शनिवार, 28 सितंबर 2024

 इटली समेत 5 देश अवैध प्रवासियों पर सख्त

इस साल 2 लाख को वापस भेजने की तैयारी

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सुरेंद्र किशोर

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जिस तेजी से अवैध मुस्लिम प्रवासी यूरोप पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं,उसकी अपेक्षा अधिक गंभीरता और ताकत के साथ यूरोप ने उन्हें विफल कर देने के लिए कमर कस ली है।

क्योंकि यूरोप,भारत नहीं हैै।

   सीरिया,अफगानिस्तान,पाकिस्तान,अल्जीरिया,मोरक्को और मिस्र जैसे देशों से अवैध मुस्लिम प्रवासी यूरोप में घुसते रहे हैं।

यूरोप के देश यह शिकायत कर रहे हैं कि अवैध प्रवासी  हमारे यहां कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा कर रहे हैं और धार्मिक बैमनस्य फैला रहे हैं।

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वैसे भारत की एकता-अखंडता-सार्वभौमता पर इस मामले में अवैध मुस्लिम घुसपैठियों से सबसे अधिक खतरा मंड़रा रहा है।

पिछले दशकों से अवैध घुसपैठिए भारत में गांव दर गांव और शहर दर शहर में अपना बहुमत बनाते जा रहे हैं।

इसके बावजूद भारत की मूल आबादी पिछली सदियों की ही तरह आज भी इस आसन्न समस्या के हल के सवाल पर बंटे-कटे हैं।

 वोट बैंक के लोभी दल व नेता गण और महा भ्रष्ट भारतीय प्रशासन तंत्र इस समस्या को इस देश में रोज-रोज बढ़ा रहे हैं।कहीं यह समस्या लाइलाज न हो जाए !!

 अब देखा जा रहा है कि  इस समस्या के प्रति भारत की आम जनता का एक बड़ा हिस्सा जहां-तहां जागरूक और सक्रिय हो रहा है,किंतु सरकारें समस्या की गंभीरता के अनुपात में तनिक भी गंभीर नहीं है।

भारत की कई राज्य सरकारें तो अवैध घुसपैठियों की खुलेआम मदद कर उन्हें अपने यहां बसा रही हैं।

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यूरोप का हाल भारत से 

 अलग हैै।

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यूरोप के अवैध प्रवासी -पीड़ित देश यह समझ गये हैं कि हमने जिस पर दया करके कभी शरण दी थी ,वे ही लोग हमारे देश पर कब्जा करने के लिए प्रयत्नशील हैं।

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इटली 

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पी.एम.मेलोनी की सरकार अवैध प्रवासियों पर सबसे 

ज्यादा सख्त है।

प्रवासियों को देश से खदेड़ने के लिए स्पेशल पेट्रोलिंग शुरू की गई है।

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हंगरी

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हंगरी सरकार प्रवासियों को बिना मुकदमे निर्वासित कर 

रही है।इसके लिए सरकार ने इमर्जेंसी कानून पास किया है।

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नीदरलैंड

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यहां की सरकार ने शरणार्थियों के मुद्दे पर ही हाल में चुनाव में जीत हासिल की।

वह शरण के नियम को कड़ा कर रही है।

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फ्रांस

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फ्रांस सरकार ने इस साल 23 हजार प्रवासियों को देश से निकाल दिया।

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जर्मनी

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जर्मनी ने नौ देशों से लगती अपनी सीमा पर आवाजाही सीमित कर दी है।

जर्मनी के चुनावों में दक्षिणपंथी दल जीत रहे हैं क्योंकि वे 

अवैध प्रवासियों के सख्त खिलाफ हैं।वे जान गये हैं कि यदि हम सतर्क नहीं हुए तो जेहादी तत्व उनके देश पर देर-सबेर कब्जा कर लेंगे।

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अब देखना है कि छह-सात करोड़ अवैध मुस्लिम प्रवासियों वाला देश भारत इस गंभीर व कठिन हो चुकी समस्या 

से कैसे उबरता है !

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28 सितंबर 24


बुधवार, 25 सितंबर 2024

     लतीफ बनाम सोहराबुद्दीन

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    राजनीति सदा करती रही 

    है मुंठभेड़, मुंठभेड़ में फर्क !

