रविवार, 1 फ़रवरी 2009

राजनीति नहीं, जन-धन की चिंता

इस देश के कई बड़े उद्योगपति इन दिनों नरेंद्र मोदी के इतने बड़े प्रशंसक कैसे हो गये, जबकि व्यापारीगण आम तौर पर उस नेता की तरफ अधिक मुखातिब होते हैं, जिसकी सरकार केंद्र में होती है। यदि इस देश के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण व्यापारी नरेंद्र मोदी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, तो वे लोग एक साथ दो -दो खतरे मोल ले रहे हैं। इस तरह वे ‘प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग’ को भी मन-ही-मन नाराज कर रहे हैं। साथ ही केंद्र सरकार की नाराजगी मोल लेने का खतरा भी उठा रहे है, पर इतना बड़ा खतरा व्यापारी ऐसे ही मोल नहीं ले रहे हैं। दरअसल देश में आये दिन घट रही आतंकी घटनाओं के कारण व्यापारियों की खुद के जान -माल पर भी भारी खतरा उत्पन्न हो चुका है। मुंबई में हुए हाल के आतंकी हमले के बाद व्यापारी यह महसूस कर रहे हैं कि उनकी रक्षा वही कर सकता है, जिसके पास आतंकवाद से दो टूक लड़ाई लड़ने का नरेंद्र मोदी जैसा साहस हो। जब जान-माल की रक्षा होगी, तभी तो व्यापार व उद्योग भी रहेगा ! यह अकारण नहीं है कि मुंबई में ताज पर हमले से हुई व्यापक जन-धन की क्षति के बाद रतन टाटा ने मीडिया से कहा था कि मजबूत नेतृत्व और कारगर कानून के जरिये ही आतंकवाद से लड़ा जा सकता है। कांग्रेस की केंद्र सरकार को चाहिए कि नरेंद्र मोदी को लेकर व्यापारियों कीे ताजा टिप्पणियों पर नाराज होने के बदले आतंकवाद के खिलाफ अपनी दो टूक लड़ाई को और तेज करे। इधर केंद्र सरकार के रूख में सकरात्मक बदलाव जरूर आया है, पर वह काफी नहीं है। नये कानून और नये गृह मंत्री से इस दिशा में उम्मीद जरूर जगती है। लगता है कि पी चिदंबरम के कुछ हाल के बयानों में वोट बैंक की चिंता नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा की अधिक चिंता है। इस तरह के कुछ और कदम केंद्र सरकार उठा कर व्यापारियों के जान-माल की सुरक्षा की गारंटी दे, तो वे नरेंद्र मोदी की तरफ उनका झुकाव खुद-ब-खुद कम होगा, ऐसा राजनीतिक प्रेक्षक कहते हैं। एक व्यापारी ने कहा कि गुजरात दंगे को लेकर बार-बार नरेंद्र मेादी को मौत का सौदागर कहने भर से काम नहीं चलेगा। सन् 1984 में तो दिल्ली के हजारों सिक्खों के संहार के बाद किसी को मौत का सौदागर क्यों नहीं कहा जाता ?



ताकि जनता का विश्वास न टूटे

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन ने साल के महीनों में अदालतों में भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए कई सराहनीय कदम उठाये हैं। कई जजों पर इस सिलसिले में उन्होंने कार्रवाई का रास्ता साफ किया है। पर हाल में उन्होंने यह कर जनता को निराश किया है कि जजों के लिए अपनी संपत्ति का ब्योरा देने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यदि इस संबंध में कानूनी बाध्यता नहीं है कि मुख्य न्यायाधीश से यह उम्मीद की जा रही है कि ऐसा कानून बनाने के लिए सरकार व संसद कहें। वे खुद न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर चिंतित रहे हैं।दूसरी बात यह भी है कि हाल के वर्षों में आम जनता का न्याय के लिए न्यायपालिका खास कर हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर निर्भरता बढ़ी है। इस भारतीय लोकतंत्र का इन दिनों ऐसा स्वरूप बनता जा रहा है, जिससे यह लगता है कि अंततः अदालत और मीडिया से ही कुछ उम्मीद की जा सकती है। अपवादों की बात छोेड़ दें, तो इस देश की राजनीति, वोट, परिवार और पैसे में उलझ कर रह गयी है। प्रशासनिक कार्यपालिका के घोड़े पर तो राजनीतिक कार्यपालिका सवार रहती है। जब अदालतों से जनता का विश्वास बढ़ रहा है, तो जजों की भी इस मामले में जिम्मेदारी बढ़ जाती है। यदि जज अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करने को राजी हो जायें, तो जनता में उनके प्रति विश्वास और भी बढ़ जायेगा। अन्यथा यदि लोकतंत्र के सभी स्तंभों के प्रति बारी-बारी से जनता में अविश्वास बढ़ता गया, तो एक दिन लोकतंत्र पर ही खतरा उपस्थित हो जायेगा। लोकतंत्र की रक्षा करने से न्यायपालिका का भी महत्व बना रहेगा। जब जज अपने मुख्य न्यायधीश को अपनी संपत्ति का ब्योरा देते ही हैं, तो उसे सार्वजनिक कर देने पर राजी हो जाने में भला क्या कठिनाई हो सकती है।



और अंत में

दोनों के आचार, विचार, स्वभाव और मित्रमंडली को देखते हुए यह स्वाभाविक ही था कि सुनील दत्त कांग्रेस में थे और उनके पुत्र अब संजय दत्त समाजवादी पार्टी में हैं।

