सोमवार, 31 अगस्त 2020

     थोड़ा लिखना, अधिक समझना !

      ..........................................

अस्सी के दशक की बात है।

मैं समाचार एजेंसी यू.एन.आई.के पटना आॅफिस में

बैठा हुआ था।

ब्यूरो प्रमुख डी.एन.झा से कुछ सीखने के लिए उनके 

पास अक्सर बैठा करता था।

उनके समक्ष मैंने चर्चित साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ की तारीफ शुरू कर दी।

इस पर झा जी ने मुझे टोकते हुए कहा कि 

‘‘रविवार और संडे नहीं चलेगा।

इंडिया टूडे चलेगा।’’

मुझे उनकी यह बात अच्छी नहीं लगी।

क्योंकि एक तो उस पत्रिका की हमलावर रिपोर्टिंग मुझे तब अच्छी लगती थी।

दूसरी बात यह कि ‘रविवार’ मुझसे भी यदाकदा लिखवाता रहता था।

इसलिए मैंने झा जी से पूछा,

‘‘ऐसा आप क्यों कह रहे हैं ?’’

उन्होंने कहा कि

 ‘‘देखिए,रविवार और संडे जिस पर आरोप लगाता है,उसका पक्ष नहीं देता है।

किंतु यह काम इंडिया टूडे करता है।’’

उस समय तो मैं झा जी की बात से सहमत नहीं हुआ।

पर, जब अस्सी के दशक के अंत में हिन्दी साप्ताहिक रविवार और नब्बे के दशक के मध्य मंे अंग्रेजी साप्ताहिक संडे बंद हो गया तो मुझे झा जी की बात याद आई।

  अंग्रेजी ‘इंडिया टूडे’ का प्रकाशन 1976 में शुरू हुआ था।

बाद में वह हिन्दी में भी छपने लगा।

कुछ अन्य भाषाओं में भी।

हिन्दी -अंग्रेजी संस्करण तो मैं अब भी देखता हूं।

अन्य भाषाई संस्करणों का क्या हुआ,यह मैं नहीं कह सकता।

टाइम्स-हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के अच्छे- अच्छे हिन्दी प्रकाशन एक- एक कर बंद हो गए।

ऐसे में इंडिया टूडे का हिन्दी सस्करण जारी रहना सुखद आश्चर्य है।

......................................

मैंने यह सब क्यों लिखा ?

यह प्रकरण मैं कुछ साल पहले भी लिख चुका हंू।

.............................

थोड़ा लिखना ,अधिक समझना !

................................

सुरेंद्र किशोर--31 अगस्त 20


रविवार, 30 अगस्त 2020

22 अगस्त, 1997 : लालू के साथ चली गईं रोचक खबरें भी !


..........................................................................

22 अगस्त, 1997 के दैनिक ‘जनसत्ता’ में लालू प्रसाद पर मेरी एक रपट छपी थी।

उसका शीर्षक था--

‘लालू के साथ चली गईं रोचक खबरें भी !’

..........................................................................

लालू प्रसाद अरसे से एक बार फिर जेल में हैं। 1997 की उस खबर को एक बार फिर पढ़ना रुचिकर होगा। यहां हू ब बहू प्रस्तुत है--

..........................................................

 ‘‘पटना, 21 अगस्त। लालू प्रसाद के राजनीतिक परिदृश्य से गायब होने के कारण पिछले तीन हफ्तों से बिहार में रोचक खबरों की कमी पड़ गई है। इससे संवाददाता परेशान हैं।

जेल जाने से पहले खुद लालू ने पत्रकारों से कहा था, ‘‘तू लोगिन चाहत बाड़ कि हम जेल चल जाईं।तब चटपटी खबर ना मिली।’’ उन्होंने कहा कि यदि मैं जेल चला गया तो आप लोगों की नौकरी चली जाएगी। क्योंकि तब आपको चटपटी खबर नहीं मिलेगी।


लालू प्रसाद ने ठीक ही कहा था। पटना के पत्रकार भी अब यही महसूस करने लगे हैं। अब मुख्यमंत्री आवास यानी, एक अणे मार्ग का दृश्य पूरा बदला-बदला सा है। वहीं से लालू प्रसाद की पत्नी राबड़ी देवी राज चला रही हैं। पर पत्रकारों के प्रति राबड़ी देवी का रवैया बिलकुल उल्टा है। उनकी मजबूरी भी है।