   यानी, सेक्युलर मुंठभेड़ बनाम 

    कम्युनल मुंठभेड़ ।

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      सुरेंद्र किशोर

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 सन 1995 में आतंक विरोधी दस्ते ने गुजरात के खूंखार माफिया लतीफ को दिल्ली से गिरफ्तार किया। गुजरात पुलिस ने सन 1997 में लतीफ को मुंठभेड़ में मार

 दिया।

आरोप लगा कि मुंठभेड़ नकली थी।

यह भी कहा गया कि उसे हिरासत से निकाल कर मारा गया था।

पर, गुजरात की कांग्रेस समर्थित राजपा सरकार ने तब उन पुलिस अफसरों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जिन्होंने लतीफ को मारा था। 

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सोहराबुद्दीन शेख पहले लतीफ का ड्रायवर था।लतीफ गुजरात में वही काम करता था जो काम महाराष्ट्र में दाऊद इब्राहिम करता था।

 पहले लतीफ दाउद का सहयोगी ही था।बाद में दोनों के बीच झगड़ा हो गया।

एक बार तो गुजरात में जब दाऊद गैंग और लतीफ गंैग 

में मुंठभेड़ हुई तो लतीफ गैंग ने दाऊद गैंग को हराकर भगा दिया था।

लतीफ की मौत के बाद सोहराबुददीन वही काम करने लगा था जो काम पहले लतीफ करता था।गुजरात सहित तीन राज्यों के बड़े व्यापारी रोहराबुद्दीन से परेशान थे।

   सोहराबुद्दीन के खिलाफ 50 आपराधिक मुकदमे लंबित थे।

नरेंद्र मोदी के मुख्य मंत्रित्वकाल में सोहराबुदद्दीन सन 2005 में गुजरात पुलिस के साथ मुंठभेड़ मेें मारा गया।

तब अमित शाह गुजरात के गृह राज्य मंत्री थे।इसे नकली मुंठभेड़ बताकर अमित शाह पर केस कर दिया गया।

उन्हें जेल भिजवा दिया गया।

सन 2014 में अमित शह कोर्ट से दोषमुक्त हो गये।

याद रहे कि आरोप लगा कि सन 2000 से 2017 तक इस देश में नकली मुंठभेड़ के 1782 मामले सामने आये।सारे मामले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास गये थे।पर,उनमें से सोहराबुद्दीन के मामले को लेकर किसी बड़े नेता को जेल भिजवाया गया।

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सवाल कम्युनल मुंठभेड़ का जो था।

उस केस को आगे बढ़ाने से वोट मिलने वाले थे।

आज भी इस देश में यही सब हो रहा है।

कम्युनल मुंठभेड़ और सेक्युलर मुंठभेड़ के बीच रस्साकसी चल रही है।

आज तो यह भी देखा जा रहा है कि पुलिस के साथ मुंठभेड़ में अगड़ी जाति के अपराधी मारे जा

रहे हैं या पिछड़ी जाति के अपराधी।

हां,जब खूंखार अपराधी पुलिस मुंठभेड़ के दौरान पुलिसकर्मियों की जान लेते हैं तो नेतागण आम तौर पर मृतक पुलिसकर्मियों की जाति नहीं पूछते।

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24 सितंबर 24 

 

  

  

   


शनिवार, 21 सितंबर 2024

 महाजनो येन गतः स पंथाः

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सुरेंद्र किशोर

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‘‘हमारी सरकार ने इस केस(एक लाख 72 हजार पाउंड के जीप घोटाले)को बंद करने का निर्णय किया है।

यदि प्रतिपक्ष संतुष्ट नहीं है तो वह अगले चुनाव में इस मुद्दे को बना कर देख ले।’’

   ---केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत

        लोक सभा--30 सितंबर 1955

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मैंने भी फैसला किया है कि जनता की अदालत में जाऊंगा और पूछूंगा कि जनता मुझे ईमानदार मानती है या नहीं।जनता मेरी ईमानदारी पर मुहर लगाएगी,तभी मुख्य मंत्री की कुर्सी पर दुबारा बैठूंगा।

     --- अरविंद केजरीवाल ने मुख्य मंत्री पद छोड़ने के अपने निर्णय के साथ ही 15 सितंबर 2024 को यह बात कही।

