बुधवार, 6 मार्च 2024

   द्रमुक सांसद ए.राजा की देश विरोधी टिप्पणी

   और टू जी मुकदमे की अद्यतन स्थिति

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सुरेंद्र किशोर

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द्रमुक एम.पी.व पूर्व केंद्रीय मंत्री ए.राजा ने कहा है कि भारत एक देश नहीं बल्कि एक उप महाद्वीप है।

 यह पढ़कर मुझे तुरंत याद आ गया--

टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमा अब भी दिल्ली हाईकोर्ट में अपील में है जिसमें राजा जी भी आरोपित हैं।

भले कुछ अनजान प्रवक्ता व एंकर लोग टी.वी.चैनलों पर आए दिन यह सवाल पूछते रहें कि टू जी घोटाला मुकदमे में क्या हुआ ? उनके अनुसार कुछ नहीं हुआ।

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जब भी हमारे देश के कुछ खास नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों वाले मुकदमे तेज होते हैं तो उनमें से अनेक के दिल ओ दिमाग में 

पृथकतावादी प्रवृतियां हिलोड़े मारने लगती है।

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सन 1962 के चीनी हमले से पहले तक तब के द्रमुक नेताओं में पृथकतावादी भावना आज की अपेक्षा अधिक प्रबल थी।पर,चीन ने जब हमारे बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया और प्रधान मंत्री नेहरू ने रेडियो प्रसारण में कहा कि अफसोस है कि (माई हर्ट गोज टू असमीज पीपुल)हम अपने कुछ भूभाग को बचा नहीं सके तो द्रमुक नेतागण सहम गये।

उसके बाद तो द्रमुक नेताओं को लगा कि जब पूरा भारत मिलकर अपने भूभाग को नहीं बचा सका तो मद्रास के अलग राज्य बन जाने पर मद्रास खुद को कैसे बचा सकेगा।

उसके बाद द्रमुक नेता कुछ सावधान हो गये।

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पर,उस दल की आज की पीढ़ी तो अपने स्वार्थ में वह सब भूल गयी।जबकि इधर पाक -चीन गठजोड़ की गिद्ध दृष्टि भारत पर है।

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5 मार्च 24    


 कांग्रेस के पराभव का कारण

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   सुरेंद्र किशोर

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अपेक्षाकृत कम योग्य उत्तराधिकारियों के कारण ही 

कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दल संकट में हैं।

कुछ तो डूब रहे हैं।

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कई कारणों से 1929 से अब तक कांग्रेस ने नेहरू-गांधी परिवार के अपेक्षाकृत कम योग्य नेताओं को सत्ता और पार्टी के शीर्ष पर बैठाया।

    जवाहरलाल नेहरू,इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को जब सत्ता सौंपी गई ,तब वे अपने समय के कांग्रेस के श्रेष्ठत्तम नेता नहीं थे।

  श्रेष्ठत्तम नेता कोई और थे,जिन्हें दरकिनार कर इस परिवार के नेताओं को आगे किया गया।

आज भी वही हाल है।

नतीजतन अगले लोक सभा चुनाव के पहले कांग्रेस से एक एक करके नेता निकलते जा रहे हैं।

 देश की मूल समस्याओं को समझने और उनके हल प्रस्तुत करने की क्षमता के अभाव में नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य देश,सरकार और दल को सफल नेतृत्व प्रदान नहीं कर सके।

 आर्थिक,आंतरिक और वैदेशिक मोर्चों पर सफलताएं कम ही मिलीं।

कुछ क्षेत्रों में नेहरू-इंदिरा-राजीव की सफलताएं जरूर ध्यान खींचने वाली रहीं,पर इस गरीब देश को जिस तरह के निर्णायक नेतृत्व की जरूरत थी,वह आवश्यकता पूरी नहीं हो सकी।

  ऐसे में प्रधान मंत्री मोदी ठीक ही कहते हैं ‘इस देश के कई जरूरी काम मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे।’

  किसी देश के लिए आर्थिक मोर्चे पर सफलता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