प्रभात खबर (19 जनवरी, 2009)

स्पीकर पद पर एक नजर

लोक सभा के पहले स्पीकर जीवी मावलंकर ने अध्यक्ष चुने जाने के बाद कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। पर, मौजूदा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी को इस बात का अफसोस है कि 2004 में स्पीकर चुने जाने के साथ ही उन्होंने अपनी पार्टी माकपा से इस्तीफा क्यों नहीं दे दिया था। यह बात उन्होंने हाल में कुछ पत्रकारों को बताई। सोमनाथ चटर्जी का कार्यकाल अब पूरा होने जा रहा है। पर, उनका कार्यकाल कई कारणोें से चर्चित व विवादास्पद रहा। मुख्य प्रतिपक्षी दल भाजपा ने कई बार उन पर यह आरोप लगाया कि उनका प्रतिपक्ष के साथ व्यवहार एक वाम नेता की तरह ही था। दूसरी ओर, उनके दल सीपीएम ने भी उनके साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसा व्यवहार किसी लोक सभा स्पीकर के साथ अब तक उनके दल ने नहीं किया था। इस प्रकरण के साथ ही इस गरिमायुक्त पद पर एक बार फिर नजर डाल लेने की जरूरत महसूस की जा रही है। ब्रिटेन में तो ‘वन्स अ स्पीकर, अलवेज स्पीकर’ की परंपरा रही है। यानी स्पीकर के खिलाफ अगले चुनाव में प्रतिपक्षी दल अपना कोई उम्मीदवार ही खड़ा नहीं करता। वहां स्पीकर जब तक चहते हंै, इस पद पर बने रहते हैं और स्वेच्छा से रिटायर हो जाने के बाद भी वे राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होते। इसीलिए वहां स्पीकर निष्पक्षता से सदन का संचालन कर पाते हैं। यहां तो ऐसा संभव नहीं लगता। पर कम से कम एक प्रावधान तो किया ही जा सकता है कि इस देश की विधायिकाओं के अगले स्पीकर मावलंकर की परंपरा पर चलें। यानी ऐसे व्यक्ति स्पीकर बनें, जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा अपूर्ण नहीं रह गई हो। ऐसे नेता की तलाश जरा कठिन है, पर असंभव नहीं। यदि ऐसा हुआ तो सोम नाथ चटर्जी प्रकरण दुहराया नहीं जा सकेगा। यह लोकतंत्र के लिए भी गरिमायुक्त होगा । क्योंकि निष्पक्ष और कारगर स्पीकर की उपस्थिति के कारण सदन में अनेक सदस्यों के आचरण व चर्चाओं के गिरते स्तर को रोका जा सकेगा।

यूपी के चुनावी आंकड़े
कल्याण सिंह के मुलायम सिंह से मिल जाने के बाद उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावी आंकडों पर एक नजर डाल लेना दिलचस्प होगा।समाजवादी पार्टी को पिछले तीन चुनावों में यूपी में हर बार करीब -करीब छब्बीस प्रतिशत मत मिले। 2002 में 26।27 प्रतिशत, 2004 में 26.74 प्रतिशत और 2007 में 26.07 प्रतिशत। यानी ‘गुंडा राज’ के बसपा के आरोप के बावजूद सपा के अपने वोट नहीं घटे। ये तीन चुनाव हैं - सन् 2002 का विधानसभा चुनाव, 2004 का लोक सभा चुनाव और 2007 का विधान सभा चुनाव। हां, सपा की सत्ता इसलिए छिन गई क्योंकि बहुजन समाज पार्टी का वोट 25 प्रतिशत (2004) से बढ़कर 30 प्रतिशत (2007) हो गया। ये अतिरिक्त मत ब्राह्मण मतदाताओं के थे जिन्हें सतीश मिश्र ने बसपा से जोड़ा।ये मतदाता भाजपा से इसलिए नाराज थे कि उसने ब्राह्मणों को राज्य का भी नेतृत्व नहीं सौंपा। दूसरी ओर, राजा भैया जैसे ठाकुर नेताओं ने सपा की सत्ता का लाभ उठा कर अपना वर्चस्व बढ़ाया।अब तो बसपा राज पर ही ‘गुंडा राज’ का आरोप लग रहा है। अब ‘बाबरी मस्जिद प्रसिद्धी’ वाले कल्याण सिंह के मुलायम सिंह से जुड़ने के बाद क्या होगा ? बसपा के खिलाफ सत्ता- विरोध के तत्व का कितना असर अगले लोक सभा चुनाव पर पड़ेगा ? यूपी भाजपा में ब्राह्मणों का वर्चस्व बढ़ने के बाद क्या ब्राह्मणों के एक हिस्से की फिर घर-वापसी होगी ? अगले कुछ हफ्तों में इन सवालों के जवाब मिलेंगे। फिर उसी के आधार पर चुनाव नतीजे तय होंगे। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि बसपा और सपा के बीच मतों का अधिक अंतर नहीं जान पड़ता है।

फर्क सिवान और सारण का !
सिवान और सारण जिले के कालेज एक ही विश्वविद्यालय के तहत हैं। पर सिवान जिले की परीक्षाओं में कदाचार नहीं के बराबर है। इसलिए वहां के काॅलेजों में नामांकन कम हो रहे हैं। दूसरी ओर सारण और गोपाल गंज जिलों में कदाचार पर कारगर रोक नहीं है। इसलिए वहां के काॅलेजों में छात्र-छात्राओं की भरमार है। एक ही विश्व विद्यालय में ऐसा दोहरा मापदंड क्यों ? या तो छूट सब जगह रहे या कहीं न रहे।

और अंत में
मुलायम सिंह यादव - कल्याण सिंह - मिलन की खबर पाकर यही लगा कि इस देश की राजनीति में सत्ता ही सत्य है और बाकी सारी बातें झूठ हैं।
प्रभात खबर (26 जनवरी, 2009)

आपराधिक न्याय व्यवस्था कैसी ?