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जीप घोटाला

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आजादी के तत्काल बाद के इस जीप घोटाले में एक लाख 72 हजार पाउंड केंद्र सरकार ने ब्रिटेन की एक ऐसी कंपनी को एडवांस दे दी थी जिसने एक भी काम की जीप की सप्लाई नहीं की।

कांग्रेस सांसद अनंत शयनम् अयंगार ने जांच की।पाया कि गड़बड़ी हुई है।उन्होंने न्यायिक जांच की केंद्र सरकार से सिफारिश की।पर गृह मंत्री ने कहा कि कोई जांच नहीं करायी जाएगी।

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अरविंद केजरीवाल पर आरोप

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जागरूक लोग जान रहे हैं कि केजरीवाल पर कितना गंभीर आरोप है।केजरीवाल को अदालत उस केस से मुक्त नहीं कर रही है।सिर्फ सशत्र्त जमानत दे रही है।शत्र्तें भी

काफी कठोर हैं।ऐसे में उन्हें वोटर याद आ रहे हैं।

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नब्बे के दशक में बिहार के एक बड़े चारा

घोटालेबाज ने कहा था कि जिसे जनता ने चुनाव जिता दिया,वह भ्रष्टाचारी कैसा ?!

यानी, वह भ्रष्टाचारी कत्तई नहीं है।

पर, बाद में अदालतों ने उसे भी सजा दे दी।

उसके वोटर उसे नहीं बचा सके।

क्या दिल्ली में केजरीवाल के वोटर 

सुप्रीम कोर्ट से ऊपर हैं ?!!

शायद वे वोटर भी नहीं समझते होंगे कि वे सुप्रीम कोर्ट से ऊपर हैं।

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21 सितंबर 24   


शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

   एक खुशखबरी

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सुरेंद्र किशोर

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मैं हर छह माह-साल भर पर अपना विस्तृत पैथोलाॅजिकल टेस्ट करवाता रहता हूं।

  ताजा टेस्ट 18 सितंबर 2024 को करवाया।

पिछली बार 4 अप्रैल 24 को करवाया था।

 दोनों बार अलग-अलग लेबोरेटरी से।

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गत बार की रपट मैंने अपने एक पड़ोसी डाक्टर (जो रिटायर सिविल सर्जन हैं) को दिखाई थी।उन्होंने कहा कि कोई गडब़ड़ी नहीं है।

इस बार की रिपोर्ट मैंने पोता की उम्र के एक रिश्तेदार डाक्टर को दिखवाई।

उसने संदेश भेेजा, ‘‘दादाजी की रिपोर्ट मेरी रिपोर्ट से भी 

अच्छी है।कोई चिन्ता नहीं।कोई दवा नहीं।’’

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अब पूछिएगा कि ऐसा कैसे होता है ?

सिर्फ पुरानी पीढ़ी के लोगों की कुछ बातें याद करें--

आहार-विहार ठीक रखो।

कम खाना, गम खाना।

अरली टू बेड एंड अरली टू राइज।

शाकाहारी बनो।

आदि आदि 

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सन 1966 से 1977 तक राजीतिक कार्यकर्ता के रूप में मैंनेे अपने शरीर के साथ बहुत ‘अत्याचार’ किया--समाजवाद लाने की भोली आशा में।

  न खाने का ठीक, न सोने का ठिकाना।

पाॅकिट मैं पैसे नहीं।चंदा दाताओं की भारी कमी। 

1977 से सामान्य जीवन शुरू हुआ।

शरीर का ‘रिपेयर’ शुरू किया।

और एकाग्र निष्ठा से पत्रकारिता प्रारंभ की।

न बायें देखा,न दायें ! 

सन 1983 के बाद बिछावन पर मेरे चले जाने का समय रहा 9 बजे रात।

पत्रकारिता में ऊंचे पद पर जाने पर रातजगा करना पड़ता है।

 रातजगा से बचने के लिए मैंने हमेशा बड़ा पद ठुकराया।

चूंकि मेरा काम ठीक ठाक था ,इसलिए इस क्षेत्र के सिरमौर रहे ब्राह्मणों (वे इसके हकदार भी हैं)ने मुझे सदा ‘और आगे’ 

(स्वजातीय के दावे को दरकिनार करके भी)

बढ़ाने की कोशिश की।

 (जनसत्ता का बिहार संवाददाता था तो संपादक प्रभाष जोशी ने डेस्क को कह रखा था कि 9 बजे रात के बाद सरेंद्र को फोन नहीं करना है,चाहे बिहार से जैसी भी बड़ी खबर आ रही हो !)

