मंगलवार, 5 दिसंबर 2023

 सतीश कुमार अमेरिका जाकर भी न तो हिन्दी भूले और न हिन्दी कविता रचना कर्म।

पटना आए तो उन्होंने मुझे अपना कविता संग्रह दिया--

‘‘मां,मन और माटी।’’

पेशे से इंजीनियर सतीश जी पत्रकार भी रहे हैं।

कभी टाइम्स आॅफ इंडिया, पटना में उन्हें खोजपूर्ण पत्रकारिता करते मैंने करते देखा था।

अमेरिका के कैलिफोर्निया में उद्यमी ओर निवेशक हैं।

सबके बावजूद वे इस देश की राजनीति पर भी पुस्तक लिखने की योजना बना रहे हैं।

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सुरेंद्र किशोर

5 दिसंबर 23



 अंधे और हाथी की कहानी

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सुरेंद्र किशोर

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हाल के चुनावों में भाजपा की जीत पर प्रतिक्रियाओं को देख-सुनकर मुझे अंधे और हाथी की कहानी याद आ गयी।

  कहानी के अनुसार, एक हाथी के अलग -अलग अंगों को प्रत्येक अंधा छू कर महसूस करने और उसका आकार जानने की कोशिश करता है।

जो अंधा जिस अंग को छूता है,वह कहता है कि हाथी ऐसा ही होता है।

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अधिकतर नेताओं व विश्लेषणकर्ताओं ने लगभग वही कहानी दुहराई।

अरे प्रतिपक्षी नेता भाई ,पहले यह तो पता लगाइए कि भाजपा की जीत के कौन-कौन से तीन प्रमुख व वास्तविक कारण रहे।

उन कारणों का तोड़ आपके पास है भी या नहीं ?

यदि है तो उसकी कोशिश कीजिए।

यदि नहीं है तो टुकुर-टुकुर आकाश की ओर ताकिए ।

 अपने अच्छे दिनों का इंतजार कीजिए।

   अब भाजपा और उसकी सरकारों पर निर्भर है कि वह खुद चंद्रायण-2 बनता है या चंद्रायण-3 ?

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गुरुवार, 30 नवंबर 2023

 


सन 1951 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था -बहार।

उसका एक गाना है--

‘‘दुनिया से डरोगे तो दुनिया दबाएगी।

आखें दिखाएगी,रोब दिखाएगी।

दुनिया को लात मारो,दुनिया सलाम करे।

तान से सीना चलो, दुनिया तुम्हारी है

..............।’’

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 पूर्व मुख्य मंत्री महबूबा मुफ्ती ने 3 अप्रैल, 2019 को कहा था कि ‘‘अनुच्छेद-370 हटा तो हिन्दुस्तान से हमारा रिश्ता समाप्त हो जाएगा।’’

अमित शाह को चुनौती के साथ महबूबा ने कहा था--‘‘आप  अनुच्छेद-370 को समाप्त करने की तारीख बताइए।उसी दिन से हमारा हिन्दुस्तान से रिश्ता खत्म हो जाएगा।’’

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मोदी सरकार ने सीना तान कर यह काम कर दिया।

क्या हुआ महबूबा की धमकी का ?

रिश्ता मजबूत हुआ या समाप्त ?

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16 दिसंबर, 2019 को मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि 

सी.ए.ए. मेरी लाश पर ही लागू होगा।

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गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में भी कहा कि हम सी.ए.ए.जरूर लागू करेंगे।

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देखना है--आगे -आगे क्या होता है !!!

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महबूबा और ममता बनर्जी जैसी धमकियां देने वाले इस देश में कुछ अन्य नेता भी अन्य राज्यों में मौजूद हैं।

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देखना है- निकट भविष्य में उनका क्या होने वाला है !!

