सोमवार, 22 जुलाई 2013

सही साबित हो रही है नीतीश की आशंका

 
नरेंद्र मोदी का राजनीतिक अभियान या यूं कहें कि चुनावी अभियान शुरू हो चुका है। जिन शब्दों और प्रतीकों के जरिए वह चल  रहा है, उससे लगता है कि भाजपा से अलग होने का नीतीश कुमार का निर्णय सही था। जदयू को यह  आशंका पहले से ही थी। उसे लगता था कि विभाजनकारी व्यक्तित्व वाले नेता होने के कारण नरेंद्र मोदी को कमान सौंपी गई तो वे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थिति ला देंगे। वह नुकसानदेह साबित होगा। आज लगता है कि यही हो रहा है।

  यहां तक कि खुद भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा को हाल में यह कहना पड़ा कि बहस वास्तविक मुद्दों से भटक गई है। आगामी चुनावों के लिए बहस आर्थिक स्थिति और आम आदमी को पेश आ रही समस्याओें पर होनी चाहिए जिनके लिए कांग्रेस सरकार जिम्मेदार है, न कि सांप्रदायिकता बनाम धर्म निरपेक्षता पर।

    क्या श्री सिन्हा की सलाह नरेंद्र मोदी मानेंगे ? पता नहीं। क्योंकि इस देश में दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह जैसे बड़बोले नेता भी उपलब्ध हैं जो ऐसे विवादों की  आग में घी डालने का काम करते रहते हैं। इस देश में इन दिनों नरेंद्र मोदी और दिग्विजय सिंह सांप्रदायिकतायुक्त राजनीतिक विमर्श के मुख्यतः दो ध्रुव बन चुके हैं। यदि नरेंद्र मोदी कहते हैं कि मैं हिंदू राष्ट्रवादी हंू तो दिग्विजय सिंह कहते हैं कि मैं कर्मकांडी हिंदू हंू। मोदी इन दिनों धार्मिक स्थलों का कुछ अधिक ही भ्रमण कर रहे हैं। उधर दिग्विजय सिंह को अपने बारे में यह बात सार्वजनिक करना जरूरी लगता है कि ‘मैं हर एकादशी का व्रत रखता हूं।’

   क्या भारतीय राजनीति के विमर्श का यही स्तर होना चाहिए ? ऐसी नौबत किसने लाई ? इसके आगे और कैसे नतीजे होंगे ?

 यदि भाजपा चुनाव अभियान समिति के प्रधान को किसी ने बीच में नहीं रोका तो अगला चुनाव सांप्रदायिक मुददों पर ही होगा। चुनाव तो अभी दूर है, उससे पहले देश का माहौल बिगड़ जाएगा। इसे बिगाड़ने में भाजपा और कांग्रेस दोनों के निहितस्वार्थ है, पर अन्य लोगों व संगठनों का क्या होगा ? नीतीश कुमार ने शायद इस स्थिति का पूर्वानुमान कर लिया था।

  समाजवादी पृष्ठभूमि के नीतीश कुमार ने गत जून के मध्य में ं ही भाजपा का साथ छोड़ते हुए ऐसी आशंका व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि हम अपने बुनियादी उसूलों के साथ समझौता नहीं कर सकते चाहे इसका जो भी नतीजा हो। संभवतः वे यह भी इशारा कर रहे थे कि चुनाव हारने की कीमत पर भी देश को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर ले जाने के काम में मददगार नहीं बनेंगे।

    उससे पहले भाजपा ने पंजिम में 9 जून को बड़े जोशो -खरोस और भारी ताम झाम के साथ नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रधान बनाया था। ताजपोशी तो उनकी चुनाव अभियान समिति के प्रधान पद पर हो रही थी, पर लग रहा था कि उन्हें भावी प्रधान मंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जा रहा था।

     नरेंद्र मोदी ने बुर्के वाली बात कहकर अपने इरादे का खुलेआम प्रदर्शन कर दिया कि वे आखिर अपने चुनावी व राजनीतिक अभियान को किस तरीके से चलाना चाहते हैं।उन्होंने गत 14 जुलाई को पूणे में कहा कि अपनी विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए कांग्रेस धर्म निरपेक्षता के बुर्के के पीछे छिप जाती है। इस बयान पर विवाद उठना ही था।उठा भी।राजनीतिक और सांप्रदायिक माहौल गरमाया। मोदी की इस प्रतीकात्मक टिप्पणी को अल्पसंख्यकों ने किस रुप में लिया ?इसका जवाब भाजपा के ही एक अल्पसंख्यक नेता के बयान से मिल जाता है।

   भाजपा के ही  शाहनवाज हुसेन ने मोदी की इस टिप्पणी को ज्यों का त्यों नहीं दोहराया।बल्कि उन्होंने यह कहा कि कांग्रेस धर्म निरपेक्षता का कंबल ओढ़ कर गलत तरीके से वोट हथियाना चाहती है।बुर्के के बदले उन्होंने कंबल शब्द का इस्तेमाल किया।शाहनवाज को लगा होगा कि उनके मुंह से बुरका शब्द का इस्तेमाल अल्पसंख्यक पसंद नहीं करेंगे।

  यह और बात है कि बुर्के की चर्चा करने पर अल्पसंख्यक नेताओं ने कम बल्कि उन गैर-अल्पसंख्यक नेताओं ने ही अधिक तीखी प्रतिक्रियाएं जाहिर कीं जो अल्पसंख्यक मतों के सौदागर माने जाते हैं।ऐसे नेताओं के लिए नरेंद्र मोदी जैसे नेता चुनावी राजनीति में अनुकूल साबित होते हैं। सांप्रदायिक धु्रवीकरण का लाभ दोनों को मिलता  है।

  पर यशवंत सिंहा जैसे नेता भी इसके खतरे देख रहे हैं।अविभाजित बिहार के मूल निवासी होने के कारण सिंहा  अच्छी तरह जानते हैं कि अपवादों को छोड़ दें तो हिंदू मतदाता तो आम तौर पर जातियों में बंटे होते हैं,पर अल्पसंख्यक मतदाताओें में यदि भय पैदा होगा तो वे किसी एक ताकतवर  दल के पक्ष  में मजबूती से एकजुट हो जाएंगे।मजबूत दल अलग -अलग राज्य में अलग -अलग दल हो सकते हैं।

