शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

    नटवर सिंह को पाक राजनयिक की नसीहत

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बात तब की है जब भारतीय विदेश सेवा के सदस्य नटवर सिंह की इस्लामाबाद में तैनाती हो रही थी।

वहां जाने से पहले भारत में पाकिस्तान के हाई कमिश्नर 

अब्दुल सत्तार ने उन्हें बुलवाया।

नटवर सिंह ने, जो बाद में भारत सरकार के मंत्री भी बने,

सत्तार से कहा कि

 ‘‘मैं जानता हूं कि मुझे अपने सीमा पार के दोस्तों से क्या कहना है।

पर, मुझे यह बता दें कि मुझे क्या नहीं कहना चाहिए ?’’

सत्तार ने बेझिझक अंदाज में कहा कि 

‘‘यह कभी मत कहना कि हम सब एक जैसे हैं।

यदि हम एक जैसे होते तो 1947 में अलग क्यों होते ?’’

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--नटवर सिंह की आत्म कथा-

‘‘एक ही जिंदगी काफी नहीं’’ से।


शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

   कल्पना कीजिए उस दिन की जब 

  देश की विधायिकाएं वंशजों-परिजनों

   से भर जाएंगी 

आज के लोकतंत्र का कोई ‘महाराजा’ प्रधान मंत्री 

 और ‘राजा’ मुख्य मंत्री बन जाएगा ! 

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  --सुरेंद्र किशोर-

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और कितने दशक लगेंगे ?

कब तक बिहार विधान सभा की सभी 243 सीटों पर

वंशवादी-परिवारवादी नेताओं के वंशज काबिज हो जाएंगे ?

कितने दशकों में लोक सभा की सभी 543 सीटों का भी यही हश्र होगा ?

   अनुमान लगा लीजिए।

रफ्तार देख लीजिए।

मोतीलाल नेहरू परलोक में इस बात पर खुश होंगे कि उन्होंने जो काम 1928 में शरू किया,उसे कांग्रेस तथा अन्य दलों के नेतागण तेजी से तार्किक परिणति तक पहुंचा रहे हैं।

 यह तो तथ्य है कि शुरू मोतीलाल जी ने किया और उसे संस्थागत रूप जवाहरलाल जी ने दिया।

  इस संबंध में ‘जनसत्ता’ में 2012 में प्रकाशित लखनऊ के चर्चित पत्रकार के.विक्रम राव की चिट्ठी की स्कैन काॅपी प्रस्तुत है।

साथ ही, टाइम्स आॅफ इंडिया में प्रकाशित एक रपट भी।

  उस रपट में इस बात का जिक्र है कि मोतीलाल नेहरू ने महात्मा गांधी पर किस तरह भारी दबाव डाल कर किस तरह 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष बनवाया था।

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पहले के अधिकतर नेता अपने वंशज-परिजन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने के पक्ष में नहीं थे।

बिहार में डा.श्रीकृष्ण सिंह और कर्पूरी ठाकुर इसके उदाहरण हैं।

पर बाद के वर्षों में पुत्र के दबाव में पिता आने लगे।

हालांकि बिहार व देश में अब भी कई नेता मौजूद हैं जो अपने परिजन के दबाव में नहीं आ रहे हैं।

पर उनके निधन के बाद क्या होगा ?

उनके परिजन-वंशज को कोई दल विधायिका में पहुंचा देगा।

  कई दशक पहले एक बड़े नेता ने तो अपने घर में परिवारवाद को रोकने के क्रम में अपना बलिदान ही दे दिया।

उस आदर्शवादी नेता ने बड़े पुत्र ने कहा कि मुझे विधायिका का सदस्य बनवा दीजिए।

नेता जी राजी नहीं थे।

लोकलाज वाले थे।

इसी क्रम में उनके छोटे पुत्र ने कहा कि उसे नहीं, मुझे बनाइए।

इस पर दोनों भाइयों में मारपीट होने लगी।

पिता ने झगड़ा छुड़ाने की कोशिश की।

इस क्रम में शरीर व मन पर जो दबाव पड़ा,उसे वे झेल नहीं सके।

हार्ट अटैक हो गया।

वे गुजर गए।

  आज के अनेक नेता वैसी नौबत नहीं आने देना चाहते।

इसलिए वे जल्द से जल्द अपने परिजन को विधायिका में प्रवेश करा देना चाहते हैं।

  चूंकि इस देश के लोकतंत्र के आधुनिक राजे-महाराजे भी अपना पाप छिपाने के लिए वही चाहते हैं,इसलिए विधायिकाओं में वंशवाद की भरमार होती जा जा रही है।

चिंताजनक बात यह है कि जो दलीय सुप्रीमो खुद वंशवादी नहीं हैं,वे भी अपने दल में वंशवाद को नहीं रोक पा रहे हैं।

अंततः  इसका नतीजा क्या होगा ?

