गुरुवार, 7 सितंबर 2023

 जो दल  देश,काल,पात्र की वास्तविक समस्याओं और जरूरतों 

को समझ कर उनके हल के लिए गंभीर प्रयास नहीं 

करेगा,वह इस देश में टिकाऊ नहीं होगा

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सुरेंद्र किशोर

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जयप्रकाश नारायण,डा.राम मनोहर लोहिया,सोवियत संघ और चीन !

फिलहाल आज इन्हीं की चर्चा करूंगा।

चारों ने देश,काल, पात्र की जरूरतों के अनुसार अपनी नीतियां-रणनीतियां बदली हैं।

चारों अपने -अपने उद्देश्यों में काफी हद तक सफल रहे।

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पर,सवाल है कि जेपी,लोहिया,सोवियत संघ और चीन के भारतीय प्रशंसकों ने उनसे कितना कुछ सीखा ?

मुझे लगता है कि नहीं सीखा।

इसीलिए आज वे पूरे देश के स्तर पर निर्णायक नहीं है।

बल्कि इस देश की राजनीति में अभी तो भाजपा निर्णायक है।

कल क्या होगा,मैं उसकी भविष्यवाणी कैसे कर दूं ?

भविष्य जानता भी हूं,फिर भी नहीं करूंगा।

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जेपी से बात शुरू करता हूं।

जेपी पहले माक्र्सवादी थे।

समझते थे कि उसी से मानवता खास कर भारतीयों का कल्याण होगा।

पर,उन्होंने जब महसूस किया कि भारत की मिट्टी के लिए वह अनुकूल नहीं है तो वे पहले कांग्रेस और बाद में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े।

प्रथम चुनाव के बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास लेकर सर्वाेदय-भूदान ज्वाइन किया।

पर,जब सत्तर के दशक में उन्होंने महसूस किया कि इंदिरा गांधी की एकाधिकारवादी सरकार देश के लिए ठीक नहीं है तो छात्रों-युवकों के आंदोलन को सफल नेतृत्व दिया।

ऐसी आंधी चलाई कि पहली बार केंद्र की सत्ता से कांग्रेस का एकाधिकार टूट गया।

 जो कुछ तब की जनता चाहती थी,जेपी उस चाह के स्वर बने।

    क्या जेपी के आज के प्रशंसक-समर्थकगण आम जनता की वास्तविक चाह और जरूरतों की पहचान कर पा रहे हैं ?

लगता तो नहीं है।

वैसे इस सवाल का पक्का जवाब सन 2024 का लोस चुनाव रिजल्ट दे देगा।

कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति कहेगा कि सन 1977 की केंद्र की मोरारजी देसाई सरकार, पिछली कांग्रेस सरकार से बेहतर थी।

1977 में बिहार में बनी कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व वाली जनता सरकार पिछली कांग्रेसी सरकार से बेहतर थी।

यदि जेपी अपनी पुरानी ही विचार धारा व कार्य प्रक्रिया से जुड़े रह जाते तो वह परिवर्तन नहीं करा पाते जैसा उन्होंने सन 1977 के ऐतिहासिक क्षणों  में करा दिया।

कल्पना कीजिए कि तब के एक तानाशाह के सामने जेपी जैसे संत नहीं उठ खड़े होते तो इस देश का क्या होता ?

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अब डा.राम मनोहर लोहिया पर आते हैं।

डा.लोहिया पहले खुद अपनी सोशलिस्ट पार्टी वर्षों तक अकेले चलाते रहे।

सोपा और बाद की संसोपा तब सिद्धांत के पक्के लोगों की जमात थी जब तक लोहिया जीवित थे।

पर,अपने जीवनकाल में ही जब लोहिया ने यह महसूस किया कि अकेले हमारी पार्टी कुछ खास नहीं कर सकती,तो उन्होंने गैर कांग्रेसी दलों से तालमेल और गठबंधन की कोशिश शुरू की।

लोहिया के सहयोगी जार्ज फर्नांडिस कम्युनिस्टों से तालमेल के सख्त खिलाफ थे।

उन्होंने लोहिया से कहा कि यदि उनसे तालमेल करोगे तो अपना मुंह काला करा कर लौटोगे।

लोहिया ने जवाब दिया--यदि नहीं करोगे तो मुंह डबल काला होगा।

एक हद तक तालमेल हुआ और सन 1967 के चुनाव में सात राज्यों में कांग्रेस हार गयी।

कांग्रेस जो खुद को अजेय समझती थी और अहंकारी हो चुकी थी,उसका मद लोहिया ने तोड़ दिया।