इस देश में हत्या कांडों के सौ में से 95 आरोपित, साक्ष्य के अभाव में अदालतों से अंततः सजामुक्त हो जाते हैं। बलात्कार कांडों के आरोपित लोगों में से 75 प्रतिशत आरोपित कोर्ट से छूट जाते हैं। साक्ष्य जुटाने की मुख्य जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है।उसकी आज इस देश में कैसी स्थिति है,यह सबको मालूम है। दरअसल पुलिस महकमे में भीषण भ्रष्टाचार, राजनीतिक दबाव और पेशेवर अकुशलता के कारण ऐसा होता है। आए दिन सुप्रीम कोर्ट अभियोजन पक्ष को इस बात के लिए फटकार लगाता रहता है कि उसने केस का अनुसंधान ठीक ढंग से नहीं किया। अब सवाल है कि हत्याकांडों के जो 95 प्रतिशत आरोपित जब कोर्ट से छूट जाते हैं तो उनमें से कितने लोग मीडिया के सामने आकर यह आरोप लगाते हैं कि उन्हें जानबूझ कर इसलिए फंसा दिया गया था क्योंकि वे किसी खास जाति या धर्म के हैं ?पर आतंकवादी घटनाओं के अधिकतर आरोपी और उनके तरह- तरह के संरक्षक गण यही आरोप लगाते हैं।ऐसा क्यों होता है ? इसका जवाब भी अनेक लेागों को मालूम है।

किधर रहेंगे पासवान जी
राम विलास पासवान की पार्टी लोजपा अगले लोक सभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ेगी या राजद के साथ रहेगी ? सन् 2004 के लोक सभा चुनाव में पासवान जी ने लालू प्रसाद और कांग्रेस से चुनावी तालमेल किया था और उसका लाभ भी सभी पक्षों को मिला था। पर बाद के वर्षों में पासवान जी का लालू जी से मधुर संबंध नहीं रहा। अब जबकि चुनाव सिर पर है, इस बात को लेकर एक बार फिर अटकलों का बाजार गर्म है।राजद चाहता है कि बिहार में यूपीए साथ मिल कर चुनाव लड़े। पर इसी शनिवार को पासवान जी का दिल्ली से यह बयान आ गया कि उनकी पार्टी बिहार की सभी 40 लोक सभा सीटों के लिए उम्मीदवार तलाशने के काम में जुट गई है। इससे पहले लोजपा के उपाध्यक्ष प्रो रंजन प्रसाद यादव ने इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत में इन अटकलों का खंडन किया था कि राजद से लोजपा का चुनावी तालमेल होने जा रहा है। उलटे उन्होंने सवाल किया था, क्या ऐसा राम विलास जी का कोई बयान आपने कभी सुना या पढ़ा है ? राम विलास पासवान के ताजा बयान से लगा कि रंजन यादव की बात सही है। पर राजनीति में कौन आज क्या बोल रहा है और वही व्यक्ति कल क्या बोलेगा, इसका कोई ठिकाना नहीं है। पर एक बात पक्की है कि भले नीतीश कुमार की सरकार के विकास का डंका बिहार में बज रहा है, फिर भी राम विलास पासवान चुनाव में एक फैक्टर तो बने ही रहेंगे। यह और बात है कि इसको लेकर अनुमान जरूर लगाया जा सकता है कि वे कितने बड़े या छोटे फैक्टर बनेंगे।

पहले केंद्र सुस्त, अब बिहार
पटना में जेपीएन एम्स के निर्माण के काम में पहले केंद्र सरकार ने सुस्ती दिखाई थी। अब बिहार सरकार की काहिली विकास विरोधी साबित हो रही है। अब भी बिहार के हजारों मरीज दिल्ली एम्स की शरण में जाने को बाध्य हैं। सन् 2004 की जनवरी में पटना में जेपी की स्मृति में एम्स की तरह के एक अच्छे अस्पताल की आधारशिला रखी गई थी। पर बाद में केंद्र में यूपीए की सरकार बन गई तो उसने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। पर पटना हाई कोर्ट में वकील एमपी गुप्त की लोकहित याचिका ने कमाल किया। काम शुरू करने को केंद्र सरकार को अदालत ने बाध्य कर दिया। पर कुछ आधारभूत संरचनाएं तैयार करने का काम तो बिहार सरकार को करना है। पर बिहार सरकार की गति इस मामले में कछुए की है। इसलिए एम्स के निर्माण में अनावश्यक देरी हो रही है।

और अंत में
एक पार्टी सुप्रीमो के बारे में उनके कुछ कार्यकर्ताओं की यह शिकायत है कि वे तो देख कर मुस्कराते भी नहीं हैं। हाल में एक महिला अधिकारी ने अपने एक अधीनस्थ को देखकर मुस्करा क्या दिया कि उसे मोबाइल पर प्रेम संदेश आ गया। क्या पार्टी सुप्रीमो को भी यही भय है कि जहां मुस्कराए कि सामने वाले की तरफ से किसी अफसर की ट्रांसफर-पोस्टिंग की पैरवी न आ जाए ?
प्रभात खबर (12 जनवरी, 2009)

