गुरुवार, 16 जनवरी 2025

 ‘‘जिन्हें आप आज स्वर्गीय कहते हैं,सब कुछ जान 

जाने पर उनके नाम से पहले नारकीय शब्द आपको 

लगाना पड़ेगा’’

-- एक मशहूर स्वतंत्रता सेनानी ने कहा था

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सुरेंद्र किशोर

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गंगा शरण सिन्हा पचास-साठ के दशकों में राज्य सभा के सदस्य थे।

बिहार से थे।

मशहूर स्वतंत्रता सेनानी भी।

आजादी की लड़ाई के वरीयत्तम कांग्रेसी -सोशलिस्ट नेताओं के वे काफी करीबी रहे थे।सबको बाहर-भीतर से जानते थे।

‘‘द इंडियन एक्सप्रेस’’ के मालिक ,संविधान सभा और लोक सभा के पूर्वं सदस्य रामनाथ गोयनका के भी गंगा बाबू काफी करीबी थे।

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जब मैं ‘जनसत्ता’ में था तो गोयनका जी की एक चिट्ठी लेकर गंगा बाबू को देने के लिए मैं उनके पटना स्थित  आवास पर गया था।

गंगा बाबू से मेरी लंबी बातचीत हुई।बहुत ही रोचक व जानकारी भरी बातें बता रहे थे।उनके पास से हटने की इच्छा ही नहीं हो रही थी।

मैंने पाया कि देश के शीर्ष दिवंगत-जीवित नेताओं के बारे में 

 गंगा बाबू के पास जितने संस्मरण थे,वे शायद ही किसी अन्य के पास हो।

बाद में मैंने गंगा बाबू के एक परिचित बुजुर्ग गांधीवादी नेता से पूछा--गंगा बाबू अपना संस्मरण क्यों नहीं लिखते ?

उन्होंने बताया कि उनसे किसी ने कभी यह सवाल किया था।

गंगा बाबू का जवाब था-

‘‘यदि मैं सच-सच लिख दूं तो जिन नेताओं को आप स्वर्गीय कहते हैं,उन्हें कल से आप नारकीय कहने लगेंगे।’’

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इसके बावजूद मेरा खुद का विचार कुल मिलाकर स्वतंत्रता सेनानियां के पक्ष में ही रहा है।मैं न तो उन्हें स्वर्गीय कहूंगा और न ही नारकीय।

आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए घर से निकल जाना क्या कोई मामूली बात थी ?

आज तो बिना मलाईदार पद के ठोस आश्वासन के,अपवादों को छोड़कर  कोई भी व्यक्ति अपना आरामतलब जीवन त्याग़कर सक्रिय राजनीति मंे नहीं जाना चाहता।

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कहते हैं कि मनुष्य कमजोरियों का पुतला है।

पूरी दुनिया के मनुष्य।

पर, इन दिनों इस देश के खास तबके के कुछ बुद्धिजीवी -पत्रकार-नेतागण राष्ट्रपति पद के शपथ ग्रहण करने को प्रतीक्षारत डोनाल्ड टम्प की सरेआम फजीहत करने में लगे हैं।शुरुआत मणिशंकर अय्यर ने की थी।

ट्रम्प के खिलाफ हाल ही में एक अदालती फैसला आया है।

यह तो अमेरिका के मतदाता जानंे और वहां की अदालत जाने।

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काश ! डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ निन्दा अभियान चलाने वाले अपने पिछवाड़े में भी झांक लेते।

गंगा बाबू जिन्हें नारकीय कह रहे थे,उन तथाकथित नरकवासियों के इतिहास पर रिसर्च कर लेते।देश का भला होता।अगली पीढ़ी को शिक्षा मिलती।

मेरा खुद का मानना है कि जिस व्यक्ति में गुण अधिक और अवगुण कम हो,उसकी तारीफ होनी चाहिए।

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ट्रम्प प्रकरण को ध्यान में रखते हुए अस्सी के दशक के भारत पर एक बार फिर एक नजर डालिए।

ताजा राजनीतिक इतिहास तो 

यह पीढ़ी देख ही रही है।अपने -अपने चश्मे के अनुसार आकलन भी कर रही है।नतीजे भी निकाल रही है।

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पुनरावलोकन

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सन 1984 आते-आते इस देश की कैसी हालत 

कर दी थी हमारे हुक्मरानों ने !?

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दशकों से जमी काई को कुछ लोग आज साफ करना चाहते हैं।क्या वे सफल होंगे ?