लोहिया का ही करिश्मा था कि 1967 के बिहार व उत्तर प्रदेश सरकारों में 

जनसंघ और सी.पी.आई.के मंत्री एक साथ मिलकर काम कर रहे थे।

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सोवियत क्रांति में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी की युगांतरकारी उपलब्धि थीं।

उसने समानतावादी समाज बनाने की कोशिश की।

एक हद तक वे सफल भी हो गये।

पर,कई बार होता यह है कि पिछली दवाएं अनंत काल तक कारगर नहीं रहतीं।

वैसे में होश्शियार लोग दवाएं बदल लेते हैं।

रूस ही नहीं, चीन में भी यही हुआ।दवाएं बदली गयीं।

चीन में जब पूंजीवाद आया तो वहां की सरकार से सवाल पूछा गया।

उसने जवाब दिया कि हम समाजवाद की रक्षा के लिए पूंजीवाद अपना रहे हैं।

चीन ने एक काम और किया।उइगर के जेहादी मुसलमानों का उसने ऐसा दमन किया जैसा भारत के कम्युनिस्ट सोच भी नहीं सकते।

भारत के कम्युनिस्ट दल तो पश्चिम बंगाल व केरल में जेहादियों का विरोध करने का नाम तक नहीं लेते।बल्कि उन्हें वोट के लिए बढ़ावा देते हैं।

नतीजतन उन राज्यों में भी भाजपा जड़ें जमाने लगी है।

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काश ! भारत के सोवियत पक्षी कम्युनिस्ट, पहले के सोवियत संघ व बाद के रूस से तथा चीन पंथी कम्युनिस्ट चीन में आए परिवर्तनों से शिक्षा लेते तो उन दलों का यह हाल नहीं होता जो आज है।

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उसी तरह जेपी-लोहिया के आज के शिष्य समाजवादी के बदले व्यवहारवादी हो चुके हैं।

  इस देश के कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों से पूछिए कि इस देश की तीन सर्वाधिक महत्वपूर्ण समस्याएं कौन सी है ?

वे वही बताएंगे जो बताते रहे हैं,उनमें असली तीन समस्याएं शामिल नहीं होंगी ं।

नतीजतन उनके भविष्य की कल्पना कर लीजिए। 

भारत जैसे एक गरीब देश के लिए सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट एक समय जरूरी माने गये थे।

आज भी जरूरी होनी चाहिए थी।

पर,समस्याओं की पहचान व उसके उपाय में वे विफल रहे।जबकि इन दो संगठनों में एक से एक ईमानदार और निःस्वार्थी नेता व कार्यकर्ता रहे हैं।

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एक रोचक उदाहरण के साथ अपनी बात समाप्त करूंगा।

सन 1977 के चुनाव अभियान के दौरान जनता पार्टी के नेता -कार्यकर्ता गण इमरजेंसी के अत्याचारों और इंदिरा गांधी की तानाशाही की बातें अपनी चुनाव सभाओं में करते थे।

पर,दूसरी ओर ,सी.पी.आई.अक्सर अपनी चुनाव सभाओं में यह भी कहती थी कि दियो गार्सिया द्वीप में अमेरिका सैनिक अड्डा बना रहा है, उससे भारत को खतरा है।

  1977 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के साथ सी.पी.आई.की भी भारी पराजय हुई।

उसके बाद बिहार सी.पी आई की बैठक में एक जूनियर कामरेड ने अपने बड़े नेता पूछा--‘‘कामरेड,आजकल दियागो गार्सिया का क्या हाल है ?’’

बेचारे चुप रहे गये।

यह प्रकरण मुझे दैनिक ‘जनशक्ति’पटना के तेज-तर्रार संवाददाता शिवनारायण सिंह ने बताई थी।

बाद में वे दैनिक आर्यावर्त से जुड़े और हम पत्रकारों के नेता भी थे।

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कहानी का मोरल

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

जब तक राजनीतिक दल व उनके नेता देश, काल, पात्र की वास्तविक जरूरतों-समस्याओं को समझ कर उनके समाधान का रास्ता नहीं ढूंढेंगे ,तब तक 

 .........थोड़ा कहना,बहुत समझना !!!

