शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

1.-जाम नाले
2.-क्षतिग्रस्त नाले 
3.-नालों की अनुपस्थिति
4.-संप हाउसों की दुर्दशा और उनमें बिजली 
आपूत्र्ति में देर
कोढ़ में खाज --भारी वर्षा
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पटना के निवासियों की इस बार की दुर्दशा के ये मुख्य कारण रहे हैं।
भारी वर्षा के लिए तो आप किसी को कुछ नहीं कर सकते !
पर, अन्य कमियों के लिए कौन-कौन जिम्मेदार हैं ?
यदि उन जिम्मेदार,गैर जिम्मेदार  और लुटेरों का पता लगा कर सरकार व राजनीतिक पार्टियां उन्हें सजा नहीं देगी,या दिलवाएगी तो अगले वर्षों में भी निवासियों की ऐसी ही या इससे भी बदतर दुर्दशा होती रहेगी।

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

आज रमेश थानवी मेरे घर आए।
स्नेहिल व्यक्तित्व के धनी थानवी जी शहर से दूर गांव में होने के बावजूद मेरे यहां आए।सड़क भी अच्छी नहीं है।
वे गांधी विचार समागम के सिलसिल में पटना आमंत्रित थे।
रमेश जी जब सत्तर के दशक में दिल्ली से प्रकाशित चर्चित साप्ताहिक पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’  के संपादकीय विभाग मंंे कार्यरत थे,उन दिनों मैं उस पत्रिका का बिहार संवाददाता था।
  उन दिनों तो यदाकदा पत्रिका के काम के सिलसिले में  उनसे सिर्फ पत्र-व्यवहार होता था।बाद के वर्षों में कई बार फोन पर बातचीत हुई।
 रमेश थानवी एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसके एक से अधिक सदस्य अपने बारे में कम ,देश व समाज के बारे में अधिक सोचते रहे हैं।यह परिवार जोध पुर के पास के गांव का मूल निवासी है।
 खुद रमेश जी ने अनौपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया।देश-विदेश घूमे।ज्ञानार्जन किया।नये काम किए।
  उनके भतीजा ओम थानवी जनसत्ता के संपादक रहे।
इन दिनों ओम जी हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जन संचार विश्व विद्यालय,जयपुर के कुलपति हैं।
  ओम थानवी के दिवंगत पिता शिवरतन थानवी शिंक्षक,शिक्षाविद् और शिक्षा से संबंधित दो सम्मानित पत्रिकाओं के संपादक रह चुके थे।
गत साल उनका निधन हो गया।
जब मैं जनसत्ता में था तो ओम थानवी जी यदाकदा कहा करते थे कि आप तो मेरे चाचा के साथ काम कर चुके हंै।
ऐसे यशस्वी परिवार के सदस्य रमेश थानवी जब आज मेरे घर आए तो उसके पीछे  सिर्फ उनका मेरे प्रति स्नेह ही था और किसी प्रयोजन का सवाल की नहीं उठता।
मैं अभिभूत हो गया।
प्रभाष जोशी के पुत्र की शादी के अवसर पर मैं नब्बे के दशक में जोध पुर गया था।
हमलोग मेहरान गढ़ किले में भी गए। ओम थानवी ने एक पुरातन बंदूक के साथ मेरी जो तस्वीर तब खींची थी,उसे मैंने अब भी संजो कर रखा है।
दरअसल हमारे पूर्वज जोधपुर से ही भटकते-भटकते कभी बिहार आकर बसे थे।
इसलिए मैं जोध पुर और वहां के लोगों से विशेष लगाव महसूस करता हूं।
  जब मैं छोटा था तो अभिभावक हमें अपना परिचय बताने का यह तरीका सिखाते थे।
वह भोजपुरी में इस प्रकार होता था-
प्रश्न-का नाम बा ?
उत्तर-सुरेंद्र सिंह
प्रश्न-बाबू जी के नाम ?
उत्तर-शिव नंदन सिंह 
प्रश्न- कौन जात बाड़ ?
उत्तर-राजपूत
प्रश्न-गोत्र का बा ?
उत्तर-शाण्डिल्य
प्रश्न-घर कहां बा ?
उत्तर-भरहा पुर
प्रश्न-थाना ?
उत्तर-परसा
प्रश्न-जिला ?
उत्तर-सारण
प्रश्न-कहां के बाशिन्दा बाड़ ?
उत्तर-जोध पुर के ।
यानी, तब जोध पुर के बिना मेरा परिचय पूरा नहीं होता था।
--4 अक्तूबर 2019 

