रविवार, 31 मार्च 2024

 इस देश का चुनावी इतिहास 

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जिस दल या गठबंधन को जनता ने अपेक्षाकृत अधिक 

भ्रष्ट व नुकसानदेह माना,उसे केंद्र की सत्ता नहीं सौंपी

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सुरेंद्र किशोर

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 इस देश में 1967 और उसके बाद के जितने भी चुनाव हुए,सबका मुझे थोड़ा-बहुत अनुभव और मोटा-मोटी जानकारियां हैं।

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अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर हर बार मतदाताओं ने 

‘बदतर’ को ‘छोड़कर’ बेहतर को ही चुना है।

कौन बेहतर और कौन बदतर है,इसे अधिकतर जनता जानती है,चाहे कोई कितना भी गाल बजाये।

लोक सभा के मौजूदा चुनाव का रिजल्ट भी वैसा ही होगा,ऐसा मेरा अनुमान है।

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ऐसा क्यों होता है ?

इसलिए कि अधिकतर लोग जानते हैं कि कोई व्यक्ति,पार्टी या विचारधारा पूर्ण नहीं है।

न तो मैं पूर्ण हूं ,न ही आप और न कोई नेता या कोई पार्टी।

पूर्ण तो सिर्फ ईश्वर है।(जो खुद को पूर्ण समझते हैं,वे मुझे ऐसी टिप्पणी के लिए कृपया माफ कर देंगे।)

इसीलिए इस देश के मतदातागण अपेक्षाकृत ‘‘कम पूर्ण’’ से ही काम चला लेते हैं।

और ‘‘अधिक अपूर्ण’’ को टरका देते हैं।

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मैंने देखा है कि पिछले किसी चुनाव में यह तर्क नहीं चला कि मैं भ्रष्ट तो मेरा प्रतिद्वंद्वी भी तो भ्रष्ट।

इसीलिए मतदातागण मुझे ही अपना लेंगे।

आम लोगों में से अधिकतर लोग यह देखते हैं कि कौन सा दल और नेता, देश व समाज के लिए कम नुकसान देह और अपेक्षाकृत अधिक फायदेमंद है।

  जो अपेक्षाकृत अधिक नुकसानदेह और कम फायदेमंद होता है,वह मौजूदा के बदले अगले चुनाव में अपनी तकदीर आजमाने को अभिशप्त होता है।

किसी का प्रचार जो कहे,मीडिया जो कहे,पर आम लोग नेताओं व दलों के चाल,चरित्र और चिंतन के बारे में अधिक जानते हैं।

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1977 में जब लोक सभा चुनाव हुआ तब भी इमरजेंसी हटी नहीं थी।

क्रूर तानाशाह ने ढिलाई जरूर दे दी थी।

घनघोर आपातकाल के बीच मैं भूमिगत जार्ज फर्नांडिस से मिला था।

  जार्ज ने एक अंग्रेजी अखबार के एक वरिष्ठ संवाददाता की रपट की चर्चा की।

कहा कि वह पत्रकार साख वाला है।ईमानदार है।इंदिरा के प्रभाव में आने वाला नहीं है।

वह झूठ नहीं लिखता।

उसने लिखा है कि प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की जनसभा में जो लोग जुटे थे,उनके चेहरों पर इंदिरा के लिए वास्तविक समर्थन और प्रेम के भाव थे।

   जार्ज ने मुझसे कहा कि लगता है कि इंदिरा ने लोगों को मोह लिया है।

इसीलिए जब फरवरी 1977 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने लोस चुनाव कराने की घोषणा की तो जार्ज ने यह राय प्रकट की थी कि हमलोगों को चुनाव का बहिष्कार करना चाहिए।

पर,केंद्रीय नेतत्व संभवतः जेपी के कहने पर जार्ज चुनाव लड़नेे के लिए राजी हो गये।करीब साढे तीन लाख मतों से जीते।़

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उधर यह भी खबर आई थी कि आई.बी.ने इंदिरा गांधी को यह जानकारी दी कि चुनाव हो जाए तो आप एक बार फिर सत्ता में आ जाएंगी।

चुनाव के पीछे ऐसी ही रपटें थीं जो अंततः झूठी साबित हुईं।

यानी आम जनता (1977 में) किसे वोट देगी,इसका पता न तो आई.बी.को चल सका था और न ही जार्ज के मित्र व अनुभवी संवाददाता ,जो जार्ज की दृष्टि में निष्पक्ष थे।