  क्या नरेंद्र मोदी  को ऐसे उद्गार प्रकट करने से कोई रोक पाएगा ? लगता तो नहीं है।क्योंकि ताजा खबर यह है कि जो कुछ मोदी जी कर रहे हैं,उनमें भाजपा के कुछ बड़े नेताओं के साथ -साथ संघ की भी सहमति है।इस बीच राम मंदिर का नारा भी एक बार फिर तेज कर दिया गया है।मोदी के अनन्य सहयोगी अमित शाह ने इसकी शुरुआत की है।उत्तर प्रदेश और बिहार के जातीय समीकरण के सामने भाजपा के विकास का मुद्दा नहीं चल पाने के कारण शायद ऐसा किया जा रहा है।

    आज नरेंद्र मोदी जिस तरह के उकसावापूर्ण भाषण दे रहे हैं और जिस गति से धार्मिक स्थलों का दौरा कर रहे हैं, वैसा वे नहीं भी करते तो भी उन्हें कोई राजनीतिक घाटा नहीं होता, ऐसा कुछ राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है। देश में ऐसे लोगों की संख्या अब कम नहीं है जो मनमोहन सिंह की कथित निकम्मी व भ्रष्ट सरकार से बुरी तरह उब चुके हैं। वे लोग लोग प्रधानमंत्री के पद पर नरेंद्र मोदी की तरह के ही एक सफल प्रशासक चाहते हैं। सन 2002 के दंगे के कारण भले नरेंद्र मोदी की एक खास छवि बन चुकी है, पर उनकी यह भी उपलब्धि गौर करने लायक है कि उन्होंने 2002 के बाद गुजरात में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं होने दिया। यदि 2002 के दंगे के लिए उन्हें दोषी माना जाता है तो दंगे नहीं होने देने का श्रेय भी उन्हें मिलना ही चाहिए। यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक दंगे रोकने का श्रेय मोदी को नहीं देना चाहता है तो उसे 2002 के दंगे के लिए भी उन्हें जिम्मेदार ठहराने का नैतिक  हक नहीं है।

 अक्सर बड़े दंगों के लिए चर्चित गुजरात में दंगे रोकने का काम कोई सफल प्रशासक ही कर सकता है।

  गुजरात विकास के मामले में पहले भी आगे था। पर नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद भी अपने शासन काल में उसे आगे बढ़ाया है। मोदी की कुछ विफलताएं हैं तो कई सफलताएं भी हैं। अनेक सर्वेक्षणों के अनुसार नरेंद्र मोदी अभी देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। ऐसे सर्वेक्षण नतीजे उनके बुर्के और हिंदू राष्ट्रवादी वाले बयानों से पहले ही आ चुके हैं।

   पर, शायद नरेंद्र मोदी को यह गलतफहमी है कि गुजरात के बाहर इस देश के लोग उन्हें एक कट्टर हिंदू के रूप में ही देखना चाहते हैं।

  जबकि अधिक सही बात यह है कि इस देश के अधिकतर लोग प्रधान मंत्री पद के लिए एक ईमानदार और कड़ा प्रशासक और सब तरह की संकीर्णताओं से दूर रहने वाला नेता चाहते हैं। क्योंकि यह विभिन्नताओं का देश है। यदि मोदी खुद को हिंदू राष्ट्रवादी के रुप में ही पेश करना चाहते हैं तो भी उन्हें सार्वजनिक रूप से यह कहने की कोई जरूरत नहीं। उनकी उपस्थिति और उनका नाम ही बहुत कुछ कह जाता है।

( 21 जुलाई 2013 )
       

बुधवार, 3 जुलाई 2013

भारत की पतली हालत देख जबर बन गया चीन


यह महज संयोग नहीं है। एक तरफ भारत में सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष कोयला घोटाले को लेकर आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर चीन हमारी सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा है। इन दोनों घटनाओं के बीच सीधा संबंध भी है।

कोयला घोटाला इस देश का कोई पहला घोटाला नहीं है। एक तरफ हमारे देश की सरकारें तरह -तरह के घोटालों में अपने संसाधनों को दोनों हाथों से लुटा रही हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी सरकार के पास अपनी सेना और अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए पैसे की भारी कमी है। हमें कमजोर मान कर चीन ज्यादती कर रहा है।

  चीन में यह कहावत भी है कि भारत सरकार अपने बजट के पैसों को एक ऐसे लोटे में रखती है जिसकी पेंदी में अनेक छेद हैं। जाहिर है कि ये छेदें घोटालों की  ही हैं।

  विस्तारवादी चीन के अपने 14 पड़ोसी देशों से सीमा को लेकर विवाद हैं। चीन ने रुस के साथ अपना सीमा विवाद 2004 और 2008 की बातचीत के जरिए हल कर लिया।

पर, भारत के साथ वर्षों से जारी अनेक वार्ताओं के बावजूद विवाद हल नहीं हो पा रहा है।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि चीन हमें एक कमजोर देश मानता है। दूसरी तरफ रुस कमजोर देश नहीं है। रुस जैसे देश में अपनी सीमाओं की रक्षा और आतंकवाद से लड़ने को लेकर कोई आंतरिक मतभेद भी नहीं है। पर  भारत में यह भी एक बड़ी समस्या है। चीन यह अच्छी तरह जानता है।

   गांवों में कोई दबंग व्यक्ति अपने कमजोर पड़ोसी की जमीन में अतिक्रमण कर लेता है। पर उसी दबंग का किसी दूसरे दबंग से पाला पड़ता है तो वह बैठकर आपस में बातचीत के जरिए समझौता कर लेता है।

   सन् 1962 में चीन के हाथों शर्मनाक पराजय के बावजूद भारत की सरकारों ने खुद को आर्थिक व सैनिक दृष्टि से मजबूत नहीं बनाया। यदि बनाया होता तो जिस तरह चीन ने रुस के साथ अपने सीमा विवाद हल कर लिये, उसी तरह भारत के साथ भी उसे किसी न किसी तरह का समझौता करना पड़ता।

