रविवार, 10 जून 2018

​पानी की टंकी भी साथ ले गए थे नेताजी

अब तक मैं समझता था कि छोड़ते समय सरकारी बंगलों को नोंचने में हमारे बिहार के नेता ही आगे रहे हैं। पर उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने जब हाल में बंगला खाली किया तो मेरा विचार बदल गया।

लखनऊ के उस बंगले को तो इस तरह नोचा-खरोंचा गया है कि उसकी याद दशकों तक रहेगी। अस्सी के दशक में मैं एक पत्रकार -सह -एम.एल.सी. के यहां गया था। उनके सरकारी मकान में दीवाल और छत को छोड़कर लगभग सारी चीजें उखाड़ ली गयी थीं। यहां तक कि बिजली की फिटिंग्स भी। उस सरकारी घर को जिस निवर्तमान विधायक ने खाली किया था, वे प्रगतिशील पार्टी के सदस्य थे।

बाद के वर्षों में तो एक पीठासीन अधिकारी ने मुझे बताया कि उनके सदन के एक निवर्तमान सदस्य सरकारी मकान खाली करते समय पानी की दो टंकियां भी अपने साथ लेते गए ताकि उन्हें वे अपने निजी घर में लगा सकें।

अखिलेश बंगला : जैसे विदेशी लुटेरे ने बेरहमी से लूटा हो ...

सपा के एम.एल.सी. सुनील यादव ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के कहने पर अखिलेश जी के बंगले में तोड़फोड़ हुई है।

उधर उस टूटे- फूटे बंगले की वीडियो रिकॉर्डिंग को कुछ देर के लिए  यह लगता है कि किसी विदेशी लुटेरे की बेरहम लूट की तरह ही भारत की इस संपत्ति को नष्ट-भ्रष्ट किया गया है। मानो इस महल में किसी गड़े खजाने की खोज हो रही हो!

दरअसल यह सब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के परिणामस्वरूप सामने आया है। यदि सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा आदेश नहीं दिया होता तो न तो पूर्व मुख्यमंत्री लोग सरकारी आवास खाली करते और न ही अपनी खींझ बंगले पर उतारते। पता लगाया जाना चाहिए कि किसी अन्य पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले से भी कोई सामान गायब हुआ है या नहीं।

यह तोड़फोड़ दरअसल सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मुंह चिढ़ाने के लिए की गयी है। यह अदालत की अवमानना है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि एक विशेष जांच दल बनाकर इसकी जांच कराए। साथ ही सपा नेता सुनील यादव के आरोप की भी जांच हो कि इसमें मुख्यमंत्री या उनके अफसरों का तो कोई हाथ नहीं !

जांच से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

अन्यथा सुप्रीम कोर्ट को भविष्य में ऐसा कोई आदेश देने के पहले सोच लेना चाहिए ताकि सरकार यानी जनता के 48 करोड़ रुपए का नुकसान न हो। या फिर सुप्रीम कोर्ट अगली बार से अदालत के कमिश्नर की निगरानी में ऐसे बंगले खाली कराए ताकि कोई राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उस नेता को बदनाम न कर सके जैसा आरोप अखिलेश यादव लगा रहे हैं। 

10 जून 2018

शुक्रवार, 8 जून 2018

भारत के ये भ्रष्ट गिद्ध अफसर, हिन्दू शरणार्थियों से लेते हैं घूस


केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक वरीय सचिवालय सहायक को हाल में जोधपुर के एक होटल से गिरफ्तार किया गया। उसपर पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों से रिश्वत लेने का आरोप है।

मनमोहन सरकार ने पाक में ‘जेहादियों’ के सितम से परेशान होकर भारत में आए 12 हजार 100 हिंदू शरणार्थियों को लंबी अवधि के लिए वीसा दिया था। वे राजस्थान में बसे हुए हैं। तब से यह काम जारी है। क्योंकि नये शरणार्थी भी आते रहते हैं। इसके लिए केंद्र सरकार के अफसर राजस्थान जाते रहते हैं। उनमें से कुछ अफसर उन दीन-हीन-बेबस-परेशान शरणार्थियों का काम भी तभी करते हैं जब उन्हें रिश्वत मिलती है।

