गुरुवार, 6 अगस्त 2009

जस की तस धर दीनी चदरिया

‘जस की तस धर दीनी चदरिया।’डी.एन.गौतम जब आज रिटायर हो रहे हैं तो कबीर की उपर्युक्त उक्ति सहसा याद आ रही है।काश इस लोकतंत्र में अफसर के बदले नेता के लिए इस उक्ति का ं अक्सर इस्तेमाल करने का मुझे अवसर मिलता !ऐसा होता तो मुझे और भी अच्छा लगता।

बिहार के एक प्रमुख नेता ने गौतम के लिए इससे भी बेहतर बात कभी कही थी।वह बात कर्पूरी ठाकुर ही कह सकते थे।उन्होंने बिहार विधान सभा में कहा था कि के.बी.सक्सेना और डी.एन.गौतम जैसे अफसर गरीबों के लिए भगवान की तरह हैं।कर्पूरी ठाकुर के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि उन्होंने ‘तस की तस धर दीनी चदरिया।पर जस की तस चदरिया को धर देने के लिए जो जतन करना पड़ता है,वह जतन करते हुए मैंने कर्पूरी ठाकुर को करीब से देखा था।गौतम साहब से मेरा कोई खास हेल -मेल नहीं रहा। वे कोई प्रचार प्रिय हैं भी नहीं।पर, उनके बहादुरी भरे कामों पर मैंने उनके सेवा के प्रारंभिक काल से ही गौर किया है।पूत के पांव पालने में ही प्रकट हो गये थे।यदि कोई सरकार सड़क के किनारे- किनारे मजबूत नालियां भी बनवाना शुरू कर दे तो समझिए कि उसका मूल उददेश्य सिर्फ लूटपाट नहीं है।उसी तरह जिस अफसर की भ्रष्ट नेता और माफिया तत्व आलोचना करने लगंे तो समझिए कि वह अपना काम कर रहा है और उसे अपने वेतन मात्र पर ही संतोष है।

ईमानदार तो और कई लोग भी हैं जिन्हें मैं जानता हूं और कई ऐसे लोग भी होंगे जिन्हें मैं नहीं जानता।पर उनमें से अधिकतर निष्क्रिय ईमानदार ही हैं।सक्रिय ईमानदारी से ही जनता को लाभ मिलता है।निष्क्रिय ईमानदारी से खुद को संतोष मिलता है।डी.एन.गौतम की खूबी रही कि वे सक्रिय ईमानदार रहे।

इसीलिए वे अक्सर निहितस्वार्थियों के निशाने पर रहे।पर बिहार की जनता में वे किसी अच्छे नेता की तरह ही लोकप्रिय रहे।उत्तर प्रदेश के हमीर पुर जिले के मूल निवासी गौतम जी 1974 बैच के आई.पी.एस. हैं।उन्होंने एम.एससी.और पीएच.डी. भी किया है। पता नहीं कि वे रिटायर होने के बाद कहां बसेंगे ! यदि वे बिहार में रहते तो कई लोगों को प्रेरित करते रहते।सारण,मुंगेर और रोहतास जिले के एस.पी.के रूप में उन्होंने जिस तरह की कत्र्तव्यनिष्ठता दिखाई ,उससे इस राज्य के निहितस्वार्थी सत्ताधारियों को यह लग गया कि ऐसे अफसर को कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देनी खतरे से खाली नहीं हैं।इसीलिए जब नीतीश कुमार ने उन्हें गत साल पुलिस प्रधान बनाया तो अनेक लोगों ने मुख्य मंत्री की हिम्मत की दाद दी।ऐसा अफसर जो गलत काम कर ही नहीं सकता,उसे पुलिस प्रमुख बना कर बेहतर छवि वाले नीतीश कुमार ने अपनी छवि और भी निखारी।गौतम जी ऐसे अफसर हैं जो यदि किसी खास पद पर जाकर बहुत कुछ करामात नहीं भी कर सकें तो एक बात तो तय है कि जिस उंची कुर्सी पर वे बैठे,उसे घूस कमाने का जरिया तो नहीं बनने दे सकते।इसका भी असर नीचे तक कुछ न कुछ होता है।

पुलिस प्रमुख के रूप में देवकी नंदन गौतम का कुल मिलाकर कैसा अनुभव रहा,यह तो कभी बाद में वे बता सकते हैंे,पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि उनके खिलाफ उनकी सेवा अवधि के अंत -अंत तक ऐसा कोई अशोभनीय विवाद नहीं हुआ जिससे उनकी छवि को धक्का लगा हो।वह भी ऐसे समय में जब मनोनीत डी.जी.पी.आनंद शंकर को यह कहना पड़ रहा है कि पुलिसकर्मी वेतन पर ही संतुष्ट रहना सीखें।खुशी की बात है कि आनंद शंकर जी ने बीमारी न सिर्फ पकड़ी है,बल्कि उसका सार्वजनिक रूप से एजहार भी कर दिया है।पर, यह बीमारी उपर भी तो है।एक परिचित थानेदार ने कुछ साल पहले मुझे बताया था कि उसने अपने अब तक के सेवाकाल में दस एस.पी.के मातहत काम किया।पर एक डा.परेश सक्सेना को छोड़कर अन्य सभी नौ एस.पी.ने मुझे तभी थाना प्रभारी बनाया जब उन्हें रिश्वत दी गई।जिस राज्य में भ्रष्टाचार का यह हाल है,वहां डी.एन.गौतम को अपनी चदरिया जस की तस धर देने के लिए कितनी जतन करनी पड़ी होगी,इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

बिहार का सौभाग्य होगा यदि गौतम की तरह काम करने की कोशिश करने वाले दस -बीस आई.पी.एस.अफसर यहां मिलें।अपराध और भ्रष्टाचार से निर्णायक लड़ाई का इस राज्य में यह संक्रमण काल भी है।अगले कुछ समय में पता चल जाएगा कि किसकी जीत हुई।अभी भ्रष्ट तत्व तो नहीं,पर अपराधी जरूर दबाव में हैं।डी.एन.गौतम वैसे अफसरों के लिए प्रेरणा पुरूष साबित होंगे जो अफसर अपराधी और भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ मजबूती से उठ खड़े होंगे।इससे उनका इस लोक के साथ साथ वह लोक भी संवर जाएगा।गौतम ने जो पूंजी कमाई है,उसे भला कौन लूट सकता है ? घूसखोरी से बनी पूंजी को तो एक न एक दिन चोर-डकैत, ,विजिलंेस या फिर नालायक संतान द्वारा लूट लिए जाने से कम ही लोग बचा पाते हैं।यदि बचा भी पाए तो वे अपनी अगली कई पीढ़ियों को अपराध बोध की पूंजी जरूर दे जाते हैं।

हां,ईमानदारी से अपने काम करने के सिलसिले में तरह -तरह के कष्ट और तनाव जरूर होते हैं,पर उसके लिए गीता जैसी ‘ तनाव व दर्दनाशक दवा हमारे पूर्वजों ने हमें दे ही रखी है।इसी क्रम में गौतम साहब की सेवा अवधि से जुड़े कुछ संस्मरण यहां पेश हैं।सारण जिले से जब डी.एन.गौतम का समय से पहले तबादला कर दिया गया तो वे छपरा से पटना सड़क मार्ग से आ रहे थे।किसी ने तब मुझे बताया था कि जिसे भी पता चला कि गौतम साहब इस मार्ग से लौट रहे हैं तो वह सड़क के किनारे उन्हें देखने के लिए खडा हो गया।प्रत्यक्षदर्शी ने ,जो गौतम जी का स्वजातीय भी नहीं था,़बताया कि कई लोग उसी तरह रो रहे थे जिस राम के वनवास के समय अयोध्यावासी के रोने की चर्चा रामायण में है।इस घटना ने यह बात भी बताई कि बिहार में बड़े अपराधियों और उनके संरक्षक नेताओं से लड़कर उन्हें कमजारे कर देने की कितनी अधिक जरूरत जनता महसूस करती है।ऐसे ही तत्वों से तो लड़ते हुए गौतम साहब समयपूर्व तबादला ही झेलते रहे।

रोहतास और मुंगेर में भी यही हुआ।मुंगेर में 16 मई 1985 को डी.एन .गौतम ने एस.पी.का पदभार ग्रहण किया ।पर जब उन्होंने भ्रष्ट व अपराधी तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू की तो 9 जुलाई 1986 को उन्हें मुंगेर से हटा दिया गया।

दिलचस्प कहानी हजारीबाग पुलिस प्रशिक्षण कालेज में प्राचार्य के रूप में डी.एन.गौतम की तैनाती के बाद सामने आई।सन् 1994 की बात है।पटना में पहले से ही इस बात की चर्चा थी कि दारोगा की बहाली में इस बार घोर अनियमितता बरती जा रही है। आखिरकार नवनियुकत 1640 दारोगाओं ंको प्रशिक्षण के लिए हजारीबाग भेज दिया गया। इनमें से करीब चार सौ दरोगाओं को प्रशिक्षण कालेज में भर्ती करने से ही गौतम साहब ने साफ इनकार कर दिया। यह अभूतपूर्व स्थिति थी।क्योंकि गौतम के अनुसार वे दारोगा बनने लायक थे ही नहीं ।कुछ की तो निर्धारित मापदंड के अनुसार शरीर की उंचाई तक नहीं थी। इधर उन दारोगाओं को प्रशिक्षण दिलाना कई प्रभावशाली लोगों के लिए जरूरी था।इसीलिए आनन फानन में डी.एन.गौतम को प्राचार्य पद से हटाकर पटना पुलिस मुख्यालय में तैनात कर दिया गया।जो हो,इसी तरह राम राम कहते -कहते गौतम जी सेवा करते रहे।अब उनका ध्यान गीता और विवेकानंद की ओर अधिक जाए तो वह स्वाभाविक ही है।यह देश और प्रदेश ऐसे ‘मानव संसाधन’ की घोर कमी के कारण ही तो दुर्दशा को प्राप्त हो रहा है !

