आधुनिक लोकतंत्र के सुप्रीमो को चाहिए कि वे दो तरह के सलाहकार अपने आसपास रखें।
1.-‘बरुआ’ टाइप का।
2.-बिदुर टाइप का।
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पहला आपके काम के टंेशन को दूर करता रहेगा।
दूसरा आपको मृगतृष्णा में पड़कर कहीं भटकने नहीं देगा।
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आधुनिक लोकतंत्र के सुप्रीमो को चाहिए कि वे दो तरह के सलाहकार अपने आसपास रखें।
1.-‘बरुआ’ टाइप का।
2.-बिदुर टाइप का।
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पहला आपके काम के टंेशन को दूर करता रहेगा।
दूसरा आपको मृगतृष्णा में पड़कर कहीं भटकने नहीं देगा।
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विदेशी हस्तक्षेप की राह रोकना जरूरी
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सुरेंद्र किशोर
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अपने देश में अधिकतर राजनीतिक दलों को विदेशी पैसों में तभी बुराई दिखती है,जब वह विरोधी दल को मिल रहा हो
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते दिनों यह कह कर चैंका दिया कि उनके पूर्ववर्ती जो बाइडन भारतीय चुनावों के दौरान देश में सत्ता परिवर्तन की जुगत में लगे थे।
ट्रंप के बयान से भारत के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा और इससे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के उन आरोपों को ही बल मिला ,जिसमें संसदीय चुनाव के बाद उन्होंने अलग -अलग मौकों पर चुनावों में विदेशी हस्तक्षेप की बात कही थी।
फिलहाल इस पर बहस जारी है कि मतदान बढ़ाने के लिए अमेरिकी सहायता भारत आई या बांग्ला देश और यदि वह भारत आई तो खर्च कैसे हुई ?
जो भी हो,टं्रप के बयान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।
इससे पहले उनके करीबी और जाने माने उद्यमी एलन मस्क ने भी अमेरिकी संसाधनों के प्रयोग को लेकर सवाल उठाए थे।
इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सलमान खुर्शीद और मणि शंकर अय्यर जैसे नेताओं का बांग्ला देश में हुए तख्ता पलट के बाद यह कहना था कि इस पड़ोसी देश में जो कुछ हुआ,उसकी भारत में भी पुनरावृति हो सकती है।
यह भी किसी से छिपा नहीं कि जार्ज सोरोस और उनकी संस्थाओं की संदिग्ध भूमिकाओं की चर्चा यदाकदा सतह पर उभरती रहती है।यह पूरा परिदृश्य गहन पडत़ाल की मांग करता है।
भारत जैसे संप्रभु देश में विदेशी हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं,लेकिन ऐसे आरोप पहली बार नहीं लगे हैं।
पूर्व में कांग्रेस सरकारों की या तो विदेशी शक्तियों के साथ साठगांठ रही या फिर उन्होंने ऐसे आरोपों को अनदेखा करना उचित समझा।
यह 1967 की बात है जब केंद्रीय गृह मंत्री वाई.बी.चव्हाण ने उन राजनीतिक दलों के नाम बताने से इन्कार कर दिया था,जिन्हें विदेश से पैसे मिले थे।
नतीजा यह हुआ कि बाहर-भीतर राष्ट्र विरोधी शक्तियों का मनोबल बढ़ता गया।
चूंकि सरकार ही ऐसे मामलों को लेकर उदासीन रही,इसलिए अवैध धन के इस्तेमाल को लेकर नेताओं और दलों की झिझक समाप्त होती चली गयी।याद रहे कि 1967 के आम चुनाव में सात राज्यों में कांग्रेस हार गई थी।
अन्य दो राज्यों में कुछ ही समय बाद कांग्रेस सरकारें दल बदल के कारण अपदस्थ हो गईं।
लोक सभा में कांग्रेस का बहुमत घट गया।
इन घटनाओं से तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की चिंता बढ़ गई थी।
उन्हें लगा कि विपक्षी दलों ने विदेश से मिले अवैध धन की मदद से कांग्रेस को हरा दिया।
परिणामस्वरूप केंद्रीय खुफिया एजेंसी से मामले की जांच कराई गई।
जांच से पता चला कि कांग्रेस सहित कई दलों और नेताओं को 1967 चुनाव लड़ने के लिए विदेश से पैसे मिले थे।
सरकार ने उस रपट को दबा दिया,लेकिन वह रपट एक अमेरिकी अखबार में छप गई।
यदि उसी समय उक्त मामले की नीर-क्षीर ढंग से जांच कराई जाती तो राजनीति को स्वच्छ बनाने में बड़ी सहायता मिलती।मगर जांच होती कैसे ?
