सोमवार, 9 अप्रैल 2018


1977 के चुनाव की निष्पक्षता  को लेकर जेपी भी थे आशंकित -- सुरेंद्र किशोर 
जनवरी, 1977 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने लोक सभा चुनाव की घोषणा कर दी ।उन्होंने कहा कि  मार्च में चुनाव होंगे ।
चूंकि उन्होंने इमरजेंसी को पूरी तरह समाप्त किए बिना  ऐसा किया था,इसलिए  
 प्रतिपक्षी दल  थोड़ी देर के लिए हतप्रभ हो गये थे।
क्योंकि प्रतिपक्ष चुनाव की निष्पक्षता को लेकर सशंकित था।
इमर्जेंसी की ज्यादतियों और धांधलियों के कारण सरकार पर प्रतिपक्ष का विश्वास नहीं था।
  जय प्रकाश नारायण से लेकर जार्ज फर्नांडिस तक 
ने आशंकाएं जाहिर की थी।जेपी के साथ मैंने जार्ज की चर्चा यहां इसलिए की क्योंकि जार्ज गैर अहिंसक तरीके से इमरजेंसी का विरोध कर रहे थे।
 गैर अहिंसक इसलिए  कि उनके भूमिगत अभियान में भी किसी की जान लेने की योजना नहीं थी।
 आपातकाल में तरह -तरह की सरकारी जोर जबर्दस्ती के कारण प्रतिपक्ष की आंशंकाएं निराधार नहीं थी।
बड़ौदा डायनामाइट षड्यंत्र मुकदमे के सिलसिले में देश द्रोह के आरोप में जेल में बंद जार्ज फर्नांडिस ने तो चुनाव के बहिष्कार के पक्ष में ही अपनी राय दे दी थी।हालांकि जनता पार्टी कौन कहे सोशलिस्ट घटक के भी अन्य नेता  जार्ज से असहमत थे।
बाद में जनता पार्टी ने जार्ज को मुजफ्फर पुर से उम्मीदवार बनाया और वे भी भारी मतों से जीते।
चुनाव की घोषणा के बाद प्रेस सेंसरशीप में ढिलाई जरूर दे दी गयी थी।
राजनीतिक बंदियों की रिहाई शुरू हो गयी थी।पर रिहाई की रफ्तार काफी धीमी थी।याद रहे कि 25 जून 1975 की रात में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो उसके साथ देश भर के करीब सवा लाख राजनीतिक कवर्यकत्र्ताओं-नेताओं तथा कुछ अन्य लोगों को किसी सुनवाई के बिना जेलों में ठूंस दिया गया था।कुछ पत्रकार भी बंदी बना लिए गए थे।
लोगों के मौलिक अधिकार कौन कहे,जीने का अधिकार भी छीन लिया गया था।
यानी प्रतिपक्षी दलों के पास  चुनावी  तैयारी के लिए समय बहुत कम था।पर जब चुनाव प्रचार शुरू हुआ तो जनता पार्टी के पक्ष में भारी जन समर्थन की खबरें सुदूर जगहों से आने लगीं।
 उससे पहले चुनाव की घोषणा के तत्काल बाद जय प्रकाश नारायण ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि 
‘सरकार सोचती है कि उसे चुनाव में बहुमत मिलेगा।
क्योंकि विरोधी दलों को चुनाव की तैयारी करने के लिए कोई समय नहीं दिया गया है। 
सत्तारूढ़ दल ने आपात स्थिति को पूर्ण रूप से समाप्त न करने और हजारों बंदियों को न छोड़ने 
से अपना इरादा स्पष्ट कर दिया है।
इसलिए यदि कांग्रेस जीत जाती है तो आगे क्या होगा, यह बात भी लोगों के सामने स्पष्ट हो जानी चाहिए।’
साथ ही मीडिया से बातचीत में तब के आंदोलन के शीर्ष नेता जेपी ने हालांकि यह
भी कहा कि ‘ लोगों को इतनी आसानी से धोखा नहीं दिया जा सकता है।उन्होंने कठिन रास्ते से यह सीख लिया है कि केवल प्रजातांत्रिक तरीके से ही गरीब लोगों के अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं।अधिकारों के दुरूपयोग से लोगों के मन में विरोध की भावना पैदा हो गयी है।इसी कारण उनकी सहानुभूति विरोधी दलों के साथ है।’
जेपी का यह अनुमान बाद में सही निकला था।
यानी  1977 के चुनाव  नतीजे ने इसे सही साबित कर दिया था।हालांकि उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में कांग्रेस को काफी अधिक सीटें मिली थीं।