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आजादी के बाद सन 1984 तक इस देश का क्या हाल हो चुका था ?

भारत सरकार की पत्रिका ‘‘योजना’’ के 15 अगस्त, 1984 के अंक में जो कुछ छपा था,उससे देश के तब तक के हालात का पता नई पीढ़ी के लोगों को भी चल जाएगा।

उससे 1985 के प्रधान मंत्री राजीव गांधी की एक टिप्पणी को जोड़कर देख लीजिए।राजीव गांधी ने कहा था कि हम 100 पैसे दिल्ली से भेजते हैं,पर उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही गांवों तक पहुंच पाते हैं।

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उस सरकारी पत्रिका ‘‘योजना’’के कवर पेज ही पर 

लिख दिया गया था-

‘‘ये गंदे लोग, यह गंदा खेल।’’

‘योजना’ के तब के प्रधान संपादक रघुनन्दन ठुकराल की हिम्मत व देश सेवा की भावना तो देखिए !

पता नहीं, वह अंक आने के बाद उनकी नौकरी रही या गई ?

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सन 1946 से 1984 तक इस देश मंे जितने भी प्रधान मंत्री हुए,सबको भारत रत्न सम्मान मिल चुका है।

ऐसे ‘‘भारत रत्नों’’ की यही उपलब्धि थी ? !

100 पैसा घिसकर एक दिन में तो 15 पैसा नहीं बन गया होगा।

1949 के जीप घोटाले से ही घिसना शुरू हो चुका था।

याद रहे कि भारत रत्न का सम्मान राजीव गांधी को भी मिल चुका है।याद रहे कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे राजीव गांधी के कारण कांग्रेस को लोक सभा में पूर्ण बहुमत मिलना जो बंद हो गया सो आज तक नहीं मिला।

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  जब अपवादों को छोड़ कर सरकारी व निजी क्षेत्रों में गंदे लोग ही फैले हुए हों तो वही होना था जैसा राजीव गांधी ने 1985 में कहा था।

 यानी 100 पैसों को तभी घिसकर 15 पैसे बना दिया गया था।

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उन गंदे लोगों की सूची ख्वाजा अहमद अब्बास ने ‘योजना’ के उसी अंक में पेश की थी।

अब्बास के अनुसार,

1.-अफसरशाह

2.-सत्तारूढ़ दल के राजनीतिज्ञ

3.-विपक्षी दलों के राजनीतिज्ञ

4.-योजनाकार (अधिकारी वर्ग)

5.-योजनाकार (स्वप्नद्रष्टा)

6.-बड़े पत्रकार

7-छोटे पत्रकार

8.-उपदेशक (धर्म संबंधी)

9.-उपदेशक (मंद बुद्धि वाले दर्शन शास्त्री और शिक्षा शास्त्ऱी)

10.-साधु संत (ढोंगी)

11.-व्यापारी तथा 

12-शिक्षा विद्

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यह सूची पेश करते हुए अब्बास ने लिखा कि 

‘‘किसी का नाम लेने की कोई जरूरत नहीं, पर वे सभी समूह

जो हमारे सामजिक जीवन को अपने कारनामों से दूषित करते हैं,उनका भंडाफोड़ करने से समाज के लोग इन गंदे लोगों और उनके खेल के बारे में जान जाएंगे।

आशा है कि इससे वे आत्म शुद्धि का मार्ग अपनाएंगे।

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 ‘‘योजना’’ के छपने के दशकों बाद के भारत पर नजर दौड़ाइएगा ।

 क्या अब्बास साहब की भोली आशा पूरी हो सकी ?

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हां, एक बात जरूर कही जा सकती है कि गंदगी साफ करने की कोशिश आज कुछ अधिक ही हो रही है।

 किंतु इस नेक कोशिश के अनुपात में समस्याएं बहुत विराट हो चुकी हैं।कोशिश करने वाले की जान पर खतरा जरूर है।  

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अब अगस्त 1984 की योजना पत्रिका में प्रकाशित कुछ लेखों के शीर्षक देख लीजिए।

केंद्रीय मंत्री रहे बसंत साठे के लेख का शीर्षक है-

‘‘हम तो केवल सत्ता भोगते हैं,शासन तो अफसर चलाते हैं।’’

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खुशवंत सिंह ने लिखा कि अनेक पत्रकार बंधु गैर कानूनी ढंग से पैसे कमाते हैं।

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मधु दंडवते लिखते हैं कि मूल्यों के अनवरत ह्रास ,बढ़ते हुए जातिवाद व भ्रष्टाचार के कारण राजनीति पतन के गर्त तक जा पहुंची है।

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अफसरशाही के बारे में बिहार सरकार मुख्य सचिव रहे पी.एस.अप्पू ने लिखा है कि ‘‘जब राजनीतिक व्यवस्था पतनोन्मुख हो

और समाज में विघटन हो जैसा कि भारत में आजकल हो रहा है,तो यह निस्संदेह कहा जा सकता है कि अफसरशाही को सुधारना संभव नहीं।’’

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 15 जनवरी 2025

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मंगलवार, 14 जनवरी 2025

 किसने नष्ट की गंगा की निर्मलता !