उनकी कत्र्तव्यनिष्ठता के लिए बिहार की ईमानदार जनता की ओर गौतम साहब को हार्दिक धन्यवाद।

प्रभात खबर / 31 जुलाई 2009 /से साभार

काठ की हांडी फिर चढ़ा रहे हैं लालू

कभी के राजनीतिक महाबली लालू प्रसाद को इस बार लोक सभा की पिछली बंेच पर जगह दी गई है। बिहार की राजनीति में तो वे पहले ही पिछली कतार में पहुंच चुके हैं।क्या वे फिर कभी पहले की तरह राजनीति की अगली कतार में पहुंच पायेंगे ?

खुद लालू प्रसाद ने पिछले महीने ही कहा कि ‘राजनीतिक तौर पर मेरे सफाये की भविष्यवाणी गलत ही साबित होगी। मेरा दल छोड़ कर जिसको जिस दल में जाना है,जाए।मैं जीरो से शुरू करूंगा। पार्टी को काॅडर आधारित बनाउंगा। 18 से तीस साल तक उम्र के युवकों को पार्टी में शामिल करूंगा। उनका टास्क फोर्स बनाउंगा और तीस प्रतिशत युवकों को चुनाव में टिकट दूंगा और फिर सत्ता में वापस आउंगा।’

सच यही है कि लालू प्रसाद की एक समय में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक व ऐतिहासिक भूमिका थी,जिसको उन्होंने पूरा भी किया। पर अब उनकी भूमिका और राजनीतिक उपयोगिता भी लगभग समाप्त हो चुकी है।दरअसल जिस शैली की राजनीति के लालू प्रसाद अभ्यस्त रहे हैं,वह शैली उसी तरह पुरानी पड़ चुकी है जिस तरह एलसीडी टी.वी .के इस दौर में पुराने रेडियो व ट्रांजिस्टर घर के अंधेरे कोने में रख दिए जाते हंै।सन् 1990 में मंडल आरक्षण आंदोलन के ऐतिहासिक मोड़ पर मुख्य मंत्री के रूप में लालू प्रसाद ने आरक्षण समर्थकों के कठिन आंदोलन का बहादुरी से नेतृत्व दिया था।उसी के कारण वे पिछड़ा आबादी बहुल प्रदेश बिहार की राजनीति के महाबली भी बने थे।तब आरक्षण विरोधी सवर्णों ने बिहार में आरक्षण के खिलाफ तीखा आंदोलन चला रखा था।मुख्य मंत्री पद पर रहते हुए लालू प्रसाद ने सड़कों पर उतर कर आरक्षण विरोधियों को उससे भी अधिक तीखे स्वर में न सिर्फ जवाब दिया बल्कि कुछ स्थानों में तो खड़े होकर आरक्षण विरोधियों को अपने समक्ष पुलिस से बुरी तरह पिटवाया।इससे आम पिछड़ों को लगा कि पिछड़ों के हक में खड़ा होने वाला इतना मजबूत नेता पहली बार सामने आया है।

पर इस आंदोलन के कारण मिली अपार राजनीतिक ताकत का लालू प्रसाद ने लगातार दुरूपयोग ही किया।नतीजतन उन्हें कई बार जेल तक जाना पड़ा और अब भी वे भ्रष्टाचार से संबंधित अनेक मुकदमों के अभियुक्त हैं।लालू प्रसाद अपने त्याग, तपस्या और सकारात्मक राजनीतिक कर्माे के कारण तो मुख्य मंत्री बने भी नहीं थे।उन्हें तो देवी लाल -शरद यादव की जोड़ी ने प्रत्यक्ष रूप से और चंद्र शेखर ने परोक्ष रूप से मदद कर बिहार का मुख्य मंत्री बनवाया था। आरक्षण विरोधी आतुर सवर्णों ने तीखा आंदोलन करके लालू प्रसाद को पिछड़ों का मसीहा बन जाने का अनजाने में मौका दे दिया।बाद में चारा घोटाले का अभियुक्त बनने के बाद और जनता दल में विभाजन के पश्चात कांग्रेसियों ने लालू प्रसाद की गद्दी बचाई और वे लगातार वर्षों तक बचाते रहे। उस बीच राज्य में विकास थम गया,अपराधियों का बोलबाला बढ़ गया।सिर्फ बात बना कर काम चलाया जाने लगा।लालू प्रसाद की मदद में कम्युनिस्ट भी आगे रहे।यदि कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों ने यह शत्र्त रखी होती कि आप की गद्दी हम तभी बचाएंगे जब आप अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक शैली बदलेंगे तो लालू प्रसाद और बिहार का भला होता।

बिहार जैसे अर्ध सामंती समाज में लालू प्रसाद ने पिछड़ों को सीना तान कर चलना जरूर सिखाया,पर उनके खाली पेट में अन्न के दो दाने डालने का प्रबंध नहीं किया जिससे पिछड़े एक -एक करके लालू प्रसाद से उदासीन होते चले गये।सन् 2000 के बाद तो लालू प्रसाद के वोट हर अगले चुनाव में घटते गये।गत लोक सभा चुनाव में तो उनके दल को सिर्फ 19 प्रतिशत मत मिले। क्योंकि इस बीच आम लोगों ने साम्प्रदायिकता के खतरे की अपेक्षा भीषण सरकारी भ्रष्टाचार, अविकास और राजनीति के अपराधीकरण के खतरे को अधिक गंभीर माना।अब देर से सही, पर समय बीतने के साथ कांग्रेस सहित अनेक सहयोगी दल व नेता गण लालू प्रसाद का साथ बारी- बारी से छोड़ते चले जा रहे हैं तो लालू प्रसाद अकेला पड़ रहे हैं।इस बदले माहौल में यदि कांग्रेस ने राम विलास पासवान को मिला लेने में सफलता पा ली तो बिहार मंे ंइस बात के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाएगी कि किसी अगले चुनाव मंे ंकांग्रेस और राजद में से कौन सा दल एक दूसरे से आगे रहेगा।अभी राजद बिहार का मुख्य प्रतिपक्षी दल है।हालांकि गत लोक सभा चुनाव में वह विधान सभा की कुल 243 सीटों में ंसे सिर्फ 33 सीटों पर ही बढ़त बनाने में सफल हो पाया।उसकी ताकत भविष्य में और भी घटने की उम्मीद है क्योंकि उसके विधायक, पूर्व विधायक और गैर विधायक नेता राजद छोड़ते जा रहे हैं।

दरअसल लालू प्रसाद की मूल समस्या उनकी शैली है।उनकी राजनीतिक शैली के कुछ नमूने यहां पेश हैं।वे जब बिहार में सत्ता में थे तो राजनीति के अपराधीकरण पर वे कहा करते थे कि ‘जनता ने जिसको वोट दिया,वह कहां का अपराधी ?’ जब उनसे कहा गया कि सी.बी.आई.ने चारा घोटाले में आप पर केस किया है ,क्या आप मोरल ग्राउंड पर इस्तीफा देंगे ?उनका जवाब होता था,‘ फुटबाॅल ग्राउंड तो होता है, यह मोरल ग्राउंड क्या होता है ? अरे यार, राजनीति प्रमुख होती है।नैतिकता क्या चीज है ?’जब कोई पिछड़े बिहार का विकास करने के लिए कहता था तो वे कहते थे कि ‘विकास से वोट नहीं मिलता।सामाजिक समीकरण से वोट मिलता है।’उनकी यह शैली आज भी नहंीं बदली।यदि शैली बदलने की उनकी इच्छा होती तो वे सबसे पहले राबड़ी देवी को विधान सभा में प्रतिपक्ष की नेता पद से हटवा कर उनकी जगह किसी काबिल व दबंग नेता को बैठाते।

इसके विपरीत अपराध,भ्रष्टाचार और विकास के बारे में नीतीश कुमार की शैली लालू प्रसाद से बिलकुल उलट है। इस शैली को जनता ेने पसंद किया है क्योंकि आम लोगों ने यह समझा है कि भले नीतीश कुमार को कई मामलों में सफलता अब भी नहीं मिल रही है,पर उनकी मंशा सही है।इसीलिए पिछले आम चुनाव में राजग को बिहार में 40 में से 32 सीटें मिली हैं।

