मंगलवार, 18 मार्च 2025

  शाहीन बाग से जंतर-मंतर तक 

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तब नागरिकता जाने की अफवाह,

अब वक्फ जमीन खोने का झूठ !

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सुरेंद्र किशोर 

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झूठ-अफवाह के आधार पर कोई 

सार्थक आंदोलन संभव नहीं

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22 सितंबर, 2024 को ए.आई.एम.आई.एम.के प्रधान असदुद्दीन ओवैसी ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि उत्तर प्रदेश में एक लाख 12 हजार वक्फ संपत्तियों के (मौजूदा कब्जेदारों या दावाकत्र्ताओं के पास) पक्ष में ऐसा कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है कि वह वक्फ की ही संपत्ति है।

यू.पी.में वक्फ संपत्तियों की कुल संख्या एक लाख 21 हजार है।(ओवैसी के इस बयान को आप आज भी गुगल पर देख सकते हैं।)

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पर,कल जंतर मंतर के धरना स्थल पर ओवैसी ने कहा कि यदि वक्फ संशोधन विधेयक संसद से पास हो जाएगा तो कब्रिस्तान ,मदरसा और मस्जिदें मुसलमानों से छीन ली जाएंगी।

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यू.पी.के जिन एक लाख 12 हजार वक्फ संपतियों पर यदि कब्रिस्तान,मदरसे और मस्जिदंे होंगी तो वे तो छीनी ही जानी चाहिए।छीनी ही जाएगी।

  वैसे भाजपा ने कल कह दिया है कि वक्फ संशोधन बिल पास हो जाने के बावजूद स्पष्ट स्वामित्व वाली वक्फ संपत्तियों की कोई जमीन नहीं छीनी जाएगी।

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नाजायज कब्जे का जो अनुपात यू.पी.में है,वही अनुपात संभवतः पूरे देश में है।इसीलिए तो इस देश में वक्फ के पास 9 लाख एकड़ जमीन होने का दावा है।

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शाहीन बाग की कहानी

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कुछ ही साल पहले अतिवादी मुसलमानों के नेतृृृत्व में शाहीन बाग (दिल्ली) में धरना दिया गया।

धरना नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ था।उनका तर्क था कि उसके लागू होने से भारत के मुसलमानों की नागरिकता छीन ली जाएगी।

जबकि केंद्र सरकार ने तब लगातार यह कहा था कि यह कानून किसी की नागरिकता छीनने के लिए नहीं बल्कि नागरिकता देने के लिए है।

सी.ए.ए.के तहत आसपास के मुस्लिम बहुल देशों से, जो वहां के अल्पसंख्यक प्रताड़ित होकर भारत आए,उन्हें आज नागरिकता दी जा रही है।पर इस सिलसिले में किसी भारतीय मुस्लिम की नागरिकता नहीं छीनी जा रही है।

अब बताइए,कितने बड़े झूठ को आधार बना कर ‘‘शाहीन बाग’’ किया गया।तब दिल्ली तथा अन्य जगह उन लोगों ने भीषण दंगा भी किया था।

अनेक तथकथित सेक्युलर वोट लोलुप राजनीतिक दलों के नेताओं ने शाहीन बाग जाकर उन दंगाइयों के प्रति एकजुटता दिखाई थी।

बाद में पता चला कि उस धरना के पीछे प्रतिबंधित जेहादी संगठन पी.एफ.आई.था।उस अभियान के लिए विदेश से भारी पैसे आए थे।याद रहे कि आज इस देश के 90 प्रतिशत मुस्लिम वोट का कंट्रेाल पी.एफ.आई.के कब्जे में है।

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उसी तरह जब वक्फ संशोधन बिल पास हो जाएगा तो किसी जायज वक्फ संपत्ति को सरकार कभी नहीं छीनेगी।पर नाजायज संपति वक्फ के पास नहीं रहेगी।