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आज प्रयाग के पास गंगा जल न तो 

नहाने लायक है और न ही पीने लायक

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सुरेंद्र किशोर

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गंगा तेरा पानी अमृत

झर- झर बहता जाए।

युग -युग से इस देश की 

धरती तुझसे जीवन पाए।।

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दशकों पूर्व एक फिल्म बनी थी जिसके गीत का यही मुखरा था।

सही भी था।

मुगल सम्राट अकबर भी रोज गंगा जल ही पीता था।

अंग्रेजों ने भी गंगा की अविरलता को जारी रहने दिया था जिससे गंगा जल की निर्मलता बनी रही।

दरअसल गंगा जल में जैसे दिव्य औषधीय गुण हंै,वैसा गुण 

दुनिया की किसी नदी में नहीं है।यह संयोग नहीं कि कुम्भ-महा कुम्भ का हजारों साल से आयोजन गंगा के ही किनारे होता रहा है।

तीर्थ प्रयाग गंगा,सरयुग और (विलुप्त पौराणिक) सरस्वती का संगम स्थल है।

यदि गंगा नदी किसी अन्य देश में होती तो वहां की सरकार 

इसकी दिव्यता -निर्मलता को बनाये रखने के लिए कुछ भी उठा नहीं रखती।

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पर, आजादी के बाद की एक अलग एजेंडा वाली कांग्रेसी सरकार ने सिंचाई के बहाने गंगा की अविरलता को भारी नुकसान पहुंचाया।

गंगा नदी पर कुल मिलाकर 940 बांध,बराज और वीयर बना दिये गये।अविरलता को बाधित कर दिया गया।

कहते हैं कि जब गंगा अविरल थी तो वह खुद को निर्मल भी करती जाती थी।

सिंचाई का प्रबंध तो किसी अन्य तरीके से भी किया जा सकता था।

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पर,कहते हैं कि एकतरफा सेक्युलर नेहरू सरकार ने गाय,गंगा और पीपल को लेकर जान बूझकर कुछ ऐसा कर दिया जिससे पीढ़ियों को नुकसान हो रहा है।

 देसी गाय के दूध में औषधीय गुण होता है।इसकी जगह कांग्रेस सरकार ने हाईब्रिड गाय का चलन शुरू किया।

सरकार ने खुद पीपल लगाने का काम बंद कर दिया।

जबकि यदि हर पांच सौ मीटर पर पीपल का वृक्ष हो तो पर्यावरण की समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी।क्योंकि पीपल से 24 घंटे आक्सीजन निकलता हैं।

दरअसल सनातनी लोग गाय को माता कहते हैं।गंगा को गंगा मइया कहते हैं।

यह भी मानते हैं कि पीपल में देवता का वास होता है।

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 आजादी के तत्काल बाद की हमारी सरकारों को यह मंजूर नहीं था क्योंकि उसमें वे हिन्दू पुनरुत्थान की संभावना देख रहे थे।

उन्हें तो किसी और का उत्थान करना था।

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14 जनवरी 25


गुरुवार, 9 जनवरी 2025

 सदिच्छा है कि इस बार भी बिहार में कार्यरत 

किसी बिहारी पत्रकार को मिले पद्म सम्मान !

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सुरेंद्र किशोर

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सदिच्छा है कि इस बार भी बिहार में कार्यरत किसी बिहारी पत्रकार को पद्म सम्मान मिले।

गत साल मुझे मिला था।

बिहार में कार्यरत किसी बिहारी पत्रकार को पहली बार गत साल मिला।

अधिक महत्वपूर्ण यह है कि बिना मांगे मिला।

 पिछली बार जब मुझे मिला तो संपादक रवीन्द्र नाथ तिवारी ने अपनी मासिक पत्रिका ‘‘भारत वार्ता’’ मेरे नाम समर्पित की थी।

