रविवार, 11 अक्टूबर 2009

नेहरू परिवार बनाम शास्त्री परिवार

सरकार के आश्वासन के बावजूद लाल बहादुर शास्त्री की विधवा ललिता शास्त्री को इलाहाबाद में कोई भूखंड नहीं मिल सका। इलाहाबाद में ललिता शास्त्री की एक छोटे घर की आस भी पूरी नहीं हो सकी। यह आस लिए वे 1993 में वे सिधार गईं।
पर दूसरी ओर नेहरू -इंदिरा परिवार के सिर्फ एक सदस्य राहुल गांधी की घोषित संपत्ति की एक हल्की झलक देखिए। उन्होंने गत लोस चुनाव में नामांकन पत्र दाखिल करते समय यह विवरण पेश किया था। याद रहे कि यहां सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की घोषित संपत्ति का विवरण नहीं दिया जा रहा है न ही मेनका गांधी और वरुण गांधी की संपत्ति अभी यहां बताई जा रही है।
राहुल गांधी की नई दिल्ली के साकेत में एक माॅल मंे दो दुकानें हंै जिनकी कीमत क्रमशः एक करोड़ आठ लाख और 55 लाख 80 हजार रुपये हैं। फरीदाबाद में एक फार्म हाउस है जिसकी कीमत 18 लाख 22 हजार रुपये है। सुलतान गंज और मेहरौली में स्थित संपत्ति की कीमत 9 लाख 86 हजार रुपये है। इंदिरा गांधी फार्म हाउस में भी उनका हिस्सा है।
इसके अलावा भी उनके पास संपत्ति है। बीमा है, बचत है और आभूषण भी है। उनकी संपत्ति की एक झलक इस तथ्य से भी मिलती है कि उन्होंने गत वित्तीय वर्ष में करीब 11 लाख 20 हजार रुपये आयकर दिया। उन्होंने करीब 5 लाख 32 हजार रुपये सेवा कर और और 97,115 रुपये संपत्ति कर के रूप में जमा कराया।
नेहरू परिवार ने आजादी की लड़ाई के दौरान इलाहाबाद का अपना आनंद भवन जरूर कांग्रेस को दे दिया था। शास्त्री जी के पास ऐसा कुछ देने के लिए था ही नहीं। शास्त्री और नेहरू के बीच यह फर्क जरूर रहा। याद रहे कि करीब 62 साल की आजादी के बाद भी इस देश के 84 करोड़ लोगों की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये ही है। गत 62 साल में से कितने साल नेहरू-इंदिरा परिवार ने इस देश पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से शासन किया, इसकी गणना आप खुद कर लीजिए। आज यदि माओवादी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं तो विशेषज्ञों के अनुसार उसका सबसे बड़ा कारण गरीबी ही है।
दलित और राहुल
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी इन दिनों दलित बस्तियों में जा रहे हैं। अपने आप में यह कोई गलत काम नहीं है। इस बात की कुछ लोग सराहना कर रहे हैं तो ठीक ही कर रहे हैं।
पर क्या दलितों के लिए इतना ही काफी है ? क्या यह सिर्फ प्रतीकवाद नहीं है ? इससे दलितों को अंततः क्या मिलने वाला है ? उनके जीवन में कितना फर्क आने वाला है ? बेहतर तो यह होता कि राहुल गांधी दलितों के यहां खुद पहंुच जाने से पहले उनके यहां वे सरकारी धन भिजवाने का समुचित प्रबंध करवाते जो धन बिचैलिये खा जाते हैं।
उनके पिता राजीव गांधी ने सन् 1984 में ही कहा था कि दिल्ली से गरीबों के लिए जो सौ पैसे चलते हैं, उनमें से 15 पैसे ही उन तक पहुंच पाते हैं। यानी बाकी के 85 पैसे बिचैलिये ही खा जाते हैं। वे बिचैलिये कौन हैं, यह बात सब जानते हैं। राहुल गांधी भी आज 25 साल बाद यही बात दुहराते फिर रहे हैं। पर सिर्फ कहने से क्या होगा ? ऐसी स्थिति को कौन बदलेगा ? राहुल गांधी चाहें तो इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं जिस तरह उन्होंने बुंदेलखंड के लिए हाल में सफल पहल की है।
राहुल और बुंदेलखंड
बुंदेलखंड की गरीबी से पसीज कर राहुल गांधी ने 28 जुलाई, 2009 को प्रधानमंत्री मनमोेहन सिंह से भेंट की। मनमोहन सिंह पहले ही सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि ‘राहुल गांधी देश के भविष्य हैं।’ फिर क्या था, इस मुलाकात के दो महीने के भीतर ही केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड में 4000 मेगावाट के पावर प्लांट लगाने की योजना को मंजूरी दे दी। बुंदेलखंड विकास प्राधिकार का गठन किया जा रहा है और वहां के विकास के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बन रही है। इस से यह साबित होता है कि राहुल गांधी की केंद्र सरकार पर कितनी अधिक पकड़ है और वे चाहें तो और भी अनेक ऐसे काम हो सकते हैं। पर सवाल है कि क्या राहुल गांधी को देश की मूल समस्या की समझ भी है ? क्या वे अब तक यह बात समझ पाए हैं कि मूल समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार ही है ?
याद रहे कि हाल के लोकसभा चुनाव में चुनाव प्रचार के लिए कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी को जो भारी धनराशि भेजी थी, उसमें से तीन करोड़ रुपये का कोई हिसाब ही नहीं मिल रहा है। इस आरोप में राज्य कांग्रेस के कोषाध्यक्ष दीपक गुप्त को उनके पद से हटा दिया गया है। हालांकि वे खुद को निर्दोष बता रहे हैं। इस घोटाले से भी राहुल की आंखें खुलनी चाहिए। अब सवाल है कि जो पैसे बुंदेलखंड के विकास के लिए दिल्ली से जाएंगे, उनमें से कितने पैसे अफसर, ठेकेदार और नेतागण गरीब जनता के लाभ के लिए खर्च होने देंगे ? वे पैसे वास्तव में गरीबों के विकास व कल्याण पर ही खर्च हांे, पहले तो ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए। उसके बाद ही राहुल गांधी या किसी अन्य नेता को दलितों केा अपना मुंह दिखाने उनके घर जाना चाहिए।
भ्रष्टाचार पर गौर करें राहुल
गरीब जनता तक सौ में से 15 पैसे ही इसलिए पहुंच पा रहे हैं क्योंकि पूरे देश में फैली उच्चस्तरीय ब्यूरोक्रेसी का अधिकांश भी अब भ्रष्ट हो चुका है। हिंदी प्रदेशों की हालत इस मामले में और भी खराब है। अधिकतर राजनीतिक कार्यपालिकाएं तो पहले से ही भ्रष्ट हो चुकी हंै। चूंकि बड़े भ्रष्ट सरकारी अफसरों को सजा देने की प्रक्रिया काफी जटिल बना कर रखी गई है, इसलिए उनका अंततः आम तौर पर कुछ नहीं बिगड़ता। इसलिए वे एक कांड में रिश्वत लेते पकड़े जाने के बावजूद जल्दी ही येन केन प्रकारेण कानून की गिरत फ्त से छूट जाते हैं और दुबारा जनता के धन की लूटपाट में कुछ नेताओं से मिलकर वीरप्पन की तरह लग जाते हैं।
यदि ऐसे भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों की त्वरित अदालतों के जरिए सुनवाई हो और सुनवाई के दौरान उनकी भ्रष्टाचार से कमाई गई भारी निजी संपत्ति त्त को जब्त करने का कानूनी प्रावधान हो जाए तो वे लूट नहीं पाएंगे। और फिर गरीबों, पिछड़ों, दलितों व अन्य जरूरतमंद लोगों के पास सौ में से पंद्रह की जगह 85 पैसे पहुंच सकेंगे। यदि उसके बाद ही राहुल गंांधी दलितों की बस्ती में जाएंगे तो वे उनके चेहरों पर वास्तविक खुशी देखेंगे।
बिहार विधान मंडल ने भ्रष्ट लोक सेवकों की संपत्ति जब्त करने और उनके मामलों की सुनवाई त्वरित अदालतों के जरिए करवाने के लिए एक विधेयक मार्च में ही पास करके राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भिजवा दिया है। पर लगता है कि भ्रष्ट लोग उस पर राष्ट्रपति की मंजूरी नहींे लेने दे रहे हैं। बुंदेलखंड की तरह राहुल गांधी अपने प्रभाव का उपयोग करके पहले तो बिहार विधेयक को मंजूरी दिलवाएं और बाद में ऐसा ही कानून पूरे देश के लिए बनवाएं तो दलितों तक पैसे जरूर पहुंच जाएंगे। अन्यथा एक तरफ राहुल दलित की झोपड़ी से निकलेंगे और दूसरी ओर माओवादी उस झोपड़ी में जाकर अपनी जगह बना लेंगे।
भ्रष्टाचार पर उपन्यास
भ्रष्टाचार की समस्या पर रमेश चंद्र सिन्हा का उपन्यास आया है जिसमें कुछ जगबीती है तो कुछ आपबीती हैं। उपन्यास का नाम है ‘अभय कथा।’ जिस समस्या से यह देश व प्रदेश सर्वाधिक पीड़ित रहा है, उस पर कोई उपन्यास आए तो वह स्वागतयोग्य है। अब तो भ्रष्टाचार पर चर्चा भी करने वालों का, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा प्रभु वर्ग, आज मजाक ही उड़ाता है।
‘अभय कथा’ के लेखक ने आजादी से पहले और उसके बाद के भारतीय समाज में घटित बदलावों का तलस्पर्शी अध्ययन प्रस्तुत किया है। उपन्यास में भ्रष्टाचार के विविध आयामों को गहराई से देखने- परखने की कोशिश की गई है। लेखक पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी प्रोफेसर रह चुके हैं।
और अंत में
बार -बार इस देश में एक सवाल पूछा जाता है कि चीन कैसे आगे बढ़ गया और हमारा देश क्यों पीछे रह गया ? इसका एकमात्र सही जवाब यही है कि चीन ने सरकारी खजाने के लुटेरों के लिए फांसी का प्रावधान किया और दूसरी ओर हमारे देश में जिस नेता या अफसर ने जितना अधिक सार्वजनिक धन लूटा, वह उतने ही अधिक ऊंचे पद पर पहुंचने के लायक समझा गया।
साभार प्रभात खबर