सन् 2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार की सरकार ने पिछड़े समुदाय के आर्थिक व राजनीतिक हित के लिए कम ही समय में लालू प्रसाद की अपेक्षा अधिक काम किया है।साथ ही समावेशी विकास योजनाओं का लाभ सवर्ण सहित पूरे समाज को समरूप ढंग से थोड़ा- बहुत मिल रहा है।यही है नीतीश की वैकल्पिक शैली जिसका मुकाबला लालू तो दूर कांग्रेस तक को करने में दिक्कत आ रही है।इसके मुकाबले लालू प्रसाद का रास्ता तो और भी कठिन है।

/दैनिक हिंदुस्तान 28 जुलाई 2009 से साभार/

मंगलवार, 9 जून 2009

Melting iceberg of vote banks politics in Bihar

Not only the ice on the north pole of the earth, the iceberg of vote bank politics in Bihar is also melting slowly .It is due to the new type of social engineering of the engineer turned politician chief minister Nitish kumar.It is being done through the administrative and political measures.Due to new, silent and significant political developments, old benificiaries of caste-based vote banks politics are badly perturbed these days. Thus Nitish kumar is trying to change the age old agenda of Bihar politics from caste based to development based.

Whenever next lok sabha election takes place, in Bihar new voting pattern might be witnessed.In politically vibrant state like Bihar,this new political phenomenon is seems to be of far reaching consequences.Nitish kumar became the chief minister of the state in November,2005.Since then three lok sabha bye elections took place in the state.According to keen political observers ,all the three bye elections were won by the ruling N.D.A.candidates due to this new social engineering apart from several developmental schems.

Before discussing the measures taken by the new chief minister of this economically backward and to some extent unfortunate state,one should like to know the prevalent caste based vote bank politics.Obviously it was started by Congress party who has created Woman, Brahmin, muslim and schedule castes vote bank for her. It was created by the then prime minister Indira Gandhi after great division of the congress in 1969 . Bihar was also in the grip of this caste based politics for long years.But when Laloo prasad emerged as mandal messiah in ninetees,he created his own backward-dalit-muslim vote bank. He ruled the state like despot for full fifteen years with the help of this vote bank. Later part of his rule,he was limited to muslim-yadav vote bank only. Meantime Ram vilas paswan has created a solid niche in Paswan vote bank for himself.

When Nitish kumar parted company with Laloo Prasad in 1994, he was the leader of kurmi-koiri vote bank.

Vote bank politics has done immense damage to Bihar making it more backward.Supremos of vote bank politics thought their vote bank fiefdoms would not desert them even if they become oblivious to the problems of the backward and unfortunate state like Bihar.For many years, Bihar politics was guided by the slogans based on castes,religion and other sentiments.Cash and criminals also played their roles .Developments were neglected like anything.In every district,some sort of political mafias were allowed to be emerged and rule.Law and order was the worst casualty. Major parts of the govermental funds for developments and welfare were looted with impunity.Intoxicated with the power of vote bank politics,power –that- be was became ultra insensitive to even the basic problems of even their own people ie vote bank.

Realising the menace of vote bank politics, Nitish kumar started demolishing this from the first year of his office.His efforts are still on.For panchayats and local bodies elections, Nitish government has reserved fifty percent elective seats for women. Nitish kumar managed to reserve 20 percent seats for extremely backward castes in panchayats and local bodies.With this particular decision chief minister s own caste kurmi was deprived of many seats in panchayats and local bodies.Before this decision in favour of extremely backward castes, major panchayats seats were won by intermediary backward castes like yadav and kurmi.

Another major move in this regard was the reservation of 50 percent seats for women candidates in primary school teachers recruitments.Nearly two lakh teachers were already recruited during nitish tenure. Process for recruitments of another one lakh teachers is on.Thus by giving jobs to one and half lakh women in schools Nitish kumar badly damaged the old pattern of vote bank politics.Apart from these things Nitish government has taken some others women-centric measures dividing vertically the traditional vote banks.Guided by late socialist thinker and leader Dr.Ram manohar lohia ,Nitish kumar regarded women from every castes backwards and oppressed.Though Nitish kumar s party does not want to extend this Lohia s thinking for reservation for this section in parliament and state legislatures.This is really curious part of nitish kumar s politics.

Anyway, this thing apart Nitish kumar provoked Ram vilas paswan and Laloo Prasad for criticizing him for so called attempt to divide minority and dalits. Nitish government has created Maha dalit commission for recommending welfare measures for extremely backward among dalits.The commission has come to the coclusion that only a few castes among Dalits are being benifitted after independence.Nitish government has earmarked separate funds for the welfare of extremely dalits castes.Central minister and another strong leader of Bihar Mr Ram vilas paswan has openly charged Nitish kumar for dividing dalits and thus trying to weakenin them .
Same way, Laloo prasad and his party Rashtriya janta dal has been accusing nitish kumar continuously for dividing backwards and muslims.They also charged that Nitish was playing in the hands of feudal elements by dividing the forces of social justice and communal harmony.But supporters of new measures are not convinced saying that people at large are happy with the new measures of the state government.They argue that without thinking about any vote bank thing,Nitish government taking the measures which are necessary for the weaker sections of different caste and community groups..

But apart from the overt statement,hidden agenda of demolishing vote bank politics is doing miracle. Apart from winning all lok sabha and assembly bye election seats in last two and half years,the latest survey by a newspaper suggests that 73 percent people of Bihar think that this nitish government is more efficient than the previous one.

When two members from backward muslim ie. Pansmanda ie. backward muslim community Ali anwar and Dr.Ezaj Ali were sent to Rajya sabha one by one from Bihar by nitish kumar s party j.d.u, it was clear indication that muslim vote banks are being divided on the pattern of Hindus. Simultaneously nitish government has got the Bhagal pur riots closed cases reopened and court covicted even those accused who were got scot- free during previous regime.This made minority in Bihar soft to new regime if not supportive as BJ.P.is major partner in Nitish govt.

This new type of social engineering coupled with continuing widespread developmental programmes of this government has given the different look to the monotonous politics of this unfortunate state which was solely based on cash,caste and criminals.Now people have already started taking their political decision on the basis of the performance of the government. Veteran criminals even with political patronage are being convicted one by one these days. It is believed that the next lok sabha election results from Bihar might re inforce this people s decision in a big way.It is not for nothing that Nitish is repeatedly saying that if our state government would not be able to turnaround Bihar,I would not go to the people for vote in next Bihar assembly election due in 2010.
(unpublished) 12 july 2008.

रविवार, 7 जून 2009

लालू-पासवान के बिना कांग्रेस का पुनर्जीवन मुश्किल

कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश और बिहार पर विशेष ध्यान देगी। इससे बिहार के कांग्रेसी उत्साहित हैं। आनेवाले दिनों में शायद राहुल गांधी बिहार में सक्रिय भी हों। पर यहां कांग्रेस के विकास की गुंजाइश काफी सीमित है। यहां तो कांग्रेस के अधिकांश वोट बैंक पर एन.डी.ए. का पहले ही कब्जा हो चुका है। जब लालू-राबड़ी शासन के खिलाफ आवाज उठा कर कांग्रेस को अपना वोट बैंक बढ़ाने का अवसर था, तो तब तो वह लालू प्रसाद से गलबहियां कर रही थी। अब यदि कांग्रेस को अपनी ताकत बिहार में भी बढ़ानी है, तो उसे लालू-पासवान के वोट बैंक की आधारशिला पर ही फिलहाल खड़ा होना पड़ेगा। वैसे भी कांग्रेस इस्तेमाल करो और फेंको नीति में विश्वास करती रही है।

कांग्रेस को इस लोकसभा चुनाव में बिहार में मात्र दस प्रतिशत मत मिले, जबकि उत्तर प्रदेश में इस बार इस दल को 18 प्रतिशत वोट मिले। पर बिहार में काग्रेस को मिले ये मत भी खांटी व स्थायी कांग्रेसी मत नहीं माने जा सकते। इन मतों में से कुछ मत ‘प्रवासी उम्मीदवारों’ के कारण मिले। कुछ मत दो विजयी कांग्रेसी उम्मीदवारों के अपने निजी प्रभाववाले मतों के कारण थे। कुछ ऐसे भी मत कांग्रेस को बिहार में मिले जो मत उसे बिहार विधानसभा चुनाव में नहीं मिलेंगे। क्योंकि वे मतदाता ऐसे हैं, जो एक तरफ तो लालू -राबड़ी को बिहार में सत्ता में आने से रोकना चाहते हंै, तो दूसरी ओर केंद्र में राहुल गांधी को मजबूत बनाने चाहते हंै। याद रहे कि इस लोस चुनाव में बिहार में कांग्रेस को ब्राह्मणों के सिर्फ 18 प्रतिशत मत मिले। जबकि राजग को बिहार में इस जाति के 69 प्रतिशत मत मिले। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के 32 प्रतिशत वोट इस बार मिले हैं।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को 21 सीटें भी मिलीं, जबकि बिहार में सिर्फ दो। वे दो सीटें भी कांग्रेस को अपने जनाधार के कारण नहीं, बल्कि उन उम्मीदवारों के व्यक्तिगत असर के कारण मिलीं। बिहार में कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रही। 30 सीटों पर, तो उसके उम्मीदवारों की जमानतें तक जब्त हो गईं। सासाराम से विजयी मीरा कुमार को सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में करीब 4 लाख मत मिले थे। इस बार मात्र 1.92 हजार। इस बार भाजपा उम्मीदवार मुनीलाल से मीरा कुमार के मतों का अंतर 43 हजार रहा, जबकि सन् 2004 में यह अंतर 2 लाख .58 हजार का था। तब राजद का कांग्रेस से चुनावी तालमेल था। यानी, लालू प्रसाद के मत इस बार अलग हो जाने के बावजूद मीरा कुमार अपने निजी प्रभाववाले मतों के बल पर जीत गईं। याद रहे कि उनके पिता जगजीवन राम यहीं से सांसद हुआ करते थे। उनका असर अब भी बाकी है।