   रिटायर सेना प्रमुख वी.के. सिंह ने अपने कार्यकाल में सरकार को लिखा था कि हमारी सेना के पास हथियारों की भारी कमी है।

क्या इस पर सरकार ने कुछ किया ? शायद कुछ नहीं।

यदि तुलनात्मक ताकत का ध्यान रखें तो चीन की सीमा पर भारतीय सैनिक तैनाती की स्थिति और भी खराब रही है। इस कमी को देखते हुए कुछ महीने पहले सेना ने रक्षा मंत्रालय के जरिए वित्त मंत्रालय को एक विशेष प्रस्ताव भेजा था। प्रस्ताव चीन की सीमा पर  भारतीय सेना को मजबूत बनाने के लिए था।

उस इलाके में सेना को आधुनिक हथियारों तथा साजो सामान से सुसज्जित करने के लिए 50 हजार करोड़ रुपये की जरूरत है। इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने के साथ ही वित्त मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय से एक अजीब सवाल भी पूछ दिया था। वह सवाल यह था कि क्या कुछ साल बाद तक भी सीमा पर चीन से खतरा आज की तरह ही बरकरार रहेगा?

 यह खबर अखबार में भी काफी प्रमुखता से छपी थी। हमारे देश के हुक्मरानों को उस खबर पर जरूर नजर गई होगी। इसके बावजूद उस पर क्या हुआ, यह अब तक पता नहीं चल सका है। चीन से खतरे की वास्तविकता की जानकारी वित्त मंत्रालय को किसी ने दी या नहीं, पता नहीं। पर, यह खबर इस बीच जरूर आ रही है कि चीन भारतीय सीमा का लगातार उल्लंघन कर रहा है।

इस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि यह तो स्थानीय मसला है। इसी तरह का जवाब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी संसद में दिया था जब पहली बार भारतीय भूभाग में चीनी घुसपैठ की खबर आई थी।

नेहरू ने कहा था कि जिस भूभाग की चर्चा की जा रही है, वहां घासकी पत्ती भी नहीं उगती। इस पर कांग्रेस के ही महावीर त्यागी ने कहा था कि मेरे सिर में तो एक भी बाल नहीं है तो क्या इस कारण मेरा सिर काट लोगे ?
  इस तरह जानबूझ कर अपनी सीमाओं की रक्षा में विफल नेहरू सरकार को 1962 के युद्ध में पराजय का अपमान झेलना पड़ा। जब चीनी फौज भारतीय सीमा में घुसती जा रही थी और फौजी साजो-सामान के अभाव में हमारी सेना पीछे हटती जा रही थी तो नेहरू ने बचाव में आने के लिए अमेरिका को कई पत्र लिखे। एक बार तो उन्होंने एक ही दिन में दो -दो पत्र राष्ट्रपति जाॅन एफ.कैनेडी को लिखे।

इस अपमान के बावजूद भारत की विभिन्न परवर्ती सरकारों ने भी सेना को इतना मजबूत नहीं किया ताकि हम विस्तारवादी पड़ोसी को वाजिब जवाब दे सकें। नतीजतन आज भी जब सीमा में जबरन घुसपैठ और उस पर भारत सरकार की अकर्मण्यता की खबर आ रही है तो पूरे देश में एक उदासी छाई हुई है।

 यह सही है कि चीन के साथ हमारा सीमा विवाद पुराना है। पर सीमावर्ती भूभाग पर हमारा दावा भी ऐतिहासिक कारणों से कमजोर नहीं है।  

  यह बात साठ के दशक में भारतीय संसद की चर्चाओं से भी प्रकट होती है। समाजवादी नेता व स्वतंत्रता सेनानी डा. राम मनोहर लोहिया ने एक बार भारत सरकार से सवाल किया था कि दुनिया में कौन सी कौम है जो अपने सबसे बड़े देवी-देवताओं में से एक को परदेस में बसाया करती है ?

याद रहे कि कैलास मान सरोेवर तिब्बत में है।

लोहिया ने कहा था कि चीन, तिब्बत पर अपना आधिपत्य जताने और जमाने के लिए तो अंग्रेजों को गवाह बनाता है, पर उन्हीं अंग्रेजों द्वारा तैयार मैकमोहन रेखा को चीन नहीं मानता।

एक बार एक दिलचस्प प्रकरण लोहिया ने लोकसभा में उठाया था। उन्होंने कहा था कि तिब्बत स्थित मनसर नामक गांव के लोग भारत सरकार को सन 1962 तक राजस्व देते थे। मनसर भारत-तिब्बत सीमा से 200 मील अंदर तिब्बत में है। इस पर कांग्रेस के वामपंथी सदस्य शशि भूषण ने लोहिया का मजाक उड़ाते हुए कहा कि वह राजस्व लोहिया जी को ही मिलता होगा। लोहिया ने जांच की मांग की। सरकार ने जांच कराई। लोहिया की बात सही पाई गई।

लोहिया के अलावा कई अन्य दिग्गज सांसदों ने भी 1950 के बाद से ही चीनी सीमा पर अपनी सैनिक तैयारी मजबूत करने के लिए भारत सरकार को आगाह किया था। पर आज तक भारत सरकार सचेत नहीं हुई है। लगता है कि इतिहास से कुछ भी नहीं सीखने की हमारे हुक्मरानों ने कसम खा ली है।

(साभार जनसत्ता ः एक मई 2013)


वोट बैंक के बीच बिहार में मोदी प्रेम की मंद बयार

 बिहार के महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव में जदयू उम्मीदवार की हार से जदयू और भाजपा के बीच कड़वाहट बढ़ गई है। दरअसल इस उपचुनाव पर भी नरेंद्र मोदी की अदृश्य छाया पड़ गई थी जो जदयू के लिए अपशकुन साबित हुई।

 महाराजगंज में जदयू के उम्मीदवार पी.के. शाही को महाबली लालू प्रसाद और बाहुबली प्रभुनाथ सिंह के साथ- साथ दिग्गज नरेंद्र मोदी की अदृश्य ताकत से भी एक साथ मुकाबला करना पड़ा था।