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1977 के लोक चुनाव में 

अंततः जनता ने सही फैसला किया और इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया।

इंदिरा गांधी के इरादे का पता इसी से चलता था कि चुनाव कराते समय भी उन्होंने इमरजेंसी जारी रखी थी।

सत्ता में लौटतीं तो क्या करतीं ,उसका अनुमान कर लीजिए।

इमरर्जेंसी में उन्होंने क्या-क्या किया था,उसे जानने के लिए शाह आयोग की रपट पढ़ लीजिए।

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31 मार्च 24   


‘भारत रत्न’ कर्पूरी ठाकुर के बारे में 

एक सनसनीखेज जानकारी

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क्या 1984 में कर्पूरी जी की हत्या की 

साजिश एक नेता घर रची गयी थी

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता कर्पूरी ठाकुर ने 11 सितंबर, 1984 को बिहार सरकार के मुख्य सचिव के.के.श्रीवास्तव को एक गोपनीय पत्र (संख्या-101/वि.स./आ.स.)

लिखा था।

उन्होंने लिखा कि ‘‘मैं एक आवश्यक ,किंतु गोपनीय विषय की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं।

 इस अगस्त महीने में श्री ..............के पटना स्थित आवास में एक खानगी मिटिंग हुई थी जिसमें सिर्फ दस आदमी हाजिर थे।

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श्री...............ने उस मिटिंग में कहा कि ...दस लाख रुपए इकट्ठा करना चाहिए और इस राशि से आग्नेयास्त्र खरीदना चाहिए।

  इन आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल हरिजनों और पिछड़ों के तेजस्वी और लड़ाकू तत्वों का सफाया करने के लिए किया जाना चाहिए।

  तीन महीने बाद कर्पूरी ठाकुर के औरंगाबाद और गया जिले में आने पर बिलकुल साफ हो जाना चाहिए।’’

मैं यह पत्र सूचनार्थ लिख रहा हूं ताकि समय पर काम आवे।

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               आपका 

             कर्पूरी ठाकुर  

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पुनश्चः

दरअसल उस मिटिंग में जो लोग मौजूद थे ,उनमें से एक व्यक्ति ने इस साजिश की जानकारी पूर्व मंत्री रामलखन सिंह यादव और दूसरे ने पूर्व मंत्री कपिलदेव सिंह को दे दी थी।फिर यह बात कर्पूरी ठाकुर तक पहुंची।

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उधर मुख्य सचिव ने कर्पूरी ठाकुर की चिट्ठी मुख्य मंत्री चंद्रशेखर सिंह को दिखाई।

मुख्य मंत्री ने निदेश दिया कि ‘‘किस व्यक्ति द्वारा इन्हें सूचना मिली,इसकी जानकारी प्राप्त कर पूछताछ की जानी चाहिए।’’

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बाद में इस प्रसंग में क्या हुआ ,वह सब पता नहीं चल सका।

पर,जब 1988 में कर्पूरी ठाकुर की संदेहास्पद स्थिति में मौत हुई तो पूर्व मुख्य मंत्री रामसुन्दर दास ने उनकी मौत की जांच कराने की केंद्र और राज्य सरकार से मांग की थी।

  बिहार सरकार के पूर्व राज्य मंत्री व विधान सभा के सदस्य रघुवंश प्रसाद सिंह ने 22 फरवरी, 1988 को प्रधान मंत्री राजीव गांधी को पत्र लिखकर उनसे मांग की थी कि कर्पूरी ठाकुर की मौत की उच्चस्तरीय जांच कराई जाये।

रघुवंश जी ने,जो बाद में केंद्र में मंत्री बने थे ,प्रधान मंत्री को अपने पत्र में लिखा कि ‘‘....प्रधान मंत्री ने दो वर्ष पूर्व बिहार में समाजशास्त्रीय अध्ययन कराया था कि कर्पूरी ठाकुर के नहीं रहने पर बिहार की राजनीतिक स्थिति का क्या होगा ?

कर्पूरी जी का जो जनाधार है,वह कहां जाएगा ?