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अभी मोदी सरकार की जिम्मेदारी यह है कि वह यू.सी.सी.लागू करे।

सी.ए.ए. लागू करे।

एन.आर.सी.को भी लागू करना ही होगा।

अन्यथा, यह देश देर-सबेर जेहादियों के हाथों में चला जाएगा।

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पर,इसके लिए आर्थिक और सैनिक रूप से चीन की तरह ही हमें भी ताकतवर बनना पड़ेगा।

चीन अपने यहां के जेहादियों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार कर रहा है जैसा अब तक नहीं हुआ।फिर भी दुनिया के जेहादी चीन से डर कर चुप है।

(बहार का गाना याद कर लीजिए।)

यह देश आर्थिक रूप से ताकतवर तभी बनेगा जब हर क्षेत्र में सक्रिय चोरों, बेईमानों,लुटेरों को जेल भेजा जाएगा।

भ्रष्टाचार के लिए फांसी का प्रावधान करना पड़ेगा।

चीन में यह कानून मौजूद है।

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1985 में जब प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा कि हम दिल्ली से

100 पैसे भेजते हैं,किंतु सिर्फ 15 पैसे ही लोगों तक पहुंचते हैं।

इस रहस्योद्घाटन के बाद ही भ्रष्टाचार के लिए फांसी का प्रावधान कर देना चाहिए था।

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चीन अपनी सीमा पर ही घुसपैठियों को देखते ही गोली मार देता है।

दूसरी ओर हमारे यहां सीमा पर बांग्ला देशी-रोहिग्या घुसपैठियों से 10-12 हजार रुपए घूस लेकर उन्हें भारत का नागरिक बना दिया जाता है।एक खबर के अनुसार,रोज करीब पांच घुसपैठिए भारत में घुस रहे हैंे।

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कई साल पहले का आंकड़ा है कि भारत में पांच करोड़ घुसपैठिए हैं।

एन.आर.सी.लागू होने से उन्हें निकाल बाहर करना या उन्हें मतदाता सूची से हटाना संभव होगा।

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मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट में यह कह चुकी है कि  

एन.आर.सी.यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जरूरी है।

   वैसे सरकार ने जरूर कहा था  कि एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर अभी नहीं बनेगा।

   सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने शपथ पत्र में गृह मंत्रालय ने कह दिया कि किसी भी सार्वभौम देश के लिए यह एक जरूरी काम है कि वह गैर नागरिकों की पहचान के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करे।

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  एक अनुमान के अनुसार सी.ए.ए. के लागू हो जाने के बाद इस देश में करीब दो या तीन करोड़ गैर -मुस्लिम मतदाताओं की संख्या बढ़ जाएगी।ये वे गैर मुस्लिम हैं जो पड़ोसी देशों में प्रताड़ित होकर भारत में आ गये हैं।पर,अभी तक यहां के नागरिक या मतदाता नहीं बने।इनका सरकारी

आंकड़ा तो कम है,पर वास्तव में ये काफी हैं।

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इस देश के मुस्लिम वोट लोलुप राजनीतिक दल और जेहादी तत्व नहीं चाहते कि सी.ए.ए. और एन.आर.सी.लागू हो।

पश्चिम बंगाल में उन घुसपैठी मतदाताओं का लाभ पहले का सत्ताधारी वाम मोरचा उठाता था।

तब उन फर्जी बंगला देशी मतदाताओं का विरोध करते हुए   

  4 अगस्त, 2005 को ममता बनर्जी ने लोक सभा के स्पीकर

के टेबल पर कागज का पुलिंदा फेंका था।

उसमें अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों को मतदाता बनाए जाने के सबूत थे।

  ममता ने कहा कि घुसपैठ की समस्या राज्य में महा विपत्ति बन चुकी है।

ममता बनर्जी ने उस पर सदन में चर्चा की मांग की।

चर्चा की अनुमति न मिलने पर ममता ने सदन की सदस्यता

 से इस्तीफा भी दे दिया था।

 चूंकि एक प्रारूप में विधिवत तरीके से इस्तीफा तैयार नहीं  था,इसलिए उसे मंजूर नहीं किया गया।

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अब ममता का उस ‘महा विपत्ति’ पर क्या राय है ?

यदि ममता की सरकार उन्हीं अवैध घुसपैठियों के वोट पर

टिकी हैं तो क्या राय होगी !