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7 सितंबर 23


बुधवार, 6 सितंबर 2023

 


भारतीय संविधान की मूल प्रति के हिन्दी संस्करण

 की प्रस्तावना में ‘‘इंडिया’’शब्द  क्यों नहीं ?

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--सुरेंद्र किशोर

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भारत के संविधान की मूल प्रति मेरे निजी पुस्तकालय में उपलब्ध है।

हिन्दी और अंग्रेजी दोनों संस्करण मैंने एक बार फिर देखे।

प्रस्तावना पढ़ी।

 अंग्रेजी संस्करण की प्रस्तावना में भारत शब्द नहीं है।

हिन्दी संस्करण की प्रस्तावना में इंडिया शब्द नहीं है।

ऐसी असंगति क्यों ?!!

बी.बी.सी.वाले डा.विजय राणा बताते हैं कि संविधान के किसी भी भाषाई संस्करण में इंडिया शब्द नहीं है।

जाहिर है कि यह फैसला तो संविधान सभा का ही है।

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भारत तो देसी नाम है।

प्राचीन है।

परंपरागत है।

भारत शब्द हमारे प्राचीन ग्रंथ में भी मिलता है।

इंडिया तो अंग्रेजों का दिया हुआ नाम है।

वह गुलामी की निशानी है।

आजादी के बाद की हमारी सरकारों ने बारी -बारी से नई 

दिल्ली की उन सड़कों के वे नाम बदल दिए जो गुलामी की निशानी थे।

पता नहीं संविधान से इंडिया शब्द को क्यों नहीं बदला ?

नहीं बदला तो यह काम मौजूदा सरकार कर रही है।

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आजादी के बाद नई दिल्ली की जिन सड़कों के नाम बारी -बारी से बदल दिए गए,उनके नये-पुराने नाम यहां दिए जा रहे हैं--

1.-किंग्स वे--राजपथ

 2.-कुतुब रोड--श्री अरविंद मार्ग

3.-क्लाइव रोड--त्यागराज मार्ग

4.-लिटिन रोड--काॅपरनिकस मार्ग

5-किंग एडवर्ड रोड--मौलाना आजाद रोड

6.-विक्टोरिया रोड--राजेंद्र प्रसाद रोड

7.-हेस्टिंग्स रोड--कृष्ण मेनन मार्ग

8.-इम्पीरियल रोड--जनपथ

9.-कैंटोनमेंट रोड--बाबा खड़ग सिंह रोड

10.-क्वीन मेरिज एवेन्यू --पंडित पंत मार्ग

11-एलनबाई रोड--डा.बिशम्बर दास मार्ग

12.-बेयर्ड रोड--बंगला साहिब मार्ग

13.-मार्किट रोड--भाई वीर सिंह मार्ग

14-इबटसन रोड--रामकृष्ण आश्रम मार्ग

15.-लोअर रिज रोड--मन्दिर मार्ग

16.-वेजले  रोड--जाकिर हुसैन मार्ग

17.-लेडी हार्डिंग रोड--शहीद भगत सिंह रोड

18.-बेअर्ड रोड--गुरुद्वारा बंगला साहिब रोड 

19.-सर्कुलर रोड--जवाहरलाल नेहरू मार्ग

20.-राऊज एवेन्यू --दीन दयाल उपाध्याय मार्ग

21.-ओल्ड मिल्स रोड--रफी मार्ग 

22.-अलबुकर रोड--तीस जनवरी मार्ग

23.-साऊथ एंड रोड--राजेश पायलट मार्ग 

24.-हार्डिंग एवेन्यू--तिलक मार्ग

25.-कर्जन रोड--कस्तूराबा गांधी मार्ग

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इसके बाद मद्रास,बंबई और कलकत्ता सहित 19 नगरों के नाम बदले गये।

ऐसा क्यों हुआ ?