  कुछ लोग अपनी विफलता का ठीकरा जातपात पर फोड़ते हैं।होगा जातपात।

मैं इनकार नहीं करता।

  पर,मेरा अनुभव अलग रहा।

इसलिए मानसिक शांति भी रही।उसका सकारात्मक असर शरीर पर भी पड़ता है।

  देखिए, ईश्वर और कितने दिनों तक मेरा दाना-पानी इस धरती के लिए तय किया है !

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  20 सितंबर 24


 

  


मंगलवार, 17 सितंबर 2024

 केंद्रीय स्तर पर घुसपैठ अब

निरोधक मंत्रालय जरूरी

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भारत के खिलाफ जारी छद्म युद्ध की गंभीर 

समस्या पर केंद्र और कुछ राज्यों में मतभेद

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सुरेंद्र किशोर

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अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार गृह मंत्रालय से अलग ‘‘घुसपैठ निरोधक मंत्रालय’’ का गठन करे।

क्योंकि घुसपैठ को रोकने के प्रति कई राज्य सरकारें उदासीन हैं ।कई घुसपैठियों की मदद कर रही हंै।

 स्थानीय भ्रष्ट और वोट लोलुप तत्वों की मदद से इस देश में लगातार जारी घुसपैठ की इस भीषण समस्या को केंद्र सरकार खुद जल्द से जल्द अपने हाथों में ले ले।

राज्य सरकारों को इससे अलग रखेे।क्योंकि कई तथाकथित सेक्युलर राज्य सरकारें खुद घुसपैठ कराने में लगी हुई हैं,ऐसा आरोप है।इसके लिए देश के नियम-कानून-संविधान में संशोधन जरूरी हो तो वह भी किया जाये। 

कानून-व्यवस्था भले राज्यों का विषय है,किंतु घुसपैठ की समस्या सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या ही नहीं, बल्कि यह इस देश पर बाहरी तत्वों के परोक्ष हमले का मामला है। 

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आज झारखंड प्रदेश में जो कुछ हो रहा है,उसने इस समस्या को और भी नंगे रूप में सामने ला दिया है।

हाल में झारखंड हाईकोर्ट ने एक बड़ा आदेश दिया। कहा कि प्रदेश में घुसपैठियों की मौजूदगी की जांच के लिए तथ्यान्वेषण समिति का गठन हो।इस आदेश पर झारखंड सरकार ने दूसरा ही रुख अपना लिया है।

उससे पहले झारखंड के छह जिलों के उपायुक्तों ने हाईकोर्ट में यह रिपोर्ट दे दी कि उनके जिले में कोई घुसपैठ नहीं हुई है।उस रपट पर हाईकोर्ट ने उन्हें चेतावनी दी कि यदि उससे उलट रिपोर्ट आई तो उन छह अफसरों की खैर नहीं।

 झारखंड सरकार के मुख्य सचिव ने राज्य सरकार के गृह मंत्रालय को निदेश दिया है कि वह हाई कोर्ट को बताए कि इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय से पहले सलाह-मशविरा करना पड़ेगा।

झारखंड के एक बड़े इलाके में रोहिंग्या-बांग्लादेशियों की घुसपैठ के कारण गंभीर समस्या पैदा हो गयी है।आदिवासियों से जमीन छिन रही है।

हेमंत सरकार पर आरोप है कि वह जानबूझकर उस समस्या की अनदेखी कर रही है,वोट बैंक के लोभ में।

इसीलिए मामला झारखंड हाईकोर्ट पहंुचा।न्यायालय भी स्थिति की गंभीरता से चिंतित है।

झारखंड में घुसपैठ की गंभीरता से केंद्र सरकार पहले से अवगत है।

  इस समस्या के एक पक्ष से निपटने के लिए केंद्र सरकार  ने प्रवत्र्तन निदेशालय को झारखंड में सक्रिय कर दिया है।

