‘‘जिन्हें आप आज स्वर्गीय कहते हैं,सब कुछ जान
जाने पर उनके नाम से पहले नारकीय शब्द आपको
लगाना पड़ेगा’’
-- एक मशहूर स्वतंत्रता सेनानी ने कहा था
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सुरेंद्र किशोर
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गंगा शरण सिन्हा पचास-साठ के दशकों में राज्य सभा के सदस्य थे।
बिहार से थे।
मशहूर स्वतंत्रता सेनानी भी।
आजादी की लड़ाई के वरीयत्तम कांग्रेसी -सोशलिस्ट नेताओं के वे काफी करीबी रहे थे।सबको बाहर-भीतर से जानते थे।
‘‘द इंडियन एक्सप्रेस’’ के मालिक ,संविधान सभा और लोक सभा के पूर्वं सदस्य रामनाथ गोयनका के भी गंगा बाबू काफी करीबी थे।
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जब मैं ‘जनसत्ता’ में था तो गोयनका जी की एक चिट्ठी लेकर गंगा बाबू को देने के लिए मैं उनके पटना स्थित आवास पर गया था।
गंगा बाबू से मेरी लंबी बातचीत हुई।बहुत ही रोचक व जानकारी भरी बातें बता रहे थे।उनके पास से हटने की इच्छा ही नहीं हो रही थी।
मैंने पाया कि देश के शीर्ष दिवंगत-जीवित नेताओं के बारे में
गंगा बाबू के पास जितने संस्मरण थे,वे शायद ही किसी अन्य के पास हो।
बाद में मैंने गंगा बाबू के एक परिचित बुजुर्ग गांधीवादी नेता से पूछा--गंगा बाबू अपना संस्मरण क्यों नहीं लिखते ?
उन्होंने बताया कि उनसे किसी ने कभी यह सवाल किया था।
गंगा बाबू का जवाब था-
‘‘यदि मैं सच-सच लिख दूं तो जिन नेताओं को आप स्वर्गीय कहते हैं,उन्हें कल से आप नारकीय कहने लगेंगे।’’
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इसके बावजूद मेरा खुद का विचार कुल मिलाकर स्वतंत्रता सेनानियां के पक्ष में ही रहा है।मैं न तो उन्हें स्वर्गीय कहूंगा और न ही नारकीय।
आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए घर से निकल जाना क्या कोई मामूली बात थी ?
आज तो बिना मलाईदार पद के ठोस आश्वासन के,अपवादों को छोड़कर कोई भी व्यक्ति अपना आरामतलब जीवन त्याग़कर सक्रिय राजनीति मंे नहीं जाना चाहता।
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कहते हैं कि मनुष्य कमजोरियों का पुतला है।
पूरी दुनिया के मनुष्य।
पर, इन दिनों इस देश के खास तबके के कुछ बुद्धिजीवी -पत्रकार-नेतागण राष्ट्रपति पद के शपथ ग्रहण करने को प्रतीक्षारत डोनाल्ड टम्प की सरेआम फजीहत करने में लगे हैं।शुरुआत मणिशंकर अय्यर ने की थी।
ट्रम्प के खिलाफ हाल ही में एक अदालती फैसला आया है।
यह तो अमेरिका के मतदाता जानंे और वहां की अदालत जाने।
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काश ! डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ निन्दा अभियान चलाने वाले अपने पिछवाड़े में भी झांक लेते।
गंगा बाबू जिन्हें नारकीय कह रहे थे,उन तथाकथित नरकवासियों के इतिहास पर रिसर्च कर लेते।देश का भला होता।अगली पीढ़ी को शिक्षा मिलती।
मेरा खुद का मानना है कि जिस व्यक्ति में गुण अधिक और अवगुण कम हो,उसकी तारीफ होनी चाहिए।
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ट्रम्प प्रकरण को ध्यान में रखते हुए अस्सी के दशक के भारत पर एक बार फिर एक नजर डालिए।
ताजा राजनीतिक इतिहास तो
यह पीढ़ी देख ही रही है।अपने -अपने चश्मे के अनुसार आकलन भी कर रही है।नतीजे भी निकाल रही है।
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पुनरावलोकन
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सन 1984 आते-आते इस देश की कैसी हालत
कर दी थी हमारे हुक्मरानों ने !?
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दशकों से जमी काई को कुछ लोग आज साफ करना चाहते हैं।क्या वे सफल होंगे ?
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आजादी के बाद सन 1984 तक इस देश का क्या हाल हो चुका था ?