आसान नहीं माफियाओं पर कार्रवाईं

केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने गत 20 दिसंबर को सभी मुख्य मंत्रियों को एक महत्वपूर्ण पत्र लिखा । पत्र में उन्होंने यह आग्रह किया कि वे 6 जनवरी तक सभी शहरों के माफिया डाॅन और सफेदपोश अपराधियों पर पुलिसिया नकेल कस कर उन्हें शहर से बाहर निकालें। याद रहे कि यह माना जाता है कि ये तत्व आतंकवादियों के मददगार साबित हो रहे हैं। विभिन्न प्रदेशों की सरकारों ने इस संबंध में अब तक कितना कुछ किया है, उसका विवरण मुख्य मंत्रियों की दिल्ली में होने वाली अगली बैठक के बाद ही पता चल सकेगा। हालांकि इस बीच यह सवाल जरूर उठ रहा है कि क्या इस मामले में कुछ करना इतना आसान काम है जो एक पत्र लिखने से पूरा हो जाएगा ? क्या देश की मौजूदा पुलिस -व्यवस्था में व्यापक सुधार किए बिना माफिया और सफेदपोश अपराधियों के खिलाफ कोई करगर कार्रवाई संभव है ? अनेक सफेदपोश अपराधी तो इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का लाभ उठा कर बडे़ -बड़े संवैधानिक पदों पर बैठ चुके हैं। उनके जायज -नाजायज हितों की रक्षा करना अनेक मुख्य मंत्रियों के राजनीतिक कर्म का एक हिस्सा सा बन चुका है। यानी, पुलिस सुधार तब तक नहीं होगा जब तक राजनीतिक सुधार नहीं होगा। इस देश के अधिकांश भूभाग में माफिया-अफसर-पुलिस -नेता गंठजोड़ का इतना कड़ा शिकंजा कस चुका है कि उसे तोड़ना काफी कठिन काम है। मौजूदा पुलिस ढांचे से तो इसे तोड़ना और भी कठिन है। क्योंकि पुलिस तो सत्ताधारी नेताओं के चेरी बना कर रख दी गई है। उत्तर प्रदेश के हाल के इंजीनियर मनोज गुप्त हत्याकांड में स्थानीय थानेदार की भूमिका इस बात की ताजा गवाह है। इस देश के अनेक राज्यों केे कुछ खास जिलों में ऐसे -ऐसे एस।पी. की पोस्टिंग होती है जो स्थानीय माफिया-सह सत्ताधारी नेता की ठीक- ठाक ‘सेवा’ करता रहे। क्या इस देश के कई मुख्य मंत्री माफियाओं के दबाव में उनके मनचाहे एसपी की पोस्टिंग कराना कभी बंद कर पाएंगे ?

वोहरा कमेटी का हश्र
सन् 1993 के भयानक मुम्बई विस्फोटों में दाउद इब्राहिम के नाम आने के बाद भारत सरकार ने तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव एनएन वोहरा के नेतृत्व में उसी साल की जुलाई में एक कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी को माफिया-अपराध सिंडिकेट-अफसर-नेता गंठजोड़ के आरोप की जांच करनी थी। कमेटी की रपट में कई सनसनीखेज खुलासे हुए। उस पर केंद्र सरकार को कार्रवाई करनी थी।पर गत 15 साल में क्या हुआ ? इस बीच कई सरकारें आईं और गईं। एक बार फिर यह खबर आई कि गत नवंबर में हुए मुम्बई हमला कांड में शामिल आतंकियों को भी दाउद ने ही भारत पहुंचाने के लिए साधन मुहैया कराया था । एक बार फिर महाराष्ट्र के एक नेता ने गत माह यह आरोप लगाया कि अब भी कुछ भारतीय नेताओं का दाउद इब्राहिम से संपर्क बना हुआ है। ऐसे में चिदंबरम साहब के ताजा पत्र का क्या असर पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। एनएसजी के एक पूर्व प्रमुख ने हाल में अपने अनुभवों के आधार पर बड़ी पीड़ा के साथ एक टीवी कार्यक्रम में कहा कि ‘भारत एक बहुत ही नरम राज्य है।’ यानी, वे यह कहना चाहते थे कि इस देश का भगवान ही मालिक है। इस देश में न तो फोर्स को पेशेवर ढंग से काम करने दिया जाता है और न ही उसे भरपूर साधन व जन बल उपलब्ध कराया जाता है। माफियाओं और आतंकियों के खिलाफ कड़े कानून बनाने में तो इस देश के अधिकतर नेताओं की नानी मरने लगती है। सवाल वोट बैंक का जो है !