 शायद उन्हें मालूम था कि मैंने उस सम्मान के लिए कभी किसी से आग्रह नहीं किया था।

सन 1954 में ही पद्म सम्मान का प्रावधान शुरू हुआ था।

पर,दशकों बाद यानी गत साल ही पहली बार बिहार में कार्यरत किसी बिहारी पत्रकार को यह सम्मान मिल सका। 

लगता है कि रवीन्द्र नाथ तिवारी मेरी पृष्ठभूमि 

के बारे में भी कुछ जान गये थे।

वह यह कि मैं एक ऐसे किसान परिवार से आता हूं जो अपने परिवार का पहला मैट्रिकुलेट था।

काॅलेज जाने से पहले नंगे पांव ही स्कूल जाता था।

जब सामान्य प्रतिभा और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले को 

बिन मांगे यह सम्मान मिल सकता है तो बेहतर प्रतिभा वाले पत्रकार बिहार में मौजूद हैं और पहले भी रहे हैं।

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याद रहे कि हर साल 25 जनवरी को पद्म सम्मानित लोगों के नामों की घोषणा हो जाती है।

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9 जनवरी 25


   ताकि आप बाद में यह न कहें कि

 पहले बताया-चेताया क्यों नहीं था ?!

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2020 में ही अंतरराष्ट्रीय  इस्लामिक प्रचारक डा.जाकिर नाइक ने कह दिया था कि भारत में हिन्दुओं की संख्या ,कुल आबादी का अब 60 प्रतिशत से भी कम रह गई है।

(यह बात आप भी गुगल पर पढ़ सकते हैं।)

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हाल में सम्बल से सपा सांसद जिया उर रहमान बर्क को टी.वी.पर मैंने यह कहते सुना कि ‘‘भारत में मुसलमानों की संख्या अब 40 प्रतिशत हो चुकी है।’’

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प्रतिबंधित जेहादी संगठन पी.एफ.आई.ने यह तय कर रखा है कि ‘‘हम हथियारों के बल पर सन 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देंगे।’’

हाल में टी.वी.की चर्चित हस्ती मौलाना रशीदी को मैंने टी.वी.पर ही यह कहते सुना कि 2047 से पहले ही वह काम हो जाएगा।

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अब आप समझ लीजिए कि आप यदि गैर मुस्लिम हैं तो आने वाले वर्षों में आपका और आपके बाल-बच्चों का क्या हाल होने वाला है !

  अन्य देशों और मध्यकालीन भारत का इतिहास आप जानते ही होंगे।नहीं जानते हैं तो एक बार पढ़ लीजिए।

या फिर बांग्ला देश की ताजा घटनाओं को टी.वी.चैनलों पर लाइव देख ही रहे होंगे।गौर से देखिए।

  लगे हाथ यह भी बता दूं कि इस देश का कोई भी तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दल या बुद्धिजीवी इन जेहादियों या इनके कारनामों के खिलाफ कुछ नहीं बोलता या लिखता।

बल्कि उनका बचाव ही करता है।क्योंकि उन्हें उनके एकमुश्त वोट मिलते हैं।

इस मामले में स्थिति मध्यकालीन भारत से भी आज बहुत खराब और चिंताजनक है।

(दरअसल यह बात हमें नहीं पढ़ाई गई है कि पृथ्वीराज चैहान की हत्या के बाद मुहम्मद गोरी के लोगों ने जयचंद को भी मार दिया था।) 

इस देश में सक्रिय जेहादी संगठन पी.एफ.आई से जुड़े राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई.से, जो चुनाव भी लड़ता है,कांग्रेस की मजबूत साठगांठ है।पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी पी.एफ.आई.की महिला शाखा के समारोह में शामिल होने के लिए 23 सितंबर, 2017 में कोझीकोड क्यों गए थे।

उन्हीं तत्वों के बल पर नायनाड से, जहां 48 प्रतिशत मुस्लिम हैं,राहुल गांधी लोस में गये थे। और प्रियंका गांधी वहीं से अब सांसद हैं।

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पी.एफ.आई.का ताजा बयान है कि जिस दिन भारत के 10 प्रतिशत भी मुसलमान हमारे साथ आ जाएंगे ,उस दिन हम भारत को हथियारों के बल पर इस्लामिक देश बना देंगे।

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यानी, 10 प्रतिशत मुस्लिम भी अभी उनके साथ हथियार उठाने को तैयार नहीं हैं।यह इस देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए  राहत की बात हंै।