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18 मार्च 25  


सोमवार, 10 मार्च 2025

            आर्ट आॅफ इंटरव्यू

    सुनील बादल की इस पुस्तक(आर्ट आॅफ इन्टरव्यू) के बारे में यशस्वी पत्रकार-सह -लेखक बलबीर दत्त की इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं कि ‘‘मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी में पत्रकारिता पर काफी हद तक यह सर्वांगपूर्ण पुस्तक अपने ढंग की पहली पुस्तक है।’’

   जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी,उस समय ही ऐसी कोई पुस्तक मिली होती तो उसका मुझे काफी लाभ मिलता।

 खुशी है कि मीडिया जगत की नई पीढ़ी को इसका लाभ मिलेगा।

इस पुस्तक का नाम ही ऐसा है जिससे विषय वस्तु का पता चल जाता है।

  इस इंटरव्यू विधा के लगभग सारे पहलुओं की चर्चा इस पुस्तक में समाहित है।अनेक प्रसंग ,विवरण और उदाहरण मौजूद हैं।

  यदि इंटरव्यू से पहले ठीक ढंग से तैयारी कर ली जाए तो कई बार कोई-कोई भेंट वार्ता, ‘‘न्यू ब्रेक’’ साबित हो सकती है।

मैंने अपने पत्रकारीय जीवन में जयप्रकाश नारायण से लेकर लालू यादव तक और ‘‘मनातू के मऊआर’’ से लेकर धनबाद के चर्चित शूटर तक के साथ लंबी-लंबी बातचीत की थी।

उन भेंट वार्ताओं से भी खबरें निकलीं,पर मेरी तैयारी उतनी नहीं थी जितनी होनी चाहिए थी।तैयारी बेहतर होने पर बेहतर रिजल्ट होते।

नयी पीढ़ी के पत्रकारों के पास यदि सुनील बादल की पुस्तक होगी तो उन्हें मुझ जैसा अफसोस नहीं होगा।

साक्षात्कार के सारे पहलुओं पर यह पुस्तक सोदाहरण दिशा -निदेश है।

  ऐसी कृति के लिए मैं लेखक को धन्यवाद और बधाई देता हूं।

             ---  सुरेंद्र किशोर  

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‘आर्ट आॅफ इंटरव्यू’

प्रकाशक-विद्या विकास एकेडेमी

3637,नेताजी सुषाष मार्ग

दरियागंज

नई दिल्ली-110002

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प्रथम संस्करण-सन 2025

पेपरबैक- 240 पृष्ठ

मूल्य-चार सौ रुपए  

  

  


शनिवार, 8 मार्च 2025

   वंशवाद की कमजोरियां

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यदि उत्तराधिकारी, अयोग्य हो तो ऐसे बर्बाद 

होती है वंशवादी- परिवारवादी पार्टी 

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सुरेंद्र किशोर

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राजीव गांधी न सिर्फ शैक्षणिक जीवन में दो बार फेल हुए 

थे,बल्कि उनका राजनीतिक करियर भी कांग्रेस के लिए विनाशकारी ही रहा।

सन 1984-89 में उन्होंने पी.एम.के रूप में ऐसे-ऐसे काम किये कि उसके बाद कांग्रेस लोक सभा में पूर्ण बहुमत के लिए आज तक तरस रही है।

प्रतिपक्ष के नेता के रूप में भी राजीव गांधी की भूमिका 

से कांग्रेस मजबूत नहीं हुई।

बाकी बचा ‘‘काम’’ उनके पुत्र राहुल गांधी बखूबी पूरा कर देंगे,ऐसे संकेत मिल रहे हैं।राहुल ने कांग्रेस पार्टी को अतिवादी मुस्लिम संगठनों का पिछलग्गू बना दिया है।

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पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कल कहा कि कमजोर शैक्षणिक रिकाॅर्ड को लेकर मेरी टिप्पणी  की चर्चा तो भाजपा कर रही है,पर मैंने उसी इंटरव्यू में यह भी कहा था कि राजीव गांधी उत्कृष्ट प्रधान मंत्री थे,उसकी चर्चा नहीं हो रही।