आपके द्वारा निदेशित यह समाजशास्त्रीय अध्ययन भी अब शंकाओं की परिधि में आ गया है।

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 भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर के बारे में कुछ बातें 

जो आज अत्यंत प्रासंंिगक

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1970 में मुख्य मंत्री रह चुके कर्पूरी ठाकुर सन 1972-73 में रिक्शे पर ही चलते थे।क्योंकि उनके पास निजी कार नहीं थी।

एक बार मैं कर्पूरी जी के साथ रिक्शे पर पटना में एक जगह से दूसरी जगह जा रहा था।

कर्पूरी जी ने कहा कि ‘‘सुरेंद्र जी,यदि मेरे पास तेज सवारी होती तो मैं लोगों का अधिक काम कर पाता।’’

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       2

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पटना के सालिमपुर अहरा स्थित पार्टी आॅफिस में तीन व्यक्ति आसपास बैठे थे।

अस्सी के दशक की बात है।

पीलू मोदी,कर्पूरी ठाकुर और मैं।

भारी शरीर के मोदी जी एक आराम कुर्सी पर पसरे हुए थे।

बगल की कुर्सी पर बैठे कर्पूरी जी ने पीलू जी मोदी से कहा,‘‘मोदी साहब,यदि राज्य पार्टी के लिए एक हेलीकाॅप्टर का प्रबंध हो जाये तो हम बिहार विधान सभा की आधी सीटें जीत जाएंगे।’’

हंसोड़ मोदी ने जवाब दिया,

‘‘मिस्टर कर्पूरी,मैं दो का कर देता हूं।सारी सीटें जीत जाओ।अरे भाई हेलीकाॅप्टर से चुनाव नहीं जीते जाते।’’

  खैर, कहने का मतलब यह कि अपने पूरे राजनीतिक जीवन में कर्पूरी जी चुनाव प्रचार के लिए अपने लिए हेलीकाॅप्टर को  तरस गये।वे चाहते तो नाजयज पैसे जुटाकर यह काम कर सकते थे।पर,नहीं किया।

दूसरी ओर, आज की राजनीति का क्या हाल है ?

देश अब भी गरीब ही है।

पर,अब तो अधिकतर नेताओं के लिए चार्टर्ड प्लेन का जमाना आ गया है।अधिकतर नेता जहाज भाडे़ पर लेकर राजनीतिक व निजी यात्राएं कर रहे हैं।

इन्हें पैसे कौन देते है ?

जग जाहिर है।

क्योंकि आम जनता में से 80 करोड़ लोगों को तो अब भी सरकार मुफ्त राशन दे रही है।देने को मजबूर है।

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  बिहार के निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के रिटायर निबंधक उमेश प्रसाद सिंह के अनुसार ,

‘‘1977-79 के मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर ने अपने कार्यकाल में सी.बी.आई.को लिखा था कि सी.बी.आई.को बिहार सीमा में कोई भी गंभीर मामले की जानकारी मिले तो वह गोपनीय ढंग से उसकी जांच शुरू कर दे।उसमें राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक नहीं होगी।

उमेश जी के अनुसार यह आदेश सन 1996 के आरंभ तक प्रभावी रहा।

पर, जब चारा घोटाले की जांच के लिए जनहित याचिका पटना हाई कोर्ट में दाखिल की गयी तो  बिहार सरकार ने उस आदेश को निरस्त कर दिया।

राज्य सरकार नहीं चाहती थी कि सी.बी.आई. खुद जांच अपने हाथ में ले ले।’’

दूसरी ओर, हाल के वर्षों में अनेक राज्य सरकारों ने सी.बी.आई. जांच करने की आम मनाही कर दी।

कारण सब जानते हैं।अब सी.बी.आई.जांच आम तौर पर अदालती आदेश से ही संभव हो पाती है।

जब केंद्रीय एजेंसियां जांच के बाद नेताओं व अफसरों के घरों से करोड़ों-करोड़ रुपए जब्त करती है तो आरोपी नेता आरोप लगाते हैं कि बदले की भावना से केंद्र सरकार काम कर रही  है।

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        4

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अस्सी के दशक की बात है। डा.जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्य मंत्री थे और कर्पूरी ठाकुर विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता।

डा.मिश्र पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते ही रहते थे।

एक बार जब कर्पूरी ठाकुर ने सदन में उनपर कोई आरोप लगाया तो मुख्य मंत्री ने कर्पूरी ठाकुर पर भी पलट कर आरोप लगा दिया।