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

प्रवत्र्तन निदेशालय ने अदालत से कहा है कि राॅबर्ट वाड्रा 
अपने बैंक खातों और परिवार की संपत्ति का विवरण नहीं दे 
रहे हैं।
क्यों वाड्रा जी ?
आपके इस इनकार के तरह -तरह के अर्थ लगाए जा रहे हैं। 
 30 सितंबर 2019

प्रबंधन सही हो तो प्रस्तावित मेडिकल विश्व विद्यालय बदल सकता है तस्वीर--सुरेंद्र किशोर


मेडिकल की पढ़ाई के लिए बिहार में अलग से नए मेडिकल विश्व विद्यालय की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
इसके लिए राज्य सरकार ने उच्चस्तरीय समिति का गठन कर दिया है।
  राज्य सरकार का यह काम सराहनीय है।
  फिलहाल बिहार में 14 मेडिकल काॅलेज हैं।नए 11 मेडिकल काॅलेज खुलने वाले हैं।
 संभवतः  बिहार सरकार ने यह सोचा है कि इससे मेडिकल की पढ़ाई बेहतर हो सकेगी,यदि अलग से कोई विश्व विद्यालय उसका संचालन करे।
  पर अनुभव बताते हैं कि सिर्फ कोई नया विश्व विद्यालय खोल देने से पुरानी समस्या का हल नहीं होगा।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि उस प्रस्तावित विश्वविद्याल में वाइस चांसलर कौन होंगे ? वे कैसे होंगे ?
शिक्षक कहां से आएंगे ?
क्या ये लोग मेडिकल काॅलेजों में शिक्षण-परीक्षण की सही व्यवस्था सुनिश्चित करा पाएंगे ?
 अभी तो छिटपुट यह खबर आती  रहती है कि अधिकतर मेडिकल काॅलेजों में न तो छात्र
पढ़ने में रूचि रखते हैं और शिक्षक की संख्या पर्याप्त है।
क्या नए विश्व विद्यालय के कत्र्ता धत्र्ता इस बात की जांच पहले करा लेंगे कि कितने मौजूदा मेडिकल काॅलेजों में बिना कदाचार के परीक्षाएं होती हैं ?
यदि वहां कदाचार व्याप्त है तो वैसा क्यों है ? उस परंपरा को प्रस्तावित विश्व विद्यालय में  प्रवेश पाने से कैसे रोका जा सकेगा ?
  देश में तीन आर्मी मेडिकल काॅलेज हैं।
वे पूना,दिल्ली और तेलांगना में हैं।
  बिहार के नए मेडिकल विश्व विद्यालय में आर्मी काॅलेज
से  रिटायर प्रिंसिपल व शिक्षक को बुला कर तैनात किया जा सकता है,यदि वे आने को राजी हों।  
पचास के दशक में बाहर के राज्यों से शिक्षकों को बुलाकर पटना विश्व विद्यालय में तैनात किया गया था। 
   मेडिकल काॅलेजों में कदाचारमुक्त परीक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जरुरत पड़ने पर परीक्षा के दौरान पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती की जा सकती है।  
सामान्य विषयों की परीक्षाओं में कदाचार का सीधा असर सामान्य लोगों पर नहीं पड़ता।
पर मेडिकल की पढ़ाई अच्छी नहीं हो तो धरती के भगवान पर मरीजों के गार्जियन का गुस्सा उतरने लगता है।
हालांकि यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि आज जो लोग मेडिकल की पढ़ाई करके निकल रहे हैं,वे सब के सब अयोग्य ही हैं।
उनमें से अनेक लोग विदेशों में भी जाकर नाम -यश कमा रहे हैं।पर उनके साथ कुछ वैसे लोग भी डाॅक्टर बन रहे हैं जिन्होंने न सिर्फ प्रवेश परीक्षा में पास होने के लिए दो नंबर का काम किया,बल्कि वे सामान्य मेडिकल शिक्षा-परीक्षा में भी सिरियस नहीं रहे।
   हालांकि एक कमी राज्य सरकार की भी है।वह मेडिकल काॅलेजों में मानव संसाधन व अन्य तरह की जरुरी सुविधाएं जुटाने के प्रति लापारवाह रही है। 