  उधर चुनाव की घोषणा कर देने के तुरंत बाद इंदिरा गांधी ने रिक्त स्थानों को देखते हुए कांग्रेस संसदीय बोर्ड को पुनर्गठित किया।राज्यों को निदेश दिया कि वे उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश भेजें।
 प्रधान मंत्री की पहली चुनावी सभा कान पुर में हुई।बहुत बड़ी भीड़ थी।
 इंदिरा गांधी ने वहां लोगों से अपील की कि ‘मुझे उम्मीद है कि आप लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संगठनों को नष्ट करने वाली शक्तियों को प्रोत्साहित नहीं करेंगे।
क्योंकि ये शक्तियां आपकी कठिनाइयां बढ़ाएंगी।
प्रगति बाधित  करेंगी।’
उनका इशारा जेपी और नव गठित जनता पार्टी की ओर था।
 इस बीच चार गैर कांग्रेसी दलों यथा जनसंघ, संगठन कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय लोक दल ने मिल कर जनता पार्टी बना ली थी।
उससे पहले इन दलों के विलयन में  जब कुछ नेताओं ने अड़चन डालने की कोशिश की तो जेपी ने उन्हें चेताया कि यदि आप ऐसा करेंगे तो हम अलग दल बना लेंगे।
 फिर तो वे लाइन पर आ गए।
जनता पार्टी के अध्यक्ष मोरारजी देसाई और उपाध्यक्ष चरण सिंह उपाध्यक्ष चुने गए।युवा तुर्क चंद्रशेखर का गुट भी जनता पार्टी में शमिल हो गया था।
मेारारजी देसाई ने घोषणा की कि जनता पार्टी अच्छे उम्मीदवार खड़ा करेगी।उसका भरसक पालन हुआ।
जेपी ने लोगों से अपील की थी कि वे जनता पार्टी को उदारतापूर्वक दान दें ताकि चुनाव का खर्च उठाया जा सके।
पर इमरजेंसी से ऊबे अधिकतर मतदाताओं में जनता पार्टी के पक्ष में इतना अधिक उत्साह था कि जनता पार्टी का अधिकतर चुनावी खर्च आम जनता ने ही उठा लिया था।
  उस चुनाव में मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ सी.पी.आई.थी तो जनता पार्टी के साथ सी.पी.एम.और अकाली दल।जग जीवन राम के नेतृत्व वाली कांग्रेस फाॅर डेमोक्रेसी ने जनता पार्टी के साथ चुनावी तालमेल किया।
 बिहार में माक्र्सवादी समन्वय समिति के लिए जनता पार्टी ने धनबाद सीट छोड़ दी थी।
 जपा से टिकट न मिलने पर पूर्व रक्षा मंत्री जग जीवन राम ने अपनी समधिन सुमित्रा देवी को विद्रोही उम्मीदवार के रूप  में बिहार के बलिया संसदीय क्षेत्र से खड़ा कर दिया था।
सुमित्रा देवी को मात्र 31 हजार मत आए।वहां भी जपा उम्मीदवार कीजीत हुई थी।सुमित्रा देवी की जमानत जब्त हो गयी।इस नतीजे के साथ ही जगजीवन राम के समर्थकों का यह दावा भी खत्म हो गया कि चुनाव की घोषणा के बाद जग जीवन राम के कांग्रेस छोड़ने के बाद ही जनता पार्टी के
पक्ष में चुनावी हवा बनी।
याद रहे कि 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को लोक सभा की 295 और कांग्रेस को 154 सीटें मिलीं।
मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री बने।
सरकार ठीक-ठाक चल रही थी।पर जनता पार्टी के कुछ बड़े नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण मोरारजी सरकार अपना  कार्य काल पूरा नहीं कर सकी।  ़ 
@फस्र्टपोस्ट हिन्दी से साभार @


 इस साल उत्तर प्रदेश के बोर्ड परीक्षा केंद्रों पर जब सी.सी.टी.वी.कैमरे लगाए गए तो करीब 11 लाख परीक्षाथियों ने परीक्षा छोड़ दी।
  यदि कैमरे नहीं होते तो वे परीक्षा में बैठते।पास हो जाते।बाद का कोई शासक माक्र्स के आधार पर उन्हें शिक्षक बहाल कर देता ।फिर वे कैसी शिक्षा देते ?