लगभग हर दल के नेता इस दल -दल में धंसे हुए थे।
शीत युद्ध के समय जहां कम्युनिस्ट देश भारत में साम्यवाद फैलाने के लिए पैसे खर्च कर रहे थे ,वहीं पूंजीवादी देश साम्यवाद को रोकने के लिए।
जिस किसी देश में नेता से लेकर बुद्धिजीवी तक बिकने को तैयार हों, वहां विदेशी शक्तियों के लिए अपने संकीर्ण हितों को साधना कहीं आसान हो जाता है।
अपने देश में अधिकतर दलों को विदेशी पैसों में तभी बुराई दिखती है,जब वह विरोधी दल को मिल रहा हो।
यह रवैया उचित नहीं।
कुछ समय पहले भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से वित्तीय मदद मिली।
उस पर कांग्रेस ठोस तरीके से अपना पक्ष नहीं रख सकी।
इस संदर्भ में सोवियत खुफिया एजेंसी के.जी.बी. के बारे में आपातकाल के दौरान प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की राय पर गौर किया जाए।
आपातकाल लगाने के अगले दिन इंदिरा गांधी ने केंद्र सरकार के सचिवों के साथ बैठक की।
प्रधान मंत्री के संयुक्त सचिव बिशन टंडन के अनुसार,इंदिरा गांधी ने सचिवों से कहा ‘‘प्रतिपक्ष नाजीवाद फैला रहा है।
नाजीवाद केवल सेना एवं पुलिस के उपयोग से ही नहीं आता।
कोई छोटा समूह जब प्रचार करके जनता को गुमराह करे तो वह भी नाजीवाद का लक्षण है।
भारत में दूसरे दलों की सरकारें भले बन जाएं ,पर मैं माक्र्सवादी कम्युनिस्टों और जनसंघ की सरकार नहीं बनने दूंगी।
जेपी आंन्दोलन के लिए रुपया बाहर से आ रहा है।अमरीकी खुफिया एजेंसी सी आई ए यहां बहुत सक्रिय है।
के.जी.बी.का कुछ पता नहीं।
उसकी सक्रियता का कोई प्रमाण सामने नहीं आया।
प्रतिपक्ष का सारा अभियान मेरे विरुद्ध है।मेरे अतिरिक्त मुझे ऐसा कोई व्यक्ति नजर नहीं आता जो इस समय देश के सामने आई चुनौतियों का सामना कर सके।’’
इंदिरा गांधी की यह बात कितनी निराधार थी,इसका भंडा -फोड़ के.जी.बी.से जुड़े मित्रोखिन ने किया।
क्रिस्टोफर एंड्रूज के साथ मिलकर वासिली मित्रोखिन ने दो किताबें लिखीं।
मित्रोखिन के अनुसार,‘‘के.जी.बी.ने कई भारतीय समाचार पत्रों ,बुिद्धजीवियों और नेताओं पर अरबो-खरबांें रुपए खर्च किये।
मित्रोखिन के रहस्योद्घाटन का तब कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने खंडन किया।
ज्योति बसु ने कहा कि ‘‘मुझे यह तो नहीं मालूम कि के.जी.बी.ने इंदिरा गांधी को धन दिया या नहीं,परंतु एक बात मैं अच्छी तरह जानता हूं कि वामपंथियों की गतिविधियों को रोकने के लिए अमेरिका ने व्यक्तिगत रूप से इंदिरा गांधी को भी धन दिया था और कांग्रेस को भी।’’
क्या बसु की इस बात पर विश्वास करना संभव है कि कम्युनिस्ट देशों ने भारत में अघोषित ढंग से कोई खर्च नहीं किया ?
