मंगलवार, 16 अप्रैल 2019


‘प्रभात खबर’ ने लिखा है कि ‘बिहार की 40 सीटों 
में से  26 सीटों पर वंशवाद हावी है।
इन सीटों पर सत्ता के दोनों दावेदार गठबंधनों ने ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है जिनके सगे संबंधी पहले से ही राजनीति में रहे हैं।उम्मीदवारों के रूप में देखा जाए तो इनकी संख्या 29 पहुंच जाएगी।’
मुझे लगता है कि दो -चार आम चुनावों के बाद सभी 40 सीटों पर वंशवादी ही मुख्य उम्मीदवार रहेंगे।पूरे देश का भी लगभग यही हाल हो सकता है।
अधिक दिन नहीं लगेंगे जब वंशवादी उम्मीदवार ही हारेंगे और वंशवादी उम्मीदवार ही जीतेंगे।
इस लोकतंत्र का स्वरूप ऐसा ही बनना था तो दरभंगा महाराज ही क्या बुरे थे ! अखबार-कारखाने आदि खोल कर न जाने कितने सौ लोगों को दरभंगा राज ने नौकरियां दी थीं।
डुमरांव महाराज , बेतिया राज परिवार , कुरसैला इस्टेट, टेकारी राजा ........आदि आदि !!!!!!!!! को भी याद कर लीजिए और आज के नए राजाओं को भी देख लीजिए।
धन संपत्ति,रोबदाब,निजी संतरी, हावभाव, ऐशो आराम ,दिखावटी बातों में कितना अंतर रह गया है ? 
  इस बीच डा.जगन्नाथ मिश्र कहते  हैं कि ‘....पहले दलों में प्रतिबद्ध कार्यकत्र्ता मिलते थे।अब सबको पारिश्रमिक चाहिए।’
@--हिन्दुस्तान-19 मार्च 2019@
इसका कारण भी डाक्टर साहब से अधिक भला और कौन जान सकता है ?
पहले कार्यकत्र्ताओं के बीच से भी एम.पी.,एम.एल.ए.,एम.एल.सी. के उम्मीदवार  बनाए जाते थे।
अब जब विधायक -सांसद,खास -खास  खानदानों  से ही बनेंगे तो फर्क तो आएगा ही ?
जीवन भर सिर्फ कार्यकत्र्ता बने रहने के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता की उम्मीद क्योें ?
वैसे भी अपवादों को छोड़कर राजनीति जब व्यापार हो जाए और अनेक बड़े नेताओं की निजी संपत्ति का विवरण देखकर भ्रम हो जाए कि यह किसी निजी कारखाने की खाताबही  तो नहीं हैे तो फिर सिर्फ कार्यकत्र्ताओं से ही प्रतिबद्धता की उम्मीद क्यों  ?

      

रविवार, 14 अप्रैल 2019

यासीन मलिक से हरिंदर बवेजा की एक पुरानी बातचीत
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प्रश्न-आपने भारतीय वायु सेना के पांच अफसरों की हत्या और रुबाइया सईद का अपहरण इसलिए किया कि हालात की मांग थी ?
उत्तर-हां,मैंने बंदूक उठाकर कई वारदातों में हिस्सा लिया।यह वक्त की जरूरत थी।
प्रश्न-आपने बेगुनाहों का कत्ल किया ?
उत्तर-ये अफसर मासूम नहीं थे।वे गैर मुल्क के फौजी थे।कश्मीर न तो भारत का हिसा है और न पाकिस्तान का।
प्रश्न-आप फिर बंदूक उठाएंगे ?
उत्तर-पार्टी आला कमान तय करेगा।
         --इंडिया टूडे-15 जून 1994 

मां-बहन की गालियां सुनने कौन जाएगा राजनीति में ?
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इन दिनों चुनाव-प्रचार के दौरान इस देश के अनेक नेता एक दूसरे को चुन -चुन कर गालियां दे रहे हैं।बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं।
मानहानि का परिणाम भुगतने से भी बच कर निकल जा रहे हैंं।
  क्या वैसा सामान्य जीवन में संभव है ?
कत्तई नहीं।
किसी  सामान्य व्यक्ति को ऐसी गाली देकर जरा देख लीजिए।
या तो भयंकर मारपीट हो जाएगी या फिर मानहानि का मुकदमा दायर हो जाएगा।निर्भर करेगा कि आप किसे गाली दे रहे हैं।
पर,नेता गण सब कुछ सहन कर रहे हैं ।क्या झूठा और बेशर्म होना राजनीति की बुनियादी शत्र्त बन जाएगी ?
या बन चुकी है ?
यदि  नई उम्र के किसी शरीफ व्यक्ति को राजनीति में जाने की इच्छा होगी तो आज के कुछ नेताओं की ऐसी गालियां सुन कर भी वह जाएगा ?
अपने परिजन व पुरखों को सरेआम नंगा करवाने के लिए भला कौन जाएगा ? कितने लोग जाएंगे ?
  