सीधे प्रसारण का असर
भारतीय संसद के दोनों सदनों में शोरगुल और हंगामा बढ़ने के क्या- क्या कारण हैं ? कई कारण बताए जाते हैं। पर इसका एक बड़ा कारण सदन की कार्यवाही का टीवी पर सीधा प्रसारण है। संसद के कई समझदार लोगों की भी यही राय बनती जा रही है। जो सदस्य सदन की बैठकों में फिर से शालीनता व गंभीरता का युग वापस लाना चाहते हैं, वे कह रहे हैं कि सीधा प्रसारण अब बंद होना चाहिए। शायद कभी संसद की आचार समिति इस पर विचार भी करे और इसे बंद करने की अनुशंसा कर दे। याद रहे कि संसद में हाल में नोटों के बंडलों के प्रदर्शन के बाद तो लोकतंत्र के इस स्वरूप की और भी फजीहत हुई है। इस बीच बिहार विधान मंडल की बैठकों की कार्यवाही के सीधा प्रसारण की मांग बढ़ रही है। अच्छा होगा, बिहार में ऐसा कुछ शुरू करने से पहले भारतीय संसद के अनुभवों का अध्ययन कर लिया जाए।

और अंत में
किसी राज्य विधान सभा चुनाव में किसी दल की जीत होती है तो यह कहा जाता है कि यह तो सर्वोच्च नेता और दल की नीति की जीत है। और, जब हार होती है और सत्ता नहीं मिलती तो यह कहा जाता है कि दल की प्रादेशिक इकाई के नेताओं के आपसी झगड़े के कारण पार्टी हार गई।
प्रभात खबर (पांच जनवरी, 2009)

आय में बढ़ते फर्क के खतरे

ओएनजीसी यानी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम के अफसरों की इस माह के प्रारंभ में तीन दिनों की हड़ताल हुई। इससे पूरे देश में आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। अफसर अपने वेतन बढ़ाने के लिए हड़ताल पर थे। अब सवाल है कि उन्हें कितना वेतन मिलता है और वे उसमें कितनी वृद्धि की मंाग के लिए सरकार का भयादोहन कर रहे थे ? हड़ताली अफसरों के संघ के अध्यक्ष का मासिक वेतन हर माह एक लाख 29 हजार रुपए है। वे इसमें और वृद्धि के लिए हड़ताल पर चले गए थे। वे ओएनजीसी में अधीक्षण अभियंता हैं। संघ के उपाध्यक्ष का वेतन 99 हजार रुपए है। एक अन्य उपाध्यक्ष का वेतन एक लाख 26 हजार रुपए है। इसी तरह ओएनजीसी के अन्य अफसरों को भी भारी वेतन दिया जाता है। शुक्र है कि केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाया और हड़ताल समाप्त हो गई। गत 11 जनवरी को निगम ने अपने 64 हड़ताली अफसरों को सेवामुक्त कर दिया है।इस हड़ताल को उन कुछ नेताओं ने भी विवेकहीन हड़ताल बताया जो कामगारों के पक्ष में अक्सर उठ खड़े होते हैं। सवाल है कि इस गरीब देश के सरकारी कर्मियों को कितना वेतन मिलना चाहिए ? जाहिर है कि वेतन समितियां जो रकम तय करती हैं, उतनी रकम तो मिलनी ही चाहिए। पर क्या कुछ लोगों को उससे भी ज्यादा मिलना चाहिए ? अन्यथा वे देश का जरूरी काम काज भी ठप कर देंगे ? तेल का मामला तो देश की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। इन दिनों देश पर कई तरह के बाहरी -भीतरी खतरे मौजूद हैं। उनकी हड़ताल न सिर्फ मौजूदा कानून बल्कि भारत के संविधान की मंशा के भी खिलाफ थी।संविधान में दर्ज राज्य के नीति निदेशक तत्वों में से एक महत्वपूर्ण तत्व का विवरण अनुच्छेद-39 (ग) में दिया गया है। उसके अनुसार, ‘राज्य अपनी नीति का, विष्टितया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रुप से आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन साधनों का सर्व साधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण नहीं हो।’ इस देश में 84 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनकी रोज की औसत आय मात्र बीस रुपए है। दरिद्र लोगों से भरे- पड़े ऐसे देश का कोई सरकारी अफसर कहे कि उसे हर माह मिलने वाले करीब सवा लाख रुपए से तो काम नहीं चलेगा,तो उसके साथ शासन का कैसा सलूक करना चाहिए ? वैसा ही जैसा शासन ने किया।पर, इस कड़े सलूक को नैतिक बल भी मिल जाता यदि खुद शासक वर्ग भी हर स्तर पर मितव्ययिता अपनाता और फिजूलखर्ची से बचता। गत साल यह खबर आई थी कि इस देश के एक सांसद पर सरकार हर माह औसतन दो लाख पैंतीस हजार रुपए खर्च करती है। जाहिर है कि सांसदी पूर्णकालिक काम नहीं है। एक सांसद के जिम्मे जितना भी काम है,उसे अधिकतर सांसद ठीक ढंग से नहीं कर रहे हैं। पिछले सत्र में आठ विधेयक सिर्फ सत्रह मिनट में पारित कर दिए गए। ओएनजीसी के अफसरों की यह शिकायत हो सकती है कि भारत सरकार के अधिकतर अफसर और मंत्री ओएनजीसी के साधनों का नाजायज तरीके से इस्तेमाल करते रहते हैं। सांसद जब चाहते हैं, अपना वेतन- भत्ता सदन में सर्वसम्मति से बढ़ा लेते हैं। पर इंजीनियरों व कामगारों के साथ ऐसी उदारता नहीं बरती जाती।ऐसा क्यों ? आजादी के तत्काल बाद जब मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के लिए वेतन तय हो रहा था तो तब के नेताओं ने इस बात को लेकर शिकायत नहीं की कि उनको आईएएस अफसरों से कम वेतन-भत्ते क्यों दिए जा रहे हैं। तब राजनीति सेवा थी, नौकरी या व्यापार नहीं। पर अब तो अफसरों को शिकायत है कि कुल मिलकर सांसदों -विधायकों पर उनकी अपेक्षा जनता के अधिक पैसे खर्च हो रहे हैं। क्या राजनीतिक वर्ग एक बार फिर अपनी नैतिक धाक कायम करने की दिशा में कुछ त्यागमय कदम उठाएगा ताकि ओएनजीसी के बर्खास्त अफसरों को कुछ कहने का मौका न मिले ? एक बात साफ -साफ समझ ली जानी चाहिए कि आय के बढ़ते अंतर के अपने भयंकर खतरे हैं। उन खतरों को सबसे अधिक नेताओं को ही झेलना पड़ेगा।
राष्ट्रीय सहारा (15 जनवरी, 2009)