भारत में अमेरिका के राजदूत रहे डेनियल मोयनिहान ने अपनी पुस्तक ‘ए डेंजरस प्लेस’ में लिखा कि किस तरह कम्युनिस्ट फैलाव को रोकने के लिए अमेरिका ने भारतीय नेताओं को पैसे दिए।लगता है कि अब स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि इससे निपटना देश के लिए मुश्किल हो चला है।
लेकिन प्रधान मंत्री मोदी के चलते इसके समाधान की भी उम्मीद है।
बांग्ला देश में तख्ता पलट ,खुर्शीद एवं अय्यर की बयानबाजी और अब टं्रप एवं मस्क के बयानों के बाद देखना होगा कि मोदी भारत और भारतीयों को कितना आश्वस्त करते हैं कि यहां दखल संभव नहीं।
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(आज के दैनिक जागरण और नईदुनिया में एक साथ प्रकाशित)
लोक सभा चुनाव-2024
बिहार के सिर्फ एक बूथ की कहानी
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सुरेंद्र किशोर
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विश्वसनीय सूत्र ने मुझे 2024 के लोक सभा चुनाव के सिलसिले में हुए मतदान की एक कहानी बताई थी।तभी बता दी थी।
एक खास वी.आई.पी.चुनाव क्षेत्र के एक खास बूथ पर पोलिंग एजेंट को मतदान के दिन के खर्चे के लिए 10 हजार रुपए उम्मीदवार की ओर से मिले थे।
उससे पहले की रात में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के एक गांव में उसी उमीदवार की ओर से पैसे बांटे गये।
प्रति मतदाता-- 500 रुपए।
यानी, जिस घर में पांच मतदाता थे, उसे 2500 रुपए मिले।
उस परिवार के लिए 25 सौ रुपए का बहुत महत्व था।
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उस क्षेत्र के सिर्फ एक बूथ की पक्की खबर मुझे मिली।
अन्य बूथों के बारे में मैं सिर्फ अनुमान लगा सकता हूं--कोई पक्की जानकारी नहीं।
पर सवाल है कि क्या कोई उम्मीदवार सिर्फ एक ही बूथ पर इतना पैसा खर्च करेगा ?
जरूर अन्य बूथों पर खर्च किया होगा।
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इतने पैसे उसे कहां से मिले ?
इसी देश से या विदेश से ?
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21 फरवरी 25
आर.के.सिंह जैसे नेता को लोक सभा के
बदले राज्य सभा में भेजना चाहिए था
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सुरेंद्र किशोर
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आज की चालू राजनीति में
एक ईमानदार हस्ती की पीड़ा
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बात तब की है जब आर.के. सिंह पटना के डी.एम. थे।
डी.एम. ही प्राथमिक शिक्षा की जिला स्थापना समिति के प्रधान हुआ करते थे।
हम लोग पटना के लोहिया नगर में रहते थे।मेरी पत्नी पटना में ही, पर आवास से दूर स्थित एक सरकारी मिडिल स्कूल में पढ़ाने जाती थी।
अल्प वेतन का आधा पैसा रिक्शा भाड़े मेें चला जाता था।
लोहिया नगर के एक ‘बाबू साहब’ कभी- कभी मेरे घर आया करते थे।
एक दिन जब उन्हें चाय नहीं मिली तो पता चला कि मेरी पत्नी तो स्कूल जा चुकी हैं।
उन्होंने पूछा,‘इतनी जल्दी ?
अभी तो नौ ही बजे हैं ?’
मैंने कहा कि ‘दूर जाना होता है।इसलिए जल्दी चली गयी।’
उन्होंने कहा कि आर.के. मेरे परिचित हैं,उनसे मैं बात करूंगा।मैंने उन्हें मना नहीं किया।
एक दिन वे डी.एम.साहब से मिले।
उनसे कहा कि ‘‘सुरेंद्र किशोर को जानते हैं न !
जनसत्ता का रिपोर्टर है।
अपना ही जात-भाई है।
उसकी पत्नी कष्ट में है।
उसे नजदीक के किसी स्कूल में ट्रांसफर कर दीजिए।उसके घर के नजदीक भी कई स्कूल हैं।’’
इस पर आर.के. ने अनिच्छा दिखाते हुए कहा कि
‘‘पटना से पटना में बदली होती है ?
यह संभव नहीं है।’’
वे ऐसे कड़ियल अफसर थे कि कोई उनसे बहस नहीं कर सकता था।
बेचारे उदास ‘बाबू साहब’ दूसरे दिन मेरे पास आए।
कहा कि ‘‘गजब आदमी है आर.के. !
