रविवार, 27 फ़रवरी 2022

  सन 1927 की गोधरा साम्प्रदायिक हिंसा में अंग्रेजों की बेईमानी ने मोरारजी देसाई को डिपुटी कलक्टर पद से इस्तीफा दे देने को मजबूर कर दिया 

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सुरेंद्र किशोर

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गोधरा में 1927 में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के बाद ही

मोरारजी देसाई ने सरकारी नैकरी छोडकर स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़ने का निर्णय कर लिया था।

  उसे उन्होंने जल्द ही कार्य रूप भी दे दिया।

याद रहे कि तब के अंग्रेज कलक्टर ने

मोरारजी देसाई पर इस बात के लिए दबाव डाला था कि वे 

उस हिंसा ऐसी रिपोर्ट तैयार करें जिससे दंगाई मुसलमानों को दोष मुक्त किया जा सके।

 सन 2002 में भी गोधरा में कारसेवक टे्रन दहन कांड हुआ।

सन 1927 के गोधरा कांड से बीस साल पहले हुए कांड में एक खास तरह की समानता है।

2002 के गोधरा कांड के बाद रेलवे मंत्री लालू प्रसाद ने जस्टिस यू.सी.बनर्जी के नेतृत्व मंे जांच कमेटी बनाई थी ।

उस कमेटी ने यह रपट दी थी कि गोधरा स्टेशन पर ट्रेन की बोगी में किसी ने बाहर से आग नहीं लगाई थी।बल्कि आग भीतर से ही लगी थी।

पर, याद रहे कि सी.बी.आई.जांच से पता चला कि मुसलमानों की भीड़ ने बाहर से पेट्रोल छिड़कर डिब्बे के भीतर बैठे-सोये 59 कार सेवकों को जिंदा जला दिया था।कोर्ट ने उन आरोपितों को सजा भी दे दी।

  1927 के गोधरा कांड के बारे में मोरारजी देसाई ने अपनी जीवनी में लिखा है कि ‘‘ गणेश उत्सव के दौरान हिन्दुओं ने 

बाजा बजाते हुए मस्जिद के पास से जुलूस निकाला।

डी.एस.पी.जियाउद्दीन अहमद की सुरक्षा में जुलूस निकला।

  डी.एस.पी.के डर से मुसलमानों ने मंजीरे बजाने पर आपत्ति नहीं की।

जब जुलूस खत्म हुआ और लोग अपने -अपने घर जाने लगे तो मुसलमानों ने बदले की भावना से लोगांे पर हमला कर दिया।

  जुलूस के नेता वामनराव मुकादम थे।

उनके ऊपर तो बुरी तरह प्रहार हुआ।

चोट खाकर मुकादम जब गिर पड़े तो उनके मित्र पुरुषोत्तम शाह उन्हें बचाने के लिए बीच में पड़े।

 पर उन्हें  हमलावरों ने इतना मारा कि वे मर गए।

मुकादम का हाथ टूटा और अन्य कई को चोट आई।

 हमले के शिकार हिन्दू कांग्रेसी थे।

अंग्रेजों को कांगे्रसियों से नफरत थी।’’

जिले के कलक्टर ने मोरारजी देसाई को निदेश दिया कि वे पड़ताल के बाद अपनी ऐसी रपट तैयार करें ताकि उसमें हिन्दू दोषी पाए जाएं।

मोरारजी ने ऐसा करने से इनकार करते हुए कहा कि मैं तो सिर्फ सत्य ही लिखूंगा।

 मजिस्ट्रेट के रूप में भी मैं वैसा ही आचरण करूंगा।

मोरारजी लिखते हैं कि ‘‘दंगे के इस अनुभव से मेरी इस पूर्व धारणा की पुष्टि हुई कि अंग्रेज सिविलियनों और पुलिस अधिकारियों का रुख कौमी दंगों में निष्पक्ष नहीं होता।

  चूंकि मैंने उनके अन्यायी और पक्षपातपूर्ण रुख में उनका साथ नहीं दिया और तटस्थ रहा,इसीलिए उन्होंने मुझसे दुश्मनी की और प्रतिशोध लेने के लिए डी.एम.ने सरकार से मेरे खिलाफ जांच की विनती की।

  दर -सबेर नौकरी छोड़ देने का विचार भी मेरे मन में वहीं से शुरू हुआ।

  बाद में मोरारजी देसाई आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।कई बार जेल गए।

  आजादी के पहले 1937 में गठित खेर मंत्रिमंडल में बंबई प्रांत के राजस्व मंत्री बने।

  1946 में गठित सरकार में भी मंत्री बने। बाद में देसाई बंबई के मुख्य मंत्री बने।तब गुजरात भी बंबई प्रांत में शामिल था।

बाद में वे केंद्र में मंत्री, उप प्रधान मंत्री और बाद में 1977 में गैर कांग्रेसी सरकार के प्रधान मंत्री बने।

