Sunday, February 1, 2009

स्पीकर पद पर एक नजर

लोक सभा के पहले स्पीकर जीवी मावलंकर ने अध्यक्ष चुने जाने के बाद कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। पर, मौजूदा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी को इस बात का अफसोस है कि 2004 में स्पीकर चुने जाने के साथ ही उन्होंने अपनी पार्टी माकपा से इस्तीफा क्यों नहीं दे दिया था। यह बात उन्होंने हाल में कुछ पत्रकारों को बताई। सोमनाथ चटर्जी का कार्यकाल अब पूरा होने जा रहा है। पर, उनका कार्यकाल कई कारणोें से चर्चित व विवादास्पद रहा। मुख्य प्रतिपक्षी दल भाजपा ने कई बार उन पर यह आरोप लगाया कि उनका प्रतिपक्ष के साथ व्यवहार एक वाम नेता की तरह ही था। दूसरी ओर, उनके दल सीपीएम ने भी उनके साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसा व्यवहार किसी लोक सभा स्पीकर के साथ अब तक उनके दल ने नहीं किया था। इस प्रकरण के साथ ही इस गरिमायुक्त पद पर एक बार फिर नजर डाल लेने की जरूरत महसूस की जा रही है। ब्रिटेन में तो ‘वन्स अ स्पीकर, अलवेज स्पीकर’ की परंपरा रही है। यानी स्पीकर के खिलाफ अगले चुनाव में प्रतिपक्षी दल अपना कोई उम्मीदवार ही खड़ा नहीं करता। वहां स्पीकर जब तक चहते हंै, इस पद पर बने रहते हैं और स्वेच्छा से रिटायर हो जाने के बाद भी वे राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होते। इसीलिए वहां स्पीकर निष्पक्षता से सदन का संचालन कर पाते हैं। यहां तो ऐसा संभव नहीं लगता। पर कम से कम एक प्रावधान तो किया ही जा सकता है कि इस देश की विधायिकाओं के अगले स्पीकर मावलंकर की परंपरा पर चलें। यानी ऐसे व्यक्ति स्पीकर बनें, जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा अपूर्ण नहीं रह गई हो। ऐसे नेता की तलाश जरा कठिन है, पर असंभव नहीं। यदि ऐसा हुआ तो सोम नाथ चटर्जी प्रकरण दुहराया नहीं जा सकेगा। यह लोकतंत्र के लिए भी गरिमायुक्त होगा । क्योंकि निष्पक्ष और कारगर स्पीकर की उपस्थिति के कारण सदन में अनेक सदस्यों के आचरण व चर्चाओं के गिरते स्तर को रोका जा सकेगा।

यूपी के चुनावी आंकड़े
कल्याण सिंह के मुलायम सिंह से मिल जाने के बाद उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावी आंकडों पर एक नजर डाल लेना दिलचस्प होगा।समाजवादी पार्टी को पिछले तीन चुनावों में यूपी में हर बार करीब -करीब छब्बीस प्रतिशत मत मिले। 2002 में 26।27 प्रतिशत, 2004 में 26.74 प्रतिशत और 2007 में 26.07 प्रतिशत। यानी ‘गुंडा राज’ के बसपा के आरोप के बावजूद सपा के अपने वोट नहीं घटे। ये तीन चुनाव हैं - सन् 2002 का विधानसभा चुनाव, 2004 का लोक सभा चुनाव और 2007 का विधान सभा चुनाव। हां, सपा की सत्ता इसलिए छिन गई क्योंकि बहुजन समाज पार्टी का वोट 25 प्रतिशत (2004) से बढ़कर 30 प्रतिशत (2007) हो गया। ये अतिरिक्त मत ब्राह्मण मतदाताओं के थे जिन्हें सतीश मिश्र ने बसपा से जोड़ा।ये मतदाता भाजपा से इसलिए नाराज थे कि उसने ब्राह्मणों को राज्य का भी नेतृत्व नहीं सौंपा। दूसरी ओर, राजा भैया जैसे ठाकुर नेताओं ने सपा की सत्ता का लाभ उठा कर अपना वर्चस्व बढ़ाया।अब तो बसपा राज पर ही ‘गुंडा राज’ का आरोप लग रहा है। अब ‘बाबरी मस्जिद प्रसिद्धी’ वाले कल्याण सिंह के मुलायम सिंह से जुड़ने के बाद क्या होगा ? बसपा के खिलाफ सत्ता- विरोध के तत्व का कितना असर अगले लोक सभा चुनाव पर पड़ेगा ? यूपी भाजपा में ब्राह्मणों का वर्चस्व बढ़ने के बाद क्या ब्राह्मणों के एक हिस्से की फिर घर-वापसी होगी ? अगले कुछ हफ्तों में इन सवालों के जवाब मिलेंगे। फिर उसी के आधार पर चुनाव नतीजे तय होंगे। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि बसपा और सपा के बीच मतों का अधिक अंतर नहीं जान पड़ता है।

फर्क सिवान और सारण का !
सिवान और सारण जिले के कालेज एक ही विश्वविद्यालय के तहत हैं। पर सिवान जिले की परीक्षाओं में कदाचार नहीं के बराबर है। इसलिए वहां के काॅलेजों में नामांकन कम हो रहे हैं। दूसरी ओर सारण और गोपाल गंज जिलों में कदाचार पर कारगर रोक नहीं है। इसलिए वहां के काॅलेजों में छात्र-छात्राओं की भरमार है। एक ही विश्व विद्यालय में ऐसा दोहरा मापदंड क्यों ? या तो छूट सब जगह रहे या कहीं न रहे।

और अंत में
मुलायम सिंह यादव - कल्याण सिंह - मिलन की खबर पाकर यही लगा कि इस देश की राजनीति में सत्ता ही सत्य है और बाकी सारी बातें झूठ हैं।
प्रभात खबर (26 जनवरी, 2009)

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