ऊपर के नाम बदलने जरूरी थे तो उसी तर्क के आधार पर इंडिया दैट इज भारत को भारत करना भी जरूरी था।जरूरी है।

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6 सितंबर 23


गुरुवार, 31 अगस्त 2023

 ताजा संदर्भ--भारत के भूभाग पर चीन का दावा

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सन 1962 के युद्ध में भारत की पराजय के तत्काल बाद लिखी गयी  राष्ट्रकवि दिनकर की एक कविता याद आ गयी।

वे लोग यह जरूर पढ़ें जो चंद्रायण-3 तक का श्रेय जवाहरलाल नेहरू को भी दे रहे हैं।

वही लोग चीन के हाथों भारत की पराजय का दोषी सिर्फ तब के रक्षा मंत्री वी.केे.कृष्ण मेनन को मानते हैैं।

डा.राममनेाहर लोहिया ने कहा था कि दुनिया की कौन सी कौम है जो अपने सबसे बडे़ देवता यानी महा देव शिव को दूसरे देश में स्थापित करती है ?

उनका आशय कैलास मान सरोवर से था।

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रामधारी सिंह दिनकर ने कभी नेहरू को ‘‘लोक देव नेहरू’’ लिखा था। पर,जब उन्होंने उनकी नाकामयाबी देखी तो निम्न लिखित कविता लिख दी।

तब वे राज्य सभा के सदस्य थे।

इस कविता के बाद उनकी राज्य सभा की सदस्यता का नवीनीकरण नहीं हुआ।

वे भी जानते थे कि इसके बाद नहीं होगा।

दरअसल तब वैसे लोग हमारे बीच कुछ अधिक ही थे जो देश के लिए पद को कुर्बान कर देने के लिए तैयार रहते थे।

पर,आज तो हमारे बीच वैसे लोगों की भरमार है जो पद के लिए राष्ट्र को भी अपूरणीय क्षति पहुंचाने के लिए काम करते रहते हैं।

पता नहीं,इस देश को क्या होगा ?

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  परशुराम की प्रतीक्षा से 

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घातक है जो देवता सदृश दिखता है,

लेकिन,कमरे में गलत हुक्म लिखता है,

जिस पापी को गुण नहीं,गोत्र प्यारा है,

समझो,उसने ही हमें यहां मारा है।

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जो सत्य जानकार भी न सत्य कहता है,

जो किसी लोभ के विवश मूक रहता है,

उस कुटिल राजतंत्री कदर्य को धिक् है,

यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं,वधिक है।

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चोरों के जो हेतु ठगों के बल हैं,

जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,

जो छल-प्रपंच ,सबको प्रश्रय देते हैं,

या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं,

यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,

भारत अपने घर में ही हार गया है।

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कह दो प्रपंचकारी,कपटी ,जाली से,

आलसी ,अकर्मण्य ,काहिल,हड़ताली से,

सीले जुबान ,चुपचाप काम पर जाये

हम यहां रक्त वे घर में स्वेद बहाये

जो कहो पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में

या आगे सुलगती रही प्रजा के मन में

तमस यदि बढ़ता गया ढकेल प्रभा को

निर्बंध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को

रिपु नहीं,यही अन्याय हमें मारेगा

अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।

    ---रामधारी सिंह दिनकर

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 चीनी हमले के समय के हालात और तब के शीर्ष 

शासन की विफलता, अदूरदर्शिता,अक्षता,

अव्यावहारिकता पर अब दो शब्द। 

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देश के प्रमुख पत्रकार मन मोहन शर्मा के अनुसार,

‘‘एक युद्ध संवाददाता के रूप में मैंने चीन के हमले को कवर किया था।

  मुझे याद है कि हम युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे।

 हमारी सेना के पास अस्त्र,शस्त्र की बात छोड़िये,कपड़े तक नहीं थे।

 नेहरू जी ने कभी सोचा ही नहीं था कि 

चीन  हम पर हमला करेगा।

एक दुखद घटना का उल्लेख करूंगा।

अंबाला से 200 सैनिकों को एयर लिफ्ट किया गया था।

उन्होंने सूती कमीजें और निकरें पहन रखी थीं।

उन्हें बोमडीला में एयर ड्राप कर दिया गया

जहां का तापमान माइनस 40 डिग्री था।

वहां पर उन्हें गिराए जाते ही ठंड से सभी बेमौत मर गए।

  युद्ध चल रहा था,मगर हमारा जनरल कौल मैदान छोड़कर दिल्ली आ गया था।

ये नेहरू जी के रिश्तेदार थे।

इसलिए उन्हें बख्श दिया गया।

हेन्डरसन जांच रपट आज तक संसद में पेश करने की किसी सरकार में हिम्मत नहीं हुई।’’

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नोट-अपनी इस रपट की पुष्टि करने के लिए शर्मा जी अब भी हम लोगों के बीच मौजूद हैं।

हाल तक फेसबुक पर सक्रिय थे।

चीनी हमले से ठीक पहले सेना ने केंद्र सरकार से जरूरी खर्चे के लिए एक करोड़ रुपए की मांग की थी।

पर,केंद्र सरकार ने नहीं दिया।

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सुरेंद्र किशोर

30 अगस्त 23






 देश कहां जा रहा है ?!!