  उनका जन्म 29 फरवरी 1896 को हुआ।उनका निधन 10 अप्रैल 1995 को हुआ।

अंग्रेजी कलेंडर को ध्यान में रखें तो उनका जन्म दिन हर चार साल पर मनाया जाता है।

यह भी ध्यान रहे कि 2002 का गोधरा कांड 27 फरवरी को हुआ था। 

  प्रधान मंत्री बनने से पहले और बाद में भी मोरारजी देसाई एक सत्यनिष्ठ और कत्र्तव्यनिष्ठ नेता के रूप में जाने जाते रहे। 

 आम धारणा रही कि उन्होंने गद्दी के लिए कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया।  

    1979 की बात है।

 मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार गिर रही थी।उसे बचाने की कुछ नेता कोशिश भी कर रहे थे।इसके लिए कुछ कांग्रेसी सांसद मोरारजी से सौदेबाजी करना चाहते थे। मोरारजी देसाई ने सांसदों को खरीदने से तब किस तरह साफ मना कर दिया था,उसका आंखों देखा हाल पटना के एक बुजुर्ग नेता ने बाद में बताया था।

 उत्तर प्रदेश से विजयी एक कांग्रेसी सांसद, जो एक राज घराने से आते थे,तीस -चालीस कांग्रेसी तथा कुछ अन्य दलों के सांसदों को सदन में शक्ति परीक्षा से पहले मोरारजी देसाई से मिलवाना चाहते थे।

   उस सांसद से बिहार के कुछ जनता सांसद मोरार जी के पक्ष में पहले ही बातचीत कर चुके थे।

  इस संबंध में बातचीत करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण जनता सांसद उनके प्रधान मंत्री पद से इस्तीफे के एक दिन पहले मोरारजी के सरकारी आवास पर ंगए।

  पर, तब तक रात के नौ बज चुके थे।

 मोरारजी देसाई सोने चले गए थे।

वे रात में नौ बजे जरूर सो जाते थे।वे सुबह जल्दी जगते थे।इस रूटीन में कोई व्यवधान उन्हें कत्तई मंजूर ही नहीं था,चाहे कुछ भी हो जाए।

  सांसदों ने उन्हें विशेष परिस्थिति में जगा देने के लिए उनके पुत्र कांति देसाई से कहा।

कांति ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया।फिर उनके सचिव को इस काम में लगाया गया।सचिव ने हिम्मत करके दरवाजे पर हल्की दस्तक दी।पर भीतर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्होंने भी अपनी कोशिश छोड़ दी।इस बीच वरिष्ठ जनता सांसदों ने कांति देसाई से कहा कि जो सांसद सरकार बचाने के लिए सामने आना चाहते हैं,वे उसकी कुछ कीमत भी मांग रहे हैं।

  कांति ने कहा कि कीमत दी जा सकती है ,पर इसके लिए पिता जी की अनुमति चाहिए।

  दूसरे दिन जब सुबह मोरारजी को बताया गया तो उन्होंने ऐसी सौदेबाजी करके सरकार बचाने से साफ मना कर दिया।इस तरह मोरारजी ने मर्यादा बचा ली भले उनकी सरकार चली गई। 

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   चुनावी भविष्यवाणियों के ‘उस्ताद’ राजदीप 

 की नजर में यू.पी.में भाजपा की साफ बढ़त

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सुरेंद्र किशोर 

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 राजदीप सरदेसाई के चुनावी आकलन की प्रतीक्षा थी।

वह गत 25 फरवरी को आ गई।

  हिन्दुस्तान टाइम्स में उन्होंने लिखा है कि यू.पी.चुनाव में भाजपा की साफ बढ़त नजर आ रही है।

  सन 2017 के यू.पी.विधान सभा चुनाव नतीजेे को लेकर आकलनकत्र्ताओं ने काफी धुंध फैला रखी थी।

  पर,रिजल्ट से पहले ही राजदीप ने हिन्दुस्तान टाइम्स में ही यह साफ -साफ लिख दिया था कि भाजपा की सरकार बन रही है। बन भी गई।

  मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ था कि जो पार्टी 325 सीटें जीतने वाली थी,उसके बारे में भी धुंध की गुंजाइश क्यों थी !