प्रतिष्ठा के इस चुनाव क्षेत्र में नरेंद्र मोदी की भी अदृश्य किंतु मजबूत उपस्थिति रही। ऐसा नहीं था कि लालू प्रसाद और नरेंद्र मोदी में कोई भीतरी तालमेल था। बल्कि नीतीश कुमार के मोदी विरोधी रुख से महाराजगंज चुनाव क्षेत्र के भी मोदी समर्थक सख्त नाराज थे। वे जदयू को सबक सिखाना चाहते थे। नरेंद्र मोदी समर्थकों में अब ऐसे लोग भी शामिल हो चुके हैं  जो भाजपा के सदस्य या समर्थक नहीं हैं। नरेंद्र मोदी बनाम नीतीश कुमार को लेकर बिहार भाजपा के कुछ नेताओं की राय जग जाहिर है। हालांकि सुशील कुमार मोदी सहित कई नेताओं ने जदयू के पक्ष में महाराजगंज में दिल से प्रचार भी किया था। पर, सरजमीन पर चुनाव को लेकर जदयू और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच कम ही तालमेल हो पाया।

   सन 2009 के लोकसभा चुनाव में महाराजगंज में बहुत ही कम मतों से राजद के उमाशंकर सिंह ने जदयू के प्रभुनाथ सिंह को हराया था। उमाशंकर सिंह के निधन से यह सीट खाली हुई थी। इस बार राजद के प्रभुनाथ सिंह ने जदयू के पी.के. शाही को एक लाख 37 हजार मतों से हरा दिया। मतों का भारी अंतर राजग खास कर जदयू के लिए चिंता का कारण बना हुआ है।

  अनेक मतदाता जो प्रभुनाथ सिंह से खुश नहीं भी रहे हैं, वैसे लोगों ने भी जदयू को सबक सिखाने के लिए राजद को इस बार वोट दे दिया। ऐसे लोग नीतीश कुमार के मोदी विरोधी रुख से नाराज हैं। ऐसे लोगों में भाजपा के कट्टर समर्थक तो शामिल हैं ही। जदयू उम्मीदवार पी.के. शाही का यह आरोप गलत नहीं लगता है कि असहयोग के कारण उनकी हार हुई है। असहयोग सिर्फ भाजपा समर्थकों की ओर से ही नहीं था। बल्कि कुछ स्थानीय जदयू नेताओं की ओर से भी शाही को पूर्ण सहयोग नहीं रहा। कहा जाता है कि जदयू के कुछ स्थानीय नेता अपना भी राजनीतिक भविष्य देख रहे थे। वे प्रभुनाथ सिंह से दुश्मनी मोल लेना नहीं चाहते थे। इसके बावजूद जदयू उम्मीदवार पी.के. शाही को 2 लाख 44 हजार मत मिले। इन मतों में भाजपा का योगदान कम ही रहा। इससे यह बात भी साफ है कि जदयू की भी अपनी एक ताकत है जो महाराजगंज सहित पूरे राज्य में भी फैली हुई है। यह ताकत विपरीत परिस्थिति में भी जदयू को काम आने वाली है।

  हालांकि महाराजगंज की स्थिति विशेष है। इसी तरह की एक विशेष राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति मेें 1994 में लोकसभा का उपचुनाव वैशाली में हुआ था। तब के सत्ताधारी दल जनता दल को निर्दलीय लवली आनंद के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा था। हालांकि एक ही साल बाद हुए बिहार विधानसभा के आम चुनाव में लालू प्रसाद यादव के दल को पूर्ण बहुमत मिल गया था।

   कोई माने या नहीं माने, पर देश के एक बड़े हिस्से में इन दिनों नरेंद्र मोदी की मंद बयार हवा बह रही है। उसमें जातीय, उप जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक की राजनीति वाला बिहार भी शामिल है।

यह हवा सिर्फ गुजरात दंगे में मोदी की कथित भूमिका को लेकर नहीं है। कुछ  अन्य तत्व भी हैं। एक तो मोदी की छवि कठोर प्रशासक की बन गई है और उन पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का कोई आरोप भी नहीं है। दूसरी ओर केंद्र सरकार में इन गुणों की भारी कमी है।

  जो लोग यह मानते हैं कि यह देश नक्सली हिंसा, आतंकवादी घटनाओं, व्यापक सरकारी भ्रष्टाचार, लुंजपुज शासन तथा सीमा की रक्षा के प्रति लापरवाही की समस्याओं से जूझ रहा है, उन्हें नरेंद्र मोदी से उम्मीद जग गई है। यह और बात है कि अंततः उनकी उम्मीदें पूरी होंगी या नहीं।

   स्वाभाविक है कि ऐसे लोग महाराजगंज में भी हैं। उन्हें मोदी के खिलाफ नीतीश कुमार का रुख अच्छा नहीं लग रहा है। ऐसे लोगों ने अपने कारणों से इस बार राजद को वोट दे दिये। जरूरी नहीं कि वे लोग 2015 में लालू प्रसाद के दल को बिहार की गद्दी सौंपने के प्रयास को भी मदद पहुंचा ही देंगे।

   नरेंद्र मोदी के खिलाफ नीतीश कुमार के राजनीतिक रुख का सैद्धांतिक आधार  है। पर, महाराजगंज का चुनाव नतीजा उन्हें यह बताने के लिए पर्याप्त है कि नरेंद्र मोदी का विरोध जदयू के लिए अगले चुनाव में महंगा पड़ सकता है। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि मोदी विरोध के बावजूद अल्पसंख्यकों के मत थोक में जदयू को मिल ही जाएंगे। यदि थोक वोट नहीं मिलेंगे तो भाजपा से अलग होने के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई जदयू कैसे कर पाएगा?