 भर्ती संगठन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मौखिक इंटरव्यू में अनेक एम.बी.बी.एस.डाक्टर्स तक सामान्य प्रश्नों का भी जवाब नहीं दे पा रहे हैं।
एक्सपर्ट के रूप में बोर्ड में बैठे बुजुर्ग डाक्टर अपना सिर पीट रहे हैं।हालांकि सारे डाक्टर उम्मीदवार अयोग्य नहीं हैं।
पर ,जो अयोग्य हैं,उन्हीं में से भी डाक्टर बहाल होंगे।क्योंकि देश में डाक्टरों की भारी कमी है।यदि इंटरव्यू के समय सी.सी.टी.वी. कैमरे होंगे तो अयोग्य उम्मीदवारों का चयन करने  की हिम्मत किसी को नहीं होगी।
 सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है ? मैं किसी खास राज्य या खास मेडिकल काॅलेज का नाम नहीं ले रहा हूं।देश की अधिकतर जगहों में एक ही हाल है।
 पता लगाइए कि एम.बी.बी.एस.कक्षाओं में कितने छात्र उपस्थित हो रहे हैं ?वहां कितनी सुविधाएं हैं ?
क्या वहां  परीक्षाएं भी कदाचार मुक्त हो रही हैं ?
क्या मेडिकल परीक्षाओं में भी कदाचार सहनीय है ?
देश के गरीब मरीजों को हम कैसे -कैसे डाक्टरों के हवाले सौंप रहे हैं ? आखिर सरकारी अस्पतालों में तो आम तौर पर गरीब मरीज ही तो जाते हैं।
पैसे वालों के लिए तो बड़े -बड़े निजी अस्पताल हैं जहां अपेक्षाकृत बेहतर डाक्टर होते हैं।मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सरकारी अस्पतालों में सारे डाक्टर अयोग्य हैं।पर यदि दो -चार भी अयोग्य हैं तो उनके हवाले मरीजों को क्यों किया जाए ?
उसी तरह नियोजित शिक्षकों में सारे अयोग्य नहीं हैं ।पर क्या सभी योग्य हैं ?
जब बहाल हुए थे तो उन्होंने यह शत्र्त नहीं मानी थी कि उनकी बाद में टेस्ट परीक्षा होगी ?
पर बाद मंे उन्होंने  टेस्ट परीक्षा के विरोध में पटना में हिंसक प्रदर्शन क्यों किया था ?
उनके प्रदर्शन में बड़े -बड़े शिक्षक नेता भी शामिल थे।आखिर हम देश को कहां ले जा रहे हैं ?