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दरअसल राजीव गांधी दो बार फेल कर गए,इसका तो कागजी सबूत मिल जाएगा।पर अय्यर की इस बात का कोई सबूत उपलब्ध नहीं है कि राजीव गांधी उत्कृष्ट प्रधान मंत्री थे।

  बल्कि उससे उलट वे पूर्णतः विफल प्रधान मंत्री रहे।

हां,लंबे समय तक शासन करने वाला कोई विफल नेता भी कुछ अच्छे काम तो कर ही जाता है।राजीव ने भी कुछ अच्छे काम किए।किंतु उनके बुरे काम इतने अधिक थे कि उसका खामियाजा देश व कांग्रेस को भुगतना पड़ रहा है।

अपने शासन काल में राजीव गांधी ने ऐसे -ऐसे काम किए कि सन 1989 के लोक सभा चुनाव और उसके बाद भी कांग्रेस को लोक सभा में बहुमत मिलना बंद हो गया।आगे मिलेगा,इसकी भी कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।

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1990 में मंडल आरक्षण का विरोध करने का गुरु मंत्र तो मणि शंकर ने ही राजीव गांधी को दिया था।उससे भी कांग्रेस डूबी।

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1990 में मंडल आरक्षण आया था।

राजीव गांधी ने मणि शंकर अय्यर से कहा कि कांग्रेस कार्य समिति में पेश करने के लिए एक प्रस्ताव तैयार कर दीजिए।

 ‘इंडिया टूडे’( 30 सितंबर 1990) के अनुसार लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता राजीव गांधी के लिए तैयार अय्यर के मूल प्रस्ताव में आरक्षण का पूर्ण विरोध था।(याद रहे कि जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी भी पिछड़ा आरक्षण के सख्त विरोधी थे।)

कार्य समिति की बैठक में सीताराम केसरी तथा कुछ दक्षिण भारतीय नेताओं के विरोध के बाद अय्यर द्वारा तैयार उस प्रस्ताव में संशोधन करके बीच -बीच का रास्ता निकाला गया।

फिर भी इस देश के पिछड़ों को लगा कि कांग्रेस अब भी नेहरू की राह पर हैं जो आरक्षण के कट्टर विरोधी थे।

लोक सभा में राजीव गांधी ने मंडल आरक्षण पर जो लंबा भाषण दिया,उससे तो यह साफ हो गया कि कांग्रेस पिछड़ा विरोधी है।

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कांग्रेस को कमजोर करने में जाने-अनजाने अय्यर का भी हाथ रहा।

  मणिशंकर अय्यर ने विवाद भड़काने वाला बयान 

देते हुए जनवरी 2014 में कहा था 

कि ‘‘नरेंद्र मोदी कभी देश के प्रधान मंत्री नहीं बन पाएंगे।

वह अगर चाहें तो कांग्रेस उनके लिए चाय बांटने की जगह मुहैया करा सकती है।’’

   (17 जनवरी 2014)

जब मोदी प्रधान मंत्री बन गये तो  

सन 2015 में पाकिस्तान जाकर वहां के एक टी.वी.चैनल पर बोलते हुए मणि शंकर ने पाकिस्तानियों से अपील की कि ‘‘पहले आप लोग मोदी को हटाइए।’’(इस अपील में अय्यर के अनुसार यह बात छिपी थी कि भारत के मुसलमान, पाक के कहने पर वोट देते हैं।)

राजीव गांधी के शासन काल में बोफोर्स तोप सौदा घोटाला तथा एक -एक कर अन्य घोटाले सामने आने लगे।

सर्वाधिक चर्चा बोफोर्स की हुई।

क्योंकि उसके दलालों में एक क्वात्रोचि इटली का था।

उसकी प्रधान मंत्री  आवास में 

किसी सुरक्षा जांच के बिना सीधी पहुंच थी। 

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1989 के भागलपुर सांप्रदायिक दंगे के समय वहां के विवादास्पद एस.पी.का तबादला प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने रोक देने का आदेश दे दिया ,मुख्य मंत्री से पूछे बिना।(तब के मुख्य मंत्री सत्यंेद्र नारायण सिंह ने बाद में मुझे यह बात बताई थी।) 