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8 जनवरी 25 

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नई परिभाषा

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पुनश्चः

इस देश के जो राजनीतिक दल, व्यक्ति या बुद्धिजीवी इन जेहादियों के मंसूबे के खिलाफ बोलता या कुछ करता है,उसे इस देश में कुछ लोग नफरती तत्व और कम्युनल कहते हंैं।

  इससे उलट जो राजनीतिक दल या बुद्धिजीवी या व्यक्ति इन जेहादियों के पक्ष में बोलता है या उनके कारनामों को दबाता-छिपाता है,उन्हें कुछ सेक्युलर कहते हंै।

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मंगलवार, 7 जनवरी 2025

 छत्तीगढ़ के खबरखोजी पत्रकार मुकेश 

चंद्राकार की गत माह हुई निर्मम हत्या

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खबर खोजी पत्रकारों की सुरक्षा के लिए संस्थागत

 प्रबंध करे सरकार और मीडिया संस्थान

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सुरेंद्र किशोर

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छत्तीस गढ़ के खबर खोजी पत्रकार मुकेश चंद्राकर की अत्यंत निर्मम तरीके से गत माह हत्या कर दी गयी।

सरकार की सड़क योजना में घटिया निर्माण को लेकर रिपोर्टिंग करने के कारण उसकी हत्या कर दी गयी।

यानी वह पत्रकार एक तरह से सरकार यानी जनता का ही काम कर रहा था। 

हत्याकांड का षड्यंत्रकारी गिरफ्तार कर लिया गया है।यदि सिस्टम ने ठीक से काम किया तो उसे सजा भी हो जाएगी।

पर,बेचारे पत्रकार के परिवार को तो परिवार के मुखिया की गैर मौजूदगी की पीड़ा आजीवन भुगतनी पड़ेगी।

दरअसल खबरखोजी पत्रकारों की जान पर अक्सर खतरा बना रहता है।

कुछ की जान बच जाती है, पर कुछ अन्य की चली जाती है।

या, दूसरे प्रकार से भी ऐसे पत्रकारों को निहित स्वार्थी तत्वों की ओर से भारी नुकसान पहुंचाया जाता है।

बेचारा पत्रकार तो निहत्था होता है--घर पर भी और कार्य स्थल पर भी।

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मीडिया संस्थान यदि किसी पत्रकार को खतरे वाली खबर खोजने में लगाता है तो अब उसकी सुरक्षा का प्रबंध भी उसे करना ही चाहिए।

या तो सरकार बाॅडी गार्ड दे या फिर मीडिया संस्थान कोई इंतजाम करे।यदि सुरक्षा नहीं दे सकता हो तो ऐसे काम में पत्रकार को न लगाये। 

  आज सांसदों-विधायकों तथा अन्य बड़ी हस्तियों को सरकारें उदारतापूर्वक बाॅडी गार्ड क्यांे देती है ?

क्योंकि आज कानून-व्यवस्था को लेकर देश-प्रदेश में आदर्श स्थिति नहीं है।कई मामलों में अवकाश ग्रहण करने के बाद भी उन्हें बाॅडी गार्ड की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।

क्योंकि यह माना जाता है कि जनहित के काम के सिलसिले में उनकी जान पर खतरा कभी भी आ सकता है।सेवा काल में भी और रिटायर होने के बाद भी।

चैथा स्तम्भ भी तो जनहित का ही काम करता है।पत्रकार के  रिटायर होने के बाद उन्हें भी खतरा हो सकता है।

     करीब दो दशक पहले केंद्रीय खुफिया एजेंसी (एस.आई.बी.)के पटना आॅफिस ने अपने दिल्ली आॅफिस और बिहार के डी.जी.पी.को रिपोर्ट भेजी कि एक माफिया ने पटना के एक वरीय पत्रकार (जाहिर है कि रिपोर्ट में नाम भी लिखा था।)को मारने के लिए शूटर रवाना कर दिया है।

डी.जी.पी.,डी.पी.ओझा ने तत्काल उस पत्रकार को आधुनिक आग्नेयास्त्रों के साथ दो सुरक्षा गार्ड मुहैया करा दिये।

वह पत्रकार भाग्यशाली था जो समय पर सूचना मिल गयी थी।

पर, छत्तीस गढ़ का पत्रकार मुकेश चंद्राकर उतना भाग्यशाली नहीं था।

इसलिए ऐसे मामलों को देखते हुए देश -प्रदेश की सरकारें कोई न कोई संस्थागत प्रबंध करे।

ताकि कोई दूसरा मुकेश माफियाओं का शिकार न बने।

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7 जनवरी 25  


रविवार, 5 जनवरी 2025

 उप मुख्य मंत्री विजय कुमार सिन्हा

 के आश्वासन से खुशी हुई

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सुनिश्चित कीजिए कि अगुवानी-सुल्तानगंज 

जैसा हश्र शेरपुर-दिघवारा पुल का न हो !