अब ममता कहती हैं कि सी.ए.ए.-एन.आर.सी.लागू होगा तो बंगाल में खून की नदी बहेगी।

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 ऐसे नेताओं की मौजूदगी इस अभागे देश में है।

ऐसे में तो मेरा मानना है कि यदि इस देश को बचाना है तो न सिर्फ सी.ए.ए. बल्कि एन.आर.सी. और समान नागरिक कानून भी लागू करना ही पड़ेगा।

इससे कोई वोटलोलुप नेता या दल खुश रहे या नाराज।

  अमेरिका,चीन ,जर्मनी और जापान कौन कहे,यहां तक 

कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंगला देश में भी

नागरिकता रजिस्टर और नागरिकता कार्ड का 

प्रावधान है।

कार्ड वहां के लोगों को दिए गए हैं।

   कुछ नेताओं के लिए भारत कोई देश नहीं, बल्कि मात्र एक धर्मशाला है।

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किसी भी समुदाय के किसी वाजिब मतदाता की मौजूदा स्थिति में इन कानूनों के लागू होने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।फिर भी इस मुद्दे पर यदाकदा चिल्ल-पों और छिटपुट हिंसा होती रहती है।

 क्योंकि  

सीएए लागू होने व एनआरसी तैयार हो जाने पर इस हिन्दू बहुल देश को धीरे -धीरे मुस्लिम बहुल बनाने का जो जेहादी प्रयास चल रहा है,उस प्रयास को भारी धक्का लगेगा।

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सी.ए.ए.,यू.सी.सी.और एन.आर.सी.लागू होने के बाद जो बवंडर खड़ा होगा,उसे शांत करने के लिए बड़ी सैन्य व पुलिस ताकत की जरूरत पड़ेगी।

भारत सन 2014 के बाद अधिक ताकतवर बना है।ताकत तो पैसे से बढ़ती है।वह बढ़ रही है।

केंद्र सरकार का कर राजस्व 2013-14 में करीब साढ़े 10 लाख करोड़ रुपए था।मौजूदा वित्तीय वर्ष में यानी 2023-24 में 27 लाख करोड़ रुपए का अनुमान है।

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कुछ राज्यों को छोड़कर सेना,अर्ध सैनिक बल,अग्निवीर आदि मजबूत हो रहे है।

आधुनिकत्तम हथियार हमारे देश के पास आ रहे हैं।राज्यों की सुरक्षा -व्यवस्था भी बेहतर है।

पर अभी आंतरिक व बाह्य सुरक्षा के और भी ठोस काम करने होंगे।

जब इस देश के घनघोर भ्रष्टाचारीगण जेल में रहेंगे तो राजस्व बढ़ेगा।

पांच राज्यों के चुनाव नतीजे और 2024 के लोक सभा चुनाव रिजल्ट भी बताएंगे कि देश का भविष्य कैसा रहेगा।देश बचेगा या ........????

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बुधवार, 29 नवंबर 2023

 प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर कहा कि भ्रष्ट लोगों को 

जेल भेजने का हमने संकल्प किया है

यह भी कहा कि ‘‘बड़े -बड़े भ्रष्टाचारी मुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे ,मुझे 

बर्बाद कर देंगे।पर, मैं उसके लिए भी तैयार हूं।’’

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सुरेंद्र किशोर

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने परसों हैदराबाद में भी अपना पुराना संकल्प दुहराया कि भाजपा ने भ्रष्ट नेताओं को जेल भेजने का संकल्प किया है।

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मोदी ने सन 2014 में प्रधान मंत्री पद संभालने के तत्काल बाद से ही 

यह काम शुरू कर दिया था।

वह अब भी जारी है।

नतीजतन इस देश में जमानत और जेल झेल रहे 

नेताओं की संख्या ने पिछले सारे रिकाॅर्ड तोड़ दिए हैं।

सन 2024 के लोस चुनाव से पहले तक यह संख्या बहुत अधिक बढ़ जाएगी,ऐसे संकेत मिल रहे हैं।

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 मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को लाल किले से ही यह कह दिया था कि 

‘‘मैं न खाऊंगा और न खाने दूंगा।’’

बाद में मोदी ने कहा कि 

‘‘एक भी भ्रष्टाचारी नहीं बचना चाहिए चाहे वह कितना ही शक्तिशाली हो।बिना हिचक के सी.बी.आई.कार्रवाई करे।’’

उन्होंने यह भी कहा कि 

‘‘भ्रष्टाचार लोकतंत्र और न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है।’’

मोदी ने अन्य अवसर पर यह भी कहा था कि 

‘‘बड़े -बड़े भ्रष्टाचारी मुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे ,मुझे बर्बाद कर देंगे।

पर, मैं उसके लिए भी तैयार हूं।’’

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दूसरी ओर, 15 अगस्त, 2011 को तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले से कहा था कि 