जिस दिन बिहार विधान सभा की 200 से अधिक सीटों और लोक सभा की 500 से अधिक सीटों पर वंशज और परिजन काबिज हो जाएंगे,जिस दिन लोकतंत्र के नए ‘महाराजा’ के परिवार का कोई सदस्य प्रधान मंत्री और कोई ‘राजा’ राज्य में मुख्य मंत्री बन जाएगा,उस दिन इस लोकतंत्र को कौन सा नाम देंगे आप ?

 दरअसल सांसद-विधायक फंड इस वंशवाद को बढ़ाने में सहायक है।

फंड के ठेकेदारों ने  राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं की जगह ले ली है।

भाड़े की भीड़ का भी प्रबंध होने लगा है।

वह दिन दूर नहीं जब वास्तविक राजनीतिक कार्यकत्र्ता विलुप्त प्राणी हो जाएंगे।

जिस तरह ईमानदार नेता विलुप्त होते जा रहे हैं। 

  बिहार में करीब 10 साल पहले विधायक फंड समाप्त कर

दिया गया था।

पर विधायकों के भारी दबाव में आकर फिर से शुरू कर दिया  गया है।

पता लगाइए कि कितने साल से विधायक फंड के खर्चे का हिसाब नहीं मिल रहा है ?

सांसद फंड के बारे में मोदी सरकार ने हाल में राय शुमारी कराई।

करीब आठ सौ में से मात्र एक दर्जन से भी कम सांसदों ने कहा कि फंड को समाप्त कर दीजिए।

बाकी ने इसकी राशि जारी रखने या बढ़ा देने की सलाह दी।

खबर है कि प्रधान मंत्री अब इस मामले में द्विविधा में हंैे।

जबकि, अन्य मामलों में कहा जाता है और ठीक भी है कि ‘‘मोदी है तो मुमकिन है।’’

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कहां जा रहा है अपना देश ? !!

उन्हें इस पर चिंतन करना चाहिए जिनका कोई स्वार्थ नहीं है और जो अपने वंशजों के आम जीवन में सिर्फ बेहतरी चाहते हैं।

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--सुरेंद्र किशोर-6 अक्तूबर 20


 

  

   


   अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़े दें तो आजादी के 

बाद इस देश और प्रदेश के अधिकतर मतदाताओं ने 

हमेशा ही होशियारी से सही मतदान ही किया है।

  जनता तब भी सही थी जब उसने 1971 में इंदिरा 

गांधी को जिताया और 1977 में उन्हें हराया।

   बिहार के अधिकतर मतदाता तब भी सही थे जब

उन्होंने 1991 और 1995 में लालू प्रसाद को जिताया।

  अधिकतर जनता तब भी सही थी जब उसने 2005 में 

लालू प्रसाद के दल को बिहार की सत्ता से बाहर कर दिया।

  आज चाहे लोगबाग जो भी चुनावी अनुमान लगाएं, किंतु मेरा मानना है कि इस बार भी बिहार के अधिकतर मतदातागण सही चुनावी फैसला ही करंेगे।

  आम तौर पर ‘मौन’ आमलोग मतदान करने से पहले देश-प्रदेश का नफा-नुकसान अधिक देखते हैं।

दूसरी ओर, अधिकतर मुखर लोग खुद का नफा-नुकसान अधिक देखते हैं।

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---सुरेंद्र किशोर-15 अक्तूबर 20  


 राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि हम सबको साथ लेकर चलेंगे।

सामान्य वर्ग को भी सम्मान देंगे।

अच्छी बात है।

पर, संसद में तो राजद ने गत साल सवर्ण आरक्षण यानी सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए प्रस्तावित आरक्षण से संबंधित विधेयक का विरोध कर दिया था।

जबकि, लगभग अन्य सभी दलों ने उसका समर्थन किया था।

क्या उस सवर्ण विरोध पर राजद ने कोई पुनर्विचार किया है ?

नहीं किया।

जबकि, उसी के कारण लोस चुनाव हारने वाले राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने बाद में कहा था कि हमें सवर्ण आरक्षण का विरोध नहीं करना चाहिए था।


गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

 आदर्श उम्मीदवारों की खोज !

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   बिहार विधान सभा के चुनाव में क्या आपको इस बार ऐसे

उम्मीदवारों के दर्शन हो रहे हैं जिनमें कम से कम दो गुण

नजर आ रहे हों ?

   कम्युनिस्टों को छोड़कर कितने ऐसे उम्मीदवार हैं जिन्होंने अपनी जायज आय से अधिक संपत्ति नहीं बनाई है ?

कितने उम्मीदवार हैं जो अपने वंशज या परिजन को टिकट दिलवाने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते ?