तबादला रुकने से पहले हुए दंगे में करीब 100 मुस्लिम मारे गये थे।पलिसं की संलिप्तता की खबर पाकर  मुख्य मंत्री ने एस.पी.का तबादला कर दिया था।

तबादला रुकने के बाद और बहुत अधिक हत्याएं हुईं।करीब नौ सौ और।

नतीजतन कांग्रेस का मुस्लिम वोट बैंक 1989 के चुनाव में पूरे देश में उससे अलग हो गया।

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शाहबानो मामले में प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने मुस्लिम कानून को संविधान से ऊपर रखते हुए शरीअत के अनुसार भारतीय संविधान में संशोधन करवा दिया।

भाजपा के ताकतवर होने का वह भी एक कारण रहा।(याद रहे कि दुनिया के किसी सेक्युलर देश में मुस्लिम कानून वहां के संविधान -कानून से ऊपर नहीं है।)

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प्रधान मंत्री बनने से पहले राजीव.

कांग्रेस महासचिव थे।उस रूप में उन्होंने देश के तब के तीन विवादास्पद मुख्य मंत्रियों को

उनके पदों से हटवा दिया था।इसे राजीव की छवि बहुतर हुई।उन्हें मिस्टर क्लीन कहा गया।

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 प्रधान मंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने सार्वजनिक रूप से दो  महत्वपूर्ण बातें कह दीं।

उन बातों से भी लोगों को लगा कि वह इंदिरा गांधी की एक खास कमी को भी पूरा कर देंगे।

पी.एम. राजीव गांधी ने ‘‘सत्ता के दलालों’’ के खिलाफ जोरदार आवाज उठा दी।

उन्होंने एक अन्य अवसर पर यह भी कह दिया कि केंद्र सरकार दिल्ली से 100 पैसे भेजती है,किंतु गंाव तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं।

  इन बातों से अनेक लोगों में यह धारणा बनी कि प्रधान मंत्री राजीव गांधी भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक कदम उठाएंगे।

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पर,अंततः ऐसा नहीं हो सका।

कई कारणों से प्रधान मंत्री के रूप में उनके कदम डगमगाने लगे।

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..बोफोर्स तोप सौदा घोटाला तथा एक -एक कर अन्य घोटाले सामने आने लगे।

सर्वाधिक चर्चा बोफोर्स घोटाले की हुई ।क्योंकि उसके दलालों में से एक क्वात्रोचि इटली का था।

उसकी प्रधान मंत्री के आवास में 

किसी सुरक्षा जांच के बिना सीधी पहुंच थी। 

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. और अंत में

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‘‘प्रधान मंत्री राजीव गांधी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद स्थित राम जन्मभूमि का ताला 1985 में खोलवा दिया था।

इसलिए राम मंदिर निर्माण का श्रेय किसी और को नहीं लेना चाहिए।’’

--  कमलनाथ, पूर्व मुख्य मंत्री, मध्य प्रदेश,

--टाइम्स नाऊ डिजिटल,

   6 अगस्त, 20

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‘‘ताला खोलवाने में राजीव गांधी का कोई हाथ नहीं था।

राजीव गांधी को तो ताला खोले जाने की जानकारी भी नहीं थी।

दरअसल ताला खोल देने के एक स्थानीय अदालत के निर्णय

के आधे घंटे के भीतर ही छल कपट के तहत हाथ की सफाई दिखाते हुए कुछ लोगों ने ताला खोल दिया।’’

    ----- मणि शंकर अय्यर,

          , द हिन्दू- 6 अगस्त 20

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 कमलनाथ का बयान हिन्दुओं को खुश करने लिए था। अय्यर का बयान मुसलमानों को खुश करने के लिए।

राहुल गांधी ने यह द्विविधा खत्म कर दी है।अब कांग्रेस सिर्फ वहीं चुनाव जीत पा रही है जहां मुसलमान वोटर निर्णायक स्थिति में हैं।