दरअसल आम तौर पर जाति, पैसा व विचारधारा (व्यक्तियों के द्वारा किए गए)चुनावी आकलन को प्रभावित करती हैं।अपवादों की बात और है।

पर, राजदीप ने पिछले गुजरात विधान सभा चुनाव रिजल्ट की भी सही भविष्यवाणी की थी।

  उससे पहले संभवतः कर्नाटका विधान सभा चुनाव को लेकर भी राजदीप सही थे।

याद रहे कि राजदीप भाजपा या नरेंद्र मोदी के प्रशंसक नहीं हैं।बल्कि कुछ ज्यादा ही आलोचक है।

2017 के यू.पी.विधान सभा चुनाव रिजल्ट को लेकर शम्भूनाथ शुक्ल भी सही थे।

  इस बार शायद उनका आकलन अभी नहीं आया है।

या आया भी होगा तो मैं अपनी अति व्यस्तता के कारण देख नहीं पाया। 

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27 फरवरी 22

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शराबखोरी से होने वाली सड़क दुर्घटना 

और घरेलू हिंसा की घटनाएं देशव्यापी

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ ही साल पहले की बात है। सोशल वर्क में पी.जी. की पढ़ाई कर रहे एक छात्र ने इंटर्नशिप के दौरान मुम्बई के पुलिस थानों में फिल्ड शोध किया था।

शोध का विषय था शराबखोरी का लोगों पर प्रभाव।

अध्ययन में यह पाया गया कि शराबखोरी का घरेलू हिंसा से सीधा संबंध है।

अपने अनुभवों के जरिए बिहार सरकार भी इसी नतीजे पर पहुंची है।

इसके अलावा शराबखोरी से सड़क दुर्घटनाओं का भी संबंध है।

सरकारी आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

 ये चिंताजनक आंकड़े शराबंदी को पूरे देश में लागू करने की जरूरत बताते हैं।

 बिहार में शराबबंदी लागू है।

 किंतु आसपास के राज्यों में शराबबंदी नहीं है। 

 नतीजतन बिहार सरकार को अपने राज्य में उसे पूर्णतः लागू करने में दिक्कत हो रही है। 

  इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए सन 1977 में मोरारजी देसाई सरकार ने देश भर में एक साथ शराबबंदी लागू करनी शुरू की थी।

उसे चार चरणों में पूरा करना था। हर साल शराब की एक चैथाई दुकानें बंद करनी थीं। पर 1979 में देसाई सरकार के अपदस्थ हो जाने के बाद शराबबंदी योजना बंद कर दी गई।

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मंत्रियोें को समुचित वेतन 

देने के पक्ष में थे डा.आम्बेडकर 

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सन 1937 में बम्बई विधान सभा में बोलते हुए डा. बी.आर.अम्बेडकर ने कहा था कि मैं चाहता हूं कि इस देश के मंत्रियों को पर्याप्त वेतन मिले तभी प्रतिभाएं इस पद के लिए सामने  आएंगी। 

डा.आम्बेडकर ने तब यह भी कहा था कि किसी मंत्री के लिए मात्र पांच सौ रुपये का वेतन समुचित नहीं है।

  हाल में कर्नाटका की विधायिका ने जब विधायकों,मंत्रियों व मुख्य मंत्री के वेतन में 40 से 60 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी कर दी तो एक बार फिर यह विवाद शुरू हो गया।

    इस मुद्दे पर एक पक्ष यह कहता है कि भारत के आम लोगों की औसत आय के अनुपात में ही जन प्रतिनिधियों के वेतन-भत्ते भी तय होने चाहिए।

दूसरा पक्ष यह कहता है कि काम और पद की जरूरतों के अनुसार वेतन तय होने चाहिए।

    डा.आम्बेडकर ने इस बात पर जोर दिया था कि यदि प्रशासन में लोगों का विश्वास हम जगाना चाहते हैं तो मेरे अनुसार यह उचित नहीं है कि मंत्री गलियों में अधूरे कपड़े पहन कर जाएं।

अपना शरीर प्रदर्शन करें।

सिगरेट के स्थान पर बीड़ी पिएं।

अथवा, तीसरे दर्जे या बैलगाड़ी से यात्रा करें।

   आम्बेडकर की बात अपनी जगह सही है।

पर आज स्थिति बदली हुई है।

आम्बेडकर के जमाने में अधिकतर नेता अपनी जायज आय

पर ही जीवन यापन करते थे।

आज अपवादों को छोड़कर नेताओं को कई स्त्रोतों से ‘चंदा’ मिलते रहते हैं।

कई नेताओं के लिए वेतन का महत्व कम ही रह गया है।

ऐसे में इस देश के औसत दर्जे के लोगों की आय को ध्यान में रखते हुए ही जन प्रतिनिधियों के वेतन आदि तय किए जाएंगे तो लोगों में नेताओं के बारे में गलत संदेश नहीं जाएगा।  

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दिल्ली लोकायुक्त का पद खाली  

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जन लोकपाल की मांग के समर्थन में अन्ना हजारे के नेतृत्व में अरविंद केजरीवाल तथा अन्य लोगों ने सन 2011 में जन आंदोलन शुरू किया था।

उस आंदोलन से मिली लोकप्रियता के कारण अरविंद को जनता ने  दिल्ली के मुख्य मंत्री की कुर्सी पर बैठाया।

अच्छा किया।अरविंद केजरीवाल इस देश के अधिकतर मुख्यमंत्रियों की अपेक्षा बेहतर साबित हुए हैं।

किंतु समय बीतने के साथ आम आदमी पार्टी व उसकी सरकार में भी वही ‘बीमारी’ घर करने लगी।

  हालांकि अब भी आम आदमी पार्टी सरकार बेहतर काम कर रही है।

  पर शक की सूई उनकी ओर घूमने लगी है।

ताजा मामला लोकायुक्त पद को लेकर है।

दिल्ली में लोकायुक्त का पद पिछले एक साल से खाली है।

सवाल है कि वह पद क्यों नहीं भरा जा रहा है ?