उधर किशनगंज में कांगेेस की जीत पूरी तरह उम्मीदवार असरारूल हक की जीत है। इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार असरारूल हक को किशनगंज में 2 लाख 39 हजार वोट मिले। पर जब वे सन् 1998 में वहां से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे, तो भी उन्हें 2 लाख 30 हजार मत मिले थे। एन.सी.पी. उम्मीदवार के रूप में सन् 1999 में असरारूल हक को एक लाख 97 हजार मत मिले थे। याद रहे कि सपा और एन.सी.पी. का किशनगंज में अपना कोई खास जनाधार नहीं हैं।

यानी कुल मिलाकर कांग्रेस में बिहार में अपने बल बूते पुनर्जीवित हो जाने की कोई ताकत दिखाई नहीं पड़ती। उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार के नेतृत्ववाली यादव-ठाकुर अतिवादिता के कारण मायावती ने दलित-ब्राह्मण समीकरण बनाया। उसी कारण वह सन् 2007 के विधानसभा चुनाव में विजयी रहीं। उत्तर प्रदेश में मायावती के कुशासन के कारण उपजे असंतोष के कारण कांग्रेस को लोस चुनाव में इस बार बढ़त मिली। पर बिहार में नीतीश सरकार के खिलाफ अभी कोई जन असंतोष नजर नहीं आ रहा है, बल्कि सुशासन, बेहतर कानून-व्यवस्था व विकास के कारण नीतीश सरकार के प्रति जनता में आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है। हां, शिक्षकों की बहाली में गड़बड़ी, जगह- जगह शराब की सरकारी दुकानों और सरकारी दफ्तरों में बढ़ रही घूसखोरी के खिलाफ बिहार में जनांदोलन किया जा सकता है। पर कोई भी करगर जनांदोलन लालू-पासावन की मदद के बिना कांग्रेस नहीं चला सकती। अब भी लड़ाकू राजनीतिक जमात लालू के पास ही है, जिसका लाभ कांग्रेस उठा कर नीतीश सरकार को परेशानी में डाल सकती है। इसके साथ राजग के विरोध में खुद को एक शालीन व अनुशासित विकल्प के रूप में पेश कर सकती है। याद रहे कि राजनीति से अपराधियों के धीरे-धीरे सफाये के बाद अब कांग्रेस की तरह अपेक्षाकृत शालीन राजनीति को बिहार की जनता देर-सवेर पसंद करेगी। लालू की राजनीति शालीन नहीं रही है। खुद को सुधारने की उनमें क्षमता काफी कम है।

किसी बड़े जन असंतोष की अनुपस्थिति मेें किसी जातीय समूह को नीतीश से खींच कर अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ा ले, यह कांग्रेस के लिए फिलहाल संभव नहीं दिख रहा है।

वैसे भी अपनी भारी हार के बाद लालू प्रसाद कुम्भला गए हैं। हर छोटी-बड़ी हार के बाद वे थोड़ा ठंडे पड़ ही जाते हैं। मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करके कांग्रेस ने लालू को उनकी औकात बता दी है। तब से वे और भी विनम्र व दबे-दबे नजर आ रहे हैं। ऐसे भी चारा घोटाले से संबंधित जारी मुकदमों के कारण लालू प्रसाद फिलहाल कांग्रेस से झगड़ा नहीं कर सकते। हां, राजनीतिक प्रेक्षक बताते हैं कि मुकदमों से निपट लेने के बाद उन्हें भाजपा से भी मिल कर राजनीति कर लेने में कोई परहेज नहीं होगा, यदि कांग्रेस के छुटभैया नेतागण लालू प्रसाद का मजाक उड़ाना जारी रखेंगे।

लालू प्रसाद को नजदीक से और अधिक दिनों से जाननेवाले लोग जानते हैं कि लालू प्रसाद को अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए लचीलापन अपनाने में कभी कोई झिझक नहीं हुई। भागलपुर का दंगा सन् 1989 में हुआ था। उस साल के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद लोकसभा के लिए चुन लिये गये थे। तब भाजपा और कम्युनिस्टों के समर्थन से केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार चल रही थी। बिहार में भी विधानसभा का चुनाव होने को था और लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। उन्हें लगा कि बिहार में भी भाजपा की मदद लेनी पड़ेगी।

इस पृष्ठभूमि में लालू प्रसाद ने लोकसभा में तब अपने भाषण में कहा था कि भागलपुर दंगे में भाजपा या आर.एस.एस. का कोई हाथ नहीं है। उनके इस भाषण के टैक्स्ट को बाद में बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता यशवंत सिन्हा ने सदन में सुनाया था। याद रहे कि यशवंत सिन्हा तब इस बात पर नाराज थे कि दंगा जांच रपट में यह आरोप लगाया गया कि भागलपुर दंगे के लिए एल.के. आडवाणी जिम्मेदार थे। लालू शासनकाल में जब भागलपुर दंगे की जांच रपट प्रकाशित हुई, तब तक लालू प्रसाद को अपनी सरकार चलाने के लिए भाजपा की मदद की जरूरत नहीं रह गई थी। इन दिनों पटना के राजनीतिक हलकों में यह अफवाह भी गर्म है कि यदि लालू प्रसाद को कांग्रेस ने अधिक परेशान किया, तो वे कोई चैंकानेवाला राजनीतिक कदम भी उठा सकते हैं। इसलिए कांग्रेस को लालू प्रसाद की इस टिप्पणी से संतुष्ट हो जाना चाहिए था कि ‘कांग्रेस से चुनावी तालमेल नहीं करना हमारी भूल थी।’

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कांग्रेस ने लालू प्रसाद का गर्म दिमाग ठंडा करने के लिए और उन्हें सबक सिखाने के लिए यह अच्छा किया कि उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया। पर यदि कांग्रेस लालू के साथ मिल कर नीतीश सरकार के खिलाफ बिहार में अभियान नहीं चलाएगी, तो कांग्रेस को बाद में लालू प्रसाद की तर्ज पर ही यह अफसोस जाहिर करना पड़ेगा कि लालू प्रसाद को दुत्कार कर हमने भूल की।

साभार जनसत्ता (2 जून, 2009)

मंगलवार, 19 मई 2009

बिहार में एक भिन्न व नई राजनीतिक संस्कृति की जीत

बिहार में लोकसभा का चुनाव दो दलों या दो नेताओं के बीच का चुनाव नहीं, बल्कि दो परस्परविरोधी राजनीतिक संस्कृतियों के बीच का चुनाव था। बिहार के मतदाताओं ने नीतीश कुमार की राजनीतिक संस्कृति पर मुहर लगायी है और लालू-रामविलास की पुरानी संस्कृति को बुरी तरह नकार दिया है।

इस चुनाव नतीजे का यह साफ संदेश है कि यदि लालू प्रसाद -रामविलास पासवान ने अपनी ‘राजनीतिक संस्कृति’ को जल्द-से-जल्द नहीं बदला, तो वे यहां की राजनीति में अप्रासंगिक हो जायेंगे। क्योंकि देर करने पर तो नीतीश कुमार उन लोगों से और भी आगे निकल चुके होंगे।

मात्र 40 महीनों में कोई नेता एक जर्जर प्रदेश की पूरी राजनीतिक संस्कृति ही बदल दे, इस बात की कल्पना करना कठिन है। पर, यह कठिन काम नीतीश कुमार ने एक कठिन और विपरीत परिस्थिति में भी कर दिया। लालू प्रसाद और रामविलास पासवान को इस बात का बड़ा गुमान था कि यदि वे मिलकर चुनाव लड़ेंगे, तो बिहार में राजग हवा हो जाएगा, पर उन्हें इस बात का अनुमान ही नहीं रहा कि अपने छोटे से कार्यकाल में नीतीश कुमार ने राजनीति का एजेंडा ही पूरी रह बदल दिया है। अब पुराने फाॅर्मूले से नीतीश कुमार को पराजित नहीं किया जा सकता।