इस देश के 90 प्रतिशत मुसलमानों के वोट एक खास अतिवादी संगठन इन दिनों कंट्रोल कर रहा है।उन्हीें लोगों ने वायनाड लोस क्षेत्र में बारी -बारीे से भाई-बहन को जितवाया। 

ए.के. एंटोनी ने कई बार कहा है कि कांगे्रस इसलिए हार रही है क्योंकि उसने यह दिखा दिया है कि वह मुसलमानों की ओर कुछ अधिक ही झुकी हुई है।

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8 मार्च ,  25


बुधवार, 5 मार्च 2025

  1977 की मोरारजी सरकार वाली शराबबंदी में 

मेडिकल आधार पर कुछ लोगों को शराब पीने 

की छूट थी।वह छूट नीतीश सरकार में नहीं है

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सुरेंद्र किशोर

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आपातकाल (1975-77) में भूमिगत कर्पूरी ठाकुर ने आचार्य विनोबा भावे को कई पत्र लिखे थे। 

उनमें से एक पत्र का एक अंश यहां पेश है जो आज के बिहार के लिए प्रासंगिक है--

‘‘नशाबंदी अभियान हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यक्रमों का एक अभिन्न अंग था--सन 1920 से सन 1947 तक।

हजारों -लाखों लोग इसके लिए सिर्फ जेल ही नहीं गए थे ,बल्कि लोगों ने लाठियांे और गोलियांें का भी सामना किया था।’’

--कर्पूरी ठाकुर

15 सितंबर 1976

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सन 1977 में प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने पूरे देश में चरण बद्ध ढंग से शराबबंदी लागू की थी।

 उसे चार साल में पूरा करना था।

प्रत्येक वर्ष एक चैथाई शराब दुकानों को बंद करना था।

तब कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्य मंत्री थे।उन्होंने भी तहे दिल से देसाई सरकार की इस योजना को बिहार में लागू

किया। 

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उसी बीच प्रधान मंत्री देसाई पटना आए थे।राज भवन में उनका प्रेस कंाफ्रेंस था।दैनिक ‘आज’ के संवाददाता के रूप में

मैं भी उस पत्रकार सम्मेलन में मौजूद था।

 एक वरिष्ठ संवाददाता ने प्रधान मंत्री से सवाल पूछा-

‘‘देश भर में पूर्ण शराबबंदी कितने साल में आप

 लागू कर देंगे ?’’

हाजिर जवाब मोरारजी भाई ने कहा कि ‘‘मैं तो एक ही साल में लागू कर दूं।पर,तुम लोग(यानी पत्रकार समूह)ही इसके खिलाफ हो।’’

  इस पर पूरा हाॅल ठहाकों से गूंज उठा।क्योंकि जिस संवाददाता ने सवाल पूछा था,वह अन्य लोगों की अपेक्षा कुछ अधिक ही ‘पीता’ था।

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बिहार में जारी आज की शराबबंदी और मोरारजी की शराबबंदी में एक फर्क था।

 तब मेडिकल ग्राउंड पर कुछ लोगों को शराब पीने की छूट मिलती थी। आज नीतीश सरकार में वह छूट नहीं है।

छूट होनी चाहिए थी।उससे समाज के प्रभावशाली लोगों की शराबबंदी के खिलाफ ‘बोलती’ बंद हो जाती।

आज तो वैसे प्रभावशाली लोग छिप -छिप कर पीते भी हैं और साथ ही शराबंदी के लिए बिहार सरकार को कोसते भी हैं।इस मुद्दे पर राज्य सरकार के खिलाफ माहौल बनाते हैं।

मेडिकल आधार पर ऐसी  छूट आज भी दी जा सकती है।इससे बिहार की राजग सरकार को थोड़ा चुनावी लाभ मिल  सकता है।

  ऐसी मांग के कारण कोई मुझे गलत न समझे।मैं अपने लिए छूट नहीं मांग रहा हूं।क्योंकि मैं शराब नहीं पीता।मैं तो उसका स्वाद भी नहीं जानता।  