नयी पीढि़यों का हमेें ध्यान  क्यों नहीं है ?बेहतर करने की हर कोशिश का विरोध क्यों ? कुछ बातें कटु होती हैं।पर देशहित में आलोचना व अपमान सहने की कीमत पर भी कही जानी चाहिए।
  

शनिवार, 7 अप्रैल 2018


---आरक्षण पर अपना रिकाॅर्ड ठीक करने में भाजपा को लग रहा समय---
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ठीक ही कहा है कि ‘केंद्र सरकार  अनुसूचित जाति -जन जाति  के लिए आरक्षण  को न तो रद करेगी न ही किसी को ऐसा करने देगी।’
   चाहे पिछड़ों का आरक्षण हो या एस.सी.-एस.टी. का, कोई उसे समाप्त नहीं कर सकता।
हां,उसमें कुछ संशोधन जरूर हो सकता है।वह भी इस बात का ध्यान रखते हुए कि उससे  आरक्षित समुदाय को कोई नुकसान नहीं हो।बल्कि लाभ ही हो।
 पर जब कुछ भाजपा नेता और संघ के पदाधिकारी यह बयान देते हैं कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए तो आरक्षित समुदाय के लोगों के कान खड़े हो जाते हैं।
भले वे बाद में सफाई दें कि उनके बयान का गलत अर्थ  लगाया गया।पर अनेक लोगों को उस सफाई पर विश्वास करना कठिन होता है।
कई लोगों को 1978 और 1990 के साल याद आ जाते हैं।
वी.पी.सिंह की सरकार ने जब मंडल आरक्षण लागू किया तो भाजपा ने किसी और बहाने सरकार गिरा दी। उन दिनों एक बड़े भाजपा नेता ने स्वीकारा भी था कि यदि मंडल नहीं होता तो मंदिर आंदोलन भी नहीं होता।
 1979 में जब बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार गिरी तो आरोप लगाया गया कि वैसा इसलिए हुआ क्योंकि 1978 में कर्पूरी सरकार ने पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू किया था।वैसे सरकार गिराने का कारण कुछ और  बताया गया।यह सच है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने तब  बिहार के उन भाजपा विधायकों को  समझाया था कि आप लोग आरक्षण का विरोध न करें। इसके बावजूद धारणा यह बनी कि भाजपा आरक्षण के विरोध में है।सब तो अटल जैसे थे नहीं।
  बिहार और उत्तर प्रदेश विधान सभा पिछले चुनावों के अवसर पर  संघ के दो बड़े नेताओं ने बारी- बारी से  आरक्षण की समीक्षा करने की जरूरत बता दी थी।बिहार में तो उसका काफी विपरीत चुनावी प्रभाव भाजपा पर पड़ा।
 अब जब एस.सी.-एस.टी कानून को लेकर विवाद चल रहा है तो कुछ लोगों को यह कहने का मौका मिल गया है कि भाजपा आरक्षण समाप्त करना चाहती है।हालांकि यह आरोप  गलत बिलकुल है।
पर, सवाल है कि यह आरोप भाजपा पर  क्यों लगता है ? 
इस सवाल को ध्यान में रखते हुए इस मामले में भाजपा को अपना रिकाॅर्ड ठीक करना होगा।
कम से कम भाजपा अपने नेताओं को कड़ा निदेश दे कि वे आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर  लापारवाही से कोई  बयान न दंे।
--गलत शिकायत पर सजा कम--
आई.पी.सी.की धारा-182 के तहत  सिर्फ छह माह की सजा का प्रावधान है।
अब जब कि एस.सी.-एस.टी.कानून के दुरूपयोग की शिकायतेंंे मिल रही हैं तो धारा-182 में सजा की अवधि बढ़ाना समय की मांग है।
धारा-182 में  गलत शिकायत की चर्चा की गयी है।
2007 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्य मंत्री मायावती ने पुलिस को निदेश दिया था कि एस.सी.-एस.टी. एक्ट का  दुरूपयोग पाए जाने पर वे धारा -182 का इस्तेमाल करें।
---रिटायर सैन्य अधिकारियों की तैनाती--