भारत सरकार की पत्रिका ‘‘योजना’’ के 15 अगस्त, 1984 के अंक में जो कुछ छपा था,उससे देश के तब तक के हालात का पता नई पीढ़ी के लोगों को भी चल जाएगा।
उससे 1985 के प्रधान मंत्री राजीव गांधी की एक टिप्पणी को जोड़कर देख लीजिए।राजीव गांधी ने कहा था कि हम 100 पैसे दिल्ली से भेजते हैं,पर उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही गांवों तक पहुंच पाते हैं।
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उस सरकारी पत्रिका ‘‘योजना’’के कवर पेज ही पर
लिख दिया गया था-
‘‘ये गंदे लोग, यह गंदा खेल।’’
‘योजना’ के तब के प्रधान संपादक रघुनन्दन ठुकराल की हिम्मत व देश सेवा की भावना तो देखिए !
पता नहीं, वह अंक आने के बाद उनकी नौकरी रही या गई ?
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सन 1946 से 1984 तक इस देश मंे जितने भी प्रधान मंत्री हुए,सबको भारत रत्न सम्मान मिल चुका है।
ऐसे ‘‘भारत रत्नों’’ की यही उपलब्धि थी ? !
100 पैसा घिसकर एक दिन में तो 15 पैसा नहीं बन गया होगा।
1949 के जीप घोटाले से ही घिसना शुरू हो चुका था।
याद रहे कि भारत रत्न का सम्मान राजीव गांधी को भी मिल चुका है।याद रहे कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे राजीव गांधी के कारण कांग्रेस को लोक सभा में पूर्ण बहुमत मिलना जो बंद हो गया सो आज तक नहीं मिला।
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जब अपवादों को छोड़ कर सरकारी व निजी क्षेत्रों में गंदे लोग ही फैले हुए हों तो वही होना था जैसा राजीव गांधी ने 1985 में कहा था।
यानी 100 पैसों को तभी घिसकर 15 पैसे बना दिया गया था।
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उन गंदे लोगों की सूची ख्वाजा अहमद अब्बास ने ‘योजना’ के उसी अंक में पेश की थी।
अब्बास के अनुसार,
1.-अफसरशाह
2.-सत्तारूढ़ दल के राजनीतिज्ञ
3.-विपक्षी दलों के राजनीतिज्ञ
4.-योजनाकार (अधिकारी वर्ग)
5.-योजनाकार (स्वप्नद्रष्टा)
6.-बड़े पत्रकार
7-छोटे पत्रकार
8.-उपदेशक (धर्म संबंधी)
9.-उपदेशक (मंद बुद्धि वाले दर्शन शास्त्री और शिक्षा शास्त्ऱी)
10.-साधु संत (ढोंगी)
11.-व्यापारी तथा
12-शिक्षा विद्
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यह सूची पेश करते हुए अब्बास ने लिखा कि
‘‘किसी का नाम लेने की कोई जरूरत नहीं, पर वे सभी समूह
जो हमारे सामजिक जीवन को अपने कारनामों से दूषित करते हैं,उनका भंडाफोड़ करने से समाज के लोग इन गंदे लोगों और उनके खेल के बारे में जान जाएंगे।
आशा है कि इससे वे आत्म शुद्धि का मार्ग अपनाएंगे।
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‘‘योजना’’ के छपने के दशकों बाद के भारत पर नजर दौड़ाइएगा ।
क्या अब्बास साहब की भोली आशा पूरी हो सकी ?
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हां, एक बात जरूर कही जा सकती है कि गंदगी साफ करने की कोशिश आज कुछ अधिक ही हो रही है।
किंतु इस नेक कोशिश के अनुपात में समस्याएं बहुत विराट हो चुकी हैं।कोशिश करने वाले की जान पर खतरा जरूर है।
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अब अगस्त 1984 की योजना पत्रिका में प्रकाशित कुछ लेखों के शीर्षक देख लीजिए।
केंद्रीय मंत्री रहे बसंत साठे के लेख का शीर्षक है-
‘‘हम तो केवल सत्ता भोगते हैं,शासन तो अफसर चलाते हैं।’’
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खुशवंत सिंह ने लिखा कि अनेक पत्रकार बंधु गैर कानूनी ढंग से पैसे कमाते हैं।
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मधु दंडवते लिखते हैं कि मूल्यों के अनवरत ह्रास ,बढ़ते हुए जातिवाद व भ्रष्टाचार के कारण राजनीति पतन के गर्त तक जा पहुंची है।
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अफसरशाही के बारे में बिहार सरकार मुख्य सचिव रहे पी.एस.अप्पू ने लिखा है कि ‘‘जब राजनीतिक व्यवस्था पतनोन्मुख हो
और समाज में विघटन हो जैसा कि भारत में आजकल हो रहा है,तो यह निस्संदेह कहा जा सकता है कि अफसरशाही को सुधारना संभव नहीं।’’
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15 जनवरी 2025
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