इन भ्रष्ट गिद्धों को किस्मत के मारे शरणार्थियों पर भी कोई दया नहीं आती। जब उनपर भी दया नहीं आती तो यहां के लोगों के साथ ये गिद्धगण कैसा व्यवहार करते हैं, उनकी कल्पना आसान है। लोगबाग देख ही रहे हैं। झेल भी रहे हैं। दरअसल इस पूरे देश भर के भ्रष्ट अफसरों व कर्मचारियों का कमोवेश यही हाल है। अधिकतर सरकारी सेवक, सेवा को अधिकार मानकर सरकारी आदेशों को बेचते रहते हैं।

बिहार सहित देश के किस हिस्से के अधिकारी-कर्मचारी बिना रिश्वत का जनता का काम निःशुल्क कर देते हैं, यह जानने में मुझे रुचि रहती है।
किसी को उस पवित्र स्थान का पता हो तो लोगों को जाकर वहां फूल चढ़ाना चाहिए। क्योंकि मैं मानता हूं कि ईमानदार अफसर व कर्मचारी अब भी जहां -तहां मौजूद हैं। सत्ताधारी नेताओं के बीच भी कुछ ईमानदार लोग हैं। पर वे आम तौर पर निर्णायक नहीं हो पा रहे हैं।

जोधपुर की घटना सुन-जानकर एक बार फिर यह विचार मन में आया कि क्यों नहीं इस देश के आदर्शवादी और उत्साही नौजवान अखिल भारतीय स्तर पर स्टिंग आपरेशन दस्ते बना रहे हैं ? वे दस्ते ऐसे भ्रष्ट कर्मियों का स्टिंग करें और जनता के बीच उनका भंडाफोड़ करें? अब तो सोशल मीडिया भी ताकतवर होता जा रहा है।

इस काम में खतरा तो जरूर है। पर आज यदि कोई ईमानदारी से राजनीति भी करता है तो उसमें भी खतरा है। आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं की हत्याओं की खबरें भी मिलती रहती हैं। फिर भी सूचना के अधिकार के क्षेत्र में काम बंद नहीं हुआ है। 

आजादी की लड़ाई के दिनों में क्या स्वतंत्रता सेनानियों के समक्ष कम खतरे थे ? मेरा मानना है कि इस स्टिंग आपरेशन के काम में जो लोग ईमानदारी से लगेंगे और बने रहेंगे तो उन्हें देर- सवेर जनता हाथों- हाथ लेगी। यदि वे चुनावी राजनीति भी करना चाहेंगे तो वंशवादी, जातिवादी, सम्प्रदायवादी तथा धन पशु उम्मीदवारों को भी देर -सवेर वे मात दे सकते हैं। 

गुरुवार, 7 जून 2018

नमक से खतरा

‘आक्सीजन मूवमेंट’ के विनोद सिंह चीनी के खिलाफ अभियान चला ही रहे हैं। मैं आज नमक के बारे में कुछ लिखूंगा।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने गत साल एक अध्ययन रपट जारी की थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के हवाले से एसोसिएशन ने कहा था कि ‘भारतवासियों की अधिकतम सीमा प्रति दिन पांच ग्राम नमक खाने की है। पर वे दोगुनी मात्रा में नमक का सेवन करते हैं। इससे शरीर में सोडियम की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच जाती है।

इसका सीधा असर ब्लड प्रेशर पर पड़ता है। सोडियम की मात्रा बढ़ने से दिल की बीमारी, हृदयाघात और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। मोटापा और किडनी फेल होने की समस्या भी बढ़ जाती है।

घर की रसोई में मौजूद हिंग, काली मिर्च, जीरा, अदरख और लहसुन के इस्तेमाल को बढ़ाकर नमक के प्रयोग को कम किया जा सकता है।’

(मुझे यह लिखने का अधिकार भी है क्योंकि मैं आम तौर पर रात के भोजन में नमक का इस्तेमाल नहीं करता--यानी सिर्फ दूध-रोटी। अब तो  आम का भी मौसम आ गया है।’) 

‘वन नेशन, वन पोल’ लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ

उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘वन नेशन, वन पोल’ के प्रधानमंत्री के प्रस्ताव पर अपनी सहमति प्रदान कर दी है। ऐसी सहमति देने वाला देश का यह पहला राज्य है। सबसे बडे़ राज्य की सरकार में सर्वाधिक उदारता।

राज्य सरकार चाहती है कि देश में लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ हों। 1967 तक ऐसा ही होता था।