बिहार के विश्व विद्यालयों में रजिस्ट्रार के रूप में पूर्व सैन्य 
अधिकारियों  की तैनाती से एक उम्मीद बंधी है।उम्मीद बेहतरी की है।
सत्तर के दशक में जब बिहार बिजली बोर्ड के अध्यक्ष के पद पर रिटायर ब्रिगेडियर कोचर को तैनात किया गया तो काफी फर्क आया था।
उससे पहले बोर्ड के बारे में यह कहावत प्रचलित थी कि एक बार वहां के ट्रांसफरमर को बड़ी मछली खा गयी थी।
  दरअसल हुआ यह कि गंगा में नाव पर लाद कर ट्रांसफरमर उत्तर बिहार भेजा गया।नाव उलट गयी।
ट्रांसफारमर पानी में ।निकालने की कोशिश की गयी।बोर्ड की कोशिश सफल नहीं हुई।लगा कि ट्रांसफरमर मछली खा गयी।
दरअसल ट्रांसफरमर की खरीद कागज पर हुई थी।उसे कागज पर ही मछली को खिला भी दिया गया था।
पत नहीं यह कहानी सही है या नहीं,पर संभव है कि भ्रष्टाचार के पराकाष्ठा पर पहुंचने पर ऐसी -ऐसी कहानियां गढ़ भी ली जाती है।
पर पद संभालने के बाद कोचर ने कुछ ही दिनों में   ऐसी कहानियों पर विराम लगा दिया था।
विश्व विद्यालयों में तो वित्तीय के अलावा  कई अन्य समस्याएं अधिक गंभीर हैं।
उम्मीद है कि विश्व विद्यालयों में तैनात होने पर पूर्व सैन्य अधिकारियों को किसी दबाव में हटाया  नहीं जाएगा।
--पत्रकारों की आवास समस्या---
पटना में जब  राजेंद्र नगर ,लोहिया नगर तथा अन्य व्यवस्थित मुहल्ले बसे तो वहां अन्य लोगों के साथ -साथ पत्रकारों को भी जगह दी गयी।
पर अब जब गर्दनीबाग को नये ढंग से विकसित किया जा रहा है तो वहां पत्रकारों के लिए कोई गंुजाइश नहीं रखी गयी है।
प्रस्तावित गर्दनी बाग मुहल्ले में लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों के
आवास की सुविधा रेगी, वहां सिर्फ मीडिया के लिए कोई जगह नहीं होगी।
 बिहार सरकार इन दिनों  पत्रकारों के लिए पेंशन और स्वास्थ्य बीमा का प्रबंध तो कर रही है,पर उनकी आवास समस्या उपेक्षित है।पिछले कई दशकों से  सरकार की ओर से पत्रकारों की आवास समस्या हल करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया।
यहां तक कि जिन दर्जनों पत्रकारों ने राज्य आवास बोर्ड की महतवाकांक्षी दीघा आवास योजना के लिए पैसे जमा किए थे,उन्हें भी लाल झंडी दिखा दी गयी।  
 ---राजनीति के मैदान में एम्बुलेंस नहीं होता---
किसी ने पूछा कि राजनीतिक जीवन और सामान्य जीवन में 
क्या-क्या  फर्क हंै ?
एक भुक्त भोगी नेता ने यह जवाब दिया--
यदि आप सामान्य जीवन में दुर्दिन में पड़े किसी व्यक्ति को सौ रुपए की भी मदद कर दें तो वह जिंदगी भर याद रखेगा।
 पर दूसरी ओर राजनीति में यह भी देखा गया है कि किसी को कोई नेता अपनी कृपा से पी.एम., सी.एम.,मंत्री,सांसद,विधायक भी बना दें तौभी वह किसी दिन उसका  कट्टर विरोधी बन सकता है।यानी न तो उपकार का भाव और न ही  लाज-शर्म के लिए कोई स्थान !
वास्तविक युद्ध के मैदान में तो एम्बुलेंस होता है,किंतु राजनीतिक लड़ाई के मैदान में एम्बुलेंस भी नहीं होता। 
 ---एक भूली -बिसरी याद----
11 अप्रैल 1974 को जय प्रकाश नारायण ने  प्रेस बयान दिया था।
वह इस प्रकार है-
‘मैं श्री राज नारायण के लखनऊ से प्रकाशित इस वक्तव्य से हैरान हूं कि उनकी राय में मुझे भारत का अगला राष्ट्रपति होना चाहिए।
मैं नहीं जानता कि हितैषी मित्र भी मुझे जब तब अपमानित करने पर क्यों तुल जाया करते हैं ?