यद रहे कि झारखंड हाईकोर्ट घुसपैठ की समस्या पर केंद्र और राज्य सरकार की ओर से आई परस्पर विरोधी रिपोर्ट से नाराज है।

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दरअसल इस समस्या पर केंद्र का सिर्फ झारखंड सरकार से ही मतभेद नहीं है ।बल्कि कई राज्य सरकारों से केंद्र का तनाव चल रहा है।

पश्चिम बंगाल सहित कई राज्य सरकारें जानबूझकर घुसपैठियों को अपने यहां आमंत्रित करती और बसाती रही हैं।आगे भी वे राज्य सरकारें कभी अपनी करतूतों से बाज नहीं आएंगी।

यह सब जारी रहा तो अगले दस साल में भारत की मौजूदा लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के अस्तित्व पर ही बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा।यह देश अफगानिस्तान,सीरिया और बांग्ला देश बन सकता है।

इसीलिए शीघ्र केंद्रीय हस्तक्षेप जरूरी है।

अन्यथा मणिशंकर अय्यर और सलमान खुर्शीद की यह भविष्यवाणी सच साबित हो सकती है कि भारत में भी ‘‘बांग्ला देश’’ दोहराया जा सकता है।

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17 सितंबर 24  


 पत्नी प्रशंसा दिवस (15 सितंबर 2024)

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लीक से हटकर किए गए उसके 

त्याग-सहयोग के लिए मैं अपनी 

पत्नी रीता का विशेष शुक्रगुजार हूं

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ साल पहले की बात है।

मेरी पत्नी को सरकारी मिड्ल स्कूल की प्रधानाध्यापिका के पद पर पोस्ंिटग लेटर मिला।

मैंने उससे कहा कि तुम इस पद को स्वीकार मत करो।

स्वाभाविक ही था--उसने सवाल किया--क्यों ?

मैंने कहा कि हेड मास्टर बनने के बाद मध्यान्ह भोजन योजना की जिम्मेदारी संभालनी पड़ेगी ।अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर वह घोटाले वाली जगह है।

यदि घोटाला नहीं करोगी तो ऊपर का अफसर तुम्हें झूठे आरोप में फंसा देगा।करोगी तो हमारे परिवार की भी बदनामी होगी।

उसने हेड मास्टर के रुप में ज्वाइन नहीं किया।सहायक शिक्षिका के रूप में ही सन 2015 में रिटायर कर गयी।

मेरी शादी(सन 1973) के समय और उसके चार साल बाद तक मेरी  आय इतनी नहीं थी कि हमारा परिवार सामान्य ढंग से भी चल सके।मैंने दहेज में तो कुछ नहीं लिया था,पर पत्नी अच्छा-खासा गहना लेकर आई थी।

  एक -एक कर वह खुशी-खुशी गहना बेचती गई और हमारा परिवार चलता रहा।

1977 में मैं पहली बार पी.एफ.वाली नौकरी (दैनिक ‘आज’ )में आया।

उसके बाद ही आर्थिक स्थिति काम-चलाऊ बनी।

पर,उस बीच एक बार एक अजूबी स्थिति पैदा हो गई।

मेरा भतीजा कामेश्वर गांव से आकर हमारे साथ रहने लगा।

पहले उसने बी.डी.इवनिंग काॅलेज में अपना नाम लिखवाया।

बाद में उसकी इच्छा हुई कि उसका नाम काॅमर्स कालेज में लिखवाया जाना चाहिए।(वहां हमारे रिश्तेदार प्रातःस्मरणीय डा.सीताराम दीन और डा.उषारानी सिंह पढ़ाते थे।)

  कामर्स काॅलेज में नाम लिखवाने के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे।

पत्नी के पास सिर्फ एक ही गहना बचा था--मंगल सूत्र।

उसने उसे भी बेच कर भतीजे का नाम लिखवा दिया।

(भतीजे को रखकर पढ़ाने -लिखाने से बाद में 

क्या सुख-शांति मिलती है,हमलोग उसकी कहानी कह सकते हैं।

संक्षप में--हमारे परिवार में पटीदारी का कोई झगड़ा-झंझट नहीं हुआ।

उसका बड़ा श्रेय कामेश्वर को है।

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मेरी पत्नी जेपी आंदोलन के सिलसिले में तीन बार जेल गई थी।