नीतीश कुमार ने आखिर कौन सा जादू कर दिया, जो राजग को इतनी अधिक सीटें मिल गईं ? नीतीश सरकार ने पहले जातीय वोट बैंक के शिलाखंड को तोड़ा। इसी जातीय वोट बैंक के बल पर लालू प्रसाद और रामविलास पासवान निश्चिंत रहा करते थे। कोई खुद को बिहार का पर्यायवाची बता रहा था, तो कोई सत्ता की चाभी लेकर घूम रहा था।पर जातीय वोट बैंक की अपनी एक सीमा है। इसे नीतीश कुमार ने पहचाना।आजादी के बाद कांग्रेस ने भी वर्षों तक समाज के सभी हिस्सों के वोट लिये, पर सत्ता का लाभ कुछ खास सवर्ण जातियों को ही पहुंचाया। नतीजतन मंडल आरक्षण आया। उसने लालू प्रसाद को बिहार में महाबली बना दिया। लालू प्रसाद ने सभी पिछड़ी जातियों के वोट लिये, पर लाभ दिये सिर्फ कुछ खास लोगों को ही। दूसरी ओर, नीतीश कुमार ने समावेशी सामाजिक न्याय की अपनी नीति के तहत अति पिछड़ों के लिए पंचायतों और नगर निगमों में बीस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करायी। इस पर लालू प्रसाद ने कहा कि नीतीश पिछड़ों को बांट रहे हैं। इसी तरह का आरोप सवर्णों ने सन् 1990 में वी.पी. सिंह-लालू प्रसाद-रामविलास पासवान पर लगाया था, जो मंडल आरक्षण के झंडावरदार थे। सवर्णों ने आरोप लगाया था कि मंडलवादी लोग समाज को बांट रहे हैं।

नीतीश सरकार ने जब महादलित आयोग बनाया और पसमांदा मुसलमानों के हित में कुछ कदम उठाये, तो दलितों व मुसलमानों के वोट बैंक के मैनेजर बिफर उठे। यानी इतिहास ने खुद को दोहराया।

दरअसल जातीय वोट बैंक के मैनेजर बने नेतागण यह समझ बैठते हैं कि आम गरीब लोगों के आम कल्याण के लिए कुछ भी नहीं करेंगे, तो भी वे चुनाव नहीं हारेंगे। कभी कांग्रेस ने भी महिला, ब्राह्मण, मुसलमान और दलित वोट बैंक बनाकर वर्षों तक देश पर राज किया, पर अटल बिहारी वाजपेयी के कारण ब्राह्मण वोट जब कांग्रेस से खिसका, तो केंद्र से कांग्रेस की सता चली गयी। अब जब अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हैं, तो एक बार फिर कांग्रेस को इस चुनाव में देश में बढ़त मिल गयी है, पर यह ‘समावेशी विकास’ का फल नहीं है। इसलिए कांग्रेस की यह उपलब्धि शायद स्थायी साबित नहीं होगी।

इसके विपरीत बिहार में नीतीश कुमार की सरकार की उपलब्धि अधिक टिकाउ लगती है। यहां बिहार में न सिर्फ जातीय वोट बैंकों के अभिशाप की समाप्ति की दिशा में ठोस कदम डठाया गया है, बल्कि त्वरित अदालतों के जरिए राजनीति व समाज के दूसरे क्षेत्रों के अपराधीकरण पर भी अंकुश लगाने की कोशिश की गई है। इतना ही नहीं नीतीश शासन में विकास को राजनीति का केंद्र बिंदु बनाया गया है। पुराने जातीय वोट बैंक को तोड़ कर नया वोट बैंक बनाने का आरोप नीतीश कुमार पर जरूर लग रहा है। पर, इस समावेशी कदम को अधिकतर जनता ने पसंद किया है। क्योंकि दलित, मुस्लिम और पिछड़ों में जो अंतिम कतार में खड़े हैं, उनके लिए नीतीश सरकार ने काम किया है। महात्मा गांधी ने भी तो समाज के सबसे कमजोर कमजोर व्यक्ति की चिंता की थी।

बिहार के आम मतदाता नीतीश सरकार के जिस काम से सबसे अधिक खुश नजर आते हैं, वह काम कानून -व्यवस्था की स्थिति में सुधार का काम है। सन् 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय पुलिस मुख्यालय के हवाले से यह खबर आई थी कि तब राज्य में 40 हजार फरार वारंटी थे। यानी इतने आरोपितों के खिलाफ राज्य की विभिन्न अदालतों ने गिरफ्तारी के वारंट जारी कर रखे थे, पर उनकी गिरफ्तारी नहीं हो रही थी। गिरफ्तारी क्यों नहीं हो रही थी, यह सब जानते हैं।

पर नीतीश कुमार के बिहार में सत्ता संभालने के बाद त्वरित अदालतों ने काम शुरू किया। तीन साल में छोटे- बड़े 32 हजार आरोपितों को अदालतों ने सजाएं सुना दीं। नतीजतन राज्य में शांति का माहौल बन गया। इस लोकसभा चुनाव में कोई बाहुबली एक भी हत्या करने की हिम्मत नहीं जुटा सका, तो यह अकारण नहीं है। यही नई राजनीतिक संस्कृति है, जिसे जनता ने पसंद किया और राजग को भारी संख्या में जिताया। इस चुनाव नतीजे ने यह भी बताया कि बाहुबलियों और उनके रिश्तेदारों के लिए उनके पास अब वोट नहीं हैं। यदि कानून व्यवस्था कायम हो जाती है, तो बाहुबलियों की किसी को जरूरत ही कहां है ? बिहार में एक जाति के बाहुबली के मुकाबले के लिए दूसरी जाति के बाहुबली पैदा होते रहे थे। सत्ता और प्रतिपक्ष में बैठे कई नेतागण उन्हें संरक्षण देकर लोकसभा व विधानसभा में पहुंचाते थे। अब वह संस्कृति समाप्त हो रही है। अभी पूरी तरह तो समाप्त नहीं हुई है, पर जितनी भी समाप्त हुई है, उसका श्रेय नीतीश कुमार को जाता है। यदि लालू प्रसाद और रामविलास पासवान जैसे नेता भी इसी नई संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए भविष्य में काम करेंगे, तो वे बिहार की राजनीति में फिर से प्रासंगिक हो सकते हैं। यदि देर करेंगे, तो तब तक तो नीतीश कुमार अपने कामों के जरिए इन नेताओं को काफी पीछे छोड़ देंगे।

जातीय वोट बैंक -विनाश और कानून व्यवस्था की वापसी के साथ- साथ नीतीश सरकार ने विपरीत परिस्थितियों में भी विकास के जितने ठोस काम गत 40 महीनों में किये हैं, उत्तर प्रदेश जैसे अराजक राज्य के लिए भी अनुकरणीय हैं। यदि नीतीश कुमार के नेतृत्ववाले गठबंधन बिहार राजग के अधिकतर नेता व कार्यकर्ता ईमानदार व जनसेवी होते तथा सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार व काहिली की मात्रा कम होती, तो राज्य के विकास की गति और तेज होती। एक जर्जर एंबेसेडर गाड़ी को अस्सी क्या साठ किलोमीटर प्रति घंटा की दर से भी नहीं चलाया जा सकता है। यहां की राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका की हालत जर्जर एम्बेसेडर कार की ही है। साथ ही अफसरों, कर्मियों तथा अन्य आधारभूत संरचना की भी भारी कमी है।

जो हो, राज्य सरकार की तमाम कमियों को मतदाताओं ने नजरअंदाज किया है, क्योंकि उसे लग गया है कि नीतीश कुमार की मंशा ठीक है, तो देर-सवेर वे उन कर्मियों को ठीक कर ही लेंगे।

नीतीश सरकार के सत्ता में आने के बाद बिहार के विकास बजट में अचानक भारी वृद्धि और आंतरिक कर संग्रह में महत्वपूर्ण इजाफे ने भी लोगों में राज्य सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि राज्यहित में काम कर रहे मुख्यमंत्री से भाजपा ने ईष्र्या नहीं की, उनका सहयोग किया जिसका नतीजा सामने है। भाजपा और व्यवसायी समुदाय से आने के बावजूद वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ने वाणिज्य कर की वसूली की मात्रा तीन साल में दुगुनी करवा दी।

जिस राज्य में कुछ ही साल पहले तक साल में दो-तीन हजार करोड़ रुपये भी विकास पर खर्च नहीं हो पा रहे थे, वहां दस-बारह हजार करोड़ हर साल खर्च होने लगे हैं। राज्य के कोन-कोने में किसी-न-किसी तरह के सरकारी विकास कार्य नजर आने लगे हैं। सवाल विकास के विस्तार से अधिक राज्य सरकार की मंशा का है, जिसके प्रति आम लोगों को भारी विश्वास है। यही नई कार्य संस्कृति और राजनीतिक संस्कृति है, जिसे अब लालू -रामविलास पासवान को भी विकसित करना पड़ेगा। यदि नहीं करेगे, तो वे समय के साथ और भी अकेला पड़ जायंेगे।