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

ऐसे विफल कर दी गई एक गांधीवादी की भूमि सुधार योजना

जय प्रकाश नारायण का सपना था कि कोशी क्षेत्र में माॅडल भूमि सुधार कार्यक्रम चलाया जाए। यह सन 1978 की बात है। तब कर्पूरी ठाकुर की सरकार थी। स्वाभाविक ही था कि कर्पूरी ठाकुर इस काम के लिए तत्काल राजी हो जाएं। इस काम के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से गांधीवादी बी।जी. वर्गीस पटना आये थे।

इस भूमि सुधार कार्यक्रम के तहत भूमि समस्याग्रस्त पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में भूमि के रिकाॅर्ड को अद्यतन करना था। हदबंदी से फालतू घोषित जमीन का अधिग्रहण व भूमिहीनों में उनका वितरण करना था। साथ ही बटाईदारों के अधिकारों को स्वीकृति दिलानी थी। फिर उन चुने हुए पांच प्रखंडों के सर्वांगीण विकास का काम करना था। इसका नाम दिया गया कोशी क्रांति योजना।

इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए जेपी की सलाह पर बिहार सरकार ने तत्काल अलग से एक सरकारी कोषांग का गठन भी कर दिया और उसमें एक उपायुक्त व कई स्तरों के 119 अन्य लोक सेवक तैनात कर दिये गये। पर जैसे ही बनमनखी, भवानीपुर, बरहरा कोठी, धमदाहा और रुपौली में इस काम की शुरुआत करने की प्रक्रिया शुरू हुई कि भूस्वामियों और सामंती प्रवत्ति के लोगों व उनके संरक्षक नेताओं ने तगड़ा विरोध शुरू कर दिया। उस इलाके के सत्ताधारी जनता पार्टी के अनेक दबंग जन प्रतिनिधियों ने कर्पूरी सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया। पटना में भी गोलबंदी शुरू हो गई। कर्पूरी सरकार के गिरने की नौबत आ गई। कर्पूरी ठाकुर दबाव में आ गए। जेपी मन मसोस कर रह गये। और बी।जी. वर्गीस अपनी आंखों में आंसू लिए दिल्ली लौट गये। कोशी क्रांति योजना निष्क्रिय हो गई।

भूमिपतियों का दबाव इतना बढ़ा कि इस संबंध में वर्गीस ने जो लम्बा लेख लिखा था, उसकी एक ही किस्त एक अखबार में छप सकी। दूसरी किस्त छापने की हिम्मत उस अखबार ने भी नहीं की। इस प्रकरण ने यह बात साबित कर दी कि बिहार में भूमि संबंधों को बदलने का मुद्दा कितना नाजुक है और यह काम कितना कठिन है।

अब उस कोशी क्रांति योजना के बारे में प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया द्वारा 2 अप्रैल, 1981 को जारी एक खबर का एक हिस्सा पढ़िए, ‘पूर्णिया, 2 अप्रैल (प्रे)। पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में तीन वर्ष पूर्व शुरू की गई कोशी क्रांति योजना भूस्वामियों और भूमिहीनों के बीच सीधा टकराव उत्पन्न कर अपने ही भार से दबी जा रही है।

यहां अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस योजना की सफलता की उम्मीद नगण्य है। क्योंकि राजनीतिक संरक्षणप्राप्त कुछ भूस्वामी इस योजना के प्रत्येक स्तर पर अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं। स्थानीय नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि भूमि सुधार के काम बंद नहीं किए गए तो परसबिगहा कांड की पुनरावत्ति हो सकती है। याद रहे कि मध्य बिहार के परसबिगहा में एक जमीन विवाद के चलते कई लोगों को उनके घर में बाहर से बंद कर उन्हें जिंदा जला दिया गया था।

प्रेस ट्रस्ट के अनुसार गांधी शांति प्रतिष्ठान के श्री बीजी।वर्गीस की कोशी क्रांति योजना को तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने 1978 में पूर्णिया जिले में माडल भूमि सुधार कार्यक्रम के रूप में शुरू किया था। भूमि सुधार के उपायुक्त के अनुसार दोषपूर्ण भूमि पद्धति और उपज में हिस्सा बंटाने की शोषणात्मक प्रवृत्ति आदि को देखते हुए इस योजना की आवश्यकता महसूस की गई थी। एक अधिकारी के अनुसार दो वर्षों में कार्य का केवल पहला भाग ही पूरा किया जा सका। अधिकारी ने प्रेस ट्रस्ट से बातचीत में यह स्वीकार किया कि इस गति से समस्या के समाधान में एक दशक लग जाएगा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार पूर्णिया जिले में लगभग 10 हजार ऐसे भूस्वामी हैं जिनके पास एक सौ एकड़ से अधिक भूमि है। इस क्षेत्र की भूमि समस्या 50 साल पुरानी है। उस समय यह पूरा क्षेत्र घना जंगल था।’

कोशी क्रांति योजना ही नहीं, बाद के वर्षों में भी जब -जब भूमि सुधार की कोशिश हुई, भूस्वामियों ने तगड़ा विरोध कर दिया। दरअसल रोजगार के अन्य साधन विकसित नहीं होने के कारण भी भूस्वामी अपनी जमीन के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं और वे अपनी जमीन पर उनके स्वामित्व के मामले में किसी तरह के हल्के खतरे का भी पूरी जी-जान से विरोध कर देते हैं। आजादी के बाद राज्य का आम विकास हुआ होता तो जमीन मोह कम होता। पर सरकारी भ्रष्टाचार के कारण विकास नहीं हुआ।

इसी तरह 1992 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भूमि सुधार खास कर बंटाईदार कानून को सख्त करने की कोशिश की तो उनके ही वोट बैंक के तबके से भी इसका तगड़ा विरोध हो गया। भारी दबाव के बीच तब ही लालू प्रसाद ने कह दिया था कि मैं बर्र के छत्ते में हाथ नहीं डालूंगा। भ्ूमि सुधार के प्रति अपनी 1992 की नीति पर लालू प्रसाद तब तक कायम रहे जबतक वे और राबड़ी देवी सत्ता में थे।

(प्रभात खबर: 2 अक्तूबर, 2009 से साभार)

शनिवार, 26 सितंबर 2009

कैसे बदला तीन ही महीने में मतदाताओं का मूड !

मात्र तीन महीने में ही बिहार की राजनीति में क्या कुछ घट गया कि मतदाताओं का मूड ही बदल गया ? क्यों बिहार विधानसभा के इस सितंबर के उप चुनाव में 18 सीटों में से 13 सीटों पर राजग हार गया ? क्या यह बदला हुआ मूड एक बार फिर बदलेगा या यह मूड अगले साल तक कायम रहेगा ? हाल के ही लोक सभा चुनाव में बड़े बहुमत से बिहार में चुनाव जीतने वाला एन।डी.ए. बिहार विधान सभा के उपचुनावों में क्यों बुरी तरह पराजित होे गया ? क्या अगले साल होने बिहार विधान सभा के आम चुनाव में मतदाताओं का यही मूड कायम रहेगा या फिर बदलेगा ? तीन ही महीने में यह बदला हुआ मूड स्थानीय व तात्कालिक कारणों से बदला है या इसका स्थायी भाव है ?