उस पर कर्पूरी ठाकुर ने यह मांग कर दी कि आप मेरे खिलाफ आरोप की जांच के लिए न्यायिक जांच बैठाइए।

 डा.मिश्र ने जांच आयोग बैठाने की मांग नहीं मानी।उस पर कर्पूरी ठाकुर ने मुख्य मंत्री से कहा कि आप मेरे खिलाफ जांच आयोग नहीं बैठा रहे हैं,उसका कारण है।

 क्योंकि चाहते हैं कि जब हम सत्ता में आएं तो हम भी आपके खिलाफ जांच नहीं कराएं।किंतु आप गलतफहमी में मत रहिए।

हम सत्ता में आने के बाद आपके खिलाफ जांच जरूर कराएंगे।

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अब आप ऐसे मामलों में आज के नेताओं के वक्तव्यों और आचरण को देख लीजिए।

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31 मार्च 24 


 मैं उतना ही पढ़ पाता हूं जिससे लेख-काॅलम लिखने में मुझे मदद मिले।

 यदि कोई पुस्तक लेखक मुझे इस उद्देश्य से अपनी पुस्तक देते हैं कि मैं उसे पढ़कर उस पर कुछ लिख दूं तो उसके लिए मेरे पास समय नहीं होता।

हां, अपने फेसबुक वाॅल पर मैं यह जरूर लिख देता हूं कि मुझे फलां लेखक की फलां पुस्तक मिलीं।

   ---सुरेंद्र किशोर



शुक्रवार, 29 मार्च 2024

  इस देश में जब भी कोई खूंखार जेहादी आतंकवादी या दुर्दान्त माफिया मरता है या मारा जाता है तो उसके तुरंत बाद कई दलों और नेताओं का असली चरित्र जनता बीच एक बार फिर प्रकट हो जाता है।

वे इस तरह से शोकग्रस्त होकर चीत्कार करने लगते हैं जैसे उनके ही घर में गमी हुई है। 

वैसे यह सब एक तरह ठीक ही होता है।

शांतिप्रिय जनता कुछ खास तरह के लोगों से एक बार फिर सावधान हो जाती है।

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हां,कोई माफिया हो या आतंकी,उसको सजा कानूनी प्रक्रिया अपना कर ही दी जानी चाहिए।

उसकी हत्या नहीं होनी चाहिए।

यदि हत्या होती है तो हत्यारों का पता लगाकर उन्हें सजा दी जानी चाहिए।

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वैसे अपना देश कैसा बन चुका हैं और यहां ऐसे -ऐसे लोग बसते हैं जो सामान्य कानूनी प्रक्रिया से ‘शांत’ ही नहीं होते।उनकी शक्ति दिन दूनी रात चैगुणी होती जाती है।

इसलिए कुछ लोगों की यह राय रहती है कि उन्हें उसी प्रक्रिया से रास्ते से हटाया जाना चाहिए जिस तरह प्रभु श्रीराम ने बालि को रास्ते से हटाया था।

इसके बावजूद श्रीराम को फिर भी मर्यादा पुरुषोत्तम ही कहा जाता है।

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 एक चुनाव यह भी !

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भ्रष्टाचारी और उनके मददगार 

बनाम 

भ्रष्टाचार विरोधी और उनके समर्थक

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सुरेंद्र किशोर

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लोक सभा चुनाव, 2024 की पूर्व संध्या पर 

इस देश के अधिकतर मतदातागण भ्रष्टाचार के सवाल पर भी साफ-साफ दो खेमों में बंटे हुए हैं।हालांकि मुद्दे और भी हैं।

एक पक्ष कहता है कि भ्रष्टाचार मिट नहीं सकता।

दूसरा पक्ष इस बात से असहमत है।

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देखना है कि किसकी जीत होती है !!

पहले यह कहा जाता था कि भ्रष्टाचार के कारण इस देश में गरीबी कम करने में दिक्कत आ रही है।

अब यह भी कहा जा रहा है कि इस देश के सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार के कारण देश की सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरा है।

बांग्लादेशियों और रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए यहां रिश्वत देकर मतदाता बन जाना आसान हो गया है।भ्रष्टाचार के अन्य अनेक चिंताजनक कुपरिणाम सामने आ रहे हैं।

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‘‘चाहे यह भ्रष्टाचार का विरोध हो या भ्रष्ट के रूप में देखे जाने का भय,शायद भ्रष्टाचार अर्थ -व्यवस्था के पहियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण था, इसे काट दिया गया है।

मेरे कई व्यापारिक मित्र मुझे बताते हैं निर्णय लेेने की गति धीमी हो गई है।.............’’