सामान्य शिक्षा की तस्वीर
स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता के क्षेत्र में बिहार का देश में 17 वां स्थान है।
नीति आयोग के अनुसार सर्वाधिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा राजस्थान में दी जा रही है और सबसे खराब हाल उत्तर प्रदेश का है।
संतोष का विषय यह है कि पंजाब और जम्मू कश्मीर की भी स्थिति हमसे भी खराब है।
उधर यह भी खबर आती रहती है कि बिहार में दर्जनों काॅलेज कागजों  पर ही चलते हैं।
 सामान्य शिक्षा को भी सुधारने के  प्रयास में चांसलर व राज्य सरकार लगे हुए हैं।पर  मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए तो अलग से यथाशीघ्र पूरा ध्यान देने की जरुरत है। 
      भूली-बिसरी याद
छात्र जीवन में अक्सर ही मुझे रेलवे स्टेशन से रात-विरात पैदल ही चार किलोमीटर दूर गांव जाना पड़ता था।
अंधेरी व आधी रात में भी सूनसान सड़क पर चलने में कोई खास डर-भय नहीं रहता था।
कानून -व्यवस्था तब बेहतर थी।
  पर यदाकदा सड़क पर पहरा देते चैकीदार से भी मुलाकात हो जाती थी।
कई बार परिचय पूछ कर वह मेरे घर तक मुझे पहुंचा दिया करता था।
 समय बीतने के साथ चैकीदार-दफादारों की अनुपस्थिति खलने लगी।
  कहा गया कि राजनीतिक संरक्षणप्राप्त अपराधियों ने चैकीदार-दफादारों के महत्व को समाप्त कर दिया।
  इस बीच उनके लिए वेतन का प्रावधान हो गया।
फिर भी उनकी चैकसी नहीं बढ़ी।
कहा गया कि उनकी सेवाएं कलक्टरों को सौंप दिए जाने से थानों का उन पर हुकुम नहीं चल पाता।
 बिहार सरकार ने अपने ताजा निर्णय के तहत यह व्यवस्था कर दी है कि चैकीदार-दफादारों को अब एस.पी.दंडित कर पाएंगे।
इसके लिए चैकीदार संवर्ग नियमावली में संशोधन कर दिया गया है।
  देर आए,दुरुस्त आए !
कम से कम जिन जिलों के एस.पी.कत्र्तव्यनिष्ठ होंगे,उस जिले में चैकीदार-दफादारों की भूमिका बढ़ जाएगी।
  घाटा पाटने के उपाय
गत 20 सितंबर को भारत सरकार ने काॅरपोरेट टैक्स में जो भारी छूट दी,उससे एक लाख 45 हजार करोड़ रुपए का टैक्स नुकसान होगा।
  इसकी भरपाई के उपाय में सरकार लग गई है।
कई उपाय किए जा रहे हैं।उन उपायों में खाली पड़ी सरकारी जमीन को बेचना शामिल है।
  सेना की देश भर में फैली 9600 एकड़ जमीन पर लोगों ने कब्जा कर रखा है।उसे खाली करा कर बेचा जा सकता है।
उसी तरह भारतीय रेल की 930 हेक्टेयर जमीन अतिक्रमित है।
रेल महकमे की अपनी कुल जमीन 4 लाख 58 हजार हेक्टेयर है।इसमें से 47 हजार 339 हेक्टेयर जमीन का कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है।
अनुपयुक्त जमीन को अतिक्रमण से बचाना बहुत कठिन काम होता है।
इसके अलावा भी कुछ महकमों के पास जमीन है।
इन्हें बेचा जा सकता है।
और अंत में
इंडोनेशिया की जल सेना का ‘ध्येय वाक्य’ संस्कृत में है-
‘जलेष्वेव जयामहे।’ 
श्रीलंका के कोलंबो विश्व विद्यालय का ध्येय वाक्य है-
‘बुद्धिः सर्वत्र भ्राजते।’
चेन्नई स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान का ध्येय वाक्य है--‘सिद्धिर्भवति कर्मजा।’
जिस तरह  भारत सरकार का ध्येय वाक्य है-सत्यमेव जयते। 
--27 सितंबर 2019 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम ‘कानोंकान’ से।