जब सन 2007 में नीतीश सरकार ने जेपी सेनानी सम्मान (पेंशन) योजना शुरू की तो मैंने पत्नी से कहा कि इसके लिए आवेदन पत्र मत दो।

क्योंकि हमलोग पेंशन और पद के लिए उस आंदोलन में शामिल नहीं हुए थे।

बिहार सरकार ने यह नियम तय किया  कि यदि कोई महिला उस आंदोलन में एक दिन के लिए भी जेल गई हो तो

उसे पेंशन की पूरी राशि मिलेगी।

 जिन जेपी सेनानियों ने आवेदन नहीं दिया था ,उन्हें राज्य सरकार ने बाद में पेंशन आॅफर की।

नीतीश कुमार,लालू प्रसाद,ललन सिंह सहित 57 लोगों को आॅफर किया गया जिसमें मेरी पत्नी रीता सिंह का नाम भी आया।उसके बाद पत्नी ने पूछा कि अब मैं क्या करूं ?

मैंने सोचा कि अब मना करूंगा तो उसे अच्छा नहीं लगेगा।

उसके बाद मैंने कहा कि स्वीकार कर लो।

स्वीकार कर लिया।

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कुल मिलाकर मैं कह सकता हूं कि आज मैंने जीवन में जो भी थोड़ी-बहुत उपलब्धियां हासिल की हंै,वह इसीलिए संभव हुआ क्योंकि रीता जैसी पत्नी मुझे मिली है।

आज भी वह चार बजे सुबह उठकर मेरे लिए चाय बनाती है और दिन भर मुझे और परिवार को सहयोग करने में लगी रहती है।

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परंपरागत विवेक से लैस मेरे बाबू जी को मैंने बचपन में यह कहते हुए सुना था कि पुत्र और पुत्री की शादी के लिए किन -किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।

वे कहते थे कि पुत्र की शादी ऐसे परिवार में करो जो पहले का संपन्न और संस्कारी हो और आज उसकी आर्थिक स्थिति ठीक न हो।

 मेरी पत्नी का परिवार वैसा ही था जब हमारी शादी हुई थी।

मुझे याद नहीं कि मेरी कभी पत्नी से झड़प भी हुई हो।

दरअसल मेरी बात वह मान लेती है और उसकी बात मैं मान लेता हूं।दोनों में से कोई अपनी बात मनवाने के लिए जिद नहीं करता, भले बात उसके अनुकूल न हों।

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15 सितंबर 24

  


रविवार, 15 सितंबर 2024

 कल तो एसएसपी को जाम के कारण पैदल 

चलना पड़ा।कल बारी  डी जी पी की आ सकती है 

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सुरेंद्र किशोर

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आज के अखबार की ताजा खबर

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पटना जिले के

दानापुर थाने का निरीक्षण करने गये एस.एस.पी. जाम में फंसे,पैदल पहुंचे।

थानाध्यक्ष को लगाई फटकार,

यातायात एस.पी.को दिये निदेश

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एक पिछली खबर

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कुछ ही साल हुए । 

पटना हाईकोर्ट के एक जज ने कोर्ट में हाजिर थानेदार से पूछा--

सड़कों पर अतिक्रमण करवा कर रोज कितना कमा लेते हो ?

यह खबर भी अखबारों में छपी थी।

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जानकार बताते हैं कि उपर्युक्त दोनों खबरों के बीच सीधा रिश्ता है।

क्या जज महोदय भी यह नहीं जानते हैं कि जाम के पीछे  कौन -कौन से तत्व हंै ?

 फिर वे सुओ मोटो यानी स्वतः संज्ञान लेकर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं करते ?

एस एस पी साहेब ने भी जाम के लिए थानेदार को ही फटकारा।

यानी, कारण मुख्यतः थानेदार है।

पर,क्या सिर्फ थानेदार ही जिम्मेदार है ?