     क्या इसलिए कि आम आदमी पार्टी के 36 विधायकों के खिलाफ करीब एक सौ शिकायतें लोकायुक्त

 के यहां लंबित हैं ?

उधर केरल की माकपा सरकार चाहती है कि वहां के लोकायुक्त को मिले कुछ ‘‘कड़े अधिकारों’’ को उनसे छीन लिया जाए।

 याद रहे कि केरल की सरकार के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के आरोपों की संख्या बढ़ रही है।  

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और अंत में

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 सन 1977 से 2001 तक बिहार विधान सभा की प्रेस दीर्घा में बैठकर सदन की कार्यवाही देखने और रिर्पोटिंग करने का मेरा अनुभव रहा।

 पहले के प्रतिपक्षी विधायकगण प्रश्न काल का जनहित में बेहतर इस्तेमाल करते थे।

हाल के वर्षों में तो अक्सर सदन का लगभग हर काल हंगामा व शोरगुल में ही बीत जाता है।

 जब प्रश्न काल शांतिपूर्वक चलते थे तो सरकार हमेशा दबाव में रहती थी।

सदन के कठघरे में होती  थी।

कई बार तो उसे अपनी विफलताओं के लिए शर्मींदगी भी झेलनी पड़ती थी।

पर ,जब से प्रश्न काल भी शोरगुल व हंगामे में डूबने लगा,मंत्रियों और अफसरों को राहत महसूस होने लगी।

याद रहे कि कुछ दशक पहले के प्रतिपक्षी सदस्यों को जब हंगामा भी करना होता था तो वे उसकी शुरूआत जीरो आवर से करते थे। 

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प्रभात खबर,पटना

25 फरवरी 22


  सन 1927 की गोधरा साम्प्रदायिक हिंसा में अंग्रेजों की बेईमानी ने मोरारजी देसाई को डिपुटी कलक्टर पद से इस्तीफा दे देने को मजबूर कर दिया 

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सुरेंद्र किशोर

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गोधरा में 1927 में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के बाद ही

मोरारजी देसाई ने सरकारी नैकरी छोडकर स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़ने का निर्णय कर लिया था।

  उसे उन्होंने जल्द ही कार्य रूप भी दे दिया।

याद रहे कि तब के अंग्रेज कलक्टर ने

मोरारजी देसाई पर इस बात के लिए दबाव डाला था कि वे 

उस हिंसा ऐसी रिपोर्ट तैयार करें जिससे दंगाई मुसलमानों को दोष मुक्त किया जा सके।

 सन 2002 में भी गोधरा में कारसेवक टे्रन दहन कांड हुआ।

सन 1927 के गोधरा कांड से बीस साल पहले हुए कांड में एक खास तरह की समानता है।

2002 के गोधरा कांड के बाद रेलवे मंत्री लालू प्रसाद ने जस्टिस यू.सी.बनर्जी के नेतृत्व मंे जांच कमेटी बनाई थी ।

उस कमेटी ने यह रपट दी थी कि गोधरा स्टेशन पर ट्रेन की बोगी में किसी ने बाहर से आग नहीं लगाई थी।बल्कि आग भीतर से ही लगी थी।

पर, याद रहे कि सी.बी.आई.जांच से पता चला कि मुसलमानों की भीड़ ने बाहर से पेट्रोल छिड़कर डिब्बे के भीतर बैठे-सोये 59 कार सेवकों को जिंदा जला दिया था।कोर्ट ने उन आरोपितों को सजा भी दे दी।

  1927 के गोधरा कांड के बारे में मोरारजी देसाई ने अपनी जीवनी में लिखा है कि ‘‘ गणेश उत्सव के दौरान हिन्दुओं ने 

बाजा बजाते हुए मस्जिद के पास से जुलूस निकाला।

डी.एस.पी.जियाउद्दीन अहमद की सुरक्षा में जुलूस निकला।

  डी.एस.पी.के डर से मुसलमानों ने मंजीरे बजाने पर आपत्ति नहीं की।

जब जुलूस खत्म हुआ और लोग अपने -अपने घर जाने लगे तो मुसलमानों ने बदले की भावना से लोगांे पर हमला कर दिया।