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

नरेंद्र मोदी सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में यह शर्मनाक 
दलील दी थी कि ‘वोटर नहीं जानना चाहता कि पार्टी कहां से चंदा लाई।’
पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक दल 30 मई तक बताएं कि किसने उन्हें कितना चंदा दिया।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सराहनीय है।
दरअसल निष्पक्ष  जनता इस बात से निराश है कि राजनीतिक दलों ने चुनाव व राजनीति का खर्च बेशुमार बढ़ा लिया है।
इस गरीब देश के अनेक नेता चार्टर्ड विमान से चलते हैं।
जबकि इस देश में करीब 20 करोड़ गरीब लोग रोज खाली पेट सोने को अभिशप्त हैं।
 अपने वेतन-भत्ते मनमाने ढंग से बढ़ा लेने के मामले की तरह ही चुनावी चंदे के मामले में भी सारे दल बेशर्म हो चुके हैं।
पर सबसे अधिक जिम्मेवारी सत्ता दल की है।कम्युनिस्ट सहित  कोई दल पूरे चंदे का हिसाब नहीं देना चाहता है।

तब ‘अंतराष्ट्रीय कम्युनिस्ट’ हो गए थे हमारे देश के कुछ कम्युनिस्ट

1979 में दो कम्युनिस्ट देश चीन और वियतनाम के बीच भीषण युद्ध हुआ था। चीन के 26 हजार सैनिक मरे, 37 हजार घायल हुए। वियतनाम के 30 हजार मरे, 32 हजार घायल हुए। तब चीन के नागरिक चीन सरकार और वहां की सेना के साथ थे।

वियतनाम के नागरिक वियतनाम की सेना का हौसला बढ़ा रहे थे जबकि दोनों कम्युनिस्ट देश थे। पर, हमारे देश के कुछ कम्युनिस्ट तब ‘अंतराष्ट्रीय कम्युनिस्ट’ हो गए थे जब चीन ने हम पर हमला किया था।

1962 में चीन ने भारत पर हमला किया था। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के आधे से अधिक नेताओं ने कहा कि चीन ने नहीं बल्कि भारत ने ही चीन पर हमला किया। जिन्होंने कहा, उन्हें सी.पी.आई. ने पार्टी से निकाल दिया। नेहरू सरकार ने उन्हें जेलों में डाल दिया। निष्कासित कम्युनिस्टों ने 1964 में सी.पी.एम. बनाई।

आज विभिन्न विचार धाराओं को मानने वाले अनेक भारतीय उसी पुरानी भूमिका में हैं जिस भूमिका में 1962 में अनेक कम्युनिस्ट थे। पर मोदी सरकार उनके प्रति नरम है।

जगजीवन बाबू की समधिन नहीं बचा सकी थीं जमानत


जगजीवन राम की समधिन सुमित्रा देवी 1977 के लोकसभा चुनाव में बलिया से निर्दलीय चुनाव लड़ रही थीं। पर जीतने की कौन कहे, उनकी जमानत तक नहीं बच सकी।

हालांकि जगजीवन बाबू ने बेगूसराय जाकर उनके लिए वोट मांगा था। जगजीवन राम को लोग आदर से बाबू जी कहते थे। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद ही उन्होंने कांग्रेस और सरकार छोड़ी थी। उससे पहले इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल के वे प्रमुख सदस्य थे।

कुछ हलकों में तब यह माना जा रहा था कि उनके कांग्रेस छोड़ने के बाद ही जनता पार्टी की चुनावी हवा बनी थी। पर बलिया के चुनाव नतीजे ने इस बात को गलत साबित कर दिया।

पहले तो बाबू जी ने बिहार सरकार की पहली महिला मंत्री रह चुकी सुमित्रा देवी को लोकसभा का टिकट दिलाने का बहुत प्रयास किया। एक समय ऐसा आया जब यह लगा कि उन्हें बिहार के बलिया से टिकट मिल ही गया।

पर जनता पार्टी का टिकट अंततः रामजीवन सिंह को मिला। सुमित्रा देवी लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीरा कुमार की सास थीं। इमरजेंसी की पृष्ठभूमि में हो रहे चुनाव में जनता पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार के लिए जगजीवन बाबू बेगूसराय गए थे। सभा में उन्होंने कह दिया कि आप लोग बलिया में सुमित्रा देवी का समर्थन करें।

इसपर सभा में हंगामा हो गया था। बलिया में सुमित्रा देवी को मात्र 31 हजार मत मिले। यानी उनकी जमानत जब्त हो गई। रामजीवन सिंह एक लाख 46 हजार मत पाकर जीते। दूसरे स्थान पर सी.पी.आई. के उम्मीदवार रहे। बाद में सुमित्रा देवी जनता पार्टी के टिकट पर विधायक चुनी गईं और कर्पूरी ठाकुर सरकार में मंत्री बनीं।

(दैनिक भास्कर,पटना -8 अप्रैल 2019)

  

-1952 के चुनावी दृश्य की एक झलक-
समाजवादी नेता व लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी ने 1952 के चुनाव पर वैसे तो विस्तार से लिखा है, पर फिलहाल उनमें से उनके कुछ वाक्य यहां प्रस्तुत हैं ।
‘कांग्रेस का समर्थन दो ही तबके कर रहे हैं-हिन्दुओं में वे लोग ,जो बड़े जमीन्दार हैं और अंग्रेजों के राज में अमन सभा में थे।इसी गांव को देखिए।यहां के जुल्मी जमीन्दार के तहसीलदार और अमले कांग्रेस के कार्यकत्र्ता बने हुए हैं और वे लाठी से हांक कर कांग्रेस को वोट दिलाना चाहते हैं।’
‘........भोर होते ही बाबू लोग गरीबों को घर -घर घूम कर धमकाने लगे कि तुम लोग वोट देने नहीं जाओ-यदि जाओगे तो देख लेना।बुरी से बुरी धमकियां -गन्दी से गन्दी गालियां।’ 
    @-कानोंकान से@