भारत में सफल,पर चीन में क्यों विफल हुए यूरोपियन

अंग्रेज गवर्नर वारेन हेस्ंिटग्स (1772-1785) ने खुद ब्रितानी संसद में बड़े अभिमान के साथ यह कबूल किया था कि उसने किस तरह भारतीय शासकों के बीच फूट डाल कर राज किया। आज जब एक बार फिर इस देश में विभाजनकारी शक्तियां सिर उठा रही हंै, वारेन के इन शब्दों को याद करके उनसे कुछ सीख लेना जरूरी है, ‘ महान भारतीय संघ के एक सदस्य निजाम को ठीक मौके पर उसका कुछ इलाका वापस करके संघ से फोड़ा। दूसरे मूदाजी भोंसले के साथ मैंने गुप्त पत्र-व्यवहार जारी रखा और उसे अपना मित्र बना लिया। तीसरे माधो जी सिंधिया को दूसरे कामों में लगाकर और पत्र व्यवहार करके मैंने भुलाए रखा और सुलह के लिए बतौर अपने हथियार के उसका उपयोग किया।’

अंग्रेजों की इस फूट नीति और कूटनीति के बारे में सुंदर लाल ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ में विस्तार से लिखा है। सुंदर लाल ने लिखा कि ‘ वारेन हेस्टिंग्स के समय में हिंदुस्तान के अंदर ईस्ट इंडिया कम्पनी का इलाका नहीं बढ़ा। फिर भी वारेन का शासन काल ब्रिटिश भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्लाइव ने इस देश के अंदर अंग्रेजी राज की जो बुनियाद डाली थी,वारेन ने भारत की राज शक्तियों को और अधिक कमजोर करके उन बुनियादों को पक्का कर दिया।’

 अंग्रेजों के आने से पहले मध्य युग में भी विदेशी हमलावरों ने हमारी आपसी फूट का भरपूर लाभ उठाया था। अंग्रेजों के जमाने में भी हमारे देशी शासकों ने इतिहास से नहीं सीखा। कम से कम आज तो हम पूरी तरह चेत जाएं, इसके लिए जरूरी है कि हम भूले-बिसरे प्रकरणों को याद करते रहेंं।

 वारेन हेस्टिंग्स कैसा शासक था, इसके बारे में खुद लार्ड मैकाले ने लिखा था,‘ वारेन हेस्टिंग्स ने भी चाहे ईमानदारी से हो चाहे बेईमानी से जिस तरह हो सके , भारत से धन बटोरने का निश्चय कर लिया। देश की स्थिति का उसे पूरा ज्ञान था और सूझ की भी कमी उसमें नहीं थी।’ अंग्रेजों ने इस देश के साथ क्या- क्या किया,उसकी एक झलक उस चर्चा से मिलती है जो ब्रिटिश संसद में हुई थी।

चर्चा सन् 1804 के दूसरे मराठा युद्ध के औचित्य को लेकर हुई थी। सर फिलीप फैं्रसिस ने संसद में कहा था कि ‘भारत के साथ हमारा संबंध कैसे शुरू हुआ, इसके बारे में मुझे आपको यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि शुरू में हमारा संबंध केवल तिजारत का था। देशी नरेशें ने भी हम पर संदेह नहीं किया, बल्कि हर तरह से हमारे साथ अनुग्रह का व्यवहार किया।

उन्होंने न केवल तिजारत करने और उससे खूब फायदा उठाने के लिए हमें हर तरह की सुविधा प्रदान की, बल्कि ऐसी -ऐसी रियायतें और माफियां भी हमें दे दीं जो उनकी अधिकांश प्रजा को भी प्राप्त न थीं।’ ‘ व्यापार की दृष्टि से विदेशी कौमों के साथ अपनी तिजारत को बढ़ने का मौका देना देशी नरेशों के लिए बुद्धिमता थी, किंतु जबकि उनकी तिजारती आंखें खुली हुई थीं, उनकी राजनीतिक आंखें बंद थीं। उन्होंने उन असूलों पर काम नहीं किया, जिन असूलों पर चीन वालों ने काम किया और जिनके कारण यूरोपियन कौमें चीन पर अपनी सत्ता जमाने में सफल न हो सकीं।’

 सर फिलिप फ्रैंसिस ने अपने भाषण में यह भी दिखलाया कि किस तरह अंग्रेज शासक भारतीय नरेशों के खासकर उस समय के सिंधिया के चरित्र पर बिलकुल झूठे दोष लगा कर उसे बदनाम करते थे और किस तरह के छलों द्वारा उन नरेशों की स्वाधीनता हरते थे। उन्होंने कहा था कि ‘पहले हमने तिजारत शुरू की, तिजारत से कोठियां हुईं, कोठियों से किलेबंदी , किलेबंदी से सेनाएं, सेनाओं से देश विजय और विजयों से हमारी आजकल की हालत।’ उनकी राय में भारत मंे इलाके के विजय करने और अपने राज्य को बढ़ाने की योजनाएं करना अंग्रेज कौम की इच्छा के विरूद्ध है।’