‘‘देश की तरक्की में भ्रष्टाचार सबसे बड़ी बाधा है और यह सभी के लिए गहरी चिंता का विषय है।

लेकिन भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकार के पास कोई जादुई छड़ी नहीं है।’’

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जादुई छड़ी मोदी के पास है,ऐसा लगता है।

नरेंद्र मोदी की यह पहल सराहनीय है।

यह आज की जरुरत है।

मोदी विरोधी दलों के नेताओं ने 2014 से 2019 तक मोदी सरकार पर यह आरोप लगाया कि मोदी सरकार सिर्फ भाजपा विरोधी दलों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है,भाजपा के भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ नहीं।

इस आरोप को आम जनता ने सही नहीं माना,इसलिए मोदी को अधिक बहुमत से 2019 में फिर से सत्ता में पहुंचा दिया।

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भ्रष्टों के खिलाफ कार्रवाई से आम जनता खुश है।

क्योंकि अपवादों को छोड़कर अधिकतर लोगों को यह लगता है कि नेताओं-अफसरों-व्यापारियों के एक बड़े हिस्से के भीषण भ्रष्टाचार के कारण ही अपना देश अब भी गरीब है।

नतीजतन 80 करोड़ लोगों को अब भी मुफ्त अनाज देना पड़ रहा है।

आजादी के तत्काल बाद से ही लूट शुरू हो गयी थी।

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भ्रष्टाचारी लगभग सभी दलों में हैं।

कुछ में अधिक तो कुछ में कम।

यह अच्छी बात है कि अपवादों को छोड़ कर अदालतें भी बहुत अच्छे ढंग से अपना काम रही हैं।

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  आज भ्रष्टाचार और आतंकवाद देश के सामने सबसे बड़े मुद्दे हैं।

भ्रष्टाचार, आतंकवाद व जेहाद को ताकत पहुंचाता है।

आज इस देश में 10 से 12 हजार रुपए खर्च करके किसी घुसपैठिए को भारत का मतदाता बनाया जा रहा है।मुसलमानों की संख्या बढ़ा कर इस देश को मुस्लिम बहुल देश बनाने की निरंतर व सघन कोशिश जारी है।

वोट के लिए कई दल इस कोशिश में परोक्ष-प्रत्यक्ष उनकी मदद कर रहे हैं।

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मोदी विरोधी नेताओं को यदि यह लगता है कि मोदी सरकार भाजपा के भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है तो वे खुद कोर्ट में क्यों नहीं जाते भ्रष्टाचार के सबूतों के साथ ?

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नेशनल हेराल्ड घोटाला केस,

टू जी घोटाला 

और जय ललिता के खिलाफ जो कदम डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने उठाया,वही कदम मोदी विरोधी नेता भाजपा के कथित भष्टों के खिलाफ क्यों नहीं उठाते ?

याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने बहुत पहले यह निर्णय दे रखा है कि सामान्य नागरिक भी किसी लोक सेवक के खिलाफ

केस कर सकता है। 

डा.स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट के उसी आदेश का लाभ उठाकर उपर्युक्त तीनों केस किए।

डा.स्वामी तीनों में सफल रहे।

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29 नवंबर 23

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पुनश्चः

2019 के लोस चुनाव से ठीक पहले राफेल में कथित भ्रष्टाचार का मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने उस आरोप में कोई तथ्य नहीं पाया।

2024 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले अडाणी का मामला सुप्रीम कोर्ट में गया।

सुप्रीम कोर्ट ने इसमें भी कोई तथ्य नहीं पाया।

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सोमवार, 27 नवंबर 2023

 


जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं,उन राज्यों की 

साठ-सत्तर के दशकों की राजनीति कैसी थी ?