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार के उप मुख्य मंत्री सह पथ निर्माण मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा है कि गंगा नदी पर निर्माणाधीन अगुवानी घाट-सुल्तान गंज पुल के ढहने के दोषियों को नहीं छोड़ेंगे।

  वह पुल अब तक तीन बार गिर चुका है।

 निर्माण एजेंसी है-एस.पी.सिंघला।

मंत्री जी के आश्वासन से उम्मीद तो बंधती है।

क्योंकि वे मजबूत आदमी हैं।

शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल को भी सिंगला निर्माण एजेंसी ही बना रही है।

अभी तो उसके पिलर का निर्माण हो रहा है।

खुशी है कि अब तक कोई पिलर नहीं ढहा।

पर, असली टेस्ट होगा--सुपर स्क्रचर के निर्माण के समय।

पूरी उम्मीद है कि मंत्री जी तब तक ‘‘अगुवानी’’ के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई कर चुके होंगे।

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मैं अभी जेपी गंगा सेतु से गांव जाता हूं।

शेरपुर- दिघवारा पुल के बन कर तैयार होने की बेचैनी से प्रतीक्षा है।

उम्मीद कर रहा हूं कि मेरे जीवन काल में वह पुल तैयार हो जाएगा !!

   निर्माणाधीन शेरपुर-दिघवारा पुल से गांव जाने में अपेक्षाकृत बहुत कम समय लगेगा।

यदि अगुवानी वालों के खिलाफ सबक सिखाने लायक कार्रवाई हो गयी, तब तो मैं शेरपुर-दिघवारा पुल से यात्रा करूंगा।

अन्यथा, मैं खतरा मोल क्यों लूंगा ?!

यह बात मैं इसलिए कहता हूं क्योंकि इस देश में भ्रष्टों पर कार्रवाई करने वाली शक्तियां जितनी मजबूत हैं,उनसे कई गुना अधिक मजबूत वे शक्तियों हैं जो जाति व पैसे के आधार पर उन्हें बचाती रहती हैं। 

गांव जाने में थोड़ा समय ही तो ज्यादा लगेगा-झेल रहा हूं-आगे भी झेल लूंगा।शेरपुर -दिघवारा पुल को दूर से ही प्रणाम कर लूंगा !!

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4 जनवरी 25


बुधवार, 1 जनवरी 2025

 राजनारायण की पुण्य तिथि पर

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(23 नवंबर 1917--31 दिसंबर 1986)

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समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में जैसा 

मैंने लोकबंधु राज नारायण को पाया !

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प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में पराजित करने वाले राजनारायण ने एक फिल्म में भी भूमिका निभाई थी।

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--सुरेंद्र किशोर--

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यह बात सत्तर के दशक की है।

लोहियावादी नेताओं में फूट पड़ 

गयी थी।

सन 1967 में डा.राम मनोहर लोहिया के असामयिक निधन के 

बाद लोहियावादी समाजवादी मुख्यतः राज नारायण और मधु लिमये के खेमों में बंट गये थे।

 जार्ज फर्नांडिस, मधु लिमये के साथ थे।

पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर समाजवादियों की एकता के पक्षधर थे।

उन्होंने एकतावादी-समतावादी नाम से एक संगठन भी बना लिया था।

 जब एकता का कर्पूरी जी का प्रयास सफल नहीं हुआ तो वह जयप्रकाश नारायण से मिले।

कर्पूरी जी ने जयप्रकाश जी से कहा कि आप पार्टी में एकता के लिए राज नारायण जी को व्यक्तिगत पत्र लिख दें।

जेपी राजी हो गये।

उन्होंने लिख दिया।

पत्र अंग्रेजी में था।

दूसरे दिन मैं वह पत्र लेने पटना के कदमकुआं स्थित जेपी के आवास पर गया था।

जेपी के निजी सचिव सच्चिदानंद ने चिट्ठी तैयार रखी थी।

चिट्ठी लिफाफे रखी थी।

पर, लिफाफा बंद नहीं था।

स्वाभाविक उत्सुकता के तहत मैंने उसे खोल कर पढ़ा।

उस पत्र की कुछ ही बातें मुझे याद हैं।

उस पत्र से राज नारायण यानी नेताजी के प्रति जेपी के स्नेह का पता चला।

फिर समाजवादी आंदोलन में राज नारायण के महत्व का भी पता चला।

साथ ही, जेपी ने उस पत्र में राजनारायण से यह उम्मीद की थी कि वे समाजवादियों की एकता बनाये रखने में अपनी भूमिका निभाएं।