 आर्थिक साधनों से ही विकास,कल्याण और सुरक्षा के काम किए जा सकते हैं।

  इसी पृष्ठभूमि मेें 1985 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था,‘केंद्र सरकार 100 पैसे भेजती है ,पर गांवों तक उसमंे से सिर्फ 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं।’

 यह काम एक दिन में तो नहीं हुआ होगा।

उसमें कुछ न कुछ योगदान 1947 से 1985 तक की सारी सरकारों का रहा ही होगा।

यानी उन दिनों की सरकारें भ्रष्टाचार के खिलाफ उतनी सख्त नहीं थीं जितनी किसी गरीब देश की सरकारों को होना चाहिए।

 केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय में कई दशक

पहले सचिव रहे एन सी सक्सेना ने यह सलाह दी थी कि बैंक खातों के जरिए ही लोगों तक आर्थिक मदद पहुंचाई जानी चाहिए।

उससे लीकेज बंद होगा,लेकिन यह काम मोदी सरकार ने ही बड़े पैमाने पर शुरू किया।

सक्सेना की नेक सलाह को मानने से कई सरकारों ने इन्कार कर दिया।

कारण स्पष्ट है।

  नेताओं के वंशज-परिजन के बीच से निकले अपेक्षाकृत कम योग्य उत्तराधिकारियों के कारण ही कांग्रेस समेत कई दल संकट में हैं।

कुछ तो डूब रहे हैं।

संकेत हैं कि आने वाले दिन भी उनके लिए सुखकर नहीं हैं।

इन दलों की स्थिति सुधरती नहीं देख कर बीते दिनों के कुछ लाभार्थी तरह-तरह के उपदेश दे रहे हैं।

कुछ तो विलाप और प्रलाप भी कर रहे हैं।

दलों के पराभव के मूल कारणों की गंभीर चर्चा संबंधित दलों के नेता भी नहीं कर रहे हैं,क्योंकि इससे हाईकमान के यहां उनकी पूछ खत्म हो जाएगी।

   कांग्रेस में वंशवाद की शुरूआत 1929 में ही हो चुकी थी।

उसे ठोस रूप महात्मा गांधी की मदद से मोतीलाल नेहरू ने दिया।

दोनों के बीच हुए पत्र-व्यवहार से यह साफ है कि गांधी जी ने प्रारंभिक हिचक के बाद ही जवाहरलाल नेहरू का आगे बढ़ाया।

  मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस मुख्यालय संचालन के लिए प्रयागराज का अपना विशाल आनंद भवन दे दिया था।

यह अंग्रेजी राज में बड़ी बात मानी गई।

गांधी जी पर संभवतः इस बात का असर रहा होगा।

 उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू ने 1928 में महात्मा गांधी को बारी -बारी स तीन चिट्ठियां लिखीं।

 उनके जरिए उन्होंने आग्रह किया कि वह जवाहरलाल को कांग्रेस अध्यक्ष बनवा दें।

पहले दो पत्रों पर गांधी राजी नहीं हुए।

 वह तब जवाहर को उस पद के योग्य नहीं मानते थे।

मोतीलाल जी के तीसरे पत्र पर गांधी जी बेमन से मान गए।

उक्त सारे पत्र नेहरू मेमोरियल में उपलब्ध हंै।

(उन पत्रों पर आधारित खबर की स्कैन काॅपी इस लेख के साथ दी जा रही है।)

   आजादी के तत्काल बाद जब प्रधान मंत्री पद पर किसी नेता को बैठाने की बात आई तो महात्मा गांधी ने सरदार पटेल के दावे को नजरअंदाज कर नेहरू को प्रधान मंत्री बनवा दिया,जबकि देश की 15 में से 12 प्रदेश कांग्रेस कमेटियों ने इस पद के लिए सरदार पटेल का नाम सुझाया था।

कांग्रेस के तब के अधिकतर शीर्ष नेतागण इस देश की जमीनी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए इस पद के लिए सरदार पटेल को सर्वाधिक योग्य मानते थे।