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अब कहिएगा कि हम कैसे जानेंगे कि किसी ने जायज आय से अधिक संपत्ति बनाई या नहीं ?

इसका जवाब यह है कि आप किसी नेता की भेश- -भूषा,पहनावा-ओढ़ावा और अन्य हाबी-जाबी की उपस्थिति -अनुपस्थिति से काफी हद तक अंदाज लगा ही सकते हैं।

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  कर्पूरी ठाकुर की तरह कई स्वतंत्रता सेनानी पिछले दशकों तक इन मामलों में देखते ही पहचान लिए जाते थे।

अब वैसे लोग विलुप्त होते जा रहे हैं।

पर संभव है कि नई पीढ़ी में भी आदर्श उम्मीदवार जहां -तहां नजर आ जाएं !

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सुरेंद्र किशोर

-29 अक्तूबर 20


 इतिहास के नाजुक मोड़ पर 

कटु सत्य एक बार फिर !

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--सुरेंद्र किशोर--

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सन 1990 में मंडल आरक्षण आया।

अधिकतर सवर्णों ने उसका तगड़ा विरोध किया।

तब बिहार विधान सभा के प्रेस रूम में बैठकर अक्सर मैं 

यह कहा करता था कि आरक्षण का विरोध मत कीजिए।

यदि गज नहीं फाड़िएगा तो थान हारना पड़ेगा।

कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा भी प्रेस रूम में बैठते थे।

मेरी बातों के वह आज भी गवाह हैं।

  आरक्षण विरोध के कारण 15 साल तक ‘थान’ हारे रहे थे।

 ‘‘भूरा बाल साफ करो,’’

यह बात किसी ने कही थी या नहीं यह मैं नहीं जानता।

पर ‘भूरा बाल’ ने खुद को ही कुछ साल के लिए साफ कर लिया।

कम से कम दो पीढ़ियां बर्बाद हो गईं।

   आज भी बिहार इतिहास के नाजुक मोड़ पर खड़ा है।

कुछ लोग एक बार फिर वैसी ही गलती कुछ दूसरे ढंग से करने पर उतारू हैं।

वे ऐसी शक्तियों को मजबूत करना चाहते हैं जिनका विकास का कोई इतिहास ही नहीं है। 

यानी, बताशा के लिए मंदिर तोड़ने पर कोई अमादा हो तो आप उनका क्या कर लेंगे ? !!

यह लोकतंत्र है।सबको अपने मन की सरकार चुनने का पूरा हक है।

 1990 में भी मुझ पर उस टिप्पणी के कारण बहुत से लोग नाराज हुए थे।

कुछ लोग मुझे लालू का दलाल भी बता रहे थे।

मेरा परिवार भी इस मुद्दे पर मेरे खिलाफ था।

दरअसल दूरदर्शी होने के लिए सिर्फ पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं है।

  मेरे इस ताजा पोस्ट पर भी कई लोग नाराज हो सकते हैं।

कुछ उसी तरह की बातें बोल सकते हैं।यह उनका हक है।

पर, वे एक बात जान लें।

अन्यथा कल होकर कहेंगे कि कोई चेताने के लिए था ही नहीं।

जो नेता लोग 1990 में आरक्षण विरोधी आंदोलन के नेता थे,उनमें से एकाधिक लोगों ने मुझसे कुछ साल बाद कहा था कि हमारा स्टैंड तब गलत था।हमें आरक्षण का विरोध नहीं करना चाहिए था।हमारे विरोध का लाभ लालू प्रसाद ने उठा लिया।

  आज जो लोग बताशे के लिए मंदिर तोड़ने को एक बार फिर अमादा हैं,वे भी कुछ समय बाद पछताएंगे,यदि वे अपनी योजना में अंततः सफल हो गए। 

  पर तब तक देर हो चुकी होगी।

हालांकि उनकी सफलता पर मुझे संदेह है।

होशियार लोग चुनाव में हमेशा बदतर को छोड़कर बेहतर को अपनाते हैं।

पर आज क्या हो रहा है ?

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29 अक्तूबर 20


सोमवार, 26 अक्टूबर 2020

 इस देश में सैनिक शाही या हिटलर शाही 

की आंशका को निर्मूल करने के लिए गंभीर

प्रयास करने की जरूरत 

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राजनीति में तेजी से बढ़ते भ्रष्टाचार,अपराध,देशद्रोह

और वंशवाद-परिवारवाद के कारण लोकतंत्र के 

सामने गंभीर खतरा

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चुनाव एक ऐसा मौका है जब आप हिटलर शाही

या सैनिक शाही की आशंका से इस देश को साफ 

बचा कर निकाल सकते हैं।

उस आशंका को निर्मूल कर सकते हैं।

आखिर यह आशंका मेेरे मन क्यों आई ?