  जुलूस के नेता वामनराव मुकादम थे।

उनके ऊपर तो बुरी तरह प्रहार हुआ।

चोट खाकर मुकादम जब गिर पड़े तो उनके मित्र पुरुषोत्तम शाह उन्हें बचाने के लिए बीच में पड़े।

 पर उन्हें  हमलावरों ने इतना मारा कि वे मर गए।

मुकादम का हाथ टूटा और अन्य कई को चोट आई।

 हमले के शिकार हिन्दू कांग्रेसी थे।

अंग्रेजों को कांगे्रसियों से नफरत थी।’’

जिले के कलक्टर ने मोरारजी देसाई को निदेश दिया कि वे पड़ताल के बाद अपनी ऐसी रपट तैयार करें ताकि उसमें हिन्दू दोषी पाए जाएं।

मोरारजी ने ऐसा करने से इनकार करते हुए कहा कि मैं तो सिर्फ सत्य ही लिखूंगा।

 मजिस्ट्रेट के रूप में भी मैं वैसा ही आचरण करूंगा।

मोरारजी लिखते हैं कि ‘‘दंगे के इस अनुभव से मेरी इस पूर्व धारणा की पुष्टि हुई कि अंग्रेज सिविलियनों और पुलिस अधिकारियों का रुख कौमी दंगों में निष्पक्ष नहीं होता।

  चूंकि मैंने उनके अन्यायी और पक्षपातपूर्ण रुख में उनका साथ नहीं दिया और तटस्थ रहा,इसीलिए उन्होंने मुझसे दुश्मनी की और प्रतिशोध लेने के लिए डी.एम.ने सरकार से मेरे खिलाफ जांच की विनती की।

  दर -सबेर नौकरी छोड़ देने का विचार भी मेरे मन में वहीं से शुरू हुआ।

  बाद में मोरारजी देसाई आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।कई बार जेल गए।

  आजादी के पहले 1937 में गठित खेर मंत्रिमंडल में बंबई प्रांत के राजस्व मंत्री बने।

  1946 में गठित सरकार में भी मंत्री बने। बाद में देसाई बंबई के मुख्य मंत्री बने।तब गुजरात भी बंबई प्रांत में शामिल था।

बाद में वे केंद्र में मंत्री, उप प्रधान मंत्री और बाद में 1977 में गैर कांग्रेसी सरकार के प्रधान मंत्री बने।

  उनका जन्म 29 फरवरी 1896 को हुआ।उनका निधन 10 अप्रैल 1995 को हुआ।

अंग्रेजी कलेंडर को ध्यान में रखें तो उनका जन्म दिन हर चार साल पर मनाया जाता है।

यह भी ध्यान रहे कि 2002 का गोधरा कांड 27 फरवरी को हुआ था। 

  प्रधान मंत्री बनने से पहले और बाद में भी मोरारजी देसाई एक सत्यनिष्ठ और कत्र्तव्यनिष्ठ नेता के रूप में जाने जाते रहे। 

 आम धारणा रही कि उन्होंने गद्दी के लिए कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया।  

    1979 की बात है।

 मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार गिर रही थी।उसे बचाने की कुछ नेता कोशिश भी कर रहे थे।इसके लिए कुछ कांग्रेसी सांसद मोरारजी से सौदेबाजी करना चाहते थे। मोरारजी देसाई ने सांसदों को खरीदने से तब किस तरह साफ मना कर दिया था,उसका आंखों देखा हाल पटना के एक बुजुर्ग नेता ने बाद में बताया था।

 उत्तर प्रदेश से विजयी एक कांग्रेसी सांसद, जो एक राज घराने से आते थे,तीस -चालीस कांग्रेसी तथा कुछ अन्य दलों के सांसदों को सदन में शक्ति परीक्षा से पहले मोरारजी देसाई से मिलवाना चाहते थे।

   उस सांसद से बिहार के कुछ जनता सांसद मोरार जी के पक्ष में पहले ही बातचीत कर चुके थे।

  इस संबंध में बातचीत करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण जनता सांसद उनके प्रधान मंत्री पद से इस्तीफे के एक दिन पहले मोरारजी के सरकारी आवास पर ंगए।

  पर, तब तक रात के नौ बज चुके थे।

 मोरारजी देसाई सोने चले गए थे।

वे रात में नौ बजे जरूर सो जाते थे।वे सुबह जल्दी जगते थे।इस रूटीन में कोई व्यवधान उन्हें कत्तई मंजूर ही नहीं था,चाहे कुछ भी हो जाए।

  सांसदों ने उन्हें विशेष परिस्थिति में जगा देने के लिए उनके पुत्र कांति देसाई से कहा।

कांति ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया।फिर उनके सचिव को इस काम में लगाया गया।सचिव ने हिम्मत करके दरवाजे पर हल्की दस्तक दी।पर भीतर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्होंने भी अपनी कोशिश छोड़ दी।इस बीच वरिष्ठ जनता सांसदों ने कांति देसाई से कहा कि जो सांसद सरकार बचाने के लिए सामने आना चाहते हैं,वे उसकी कुछ कीमत भी मांग रहे हैं।