  1958 में इंदिरा गांधी कांग्रेस कार्य समिति की सदस्य बना दी गईं।

कल्पना कीजिए,कितने बड़े -बड़े स्वतंत्रता सेनानी तब इस पद के लिए उनसे अधिक काबिल थे।

कुछ समय बाद इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दी गईं।

कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री महावीर त्यागी ने इंदिरा को अध्यक्ष बनाए जाने के विरोध में जवाहरलाल नेहरू को कड़ा पत्र लिखा।

  वास्तव में नेहरू जी इंदिरा को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाकर यह संकेत दे रहे थे कि उनके न रहने पर बेटी प्रधान मंत्री बने।

   अंततः ऐसा ही हुआ।

बीच में कुछ समय के लिए लालबहादुर शास्त्री प्रधान मंत्री बने।

  क्या 1984 में इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद राजीव गांधी कांगेे्रस में पी एम पद के लिए सबसे योग्य नेता थे ?

ऐसा नहीं था।

राजीव गांधी ने जिस तरह अपनी सरकार और पार्टी चलाई,उसका यह नतीजा हुआ कि उनके बाद कांग्रेस को लोक सभा में पूर्ण बहुमत मिलना बंद हो गया।

याद रहे कि इंदिरा गांधी के शासनकाल में ही जनता ने पहली बार 1977 में कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से हटा दिया था।

 दूसरी ओर बिना किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से राजनीति में आए मोदी के कारण भाजपा की चुनावी ताकत बढ़ती ही जा रही है,क्योंकि मोदी ने देश की मूल समस्याओं को समझा और उनके समाधान पूरे  मनोयोग से तलाशे।

  उसके सकारात्मक परिणाम भी देखे जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि आजादी के तत्काल बाद के हमारे शासकों को सुशासन की सलाह देने वालों की कोई कमी थी।

 सिंगापुर के संस्थापक प्रधान मंत्री ली कुआन यू ने नेहरू को इस बारे में सलाह दी थी।

जब उनकी सलाह नहीं मानी गई तो ली कुआन यू ने कहा कि ‘समस्याओं के बोझ के कारण नेहरू ने अपने विचारों और नीतियों को लागू करने का जिम्मा मंत्रियों और सचिवों को दे दिया।

 अफसोस की बात है कि वह भारत के लिए वांछित परिणाम लाने में असफल रहे।’   

  ली कुआन 1959 से 1990 तक सिंगापुर के प्रधान मंत्री थे।उन्होंने सिंगापुर के लोगों की प्रति व्यक्ति आय को 500 डालर से बढ़ा कर 55 हजार डालर पर पहुंचा दिया।

भारत भी सिंगापुर की तरह तरक्की कर सकता था,लेकिन मौका गंवा दिया गया।

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6 मार्च 2024 के दैनिक जागरण,नईदुनिया और नवदुनिया के सारे संस्करणों में प्रकाशित 


 हिटलरशाही को आमंत्रित मत कीजिए !!!

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आंध्र दुर्घटना -रेल मंत्री बोले-ड्राइवर 

मोबाइल पर क्रिकेट देख रहे थे।

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रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पिछले साल 29 अक्तूबर को आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले में हुए टे्रन हादसे के बारे में चैंकाने वाला खुलासा किया।

  वैष्णव ने कहा कि जिन दो पैसेंजर ट्रेनों की टक्कर में 14 यात्रियों की मौत हुई थी, उनमें से एक के पायलट और को-पायलट फोन पर क्रिकेट मैच देख रहे थे।

(रेल मंत्री ईमानदार हैं।उनकी मंशा सजा देने की है।इसलिए इसका ख्ुालासा कर दिया।वे दबाव में आने वाले नहीं हैं।

अन्यथा कोई बेईमान रेल मंत्री इस खबर को छिपा लेता।

अब आप निकट भविष्य में पूछ सकते हैं कि क्रिकेट मैच देखने वालों को कितनी सजा हुई ?)