कभी मंै राष्ट्रपति बनने लगता हूं ,कभी सब विरोधी दलों का नेता होने लगता हूं।
  दीखता है कि जो पार्टी और सत्ता राजनीति में डूबे हुए हैं 
,वे केवल पार्टी, सत्ता, पद और चुनाव की ही भाषा समझते हैं।
वे यह समझने में सर्वथा असमर्थ प्रतीत होते हैं कि इस सब के बाहर भी खड़े होकर कोई व्यक्ति अपने राष्ट्र की और जनता की सेवा कर सकता है और पदों को ललचाई निगाह से न देखने में कृतकृत्य अनुभव कर सकता है।
 आशा करता हूं कि मेरे मित्र और शत्रु दोनों ही अटकलें लगाना और उम्मीदें रखना हमेशा के लिए छोड़ देंगे कि  ,कितना ही बड़ा क्यों न हो कोई भी पद पाने को या सत्ता या पार्टी की राजीति में फिर घुसने को मैं उत्सुक होऊंगा या राजी किया जा सकूंगा।
पद या पार्टी की राजनीति करने वाले यह समझने में भी असमर्थ जान पड़ते हैं कि पद और पार्टी की राजीति की अपेक्षा विशालतर और व्यापकत्तर अर्थ रखने वाली भी एक राजनीति होती है।
1954 में जिस दिन मैंने पार्टी और सत्ता से आजीवन निर्लिप्त 
रहने की घोषणा की थी, उसी दिन  मैंने यह स्पष्ट कर दिया था कि राष्ट्र के राजनीतिक जीवन में मेरा कर्ममय सहयोग जारी रहेगा।इसे छोड़ देने का मेरा कोई इरादा नहीं है।’ 
       ----और अंत में---
मध्य प्रदेश में पांच हिन्दू संतों को राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया है।इस पर आलोचनाएं हो रही हैं।
इन्हें तो सिर्फ दर्जा दिया गया है। सन 1977 में तो  हिन्दू संत पवन दीवान बाजाप्ता मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए थे।
अरे भई, जब समाज के लगभग हर अन्य तबके के लोग इस देश मेें सत्ता व विधायिकाओं में हिस्सेदारी पा ही रहे हैं तो  संत ही पीछे क्यों रहें ! हर तबके यानी उजाले की दुनियां से लेकर अंधेरे की दुनियां तक के लोग । 
@ 6 अप्रैल, 2018 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

डा.भरत झुनझुनवाला ने लिखा है ------ 
‘सन् 1000 के बाद महमूद गजनी ,मुगल एवं ब्रिटिश लोगों ने हम पर धावा बोला और हमें परास्त किया।
विचार योग्य है कि 1000 ई.के आसपास ऐसा क्या हुआ कि 4000 वर्षों से समृद्ध सभ्यता अचानक अधोगामी हो गयी ?
ऐसा प्रतीत होता है कि शंकर के दर्शन के गलत प्रतिपादन के कारण यह हुआ।
शंकर के समय को लेकर विद्वानों में विवाद है।कुछ का मानना है कि वे 800 ई. के आसपास हुए,दूसरे विद्वानों का मानना है कि वे इससे बहुत पहले हुए थे।लेकिन इस विवाद में पड़े बिना कहा जा सकता है कि 800 ई.के आसपास आदि शंकर ने इस धरती पर भ्रमण किया था।
  उपलब्ध विषय के लिए शंकर का मुख्य मंत्र है, ‘ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या’।
शंकर ने सिखाया कि यह जो संपूर्ण जगत दिख रहा है ,यह एक ही शक्ति के विभिन्न रूपों में प्रस्फुटन है।
मनुष्य स्वयं भी उसी एक ब्रह्म का स्वरूप है।अतः मनुुष्य को चाहिए कि सांसारिक प्रपंचों में लिप्त होने के स्थान पर उस एक ब्रह्म से आत्मसात करे।तब उसे वास्तविक सुख की प्राप्ति होगी।
ब्रह्म से आत्मसात करने पर व्यक्ति ब्रह्म की इच्छानुसार व्यवहार करेगा जैसे ंनौकरी करने पर व्यक्ति मालिक की इच्छानुसार व्यवहार करता है।’............