  कांति ने कहा कि कीमत दी जा सकती है ,पर इसके लिए पिता जी की अनुमति चाहिए।

  दूसरे दिन जब सुबह मोरारजी को बताया गया तो उन्होंने ऐसी सौदेबाजी करके सरकार बचाने से साफ मना कर दिया।इस तरह मोरारजी ने मर्यादा बचा ली भले उनकी सरकार चली गई। 

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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

 जब किसी भ्रष्ट के खिलाफ किसी भी नागरिक को 

कोर्ट जाने का अधिकार है ही तो यह रोना क्यों रो रहे हो  कि केंद्र की भाजपा सरकार जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है ?

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जिस किसी भ्रष्ट को, आपके अनुसार, भाजपा सरकार बचा रही है ,रोना रोने के बदले उसके खिलाफ आप कोर्ट क्यों नहीं चले जाते ?

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सुरेंद्र किशोर

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डा.सुब्रह्मण्यन स्वामी ने 1 जून 1996 को चेन्नई की एक अदालत में जय ललिता के खिलाफ केस दायर किया जिसमें आय से अधिक धन नाजायज तरीके से एकत्र करने का

उन पर आरोप लगाया गया।

  सीआर.पी.सी. की धारा-200 के तहत यह याचिका दायर की गई।

उस पर अदालत ने 21 जून 1996 को इसकी जांच का आदेश दिया।

 जांच रपट के आधार पर दायर आरोप पत्र पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने जयललिता व अन्य को दोषी पाया।

सजा हुई।

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चारा घोटाले को लेकर भी जनहित याचिकाएं पटना हाई कोर्ट में दायर की गई थी।

अदालत ने सी.बी.आई.जांच का आदेश दिया।

इस घोटाले में कई लोगांे को अदालत सजा दे चुकी है।

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यानी, इन दोनों मामलों में दोषियों को सजा दिलाने के लिए लोगों ने व्यक्तिगत हैसियत से पहल की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने हर नागरिक को ऐसी छूट भी दे रखी है।

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इस उपलब्ध सुविधा के बावजूद आज कोई सरकारी एजेंसी किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई शुरू करती है तो पीड़ित व्यक्ति या उसके समर्थक यह रोना रोते लगते हैं कि इसी के खिलाफ कार्रवाई क्यों हुई ? फलां भ्रष्ट व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है ?

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डा.स्वामी या चारा घोटाले में पी. आई. एल. करने वाले तो ऐसा रोना नहीं रो रहे थे।

उन लोगों ने अपने पौरूष का प्रदर्शन किया और दोषियों  को 

सजा दिलवा दी।

यदि जांच एजेंसियां आज के किन्हीं भ्रष्ट सत्ताधारियों को  बख्श रही है तो आप भी डा.स्वामी या चारा घाोटाले के याचिकाकर्ताओं की राह पर क्यों चल रहे हैं ?

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यदि आप उस राह पर नहीं चलिएगा तो यह माना जाएगा कि आपके पास अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई ठोस सबूत नहीं हंै।

आप सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं।

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मंत्री पद से हटा दिए गए तो असंतुष्ट हो गए।

सदन में पहंुचने का दूसरा मौका नहीं मिला तो पार्टी छोड़ दी।

यह सब अब स्वार्थी राजनीति का आम चलन हो गया है।

इस स्थिति में विभिन्न दलों के ऐसे नेताओं की सूची बननी चाहिए जो टिकट कटने के बावजूद पार्टी में बने रहते हैं।

साथ ही, उन लोगों की भी सूची बने जो मंत्री पद से हटाए जाने के बावजूद दल या सुप्रीमो से नाराज नहीं होते।

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   इस स्थिति के दो अपवाद मुझे फिलहाल नजर आते हैं।

अपवाद और भी होंगे किंतु मुझे उनके बारे में पता नहीं।

पता चलेगा तो उन पर भी लिख दूंगा।

राजद के जगदानंद सिंह और जदयू के नीरज कुमार अपवाद स्वरूप लगते हैं।

नीरज कुमार पहले बिहार में मंत्री थे।

अब नहीं हैं।

 फिर भी मैं देखता हूं कि जदयू व उसके नेता नीतीश कुमार के प्रति नीरज कुमार का समर्थन व प्रशंसा के भाव पहले जैसे ही हैं।