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कहीं मैंने हिटलर के शासन के बारे में कुछ ऐसा ही पढ़ा था।

(हिटलर शासन के जानकारों से अपील है कि यदि यह बात गलत हो तो मुझे सही बात बता देंगे।)

  हिटलर के शासन काल के प्रारंभिक वर्ष की बात थी।

तब के ट्रेन ड्रायवर किसी भी स्टेशन पर रेलगाड़ी अनिश्चितकाल तक के लिए खडी़ कर देते थे।

ड्रायवर,खलासी और स्टेशन मास्टर आदि मिलकर ताश खेलने लगते थे।

पैसेंजर चिल्लाता रहता था,पर उसे सुनने वाला कोई नहीं था।

हिटलर को जब इस बात का पता चला तो वह छापेमारी करने लगा।

जहां भी रेलकर्मी ताश खेलते पाए जाते थे,हिटलर उसी समय उन्हें गोली मार देता था।

जब ऐसे कई एक्शन हुए तो हर ड्रायवर को यह लगने लगा कि हिटलर रिवाल्वर लेकर उसकी पीठ पर खड़ा है।

उसके बाद रेलगाड़ी समय पर चलने लगी।

भारत में इमरजेंसी (1975-77)में भी समय पर टे्रन चलती थी।

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यदि मौजूदा भारत में भीषण भ्रष्टाचार, आतंकवाद और घुसपैठ आदि की समस्याएं इसी तरह बढ़ती गयीं तो 

अंततः क्या होगा ?

उसी तरह के काम होंगे जिस तरह के ऐक्शन यू.पी में हो रहे हैं।

अपराधी सह अतिक्रमणकारी के घर बुलडोजर से ढाहे जाएंगे।

इस देश की सीमा में अवैध रूप से प्रवेश करने और करवाने वालों पर सीधे गोली चलेगी।

सरेआम रिश्वत लेने वालों के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई होगी अन्यथा यह देश नहीं बचेगा।

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क्या कभी यह कल्पना की जाती थी कि क्रिकेट मैच की सनक में ट्रेन ड्रायवर 14 यात्रियों की जान ले लेगा ????

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4 मार्च 24  

 


सोमवार, 4 मार्च 2024

 राजनीतिक कर्म मेरा पहला प्यार था,

पत्रकारिता धर्म दूसरा बना !

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सुरेंद्र किशोर 

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राजनीतिक कर्म मेरा पहला प्यार था।

पर,कई वजहों से वहां न टिक पाने के कारण ही मैं मजबूरी में पत्रकारिता के काम में लग गया।

पत्रकारिता को मैं अर्ध सार्वजनिक कर्म मानता हूं।

व्यवहार में माना भी।

हमलोगों के समकालीन छात्र नेता विजयकृष्ण कहा करते हैं  कि यदि सुरेंश शेखर (सन 1966 के मैट्रिक बोर्ड टाॅपर) और 

सुरेंद्र किशोर राजनीति में रह जाते तो राजनीति में अच्छा करते।

 बाढ़ इलाके के वही विजयकृष्ण जो बाद में विधायक, मंत्री और सांसद बने।वे मुझे लंबे समय से जानते हैं।

सुरेश शेखर को मैंने पटना के शीर्ष समाजवादी राजनीतिक हलकों से परिचय कराया।सुरेश ने मुझे पटना विश्व विद्यालय के छात्रों से मिलवाया।

सुरेश प्रसाद सिंह उर्फ सुरेंश शेखर नीतीश कुमार के बहुत ही अच्छे मित्र थे।अब नहीं रहे।

  उदयकांत लिखित चर्चित पुस्तक ‘‘नीतीश कुमार --अंतरंग दोस्तों की नजर से’’ में सुरेश शेखर की भी खूब चर्चा हुई है।

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खैर,सरजमीन के राजनीतिक कर्मोें से मुझे जो संतोष मिला था ,उसकी यहां संक्षिप्त चर्चा करूंगा।

संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में मैं छात्र जीवन से ही सारण जिले में सक्रिय था।