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गठबंधन ‘इंडिया’’ के बैठक स्थल पर 1610 रु.में 

एक प्लेट नाश्ता,485 रुपए में एक कप चाय और 

550 रु.में एक कप काॅफी मिलती है

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कुछ अन्य राजनीतिक दलों का भी यही हाल है।

आम लोगों से कितना कट चुके हैं हमारे नेतागण ?

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सुरेंद्र किशोर

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‘‘इंडिया’’से जुड़े नेता गण आज मुम्बई के ग्रैंड हयात सितारा होटल में बैठक कर रहे हैं।

गरीब देश के इन नेताओं में से अधिकतर अमीर नेता चार्टर्ड विमान से यात्रा किया करते हैं।

अब उस होटल के खर्चे की एक झलक देखिए।

गुगल में जाकर उसका मेनू खोजिए।

पता चलेगा कि वहां एक कप चाय की कीमत 485 रुपए है।

काॅफी की कीमत 550 रुपए और नाश्ता 1610 रुपए में मिलेगा।

होटल के अन्य खर्चों का अनुमान लगा लीजिए।

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अब इधर इस देश की हालत पर जरा गौर कीजिए।

आज के ही अंग्रेजी दैनिक ‘द हिन्दू’ में छपा है कि(यू.एन.रिपोर्ट के अनुसार) भारत के 74 प्रतिशत लोगांे को स्वस्थकर भोजन नसीब नहीं है।

अस्सी करोड़ लोगों को तो केंद्र सरकार लगभग मुफ्त अनाज दे रही है ताकि वे अपने पेट की, अपनी पीठ से दूरी बनाए रखें।   

जो नेतागण मुम्बई में आज बैठक कर रहे हैं ,वे उन्हीं 74 प्रतिशत लोगों के असली प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं।महंगी और गरीबी का रोना रोते हैं।

पिछले कुछ दशकों में देखते -देखते इस देश में नेताओं और आम लोगों के बीच का अंतर कितना अधिक बढ़ गया !!!

मैं तो सन 1966-67 से ही, पहले राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में और बाद में पत्रकार के रूप में सब कुछ देखता-समझता रहा हूं।

हाल के वर्षों में राजनीतिक खर्चों में हुई अपार बढ़ोत्तरी करने में सिर्फ उन्हीं नेताओं का हाथ नहीं है जो आज बैठक कर रहे हैं ।

बल्कि उनका भी थोड़ा-बहुत हाथ है जो आज केंद्र में सरकार चला रहे हैं।थोड़ा-बहुत इसलिए लिखा क्योंकि उन पर अब तक अरबों-करोड़ों रुपए के घोटाले का आरोप नहीं लगे हंै।

उम्मीद की गयी थी कि महाबली प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी राजनीतिक गतिविधियों पर हो रहे अपार खर्चे को अपने प्रभाव से घटाएंगे।पर, निराशा हुई।

वे तो सांसद फंड भी बंद नहीं कर सके जो देश के शासकीय भ्रष्टाचार का रावणी अमृत कुंड है।

याद रहे कि जनसंघ अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय की जब हत्या हुई, तब वे टे्रन मंे अकेले ही यात्रा कर रहे थे।

संभवतः पार्टी पर अपने एक सहयात्री के भी खर्चे का बोझ नहीं डालना चाहते थे उपाध्याय जी।

यदि उनके साथ उस दिन कोई एक व्यक्ति भी रहा होता तो शायद उपाध्याय जी की हत्या नहीं होती।

पर,उस उपाध्याय के मूल्यों को भी अधिकतर भाजपाई भूल गए। 

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ये अपार पैसे राजनीति करने वालों के पास आज आते कहां से हैं ?