ऐसे -ऐसे कह दिया।’’
इधर मैं तो मन ही मन खुश हुआ।
एक ऐसा अफसर तो बिहार में है जो न जात के प्रभाव में आया और न ही जनसत्ता जैसे ‘‘उखारू-पछारू’’ अखबार से सहमा।
जरूर वह राज्य का भला करेगा,मैंने मन ही मन सोचा।
याद रहे कि उन दिनों जनसत्ता की 18 हजार प्रतियां पटना आती थीं।
कई विवादास्पद हस्तियों को यह आशंका रहती थी कि पता नहीं कल के जनसत्ता में किसके बारे में क्या छपा होगा !
बड़े बड़े सत्ताधारी लोग मुझे उपकृत करने के लिए उत्सुक रहते थे।
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जहां तक मुझे मालूम है, आर.के.कभी विवादास्पद रहे नहीं।
उन्हें किसी अखबार से भला क्यों डरना !
मैं कभी आर.के.सिंह से मिला नहीं।आज तक भी नहीं।
न ही अब कोई वैसा अवसर आने की उम्मीद है।क्योंकि मैंने कहीं आना-जाना काफी कम कर दिया है।
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केंद्रीय मंत्री रहे आर.के.सिंह ने तब कहा था कि ‘‘स्कूलों में मास्टर नहीं आते हैं और डी.एस.ई.आंखें मूंदे रहते हैं।
यह व्यवस्था सिर्फ बिहार में है।
सरकार को इस संबंध में विचार करना चाहिए।
बिहार में स्वास्थ्य विभाग का भी बुरा हाल है।प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डाक्टर नहीं जाते।वे आरा और पटना में बैठकर प्रैक्टिस करते हैं।भागे रहने के एवज में सारे डाक्टर, सिविल सर्जन को कमाई का एक हिस्सा दे देते हैं।
आगे सिविल सर्जन क्या करते हैं, सबों को पता है।’
एम.पी.फंड की ठेकेदारी को लेकर क्या-क्या होता है,उससे भी दस साल में आर.के.परिचित हो चुके होंगे।
बिहार काॅडर के आई.ए.एस. रहे आर.के. सिंह ने वही कहा है जिसकी जानकारी सरकार को ‘छोड़कर’ पूरे बिहार को है।
आर.के.सिंह उन थोड़े से जन प्रतिनिधियों में शामिल हैं जो सांसद फंड से कमीशन नहीं लेते।
जो जन प्रतिनिधि लेते हैं,वे अफसरों के सामने लज्जित रहते हैं।वे भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ इस तरह आवाज नहीं उठाते।
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स्कूल शिक्षक,डाक्टर और एम.पी.फंड के बारे में जिस नेता की ऐसी राय हो,वह दो बार लोक सभा चुनाव जीत गया,वही आठवां आश्चर्य हुआ।
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भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को आर.के. को लेकर पहले ही सावधानी बरतनी चाहिए थी।
उन्हें लोक सभा लड़वाने के बदले राज्य सभा मंे भेजना चाहिए था।
एम.पी.और केंद्रीय मंत्री के रूप में आर.के.सार्वजनिक काम मंे ही लगे रहते थे।
व्यक्तिगत काम से साफ मना कर देते थे।
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आर.के.केे बारे में यह कहा जा सकता है कि वे जिस पद पर बैठे या बैठेंगे,उस पद को ऊपरी कमाई का औजार नहीं बनने देंगे।
ऐसे नेताओं की मोदी राज में,यानी आज भी काफी कमी है।
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21 फरवरी 25
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अमेरिका से प्रत्यार्पित होकर भारत पहुंचे दो
युवकों को पटियाला पुलिस ने हत्या के आरोप में
15 फरवरी की रात को गिरफ्तार कर लिया
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इस देश के जो नेता और राजनीतिक दल आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस को भारी हथकड़ी लगा कर जकड़ दिये जाने की चर्चा तक नहीं करते ,वे भारी हथकड़ी-बेड़ी के साथ अमेरिका से लौट रहे ‘‘घुसपैठियांे’’ं को लेकर काफी चिंतित और दुखी नजर आ रहेे हैं।
याद रहे कि प्रत्यार्पितों में से कई लोगों के खिलाफ भारत में पहले से ही गंभीर आरोपों में मुकदमे चले रहे हैं।
(आपातकाल में केस की सुनवाई के सिलसिले में जब भी जार्ज को दिल्ली कोर्ट में हाजिर किया जाता था,उनको हथकडी में जकड़कर ही --जैसा कि इस पोस्ट के साथ संलग्न फोटोे से स्पष्ट है।
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कहते हैं कि कुछ खास नेताओं -दलों की असल चिंता भारत में आकर उनका वोट बैंक बने बांग्लादेशी -रोहिंग्या घुसपठियों के भविष्य को लेकर है जिन्हें राजग सरकार ने निकाल बाहर करना शुरू कर दिया है।
भारत में रह रहे वैसे करोड़ों घुसपैठियों को धीरे -धीरे बाहर
करने की गंभीर कोशिश होने वाली है।
फिर उनके वोट बैंक का क्या होगा ?!