पार्टी का निदेश था कि भूमिहीनों को बासगीत के पर्चे दिलवाने हैं भले हम सत्ता में हांे या विपक्ष में।

उन दिनों हमारी पार्टी प्रतिपक्ष में थी जब मैंने करीब आधा दर्जन भूमिहीनों को बासगीत के पर्चे दरियापुर अंचल (सारण जिला)से दिलवाए थे।

उन दिनों सरकारी दफ्तरों में आज जैसी ‘‘कार्य शैली’’ (???!!) नहीं थी।

मुुझे जहां तक याद है, मैं अकेले ही अंचल कार्यालय गया।सी.ओ. से मिला।उनसे विनमं्रतापूर्वक बातें कीं।

कोई देर किए बिना गरीबों के लिए पर्चे मिल गये।

जिन्हें पर्चे मिले,उनके परिवार अब भी मुझे याद करते हैं।

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सत्तर के दशक में सारण जिले में बड़ी बाढ़ आई हुई थी।

फसल नष्ट हो गयी थी।कांग्रेस की सरकार ने बड़े पैमाने पर राहत में अनाज बंटवाये थे।

दिघवारा से लेकर मेरे गांव तब नाव चलती थी।सारा इलाका जलमग्न था।

हमारे इलाके से हम दो प्रतिनिधि रेगुलर दिघवारा जाते और नाव पर अनाज लाद कर गांव ले लाते।गांव में अनाज बांटते।

उन दिनों आम तौर पर संपन्न किसान सरकारी रिलीफ के अनाज नहीं स्वीकार करते थे।

मेरे साथी ने मुझसे कहा कि हम लोग अक्सर अपने काम छोड़ कर अनाज लाने दिघवारा जाते हैं।यहां मजदूर रखना पड़ता है।अन्यथा काम का नुकसान होता है।

हमलोगों को चाहिए कि हर किस्त में हमलोग 25-25 किलो अनाज अपने पास रख लें।

मैंने कहा कि आप 25 किलो रख लीजिए।मैं नहीं लूंगा।

उस पर उन्होंने कहा कि जब आप नहीं लेंगे तो मैं भी नहीं लूंगा।उन्होंने भी नहीं लिया।यानी जो भी सरकारी अनाज आता था,हमलोगों के कारण सब अनाज लोगों में बंट जाता था।

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तत्काल बाद 1972 में बिहार विधान सभा का चुनाव हुआ।

मैं सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के प्रचार में लग गया।लोगों से कहता था कि कांग्रेसी सरकारों ने नदियों के किनारे तटबंध नहीं बनाये।इसलिए बाढ़ आती है।लोग तबाह होते हैं।

जवाब में उनमें से कुछ लोग कहते थे कि बाढ़ तो भगवान ने भेजा,पर रिलीफ के अनाज जयपाल (कांगेेसी नेता)ने भेजे।

रामजयपाल सिंह यादव चुनाव जीत गये।   

मैंने तो ये छोटे -छोटे काम किए थे।पर,संतोष देने वाले काम थे।

इस तरह के जनहित के कई काम

मैंने छपरा और पटना में किये।

पटना के एक काम 

की चर्चा खास तौर पर करूं।

कर्पूरी ठाकुर के चुनाव क्षेत्र ताजपुर के दो रिक्शा चालक पटना में गिरफ्तार हो गये थे।

उनके लिए जमानदार बनना था।मैं तब कर्पूरी जी का निजी सचिव था।

मैं कर्पूरी ठाकुर के साथ रिक्शे पर पटेल पथ से पटना कचहरी गया।

देर तक कर्पूरी जी बेंच पर बैठे रहे।

सारी औपचारिकताएं पूरी करके हम दोनों उन रिक्शे वाले के 

जमानदार बने।वे गरीब कोई आदतन अपराधी नहीं थे।

पर,कभी -कभी पुलिस की नजरों में गरीब लोग मामूली कसूर में भी बड़े कानून तोड़क मान लिये जाते हैं।जेल भेज दिए जाते हैं।