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बिहार की शराबबंदी का फायदा महिलाओं के साथ-साथ अपेक्षाकृत गरीब घर के युवकों को भी हुआ है।इस संबंध में मेरी व्यक्तिगत जानकारी भी है।

अब अमीर घर के लड़के अपने अपेक्षाकृत गरीब दोस्त को बुला कर शराब नहीं पिलाते।क्योंकि चोरी -छिपे शराब पहुंचाने वालों ने शराब की कीमत बहुत अधिक बढ़ा दी है।क्योंकि इस धंधे में पुलिसिया नजराना बढ़ गया है।

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5 मार्च 25 


मंगलवार, 4 मार्च 2025

 मान्यवर हरिवंश जी की 10 और किताबें 

 अब मेरे निजी पुस्तकालय-संदर्भालय में 

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     सुरेंद्र किशोर

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मशहूर पत्रकार और राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश जी 

की दस किताबांे का सेट अब मेरे सामने है।

 ये किताबें ‘समय के सवाल’सीरीज के तहत प्रकाशन संस्थान (नई दिल्ली)से छपी हैं।

  इन पुस्तकों का संपादन जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय के पूर्व प्राध्यापक और हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक डाॅ.ओम प्रकाश सिंह के मार्ग दर्शन में हुआ है।

  इन किताबों के  अलग-अलग खंडा़ें में हरिवंश जी की करीब चार दशक(1977-2017)की पत्रकारिता में लिखे लेखों का संकलन है।

 ये आलेख नव भारत टाइम्स,धर्मयुग(टाइम्स आॅफ इंडिया प्रकाशन समूह),रविवार(आनंद बाजार पत्रिका समूह)प्रभात खबर,इंडिया टूडे समेत अन्य प्रकाशन संस्थानों में रिपोर्ट,रिपोर्ताज,विश्लेषण,त्वरित टिप्पणी,अग्रलेख ,साक्षात्कार,यात्रा वृतांत आदि के रूप में प्रकाशित हुए थे।

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पुस्तकों के नाम हैं-

1.-बिहार सपना और सच

2.-झारखंड सम्पन्न धरती,उदास बसंत

3.-झारखंड चुनौती भी,अवसर भी

4.-राष्ट्रीय चरित्र का आईना

5.-पतन की होड़

6.-भविष्य का भारत़

7.-सरोकार और संवाद

8.-अतीत के पन्ने

9.-ऊर्जा के उत्स

10-सफर के शेष

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पुस्तक -‘बिहार सपना और सच’ के बारे में इन पुस्तकों के संपादक डा.ओम प्रकाश सिंह ने लिखा है कि 

‘बिहार देश का एक ऐसा राज्य है जिसका नाम इतिहास के पन्नों में वैभव और समृद्धि के लिए दर्ज है।

पाटलिपुत्र,मगध,वैशाली के बारे में इतिहास के पन्नों को उलट -पुलट कर हम केवल गौरवान्वित ही नहीं होते बल्कि आज भी उसकी आवश्यकता महसूस करते हैं।

वही बिहार जिसका अतीत रचनाकारों के लिए आज भी उपजीव्य बना हुआ है,उसका वर्तमान कैसा है,इस पुस्तक के माध्यम से बखूबी उजागर होता है।

  इस पुस्तक मंे हरिवंश जी के वे उद्गार संकलित हैं,जो 1979 से 2020 के बीच बिहार की दशा देख कर फूट पड़े थे।हरिवंश जी राजनेता हैं,पर इसके पूर्व,वे सफल पत्रकार हैं।

बिहार से वे लंबे समय से जुड़े रहे हैं।

 कुछ अर्थों में वह उनकी कर्मस्थली है।

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प्रकाशक-

प्रकाशन संस्थान,

4268-बी/3,अंसारी रोड,

दरियागंज,

नयी दिल्ली -110002

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फोन-011-23253234 और 

43549101 

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2 मार्च 2025

 


रविवार, 2 मार्च 2025

    

अर्थाभाव में रांची के 90 वर्षीय पद्मश्री 

सम्मानित का समुचित इलाज नहीं

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गुमनाम नायकों को पद्म सम्मान 

देने की मोदी परंपरा सराहनीय

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सुरेंद्र किशोर

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परपरंा तो ठीक है,पर ऐसा न हो कि पद्म 

सम्मानित अर्थाभाव में भुखमरी या लाइलाज ?!! 