  हालांकि नीतीश कुमार ने यह भी कहा है कि वे अपने रुख पर कायम रहेंगे, भले इसके लिए उन्हें कोई भी राजनीतिक कीमत क्यों न चुकानी पड़े। यदि सचमुच कीमत चुकानी पड़ी तो इस तरीके से नीतीश कुमार का नाम इतिहास में दर्ज जरूर हो जा सकता है कि उन्होंने सिद्धांत के लिए गद्दी को खतरे में डाल दिया। ऐसे नेता देश में नहीं के बराबर हैं। पर वैसी स्थिति आई तो इसके साथ ही बिहार की जनता के उस हिस्से को भी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है जो लालू प्रसाद के दल के शासन की वापसी कत्तई नहीं चाहते।क्योंकि अनेक लोगों को लालू प्रसाद के इस वायदा पर कतई विश्वास नहीं है कि वे सत्ता में आने के बाद इस बार शांति व्यवस्था व विकास के लिए काम करेंगे। जिस तरह उत्तर प्रदेश में मुलायम -अखिलेश अपना यह वादा नहीं पूरा कर पा रहे हैं, उसी तरह इस वायदे को पूरा करना खुद लालू प्रसाद के हाथ में भी नहीं है।क्योंकि आरोप है कि उनके साथ शांति व विकास विरोधी लोग ही अधिक हैं।

  वैसे महाराजगंज की हार के कई और कारण भी हैं जिन पर सत्ताधारी जदयू को विचार करना होगा। महाराजगंज के आम राजपूत मतदाताओं के बीच इस बात को लेकर नाराजगी थी कि जदयू ने पहले की तरह उनके समुदाय के ही किसी नेता को टिकट नहीं दिया। सारण प्रमंडल में प्रभुनाथ सिंह जातीय पहचान के प्रतीक बन गये हैं।

हालांकि यह बात भी सच है कि जदयू ने इस बार राजपूत समुदाय से आने वाले जिस नेता को पहले टिकट का आॅफर किया था, उसने लड़ने से ही इनकार कर दिया।

 2009 में पराजय के बाद प्रभुनाथ सिंह क्षेत्र में सक्रिय रहे, लोगों से इस बार विनम्रता से बातें करते रहे और अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाते रहे।

  एक तरफ विधायक फंड के बंद होने और दूसरी ओर सरकारी दफ्तरों में जम कर घूसखोरी जारी रहने का असर राजग कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा। उनमें से अनेक लोगों ने इस चुनाव में वैसी सक्रियता नहीं दिखाई जैसी उन्हें दिखानी चाहिए थी। दूसरी ओर बाहुबली प्रभुनाथ सिंह की ऐसी छवि बनी हुई है कि वे अपने लोगों के काम के लिए सरकारी दफ्तरों पर खुद भारी दबाव भी बना सकते हैं।

   इधर इन दिनों किसानों को खेतिहर मजदूर कम मिल रहे हैं। ऐसा मनरेगा और राज्य सरकार की ओर से गरीब परिवारों को तरह- तरह के मदों में  मिल रही  भारी आर्थिक व अनाज की मदद के कारण हो रहा है। खेतिहर मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत बढ़ गई है। अनेक किसानों के एक बड़े हिस्से को यह लगता है कि सरकार किसानों की अपेक्षा खेतिहर मजदूरों की ही अधिक मदद कर रही है। ऐसे किसान भी महाराजगंज में प्रभुनाथ सिंह के काम आ गये।

  अब सवाल यह है कि क्या महाराजगंज का नतीजा लोकसभा व बिहार सभा के आगामी चुनावों में भी दोहराएगा ? यदि भाजपा और जदयू साथ- साथ रहे तो बिहार में इस गठबंधन को हराना किसी के लिए आसान नहीं होगा।

  अधिक लोगों की तो यही राय है कि वैशाली लोकसभा उप चुनाव की तरह महाराजगंज का एक विशेष स्थान है जहां प्रभुनाथ सिंह जैसे एक ताकतवर नेता हैं। हर जगह ऐसे दबंग व जमीनी नेता लालू प्रसाद को ंनहीं मिल सकते। ऐसी जातीय बनावट भी हर क्षेत्र में नहीं है।

 पर किसानों की वाजिब शिकायतों व बुनियादी जरुरतों पर भी राज्य सरकार को विशेष ध्यान देना होगा। हां, जिन अर्ध सामंती किसानों को इस बात का गुस्सा है कि नीतीश कुमार ने कमजोर वर्ग के लोगों का मन बढ़ा दिया है, तो उस मानसिक समस्या का हल तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं मिलेगा।

  नरेंद्र मोदी को लेकर बिहार जदयू और भाजपा के बीच बढ़ती खटास को देखते हुए इस पर कोई फैसला जल्द करना होगा अन्यथा बाद में देर हो जाएगी। क्योंकि इस बीच जदयू और भाजपा कार्यकर्ताओं व नेताओं के बीच भी कटुता बढ़ती जाएगी। इसका विपरीत असर साथ चुनाव लड़ने के बावजूद पड़ सकता है।

(संपादित अंश जनसत्ता के 7 जून 2013 के अंक में प्रकाशित)
 

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने ठीक ही कहा है कि चुनाव जीतना उनकी पार्टी का एकमात्र उद्देश्य नहीं है। बल्कि वैकल्पिक राजनीति खड़ी करना उनका लक्ष्य है।

इस लक्ष्य की राह पर चलने से आम लोगों को यह पता चलेगा कि सिद्धांतनिष्ठ राजनीति के रास्ते चल कर चुनाव भी जीता जा सकता है। अधिकतर मौजूदा राजनीतिक दल तो दबे स्वर से यह बताते या फिर संकेत देते रहे हैं कि कुछ-कुछ गड़बड़ी किये बिना चुनाव जीतना कठिन है क्योंकि आम लोग भी अब वोट देने के लिए पैसे मांगते हैं।

   आम आदमी पार्टी का यह भी दायित्व है कि वह अपने चरित्र और काम के जरिए इस कुप्रचार को आने वाले दिनों में गलत साबित कर दे।

पर, एक पार्टी के सिद्धांतनिष्ठ व जनाभिमुखी बने रहने के लिए यह जरूरी है कि उसके कुछ प्रमुख नेता खुद चुनाव नहीं लड़ें और अवसर मिलने पर भी किसी सरकारी पद पर नहीं बैठें। तभी पार्टी पर उनकी नैतिक धाक बनी रह सकेगी। इससे वे पार्टी के किसी भटकाव को रोक सकेंगे। क्या नवगठित ‘आप’ के कुछ बड़े नेतागण खुद ऐसा कर पाएंगे ? आज आर.एस.एस. की भाजपा पर धाक इसलिए भी कायम है क्योंकि संघ वाले खुद चुनाव नहीं लड़ते।

कांगे्रस और सी.बी.आई.