समान्यतः उन्हीें लोगों के यहां से आते हैं जो लोग इस देश को दोनों हाथों से लूट रहे हैं और जो इस देश को गरीब बनाए रखने के लिए जिम्मेदार  हैं।

अपवादों की बात और है।

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डा.राम मनोहर लोहिया के सादा जीवन और उच्च विचार से प्रभावित होकर छात्र जीवन में ही मैं उनकी पार्टी से जुड़ा था।

डा.लोहिया ने न तो घर बसाया,न मकान बनाया और न ही निजी कार खरीदी।इसके बावजूद देश, राजनीति व समाज पर अपना प्रभाव छोड़ने में उनका अर्थाभाव बाधक नहीं बना।

याद रहे कि आज कई लोग अपनी कमी  छिपाने के लिए कहा करते  हैं कि पैसे के बिना राजनीति आज नहीं होगी।

अधिक दिन नहीं हुए जब माले के महेंद्र प्रसाद सिंह और माकपा के वासुदेव सिंह जैसे नेता अपार पैसे के बिना भी चुनाव जीतते थे।वैसे आज भी देश में कई लोग होंगे।

 याद रहे कि पचास के दशक में पार्टी के महा सचिव के रूप में लोहिया ने अपने दल के विधायकों को लिखा था कि आप  अपना जीवन स्तर नहीं बढ़ाएं ताकि जनता का आपसे लगाव बना रहे।आज तो अनेक नेतागण  बड़ी -बड़ी ए.सी.गाड़ियों के काफिले के साथ जनता के पास जाते हैं तो  आम लोगों में से कुछ को उबकाई आने लगती है।

जो नेता लोग यह कहते हैं तामझाम के साथ जनता के बीच जाने पर ही नेता का प्रभाव बढ़ता है, वे धोखा देते हैं।हां,तामझाम का प्रभाव स्थानीय दलालों व लगुए-भगुए पर जरूर पड़़ता है। 

1967 में जब बिहार में संसोपा यानी लोहिया की पार्टी सत्ता में थी तब एक बार लोहिया दिल्ली से ट्रेन से दिल्ली से भागलपुर आए । 

भागलपुर से स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से दुमका गये।

चाहते तो वे अपने किसी मंत्री से कार का प्रबंध करवा कर उससे दुमका जाते।

दिल्ली में भी डा.लोहिया यदाकदा पैदल ही चलते थे जैसा कि मुझे वरिष्ठत्तम पत्रकार मन मोहन शर्मा ने बताया था।

जब तक लोहिया जी जीवित थे,तब तक मैं भी पार्टी में पूरे मन से रहा।कर्पूरी जी के रहते आधे मन से रहा।पर,अंततः मन उचट गया तो राजनीति का अलविदा करके पत्रकारिता में आ गया।

लोहिया-कर्पूरी का नाम जपने वाले नेता लोग आज क्या कर रहे हैं ?

कर्पूरी जी को तो आम चुनाव में प्रचार के लिए भी कभी एक हेलीकाॅप्टर तक उपलब्ध नहीं हो सका,चार्टर्ड विमान की बात कौन कहे।इसके बावजूद वे दो बार मुख्य मंत्री और एक बार उप मुख्य मंत्री बने।

मुझे तो आज के अधिकतर नेताओं के कारण अगली पीढ़ियों के भविष्य पर भी प्रश्न-चिन्ह लगा प्रतीत होता है।

क्योंकि वे वोट के लिए यानी तात्कालिक उपलब्धि के लिए देश की अनेक मूल व गंभीर समस्याओं की या तो उपेक्षा कर रहे हैं या उन समस्याओं को और अधिक गंभीर बनाने में मददगार बन रहे हैं।

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31 अगस्त 23

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पुनश्चः-इस देश के नेतागण अपना राजनीतिक व व्यक्तिगत खर्च जरूर बढ़ाएं ,पर वह देश के आम लोगों की बढ़ती आय के अनुपात में ही हो। 


मंगलवार, 29 अगस्त 2023

 चर्चित पुस्तक ‘‘आपातकाल एक डायरी’’ से

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26 अगस्त 1975

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सांसदी केस में जब सुप्रीम कोर्ट के जज कृष्णा अय्यर ने  

पी.एम. को (पूरी) राहत नहीं दी तो पी.एम.ने 

जज के आई.ए.एस. साढ़ू को दी गयी राहत तुरंत वापस ले ली

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सुरेंद्र किशोर

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प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव बिशन टंडन अपनी डायरी (भाग-2) में लिखते हैं