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तेलांगना के पद्म सम्मानित मजदूर का शरीर स्वस्थ था,इसलिए वह निर्माण कंपनी में मजदूरी करने लगा था।

पर,रांची के पद्म सम्मानित तो अशक्त हैं।रांची के पत्रकार कुंदन कुमार चैधरी ( दैनिक भास्कर)ने  90 वर्षीय पद्म समानित व्यक्ति की दयनीय स्थिति के बारे में खबर दी है।

आज छपी खबर के अनुसार ,सन 2016 में पद्म सम्मान से विभूषित 90 वर्षीय सिमोन उरांव पैरालिसिस से ग्रस्त हैं ।और, अर्थाभाव के कारण उनका समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है।तीन साल से उनकी सुध कोई नहीं ले रहा है।

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कुछ समय पहले खबर छपी है सन 2022 में पद्म सम्मानित दर्शनम् मुगोलैया मजदूरी कर रहे हैं तो तेलांगना सरकार ने उन्हें तुरंत भारी आर्थिक सहयाता दे दी।

वहां पद्म सम्मानितों के लिए राज्य सरकार ने मासिक पेंशन का प्रावधान भी कर दिया।ओड़िशा तथा देश की कुछ अन्य राज्य सरकारों ने भी पद्म सम्मानितों के लिए पेंशन का प्रावधान किया है।

पर अपुष्ट सूत्रों से जानकारी मिली है कि ऐसी ही पेंशन के  प्रस्ताव को बिहार सरकार ने हाल में ठुकरा दिया है।

देश के चैथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान यानी पद्मश्री से सम्मानित व्यक्ति मुगोलैया की वहां की राज्य सरकार ने सुध ली।

पर झारखंड की सरकार सिमोन के बारे में क्या कर रही है ?

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 याद रहे कि सन 2014 में सत्ता में आने के तत्काल बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने यह तय किया कि अब हम पद्म पुरस्कारों से गुमनाम नायकांे को सम्मानित करेंगे।

यह अच्छी बात है।सन 2014 से पहले की केंद्र सरकार अपवादों को छोड़ कर आम तौर पर वैसी हस्तियों को सम्मानित करती थी जिन्हेें निजी जीवन में कोई आर्थिक संकट नहीं रहता था। 

 पर,जब मोदी राज में ‘पात्रता’ बदल गई तो कम से कम वैसे सम्मानित लोगों के लिए मानदेय का प्रावधान करना चाहिए था जो आयकर दाता नहीं हैं।

पर, वह भी नहीं हुआ।हां,कुछ राज्य सरकारें उन सम्मानितों के काम आ रही हैं।

पर,यह तो विभिन्न राज्य सरकारों के मन -मिजाज पर निर्भर करता है। 

    याद रहे कि पद्म सम्मानितों को केंद्र सरकार कोई आर्थिक मदद नहीं करती।इसका कोई प्रावधान ही नहीं।बल्कि पद्मश्री,पद्मभूषण या पद्म विभूषण शब्द को अपने नाम के साथ जोड़ने की भी सम्मानितों को अनुमति नहीं है।यहां तक कि लेटर हेड ,विजिटिंग कार्ड या आवास के नेम प्लेट पर भी लिखना मना है।

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कई साल पहले की बात है।

नई दिल्ली के एक मशहूर वामपंथी पत्रकार को पद्मश्री आॅफर किया गया था।

  उन्होंने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

वे नई दिल्ली में पत्रकार कोटा वाले सरकारी मकान में अत्यल्प रेंट पर जरूर रहते थे।

सरकारी मकान में आप कब तक रहेंगे,उसको लेकर नियम है।

जब पत्रकार महोदय नियम विरुद्ध जाकर ‘ओवर स्टे’ करने लगे तो केंद्र सरकार ने निष्कासन का नोटिस दे दिया।

उस नोटिस के खिलाफ वे कोर्ट चले गए।

हालंाकि कोर्ट से उन्हें अंततः राहत नहीं मिली।

यानी, पत्रकार महोदय को लगा होगा कि पद्मश्री के साथ तो कोई आर्थिक लाभ है नहीं।

तो फिर इसे स्वीकार करके सरकार पक्षी होने का लांछन नाहक क्यों झेलना !