ये कुछ सवाल हैं जिनके ठोस जवाब आने वाले दिनों में तलाशे जाएंगे और आएंगे भी। पर फिलहाल सरसरी तौर पर देखने से दो बातें सामने आती हैं। ये बातें लोक सभा चुनाव के बाद ही घटित हुई हैं। एक तो नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले बिहार राजग ने यह तय किया कि इस बार भी किसी नेता के परिजन को वह टिकट नहीं देगा। और नहीं दिया भी। इस अभियान के पीछे नीतीश कुमार की मुख्य भूमिका थी। पर इस काम में जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने भी उनका दिल से समर्थन किया। इससे लोहियावादी समाजवादियों की छवि सुधरी। नीतीश कुमार की इस पहल की देश भर में सराहना हुई। नीतीश कुमार ने ऐसे समय में यह काम किया जबकि भाजपा भी परिवारवाद की कीचड़ में बुरी तरह धंसती जा रही है। जदयू के इस कदम को देश व प्रदेश की राजनीति के सुधारीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा जदयू ही देश में अब एक ऐसा प्रमुख दल है जिसमें परिवारवाद नहीं है।

पर खुद राजग यानी एन।डी.ए. के परिवारवादी नेताओं ने इसे अपने राजनीतिक भविष्य के लिए ‘घातक’ माना। जदयू सांसद पूर्णमासी राम और जदयू डा. जगदीश शर्मा ने इसपर विद्रोह भी कर दिया। इन दोनों के परिजन उम्मीदवार बने। डा.शर्मा की पत्नी जीत गई, पर पूर्णमासी राम के पुत्र हार गये।

पर यह मामला सिर्फ इन दो नेताओं को ही प्रभावित नहीं करता है। बल्कि बिहार राजग के उन अनेक नेताओं को भी प्रभावित करता हैं जो अपने परिजन के लिए भविष्य में राजग से विधायिका के टिकट व मंत्री पद चाहते हैं। कई लोगों को परिवारवाद के आधार पर पहले भी टिकट मिलते भी रहे हैं। पर अब मिलने बंद हो गये। पूरी तरह बंद हो गये। जाहिर है कि ऐसे लोग यह चाहेंगे कि नीतीश कुमार का यह परिवारवाद विरोधी अभियान फेल हो जाए। इनमें से संभव है कि कुछ लोग इस प्रयोग को फेल करने के लिए इन उप चुनावों में सक्रिय भी हुए होंगे। कुछ नेता लोग निष्क्रिय रहे होेंगे। पर राजग के कुछ लोगों की इस उप चुनाव में निष्क्रियता का भी विपरीत असर राजग उम्मीदवारों पर पड़ा होगा तो यह स्वाभाविक ही है। जहां चुनावी मुकाबला कड़ा हो वहां थोड़ा कम प्रभाव डालने वाला चुनावी तत्व भी मतदान में निर्णायक हो जाता है। इस बार हुआ भी।

सवाल उन परिवारवादी नेताओं के राजनीतिक पारिवारिक कैरियर का जो है। इसी पारिवारिक राजनीतिक कैरियर को कायम रखने के लिए तो जदयू सांसद पूर्णमासी राम ने अपने पुत्र को राजद से बगहा में उम्मीदवार बनवा दिया था। उन्होंने पहले ही कह दिया था कि मेरा पुत्र कह रहा है कि उसे उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा तो वह जहर खा लेगा।

राजनीति में परिवारवाद के खात्मे का काम राजनीतिक सुधार का आज मौलिक काम हो चुका है। यह सती प्रथा व बलि प्रथा की कानूनी समाप्ति से भी अधिक कठिन काम लगता है। सुधार के काम करने वाले सुधारकगण इस दुनिया में कई बार गोलियां भी खाते रहे हैं। यहां तो मात्र गद्दी जाने का खतरा नीतीश कुमार के सामने है। पर ऐसे ही सुधारक लोग इतिहास पुरूष हुआ करते हैं। अब भला बताइए कि परिवारवाद के आधार पर ही हर जगह टिकट मिलने लगे तो वाजिब राजनीतिक कार्यकर्ताओं की बलि हुई या नहीं ? किसी चुनावी सीट को किसी राजनीतिक परिवार के साथ सती क्यों हो जाने दिया जाना चाहिए ? यह लोकतंत्र है या राजतंत्र ? अब यह नीतीश कुमार पर निर्भर करता है कि वे अगले किसी चुनाव में ‘इस सुधार कार्यक्रम की गलती को सुधार कर’ अपनी गद्दी बचाने की कोशिश करते हैं या फिर इतिहास में अपना गौरवशाली नाम को दर्ज करा देना चाहते हैं। याद रहे कि पूरे देश की राजनीति में इन दिनों परिवारवाद की बुराई इतनी व्यापक और गंभीर होती जा रही है कि इसके खिलाफ भारी विद्रोह एक न एक दिन होना ही होना है। यदि आज नीतीश कुमार अपने कदम पीछे कर लेंगे तो कोई अन्य सुधारक इसका श्रेय ले लेगा। आज नहीं तो कल यह होने ही वाला है। इसलिए सवाल यह बनता जा रहा है कि एक नेता के बेटा, बेटी या पत्नी को टिकट मिलेगा तो कोई दूसरा नेता इससे वंचित क्यों होना चाहेगा ? इस तरह इस बुराई की श्रृखंला पूरी राजनीति को निगल लेगी।

जिस तरह करोड़पतियों व अरबपतियों का इस देश की संसद पर कब्जा होता जा रहा है। अभी इस साल 543 में से 360 करोड़पति लोक सभा सदस्य चुने गये। इस गरीब देश में यह भी एक खतरनाक बुराई है जिससे किसी व्यक्ति या संगठन को एक दिन लड़ना ही है। क्यांेकि जिस देश में 84 करोड़ लोगों की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये है उस देश की संसद पर सिर्फ करोड़पतियों का ही कब्जा कैसे होने दिया सकता है ? यदि होगा तो उस सरकार के मंत्री कैबिनेट की बैठक में इस बात को लेकर झगड़ा करते रहेंगे कि उन्हें ऐसे होटल में रहने दिया जाए जिस के एक कमरे का एक रात का किराया एक लाख रुपये ही क्यों न हो।

यह बहुत अच्छी बात है कि ताजा उप चुनाव में झटके खाने के बावजूद शरद यादव व नीतीश कुमार ने कह दिया है कि वे परिवारवाद का विरोध जारी रखेंगे। जाहिर है कि शरद-नीतीश के इस ऐतिहासिक कदम से डा। राम मनोहर लोहिया की आत्मा को शांति मिल रही होगी। शायद यह कदम आगे कभी इस देश के लिए निदेशक भी साबित हो !

कारण और भी हो सकते हैं, पर विधान सभा उप चुनावों में राजग की हार का एक दूसरा तात्कालिक कारण यह समझ में आता है कि राज्य सरकार के राजस्व व भूमि सुधार विभाग के सूत्रों के हवाले से अखबारों में इस जुलाई में ही यह खबर छप गई थी कि राज्य सरकार बटाईदारी कानून में सुधार सहित भूमि सुधार आयोग की कुछ सिफारिशों को जल्दी ही लागू करेगी। इस खबर के मीडिया में आते ही राज्य भर में छोटे -बड़े किसानों में खलबली मच गई। उन किसानों में से अनेक लोग राजग के ठोस मतदाता रहे हैं। आशंकित बटाईदारी कानून से नाराज होने वालों में हर जाति के किसान हैं जिनके पास बंटाई पर देने के लिए जमीन है। राज्य सरकार को अपनी ‘गलती’ का एहसास हुआ। इसके बाद राज्य सरकार ने 5 अगस्त 2009 को यह घोषणा कर दी कि अभी पुराने ही सीलिंग व बटाईदारी कानून लागू रहेंगे। उनमें कोई बदलाव नहीं होगा। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि बंदोपाध्याय आयोग की रपट समग्रता में नहीं है। इसलिए उसे लागू नहीं किया जाएगा। पर राज्य सरकार की इस सफाई पर अनेक किसानों ने भरोसा नहीं किया।

जहां उप चुनाव हुए,उनमें एक चुनाव क्षेत्र फुलवारी शरीफ के एक सवर्ण बहुल गांव के एक किसान ने मतदान के दिन ही यानी 15 सितंबर, 2009 को ही इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि रामाश्रय प्रसाद सिंह (बिहार सरकार के मंत्री) की इज्जत रखने के लिए कुछ मतदाताओं ने जरूर जदयू को वोट दे दिया अन्यथा हमारा पूरा गांव बटाईदारी कानून लागू होने की आशंका से पीड़ित होकर राजग से नाराज हो गया है। इस गांव के अधिकतर वोट इस बार कांग्रेसी उमीदवार को पड़े। ऐसी ही खबर सारण जिले के एक राजपूत बहुल गांव से भी मिली थी जिस गांव के किसान बटाईदारी कानून नहीं चाहते। हालांकि यह आशंका सिर्फ इन दो गांवों व जातियों मंे ही नहीं है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल में एक अन्य संदर्भ में कहा था कि मैं कई तरह की बीमारियों का इलाज करने के लिए मुख्यमंत्री बना हूं। वैसे भी उन्होंने अब तक अनेक ऐसे सराहनीय व ऐतिहासिक काम किए हैं जिनकी तारीफ उनके कुछ राजनीतिक प्रतिद्धंद्धी दलों ने भी समय -समय पर की। उनके कई कामों को अन्य राज्यों ने बाद में अपने यहां भी किया। पर हाल के उनके कुछ कदमों के नतीजों से ऐसा लगा कि सारी बुराइयों से एक साथ नहीं लड़ा जा सकता। बिहार में तो बिलकुल ही नहीं जहां के प्रशासन व राजनीति को हाल के कुछ दशकों में नेताओं ने बिगाड़ कर रख दिया। क्योंकि कई बुराइयों की काई तो इतनी गहरी बैठ चुकी है कि उन्हें छुड़ाना यहां एक बड़ा दुरूह काम है। बटाईदारी की समस्या भी ऐसी एक समस्या है जिसे हाथ लगा कर लालू प्रसाद जैसे महाबली भी पीछे हट गये थे। सन् 1992 में कुछ वामपंथी दलों व बुद्धिजीवियों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को सलाह दी कि वे भूमि सुधार लागू कर दें। लालू प्रसाद ने फरवरी, 1992 में यह घोषणा कर दी कि उनकी सरकार भूहदबंदी की सीमा घटाएगी और बटाईदारी कानून में संशोधन करके बटाईदारों को उनका वाजिब हक दिलाएगी। इसके लिए कानून में संशोधन का प्रारूप तैयार करने के लिए अफसरों की टीम को यह काम सौंप दिया गया है। लालू प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से यह भी कह दिया था कि मेरी सरकार यह भी चाहती है कि कोई एक व्यक्ति नौकरी, व्यापार व खेती तीनों पर एक साथ काबिज नहीं हो। उसके पास इनमें से एक ही रोजगार रहे।