दरअसल लगता है कि जनता,खास कर एम्बुलेंस सवार मरीजों के साथ रोज-रोज इतना बड़ा अनर्थ-अन्याय करते रहने की ताकत कहीं और से थानदारों को मिलती है।

अपार जन-पीड़ा प्रदान करके की भी सजा से बच जाने की ताकत सिर्फ थोनदार की अपनी नहीं हो सकती।इस पाप में हिस्सेदार बड़े -बड़े लोग भी हो सकते हैं। 

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यदि कर्तव्यनिष्ठ हैं तो पैदल चलने को मजबूर हुए एस.एस.पी.साहब को अब यह देखना है कि उनकी कोई अगली यात्रा भी पैदल यात्रा ही न बन जाये !

यह भी देखना है कि जाम पर रोक नहीं लगी तो अगले दिन डा.जी.पी.साहब को भी कहीं पैदल चलने को मजबूर होना पड़ सकता है।

 आम जनता का हाल जानिए।मैं जरूरी काम रहते हुए भी पटना मुख्य नगर में नहीं जाता क्योंकि मुझे आशंका रहती है कि कहीं मैं घंटों 

जाम में न फंस जाऊं !

यदि किसी व्यक्ति को लगातार दो-तीन घंटे जाम में फंस कर पेशाब रोकना पड़ जाये तो उसकी किडनी पर उसका खराब असर पड़ सकता है।मुझे अपनी किडनी बचाये रखनी है।

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इस बात पर शीर्ष सत्तासीनों को भी विचार करना चाहिए,कि पहले के कुछ पुलिस अफसर किस तरह अपनी ड्यूटी ठीक ढंग से कर पाते थे ?

 डी.एन.गौतम और किशोर कुणाल जैसे एस.पी. जब जिलों में हुआ करते थे तो सड़क जाम कौन कहे, अपराधी भी जिला छोड़ देते थे।

कभी पटना में कार्यरत दुबले -पतले बड़े ट्राफिक अफसर बनवारी सिंह की कार्य दक्षता याद आती है।जाम स्थल पर तुरंत पहुंच जाते थे।

आज ऐसा क्यों नहीं होता ?

क्या इस बीच एस.पी.या ट्राफिक एस पी की ताकत कम कर दी गयी है ?

बिल्कुल नहीं।

फिर सड़कों पर अराजकता के क्या कारण हैं ?

यह लाइलाज बीमारी क्यों बन चुकी है ?

क्या शीर्ष राजनीतिक कार्यपालिका के लोग अफसरों को 

जाम हटाने से रोकते हंै ?

या पैसे के लिए जाम लगवाने वालों को वैसा करते रहने के लिए बढ़ावा देते हैं ?

या, आज के एस.पी.गण, ‘‘गौतम-कुणाल कार्य कौशल’’ से 

अनभिज्ञ हैं ?

यदि अनभिज्ञ हैं तो वे दोनों

पटना में ही रहते हैं।जाकर पूछ लीजिए।

(मैं यहां यह क्यों कहूं कि थानेदारों को अपने वरीय अधिकारियों की ‘‘गैर प्रशासनिक जरूरतें’’ पूरी करनी 

पड़ती हंै ?उसके लिए जाम लगवा कर पैसे जुटाने पड़ते हैं ?) 

पर,एक बात जरूर कहूंगा।

अस्सी के दशक में भागवत झा आजाद जैसे दबंग मुख्य मंत्री ने कहा था कि बिहार में मेरा राज नहीं, बल्कि दारोगा राज है।

यानी सुधारने की कोशिश में वे विफल रहे थे।

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आए दिन प्रमंडलीय आयुक्त, पटना की सड़कों से अतिक्रमण हटाने के लिए सड़कों पर उतरते हैं।

पर,हर बार वे फेल होते हैं।

उनकी स्थिति हास्यास्पद हो जाती है और आम जनता की हालत पीड़ाजनक।

क्या हम सड़क जाम से पीड़ा झेलने के लिए ही पैदा हुए हैं।

कोई भी देख सकता है कि आम लोग जिस जगह जाम से कराह रहे होते हैं,उसके ठीक बगल में एक ट्राफिक पुलिसकर्मी  आराम से खैनी मल रहा होता है । दूसरा जाम लगाने के लिए उन लोगों से शुकराना वसूल रहा होता जिनके कारण जाम लगती है।

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15 सितंबर 24