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--नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी,

हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स

23 अक्तूबर 2019

(याद रहे कि अभिजीत बनर्जी की सलाह पर ही कांग्रेस ने ‘न्याय योजना’ का नारा उछाला है।) 

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दूसरी ओर,

इस देश का सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि 

‘‘भ्रष्ट लोग देश को तबाह कर रहे हैं।’’

---दैनिक जागरण -10 नवंबर 2022

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‘‘पैसे की भूख ने भ्रष्टाचार को कैंसर की तरह पनपने में मदद की है।अदालतें दिखाएं कि भ्रष्टाचार को कत्तई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’’ 

---सुप्रीम कोर्ट--3 मार्च 23

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  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि 

‘‘एक भी भ्रष्टाचारी नहीं बचना चाहिए, चाहे वह कितना 

ही शक्तिशाली हो।

बिना हिचक के सी.बी.आई.कार्रवाई करे।’’

उन्होंने यह भी कहा कि 

‘‘भ्रष्टाचार लोकतंत्र और न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है।’’

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इस देश में भ्रष्टाचार की समस्या पुरानी है।जो समय के साथ बढ़ती 

गई।

‘‘भ्रष्टाचार को लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज नहीं बनने दिया    जाना चाहिए’’--महात्मा गांधी

‘‘भ्रष्टाचारियों को नजदीक के लैंप पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए’’--जवाहरलाल नेहरू

‘‘भ्रष्टाचार तो विश्वव्यापी फेनोमेना है।’’

--प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी

‘‘सत्ता के दलालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।’’

--प्रधान मंत्री राजीव गांधी

‘‘मुल्क के शक्तिशाली लोग इस देश को बेचकर खा रहे हैं।’’

 --मधु लिमये--(1988)

‘‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’’

--मनमोहन सिंह-(1998)

‘‘भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता।’’

--सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूत्र्ति बी.एन.अग्रवाल--5 अगस्त ,2006

‘‘भ्रष्ट लोगों से छुटकारा पाने का एकमात्र रास्ता यही है कि कुछ लोगों को लैंप पोस्ट से लटका दिया जाए।’’

--सुप्रीम कोर्ट-7 मार्च 2007

‘‘भ्रष्टाचार को साधारण अपराध के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।’’

-दिल्ली हाईकोर्ट --9 नवंबर 2007

‘‘भ्रष्टाचार में जोखिम कम और लाभ ज्यादा है।’’

-एन.सी.सक्सेना,पूर्व सचिव ,केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय

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मनी लाउंडरिंग का अपराध हत्या से भी अधिक जघन्य

 --भारत का सुप्रीम कोर्ट

5 फरवरी 2022

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प्रधान मंत्री मोदी ने एक अवसर पर कहा कि  

‘‘भ्रष्टाचार लोकतंत्र और न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है।’’

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नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने से पहले

अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर इस देश में 

सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष में एक अघोषित समझौता रहा था--

‘‘हम सत्ता में आएंगे तो हम तुम्हें बचाएंगे,तुम सत्ता में आना तो हमें बचाना।’’

 मनमोहन सिंह सरकार के गठन के प्रथम वर्ष में ही केंद्र सरकार ने कहा था कि ‘‘राजग शासन के सभी घोटालों की जांच होगी।’’

(दैनिक जागरण-29 सितंबर 2004)

’’(इस पोस्ट के साथ संलग्न है तत्संबंधी न्यूज आइटम की स्कैन काॅपी)


इस घोषणा के बावजूद जांच नहीं हुई।एक दूसरे को बचा लेने की नीति के तहत जांच नहीं हुई।

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 बकौल प्रधान मंत्री राजीव गांधी -1985 आते -आते केंद्र सरकार  के 100 पैसे घिसकर 15 पैसे ही रह गए।इस बात की जांच नहीं हुई कि 100 पैसे कैसे इतना घिस गये ?