पर इस घोषणा का सबसे कड़ा विरोध तत्कालीन निर्दल विधायक राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने किया। बाद में चर्चित पप्पू यादव सांसद भी बने थे। तब उन्होंने जेल से जारी बयान में कहा कि राज्य सरकार छोटे किसानों की जमीन बटाईदारों व खेतिहर मजदूरों में बांटना चाहती है। मैं तो कहूंगा कि पहले अट्टालिकाओं में रहने वाले उद्योगपतियों की संपत्ति बंटे। पप्पू यादव की आवाज एक खास दबंग पिछड़ी जाति यानी यादव की आवाज मानी गई जो जाति लालू प्रसाद का मजबूत वोट बैंक माना जाती है।

बाद में इस तरह राज्य में व्याप्त लालू के अनेक वोटरों में भारी असंतोष को देखते हुए लालू प्रसाद ने अपनी घोषणा वापस ले ली। जब उनकी समर्थक पार्टी सी।पी.आई.ने इस बारे में उनसे पूछा तो लालू प्रसाद ने कहा कि हम बंटाईदारी कानून लागू करके बर्रे के छत्ते में हाथ नहीं डालना चाहते हैं।

वैसे भी लालू प्रसाद-राबड़ी देवी के 15 साल के कार्यकाल में भूमि संबंधों में सरकारी प्रयासों से कोई खास बदलाव नहीं आया। अब जब नीतीश सरकार ने इस पर कुछ कहा तो कई राजग समर्थकों को लालू प्रसाद ही बेहतर लगने लग रहे हैं।

दरअसल व्यावहारिक राजनीति करने वाले कुछ लोग कह रहे हैं कि बंटाईदारी जैसे विवादास्पद मामलों में हाथ डालने के बदले नीतीश सरकार को चाहिए कि वे गांवों के विकास की गति को और तेज करें। बिजली, पानी और सड़क की बेहतर व्यवस्था की अपनी कोशिश को और तेज करें। कृषि आधारित उद्योग गांवों में लगें। जब कुछ अन्य विकसित राज्यों की तरह छोटे -बड़े किसानों की माली हालत इस राज्य में भी सुधरेगी तो वे बटाईदारों की स्थिति सुधारने में सरकार का सहयोग करेंगे। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि होम करते हाथ जलाने से बेहतर है कि होम की ज्वाला को अधिक तेज नहंीं होने दिया जाए। पुराने माॅडल की जर्जर एम्बसेडर कार की गति को अचानक अधिक बढ़ा देने के अपने खतरे हैं। हालांकि नीतीश कुमार कह रहे हैं कि बंटाईदारी कानून तो बिहार में पहले से ही है। इसमें संशोधन करने का अभी हमने कोई फैसला ही नहीं किया है।दरअसल पूरे मामले में गलतफहमी फैल गई।कौआ कान ले गया, यह चर्चा इस बात को देखे बिना हो गई कि कान अपनी जगह पर है भी या नहीं।

( 20 सितंबर, 2009)

बटाईदारी विवाद व उप चुनाव

अपनी जमीन बटाई पर देकर खेती कराने वालों की ताजा नाराजगी के समक्ष लगता है कि नीतीश सरकार सहम सी गई है।इस नाराजगी ने तो हाल के बिहार विधान सभा उप चुनावों में राजग को बड़ा झटका दे दिया है। आगे के लिए भी खतरा मौजूद है। जानकार सूत्र बताते हैं कि किसानों की इस नाराजगी को जल्द से जल्द दूर करने के उपाय भी बिहार सरकार द्वारा खोजे जा हैं। पर इस सिलसिले में इस बात का भी ध्यान रखा जा रहा है कि एक नाराजगी को दूर करने के क्रम में दूसरी नाराजगी न पैदा हो जाए। यानी बटाईदार उधर नाराज न हो जाएं। उनकी खेती भी चलती रहे और कुल मिलाकर राज्य का कृषि उत्पादन भी बढ़े।

ऐसा कोई रास्ता नीतीश कुमार जैसे कल्पनाशील नेता के लिए खोज लेना कोई कठिन काम भी नहीं है। जल्दी ही इस संबंध में कोई ठोस सरकारी फैसला सामने आ सकता है।


जमीन वाले नाराज क्यों ?
कई जमीन वाले आखिर राजग सरकार से नाराज क्यों हुए? नाराजगी का मुख्य कारण जमीन से बेदखली का खतरा रहा। यह खतरा गत जुलाई में प्रकाशित एक अपुष्ट खबर के कारण पैदा हुआ था। खबर यह थी कि बिहार सरकार बटाईदारी कानून में इस तरह संशोधन करने जा रही है जिससे जमीन वालों का उनकी उस जमीन पर हक ही नहीं रहेगा जो जमीन वे बटाईदार को जोतने के लिए देंगे। कई लोगों के मन में इस बात का खतरा अब भी है। पर धीरे -धीरे वह कम होता जा रहा है। इस आशंका को पूरी तरह निर्मूल करने के लिए बिहार की राजग सरकार अत्यंत सक्रिय हो गई है।

हालांकि बिहार सरकार ने गत अगस्त में ही यह कह दिया था कि वह बटाईदारी कानून में ऐसा कोई संशोघन नहीं करने जा रही है जिससे जमीन वाले अपनी जमीन को लेकर कोई असुरक्षा महसूस करें।पर जमीन वाले अभी पूरी तरह निश्चिंत नहीं हो पाए हैं। इस नाराजगी को बातों व बयानों के बदले अब किसी ठोस प्रशासनिक कदम से ही दूर करना होगा। जानकार लोग बताते हैं कि नीतीश कुमार इसी ठोस कदम की ओर आगे बढ़ रहे हैं।


बटाईदारी का 12 साला बंधन
यह बात कम ही लोग जानते हैं कि मौजूदा बटाईदारी कानून में भी एक बारह साला प्रावधान है। वह प्रावधान भी जमीन वालों के लिए सुखद नहीं है। प्रावधान यह है कि यदि किसी बटाईदार के पास किसी जमीन वाले का कोई भूखंड लगातार बारह साल तब बटाई में रह जाए तो उस जमीन पर उस बटाईदार का कानूनी हक हो जाता है।

पता चला है कि नीतीश सरकार इस बारह साला प्रावधान को समाप्त करने की जरूरत पर गंभीरता से विचार कर रही है। इस प्रावधान की समाप्ति से जमीन वालों में निश्चिंतता का भाव पैदा होगा। उन्हें यह लगेगा कि उनकी जमीन कहीं नहीं जाएगी। बटाई पर देने के बावजूद उस जमीन के मालिक वही रहेंगे जो पहले से मालिक हैं। फिर जमीन मालिक किसी बटाईदार को एक साल या तीन साल के आपसी निजी समझौते के आधार पर जमीन बटाई पर दे सकते हैं। इस समझौते के आधार पर राज्य सरकार उस बटाईदार को सरकारी मदद देगी ताकि वह बेहतर ढंग से खेती करके उपज को और भी बढ़ा सके। उपज बढ़ेगी तभी उस जमीन वालों को मिलने वाला लाभ भी बढ़ेगा।यह द्विपक्षीय समझौता किसी तरह के कानूनी दावे का आधार नहीं बनेगा। समझौते की अवधि पूरी होते ही जमीन वाले अगली बार किसी अन्य बटाईदार को जोतने के लिए अपनी जमीन दे सकते हैं।

ये कुछ उपाय डैमेज कंट्रोल उपाय माने जा रहे हैं जिन पर राज्य सरकार सोच विचार कर रही है। अंततः क्या उभर कर सामने आता है, यह आने वाला समय बताएगा। पर ध्यान इसी बात का रखा जा रहा है जमीन वाले और बटाईदार में से किसी के हक को क्षति नहीं पहंचे और साथ ही राज्य का कृषि उत्पादन भी बढ़े। जमीन बटाईदारों को जोतने के लिए देने वालों में अब सिर्फ बड़े किसान ही नहीं हैं।एक दो एकड़ जमीन वालों को भी बटाई पर अपनी जमीन दे देनी पड़ रही है। यानी बटाई पर जमीन देने और लेने वालों दोनों की संख्या काफी है।


लालू प्रसाद का कदम सराहनीय
गत उप चुनाव में सफलता पाने के बाद लालू प्रसाद ने एक अच्छी बात कही है। उन्होंने जनता से अपील की है कि वह राजद शासन काल के दौरान उनके कार्यकर्ताओं की गलतियों को माफ कर दे। उन्होंने कार्यकर्ताओं को अपनी जुबान पर लगाम लगाने की भी नसीहत दी।