  जगदानंद सिंह लगातार लालू प्रसाद व राजद के प्रति प्रतिबद्ध बने हुए हैं।

जबकि चुनाव हारने के बाद भी न तो वे राज्य सभा में हैं और न ही विधान परिषद में।

मैं यहां यह नहीं कह रहा हूं कि वे उच्च सदन की सदस्यता चाहते हैं।

 कुछ तथाकथित लाॅयल नेता भी पीछे में अपने सुप्रीमो की आलोचना यदाकदा कर देते हैं।

पर, जगदा जी को पीठ पीछे भी कभी आलोचना करते नहीं सुना।

यह लिखने का मेरा आशय सिर्फ यही है कि आप चाहे जिस दल रहें,जन सेवा भाव से रहें।

सिर्फ मेवा प्राप्ति के लिए नहीं।

उससे राजनीति बेहतर होगी और लोगों की राय राजनीति के प्रति बदलेगी।

सफल लोकतंत्र के लिए यह जरूरी तत्व है।

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सुरेंद्र किशोर

25 फरवरी 22     


गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022

 अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो(नौजवानो) !

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क्योंकि जेहादियों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष 

को लेकर इस देश की ‘राजनीति’ दुविधा में है

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किंतु जेहादियों के बीच किसी तरह की दुविधा नहीं। 

इस देश के कई राजनीतिक दल व नेता वोट के लिए 

इस देश को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं।

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केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के अनुसार इस देश 

के 80 प्रतिशत मुसलमान जेहादियों के साथ नहीं हैं।

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सुरेंद्र किशोर

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सिमी के संस्थापक सदस्य सफदर नागौरी को अहमदाबाद बम धमाकों के मामले में, जिनमें 56 निर्दोष लोग मारे गए थे,जब फांसी की सजा हुई तो उसने कहा कि ‘‘हमारे लिए कुरान के फैसले सर्वोच्च हैं, न कि भारत के संविधान या कानून के फैसले।’’

सन 2008 में हुए उन बम धमाकों का नागोरी मुख्य साजिशकर्ता था।

याद रहे कि नागोरी सहित 38 दोषियों को कल मृत्यु दंड दिया गया है।

दरसल ‘सिमी’ के लोग,जिसका ताजा स्वरूप पी.एफ.आई.है,भारत में हथियारों के बल पर इस्लामिक शासन कायम करने के लिए वर्षों से प्रयत्नशील हैं।

शाहीनबाग, हिजाब वगैरह विवाद के पीछे पी एफ आई ही है।

इस जेहादी संगठन को इस देश के अनेक राजनीतिक दलों व तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों का समर्थन हासिल है।

हालांकि केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी का दावा है कि ‘‘इस देश के 80 प्रतिशत मुसलमान जेहादियों के साथ नहीं हैं।’’

खुदा करे,यह दावा सच साबित हो।

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अब जरा उनकी सुनिए--

वैसे इस अंडर ग्राउंड संगठन के ओवर ग्राउंड समर्थक रोज रोज इस देश के टी.वी चैनलों पर आकर इन जेहादियों का बचाव करते रहते हैं।ऐसे टी.वी कार्यक्रमों से जेहादियों की ताकत बढ़ती जा रही है।

 9 अप्रैल, 2008 के ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के अनुसार नागौरी ने

कहा था कि ‘‘हमारा लक्ष्य जेहाद के जरिए भारत में इस्लामिक शासल कायम करने का है।’’

7 अगस्त 2008 के ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ के अनुसार लालू प्रसाद ने कहा था कि यदि सिमी पर प्रतिबंध लग गया तो आर.एस.एस.पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए।

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मुलायम सिंह यादव ने भी 2008 में सिमी का बचाव किया।

12 अगस्त, 2008 को राम विलास पासवान ने भी सिमी पर से प्रतिबंध हटाने की मांग की।

  जबकि 2008 में यू.पी.ए.सरकार ने सिमी पर रोक जारी रखने की सुप्रीम कोर्ट से गुहार की।

पर कांग्रेस के ही सलमान खुर्शीद सुप्रीम कोर्ट में सिमी के वकील थे।

प्रतिबंध के खिलाफ सिमी ने याचिका दायर की थी।

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 टाइम्स आॅफ इंडिया के अनुसार सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने कहा था कि ‘‘जब भी हम सत्ता में आएंगे तो हम इस देश के सभी मंदिरों को तोड़ देंगे और वहां मस्जिद बनवाएंगे।(टाइम्स आॅफ इंडिया..30 सितंबर 2001)  

  सिमी,आई. एम. और पी. एफ. आई. के लोगों के दिमाग उनके अपने इस 

लक्ष्य के प्रति बिलकुल साफ हैं।

हां,इस देश के कई तथाकथित ‘सेक्युलर’ राजनीतिक दल मुस्लिम वोट के लिए ऐसे जेहादी संगठनों का साथ देते रहे हैं।

इन राजनीतिक व बौद्धिक तत्वों की मदद से ये जेहादी तत्व अपनी ताकत बढ़ाते जा रहे हैं।

अब इस देश की नई पीढ़ी के लोगों को ही सोचना है कि देश को उनकी गिरफ्त में जाने से कैसे रोकना है। 