इस पर मुझे लिखना था तो तब की साप्ताहिक पत्रिका (दिनमान) मेरे काम आई।

1982 के बाद की घटनाओं के लिए ‘इंडिया टूडे’ मेरे काम आता है।

सन 1982 से पहले के अंक मेरे पास नहीं हैं।

इंडिया टूडे का प्रकाशन 1976 और दिनमान का प्रकाशन 

1965 में शुरू हुआ था।

वैसे हिन्दी इंडिया टूडे, दिनमान का विकल्प नहीं बन सका।

शायद उसे बनना भी नहीं है।

कुल मिलाकर त्रुटिहीनता और संतुलन के मामले में ‘इंडिया टूडे’ लाजवाब है।

ये दो पत्रिकाएं मुझे तथ्यों की याद दिला देती है।

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ऐसा नहीं कि विदेश में छपने वाली पत्र-पत्रिकाएं त्रुटिहीन होती हैं।

हालांकि यहां के कई लोेगों के लिए वे वेद वाक्य हैं।

1964 में डा.लोहिया के बारे में टाइम मैगजिन ने जो गलती की थी कि वैसी गलती

भारत की कोई सामान्य पत्रिका भी संभवतः नहीं कर सकती।

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मैं ‘माया’ से लेकर ‘धर्मयुग’ तक के लिए लिखता था।

इन दो पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग से मेरे लेखों पर अक्सर सवाल पूछे जाते थे। चिट्ठियां आती थीं।

आपने यह लिख दिया,उससे आपका आशय स्पष्ट नहीं हो रहा है।

आपने यह लिख दिया,इसका आपके पास सबूत है क्या ?

मैं संतोषजनक जवाब देता था तभी छपता था।

ध्यान रहे कि तब डाक से चिट्ठियां आती-जाती  थीं,क्योंकि तब तक टेलेक्स,टेलीप्रिंटर,फैक्स या ईमेल आदि का यहां प्रचलन नहीं था।

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अब आप ‘टाइम’ मैगजिन पर आइए।

उसका बड़ा नाम है।वह जोरदार रिपोर्टिंग करता रहा है।

पर,ऐसा नहीं है कि वह गलतियां नहीं करता।

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 सन 1964 में अमरीकी साप्ताहिक पत्रिका ‘टाइम’ ने डा.राममनोहर लोहिया 

के खिलाफ गलत व बिल्कुल निराधार खबर छाप दी थी।

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उस गलत खबर से खिन्न डा.लोहिया 

ने ‘टाइम’ पर मानहानि का मुकदमा 

दायर किया था।

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  याद रहे कि फूल पुर लोक सभा उप चुनाव के संबंध में ‘टाइम’ ने निराधार खबर छापी थी।

‘टाइम’ ने अन्य बातों के अलावा यह भी लिख दिया था 

कि ‘‘ डा.लोहिया नेहरू परिवार के आजीवन शत्रु हैं।’’

  भारत की राजनीति के बारे में ‘टाइम’ की छिछली जानकारी का ही यह नतीजा था।

दरअसल समाजवादी नेता डा.लोहिया, जवाहरलाल नेहरू की नीतियों का विरोध करते थे न कि वे उनके आजीवन शत्रु थे।

एक बार डा.लोहिया ने अपने मित्रों से कहा था कि

 ‘‘यदि मैं बीमार पड़ूंगा तो मेरी सबसे अच्छी सेवा- शुश्रूषा जवाहरलाल नेहरू के घर में ही होगी।’’

आजादी के बाद एक बार डा.लोहिया जब दिल्ली जेल में थे,प्रधान मंत्री  नेहरू ने अपने निजी सचिव एम.ओ. मथाई के जरिए उनके लिए आम भिजवाया था।

 सन 1964 में नेहरू के निधन के बाद डा.लोहिया ने कहा था, ‘‘1947 से पहले के नेहरू को मेरा सलाम !’’

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नेहरू के निधन के बाद फूल पुर लोक सभा क्षेत्र के उप चुनाव में 

  डा.लोहिया कांग्रेस की उम्मीदवार विजयलक्ष्मी पंडित के खिलाफ चुनाव -प्रचार में गए थे।

 ‘टाइम’ के 4 दिसंबर, 1964  के अंक में लिखा गया कि 

‘‘डा.लोहिया नेहरू परिवार के आजीवन शत्रु हैं।

 इस कारण वे उप चुनाव में विजयलक्ष्मी पंडित के विरूद्व प्रचार करने गए थे।’’

 पत्रिका ने यह भी लिख दिया कि

 ‘‘लोहिया ने मतदाताओं से कहा कि वे विजयलक्ष्मी पंडित की सुन्दरता के जाल में न फंसें।उनके अंदर केवल विष है।’’

‘टाइम’ के अनुसार डा.लोहिया ने मतदाताओं से कहा कि श्रीमती पंडित की युवावस्था जैसी सुन्दरता इसलिए कायम है क्योंकि उन्होंने यूरोप में प्लास्टिक शल्य चिकित्सा करायी है।