लालू प्रसाद के कद का कोई बड़ा नेता अपने दल की गलती को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करे और उसके लिए जनता से माफी मांगे, यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। कम ही नेता इस तरह अपनी गलती मानते हैं। इससे पहले कई बार चुनाव हारने के बाद भले लालू जी ने अपनी, सरकार व अपने कार्यकर्ताओं की गलती का बयान किया था, पर इस बार उन्होंने जीतने के बाद गलती मानी है। यह और भी अच्छी बात है।

पर इससे पहले तो लालू जी कई बार अपनी बात पर कायम नहीं रह सके थे। इसका कारण जो भी रहा हो। संभव है कि उसके लिए वे खुद जिम्मेदार नहीं हों।देखना है कि वे इस बार अपने कार्यकर्ताओं को संयमित करने की अपनी बात पर कायम रह पाते हैं या नहीं। कायम रहेंगे तो उनकी ही राजनीतिक सेहत के लिए अच्छा होगा।

सन् 1990 में मंडल आंदोलन की लहर पर सवार होकर लालू प्रसाद राजनीति के महाबली बने थे। वे जिन करोड़ों लोगों के मसीहा बने थे, वे गरीब व पीड़ित लोग ही थे। वे गरीब लोग अपनी उदंडता के लिए नहीं जाने जाते रहे हैं बल्कि वे पुराने सामंतों की उदंडता के शिकार के रूप में जाने जाते थे। पर लालू प्रसाद सत्ता के शिखर पर चढ़े तो उनके इर्दगिर्द पार्टी नेता व कार्यकर्ता के नाम पर अनेक ऐसे अराजक तत्व एकत्र हो गये जो उदंडता के लिए जाने जाते रहे। नया सामंतवाद पैदा हुआ जिसका नुकसान अंततः लालू जी को ही हुआ। इससे उस कमजोर वर्ग को भी नुकसान हुआ जिनको मंडल आरक्षण से कुछ फायदा हुआ था। उन्हें लालू जी ने सीना तान कर चलना सिखाया भी था।
लोकतंत्र में तो एक दल सत्ता में आता है तो दूसरा दल सत्ता की प्रतीक्षा करता है। इससे किसी नेता या दल को कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। समाज को फर्क तब पड़ता है जब कोई नेता राजनीतिक संस्कृति बनाता है या उसे बिगाड़ देता है।

यह अच्छी बात है कि लालू जी की अंतरात्मा ने अपने कार्यकर्ताओं को शालीन रहने की नसीहत दी है। हालांकि यह काम बड़ा कठिन है,पर लालू जी को इसकी कोशिश तो करनी ही चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि हनुमान जी को खुद के शाकाहार होने के बारे में सपने में दिए गए अपने वचन से जिस तरह लालू जी बाद में पलट गए,उसी तरह इस मामले में भी वे पलट जाएं। लालू प्रसाद अपने काय्रकर्ताओं को काबू में रखेंगे तो उससे उनके राजनीतिक विरोधी भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा।जो कोई नेता एक कठिन काम करता है तो लोगबाग उसकी वाहवाही करते ही हैं।


और अंत में
अब सवाल हवाई जहाज के ‘पशु क्लास’ और ‘मनुष्य क्लास’ का ही नहीं है। इस गरीब देश के तो कई अमीर नेता अब सेवा विमान से चलना ही अपनी तौहीन मानने लगे हैं। कई बार वे विशेष विमान से वैसी जगह भी जाते हैं जहां के लिए सेवा विमान की अनेक उड़ानें रोज ही उपलब्ध हैं।

(प्रभात खबर से साभार: 21 सितंबर, 2009)

शनिवार, 22 अगस्त 2009

बंटवारे के लिए मौलाना आजाद की नजर में नेहरू जिम्मेदार

मिस्टर जिन्ना सन् 1946 के आरंभ में अखंड भारत के लिए तैयार हो गये थे, पर उसी साल के मध्य में जवाहर लाल नेहरू ने एक ऐसा बयान दे दिया कि जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन का नारा देकर पाकिस्तान बनवा लिया। यह बात आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने लिखी है। अपनी आत्मकथा ‘आजादी की कहानी’ में आजाद ने लिखा कि ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन, कांग्रेस महासमिति और मुस्लिम लीग परिषद के बीच इस बात पर आपसी सहमति बन चुकी थी कि अखंड आजाद भारत की केंद्रीय सरकार के अधीन तीन विषय होंगे-रक्षा, विदेश और संचार। राज्यों को तीन श्रेणियों में बांट दिया जाएगा। उन्हें स्वायतता रहेगी। ‘बी’ श्रेणी के राज्यों में पंजाब, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत व ब्रिटिश बलोचिस्तान शामिल किए जाएंगे। ‘सी’ श्रेणी के राज्यों में बंगाल और असम शामिल थे। बाकी राज्य ‘ए’ श्रेणी में रखे गये थे। कैबिनेट मिशन का ख्याल था कि इस भावी व्यवस्था से मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग को पूरी तरह से इतमिनान हो जाएगा।

याद रहे कि आजादी के लिए हिंदुस्तान के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श की खातिर ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन भारत भेजा था। मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मिशन ने मेरी यह बात भी मान ली थी कि अधिकतर विषय प्रांतीय धरातल पर संभाले जाएंगे। इसलिए बहुमत वाले राज्यों में मुसलमानों को प्रायः पूरी स्वायत्तता प्राप्त होगी। बी और सी श्रेणियों के राज्यों में मुसलमानों का बहुमत था। इस तरह वे अपनी सारी औचित्यपूर्ण आशाओं को सफल बना सकते थे।’

‘शुरू- शुरू में मि. जिन्ना ने इस योजना का घोर विरोध किया। मुस्लिम लीग स्वतंत्र देश की अपनी मांग को लेकर इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उसके लिए कदम वापस लौटाना मुश्किल था। पर कैबिनेट मिशन ने बहुत ही साफ -साफ और असंदिग्ध शब्दों में कह दिया कि वह देश के बंटवारे का सुझाव कभी नहीं दे सकता। मिशन के सदस्य लाॅर्ड पेथिक लारेंस और सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने बार- बार कहा कि हमारी समझ में नहीं आता कि मुस्लिम लीग जिस पाकिस्तान सरीखे राज्य की कल्पना कर रही है, वह कैसे जियेगा, कैसे बढ़ेगा और कैसे स्थायी होगा? उनका ख्याल था कि मैंने जो सूत्र दिया है, वही समस्या का हल है। मंत्रिमंडलीय मिशन का ख्याल था कि इसमें कोई हर्ज नहीं है ।’

मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मुस्लिम लीग परिषद की तीन दिन तक बैठक हुई। तब कहीं जाकर वह किसी फैसले पर पहुंच सकी। आखिरी दिन जिन्ना को यह तसलीम करना पड़ा कि मिशन की योजना में जो हल प्रस्तुत किया गया है, अल्पसंख्यकों की समस्या का उससे अधिक न्यायपूर्ण हल और कोई नहीं हो सकता। और उन्हें इससे अच्छी शर्तें मिल ही नहीं सकतीं। उन्होंने परिषद को बताया कि मंत्रिमंडल मिशन ने जो योजना प्रस्तुत की है, उससे और कुछ भी ज्यादा मैं नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग को योजना मान लेने की सलाह दी और लीग परिषद ने सर्वसम्मति से उसके पक्ष में वोट दिया।’

इस संबंध में कांग्रेस के फैसले के बारे में मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘कांग्रेस कार्य समिति में जो विचार विमर्श हुआ, उसमें मैंने कहा कि कैबिनेट मिशन की योजना मूलतः वही है जो कांग्रेस पहले स्वीकार कर चुकी है। ऐसी हालत में योजना में जो प्रमुख राजनीतिक हल प्रस्तुत किया गया था, उसे मान लेने में कार्यसमिति को कोई मुश्किल नहीं हुई। 26 जून, 1946 के अपने प्रस्ताव में कांग्रेस कार्य समिति ने भविष्य के संबंध में कैबिनेट मिशन की योजना स्वीकार कर ली-यद्यपि उसने अंतरिम सरकार का सुझाव मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की। कैबिनेट मिशन योजना का कांग्रेस व मुस्लिम लीग दोनों के द्वारा स्वीकार कर लिया जाना हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की एक गौरवमय घटना थी। यह भी लगा मानो हम आखिरकार सांप्रदायिक कठिनाइयों को भी पीछे छोड़ आए हैं। मि. जिन्ना बहुत खुश न थे, लेकिन और कोई रास्ता न था, इसलिए योजना मानने के लिए उन्होंने खुद को तैयार कर लिया था।’

पर इस पूरी योजना को पलीता लगाने वाली घटना की चर्चा करते हुए मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा कि ‘तभी एक ऐसी दुःखद घटना घटी जिसने इतिहास का क्रम ही बदल दिया। दस जुलाई को कांग्रेस अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू ने बम्बई में एक संवाददाता सम्मेलन बुलाया। वहां उन्होंने एक बयान दिया जिस पर शायद सामान्य परिस्थितियों में कोई ध्यान भी न देता। पर उस बयान ने शंका और घृणा के तत्कालीन वातावरण में बड़े ही दुर्भाग्यपूर्ण परिणामों के एक क्रम को जन्म दिया।’

‘कुछ पत्र प्रतिनिधियों ने उनसे सवाल किया, ‘क्या कांग्रेस कार्य समिति के प्रस्ताव पास कर देने का मतलब यह है कि कांग्रेस ने योजना को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है जिसमें अंतरिम सरकार के गठन का सवाल भी निहित है ?’