 जेपी की चिट्ठी उनके आवास से लाने का यह मौका मुझे इसलिए मिला था क्योंकि मैं समाजवादी कार्यकत्र्ता के नाते  उन दिनों कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।

कर्पूरी ठाकुर उन दिनों बिहार विधान सभा मंे प्रतिपक्ष के नेता थे।उससे पहले कर्पूरी जी सन 1970 में बिहार के मुख्य मंत्री और 1967 में उप मुख्य मंत्री रह चुके थे।

 कर्पूरी जी 1952 से ही लगातार विधायक थे और समाजवादी आंदोलन में उनका बड़ा मान था।

पर, मुझे बाद में लगा कि जेपी की चिट्ठी भी समाजवादियों की खेमेबाजी पर कोई सकारात्मक असर नहीं डाल सकी।

उन्हीं दिनों ही बांका में हुए लोक सभा उप चुनाव में राज नारायण जी का मुकाबला मधु लिमये से हो गया।

दरअसल कर्पूरी ठाकुर ने ही लोक सभा के उस उप चुनाव में राज नारायण जी को उम्मीदवार बनवा दिया था।

संभवतः राजनारायण जी वहां की चुनावी संभावना के बारे मंे पहले से ही सशंकित थे।

 यह बात मैं व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर  कह रहा हूं।

मैं राज नारायण जी से पहले से परिचित था।

पर, शायद उन्हें इस बात की खबर नहीं थी कि मैं इस बीच कर्पूरी जी का निजी सचिव बन चुका था।

राज नारायण जी बांका जाने के लिए पटना रेलवे स्टेशन से गुजरने वाले थे।

वह वहां नामांकन दाखिल करने जा रहे थे।

कर्पूरी जी के साथ मैं भी नेता जी यानी राज नारायण जी से मिलने पटना जंक्शन गया था।

 मुझे देखा तो नेता जी मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे सबसे अलग ले गये।

  अपने कमजोर कंधे पर उनके भारी हाथ का दबाव मुझे आज भी याद है।

  उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मेरा बांका में उप चुनाव लड़ना सही रहेगा ?

मैं भला क्या कहता !

 कर्पूरी जी का मैं निजी सचिव था।

हालांकि एक राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप मैं यह महसूस कर रहा था कि सही नहीं रहेगा।

फिर भी मुझे कहना पड़ा कि आपका लड़ना ठीक रहेगा।

नेता जी लड़े और हारे।

मधु लिमये जीत गये।

समाजवादी आंदोलन के लोगों के बीच पहले ‘नेता जी’ राजनारायण ही थे।

मुलायम सिंह यादव तो बाद में नेता जी कहलाए।

   राज नारायण से मेरी थोड़ी लंबी मुलाकात एक बार छपरा में हुई थी जहां वह एक राजनीतिक कार्यक्रम के सिलसिले में आए थे।

उससे पहले सन 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के गया राष्ट्रीय सम्मेलन में मैं उनसे आॅटोग्राफ के लिए मिला था।

उन्होंने मेरे आॅटोग्राफ बुक पर एक अच्छा सा दोहा लिख दिया था।

मैंने तब कई अन्य राष्ट्रीय समाजवादी नेताओं के भी आॅटोग्राफ लिये थे।

वह आॅटोग्राफ बुक अब भी मेरे पास है।

छपरा वाली मुलाकात संभवतः 1969 में हुई।

 तब मैं वहां छात्र था और लोहियावादियों की पार्टी के छात्र संगठन क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ का जिला सचिव था।

उसके प्रदेश स्तर के नेता बिहार सरकार के पूर्व नरेंद्र सिंह थे।

 बिहार में युवजन सभा से हटकर छात्रों का भी एक संगठन था जिसका नाम था क्राांतिकारी विद्यार्थी संघ।

 छपरा में  नेता जी के सबसे करीबी थे वकील रवींद्र वर्मा।

  ठीक उसी तरह, जिस तरह पटना में नेता जी के सहयोगी थे भोला प्रसाद सिंह।

 वर्मा जी वकील थे और इलाहाबाद विश्व विद्यालय के छात्र रह चुके थे।

वहीं वे समाजवादियों के प्रभाव में आए थे।

  वर्मा जी अब नहीं रहे।

पर इस अवसर पर इतना जरूर कहूंगा कि समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने में अपने छोटे दायरे में ही सही, पर,वर्मा जी का जितना योगदान था,उस अनुपात में न तो उनकी पार्टी ने और न ही समाजवादी सरकारों ने उन्हें कुछ  दिया।