(सुप्रीम कोर्ट के जज कृष्णा अय्यर के साढ़ू )‘‘आई.ए.एस.शंकरण का दिल्ली में टर्म समाप्त हो चुका है।

पर,श्रम मंत्री उसे रखना चाहते हैं।

बोर्ड के सामने मामला गया तो उसने सिफारिश की कि शंकरण को वापस (तमिलनाडु काॅडर) जाना चाहिए।

प्रधान मंत्री ने भी पहले बोर्ड की सिफारिश मान ली।

इतना हो जाने के बाद रजनी पटेल ने प्रधान मंत्री को बताया कि शंकरण जस्टिस कृष्णा अय्यर के साढ़ू है।

 कृष्णा अय्यर की पत्नी की मृत्यु के बाद शंकरण के परिवार से उनको बड़ी सहायता मिलती है।

शंकरण के दिल्ली रहने से कृष्णा अय्यर को बड़ी मदद मिलेगी।

कृष्णा अय्यर प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की स्टे याचिका सुनने वाले थे।(याद रहे कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी की लोक सभा की सदस्यता 12 जून 1975 को रद कर दी थी।)

यह जान कर प्रधान मंत्री ने आदेश दे दिया कि शंकरण श्रम मंत्रालय में (यानी दिल्ली में)रुक सकते हैं।

  पर,उधर जस्टिस कृष्णा अय्यर ने बिना शर्त लगाए स्टे नहीं दिया।(अपने जजमेंट में कह दिया कि प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी सदन की बैठकों में शामिल तो हो सकती हैं,पर,सदन में वह मतदान नहीं कर सकतीं।)

उसके बाद प्रधान मंत्री ने आदेश दे दिया कि ‘‘शंकरण को फौरन वापस जाना चाहिए।’’

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26 अगस्त 23 


 भिखारी ठाकुर पर किरण कांत वर्मा की पुस्तक पठनीय 

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सुरेंद्र किशोर

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कवित्त,रंगमंच और सिनेमा से जुड़े किरण कांत वर्मा ने भिखारी ठाकुर की रचनाओं पर एक पुस्तक लिखी है जिसका नाम है--

‘‘कहत भिखारी ठाकुर: पिया गईले कलकतवा।’’

पुस्तक लीक से हट कर लगी,पठनीय भी।

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किरण कांत जी की पुस्तक का इसी माह लोकार्पण हुआ।

 मुख्यतः सामाजिक समस्याओं को आधार बना कर लेखन करने वाले भिखारी ठाकुर को राहुल सांकृत्यायन ने ‘‘भोजपुरी का शेेक्सपीयर’’ कहा था।

आई.सी.एस.अधिकारी जगदीशचंद्र माथुर ने भिखारी ठाकुर को ‘‘अनगढ़ हीरा’’ कहा था।

आमलोगों में भिखारी ठाकुर कितना लोकप्रिय थे,उसका विवरण एक ंसंस्मरण के जरिए यहां प्रस्तुत है।

यह संस्मरण मुझे रामदयाल सिंह ने सुनाया था।

   रामदयाल सिंह प्रतिबद्ध समाजवादी नेता थे । 

सन 1977 में भोजपुर जिले के संदेश क्षेत्र से जनता पार्टी के विधायक भी बने थे।

 वे एक दफा राम दयाल बाबू कर्पूरी ठाकुर के साथ उत्तर बिहार से पटना लौट रहे थे।

पहलेजा घाट (सारण जिला)पहुंचने पर उन लोगों को पता चला कि रात का अंतिम स्टीमर जा चुका है।(तब तक गांधी सेतु बना नहीं था।)

 रात में पहलेजा घाट पर पुआल पर दोनों सो गए।

जाड़े की रात थी।

सुबह उठकर कर्पूरी जी शौच के लिए दूर खेत में चले गए।

इस बीच ‘घूरा’ यानी  आग के पास कुछ ग्रामीणों से राम दयाल बाबू बातंे करने लगे।

कर्पूरी जी के प्रति रामदयाल जी के श्रद्धा भाव को देखकर एक ग्रामीण को लगा कि यह जरूर कोई बड़े आदमी हैं।

ग्रामीण- ‘‘इ के बाड़न ?’’

राम दयाल जी-‘‘कर्पूरी ठाकुर हैं।’’

ग्रामीण - ‘‘कहां के हैं और कौन जात हैं ?’’