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सन 2001

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सिमी की राष्ट्रविरोधी व हिंसक गतिविधियों को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा दिया।

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3 सितंबर 2001

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सरकार ने सिमी पर जो प्रतिबंध लगाया है,वह मेरी दृष्टि में जायज नहीं है।

     ---शाही इमाम ,फतेहपुरी मस्जिद

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‘‘गुजरात दंगों के बाद दंगों की प्रतिक्रिया में इंडियन मुजाहिद्दीन का गठन हुआ।’’

         ---डा.शकील अहमद,

     कांग्रेस महा सचिव--21 जुलाई 2013

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सिमी पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए था।

--मुलायम सिंह यादव

7 अगस्त 2008

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मन मोहन सिंह सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सिमी के लोग जेहाद का प्रचार कर रहे हैं और कश्मीर में आतंकवादियों की पूरी मदद

कर रहे हैं।

....टाइम्स आॅफ इंडिया .....21 अगस्त 2008 -- 

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राम विलास पासवान ने सिमी पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग की।

        ---12 अगस्त 2008 

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कश्मीर के  अलगाववादी नेता 

सैयद अली शाह जिलानी ने कहा कि 

सिमी पर प्रतिबंध नागरिक अधिकार पर हमला है।

--29 सितंबर 2001

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सिमी से प्रतिबंध हटाए जाने के ट्रिब्यूनल के निर्णय पर भाजपा ने केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए इसका ठीकरा गृह मंत्री शिवराज पाटिल पर फोड़ा है।

     ---6 अगस्त 2008

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हालांकि मनमोहन सरकार को सिमी पर फिर प्रतिबंध लगाना पड़ा

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रेल मंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि मैंने हमेशा कहा है कि  सिमी पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए।

यदि लगता है तो शिव सेना और दुर्गा वाहिनी पर प्रतिबंध लगना चाहिए।

-----टाइम्स आॅफ इंडिया--7 अगस्त 2008

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यशवंत सिन्हा के नेतृत्व में भाजपा के प्रतिनिधि मंडल ने चुनाव आयोग से मिलकर यह मांग की कि सिमी समर्थक दलों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

   ----19 अगस्त 2008

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सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने 2001 में  मीडिया से  बातचीत  में कहा था कि ‘जब हम सत्ता में आएंगे तो सभी मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बना देंगे।’ 

मंसूरी का बयान 30 सितंबर 2001 के  अखबार में छपा था। 

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2012 में पश्चिम बंगाल के डी.जी.पी.एन.मुखर्जी ने कहा था कि सिमी के जरिए आई.एस.आई.ने माओवादियों से तालमेल बना रखा है।

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2001 में जब सिमी पर  केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगाया तो उस प्रतिबंध के खिलाफ

सिमी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।सिमी के वकील कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद थे।

तब वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे।

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 स्थापना के समय  सिमी, जमात ए इस्लामी हिंद से जुड़ा छात्र संगठन था।

पर जब 1986 में सिमी ने ‘इस्लाम के जरिए भारत की मुक्ति’ का नारा दिया तो जमात ए इस्लामी हिंद ने उससे अपना संबंध तोड़ लिया।

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केंद्र सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध लगाने के लिए जो मापदंड अपनाए,वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं।

      ---- इम्तियाज अहमद,

             प्रोफेसर जे.एन.यू

              30 सितंबर 2001

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मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह ने राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए सिमी पर प्रतिबंध लगाने का स्वागत किया,पर बजरंग दल पर प्रतिबंध नहीं लगाने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई।

   ---पायनियर--29 सितंबर 2001

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भाजपा के पूर्व महा सचिव गोविंदाचार्य ने सिमी की तरफदारी पर रेल मंत्री लालू प्रसाद की आज कड़ी निंदा की और आर.एस.एस.पर प्रतिबंध की मांग को अल्पसंख्यक की राजनीति का हिस्सा करार देते हुए नकार दिया।

------इंदौर--19 अगस्त 2008

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सिमी के संविधान में भारत को मजहबी आधार पर बांटने की बात स्पष्ट रूप से दर्ज है।

-----सी.बी.आई.के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह

   --22 सितंबर 2008 ,राष्ट्रीय सहारा  

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लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं है।उसके लिए एकमात्र रास्ता जेहाद है।

-------सिमी सदस्य अबुल बशर--

28 सितंबर 2008--राष्ट्रीय सहारा 

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‘‘जेहाद के नाम पर बिहार में भड़काया जाने लगा है एक वर्ग को।’’

    ----बिहार पुलिस की  खुफिया शाखा की रपट

             22 सितंबर 2001

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पुनश्चः

सन 2001 की एक रपट के अनुसार सिमी के समर्थकों की संख्या एक लाख हो चुकी है।

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