याद रहे कि कर्पूरी जी उन दोनों को व्यक्तिगत रूप से जानते थे।

अब आप कल्पना कीजिए कि एक पूर्व मुख्य मंत्री गरीबों की जमानत के लिए लबेे घंटे तक कचहरी की बेंच पर बैठे।

उस गरीब सेवा का ‘सुख’ मुझे भी मिला था।

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3 मार्च 24


  


  

 

   


रविवार, 3 मार्च 2024

 श्रीराम ने बालि को छिपकर मारा था।

इसके बावजूद वे

मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए।

यानी,व्यापक जनहित में थोड़े से भटकाव की अनुमति है।

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जो राजनीतिक दल व नेतागण भारत के संविधान व कानून की रक्षा की सबसे अधिक जरूरत बताते रहते हैं,वे अपने पंथिक और व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए संविधान व कानूनों को बदलते-बदलवाते रहे हैं।

 


गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

 चाणक्य-मेगस्थनीज संवाद

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‘इतिहास का प्रसंग है।

मेगस्थनीज चाणक्य से मिलने आए।

देखा काम में व्यस्त हैं।

वहां जल रहा दीपक बुझाते हैं।

दूसरा जलाते हैं,

फिर मेगस्थनीज से संवाद करते हैं।

मेगस्थनीज की जिज्ञासा है,एक दीपक बुझा कर,

दूसरा क्यों जलाया आपने ?

चाणक्य का सहज जवाब था,

अब तक महामंत्री की हैसियत से राष्ट्र का काम कर रहा था।

अब चाणक्य की हैयित से आपसे बात कर रहा हूं।

उस दीपक में राष्ट्र का तेल है।

निजी कार्य के लिए राष्ट्रीय संपत्ति का उपयोग घोर अपराध है।

यह है इस देश की तासीर।

इसे बचाने के लिए सभी दलों में आम सहमति बने।’

-- हरिवंश,राज्य सभा के उप सभापति

दैनिक भास्कर

6 फरवरी 2014

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अब समकालीन तासीर की कुछ झलकें देखिए।

इंडी गठबंधन की पहली बैठक पटना में हुई थी।

उसमें शामिल होने के लिए इस गरीब देश के अमीर नेतागण आठ चार्टर्ड विमानों में सवार होकर विभिन्न हिस्सों से पटना पहुंचे थे।

जिस देश के 80 करोड़ लोगों को फ्री अनाज देना पड़ रहा है,उस देश में ऐेसे-ऐसे नेता हैं।

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दूसरी झलक

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1985 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि 

हम दिल्ली से सौ पैसे भेजते हैं,पर गांवों तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैैं।

ये सौ पैसे एक दिन में तो घिस कर तो 15 पैसे नहीं बने होंगे।

ये जवाहरलाल नेहरू,लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के शासनकाल में घिसते चले गये।

मोदी सरकार श्वेत पत्र जारी कर रही है।

राजीव गांधी ने तो अपनी मां और नाना की सरकारों पर श्वेत पत्र 1985 में ही जारी कर दिया था।

वैसे लालबहादुर शास्त्री पर कोई शक नहीं करता।

शायद इसीलिए रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई।

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अब सन 1963 का हाल जानिए।  

सन 1963 में ही तत्कालीन कांग्रेस  अध्यक्ष डी.संजीवैया को  इन्दौर के अपने भाषण में यह कहना पड़ा  कि ‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।

 कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा था कि ‘झोपड़ियों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’

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सुरेंद्र किशोर

8 फरवरी 24






बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

 कहते हैं

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विफल साहित्यकार, आलोचक बन जाता है।

आलोचक के रूप में कोई सफल होता है तो कोई विफल !

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विफल प्रेमी, कवि बन जाता है।

कवि के रूप में कोई सफल होता है तो कोई विफल !!

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विफल नेता, पत्रकार बन जाता है।

पत्रकार के रूप में कोई सफल होता है तो कोई विफल !!!

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सुरेंद्र किशोर 

7 फरवरी 24