राम दयाल बाबू-‘‘बिहार के मुख्य मंत्री रह चुके हैं।

हज्जाम में इतना बड़ा व्यक्ति कोई और नहीं हुआ ?’’

ग्रामीण-‘‘भिखारियो ठाकुर से बड़का आदमी़ बाड़न ! ?’’

अब इस पर राम दयाल बाबू क्या बोलते !

 वैसे भी तब तक कर्पूरी जी पास आते दिखाई पड़ गए थे। 

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‘कहत भिखारी ठाकुर -पिया गईले कलकतवा’

लेखक-किरण कांत वर्मा

मो.-9934604362

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29 अगस्त 23


                               

 


सोमवार, 28 अगस्त 2023

 नीतीश कुमार के अंध विरोधी गण ! 

इस पोस्ट के 

लिए कृपया मुझे माफ कर दीजिएगा 

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सुरेंद्र किशोर

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यदि नरेंद्र मोदी विरोधी गठबंधन नीतीश कुमार को राष्ट्रीय संयोजक बना दे तो एनडीए के खिलाफ ‘‘इंडिया’’ के चुनावी अभियान में गंभीरता आ   जाएगी।

  (अन्यथा,‘‘इंडिया’’सी.बी.आई.-ई.डी.झेल रहे नेताओं का गठजोड़ मात्र बन कर रह जाएगा जिसके भावी नेता जनता में राहुल गांधी माने जा सकते हैं।

वह भाजपा के लिए अत्यंत अनुकूल स्थिति होगी।)

 कम से कम तीन मामलांे में नीतीश कुमार ,नरेंद्र मोदी की बराबरी करने की स्थिति में हैं।

वे हैं रुपए-पैसों के मामलों में व्यक्तिगत ईमानदारी, परिवारवाद-वंशवाद से दूरी तथा आम विकास को लेकर कल्पनाशीलता।

नीतीश कुमार के अलावा ‘‘इंडिया’’ का कोई भी अन्य नेता,जो पी.एम.पद का घोषित या अघोषित उम्मीदवार है, अपने विवादास्पद कैरियर के कारण, नरेंद्र मोदी के मुकाबले हल्का ही साबित होगा।चुनाव में गंभीरता आ जाने पर वोट बैंक के बाहर वाले मतदाताओं को निर्णय करने में सुविधा हो जाती है।

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नीतीश कुमार के बावजूद ‘‘इंडिया’’ सन 2024 के लोस चुनाव में विजयी ही हो जाएगा,यह भविष्यवाणी करने की स्थिति अभी नहीं है।

वैसे तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुसार तो , कुल मिलाकर अभी  नरेंद्र मोदी का ही ‘अपर हैंड’ लगता है।

आजकल चुनाव पूर्व सर्वेक्षण पहले की अपेक्षा अधिक सही साबित हो रहे हैं।जिन्हें मेरी इस बात में शक हो ,वे हाल के वर्षों के सर्वेक्षणों के आंकड़े निकाल कर देख लें।

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बिहार में 2024 के चुनाव में क्या होगा ?

यदि सिर्फ ‘गणित’ काम करेगा तब तो यहां ‘‘इंडिया’’ का पलड़ा भारी रहेगा।

पर,साथ-साथ यदि ‘रसायन’ भी काम कर गया तब तो कुछ भी रिजल्ट संभव है।

फिलहाल दो संकेतक, हम  विश्लेषणकर्ताओं को राह दिखाते हैं।

हाल में बिहार के गोपालगंज और कुढ़हनी विधान सभा उप चुनावों में भाजपा जीत गयी।

मोकामा में हार गयी ।पर,वह तो बिहार का एक विशेष क्षेत्र है।वहां कोई सामान्य फार्मूला लागू नहीं होता।

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गत साल उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ और रामपुर में लोक सभा उप चुनाव हुए।

दोनों सपा की सीटंे थीं।

दोनों में इस बार एनडीए जीत गया।

सुना कि वहां ‘रसायन’ काम कर गया।

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वैसे अभी सन 2024 के चुनाव में महीनों की देर है।

अभी का कोई भी पूर्वानुमान अंततः अधकचरा साबित हो सकता है।

क्योंकि पता नहीं, कल देश-प्रदेश में क्या होगा ?

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27 अगस्त 23