पर इस चुनाव में भारी सफलता के बाद नीतीश कुमार को सरकारी दफ्तरों में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार के खिलाफ बेरहम अभियान चलाना पड़ेगा। अन्यथा विकास का लाभ आम लोगों को नहीं मिलेगा। राजनीति में बचे -खुचे अपराधियों को निकाल बाहर करना पड़ेगा। ऐसी सफलता के बाद बड़े -बड़े नेताओं के मन डोलने लगते हैं। उनमें एकाधिकारवादी प्रवृत्ति पैदा होने लगती है। किसी नेता के मन में ऐसी प्रवृत्ति पैदा कराने में कुछ करीबी लोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नीतीश कुमार के स्वभाव को देखते हुए तो लगता है कि वे ऐसी प्रवृति खुद में पनपने नहीं देंगे। पर पता नहीं कल क्या होगा ? एक बात तय है कि नीतीश कुमार से इस राज्य की जनता को भारी उम्मीदें हैं। उम्मीद है कि वे एक ऐसे विनम्र, किंतु दृढ़ नेता के रूप में इतिहास में याद किया जाना पसंद करेंगे, जिसने एक बिगड़ी शासन व्यवस्था को थोड़े ही समय में पटरी पर ला दिया। गत 40 महीने के उनके शासन काल से यह साफ है कि ऐसा वे कर सकते हैं। उनका यह फैसला सही है कि वे राजग में ही रहेंगे और साथ ही यह बात भी है कि बिहार में राजग की घटक भाजपा जैसी शांत सहयोगी शायद ही कहीं किसी और को मिले !

प्रभात खबर से साभार (17 मई, 2009)

रविवार, 17 मई 2009

एक विदेशी बैंक में भारत के खरबों डूबने की कहानी

यह कथा बिहार के दरभंगा की है। यह नीदरलैंड के एक बैंक में 77 अरब रुपए डूबने की कहानी है। यह धन दरभंगा के मोहम्मद मोहसिन का था। यह कहानी सन् 1984 में दरभंगा के ही एक शिक्षक वैद्यनाथ मिश्र ने इन पंक्तियों के लेखक को सुनाई थी। वे उस धन को निकालने की कोशिश करते-करते दिवंगत हो गए। अब उनके करीबी रिश्तेदार इस कोशिश में लगे हैं। पर, सफलता हाथ नहीं लग रही है।

इनके दावे में कितना दम है? ऐसे माहौल में एक बार फिर इस पुरानी कहानी पर एक नजर डालना मौजंू होगा, जब स्विस बैंकों मेें जमा भारतीयों के काला धन को लेकर इस देश में चर्चा गर्म है।

मोहसिन ने मरने से पहले वैद्यनाथ मिश्र को दान पत्र के जरिए इस विदेशी बैंक में जमा धन का उत्तराधिकारी बना दिया था। मोहसिन, मिश्र परिवार के कर्जदार थे। मोहसिन हैदराबाद निजाम के यहां जौहरी का काम करते थे। कहते हैं कि वहां से उन्होंने किसी-न-किसी तरीके से काफी हीरे -जवाहरात लाए थे। मोहसिन ने उस हीरे-जवाहरात को नीदरलैंड ट्रेडिंग एजेंसी की कलकत्ता शाखा में जमा कर दी थी। बाद में ट्रेडिंग सोसायटी एक बैंक में परिवर्तित हो गई, जिसका नाम पड़ा एल्जीमीन बैंक नीदरलैंड एन.वी।

उस हीरे -जवाहरात की कीमत आंक कर ट्रेडिंग सोसायटी ने मोहसिन को 21 अगस्त, 1923 को 21 करोड़ मार्क की रसीद दे दी थी। वह रसीद अब भी मिश्र परिवार के पास है, पर जब वैद्यनाथ मिश्र ने इस धन को विदेश से वापस लाने के लिए उस बैंक से पत्र व्यवहार शुरू किया, तो एल्जीमीन बैंक ने कभी तो लिखा कि वह लौटाने को तैयार है, तो कभी कहा कि उस रिश मार्क का अब न तो कोई विनिमय मूल्य है और न ही कोई कीमत। मोहसिन से मिश्र को इस जमा धन का उत्तराधिकार कैसे मिला? यह भी कथा के भीतर की एक कथा है।

दरअसल बड़ी संपत्ति के मालिक मोहसिन शाह खर्च निकले। अपनी जमा पूंजी खत्म हो गई, तो इस कारण वे मिश्र परिवार के कर्जदार हो गए थे। उन्होंने इसी कारण इस बैंक जमा खाते का मिश्र परिवार को लिखित तौर पर उत्तराधिकारी बना दिया। उसके बाद वैद्यनाथ मिश्र ने इस संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और बाद के अन्य सत्ताधिकारी नेताओं से बारी- बारी से गुहार लगाई। वे पैसे की वापसी की कोशिश में देश भर में चक्कर काटते रहे। इस संबंध में उचित कार्रवाई का लोगों से आग्रह करते रहे। पर सफलता नहीं मिली।

27 जुलाई, 1989 को सी.पीआई. के चतुरानन मिश्र ने यह मामला राज्य सभा में उठाया। केंद्र सरकार ने सीधा हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।पर चतुरानन मिश्र ने 18 जुलाई 1990 को संसद में धरना देने की धमकी दी, तो भारत सरकार ने जांच करके बताया कि यह मामला सिर्फ 70.80 गिल्डर का है। इतने छोटे मामले में भारत सरकार हस्तक्षेप नहीं करेगी। सन् 15 अगस्त, 1990 को भी हुकुम देव नारायण यादव के नेतृत्व में 14 सांसदों ने इस संबंध में तत्कालीन प्रधान मंत्री वी.पी. सिंह को पत्र लिखा और धन की वापसी के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया।

इस बीच वैद्यनाथ मिश्र का परिवार विभिन्न अदालतों में भी मामला दायर करता रहा, पर अब तक कोई नतीजा नहीं निकला। वैद्यनाथ मिश्र के बाद डाॅ. मुनींद्र भट्ट इस मामले का पीछा करते रहे। ं

दिल्ली हाई कोर्ट के वकील आर.के. जैन ने 1999 में मुख्य सतर्कता आयुक्त को लिखा कि वह इस बात की जांच कराएं कि इस धन के विदेश से वापस लाने में भारतीय सरकारी बैंकों ने किस तरह की लापरवाही बरती है।

इस संबंध में दरभंगा के वैद्यनाथ मिश्र के साथ इन पंक्तियों के लेखक की सन् 1984 में हुई लंबी बातचीत का विवरण यहां पेश है।

प्रश्न-आपके दावे में कोई दम भी है या फिर आप सिर्फ हवा मंे हाथ-पैर मार रहे हैं ? क्योंकि जितनी बड़ी रकम आप बता रहे हैं, वह तो अविश्वसनीय लगती है?

जवाब-मैं हवा में नहीं हूं। मेरी प्रत्येक बात ठोस सबूतों के आधार पर है। यदि एल्जीमीन बैंक समझता है कि मेरे दावे में दम नहीं है, तो वह मूल मुद्दे को अदालत के सामने क्यों नहीं आने दे रहा है ? यदि दम नहीं होगा, तो अदालत मेरे दावे को खारिज कर देगी। पर बैंक तकनीकी आधार पर प्रारंभिक दौर में ही इस मामले को खत्म करा देने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है।

प्रश्न-यह तकनीकी आधार क्या है ?

उत्तर-यही कि मैंने कोर्ट फीस जमा नहीं की है और दावे के मामले में तमादी हो चुकी है।

प्रश्न-जब आपके दावे में इतना दम है, तो फिर कोर्ट फीस की रकम जमा कर देने के लिए कोई फिनांसर मिल जाना चाहिए था?

उत्तर-इस मुकदमे के बारे में अभी लोगों को मालूम ही नहीं है। क्योंकि अखबारों ने भी अब तक इस ओर ध्यान नहीं दिया। अन्यथा कोई फिनांसर मिल जाता। वैसे तो इस केस को खुद भारत सरकार को लड़ना चाहिए था। क्योंकि प्राप्त होनेवाली रकम में से कानूनन 80 प्रतिशत तो भारत सरकार को ही मिलनी है। यह तो भारत की आर्थिक आजादी के लिए लड़ाई है, जो मैं अकेले लड़ रहा हूं।

प्रश्न-अब जरा मूल मुद्दे पर आइए। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मोहम्मद मोहसीन ने एल्जीमीन बैंक में वही जर्मन रीश मार्क जमा किया हो, जो उन दिनों हजारों में देने पर एक कप चाय मिलती थी ?