 डा.लोहिया ने दिल्ली के सीनियर सब जज की अदालत में टाइम  के संपादक,मुद्रक,प्रकाशक और नई दिल्ली स्थित संवाददाताओं के विरूद्व मानहानि का मुकदमा किया।  

  अदालत में प्रस्तुत अपने आवेदन पत्र में डा.लोहिया ने कहा कि टाइम में प्रकाशित उक्त सारी बातेें बिलकुल मनगढंत हैं और मुझे बदनाम करने के इरादे से इस तरह की कुरूचिपूर्ण बातें मुझ पर आरोपित की गई हंै।

डा.लोहिया ने कहा कि टाइम ऐसे दकियानूसी कट्टरपंथी तत्वों का मुखपत्र है, जिन्हें हमारी समतावादी और लोकतांत्रिक नीतियां पसंद नहीं हैं।

  नई दिल्ली स्थित संवाददाताओं ने, जो उक्त समाचार भेजने के लिए जिम्मेदार हैं, मुझसे कभी भंेट तक नहीं की।

 ये संवाददाता स्थानीय भाषा भी नहीं जानते।

इसलिए मेरे भाषण की उन्हें सीधी जानकारी भी नहीं हो सकती थी।

शत्रुता का आरोप का खंडन करते हुए डा.लोहिया ने कहा कि

कांग्रेसी शासन अथवा दिवंगत प्रधान मंत्री की जब भी मैंने आलोचना की है तो नीति और सिद्धांत के प्रश्नों पर ही।

किसी निजी द्वेष पर नहीं।

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उस मुकदमे का अंततः क्या हश्र हुआ ,मैं जान नहीं सका।

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याद रहे कि हाल के कोविड काल में ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने भारत में मृतकों की संख्या के बारे में निराधार खबर छापी थी जिसका भारत सरकार ने खंडन किया था।

भारत में कुल तीन लाख लोग मरे थे जबकि ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने लिखा कि 42 लाख लोग मरे।

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इस पृष्ठभूमि में मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि आज मैंने जिस लेख के लिए 1967 के दिनमान से तथ्य लिए हैं, वे गलत नहीं हो सकते।

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जिन पत्रकारों को सेवा निवृति के बाद भी प्रासंगिक व जनापयोगी बने 

रहना हैं,उन्हें अपना निजी संदर्भालय अपने सेवाकाल में ही तैयार करते रहना चाहिए।संदर्भालय में भरसक त्रुटिहीन संदर्भ सामग्री रहे।

आज सटीक ओर त्रुटिहीन लेखन करने वाले फ्रीलांसर की कमी होती जा रही है।

पत्रकारिता के क्षेत्र में दिक्कत यह है कि जब कोई पत्रकार लंबी तपस्या के बाद प्रौढ़ और ज्ञानी होता है तभी उसे रिटायर कर दिया जाता है।

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सुरेंद्र किशोर

27 नवंबर 23

   

  


 संविधान दिवस पर

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सरल हृदय वाले नेता राजनीति में सन 1950 में भी पीछे 

ढकेल दिए जाते थे और आज तो और भी सौ कदम 

पीछे कर दिए जाते हैं

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सरदार पटेल न होते तो सरल हृदय वाले योग्यत्तम राजेन 

बाबू राष्ट्रपति न बन पाते

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1950 में संविधान लागू हो जाने के बाद सवाल राष्ट्रपति के पद पर नियुक्ति का था।

प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि इस पद पर सी.राज गोपालाचारी बैठें।

हालांकि राजगोपालचारी विचारों से घोर दक्षिणपंथी व पंूजीवादी व्यवस्था के पोषक थे।

उधर नेहरू खुद को समाजवादी बताते थे।

राजा जी को राष्ट्रपति बनाने के सवाल पर कांग्रेस पार्टी में भारी आंतरिक मतभेद उठ खड़ा हो गया।

खैरियत थी कि तब कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र था।

पार्टी में विरोध इसलिए भी था क्योंकि राजा जी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध कर दिया था।

सरदार पटेल के समर्थकों ने डा.राजेंद्र प्रसाद के नाम को आगे बढ़ा दिया।

  इस बीच जवाहरलाल नेहरू एक दिन राजेंन्द्र प्रसाद के पास चले गये।

 उनसे यह लिखवा लिया कि 

‘‘मैं राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार ही नहीं हूं।’’