ऐसे ही उनका काफी नेम-फेम था।

पर सरकारी मकान में नियम विरूद्ध जाकर ओवर स्टे करना

तो उनके लिए फायदे का काम था। 

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2 मार्च 25


     

   


 


 मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के

 जन्म दिन पर उन्हें बधाई !

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एक पुरानी याद 

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नीतीश कुमार की ‘प्रगति यात्रा’ के संबंध में अखबारों में जारी विज्ञापनों में एक नारा होता है--

‘‘हमने जो कहा,वह पूरा किया।’’

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नीतीश जी ने सन 1977 में मुझसे जो कहा था,वह भी उन्होंने उसे भी पूरा किया था।

हालांकि उनकी तब की बात मुझे असंभव सी लगी थी।

कुछ ही समय पहले नीतीश कुमार सन 1977 का विधान सभा  चुनाव हारे थे।

हम काॅफी बोर्ड वाले काॅफी हाउस में साथ बैठे थे।

तब बिहार में सरकार कर्पूरी ठाकुर की थी।मैं उन दिनों दैनिक ‘आज’ अखबार में काम करता था।

मैंने नीतीश जी से कहा कि ‘‘कर्पूरी जी की सरकार से जैसी हमें उम्मीद थी,वह पूरी नहीं हो रही है।’’

उस पर आत्म विश्वास से भरे नीतीश कुमार ने 

कहा,‘‘सुरेंद्र जी,मैं एक दिन मुख्य मंत्री जरूर बनंूगा।और बनूंगा तो अच्छा काम करूंगा।’’

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मेरा आकलन है कि कुल मिलाकर अत्यंत विपरीत परिस्थितियों के बावजूद नीतीश जी ने मुख्य मंत्री के रूप में बिहार में अच्छा काम किया है।बिहार को उससे पहले की अपेक्षा  लगभग बदल दिया है।हां,सरकारी भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर जरूर सफल नहीं रहे।

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 यदि नीतीश कुमार के शासन काल में डा.श्रीकृष्ण सिंह के समय जैसी कत्र्तव्यनिष्ठ उच्च ब्यूरोके्रसी होती और मौजूदा मुख्य मंत्री के पास भाजपा जैसा संगठन होता तो नीतीश कुमार और भी अच्छा काम कर पाते।

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पुनश्चः

तब की बात है जब भागवत झा आजाद बिहार के मुख्य मंत्री थे।

उधर देश भर में वी.पी.सिंह की ‘‘बोफोर्स आंधी’’ चल रही थी।

उन्हीं दिनों मेरी मुलाकात सत्येंद्र नारायण सिंह से हुई।

 उन्होंने कहा कि आज राजपूत लोग पूरी तरह वी.पी.सिंह के साथ हैं।

यदि कांग्रेस हाई कमान मुझे भी बिहार का मुख्य मंत्री बना दे तौभी बिहार के राजपूत कांग्रेस को वोट नहीं देंगे।

 उनसे बातचीत के बीच मैं मन ही मन यह सोच रहा था कि कांग्रेस हाईकमान इतना अदूरदर्शी

तो है नहीं जो इन्हें मुख्य मंत्री बना देगा !

क्योंकि भागवत झा अच्छा काम कर रहे थे।

 पर,मेरा अनुमान गलत निकला -कांग्रेस हाईकमान ने सत्येंद्र बाबू को मुख्य मंत्री बना ही दिया।

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यानी कई बार आपका अनुमान गलत निकलता है।

नीतीश कुमार के काॅफी हाउस के आत्म विश्वास को देख कर भी मुझे तब उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ था।

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1 मार्च 25