    आज मुलायम सिंह और मायावती पर सी.बी.आई. ने केस नहीं कर रखा होता तो केंद्र की मनमोहन सरकार स्थिर रह पाती ?

यदि सी.बी.आई. के निदेशक के पद पर यू.एन. विश्वास जैसे कर्तव्यनिष्ठ अफसर तैनात होते तो क्या मुलायम-मायावती का मनमोहन सरकार भयादोहन कर पाती ?

याद रहे कि सी.बी.आई. केंद्र सरकार के इशारे पर अदालत में कभी इन नेताओं के खिलाफ कड़ा रुख अपनाती है तो कभी नरम।

कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अल्पमत मनमोहन सरकार सी.बी.आई. के भरोसे ही चल रही है। ऐसे में केंद्र सरकार इसके निदेशक पद पर रणजीत सिन्हा को नहीं बैठाती तो आखिर किसे बैठाती ?

     आरोप लगाया गया था कि चर्चित चारा घोटाला केस में रणजीत सिन्हा की सहानुभूति आरोपित लालू प्रसाद के प्रति थी।यह भी कि  सिन्हा सी.बी.आई. के तत्कालीन संयुक्त निदेशक यू.एन. विश्वास के विरुद्ध जाकर काम कर रहे थे। तब सिन्हा सी.बी.आई. में ही थे। पटना हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया होता और विश्वास जैसे ईमानदार व निर्भीक अफसर उस घोटाले की जांच के प्रधान नहीं होते तो चारा घोटाला भी रफा-दफा कर दिया गया होता। सर्वदलीय चारा घोटाले को लेकर यू.एन. विश्वास ने अपनी जान हथेली पर लेकर ऐसा मजबूत केस तैयार कर दिया था कि आज उनमें से प्रत्येक केस में किसी न किसी आरोपित को कोर्ट से सजा मिल ही रही है।

   याद रहे कि बाद में रणजीत सिन्हा को यू.पी.ए.-वन की सरकार के रेल मंत्री लालू प्रसाद ने आर.पी.एफ. का प्रधान बनाया था। वह उनके रेल मंत्री रहने तक महानिदेशक पद पर बने रहे।

अब जबकि लोकपाल विधेयक पास होने जा रहा है तो ऐसे में भ्रष्टाचार से घृणा करने वाले किसी आई.पी.एस. अफसर को तो कांग्रेस सरकार सी.बी.आई. का निदेशक बना नहीं सकती थी। कांग्रेस की अपनी राजनीतिक मजबूरी भी तो है।

लोकपाल से डर क्यों ?

  समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने लोकपाल विधेयक का कड़ा विरोध करते हुए कहा है कि ‘हम लोकपाल की अवधारणा के ही खिलाफ हैं। चुनाव में जनता द्वारा चुने गये लोग बेइमान और और लोकपाल ईमानदार ? यह बात लोकतंत्र के आधार के ही खिलाफ है।’

   यानी नरेश अग्रवाल कहना चाहते हैं कि जो चुनाव जीत गया, उसे कानून से ऊपर मान लिया जाना चाहिए। ऐसा विचार रखने वाले वह देश के अकेले नेता नहीं हैं। फर्क यही है, वह सार्वजनिक रूप से यह बात बोल रहे हैं। बाकी लोग दबे स्वर से यह बोलते रहे हैं। हालांकि लोकपाल विधेयक पर लोकसभा में बहस के दौरान भी ऐसे कई स्वर फूटे थे जो नरेश अग्रवाल से मिलते जुलते थे।

 नब्बे के दशक मेंं बिहार के एक बड़े नेता से पूछा गया था कि आपने एक अपराधी को टिकट देकर सांसद क्यों बनवा दिया ? उसके जवाब में नेता जी ने कहा कि जिसे जनता ने जिता दिया, वह अब अपराधी कैसा ?

  आपातकाल में भी इंदिरा सरकार ने एक कानून लाने का विचार किया था। उसके अनुसार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित कुछ प्रमुख पदधारकों पर कोई  फौजदारी मुकदमा दायर नहीं हो सकता था। बाद में सरकार को सुबुद्धि आई और उस कानून को संसद से पास नहीं कराया गया। पर वह प्रस्तावित कानून आपातकाल की मानसिकता की देन थी। आज तो आपातकाल के बिना भी इस देश के कुछ नेतागण आपातकाल वाली मानसिकता रखते हैं और खुद को कानून से ऊपर मानते हैं। लोकसभा में पूर्ण बहुमत यदि ऐसे नेताओं को मिल जाए तो वे इंदिरा गांधी के उस अधूरे सपने को भी पूरा कर देंगे, ऐसा लगता है।

हर महीने तीन हजार

  एक अच्छी सलाह को मानने में केंद्र सरकार को पूरे दस साल लग गये। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के तत्कालीन सचिव एन.सी. सक्सेना ने दस साल पहले ही यह सुझाव दिया था कि गरीबों की मदद के लिए आवंटित पैसों को सीधे उन्हें मनिआर्डर के जरिए भिजवा दिया जाना चाहिए।

अब जाकर यह काम केंद्र सरकार करने जा रही है। यह एक अच्छा काम है। इसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है यदि इसे ठीक से लागू करा दिया जाए। गरीबों के बैंक खातों में सरकार द्वारा पैसे डाले जाएंगे। इस मद में केंद्र सरकार हर साल करीब 4 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी।

   अस्सी के दशक में भी तत्कालीन प्र्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि हम दिल्ली से सौ पैसे भेजते हैं, पर उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही लोगों तक पहुंचते हैं। बाकी पैसे बिचैलिये खा जाते हैं।

इस हिसाब से देखा जाए तो गत दस साल में कितने पैसे बिचैलियों ने लूट लिये? इस लूट के लिए कौन जिम्मेदार है ?  बैंकों के जरिए भेजे जाने वाले पैसे को  बिचैलिये से बचाने की जिम्मेदारी सरकार की होगी।

और अंत में

  केंद्र सरकार कहती है कि 2 जी स्पैक्ट्रम आवंटन में कोई घोटाला नहीं हुआ। तो फिर ए. राजा पर केस क्यों चल रहा है और वह लंबे समय तक जेल में क्यों रहे ?