  जब इस बात का पता सरदार पटेल को चला तो वे नाराज हो गये।

पटेल गुट के बड़े नेता महावीर त्यागी ने राजेन बाबू को ‘बिहारी बुद्धू’ तक कह दिया।

  समकालीन नेताओं के संस्मरण, लेखों व डायरी के पन्नों में दर्ज इतिहास के अनुसार उस समय की यह कहानी कुछ यूं बनती है।

  राजेंद बाबू से सरदार साहब ने पूछा कि आपने ऐसा लिख कर क्यों दे दिया ?

  इस पर सरल हृदय के गांधीवादी राजेन बाबू ने  कहा कि ‘‘मैं गांधी जी का शिष्य हूं।

यदि कोई मुझसे पूछता है कि क्या आप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं तो यह बात मैं अपने मुंह से कैसे कह सकता हूं कि मैं उम्मीदवार हंू ? 

पंडित जी ने मुझसे जब ऐसा ही सवाल पूछा तो मैंने वैसा कह दिया।

 उनके मांगने पर मैंने यही बात लिखकर भी उन्हें दे दी।’’

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    इस बिगड़ी बात को सरदार साहब ने अपने विशेष प्रयास व कौशल से बाद में संभाला।

संभवतः पटेल व उनके समर्थक यह नहीं चाहते थे कि तीनों महत्वपूर्ण पदों पर एक ही जाति के नेता बैठें।

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उप राष्ट्रपति पद के लिए डा.एस.राधाकृष्णन का नाम तय था।

 पहले तो राजेंद्र बाबू को इस बात के लिए तैयार कराया गया कि वे उम्मीदवार बनें।

दरअसल राजेंद्र बाबू मन ही मन  चाहते तो थे ही  कि उन्हें राष्ट्रपति पद मिले।

पर, इसके लिए वे आज के अधिकतर नेताओं की तरह आग्रही या फिर दुराग्रही कत्तई नहीं थे।

(आज के तो कई नेता, पद के लिए सुप्रीमो का भयादोहन भी करते हैं या सुप्रीमो की राजनीतिक लाइन तक बदलवा देते हैं।)

पर,उधर राजेन बाबू किसी भी  पद के लिए नीचे नहीं गिरना चाहते थे।

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खैर,पटेल साहब ने स्थिति संभाली और राजेन बाबू राष्ट्रपति बने।

कैसे स्थिति संभाली,वह भी एक रोचक कहानी है।

हालांकि वह कहानी भी तब की राजनीति का गौरव बढ़ाने वाली नहीं है।

याद रहे कि नेहरू ने पार्टी की बैठक में यह धमकी दे दी थी कि यदि राजाजी को राष्ट्रपति नहीं बनाया जाएगा तो मैं प्रधान मंत्री पद से इस्तीफा दे दूंगा।

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26 नवंबर 23


 शिकोरा,पराली और पनौती

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एक अखबार के बिहार संस्करण में यह अपील छपती थी-

गर्मी के दिनों मंे पक्षियों के लिए शिकोरा में पानी रखिए।

यह अपील तो अच्छी है।

पर,बिहार के लोग जानते भी हैं कि श्किोरा क्या होता है ?

मैंने तो उससे पहले यह शब्द नहीं सुना था।

मैंने अखबार के मालिक से कहा कि शिकोरा के बदले दूसरे शब्द का इस्तेमाल करिए।

फिर वे शिकोरा के साथ ब्रैकेट में बिहार के लिए समतुल्य शब्द लिखना शुरू कर दिया था।

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अब पराली और पनौती पर आइए।

पराली शब्द को लेकर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने भी कहा था कि पराली के बदले पुआल शब्द का इस्तेमाल करिए।

पर,अब भी पराली लिखा जाता है।

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अब मेरे लिए एक और नया शब्द आया है--पनौती।

अरे भई, इसके बदले अपशकुन शब्द उपलब्ध है।

पनौती,पराली और शिकोरा से हमें एतराज नहीं।

इस देश के जिन क्षेत्रों के लोग इन्हें जानते हैं,उन्हें इस्तेमाल करने दीजिए।

पर, बिहार में ???

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सुरेंद्र किशोर