आई.जल्दीबाजी में थी।

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दूसरी ओर, जब हाल में जांच एजेंसी ने बारी -बारी से अरविन्द केजरीवाल और हेमंत सोरेन को गिरफ्तार करके उन्हें कोर्ट में पेश किया तो कोर्ट ने दोनों को जेल भेज 

दिया।

  क्योंकि इनके मामलों में अदालत को पहली नजर में ही उन कागजात में सबूत नजर आ गये थे जो कागजात जांच एजेंसी ने कोर्ट में पेश किये थे।

बचाव पक्षों के बड़े- बड़े वकील भी इन दोनों नेताओं को जेल जाने से नहीं बचा सके।

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यानी, 

यानी,जांच एजेंसी सिर्फ गिरफ्तार करती है।

किंतु जेल भेजने या न भेजने का फैसला अदालत का होता है।

फिर भी, इन कैद नेताओं के पक्ष में यह प्रचार किया जाता है कि मोदी सरकार ने जेल भेज दिया।

ऐसा कह कर कोर्ट को 

प्रकारातंर से पक्षपाती साबित करने की कोशिश अघोषित रूप से की जाती है।यानी कोर्ट की मोदी से साठगांठ है।

आश्चर्य है कि कोर्ट पर ऐसे परोक्ष आरोप को लेकर किसी के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला नहीं चलता।

इसीलिए ऐसे आरोप लगते रहते हैं।

याद रहे कि इस देश के कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के 24 घंटे के भीतर अदालत में उसे पेश करने की कानूनी मजबूरी है।

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13 मई 24


 


अपने नेताओं के झूठे बयानों पर ऐसे 

काबू किया था यूरोप के एक अखबार ने

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सुरेंद्र किशोर

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यह बात यूरोप के एक देश से संबंधित है।

बहुत पुरानी भी है।

किंतु अपने इस देश पर आज भी लागू है।

 मैंने कई दशक पहले कहीं यह कहानी पढ़ी थी।

उस देश के अधिकतर नेता अक्सर झूठा  बयान या गलत आंकड़ा देते रहते थे।

वे बयान छपते थे तो अखबारों को दूसरे दिन परेशानी होती थी।या तो उसका खंडन आता था या फिर मानहानि के मुकदमे हो जाते थे।

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एक अखबार ने उसका ठोस उपाय किया।

झूठे नेताओं के झूठे बयान या आंकड़े जब अखबार के दफ्तर में आते थे तो अखबार वाले शंका होने पर उस संबंध में सही बात का पता लगा लेते थे।या पहले से ही उनके पास उस संबंध में सही तथ्य उपलब्ध होते थे।

अखबार उस झूठे बयान या गलत आंकड़े के साथ ही सही बात व सही आंकड़े भी उसी दिन छापने लगे।

अपनी ओर से टिप्पणी--इस नेता की झूठी बात यह है कि उसके विपरीत सही बात यह है।

पाठकगण दोनों को पढ़ें और उसके बाद ही उस पर अपनी राय बनायें।

जब ऐसे- ऐसे अनेक खंडन लगातार छपने लगे तो झूठे नेताओं को शर्म आई।उन्होंने झूठ बोलना काफी कम कर दिया।

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भारत के प्रिंट मीडिया के लिए तो यह करना कई कारणों से संभव नहीं लगता है।

पर, सोशल मीडिया

यह काम करे तो वह अधिक लोकप्रिय हो जाएगा।

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हां, इस मामले में संतुलन बरतने से मीडिया को अधिक लाभ होगा।

समानांतर मीडिया इस मामले में पक्ष और विपक्ष के नेताओं के साथ समान रुख अपनाए।

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अंत में 

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सत्तर-अस्सी के दशकों के बिहार के एक बड़े नेता जब सत्ता में होते थे तो वे राज्य की सिंचित जमीन का एक आंकड़ा बताते थे।आंकड़े को बढ़ा देते थे।

पर जब वही नेता विपक्ष में होते थे तो उनके आंकड़े में भारी कमी आ जाती थी।

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चुनाव के समय अपने देश के अधिकतर नेता लोग सार्वजनिक रूप से झूठ और अशिष्ट शब्दों का कुछ अधिक ही इस्तेमाल करते हैं।कई बार गाली-गलौज भी।

शायद पहले चंडूखानों में ही वैसी अशिष्टता देखी जाती थी।

पर,अब तो ऐसा हो गया है कि नयी पीढ़ी के अनेक लोगों को सक्रिय राजनीति से

घिन आती है।

एक बार एक छात्र ने सरल भाव से 

पूछा--क्या राजनीति में खादी के साथ-साथ झूठ बोलने की भी कोई मजबूरी होती है ?

शिक्षक ने कहा--कोई मजबूरी नहीं।

छात्र सोचने लगा--इन गालीबाज,अशिष्ट और झूठे नेताओं के परिजन और बाल-बच्चे अपने अभिभावक के बारे में कैसी राय बनाता होगा !

निजी टी.वी.चैनलों के कुत्ता भुकाव कार्यक्रमों पर अशिष्ट अतिथियों के बारे में उनके ही परिजन क्या सोचते होंगे ?

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सुरेंद्र किशोर

12 मई 24

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पुनश्चः

एक बार एक पूर्व केंद्रीय मंत्री जो बिहार के प्रमुख नेता थे, कहा था कि चुनाव के समय के गाली-गलौज को हम होली की गालियों की तरह ही बाद में भुला देते हैं।

पर सवाल है कि इस बीच नयी पीढ़ी को आप कैसी शिक्षा दे जाते हैं ?