उत्तर-असंभव ! बिलकुल असंभव ! ! मरते समय मोहसिन ने मुझे बताया था कि उसने हीरे- जवाहरात ही जमा किए थे और मरते समय सामान्यतः कोई झूठ नहीं बोलता। साथ ही आपको तो मालूम ही होगा कि जर्मनी एक देश है और नीदरलैंड दूसरा देश। नीदरलंैड पर कुछ वर्षों को छोड़कर कभी किसी देश का अधिकार नहीं रहा। पड़ोस का देश होने के कारण नीदरलैंड के भारत स्थित बैंक को यह मालूम था कि जर्मन रीश मार्क को उसी देश के लोग लेने से इनकार कर रहे थे। यहां तक कि जर्मन सरकार ने रीश मार्क अस्वीकार करने के जुर्म में अपने कुछ नागरिकों को फांसी भी दे दी थी। रीश मार्क उन दिनों जर्मनी के निजी छापाखानों में भी छपने लगे थे। जर्मन सरकार भी जो नोट छाप रही थी, उस पर भी सरकार की ओर से ऐसा कोई प्रामिस नहीं होता था जैसा कि भारतीय नोट पर रिजर्व बैंक के गवर्नर की तरफ से लिखा रहता था कि ‘मैं धारक को ......रुपए अदा करने का वचन देता हूं।’ऐसी स्थिति में ऐसा हो ही नहीं सकता कि जो रीश मार्क जर्मनी में ही अस्वीकृत हो रहा हो, उसे साढ़े 4 प्रतिशत ऊंचे सूद पर कोई दूसरा देश लेता। फिर बात यह भी है कि जो मोहसिन कभी विदेश नहीं गया, वह इतना अधिक जर्मन रीश मार्क लाता कहां से? सबसे बड़ी बात यह है कि एल्जीमीन बैंक के पास यदि मोहसिन का दिया हुआ जर्मन रीश मार्क है, तो उसने 1968 में लिखित वायदा करने के बावजूद उस जमाकर्ता को लौटाया क्यों नहीं ?दरअसल बात यह है कि जौहरी मोहसिन ने हीरे-जवाहरात जमा किए थे, जिसकी कीमत मार्क में लगा कर बैंक ने रसीद दे दी थी। इतिहास बताता है कि उन दिनों मार्क नीदरलैंड में मनी आॅफ एकाउंट था।

प्रश्न - क्या आपने नीदरलैंड का आर्थिक इतिहास भी पढ़ा है ?

उत्तर-इस मामले को लेकर मैंेने इस देश के लगभग सभी पुस्तकालयों को छान मारा है। विदेशों से भी कुछ सहित्य मंगाया है । मैंने यहां तक कि जर्मन रीश मार्क का एक नोट भी जर्मनी से मंगाया है, जो उन दिनों प्रचलित था। (मिश्र ने वह नोट भी इस संवाददाता को दिखाया।)

प्रश्न-क्या यह जर्मन नोट वही नोट है, जिसे मोहसिन द्वारा जमा करने की बात एल्जीमीन बैंक कर रहा है ?

उत्तर - इसमें भी घपला है। मोहसिन ने 21 अगस्त, 1923 को जमा किया। जर्मन रीश मार्क सितंबर, 1923 में पहली बार छपा। पर उसी पर यह भी लिखा हुआ है कि यह दो वर्षों के बाद प्रचलन में आएगा, तो फिर ऐसे रीश मार्क को एल्जीमीन बैंक कैसे स्वीकार कर सकता था, जो अभी प्रचलन में नहीं था और छपा भी नहीं था ?

प्रश्न-ःक्या मार्क सिर्फ जर्मनी में ही चलता है ?

उत्तर-नहीं मार्क भिन्न-भिन्न रूपों में फ्रांस, आस्ट्रिया, फिनलैड और बावेरिया आदि देशों में प्रचलित रहा है। किस देश में मार्क का क्या रूप था, इस पर मैंने बहुत साहित्य पढ़ा है। मैं एक बार फिर कह दूं कि नीदरलैंड में मार्क मनी आॅफ एकाउंट ही था। जैसे आज भी कुछ देशों के लिए पाउंड और डाॅलर मनी आॅफ एकाउंट है, हालांकि यह वहां की करेंसी नहीं है।

प्रश्न-इस बात के आपके पास और क्या प्रमाण हैं कि मोहसिन ने नोट नहीं, बल्कि हीरे-जवाहरात ही जमा किए थे ?

उत्तर-एल्जीमीन बैंक इतना अधिक सूद (साढ़े चार प्रतिशत प्रति वर्ष) किसी कीमती सामग्री पर ही दे सकता है। मोहसिन जौहरी थे और और बाद में ‘नवाब’ हो गए थे।इसलिए उनके पास इतने हीरे-जवाहरात होना नामुमकिन नहीं था।

प्रश्न-मोहसिन ने आपको अधिकार कैसे दे दिया, जबकि उसकी बेटी का बेटा मंजुरूल हसन मौजूद है और काफी गरीबी में है?

उत्तर-मोहसिन मेरे परिवार का कर्जदार था। इसलिए उसने मरने से एक वर्ष पूर्व मेरे नाम बजाप्ता दान पत्र लिखा। फिर भी मुझे इस संपत्ति का कोई लोभ नहीं है। मैं तो इसलिए यह लड़ाई लड़ रहा हूं, ताकि यूरोप से अपने गरीब भारत को इसका वाजिब पैसा मिल जाए और यह देश के विकास के काम में खर्च हो।

प्रश्न- इस लड़ाई में आपको क्या- क्या कठिनाइयां आईं ?

उत्तर-शारीरिक और आर्थिक परेशानी के साथ- साथ मुझे जान से मारने की भी कोशिश की गई। जब मैं रिजर्व बैंक के गवर्नर से मिलने बंबई गया था, तो मेरी हत्या का प्रयास हुआ। एल्जीमीन बैंक की शाखा कलकत्ता के अलावा बंबई और मद्रास में भी है। नीदरलैंड के दिल्ली स्थित दूतावास में वार्ता के दौरान वहां का एक अधिकारी मुझ पर गोली चलाने पर अमादा हो गया था। किसी तरह जान बची। इसलिए मैं अपने शहर में भी सावधान रहता हूं। कागजात बैंक लाॅकर में रखता हूं।

प्रश्न-इस संबंध में रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक की कैसी भूमिका रही ?

उत्तर-इन बैंकों की भूमिका पर आश्चर्य होता है। लगता है कि इनके अधिकारियों में देशप्रेम है ही नहीं। जब भी मैंने उन्हें लिखा, इन बैंकों ने बंधा -बंधाया जवाब दे दिया कि एल्जीमीन बैंक के जरिए पत्र व्यवहार कीजिए। अब भला आप ही बताइए कि जिस एल्जीमीन बैंक के विरुद्ध मैं शिकायत कर रहा हूं, उसी बैंक के जरिए इस पर कोई लाभप्रद पत्र व्यवहार कैसे हो सकता है ?

प्रश्न-मोहसिन के उस हीरे-जवाहरात की वास्तविक कीमत कितनी है ?

उत्तर-मैंने कलकत्ता के चार्टर्ड एकाउंटेंड आर.एस.पी. गुप्त एंड कंपनी से 19 जून, 1980 को इसकी गणना कराई थी। इक्कीस करोड़ मार्क की भारतीय रुपए मंे कीमत बीस अरब 49 करोड़ 60 लाख रुपए होती है। उस तारीख तक सूद की रकम 52 अरब 41 करोड़ 24 लाख 13 हजार 315 रुपए थी। अब यह राशि बढ़कर 77 अरब रुपए हो गई है। इधर मैंेने मार्क पर कुछ और साहित्य पढ़ा है। यूरोप में खास कर नीदरलैंड में एक मार्क की कीमत आठ औंस चांदी से लेकर 8 औंस सोना तक बताई गई है। सोना की बात छोड़ भी दी जाए, तो चांदी के आधार पर ही 21 करोड़ मार्क की कीमत आंकी जाए, तो वह 2 खरब 19 अरब रुपए तक पहुंच जाती है।मैं तो देश के धनवानों से अपील करता हूं कि वे इस देश को समृद्ध बनाने के लिए इसमें थोड़ा धन लगाएं।

वैद्यनाथ मिश्र से इन पंक्तियों के लेखक की बातचीत के 25 साल बीत चुके है। यदि उस धन की कीमत का आकलन आज की तारीख में किया जाए, तो उसके भारी आकार की सहज ही कल्पना की जा सकती है। मिश्र को अफसोस रहा कि इस मामले को उसकी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचाया जा सका।

साभार पब्लिक एजेंडा

आज के जार्ज को पुराना जार्ज कभी याद भी आता है ?