(दैनिक प्रभात खबर में 26 नवंबर 2012 को प्रकाशित)

एक महाराजा लीक से हटकर

जयपुर के आखिरी महाराजा सवाई मान सिंह की कई विशेषताएं थीं। वह एक साथ कुशल प्रशासक, देशभक्त, सैनिक और खिलाड़ी थे।

वह न सिर्फ पोलो के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे, बल्कि दुनिया की दस सबसे सुंदर महिलाओं में से एक गायत्री देवी के पति भी थे। सन् 1958 में उनके नेतृत्व में भारत ने पोलो खेल में विश्व का स्वर्ण कप जीता था। पोलो खेलते समय हुई दुर्घटना में 24 जून 1970 को उनका निधन हो गया। निधन के समय उनकी आयु सिर्फ 58 साल थी।

21 अगस्त 1912 को जन्मे मान सिंह जयपुर के महाराजा लेफ्टिनेंट जनरल सवाई माधो सिंह के दत्तक पुत्र थे। सवाई मान सिंह पोलो मैच खेलते हुए अचानक अस्वस्थ हो गये। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। पर अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

इससे एक माह पहले भी एक पोलो मैच के दौरान वह गिर पड़े थे। तब उन्हें गहरी चोट लगी थी। पर एक माह के आराम के बाद वह फिर पोलो के खेल में जुट गये। राजपूत घरानों के इस नारे को कि ‘रण में लड़ते -लड़ते शहीद हो जाओ,’ उन्होंने पोलो के खेल में लागू कर दिया। पोलो का मैदान उनके लिए रणक्षेत्र था और उसी में वह शहीद हो गये। उनकी मौत महारानी गायत्री देवी के लिए एक बड़ा सदमा था।

कूच बिहार के महाराजा जितेंद्र नारायण की पुत्री गायत्री देवी से मान सिंह ने 1940 में प्रेम विवाह किया था। यह अंतरजातीय विवाह था। यह उनकी तीसरी शादी थी। इससे पहले की दो शादियां उन्होंने जोधपुर राजघराने में की थीं। जोधपुर के महाराजा सुमेर सिंह की बहन से मान सिंह की पहली शादी हुई थी। दूसरी शादी उनकी बेटी से हुई। गायत्री देवी से उनका परिचय तब हुआ था जब मान सिंह पोलो खेलने कलकत्ता गये थे और वह कूच बिहार के महाराजा के अतिथि थे।

मानसिंह के निधन के बाद गायत्री देवी को इंदिरा सरकार से कठिन संघर्ष करना पड़ा। आपातकाल में गायत्री देवी को सरकार ने जेल में बंद कर दिया था। बड़े अमानवीय तरीके से उन्हें जेल में रखा गया था। हालांकि उससे पहले वह 1962, 1967 और 1971 में लोकसभा की सदस्या रह चुकी थीं। प्राप्त मतों की संख्या की दृष्टि से उन्होंने रिकार्ड कायम किया था। गायत्री देवी का निधन सन 2009 में 90 साल की उम्र में हुआ।

मानसिंह को  7 सितंंबर 1922 को महाराजा सवाई माधो सिंह ने अपना उत्तराधिकारी बनाया था। पर जयपुर रियासत की सत्ता उन्होंने 1937 में संभाली। अपने शासन के दौरान उन्होंने लोगों की भलाई, सेवा और सहायता पर अधिक जोर दिया।

आजादी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रियासत को भारत में मिलाने का प्रस्ताव जब जयपुर महाराज के सामने रखा तो उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। याद रहे कि तब 565 रियासतें थीं जिन्हें मिलाया गया था।

याद रहे कि तब सभी राजाओं का रुख ऐसा नहीं था। जयपुर रियासत देश की सबसे बड़ी कुछ रियासतों में एक थी। उन्हें 18 लाख रुपये सालाना प्रिवी पर्स मिलता था जिसे बाद में इंदिरा गांधी सरकार ने समाप्त कर दिया। इनके अलावा हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर, बड़ौदा और पटियाला के पूर्व शासक ही दस लाख रुपये से अधिक प्रिवी पर्स पाते थे। हैदराबाद के पूर्व शासक को बीस लाख रुपये सालाना मिलता था। जयपुर महाराजा के विपरीत उन्हीं दिनों कुछ रियासतों ने भारत में विलयन में भारी हिचक दिखाई थी। हैदराबाद रियासत को तो पुलिस कार्रवाई के बाद हासिल किया गया था। संयोगवश उस पुलिस कार्रवाई का नाम दिया गया आपरेशन पोलो। पोलो जयपुर के पूर्व शासक का प्रिय खेल था।

जूनागढ़ के शासक भी विद्रोह की मुद्रा में थे। कश्मीर के महाराजा के तो आरंम्भिक इनकार के कारण पाकिस्तान को हमला करने का मौका मिल गया। ऐसे में विलय के प्रस्ताव को जयपुर  महाराजा द्वारा तुरंत स्वीकारने के रुख की  सराहना हुई थी।

जयपुर महाराज ने देश की नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लिया था। सवाई मान सिंह के बारे में प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक जाॅन गुंटर ने लिखा था कि वह अपने आप को नई परिस्थितियों में ढालने में ऐसे अभ्यस्त हो चुके थे जिस तरह वह पोलो खेल के दौरान अपने घोड़े बदलते थे।

पूर्व महाराजा के असामयिक निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने कहा था कि देश ने एक महान खिलाड़ी, एक योग्य प्रशासक और राजनीतिक खोया है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गायत्री देवी के नाम शोक संदेश भेजा था। उसमें उन्होंने सवाई मान सिंह के विभिन्न पदों की सेवाओं का जिक्र करते हुए अपनी संवेदना व्यक्त की थी।