उन्हें पत्रकारों के उल्टे-सीधे सवालों के जवाब देने की अभी प्रैक्टिस नहीं हुई है। वे दे भी नहीं सकतीं।

कल तक सिर्फ एक घरेलू महिला थीं। उन्हें अभी प्रचार का चस्का भी नहीं लगा है। पति के जेल जाने से वे दुखी और उदास सी हैं।

लालू प्रसाद की हाजिर जवाबी मशहूर रही है। कई बार उनकी हाजिर जवाबी शालीनता की सीमा पार कर जाती थी। पर, पत्रकार उसमें से भी रोचक बातें निकाल ही लेते थे। पिछले माह तक पटना के कई पत्रकार तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के आवास पर करीब -करीब रोज ही जाते थे। जिस दिन संवाददाताओं को कहीं दूसरी जगह खबर नहीं मिलती थी, उस दिन भी वे लालू प्रसाद के घर से खाली हाथ नहीं लौटते थे। संवाददाता आपस में अक्सर यह कहते सुने जाते थे,‘‘आज कहीं कुछ नहीं है। चलो लालू के घर।’’


दैनिक टेलिग्राफ के संवाददाता फैजान अहमद ने स्वीकार किया कि ‘‘लालू प्रसाद अपने आप में एक खबर थे। अच्छी या बुरी खबरें उनसे निकलती रहती थीं। पर अब पहले जैसा नहीं है। रोचक और चटपटी खबरों की कमी से पटना के दूसरे संवाददाता भी परेशान हैं। अब अस्पताल जेल से बाहर छनकर आने वाली अपुष्ट खबरों से संतोष करना पड़ रहा है।

दरअसल लालू प्रसाद से संबंधित उटपटांग खबरें पढ़ने की पाठकों की आदत सी पड़ गई है। लालू प्रसाद भी जानते थे कि उनकी उटपटांग बातों और अजीब ओ गरीब हरकतों से अखबारों के लिए अच्छी खबरें बनती हैं।

करीब डेढ़ साल पहले लालू प्रसाद जब जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर पटना पहुंचे थे तो उन्होंने प्रेस से कहा था कि ‘‘अब मैं सावधानी से बोलूंगा। क्योंकि अब मैं जो कुछ बोलूंगा, वह देश के अखबारों के पहले पेज पर मोटे -मोटे अक्षरों में छपेगा। कुछ दिनों तक उनका यह संयम कायम भी रहा। पर वे तो अपनी आदत से लाचार थे। वे कहीं भी, कभी भी, कुछ भी बोल देते थे।

उन्हें छपास की बीमारी भी थी।


वे जानते थे कि किसी मुख्यमंत्री की उटपटांग चीजें खूब छपती हैं। बाद के दिनों में जब इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रसार बढ़ा तो एक दिन लालू ने प्रिंट मीडिया के संवाददाता से कहा था,‘अब तोहरा लोगिन के ग्लेमर कम हो गईल। अब तो तुरंत फोटो खींचत बा, आ ओही दिन सांझ में टी.वी. पर देखा देत बा। वीकली का वैल्यू त खतम ही हो गया।’’

लालू प्रसाद जब सत्ता में थे तो उनका प्रेस से खट्टा-मीठा संबंध रहा। कभी वे अपनी आलोचनाओं से चिढ़कर गालियां भी दे देते थे। वे कभी मिलने से इनकार भी कर देते थे। पर वे मानते थे कि प्रेस उनके लिए एक जरूरी बुराई है।

चारा घोटाले को लेकर प्रेस ने लालू प्रसाद के खिलाफ क्या- क्या नहीं लिखा ? उन्होंने कुछ किया ही ऐसा है। वे प्रेस से बीच- बीच में सख्त नाराज भी होते रहे। फिर भी प्रेस से लालू प्रसाद का काम चलाऊ रिश्ता उनके जेल जाने तक बना रहा। एक पत्रकार के अनुसार वह प्रेम और घृणा का मिलाजुला रिश्ता था। अब तो प्रेस के लिए रोचक खबरों का सवाल है। रोचक खबरें अब कौन देगा ?

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

जब तक पूरी पूंजी डूब न जाए

यदि  किसी कारखाना मालिक की नालायक औलाद के कारण उसके कारखाने में लगातार घाटा होने लगे, फिर भी वह अपने उस कारखाने को किसी पड़ोसी को तो नहीं सौंप देगा !