 एक अन्य अंग्रेज इतिहासकार ने ठीक ही लिखा है कि ‘हमलोगों में यह रिवाज है कि पहले किसी देशी नरेश का राज उससे छीन लेते हैं।फिर पदच्युत नरेश पर और उसके बनने वाले उत्तराधिकारी पर झूठे कलंक लगा कर उसे बदनाम करते हैं।’ इतने चतुर व घाघ अंग्रेज शासकों से लड़कर हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने भारी संघर्ष व बलिदान के बलकर हमें आजादी दिलाई है। पर आज इस कीमती आजादी को बचाए रखने के लिए हमें जो कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए, वे सावधानियां क्या हम बरत रहे हैं ? आज राजनीतिक गुलामी की तो नहीं, पर इस देश पर आर्थिक गुलामी का खतरा तो बरकरार है ही। इतिहास से शिक्षा लेकर हम किसी नए खतरे से जरूर बच सकते हैं। इतिहास से शिक्षा तभी मिलेगी जब हम अपना सही -सही इतिहास पढ़ेंगे। पर इस देश के कई बुद्धिजीवियों और इतिहासज्ञों के साथ दिक्कत यह है कि वे हमें एक खास तरह का इतिहास ही पढ़ाना चाहते हैं।
प्रभात खबर (1 जनवरी, 2009)

स्वामी रामदेव और गंगा

गंगा नदी को साफ करने के लिए स्वामी रामदेव की गंभीर पहल स्तुत्य है। गंगा को उसकी पूरी लंबाई में साफ करके फिर से उसकी धारा को निर्मल व अविरल बनाने के लिए राम देव जी की कोशिश को देश भर के साधु संतों का समर्थन मिल रहा है।देश की शीर्ष धर्म सत्ता इस मुद्दे पर इन दिनों एक मंच पर है। स्वामी राम देव ने कहा है कि ‘हमारी मांग है कि केंद्र की सरकार गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करे और गंगा में गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ संज्ञेय अपराध की धाराओं के तहत कार्रवाई हो। इस मांग के समर्थन में संतों ने अभियान शुरू भी कर दिया है।’ सवाल है कि चुनाव सर पर है। केंद्र की कथित धर्मनिरपेक्ष सरकार गंगा के लिए कुछ करने से पहले संभवतः इस बात का आकलन करेगी कि इससे उसके वोट बैंक पर तो कोई विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा। यानी गंगा के लिए रामदेव जी की ‘लड़ाई’ लंबी होने वाली है। गंगा नदी की भी लम्बाई 2507 किलोमीटर है। संतों ने गंगा की पूरी लंबाई में जगह जगह शिविर लगाने का निर्णय किया है ताकि लोगों को ंगंगा की सफाई के प्रति जागरूक बनाया जा सके। गंंगा की सफाई का मसला देश के बिगड़ते पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। पर संतों को इस मामले में एक और तरह से इस दिशा में पहल करनी चाहिए।जो नगर और महा नगर गंगा के किनारे बसे हुए हैं, उनकी नालियों और नालों के जरिए अत्यंत ही प्रदूषित जल सीधे गंगा में बहाया जा रहा है।पटना में ऐसे 29 नाले हैं जो गंगा को रोज- रोज प्रदूषित कर रहे हैं। बाबा राम देव तथा इस देश के कई अन्य संतों के पास इन दिनों काफी पैसे हैं।यदि ये संत अपने कुछ पैसे खर्च करके जहां तहां कुछ ही संख्या में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगवा देते तो संबंधित सरकारों को थोड़ी शर्म आती। इससे इन संत लोगों को सरकारों से ऐसी ही मांग करने का कुछ और नैतिक अधिकार मिल जाता।एक बात और है। संबंधित सरकार के सहयोग से स्वामी राम देव या कोई अन्य संत कहीं वाटर ट्रीटमेंठ प्लांट लगाएंगे तो उस प्लांट की गुणवत्ता भी बेहतर होगी ।क्या राम देव जी को तुलसी दास की वह बात याद हैजिसमें उन्होंने कहा था,‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरही ते नर न घनेरे ।’राम देव जी महाराज जब मंच पर बैठ कर खुद आसन-प्राणयाम करके लोगों को सिखाते हैं तभी लोगांे ंपर उसका भारी असर होता है।