   अरविंद केजरीवाल जी थोड़ा वयस्क बनिए
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दिल्ली  के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजन्स के खिलाफ हैं।
केजरीवाल टुकड़े -टुकड़े गिरोह के खिलाफ अभियोजन चलाने के भी खिलाफ हैं।
 अब वे इस बात के भी खिलाफ हैं कि बिहारी लोग दिल्ली जाकर इलाज कराएं। 
 अरे केजरीवाल जी,
दिल्ली के मुहल्लों में कुछ अच्छे काम कर देने से आप कभी बड़ा नेता नहीं बनिएगा।
जबकि, एक ईमानदार नेता होने के कारण वैसी संभावना आपमें मौजूद है।
  कुछ पूरे देश और देश की आंतरिक व वाह्य सुरक्षा के बारे में भी सोचिए।
इस बात का भी अध्ययन कीजिए कि केंद्र सरकार ने ही बिहार को कैसे गरीब बनाए रखा है।
यदि आजादी के बाद नेहरू सरकार ने रेल भाड़ा समानीकरण नियम लागू नहीं किया होता तो अनेक टाटा नगर बिहार में बस गए होते।
फिर तो दिल्ली के लोगों को इलाज कराने बिहार आना पड़ता।
आपको पता है कि पूर्व प्रधान मंत्री चंद्र शेखर जब राज्य सभा के सदस्य थे तो अपने एक आपरेशन के लिए पटना ही आए थे ?

विचित्र,किन्तु सत्य !!!
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खबर है कि बिहार के इंजीनियरों ने विधायक फंड के 764 करोड़ रुपए के खर्च का कोई हिसाब ही नहीं दिया है।जबकि पैसे खर्च हो चुके हैं।
तीन वित्तीय वर्ष में दी गई राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं भेजा गया।सवाल है कि क्या उन पैसों का सरजमीन पर इस्तेमाल हुआ भी है ?हुआ है तो कितना ?
 दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ के अनुसार विधान सभा की प्राक्कलन समिति ने जब खर्च का हिसाब मांगा तो योजना एवं विकास विभाग ने इंजीनियरों को तलब किया।
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इस तरह विधायक फंड के उपयोग का असली रुप सामने आ रहा है।
पहले भी आता रहा है।पर, अब यह तो हद हो गई है।
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विधायक-सांसद फंड का और भी असली रुप तब सामने आ जाएगा,जब केंद्र व राज्य सरकार एक काम करेगी।
इस मद के पैसों  का कहां -कहां और किस काम में इस्तेमाल किया गया ?
यदि उसका पूरा विवरण गांव-टोला-शहर के नाम सहित स्थानीय अखबारों में सरकार विज्ञापन के रूप में छपवा दे।
उस स्थल के लोगबाग जान जाएंगे कि काम सरजमीन पर हुआ है या कागज पर।
सरजमीन पर हुआ भी है तो कितना टिकाऊ हुआ है।