जवाब में जवाहर लाल ने कहा कि कांग्रेस करारों की बेड़ियों से बिलकुल मुक्त रह कर और जब जैसी स्थिति पैदा होगी, उसका मुकाबला करने के लिए स्वतंत्र रहते हुए, संविधान सभा में जाएगी।’ पत्र प्रतिनिधियों ने फिर पूछा कि क्या इसका मतलब यह है कि कैबिनेट मिशन योजना में संशोधन किए जा सकते हैं?

जवाहर लाल बड़ा जोर देकर जवाब दिया कि कांग्रेस ने सिर्फ संविधान सभा में भाग लेना स्वीकार किया है और वह मिशन योजना में जैसा उचित समझे, वैसा संशोधन-परिवर्तन करने के लिए अपने आपको स्वतंत्र समझती है।मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मैं यह कह दूं कि जवाहर लाल का बयान गलत था।

यह कहना सही न था कि कांग्रेस योजना में जो चाहे संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है। असल में यह तो हम मान चुके थे कि केंद्रीय सरकार संघीय होगी ।’ (आजादी की कहानी:मौलाना अबुल कलाम आजाद की आत्म कथा-पृष्ठ-173)

आजाद के शब्दों में ‘जवाहर लाल नेहरू के इस बयान से मि. जिन्ना भौंचक रह गये। उन्होंने तुरंत एक बयान जारी किया कि कांग्रेस अध्यक्ष के इस वक्तव्य से सारी स्थिति पर फिर से विचार करना जरूरी हो गया है। जिन्ना ने लियाकत अली खान से लीग परिषद की बैठक बुलाने के लिए कहा और अपने बयान में कहा कि मुस्लिम लीग परिषद ने दिल्ली में कैबिनेट मिशन की योजना इसलिए स्वीकार कर ली थी कि यह आश्वासन दिया गया था कि कांग्रेस ने भी उसे स्वीकार कर लिया है और यह योजना हिंदुस्तान के भावी संविधान का आधार होगी। अब चूंकि कांग्रेस अध्यक्ष ने यह एलान किया है कि कांग्रेस संविधान सभा में अपने बहुमत से योजना को बदल सकती है, इसलिए इसका मतलब यह हुआ कि अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक की दया पर जियेगा।

उसके बाद मुस्लिम लीग की बैठक 27 जुलाई को बम्बई में हुई। अपने उद्घाटन भाषण में मिस्टर जिन्ना ने फिर से पाकिस्तान की मांग की और कहा कि मुस्लिम लीग के सामने यही एक रास्ता रह गया है। तीन दिनों की बहस के बाद लीग परिषद ने मिशन योजना को अस्वीकार करते हुए एक प्रस्ताव पास कर दिया। उसने पाकिस्तान की मांग पूरी कराने के लिए ‘सीधी कार्रवाई’ करने का भी फैसला किया।’

(प्रभात खबर, 20 अगस्त 2009 से साभार)

बुधवार, 19 अगस्त 2009

‘आजादी लाओ’ से ‘आजादी बचाओ’ तक का सफर

स्वतंत्रता सेनानियों ने दशकों पहले अपना ‘आज’ न्योछावर करके हमारे ‘कल’ के लिए आजादी की बेजोड़ जंग छेड़ी थी। तभीे हम 62 साल पहले आजाद हुए। पर, इतने साल में हमारे सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेताओं ने इस देश के साथ क्या-क्या किया? कैसा सलूक किया? देश के लिए कितना और अपने निजी लाभ के लिए कितना कुछ किया? आजादी के बाद सत्ता में आए अधिकतर नेताओं ने मिलजुल कर या फिर बारी -बारी से, परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से, जाने या अनजाने तौर पर देश मंे आज एक अजीब दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ला दी। इस स्थिति में आज इस देश में ‘आजादी बचाओ’ आंदोलन’ शुरू करने की सख्त जरूरत आ पड़ी है। यानी, हमने 62 साल में ‘आजादी लाओ’ से ‘आजादी बचाओ’ तक का ही सफर तय किया है।

ऐसा नहीं है कि इस देश को एक बार फिर ‘सोने की चिड़िया’ बना देने की देशवासियों में क्षमता नहीं है। शत्र्त है कि हमारे नेताओं में ईमानदारी होनी चाहिए। सन 1700 में विश्व जी.डी.पी. में भारत का हिस्सा 24 दशमलव 40 प्रतिशत था। पर ताजा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यह घटकर अब मात्र पांच प्रतिशत रह गया है। हां, इसी देश के हर क्षेत्र के चुने हुए प्रभावशाली लोगों की निजी संपत्ति आजादी के बाद बेशुमार बढ़ रही है। करोड़पतियों की संख्या इस देश में अब एक लाख तक पहुंच चुकी है। अरबपतियों की संख्या एक सौ पहुंच रही है। हालांकि यह सरकारी आंकड़ा ही है। काले धन वाले करोड़पतियों की संख्या तो और भी अधिक है। दूसरी ओर, योजना आयोग के अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्त के अनुसार इस देश में करीब 84 करोड़ लोगों की रोजाना औसत आय बीस रुपये मात्र है।

जिस देश में इतनी अधिक आर्थिक व सामाजिक विषमता है, भीषण गरीबी और भुखमरी है, वहां की आजादी को कितने दिनों तक बचाए रखा जा सकेगा? यह सवाल अब पूछा जाने लगा है। इस विषमता के लिए कोई और नहीं, बल्कि हमारे वे शासक ही जिम्मेदार रहे हैं, जिनके हाथों में आजादी के बाद से देश व प्रदेशों की सत्ता रही है। सभी दल परोक्ष व प्रत्यक्ष रूप से सत्ता में रहे हंै। किसी के दामन साफ नहीं हैं। इस देश की मूल समस्या यह नहीं है कि इस देश में समस्या है। गंभीर समस्या यह है कि उसे दूर करने की कहीं से कोई ईमानदार कोशिश नजर नहीं आ रही है। यदि कहीं कोई कोशिश है भी तो वह अपवादस्वरूप ही है और ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। यह अधिक चिंताजनक बात है।

संविधान के भाग चार में राज्य के लिए कुछ निदेशक तत्वों का समावेश किया गया है। उसके अनुच्छेद -38(2) में कहा गया है कि ‘राज्य विष्टितया आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यक्तियों बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा।’

क्या इस देश के शासन ने गत 62 साल में ऐसा कोई प्रयास किया? बल्कि इससे उलट किया। नतीजतन विभिन्न जनसमूहों व क्षेत्रों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है। लगता है कि हमारे शासकों में से अधिकतर लोगों की नजर में पैसे ही सब कुछ है। राजनीति पर आज पैसा जितना हावी है,उतना पहले कभी नहीं था। यह कोई संयोग नहीं है कि गत लोकसभा चुनाव के बाद करोड़पति सांसदों की संख्या बढ़ कर दुगुनी हो गई। मौजूदा लोकसभा में 300 करोड़पति हैं। कांग्रेस के 66 प्रतिशत और भाजपा के 50 प्रतिशत सांसद करोड़पति हैं। ये सांसद समाज के अंतिम आदमी के बारे में कितना सोचेंगे?

लोकतंत्र पर हावी होते धनतंत्र वाले इस देश में एक दिन में ऐसी स्थिति नहीं बनी। आजादी के तत्काल बाद से ही इसके लक्षण दिखाई पड़ने शुरू हो चुके थे। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सेे एक बार जब यह कहा गया था कि आपके मंत्रिमंडल व प्रशासन में भ्रष्टाचार घर करने लगा है,इसलिए कोई एजेंसी बनाइए जो उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार पर नजर रखे। नेहरू जी के निजी सचिव के अनुसार पंडितजी ने इस पर कह दिया कि ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि इससे मंत्रियों में डिमोरलाइजेशन आएगा।

अब भला भ्रष्टाचार की गति को बढ़ने से कौन रोक सकता था? वह बढ़ता गया। खुद पंडित जी के मन में सार्वजनिक धन के प्रति कोई निजी लोभ नहीं रहा, पर अपनी बिटिया को देर-सवेर अपना उत्तराधिकारी बनाने का रास्ता वे साफ कर गये। इंदिरा गांधी 41 साल की उम्र में कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्या और 42 साल की उम्र में कांग्रेस अध्यक्षा बना दी गईं। यह नेहरू की सहमति से हुआ। व्यक्तिगत ईमानदारी के मामले में इंदिरा गांधी नेहरू जी की तरह कतई नहीं थीं, इसलिए उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद सरकार में भ्रष्टाचार ने संस्थागत स्वरूप ग्रहण कर लिया। जब उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे, तो इंदिरा गांधी ने कहा भी था कि भ्रष्टाचार तो वल्र्ड फेनोमेना है। यह सिर्फ भारत में ही थोड़े ही है।’