जामिया मिलिया की छवि दांव पर
दिल्ली में आतंकी गतिविधि में शामिल आरोपितों को जामिया मिलिया के वी।सी.मुशीरूल हसन ने जामिया मिलिया के खर्चे पर कानूनी सहायता देने का निर्णय किया है। भारत में हो रही आतंकवादी घटनाओं के बारे में मुशीरूल साहब क्या सोचते हैं,यह बात खुद उन्होंने गत 22 सितंबर 2008 को सार्वजनिक रूप से बताई है। उन्होंने एन.डी.टी.वी. के कार्यक्रम में कहा कि ऐसी आतंकवादी घटनाएं इसलिए हो रही हैं क्योंकि भारत का मुस्लिम समुदाय यहां खुद को अलग थलग महसूस कर रहा है।उन्होंने सच्चर कमेटी की रपट का जिक्र करते हुए कहा कि मसलमानों की आर्थिक दशा काफी खराब है। मुशीरूल हसन के इस तर्क से यह बात स्पष्ट होती है कि आतंकवादी गतिविधियों में शामिल आरोपित ‘अलग-थलग पड़े’ मुस्लिम समुदाय की ओर से हिंसक लड़ाई लड़ रहे हैं।जबकि इस देश में आतंकी कार्रवाइयों में लिप्त सिमी और इंडियन मुजाहिदीन के जेहादी बार बार लिख लिख कर और बयान दे देकर यह खुलेआम कह रहे हैं कि वे भारत में इस्लामी शासन कायम करने के लिए लड़ रहे हैं। वे खलीफा का राज चाहते हैं। अब इन बातों का यहां अधिक व्याख्या करना जरूरी नहीं है। पाठक खुद समझ लें कि अंततः कौन क्या चाहता है। हा, एक सवाल मुशीरूल हसन से पूछा जा सकता है।वह यह कि वे जिन आतंकवादियों को कानूनी सहायता दे रहे हैं, वे यदि अदालत से दोषी करार दे दिए गए तो फिर जामिया मिलिया की पूरी दुनिया में कैसी छवि बनेगी ? क्या उसकी वह छवि बनी रह पाएगी जैसी छवि की कल्पना उसके कभी के उसके एक कुलपति जाकिर हुसेन ने की थी ?

नक्सली और इंडियन मुजाहिदीन
दिल्ली के जामिया नगर में हुई आतंकी-पुलिस मुंठभेड़ के बाद कुछ लोगों के द्वारा नक्सलियों से इन आतंकियों की तुलना की जाने लगी है।कहा जा रहा है कि नक्सली भी तो समाज की मुख्य धारा से अलग- थलग पड़े मुख्यतः दलितों और आदिवासियों को गोलबंद करके उनके लिए हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे हैं ! पर यह तुलना गलत है। इंडियन मुजाहिदीनों और नक्सलियों के चरित्र में मूल अंतर हैं।नक्सलियों ने न सिर्फ दलित-आदिवासी के लिए, बल्कि समाज के करीब अस्सी प्रतिशत गरीब लोगों के लिए लड़ाई शुरू की है।वे इस देश पर सर्वहारा का शासन चाहते हैं। इस देश में अस्सी प्रतिशत सर्वहारा हैं जिनकी रोज की औसत आय मात्र बीस रुपए है। यानी वे बहुमत का शासन चाहते हैं।पर इंडियन मुजाहिदीन कुरान के उपदेशों के आधार पर अल्पसंख्यक का बहुमत पर शासन कायम करना चाहते हैं जैसा कि मध्य युग में यहां था।यह बात उनके साहित्य और बयानों में है जिसे मुशीरूल हसन जैसे बुद्धिजीवी जानबूझकर या अनजाने में नजरअंदाज कर रहे हैं।हालांकि यहां नक्सलियों के तरीके का समर्थन नहीं किया जा रहा है।एक बात और याद रखने की है।जब नक्सलियों की धरपकड़ के सिलसिले में उनके छिपे हुए स्थानों में पुलिस या अर्ध सैनिक बल धावा बोलते हैं और मुंठभेड़ें होती हैं और कुछ निर्दोष लोगों को भी क्षति पहुंचती है,तो उन स्थानों और उसके आसपास के लोगों की वैसी ही प्रतिक्रिया नहीं होती जैसी प्रतिक्रिया इन दिनों जामिया नगर और आसपास के कुछ लोगों की हो रही है।

दिन में कहीं, रात में कहीं और
राजनीति में भीतरघाती पहले भी हुआ करते थे,पर अब उनकी संख्या काफी बढ़ गई है। राजनीति में पैसे का बोलबाला बढ़ने और किसी तरह के आदर्श के लोप होतेे जाने के कारण ऐसा हुआ है। बिहार में किस दल का कौन नेता दिन में कहां है और रात में कहां रहता है, इसका पता ही नहीं चल रहा है। अपने दलीय सुप्रीमो से विश्वासघात करने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। कुछ सुप्रामों भी परेशान हैं।पर उन्होंने भी जब मौका आया था तो अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपने कैरियर निर्माताओं के साथ इसी तरह विश्वासघात किया था। छोटे नेता अपने बड़े नेताओं को अब उसी लहजे में जवाब दे रहे हैं।कहते हैं कि एक गति से चलना गधे का गुण होता हे। होशियार व्यक्ति तो जिस सीढ़ी के जरिए छत पर चढ़ता उस सीढ़ी को ढोए नहीं फिरता। यह बात और है कि जब वह छत से गिरता है तो उसे चोट बहुत लगती है। यह हर पेशे में है।पर राजनीति जबसे सेवा के बदले पेशा हो गई है, तब से इसमें यह अधिक है। हालांकि आज भी राजनीति में कई अच्छे लोग भी हैं। अगले लोक सभा चुनाव में बिहार का कौन सा नेता कहां से लड़ेगा, यह ठीक नहीं है। इस आशंका में टिकटार्थियों द्वारा लाॅयल्टी बदलने की प्रक्रिया तेज है। कोसी प्रलय को लेकर नेताओं और दलों के बीच आरोप प्रत्यारोप का जो दौर चल रहा है उसमें तो कई नेता अपने ही सुप्रीमो के खिलाफ उनके राजनीतिक विरोधियों को दबे छिपे सूचना, ‘मसाला’ व तर्कों से लैस कर रहे हैं।
तापमान (अक्टूबर, 2008)