उन घुसपैठियों के कारण देश के कई हिस्सों में वोट का समीकरण बदल गया है।
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20 फरवरी 25
कर्पूरी ठाकुर की पुण्य तिथि पर
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घोर अभाव के बावजूद गलत पैसों को अपने
पास नहीं फटकने देते थे कर्पूरी ठाकुर
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सुरेंद्र किशोर
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सन 1972-73 की बात है।
समाजवादी कार्यकर्ता की हैसियत से मैं कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।
कर्पूरी जी बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे।
बिहार विधान मंडल भवन में आॅफिस के लिए उन्हें एक बड़ा कमरा मिला हुआ था।
कर्पूरी जी ने एक दिन मुझे एक बिल देकर कहा कि लेखा शाखा(विधान सभा सचिवालय ) में जाकर दे दीजिए।
मैं वहां गया।
वहां के प्रशाखा पदाधिकारी साहब को मैंने बिल थमाते हुए कहा कि यह कर्पूरी जी का है।
वह बिल करीब छह सौ रुपए का था।
प्रशाखा पदाधिकारी ने पहले बिल की राशि देखी।
उसके बाद मुझे ऊपर से नीचे तक तीखी नजरों से निहारा ।
फिर असामान्य स्वर में कहा,
‘‘कैसे -कैसे लोग कुर्ता-पायजामा पहन कर बड़े- बड़े नेताओं के करीबी हो जाते हैं।
नेता की जरूरतों का उन्हें पता ही नहीं होता है।
आप 6 सौ रुपए का बिल दे रहे हैं।
कर्पूरी जी इतने बड़े नेता हैं।उनका इतने कम पैसे में काम चलेगा ?
जाइए,इसे 13 सौ का बना कर ले आइए।’’
मुझे तो बिल वगैरह का कोई ज्ञान था नहीं।
मैंने लौटकर उस बाबू की उक्ति कर्पूरी जी के सामने दोहरा दी।
कर्पूरी जी ने गुस्से में दांत पीसते हुए कहा--‘‘ये बेईमान लोग हैं।
लुटेरे हैं।
राज्य को लूट लेंगे।
दीजिए मुझे बिल नहीं पास करवाना।’’
यह कह कर उस बिल को उन्होंने अपने टेबल की दराज में रख लिया।
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अब आप कर्पूरी जी की व्यक्तिगत आर्थिक परेशानी से संबंधित एक संस्मरण पढ़िए।
उन दिनों नेता,प्रतिपक्ष को कोई खास सुविधा हासिल नहीं थी।सिर्फ एक स्टेनो टाइपिस्ट मिलता था।
(वह सब सुविधाएं 1977 में शुरू र्हुइं--यानी, कैबिनेट मंत्री के बराबर सुविधाएं)
एक दिन कर्पूरी जी की धर्म पत्नी ने मुझसे कहा कि ठाकुर जी महीने में 15-20 दिन पटना से बाहर ही रहते हैं।यहां चैके में राशन है या नहीं, इसका ध्यान नहीं रखते।
उनसे कहिए कि पूरे महीने का राशन एक बार खरीद कर रखवा दें।
मैंने उनसे यह बात कही।कर्पूरी जी ने कहा कि उन लोगों से (उनके परिवार के सदस्यों से)कहिए कि वे पितौंजिया(यानी पुश्तैनी गांव) जाकर रहें।
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दरअसल कर्पूरी जी को विधायक के रूप में तब मात्र 300 रुपए वेतन मिलता था।कमेटी की बैठक होने पर 15 रुपए दैनिक भत्ता।
यानी कुल 60 रुपए।
अब आप बताइए कि कोई भी ईमानदार व्यक्ति 360 रुपए में पटना में परिवार का खर्च कैसे उठा सकता था !