कौन-कौन उसके लिए जिम्मेवार रहे।

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सन 1963 में ही तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष डी.संजीवैया को  इन्दौर के अपने भाषण में यह कहना पड़ा  कि 

‘‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे। 

गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा था कि ‘‘झोपड़ियों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’’

 1971 के बाद तो लूट की गति तेज हो गयी।

अपवादों को छोड़कर सरकारों में भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप ले लिया।आज तो भ्रष्टाचार लगभग सर्वव्यापी हो चुका है।

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  आजादी के तत्काल बाद एक केंद्रीय मंत्री ने प्रधान मंत्री नेहरू से कहा था कि सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है।

इसकी निगरानी के लिए कोई छतरी संगठन बना दीजिए।

जवाहरलाल का जवाब था-उससे शासन में पस्तहिम्मती आएगी।

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आजादी के बाद से अब तक हुए सैकड़ों घोटालों को याद कर लीजिए।

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अब तो कांग्रेस ने एक ऐसे नोबल विजेता को अपना अघोषित सलाहकार बना लिया है जो भ्रष्टाचार की खुलेआम वकालत करता है।

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  गत 24 फरवरी, 23 को भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 

‘‘आम आदमी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है।

हर स्तर पर जवाबदेही तय करने की जरूरत है।’’

अदालत ने यह भी कहा कि 

‘‘किसी भी सरकारी दफ्तर में जाएं तो आप बिना डरे बाहर नहीं आएंगे।’’

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इसके अलावा भी अनेक उक्तियां आपको मिलेंगी।

पर,भ्रष्टाचार के राक्षस से निर्णायक लड़ाई कभी नहीं हुई।

वोट बैंक के दायरे के लोगों को छोड़कर आम जन में भ्रष्टों के खिलाफ भारी गुस्सा है।

देखना है कि अगले चुनाव में कितने मतदाता भ्रष्टों के पक्ष में मतदान करते हैं और कितने लोग उनके पक्ष में जो भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्षरत हैं ?इसी पर देश का भविष्य निर्भर करेगा।

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28 मार्च 24

 



गुरुवार, 28 मार्च 2024

 अद्भुत प्रतिभाशाली दिवंगत डा.श्रीकांत 

जिचकर की याद में 

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14 सितंबर 1954--2 जून 2004)

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सुरेंद्र किशोर

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सर्वाधिक शिक्षित होने का विश्व रिकाॅर्ड कायम किया था 

डा.जिचकर ने।

वे राजनीति में भी सक्रिय थे।

वहां भी काफी कारगर साबित हुए।

आज पढ़े-लिखे लोगों के लिए राजनीति में कितनी

जगह बच गई है ?

हां, धनवानो-बाहुबलियों आदि के लिए जगह की कोई कमी नहीं

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‘‘बेटा, बड़ा होकर जिचकर की तरह बनना’’

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नागपुर के अभिभावक गण 

अपने बच्चों से कभी यही कहा करते थे।

संभवतः आज भी कहते होंगे !

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आज देश के विभिन्न क्षेत्रों में,खासकर राजनीति में, कितनी ऐसी हस्तियां मौजूद हैं, जिनकी ओर इंगित करके कोई अभिभावक यह कह सके कि ‘‘बेटा,बड़ा होकर इनके जैसा ही बनना ?’’

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दिल्ली में कितने ऐसे नेता मौजूद हैं जिन्हें कोई पिता अपनी संतान का स्थानीय अभिभावक बनाना पसंद करेगा ?

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राज्य सभा के सदस्य रहे भाजपा नेता

तरुण विजय ने नागपुर के डा. जिचकर के बारे में पांचजन्य (13 जून 2004)में लिखा था--

‘‘विद्वान शिरोमणि यौवन तेज से भरपूर सुदर्शन चेहरा एवं वाणी मेें नूतन ब्राह्मण का परिमर्जित माधुर्य।’’

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पिछड़ी जाति में जन्मे डा.जिचकर ने खुद कहा था कि 

‘‘अब मैं दीक्षित हो गया हूं।

 दीक्षा प्राप्त करने के बाद ब्राह्मणत्व की श्रेष्ठत्तम परंपरा में सम्मिलित हो गया हूं। 

मैं जन्म से ब्राह्मण नहीं था।

 परंतु घर में अग्नि प्रतिष्ठापित कर अग्निहोत्र धर्म का नियमानुसार पालन कर और अब सोम यज्ञ द्वारा दीक्षित होने के बाद मैं स्वयं को दीक्षित कहने का अधिकारी हो गया हूं।’’