इतिहास की स्लेट पर लिखी अपनी गौरव-गाथा को कोई महान नेता खुद ही अपने हाथों से मिटाने या धुंधला करने लगे, तो उसे क्या कहा जाएगा ? ऐसे नेता का नाम आज बुझा- बुझा जार्ज फर्नांडीस है, जिसे कभी ‘अगिया बैताल’ का दर्जा हासिल था।

उनके नाम से पहले महान शब्द का इस्तेमाल अधिकतर लोगों को आज अटपटा लगेगा। पर आज राजनीति का गर्हित स्वरूप देख कर जाॅर्ज को महान कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऐसे नेता बिरले होते हैं, जो समाज के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर सत्ता से भिड़ जायें। आपातकाल में ंयही काम किया था जार्ज फर्नांडीस ने। यदि आपातकाल की समाप्ति नहीं हुई होती, तो जार्ज को उनके कई साथियों के साथ बड़ोदा डायनामाइट केस के सिलसिले में फांसी तक की सजा हो सकती थी। सी.बी.आई. ने उन पर देशद्रोह का केस तैयार किया था।

पहले की सहकर्मी और आज जार्ज की आलोचक पूर्व सांसद मृणाल गोरे ने गत साल दिसंबर में टाइम्स आॅफ इंडिया के साथ बातचीत में कहा था कि जार्ज फर्नांडीस के पास मुंबई में अपना कोई मकान नहीं है। वे मुंबई आने पर पार्टी आॅफिस के टेबुल पर सोते रहे हैं।

यानी एक ऐसा नेता, जो देश की खातिर और अपने विचारों के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर काम करे और केंद्रीय मंत्री बनने के बाद भी अपने लिए कोई संपत्ति खड़ी नहीं करे, उसे आज के युग में महान नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे, जबकि अधिकतर मामलों में राजनीति धन कमाने का इन दिनों आसान जरिया बन चुकी है ? सांसद-विधायक फंड ने राजनीति को गर्हित बना दिया है।

हां, जार्ज जैसा नेता अपने हाल के कुछ गलत राजनीतिक कदमों के चलते अपनी ही गौरव गाथा को धूमिल करता जरूर नजर आता है। जाॅर्ज फर्नांडीस के पुराने प्रशंसकों को यह सुनकर झटका लगा कि इस बार मुजफ्फरपुर में मतदान के एक दिन पहले ही वे दिल्ली चले गये और मतदान के दिन मतदान केंद्रों पर उनके पोलिंग एजेंट तक नहीं थे। चुनाव रिजल्ट क्या होगा, यह जग जाहिर है।

आखिर बुरी तरह अस्वस्थ जार्ज फर्नांडीस ने चुनाव लड़ने का फैसला ही क्यों किया, यह बात समझ में नहीं आई। लगता है कि आज का जाॅर्ज कभी पुराने जाॅर्ज को याद भी नहीं करता। यदि याद करता, तो अपने ही नये अवतार पर उसे शर्म आती। सन् 1977 में यदि आपातकाल नहीं हटता और वे केंद्रीय मंत्री नहीं बने होते, तो जार्ज का दर्जा इस देश में ‘मिनी भगत सिंह’ का होता। खैर सन् 1977 में उनका मंत्री बनना भी गनीमत थी। पर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री बन कर और तहलका का तोहमत पाकर तो उनकी छवि धूमिल ही होने लगी। हालांकि जाॅर्ज को करीब से जाननेवाले किसी व्यक्ति ने कभी यह विश्वास नहीं किया कि उन्होंने रक्षा सौदों में कभी कोई रिश्वत ली होगी। हां, अपनी एक सहयोगी की करतूत के बचाव को लेकर जरूर वे विवाद में पड़े। हालांकि बराक सौदे में उनसे हो रही पूठताछ से भी उनके पुराने प्रशंसकों को झटका लग रहा है।

हालांकि जाॅर्ज ने सबसे बड़ा झटका इस कारण दिया कि उन्होंने बुरी तरह अस्वस्थ होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी और ज्योति बसु की तरह शालीनता से सक्रिय राजनीति से रिटायर हो जाना मंजूर नहीं किया। मुजफ्फरपुर से इस बार जब चुनाव लड़ने पर जाॅर्ज अमादा हो गये, तो उनकी पत्नी लैला कबीर ने ठीक ही कहा था कि कोई बच्चा अपना हाथ जलाने पर अमादा हो, तो उसे जलाने नहीं दिया जाना चाहिए।

यानी वे यह कहना चाहती थीं कि जार्ज खुद नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। आश्चर्य है कि जाॅर्ज के साथ के लोगों ने उन्हंे मुजफ्फरपुर से उम्मीदवार बनने से क्यों नहीं रोका ? यह बात तो पिछले काफी समय से साफ हो चुकी थी कि जिस समता पार्टी और जदयू को बनाने में जार्ज की कभी महत्वपूर्ण भूमिका थी, उस पर उनका अब कोई व्यावहारिक अधिकार नहीं रह गया था। इसके कई कारण रहे हैं। उन कारणों के लिए कौन किना जिम्मेदार है, यह एक अलग चर्चा का विषय है। पर एक बात तो यह है कि जिस दल पर अधिकार ही नहीं है, उससे चुनावी टिकट की उम्मीद करना भी जाॅर्ज के लिए मुनासिब नहीं था। उन्होंने टिकट की उम्मीद करके अपनी स्थिति हास्यास्पद बनायी। यानी नये जाॅर्ज को पुराना जाॅर्ज याद नहीं रहा।

हालांकि जाॅर्ज फर्नांडीस ने खुद को कई लोगों की नजरों में तभी एक हद तक गिरा लिया था, जब उन्होंने तहलका मामले मंे उस मीडिया से मुंठभेड़ कर ली, जिसने रक्षा सौदों में दलाली की परंपरा का भंडाफोड़ किया था। बाद में उन्होंने गुजरात दंगे में गुजरात सरकार की सख्त आलोचना नहीं करके भी अपने ही धर्मनिरपेक्ष व्यक्तित्व को छोटा किया। ऐसे व्यक्ति जिसने सन् 1967 में डाॅ. राम मनोहर लोहिया और सन् 1977 में जयप्रकाश नारायण की राजनीतिक लाइन के खिलाफ खुल कर आवाज उठाई, उस जाॅर्ज को अटल सरकार में मंत्री बन जाने के बाद पता नहीं क्या हो गया था ? जाॅर्ज फर्नांडीस ़ने डाॅ. लोहिया की इस लाइन का खुला विरोध किया था कि सभी गैर कांग्रेसी दलों को मिलकर चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ एक उम्मीदवार खड़ा करना चाहिए। सन् 1977 में जाॅर्ज जयप्रकाश नारायण की इस राय से असहमत थे कि जनता पार्टी को चुनाव में शामिल होना चाहिए। जाॅर्ज को यह आशंका थी कि इंदिरा गांधी चुनाव में धांधली करा कर जीत जायेंगीं और आपाकाल को उचित ठहरा देंगीं। हालांकि दोनों मामलों में जाॅर्ज गलत थे, पर अपने सर्वोच्च नेता के खिलाफ इस तरह खुलेआम आवाज उठाना हिम्मत की बात थी, जिसकी कभी कमी जाॅर्ज में नहीं रही। हालांकि अपने जीवन की संध्या बेला में उन्होंने अपनी हिम्मत का सदुपयोग नहीं किया, इसका गम उनके प्रशंसकांे को रहा। .

जार्ज फर्नांडीस ने कर्नाटका से आकर पचास के दशक में मुंबई में श्रमिक नेता के रूप में काम शुरू किया। सन् 1967 तक वे मुंबई में इतना जम गये थे कि उन्होंने मुंबई के सबसे बड़े कांग्रेसी नेता और केंद्रीय मंत्री एस.के. पाटील को दक्षिण मुंबई लोकसभा क्षेत्र में चुनाव में हरा दिया। इस कारण जाॅर्ज जाइंट कीलर कहलाये। बाद में सन् 1974 में रेलवे मेंस फेडरेशन के अध्यक्ष के रूप में ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल का नेतृत्व करके जाॅर्ज हीरो बन गये। पर तहलका मामले में उनपर आरोप लगा, तो वे मीडिया पर ही उखड़ गये। जाॅर्ज ने कहा कि ‘मैंने भी कुछ पत्रिकाओं का संपादन किया है। मैं नहीं जानता कि पत्रकारिता ऐसी भी हो सकती है, जिसमें काॅल गर्ल का इस्तेमाल किया जाता हो।’

पत्रकारिता में खबरें निकालने के लिए भी काॅल गर्ल का इस्तेमाल हो, इस पर मीडिया जगत भी विभाजित रहा, पर खुद जार्ज यह बात किस मुंह से कह रहे थे, जिन्होंने अपनी साप्ताहिक पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ के आठ सितंबर, 1974 के अंक में कवर स्टोरी छापी थी, जिसका शीर्षक था, ‘संसद या चोरों और दलालों का अड्डा?’ तब ‘प्रतिपक्ष’ ने संसद की तुलना वेश्यालय से की थी। तब कौन सी पत्रकारिता हो रही थी?

दरअसल ‘तहलका प्रकरण’ आते- आते जाॅर्ज ने अपनी भूमिका बदल ली थी और इसी बदली हुई भूमिका के कारण यह कहा जा रहा है कि जाॅर्ज अपनी ही गौरव गाथा को अपने ही हाथों से मिटाने पर तुले हुए हैं, तो उनका कोई पुराना प्रशंसक भी भला क्या कर सकता है ! क्या आज के जाॅर्ज को कभी पुराना जाॅर्ज याद आता है ?



प्रभात खबर से साभार