Sunday, February 1, 2009

आसान नहीं माफियाओं पर कार्रवाईं

केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने गत 20 दिसंबर को सभी मुख्य मंत्रियों को एक महत्वपूर्ण पत्र लिखा । पत्र में उन्होंने यह आग्रह किया कि वे 6 जनवरी तक सभी शहरों के माफिया डाॅन और सफेदपोश अपराधियों पर पुलिसिया नकेल कस कर उन्हें शहर से बाहर निकालें। याद रहे कि यह माना जाता है कि ये तत्व आतंकवादियों के मददगार साबित हो रहे हैं। विभिन्न प्रदेशों की सरकारों ने इस संबंध में अब तक कितना कुछ किया है, उसका विवरण मुख्य मंत्रियों की दिल्ली में होने वाली अगली बैठक के बाद ही पता चल सकेगा। हालांकि इस बीच यह सवाल जरूर उठ रहा है कि क्या इस मामले में कुछ करना इतना आसान काम है जो एक पत्र लिखने से पूरा हो जाएगा ? क्या देश की मौजूदा पुलिस -व्यवस्था में व्यापक सुधार किए बिना माफिया और सफेदपोश अपराधियों के खिलाफ कोई करगर कार्रवाई संभव है ? अनेक सफेदपोश अपराधी तो इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का लाभ उठा कर बडे़ -बड़े संवैधानिक पदों पर बैठ चुके हैं। उनके जायज -नाजायज हितों की रक्षा करना अनेक मुख्य मंत्रियों के राजनीतिक कर्म का एक हिस्सा सा बन चुका है। यानी, पुलिस सुधार तब तक नहीं होगा जब तक राजनीतिक सुधार नहीं होगा। इस देश के अधिकांश भूभाग में माफिया-अफसर-पुलिस -नेता गंठजोड़ का इतना कड़ा शिकंजा कस चुका है कि उसे तोड़ना काफी कठिन काम है। मौजूदा पुलिस ढांचे से तो इसे तोड़ना और भी कठिन है। क्योंकि पुलिस तो सत्ताधारी नेताओं के चेरी बना कर रख दी गई है। उत्तर प्रदेश के हाल के इंजीनियर मनोज गुप्त हत्याकांड में स्थानीय थानेदार की भूमिका इस बात की ताजा गवाह है। इस देश के अनेक राज्यों केे कुछ खास जिलों में ऐसे -ऐसे एस।पी. की पोस्टिंग होती है जो स्थानीय माफिया-सह सत्ताधारी नेता की ठीक- ठाक ‘सेवा’ करता रहे। क्या इस देश के कई मुख्य मंत्री माफियाओं के दबाव में उनके मनचाहे एसपी की पोस्टिंग कराना कभी बंद कर पाएंगे ?

वोहरा कमेटी का हश्र
सन् 1993 के भयानक मुम्बई विस्फोटों में दाउद इब्राहिम के नाम आने के बाद भारत सरकार ने तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव एनएन वोहरा के नेतृत्व में उसी साल की जुलाई में एक कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी को माफिया-अपराध सिंडिकेट-अफसर-नेता गंठजोड़ के आरोप की जांच करनी थी। कमेटी की रपट में कई सनसनीखेज खुलासे हुए। उस पर केंद्र सरकार को कार्रवाई करनी थी।पर गत 15 साल में क्या हुआ ? इस बीच कई सरकारें आईं और गईं। एक बार फिर यह खबर आई कि गत नवंबर में हुए मुम्बई हमला कांड में शामिल आतंकियों को भी दाउद ने ही भारत पहुंचाने के लिए साधन मुहैया कराया था । एक बार फिर महाराष्ट्र के एक नेता ने गत माह यह आरोप लगाया कि अब भी कुछ भारतीय नेताओं का दाउद इब्राहिम से संपर्क बना हुआ है। ऐसे में चिदंबरम साहब के ताजा पत्र का क्या असर पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। एनएसजी के एक पूर्व प्रमुख ने हाल में अपने अनुभवों के आधार पर बड़ी पीड़ा के साथ एक टीवी कार्यक्रम में कहा कि ‘भारत एक बहुत ही नरम राज्य है।’ यानी, वे यह कहना चाहते थे कि इस देश का भगवान ही मालिक है। इस देश में न तो फोर्स को पेशेवर ढंग से काम करने दिया जाता है और न ही उसे भरपूर साधन व जन बल उपलब्ध कराया जाता है। माफियाओं और आतंकियों के खिलाफ कड़े कानून बनाने में तो इस देश के अधिकतर नेताओं की नानी मरने लगती है। सवाल वोट बैंक का जो है !

सीधे प्रसारण का असर
भारतीय संसद के दोनों सदनों में शोरगुल और हंगामा बढ़ने के क्या- क्या कारण हैं ? कई कारण बताए जाते हैं। पर इसका एक बड़ा कारण सदन की कार्यवाही का टीवी पर सीधा प्रसारण है। संसद के कई समझदार लोगों की भी यही राय बनती जा रही है। जो सदस्य सदन की बैठकों में फिर से शालीनता व गंभीरता का युग वापस लाना चाहते हैं, वे कह रहे हैं कि सीधा प्रसारण अब बंद होना चाहिए। शायद कभी संसद की आचार समिति इस पर विचार भी करे और इसे बंद करने की अनुशंसा कर दे। याद रहे कि संसद में हाल में नोटों के बंडलों के प्रदर्शन के बाद तो लोकतंत्र के इस स्वरूप की और भी फजीहत हुई है। इस बीच बिहार विधान मंडल की बैठकों की कार्यवाही के सीधा प्रसारण की मांग बढ़ रही है। अच्छा होगा, बिहार में ऐसा कुछ शुरू करने से पहले भारतीय संसद के अनुभवों का अध्ययन कर लिया जाए।

और अंत में
किसी राज्य विधान सभा चुनाव में किसी दल की जीत होती है तो यह कहा जाता है कि यह तो सर्वोच्च नेता और दल की नीति की जीत है। और, जब हार होती है और सत्ता नहीं मिलती तो यह कहा जाता है कि दल की प्रादेशिक इकाई के नेताओं के आपसी झगड़े के कारण पार्टी हार गई।
प्रभात खबर (पांच जनवरी, 2009)

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