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डा. जिचकर न सिर्फ महाराष्ट्र सरकार के  मंत्री थे बल्कि राज्य सभा के सदस्य भी थे।

वह महाराष्ट्र विधान परिषद के भी सदस्य रहे।

उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर एक बार लोक सभा का चुनाव भी लड़ा था।

पर, वे विफल रहे।

सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया था।

     जिचकर एम.बी.बी.एस. और एम.डी. थे।

 वह एलएल.बी., एलएल.एम. और एम.बी.ए. भी थे।

उन्होंने पत्रकारिता की भी डिग्री ली थी।

दस विषयों में एम.ए. थे।

1973 से 1990 के बीच उन्होंने कुल 20 डिग्रियां लीं।

सारी परीक्षाओं में उन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्णता हासिल की।

उन्हें कई स्वर्ण पदक भी मिले।

वह संस्कृत में डि लिट थे।

 1978 में आई.पी.एस.बने।

 इस्तीफा देने के बाद आई.ए.एस.बने।

1980 में महाराष्ट्र विधान सभा के सदस्य बने। 

मंत्री भी बने।

 उनके पास 14 विभाग थे।

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   डा. जिचकर का नाम लिम्का बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में  भारत के सबसे अधिक योग्य और निपुण व्यक्ति के नाते दर्ज है।

 वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने जीरो बजट की अवधारणा को कार्यरूप दिया था। 

डा. जिचकर को समय -समय पर याद करके नागपुर का  अभिभावक अपने बच्चों से कहता है कि ‘बेटा, बड़ा होकर श्रीकांत जिचकर की तरह बनना। ’

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वह आधुनिक राजनीति में संभवतः एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनको कोई पिता दिल्ली में अपनी संतान का स्थानीय अभिभावक बना सकता था।

    डा. जिचकर ने नागपुर में एक विद्यालय की स्थापना की थी ।

उस स्कूल के बारे में अभिभावकों से अपील करते हुए अखबार में विज्ञापन छपा था, 

‘‘ डा. श्रीकांत जिचकर जिस विद्यालय में अपने बेटे को प्रवेश दिला रहे हैं, क्या आप अपने बच्चों को भी उसी विद्यालय में पढ़ाना चाहेंगे ? ’’

 इस विज्ञापन के छपते ही सैकड़ों अभिभावकों की भीड़ लग गई थी।

यानी, उन्होंने एक ऐसा गुणवत्तापूर्ण स्कूल स्थापित किया था जिसमें उनका बेटा भी पढ़ सके।

   जिचकर नागपुर छात्र संघ के अध्यक्ष भी थे।

 इसके अलावा भी उनके पास डिग्रियां और उपलब्धियां थीं। 

सन् 1983 में दुनिया के दस सर्वाधिक प्रमुख युवा व्यक्तियों की सूची में शामिल होने का सम्मान उन्हें मिला था।

  वह सन 1992 में राज्य सभा के सदस्य चुने गए।

पी.वी.नरसिंह राव उन्हें पसंद करते थे।

राव ने डा. जिचकर को इंदिरा गांधी से मिलवाया था।

डा.जिचकर ने अधिकतर देशों की यात्राएं की थीं।

उनके निजी पुस्तकालय में 52 हजार पुस्तकें थीं।

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वे छायांकन, चित्र कला, रंगकर्म के भी जानकार थे।

 उन्हें संपूर्ण गीता कंठस्थ थी। 

साथ ही, उन्होंने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया था।

    खेतिहर परिवार के जिचकर के साथ एक सुविधा अवश्य थी कि पैसे की कमी के कारण उनका कोई काम नहीं रुका।

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    उनमें  और भी अनेक गुण थेे।

पर सबसे बड़ी बात यह थी कि वे राजनीति में भी थे।

 यानी ऐसे लोग राजनीति में आ सकते हैं ,यदि उनके लिए सम्मानपूर्ण जगह बनाई जाए।

 हालांकि आज जितने लोग राजनीति मंे हैं, उनमें से भी अनेक लोग योग्य और कत्र्तव्यनिष्ठ हैं।

 पर, वैसे लोगों की संख्या घटती जा रही है।

   डा. जिचकर जैसी विभूतियों को समय -समय पर याद करके नई पीढ़ी को प्रेरित किया जा सकता है।

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28 मार्च 24