खैर, उसकी चिंता उन्हें नहीं थी।

तब देश के अन्य अधिकतर समाजवादी भी उसकी चिंता नहीं करते थे।

  खैर, वर्मा जी राज नारायण जी को लेकर टैक्सी से सारण जिले के एक सुदूर गांव की ओर जा रहे थे जहां कार्यक्रम था ।मैं भी साथ था।

 वर्मा जी ने राजनारायण जी से मेरा परिचय कराया, 

‘ये हैं सुरेंद्र अकेला।

अच्छे कार्यकत्र्ता हैं।’

 नेता जी ने अपने लहजे में सवाल किया, 

‘का हो अकेला ? 

अभी अकेले हउ अ ?

 शादी नइख कइले ?’ 

मैंने कहा कि जी नहीं।

इस पर नेता जी ने वर्मा जी से कहा कि 

‘रवींदर, फलां .......की छोटी बहन से इसकी शादी करा दूं ?

 वह मेडिकल में पढ़ती है।’ 

उन्होंने लखनऊ के अल्पसंख्यक समुदाय की एक समाजवादी महिला का नेता का नाम लिया था।

जानबूझ कर मैं उनका नाम नहीं लिख रहा हूं।

मैंने कहा कि ‘नेता जी , बहुत गैप है।कहां वह मेडिकल छात्रा और कहां मैं जो बी.एससी. की परीक्षा छोड़कर कार्यकत्र्ता बना हुआ हूं।’

 नेता जी ने कहा कि 

‘मैं सारा गैप पाट दूंगा।’

 पता नहीं, वह मजाक कर रहे थे या वह सिरियस थे।

पर, मुझे उनके चेहरे के भाव से लगा कि वे सिरियस थे।

पता नहीं वे चाहते हुए भी ऐसी शादी करा पाते या नहीं,पर उनका आत्म -विश्वास देखने लायक था।

साथ ही धर्म निरपेक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता भी। 

  तब सांप्रदायिक माहौल आज जैसा बिगड़ा हुआ भी नहीं था।

तब समाजवादी आंदोलन के नेता यह चाहते थे कि राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं की पत्नियां नौकरी वाली हों ताकि परिवार चलाने के लिए पैसे की तंगी नहीं हो।

 देश के कई समाजवादी नेताओं की पत्नियां ऐसी थीं भी।

 आज तो राजनीति में इतना पैसा है कि किसी को इसकी चिंता नहीं।

कुल मिलाकर मैं राज नारायण जी को एक निःस्वार्थ, निर्भीक  और जुझारू नेता के रूप मंे याद करता हूं।

 वह अपने साथियों और कार्यकत्र्ताआंे का बड़ा ध्यान रखते थे।

सन 1968 में समाजवादी आंदोलन के सिलसिले में दिल्ली के संसद भवन के पास  हुए प्रदर्शन में मैं भी था।

गिरफ्तारियां हो गयीं।

अनेक नेताओं और कार्यकत्र्ताओं के साथ मैं भी तिहाड़ जेल पहुंच गया।

उस समय जेल जाने वालों में मधु लिमये,राज नारायण ,जनेश्वर मिश्र, किशन पटनायक ,शिवानंद तिवारी ,राजनीति प्रसाद, राम नरेश शर्मा, देवेंद्र कुमार सिंह सहित अनेक छोटे- बड़े नेता-कार्यकत्र्ता  थे।

कुछ समय तक जेल में रहना पड़ा।

कड़ाके की जाड़ा थी।

वह भी दिल्ली की जाड़ा।

फिर भी कंबल ओढ़े ‘‘नेता जी’’ सुबह-सबेरे सभी बंदियों के पास जाते थे।

सबका हाल चाल पूछते थे।

किसे चाय मिली या नहीं, इसका बड़ा ध्यान रखते थे।

मैंने महसूस किया कि व्यक्तिगत रूप से कार्यकत्र्ताओं का ध्यान रखने में राजनारायण जी अन्य बड़े नेताओं से थोड़ा अलग थे।

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(यह विवरण मैं नई पीढ़ी के लोगों के लिए दोबारा यहां पोस्ट

कर रहा हूं।वे छोटे कार्यकर्ताओं से भी स्नेह रखते थे।)