प्रधानमंत्री की यह राय जब सार्वजनिक हो गई तब भ्रष्टों पर भला रोक कौन लगाता ? नतीजतन राजीव गांधी का शासनकाल आते -आते सरकारी भ्रष्टाचार की स्थिति ऐसी हो गई कि सौ में से मात्र 15 पैसे ही सरजमीन तक पहुंच पाते थे। ऐसी स्थिति एक दिन में नहीं आई कि विकास व कल्याण के मद के एक रुपये में से 85 पैसे बिचैलिए खा जाएं और वे किसी तरह की सजा से बच भी जाएं। ऐसा उच्चस्तरीय संरक्षण से ही संभव हो सकता था। यही बात भी थी। आज अनेक निष्पक्ष लोग यह मानने लगे हैं कि इस देश की सबसे बड़ी समस्या सरकारी भष्टाचार ही है। यह भी कहा जा रहा है कि यदि इंदिरा गांधी के बदले कोई अन्य ऐसा नेता सन् 1966 में प्रधान मंत्री बना होता जो भ्रष्टाचार के प्रति कठोर होता, तो इस देश की ऐसी दुर्दशा नहीं होती। चीन हमलोगों के दो साल बाद आजाद हुआ था। पर वहां भ्रष्टाचार के खिलाफ फांसी का प्रावधान किया गया। तभी वह देश बन सका।

पर उसके उलट हमारे देश में जिस व्यक्ति पर भ्रष्टाचार का जितना अधिक गम्भीर आरोप लगता है, उसके अपने क्षेत्र में उतनी ही अधिक तरक्की करने का चांस होता है। बासठ साल की आजादी में राजनीति को चार भागों में बांटा जा सकता है। पहले राजनीति सेवा थी। बाद में यह नौकरी हुई जब सांसद पेंशन की व्यवस्था की गई। उसके बाद यह व्यापार बनी और अब इसे उद्योग का दर्जा मिल गया। कुछ नेताओं की कुल निजी संपत्ति का विवरण देख कर यह स्पष्ट है।

यह अकारण नहीं है कि कई हस्तियों, समितियों और आयोगों की सिफारिशों व सलाहों के बावजूद सांसद क्षेत्र विकास निधि को समाप्त नहीं किया जा रहा है, जबकि राजनीति को दूषित करने में किसी एक तत्व का यदि आज सबसे बड़ा हाथ है, तो वह सांसद-विधायक फंड ही है। लोकतंत्र का आज यही स्वरूप है। विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन के विवरण देने के लिए जर्मनी व लाइखटेंस्टाइन देशों की एकाधिक एजेंसी तैयार हंै। पर भारत सरकार ही सूचना लेने को तैयार नहीं है। इतना ही नहीं, भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के एक वरीय अफसर ने हाल में जर्मनी स्थित भारतीय राजदूत को एक सनसनीखेज पत्र लिखा। पत्र में यह लिखा गया कि वे भारतीय खातेदारों के नाम रिलीज करने के लिए जर्मन सरकार पर दबाव नहीं डालें। याद रहे कि एक लिस्ट जर्मन सरकार ने लाइखटेंस्टाइन के एल.जी.टी. बैंक के एक विद्रोही कर्मचारी से प्राप्त कर ली, जिसमें भारतीयों के वहां जमा काले धन का पूरा विवरण है। ऐसा अपने ही देश में संभव है कि सरकार इस देश को लूटने वाले काला धन वालों की खुलेआम मदद करे। एक अनुमान के अनुसार भारत के तीन प्रतिशत अमीरों ने 30 से 40 बिलियन डाॅलर विदेशों में नाजायज तरीके से जमा कर रखे हैं।

62 साल की आजादी की एक उपलब्धि यह भी है कि आयकर के अनेक मामलों को जानबूझ कर उलझा दिया जाता है, ताकि टैक्स चोरों को राहत मिल सके। गत 4 अगस्त, 2009 को राज्यसभा में यह बताया गया कि आयकर के एक लाख 41 हजार करोड़ रुपये के मामले कानूनी विवादों में उलझे हुए हैं। एक अनुमान के अनुसार इस देश के अमीर लोग हर साल नौ लाख करोड़ रुपये की टैक्स चोरी करते हैं। साथ ही बैंकों के खरबों रुपये व्यापारियों ने दबा रखे हंै और भारत सरकार या रिजर्व बैंक उनके नाम तक सार्वजनिक करने को तैयार नहीं है। इस तरह के अनेक उदाहरण हैं, जिसमें सरकार ही लूट की मददगार है। शुकसागर में ठीक ही लिखा गया है कि भारत में एक दिन ऐसा भी आएगा, जब राजा ही अपनी प्रजा को लूटेगा।

यह तो राजनीतिक कार्यपालिका, प्रशासनिक कार्यपालिका और व्यापार जगत की हालत है। न्यायपालिका के लोग भी अपनी निजी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करने को तैयार नहीं हो रहे हैं। इस पर न्यायपालिका में ही मतभेद है। इससे दुःखी होकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने सार्वजनिक रूप से मौजूदा चीफ जस्टिस से यह कहा है कि वे मेरी संपत्ति का विवरण वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दें। श्री वर्मा ने कहा है कि मैंने पद संभालने के साथ ही मार्च, 1997 में अपनी संपत्ति का विवरण सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को सौंप दिया था। पूर्व चीफ जस्टिस यह चाहते हैं कि जजों, उनके परिजनों की संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करना न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए ठीक रहेगा। अब देखना है कि कितने जज श्री वर्मा की सलाह मानते हैं।

पर ऐसी घटनाओं से लगता है कि पूरे कुएं में भांग पड़ी हुई है और इस देश के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं हैं।

काश, आजादी के वीर बांकुरे सत्ता में आने के तत्काल बाद इस मामले में कड़ाई दिखाते तो हालात इतने नहीं बिगड़ते। आज तो हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि देश के 186 जिलों में नक्सली हावी हो चुके हैं और उनसे निपटने के लिए सेना की मदद ली जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि नक्सली समस्या सामाजिक-आर्थिक समस्या है। यदि इस देश की सरकार में भीषण भ्रष्टाचार नहीं होता, तो सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को हल करने में सुविधा होती।

दूसरी समस्या आतंकवाद और विदेशी घुसपैठियों की है। आतंकवाद से निर्णायक ढंग से लड़ने में वोट बैंक की राजनीति बाधक है। साथ ही हमलावर आतंकवादियों पर प्रति-हमला करने में हमारी शिथिलता और भ्रष्टाचार बाधक है। चूंकि आम तौर पर दोषियों को सजा नहीं मिलती, इसलिए एक ही तरह की गलती बार -बार इस देश में होती है।

मुम्बई के ताज होटल पर जब आतंकी हमला हुआ तो एन.एस.जी. कमांडो को दिल्ली से मुम्बई भेजने में साढ़े आठ घंटे लग गये। इससे पहले जब कंधार विमान अपहरण हुआ, तो अपहृत विमान को अमृतसर में इसलिए नहीं रोका जा सका, क्योंकि समय पर उच्चत्तम स्तर पर कार्रवाई करने का कोई फैसला ही नहीं हो सका। क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक विमान में थे और उसमें सेटेलाइट फोन नहीं था। वही कोई फैसला करते।

इतना ही नहीं सैन्य व पुलिस बल को उपलब्ध कराने के लिए जो बुलेट प्रूफ जैकेट दिए जाते हैं, वे बुलेट को रोक ही नहीं पाते। क्योंकि उसकी खरीद में भ्रष्टाचार होता है और कमीशन के चक्कर में घटिया बुलेट प्रूफ आते हैं। शर्मनाक बात यह है कि देश की रक्षा के मामले में भी हो रहे शिथिलता,राजनीति और भ्रष्टाचार के आरोपितों पर आम तौर पर कोई कार्रवाई नहीं होती। बासठ साल में यहां तक पहुंच चुके हैं हम। फिर कैसे बचेगी हमारी आजादी? यह आजादी बड़ी कीमत देकर हासिल की गई हे। इसे हम सिर्फ पंद्रह अगस्त और 26 जनवरी को याद करके अपने कत्र्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। पर हमें इस बात की पड़ताल करनी होगी कि जिस देश के 99 प्रतिशत नेता बेईमान हैं और अनेक प्रभावशाली लोग इस देश को लूट कर विदेशों में पैसे जमा कर रहे हैं, उनके हाथों में आजादी कितनी सुरक्षित है?