‘जब देश पर आक्रमण हो रहे थे ,ये अनुयायी कंदराओं में बैठकर ब्रह्म से एका कर रहे थे।..जगत का गरीब मरता है तो मरने दो,इससे विचलित होने की आवश्यकता नहीं है।
इसी कड़ी में आज देश के नेताओं के लिए सिर्फ अपने हित को साधना स्वीकार हो गया है,उन्हें राष्ट्र दिखाई नहीं दे रहा है।’ @30 जुलाई 2013@


सोमवार, 2 अप्रैल 2018

 भाजपा सांसद और पूर्व मुख्य मंत्री रमेश पोखरियाल तथा उनकी बिटिया डा.श्रेयसी निशंक बधाई के पात्र हैं।
श्रेयसी ने विदेश की नौकरी का लोभ छोड़कर भारत मेें काम करना स्वीकार किया और वह भी सेना में।बतौर कप्तान आर्मी मेडिकल कोर ज्वाइन किया है।  
दूसरी ओर आज इस देश का शायद ही कोई नेता चाहता है कि उनकी संतान सेना में नौकरी करे जबकि देश पर कई तरफ से खतरा है। किसी बड़े नेता की संतान सेना में हो तो उसकी  जानकारी  जरूर दीजिएगा।उन्हें भी धन्यवाद दे दूंगा।
दूसरी तरफ अधिकतर नेतागण आज  यह जरूर चाहते हंै कि उनकी संतान को 25 की उम्र होते ही एम.पी.-एम.एल.ए.का टिकट मिल जाए और उसके बाद सत्ता की बड़ी से बड़ी मलाईदार कुर्सी।
इस उपलब्धि के लिए वे न सिर्फ पार्टी का त्याग करने को तैयार रहते हैं बल्कि उन  मूल्यों का भी जिनके पालन करने का वे दावा करते कभी नहीं थकते थे।
जब समाज को दिशा देने का दावा करने वालों का यह हाल है कि आम भारतीयों का क्या ?
नतीजतन आज भारतीय सेना में अफसरों की भारी कमी हो रही है।


सेंट्रल डायरेक्ट टैक्स बोर्ड यानी सी.बी.डी.टी.ने 11 सितंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि वह कम समय में बेहिसाब संपत्ति बनाने वाले 7 लोक सभा सासंदों की जांच करेगा।
बोर्ड ने यह भी बताया था कि 42 विधायकों की संपत्ति की जांच पहले से ही हो रही है।
  इस बात के कहे सात माह हो गए।
बोर्ड ने अब तक इस दिशा में आगे क्या किया ? कुछ किया तो सुप्रीम कोर्ट को बताया ? कायदे से तो देश को बताना चाहिए कि उनके प्रतिनिधि कितनी सेवा कर रहे हैं और कितना  मेवा खा रहे हैं ? 
 सवाल है कि  क्या जिन सांसदों की संपत्ति 500 प्रतिशत बढ़ जाएगी,उसी की जांच होगी ?कम बढ़ने पर नजरअंदाज कर दिया जाएगा ?
तथ्य तो यह है कि लोक सभा के 26 , राज्य सभा के 11 और विधान सभाओं के 257 सदस्यों ने दो चुनावों के बीच जायज आय से अधिक संपत्ति बनाई है।जांच तो सबकी होनी चाहिए।  
 @ 2 अप्रैल 2018@

परीक्षाआंे में कदाचार के लिए अभी बहुत ही हल्की सजा का प्रावधान है।
इसे तुरंत बदला जाना चाहिए।अत्यंत कठोर सजा का प्रावधान 
समय की मांग है।क्योंकि अब तो पूरे देश में अधिकतर परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक हो रहे हैं और कदाचार हो रहे हंै।मेडिकल सहित लगभग सारी परीक्षाओं का यही हाल है।अपवादों की बात और है।इस तरह की परीक्षाएं पास कर कोई डाक्टर मरीजों की जान बचाएगा या उसकी हत्या करेगा ?