यानी, इतने अभाव के बावजूद कर्पूरी जी ने जाली बिल बनवाना मंजूर नहीं किया था।
यह तो छोटा सा नमूना मैंने यहां पेश किया।करीब डेढ़ साल मैं रात-दिन उनके साथ रहा।
ऐसे अवसर कई बार आए जब घर आई ‘‘लक्ष्मी’’ को उन्होंने ठुकरा दिया।
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आज जो लोग भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर की जयंती और पुण्य तिथि मनाते हैं,क्या उन्हें ऐसा करने का कोई नैतिक अधिकार है ?
(बाद में एक बार तो कर्पूरी जी के दल के ही एक विधायक ने एक घंटे के लिए भी अपनी जीप उन्हें देने से इनकार कर दिया था।कहा था--दो बार मुख्य मंत्री रहे ।अपने लिए कार क्यों नहीं खरीद लेते ?)
उनकी जयंती-पुण्य तिथि मनाने का नैतिक अधिकार तब जरूर होगा जब आज के नेतागण , सांसद-विधायक फंड में भ्रष्टाचार की कमीशनखोरी का विरोध करेंगे।(वह कमीशनखोरी भ्रष्ट सरकारी कर्मियों के लिए प्रेरणा-प्रोत्साहन स्त्रोत बनी हुई है।)
क्या कर्पूरी जी को सभाएं करके याद करने वाले लोग लगभग सर्वव्यापी सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आन्दोलन करेंगे ?
खुद सादगी का कर्पूरीनुमा जीवन बिताएंगे ?
यानी, जायज आय पर ही गुजर करेंगे ?
पर,क्या आज यह संभव भी है ?
ऐसी उम्मीद करना ही अपना भोलापन प्रकट करना नहीं है ?
क्योंकि राजनीति करने वाले अधिकतर लोग आज उस दुनिया में हैं जो कर्पूरी ठाकुर की दुनिया नहीं थी।
जब तक राजनीति बेहतर नहीं होगी, तब तक सरकारी अफसर-कर्मचारी से भी बेहतरी की उम्मीद मत कीजिए।
जब तक यह चलता रहेगा,तब तक आम जनता को सरकारी दफ्तरों से ‘‘मुफ्त में’’ सेवा नहीं मिलेगी।
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17 फरवरी 25
दो सूत्री कार्यक्रम चलाइए
देश व वंशज को बचाइए
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किसी ने ठीक ही कहा है--
1.-भ्रष्टाचार के खिलाफ आदर्शवादी-आत्म बलिदानी
युवकों का समूह बना कर स्टिंग आपरेशन चलाने की
आज सख्त जरुरत है।
2.-देश में जारी व्यापक ‘‘जेहादी अभियान’’ के विरुद्ध सीधी
कार्रवाई की आज और भी जरुरत है।
अन्यथा, यह देश नहीं बचेगा।
जेहाद और भ्रष्टाचार का सीधा संबंध बन चुका है।
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वैसे तो यह काम किसी भी आदर्शवादी-राष्ट्रवादी-सनातनी जवान को किसी इनाम की उम्मीद के बिना ही करना चाहिए।
बल्कि देश,लोकतंत्र और अपने वंशजों को बचाने के लिए करना चाहिए।
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फिर भी यदि संसदीय करियर में कोई सफलता चाहता है तो ये दो काम उसे सफलता दे सकते हैं।
जो व्यक्ति या दल ऊपर लिखे दो काम करेगा ,उसे चुनाव जीतने के लिए भी देर-सबेर किसी अन्य तीन-तिकड़म की जरुरत नहीं पड़ेगी।
अनेक लोग ऐसे अभियानियों पर लटटू हो जाएंगे।
भले जेहाद के वास्तविक व गहरे खतरे से बहुत लोग अभी वाकिफ नहीं ह,ैं जब तक कि यह खतरा उनके घर तक नहीं पहुंच जाता,पर भ्रष्टाचार से तो इस देश में लाखों-करोड़ों बेचारे लोग पीड़ित हो रहे हैं।
कोई सरकार उन्हें भ्रष्टाचार के इस सर्वव्यापी -बहुरुपी राक्षस से राहत नहीं दिला पा रही है।
जो काम कोई न कर पाए,उसे आप करिए।उससे यश अधिक मिलेगा।इतिहास याद रखेगा।
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13 फरवरी 25