याद रहे कि अलग -अलग चुनाव होने से इस गरीब देश के काफी पैसे बेवजह बर्बाद होते रहते हैं। अपने जरूरी काम छोड़कर प्रशासन व पुलिस उन चुनावों में लगे रहते हैं। राजनीतिक दलों को अधिक कारपोरेट चंदा बटोरना पड़ता है। जो कारपोरेट अधिक चंदा जो देगा, वह देश का उतना ही अधिक शोषण करेगा। वैसे भी लगभग सभी दलों ने अनावश्यक रूप से चुनाव का खर्च बहुत बढ़ा लिया है। उसके बिना भी काम चल सकता है।

हां, अलग -अलग चुनाव होते रहने से कई नेताओं को जरूर निजी फायदा होता है। अधिक बार चंदा वसूली यानी उसे चंदे में से अपने लिए निकाल लेने की अधिक गुंजाइश। 

कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि एक साथ चुनाव होने से राज्य के मुद्दे गौण हो जाएंगे। वे यह बात भूल जाते हैं कि 1957 में केरल में कम्युनिस्ट सरकार बन गयी थी जबकि देश में कांग्रेस की ही सरकार थी। 1967 के चुनाव के बाद सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं जबकि केंद्र में कांग्रेसी सरकार।

बिहार में कांग्रेस को लोकसभा की आधी से अधिक सीटें मिलीं जबकि विधानसभा में आधी से कम। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आम मतदाता अधिक होशियार हैं। बिहार में 1965-66 में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जितना बड़ा आंदोलन हुआ था, उतना बड़ा आंदोलन केंद्र सरकार के खिलाफ नहीं हुआ। 

1974-75 में जब बिहार व केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन हुआ तो 1977 के चुनाव में दोनों सरकारें चली गयीं। ऐसे उदाहरण अन्य राज्यों के संदर्भ में भी मिल सकते हैं।

मंगलवार, 5 जून 2018

जानलेवा प्लास्टिक

ब्रिटिश संसद के बारे में कहावत है कि वह स्त्री को पुरूष और पुरूष को स्त्री बनाने के अलावा हर काम कर सकती है।

पर क्या भारत की सरकारें इतनी दब्बू हैं कि वे जानलेवा प्लास्टिक के उत्पादन पर प्रतिबंध भी नहीं लगा सकतीं ? या यदि प्रतिबंध है तो उसे लागू भी नहीं कर सकतीं ?

सरकारी रिश्वत -तंत्र पर अब तक का सबसे बड़ा हमला होगा !

कल्पना कीजिए कि जिला परिवहन कार्यालय का कोई दूत आपके दरवाजे पर जाकर कहे कि ‘लीजिए अपना ड्राइविंग लाइसेंस, जिसके लिए आपने आवेदन किया था।’ उस समय आपको कैसा लगेगा ?

जाहिर है कि उसे आपके घर आकर देना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में  रिश्वत की चर्चा नहीं होगी। अभी तो ऐसा माना ही जाना चाहिए। सरकार का उद्देश्य भी यही है। शायद आपको यह कल्पना लोक की बात लगेगी। पर दिल्ली सरकार ने इसी जुलाई से ऐसा ही करने का निर्णय किया है।

न सिर्फ ड्राइविंग लाइसेंस बल्कि इस तरह की 39 अन्य सरकारी सेवाएं आम लोगों के दरवाजे तक पहुंचेंगी। अगले फेज में अन्य सेवाएं भी इससे जुड़ेंगी। यदि सफल हुई तो यह पहल अन्य राज्यों के लिए नमूना बन सकती है।

अब देखना है कि इस निर्णय को दिल्ली सरकार कितनी सफलता से लागू करा पाएगी ! क्योंकि यह सरकारी रिश्वत -तंत्र पर अब तक का सबसे बड़ा हमला होगा। उस तंत्र के लोग इस देश में बहुत ताकतवर हैं। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से भी अधिक ताकतवर। 

यह प्रस्ताव जब केजरीवाल सरकार ने गत साल उप राज्यपाल को भेजा तो उन्होंने इस पर फिर से विचार करने के लिए कहा। कहा कि इनमें से 35 सेवाएं तो पहले से ही ऑनलाइन उपलब्ध हैं। पर राज्य सरकार ने दोबारा भेजा तो उन्होंने मंजूरी दे दी।

अब होम डिलवरी के लिए प्राइवेट पार्टी का चयन हो रहा है। फिलहाल जो सेवाएं मिलेंगी, उनमें जाति प्रमाण पत्र, जन्म, मृत्यु प्रमाण पत्र, विवाह निबंधन, आय, आवास प्रमाण और वृद्धावस्था पेंशन आदि।