इस सवाल का जवाब देने की कोशिश कर रहा हूं।

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सन 1967 से ही इस देश के चुनावों को गौर से देखता रहा हूं।

समय के साथ कुछ ऐसी बुराइयां तेजी से बढ़ती जा रही हैं जिनका कुपरिणाम संभवतः वही हो सकता है जिसकी आशंका मेरे मन में है।

ईश्वर करे,मेरी आशंका गलत साबित हो जाए !

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एक बड़े नेता ने हाल में कहा कि चूंकि मेरा दामाद बेरोजगार है,इसलिए मैंने उसे विधान सभा का टिकट दे दिया।

 नेता स्पष्टवादी हंै,इसलिए उन्होंने खुलेआम यह बात कह दी।

इस देश के अन्य अनेक नेता यही काम करते रहे हैं।

  राजनीति में वंशवाद-परिवारवाद समय के साथ तेजी से बढ़ता चला जा रहा है।

आज कितने सांसद या विधायक हैं जो अपने परिजन को अपनी जगह या साथ में टिकट दिलाना नहीं चाह रहे हैं ?

अंगुलियों पर गिनने लायक।

किसी राजनीतिक वंश-परिवार में कोई त्यागी-तपस्वी जन सेवक निकले तो राजनीति में उसे आगे बढ़ाने में कोई हर्ज नहीं।

पर क्या यही हो रहा है ?

क्या त्याग-तपस्या-जन सेवा टिकट देने की कोई कसौटी रह गई है ?

लगता तो यह है कि आजादी से पहले इस देश में 

जिस तरह 565 रजवाड़े थे,उसी तरह के राजनीतिक घरानों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। 

यह संयोग नहीं है कि ऐसे घरानों में से अधिकतर के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं।

क्या इसे ही लोकतंत्र कहते हैं ?

क्या स्वंतत्रता सेनानियों ने अपनी सुख, चैन व जान को जोखिम में डालकर इसी दिन के लिए हमें आजाद 

करवाया था ?

हमारे लोकतंत्र में अन्य अनेक बुराइयां गहरे घर करती जा रही  हंै।

 नतीजतन शासन-प्रशासन की स्थिति दिनानुदिन बिगड़ती जा रही है।

आज देश-प्रदेश में कितने सरकारी आॅफिस हैं जहां बिना नजराना-शुकराना के काम हो रहा है ?

कितने सांसद या विधायक हैं जो अपने क्षेत्र विकास फंड से ‘चंदा’ नहीं ले रहे हैं ?

जितने जन प्रतिनिधि चंदा लेंगे,उसके साथ ही उतने ही अफसर रिश्वत लेने की अघोषित छूट भी हासिल कर लेंगे।

आज चाहते हुए भी ईमानदार प्रधान मंत्री और ईमानदार मुख्य मंत्री भी शासन-व्यवस्था को भ्रष्टाचारमुक्त नहीं कर पा रहा है।

वैसे आम लोग ऊब रहे हैं जिनका कोई निहितस्वार्थ नहीं है।

इसका अंततः क्या नतीजा होगा ?

अनुमान लगाइए।

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फिलहाल बिहार विधान सभा चुनाव के इस अवसर पर सही सोच वाला व्यक्ति क्या करंे ?

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1.-उस दल को और उसके उस उम्मीदवार का समर्थन करें जो अन्य दलों या उम्मीदवारों की अपेक्षा कम भ्रष्ट है ।या ईमानदार है।

जो आदतन भ्रष्ट या अपराधी नहीं है,उसमें सुधरने की गुंजाइश बनी रहती है।

शत्र्त है कि थोड़ी कड़ाई हो जाए।

2.-उसे ताकत पहुंचाएं जो अपेक्षाकृत कम वंशवादी-परिवारवादी है।

या जो परिवारवादी नहीं है।

3.- कई शक्तियां हथियारों के बल पर इस देश में  राजनीतिक विचारधारा या धार्मिक विश्वास के अनुकूल शासन-व्यवस्था स्थापित करने की गंभीर कोशिश में है।

ऐसी शक्तियों के प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थकों को इस चुनाव में मदद मत कीजिए।

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यदि राजनीति व शासन पर आदतन भ्रष्ट तत्वों ,खूंखार  अपराधियों, घृणित व बेशर्म परिवारवादियों-वंशवादियों और देशद्रोहियों -संविधान विरोधियों का वर्चस्व इसी रफ्तार से बढ़ता गया तो आखिर एक दिन क्या होगा ?

एक दिन वही होगा

जिसकी आशंका इस पोस्ट के शीर्षक में व्यक्त की गई है।

हालांकि अब भी समय बचा है चेत जाने के लिए।

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--सुरेंद्र किशोर-24 अक्तूबर 20