(दैनिक जागरण के पटना संस्करण से साभार-15 अगस्त, 2009)

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

जस की तस धर दीनी चदरिया

‘जस की तस धर दीनी चदरिया।’डी.एन.गौतम जब आज रिटायर हो रहे हैं तो कबीर की उपर्युक्त उक्ति सहसा याद आ रही है।काश इस लोकतंत्र में अफसर के बदले नेता के लिए इस उक्ति का ं अक्सर इस्तेमाल करने का मुझे अवसर मिलता !ऐसा होता तो मुझे और भी अच्छा लगता।

बिहार के एक प्रमुख नेता ने गौतम के लिए इससे भी बेहतर बात कभी कही थी।वह बात कर्पूरी ठाकुर ही कह सकते थे।उन्होंने बिहार विधान सभा में कहा था कि के.बी.सक्सेना और डी.एन.गौतम जैसे अफसर गरीबों के लिए भगवान की तरह हैं।कर्पूरी ठाकुर के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि उन्होंने ‘तस की तस धर दीनी चदरिया।पर जस की तस चदरिया को धर देने के लिए जो जतन करना पड़ता है,वह जतन करते हुए मैंने कर्पूरी ठाकुर को करीब से देखा था।गौतम साहब से मेरा कोई खास हेल -मेल नहीं रहा। वे कोई प्रचार प्रिय हैं भी नहीं।पर, उनके बहादुरी भरे कामों पर मैंने उनके सेवा के प्रारंभिक काल से ही गौर किया है।पूत के पांव पालने में ही प्रकट हो गये थे।यदि कोई सरकार सड़क के किनारे- किनारे मजबूत नालियां भी बनवाना शुरू कर दे तो समझिए कि उसका मूल उददेश्य सिर्फ लूटपाट नहीं है।उसी तरह जिस अफसर की भ्रष्ट नेता और माफिया तत्व आलोचना करने लगंे तो समझिए कि वह अपना काम कर रहा है और उसे अपने वेतन मात्र पर ही संतोष है।

ईमानदार तो और कई लोग भी हैं जिन्हें मैं जानता हूं और कई ऐसे लोग भी होंगे जिन्हें मैं नहीं जानता।पर उनमें से अधिकतर निष्क्रिय ईमानदार ही हैं।सक्रिय ईमानदारी से ही जनता को लाभ मिलता है।निष्क्रिय ईमानदारी से खुद को संतोष मिलता है।डी.एन.गौतम की खूबी रही कि वे सक्रिय ईमानदार रहे।

इसीलिए वे अक्सर निहितस्वार्थियों के निशाने पर रहे।पर बिहार की जनता में वे किसी अच्छे नेता की तरह ही लोकप्रिय रहे।उत्तर प्रदेश के हमीर पुर जिले के मूल निवासी गौतम जी 1974 बैच के आई.पी.एस. हैं।उन्होंने एम.एससी.और पीएच.डी. भी किया है। पता नहीं कि वे रिटायर होने के बाद कहां बसेंगे ! यदि वे बिहार में रहते तो कई लोगों को प्रेरित करते रहते।सारण,मुंगेर और रोहतास जिले के एस.पी.के रूप में उन्होंने जिस तरह की कत्र्तव्यनिष्ठता दिखाई ,उससे इस राज्य के निहितस्वार्थी सत्ताधारियों को यह लग गया कि ऐसे अफसर को कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देनी खतरे से खाली नहीं हैं।इसीलिए जब नीतीश कुमार ने उन्हें गत साल पुलिस प्रधान बनाया तो अनेक लोगों ने मुख्य मंत्री की हिम्मत की दाद दी।ऐसा अफसर जो गलत काम कर ही नहीं सकता,उसे पुलिस प्रमुख बना कर बेहतर छवि वाले नीतीश कुमार ने अपनी छवि और भी निखारी।गौतम जी ऐसे अफसर हैं जो यदि किसी खास पद पर जाकर बहुत कुछ करामात नहीं भी कर सकें तो एक बात तो तय है कि जिस उंची कुर्सी पर वे बैठे,उसे घूस कमाने का जरिया तो नहीं बनने दे सकते।इसका भी असर नीचे तक कुछ न कुछ होता है।

पुलिस प्रमुख के रूप में देवकी नंदन गौतम का कुल मिलाकर कैसा अनुभव रहा,यह तो कभी बाद में वे बता सकते हैंे,पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि उनके खिलाफ उनकी सेवा अवधि के अंत -अंत तक ऐसा कोई अशोभनीय विवाद नहीं हुआ जिससे उनकी छवि को धक्का लगा हो।वह भी ऐसे समय में जब मनोनीत डी.जी.पी.आनंद शंकर को यह कहना पड़ रहा है कि पुलिसकर्मी वेतन पर ही संतुष्ट रहना सीखें।खुशी की बात है कि आनंद शंकर जी ने बीमारी न सिर्फ पकड़ी है,बल्कि उसका सार्वजनिक रूप से एजहार भी कर दिया है।पर, यह बीमारी उपर भी तो है।एक परिचित थानेदार ने कुछ साल पहले मुझे बताया था कि उसने अपने अब तक के सेवाकाल में दस एस.पी.के मातहत काम किया।पर एक डा.परेश सक्सेना को छोड़कर अन्य सभी नौ एस.पी.ने मुझे तभी थाना प्रभारी बनाया जब उन्हें रिश्वत दी गई।जिस राज्य में भ्रष्टाचार का यह हाल है,वहां डी.एन.गौतम को अपनी चदरिया जस की तस धर देने के लिए कितनी जतन करनी पड़ी होगी,इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

बिहार का सौभाग्य होगा यदि गौतम की तरह काम करने की कोशिश करने वाले दस -बीस आई.पी.एस.अफसर यहां मिलें।अपराध और भ्रष्टाचार से निर्णायक लड़ाई का इस राज्य में यह संक्रमण काल भी है।अगले कुछ समय में पता चल जाएगा कि किसकी जीत हुई।अभी भ्रष्ट तत्व तो नहीं,पर अपराधी जरूर दबाव में हैं।डी.एन.गौतम वैसे अफसरों के लिए प्रेरणा पुरूष साबित होंगे जो अफसर अपराधी और भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ मजबूती से उठ खड़े होंगे।इससे उनका इस लोक के साथ साथ वह लोक भी संवर जाएगा।गौतम ने जो पूंजी कमाई है,उसे भला कौन लूट सकता है ? घूसखोरी से बनी पूंजी को तो एक न एक दिन चोर-डकैत, ,विजिलंेस या फिर नालायक संतान द्वारा लूट लिए जाने से कम ही लोग बचा पाते हैं।यदि बचा भी पाए तो वे अपनी अगली कई पीढ़ियों को अपराध बोध की पूंजी जरूर दे जाते हैं।

हां,ईमानदारी से अपने काम करने के सिलसिले में तरह -तरह के कष्ट और तनाव जरूर होते हैं,पर उसके लिए गीता जैसी ‘ तनाव व दर्दनाशक दवा हमारे पूर्वजों ने हमें दे ही रखी है।इसी क्रम में गौतम साहब की सेवा अवधि से जुड़े कुछ संस्मरण यहां पेश हैं।सारण जिले से जब डी.एन.गौतम का समय से पहले तबादला कर दिया गया तो वे छपरा से पटना सड़क मार्ग से आ रहे थे।किसी ने तब मुझे बताया था कि जिसे भी पता चला कि गौतम साहब इस मार्ग से लौट रहे हैं तो वह सड़क के किनारे उन्हें देखने के लिए खडा हो गया।प्रत्यक्षदर्शी ने ,जो गौतम जी का स्वजातीय भी नहीं था,़बताया कि कई लोग उसी तरह रो रहे थे जिस राम के वनवास के समय अयोध्यावासी के रोने की चर्चा रामायण में है।इस घटना ने यह बात भी बताई कि बिहार में बड़े अपराधियों और उनके संरक्षक नेताओं से लड़कर उन्हें कमजारे कर देने की कितनी अधिक जरूरत जनता महसूस करती है।ऐसे ही तत्वों से तो लड़ते हुए गौतम साहब समयपूर्व तबादला ही झेलते रहे।

रोहतास और मुंगेर में भी यही हुआ।मुंगेर में 16 मई 1985 को डी.एन .गौतम ने एस.पी.का पदभार ग्रहण किया ।पर जब उन्होंने भ्रष्ट व अपराधी तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू की तो 9 जुलाई 1986 को उन्हें मुंगेर से हटा दिया गया।

दिलचस्प कहानी हजारीबाग पुलिस प्रशिक्षण कालेज में प्राचार्य के रूप में डी.एन.गौतम की तैनाती के बाद सामने आई।सन् 1994 की बात है।पटना में पहले से ही इस बात की चर्चा थी कि दारोगा की बहाली में इस बार घोर अनियमितता बरती जा रही है। आखिरकार नवनियुकत 1640 दारोगाओं ंको प्रशिक्षण के लिए हजारीबाग भेज दिया गया। इनमें से करीब चार सौ दरोगाओं को प्रशिक्षण कालेज में भर्ती करने से ही गौतम साहब ने साफ इनकार कर दिया। यह अभूतपूर्व स्थिति थी।क्योंकि गौतम के अनुसार वे दारोगा बनने लायक थे ही नहीं ।कुछ की तो निर्धारित मापदंड के अनुसार शरीर की उंचाई तक नहीं थी। इधर उन दारोगाओं को प्रशिक्षण दिलाना कई प्रभावशाली लोगों के लिए जरूरी था।इसीलिए आनन फानन में डी.एन.गौतम को प्राचार्य पद से हटाकर पटना पुलिस मुख्यालय में तैनात कर दिया गया।जो हो,इसी तरह राम राम कहते -कहते गौतम जी सेवा करते रहे।अब उनका ध्यान गीता और विवेकानंद की ओर अधिक जाए तो वह स्वाभाविक ही है।यह देश और प्रदेश ऐसे ‘मानव संसाधन’ की घोर कमी के कारण ही तो दुर्दशा को प्राप्त हो रहा है !

उनकी कत्र्तव्यनिष्ठता के लिए बिहार की ईमानदार जनता की ओर गौतम साहब को हार्दिक धन्यवाद।

प्रभात खबर / 31 जुलाई 2009 /से साभार