तो क्या वह मुनाफे का इंतजार तब तक करता रहेगा, जब तक उसकी पूरी पूंजी डूब न जाए ?

................................

सुरेंद्र किशोर-26 अगस्त 2020


बुधवार, 26 अगस्त 2020

नीरव मोदी से रिकवरी बनाम बोफर्स दलाल को पैसे लेकर भाग जाने की छूट !!

नीरव मोदी से पंजाब नेशनल बैंक को रिकवरी के रूप में 24 करोड़ 33 लाख रुपए फिलहाल मिल गए हैं। खबर है कि नीरव के खिलाफ मोदी सरकार की सख्त कार्रवाई के कारण ऐसा हुआ है। हीरा व्यवसायी नीरव मोदी इन दिनों लंदन जेल में है। इस देश के इडी के अनुरोध पर नीरव की पत्नी के खिलाफ इंटरपोल ने रेड काॅर्नर नोटिस जारी कर दिया है। 

दूसरी ओर, मनमोहन सरकार ने बोफर्स दलाल के जब्त बैंक खाते को चालू करवाकर दलाली के सारे पैसे निकाल लेने की उसे सुविधा प्रदान कर दी थी।

वी.वी. सिंह की सरकार ने 1990 में स्विस बैंक के लंदन स्थित शाखा के उस खाते को जब्त करवा दिया था। भारत के आयकर न्यायाधिकरण ने कहा था कि बोफर्स की दलाली के पैसों पर आयकर बनता है। एक अफसर को लंदन भेजकर मनमोहन सरकार ने यदि जब्त खाते को चालू नहीं करवाया होता तो इनकम टैक्स के पैसे भारत सरकार के खजाने में आ जाते।

दूसरे बोफर्स दलाल हिन्दुजा के मुम्बई स्थित फ्लैट को आयकर ने जब्त कर पैसे वसूले। यह जब्ती भी मोदी राज में ही संभव हो सकी।

  ..............................

अब आप ही बताइए कि आम लोग रिकवरी कराने वाली सरकार का समर्थन करें या वैसी पार्टी का जिसकी सरकार ने एक दलाल को लाभ पहुंचाने के लिए सार्वजनिक धन लुटवा दिया ? यह तो एक नमूना मात्र है।

ऐसे ही कारनामों के कारण कांग्रेस व उसके कुछ अन्य सहयोगी दल जनसमर्थन के लिए आज तरस रहे हैं।

.............................................

--26 अगस्त 2020


       को बड़ -छोट कहत अपराधू !

    ........................................................

बात तब की है जब चीन, जापानी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ रहा था।

कम्युनिस्ट सुप्रीमो माओ त्से तुंग ने चीन के राष्ट्रवादी शासक चांग काई शेक को संदेश भेजा,

‘‘अभी हमलोग मिलकर जापानियों से लड़ लें।

आजादी के बाद फिर हमलोग आपस में तय कर लेंगे कि चीन की सत्ता किसके हाथ में आएगी।’’

  इसके जवाब में चांग काई शेक ने कहा कि 

‘‘जापानी साम्राज्यवाद चर्म रोग है और कम्युनिस्ट हृदय रोग।

हम हृदय रोग को कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?’’

  उसी तरह मेरी समझ से आज भारत के लिए चीन चर्म रोग है।

 किंतु पाकिस्तान व उसके भारतीय समर्थक हृदय रोग।

क्योंकि चीन हमारी सीमा की जमीन हड़पना चाहता है।

दूसरी ओर,पाकिस्तान देसी -विदेशी जेहादियों व उनके समर्थकों के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करने की कोशिश में लगा हुआ है।

   जो लोग कहते हैं कि चीन पाक की अपेक्षा हमारे लिए अधिक खतरनाक है,उनसे मैं असहमत हूं।

मेरी समझ से दोनों खतरनाक हैं।

किंतु पाक कुछ अधिक ही खतरनाक है।

क्योंकि इस देश के भीतर चीन की अपेक्षा पाक के एजेंट काफी अधिक हैं।

बहुसंख्यक समुदाय में भी।

वोट के लिए।

वे अधिक सक्रिय भी हैं।टी.वी.चैनलों पर भी आकर वे अपनी मंशा जाहिर करते रहते हैं।

दोनों से लड़ने के लिए हमें सरकारी भ्रष्टाचार पर निर्ममतापूर्वक रोक लगा कर अधिक से अधिक साधन जुटाने पड़ंेगे।

हथियार ,सैनिक, पुलिस और खुफिया तंत्र

को काफी मजबूत करना होगा।

आतंकवादियों के खिलाफ सामान्य कानून के तहत निपटना मुश्किल है।

देश के भीतर के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ भी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई करनी होगी न कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत।

.............................