                
कभी बाएं तो कभी दाएं !!!
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       एक
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सितंबर, 2019 के अंत में यह खबर आई कि केंद्र सरकार की उच्चस्तरीय समिति ने कोयला सेक्टर के निजीकरण की सिफारिश कर दी है।
सत्तर के दशक में जब कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण
हो रहा था, तब  कुछ लोगों ने राष्ट्रीकरण के खिलाफ अपनी राय दी थी।
पर, उन्हें पूंजीपतियों का दलाल घोषित कर सरकार ने अपना समाजवादी चेहरा कुछ और चमका लिया था।
याद रहे कि इंदिरा गांधी की सरकार ने 1971-72 में कोकिंग कोल और 1973 में नन-कोकिंग कोल खानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया।
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         दो
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पहले रेलवे,विमान सेवा  और बिजली क्षेत्रों में भी निजी कंपनियां काम कर रही थीं।
 पहले उनका राष्ट्रीकरण हुआ।
अब उनका भी फिर से धीरे -धीरे निजीकरण हो रहा है।
सरकारी पटरियों पर निजी ट्रेन चलाने की तैयारी है।
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तीन
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द्वितीय पंचवर्षीय योजना काल में इस देश में रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का प्रचलन शुरु हुआ।
तब अनेक गांधीवादियों व पारंपरिक विवेक वाले लोगों ने रासायनिक खाद के खतरों की ओर सरकार व लोगों 
का ध्यान खींचा था।
हमारे विधायक व बिहार सरकार के पूर्व मंत्री जगलाल चैधरी गांवों में जाकर लोगों से कहते थे कि इससे खेत बंजर हो जाएंगे।
पर तब कई लोगों ने जगलाल चैधरी जैसे लोगों को पुरानपंथी कह कर उनका मजाक उड़ाया।
अब जब चेतावनी सच होने लगी तो जैविक खाद पर बड़े पैमाने पर जोर दिया जा रहा है।
बड़े- बड़े नामी गिरामी लोग भी अपनी जमीन में जैविक खेती कर रहे हैं।
कह रहे हैं कि बाजार के गेहंू और चावल में भी आर्सेनिक है जो कैंसर को जन्म देता है।
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     चार
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एक तरफ तो इलेक्ट्राॅनिक गजेट के अतिशय इस्तेमाल के कारण उसका प्रतिकूल असर लोगों की गर्दन,आंखें तथा अन्य अंगों पर पड़ रहा है,वहीं दूसरी ओर उसका इस्तेमाल बढ़ता ही जा रहा है।
 अंततः क्या होगा ?
जब गर्दन-आंख की बीमारियां  महामारी का रूप ले लेंगी, तब हमारे सामने  इसका इस्तेमाल काफी कर देने के अलावा कोई चारा नहीं होगा।
कम इस्तेमाल यानी  सिर्फ अत्यंत जरूरी कामों के लिए ही इस्तेमाल। 
 देर हो जाने से पहले हम कम से कम इस मामले में संभल जाएं तो बेहतर होगा।
कोल इंडिया आदि जैसे सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के मामले में हमने देर कर दी।
सरकार  इस बात का पूर्वानुमान नहीं कर सकी  कि सार्वजनिक क्षेत्र को ठीक ढंग से चलाने के लिए अफसरों व कर्मचारियों में जिस कठोर ईमानदारी की जरुरत है,वह हमारे यहां नहीं रही।
यहां तक कि वाम सरकार को भी मजबूर होकर कोलकाता के सार्वजनिक क्षेत्र के होटल ग्रेट इस्टर्न होटल को बेच देना पड़ा था।