--सुरेंद्र किशोर-26 अगस्त 20  


सोमवार, 24 अगस्त 2020

 चाहे जितना और जैसा भी संगठनात्मक परिवत्र्तन कर लो,

जब तक महा घोटालांे,भीषण भ्रटाचार, और अतिवादी मुसलमानों के प्रति सहनशीलता जारी रखोगे , तब तक

 तुम्हारी पार्टी का पुनर्जीवन संभव ही नहीं।

वंशवाद-परिवारवाद के तहत आगे आए बकलोल उत्तराधिकारी

कभी किसी पार्टी का पुनरूद्धार नहीं कर सकते। 

..........................

याद रहे कि मैंने किसी दल का नाम नहीं लिखा है।

क्योंकि, यह बात एकाधिक दल पर लागू होती है।

............................

--सुरेंद्र किशोर

24 अगस्त 20


  बिहार में बिजली बढ़ी,स्मार्ट फोन बढ़े और 

 उसके साथ जानकारी और जागरूकता भी।

   --सुरेंद्र किशोर-

बिहार में सन 2005 में मात्र 700 मेगावाट बिजली की 

आपूत्र्ति हो रही थी।

  आज राज्य में 5932 मेगावाट बिजली की आपूत्र्ति 

हो रही है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार अब बिहार के हर घर में बिजली

उपलब्ध है।

  सारण जिला स्थित मेरे पुश्तैनी गांव में 2009 में ही बिजली 

पहुंचाई जा सकी।

बिजली रहने और नहीं रहने के बीच कितना फर्क होता है,इस पर अधिक कुछ कहने की जरूरत नहीं है।

लोगबाग महसूस करते हैं।उसका लाभ उठाते हैं।

  पर,एक खास फर्क आया है जिसका लाभ और हानि दोनों है।

  अब गांवों में भी अपना मोबाइल-स्मार्ट फोन चार्ज करने के लिए किसी को पास के बाजार में नहीं जाना पड़ता।

बिहार जैसे विकासशील राज्य में आप आज जहां भी जाइए,लोगों के हाथों में स्मार्ट फोन देखिएगा।

  अधिकतर युवजन उसमें मग्न रहते हैं।

गांवों के खेतों की डरेर पर बैठकर निम्न मध्यम वर्ग के युवक भी स्मार्ट फोन में व्यस्त रहते हंै। 

  इसके लाभ कम, हानि अधिक है।

घर के कम उम्र बच्चे भी मां-बाप से छिप कर लंबे घंटे तक स्मार्ट फोन देख रहे हैं।

उन  बच्चों की कोमल आंखें  खतरे में हंै।

हां, वे बुजुर्गों के लिए , जिनसे बातचीत करने वालों की कमी रहती है, स्मार्ट फोन अच्छे साथी की भूमिका निभा रहे हैं।

 लोगबाग अपनी -अपनी आदत-पसंद  के अनुसार इस यंत्र का उपयोग कर रहे हैं।

अनेक लोगों का अकेलापन कट रहा हैं।

जिनकी जीवन साथी ,साथ छोड़ गई हैं,उनके लिए खास यह वरदान है।

  गर्दन टेढ़ी करके अनिश्चित काल तक बिना पलक झपकाए स्मार्ट फोन देखने वाले लोग दो तरह के चिकित्सकों की व्यस्तता व आय बढ़ा रहे है--आंख  और हड्डी के डाक्टरों  की ।

.....................................

पुनश्चः

स्मार्ट फोन के जरिए बिहार के गांव-गांव में भी राजनीतिक -गैर राजनतिक सूचनाओं का विस्फोट हुआ है।

अधिकतर लोग अपने स्मार्ट फोन पर सारे नेताओं के भाषण सुन रहे हैं,उन्हें देख रहे हैं और अपने -अपने तरीके से दलों व नेताओं के बारे में अपनी राय बना रहे हैं। 

बिहार तो पहले से ही राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश रहा है।पर हाल में जानकारी -जागरूकता और भी बढ़ी है। 

............................................

--सुरेंद्र किशोर--23 अगस्त 20