उनके निधन की खबर सुनकर राजस्थान के विभिन्न हिस्सों से भारी संख्या में लोग जयपुर में इकट्ठे हो गये थे। तब के एक अखबार की खबर के अनुसार निधन के समाचार से सारे राजस्थान में मुर्दनी छा गई। गांवों और शहरों से भीड़ एकत्र हो गई। लोगों की आंखें इस प्रकार सूजी हुई थीं, जैसे कि उन्होंने अपना कोई बहुत ही करीबी रिश्तेदार खोया है। जयपुर के महाराज सचमुच एक इनसान थे जिनसे सभी प्रेम करते थे और आदर देते थे।

(प्रभात खबर में 23 नवंबर 2012 को प्रकाशित)

शनिवार, 24 नवंबर 2012

बाल ठाकरे की अंतिम इच्छा लीक से हटकर थी


    शिव सेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने गत 9 सितंबर को कहा था कि भाजपा की ओर से सुषमा स्वराज को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय राजनीति को लेकर बाल ठाकरे की यह संभवतः अंतिम इच्छा थी। भावी प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम के शोर के बीच बाल ठाकरे की यह संतुलित आवाज सामने आई थी।

   बाल ठाकरे की इस इच्छा पर उनकी विचार धारा या फिर उनकी रणनीति का कोई असर नहीं था।
याद रहे कि सुषमा स्वराज न तो महाराष्ट्र की हैं और न ही कट्टर हिंदुत्व की पैरोकार हैं। हालांकि वह आज भाजपा की राजनीति में भले घुल -मिल गई लगती हैं, पर मूलतः वह समाजवादी धारा की राजनीति से निकल कर भाजपा में आई हैं।

  बाल ठाकरे में सुषमा स्वराज को प्रतिभाशाली और बुद्धिमान बताते हुए कहा था कि वह एकमात्र नेता हैं जो इस पद के योग्य हैं। प्रधानमंत्री के रूप में वह अच्छा काम करेंगी।

बाल ठाकरे की इस राय पर भाजपा नेताओं ने तब सधी हुई प्रतिक्रिया दी थी। बलवीर पुंज ने कहा था कि हमारे दल में प्रधानमंत्री पद के कई योग्य उम्मीदवार हैं। श्री पुंज की प्रतिक्रिया वाजिब भी थी। क्योंकि जब तक पार्टी या फिर राजग में इस मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं हो जाता है, तब तक बाल ठाकरे की इस सलाह पर सार्वजनिक रूप से यही प्रतिक्रिया हो सकती थी।

वैसे भी भाजपा पर आर.एस.एस. के बढ़ते दबदबे के इस दौर में इस बात की उम्मीद कम ही है कि  भाजपा के बहुमत सुषमा के पक्ष में हो जाए। पर सहयोगी दल का क्या रुख होगा, यह अभी तय नहीं है। लोकसभा की चुनावी राजनीति के जानकार लोग बताते हैं कि यदि भाजपा नरेंद्र मोदी को भी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर चुनाव लड़े तो भी अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने बूते बहुमत नहीं मिलेगा। क्योंकि भाजपा करीब पौने तीन सौ सीटों पर ही पहले या दूसरे नंबर पर रहती आई है।

    हालांकि यह बात गौर करने की है कि बाल ठाकरे ने इस मुद्दे पर अपनी विचार धारा और राजनीतिक राय से अलग हट कर बात कही थी। उनके ऐसे संतुलित बयान शायद ही कभी आते थे।

 लगता है कि बाल ठाकरे ने सुषमा स्वराज के बारे में ऐसी राय संभवतः कई बातों पर ध्यान रख कर ही दी थी। उन बातों की चर्चा कुछ राजग नेताओं व राजनीतिक प्रेक्षकों की ओर से भी होती रहती है।

  जानकार सूत्रों के अनुसार जहां नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी का सर्वाधिक विरोध हो रहा है, उस बिहार के भी कुछ राजग नेतागण सुषमा स्वराज को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में हैं। पर वे अभी इसकी सार्वजनिक तौर पर मांग नहीं कर रहे हैं। वैसे तो इस बारे में अंतिम फैसला राजग को ही करना है, पर उम्मीदवारों की पात्रता को लेकर अभी से चर्चा स्वाभाविक हो चुकी है। सपा ने लोकसभा के अपने उम्मीदवारों की घोषणा करके ऐसी चर्चा को तेज कर दिया है।

    गंगा-यमुनी संस्कृति वाले देश में नरेंद्र मोदी के बारे में कुछ आशंकाएं कई लोगों के दिलो -दिमाग में हैं। हालांकि उनके खिलाफ कोई आरोप अदालत में अभी साबित नहीं हुआ है, पर मुख्य सवाल उनकी छवि को लेकर हंै। सबको साथ लेकर चलने की उनकी क्षमता पर भी प्रश्न चिह्न लगाये जाते हैं।

  दूसरी ओर यह कहा जाता है कि सुषमा स्वराज लोकसभा में भाजपा की नेता हैं। ब्रिटेन में तो प्रतिपक्षी दल अपना छाया मंत्रिमंडल भी बना लेता है। फिर प्रतिपक्ष के नेता को छाया प्रधानमंत्री यानी भावी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं माना जाना चाहिए ?

   वैसे भी सुषमा स्वराज समाजवादी पृष्ठभूमि की है जो नरंेद्र मोदी की पृष्ठभूमि से बिलकुल अलग है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार सुषमा स्वराज के पक्ष में एक बात यह भी है कि वह महिला हैं। इस देश में इंदिरा गांधी को महिला होने का भी राजनीतिक खास कर चुनावी लाभ मिला था। कुछ चुनाव विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सन 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बढ़त इसलिए भी मिल गई थी क्योंकि भाजपा की ओर से उस समय प्रधानमंत्री के उम्मीदवार एक गैर ब्राह्मण यानी लाल कृष्ण आडवाणी थे। उधर कांग्रेस के पास राहुल गांधी  थे। सुषमा स्वराज के उम्मीदवार होने के बाद यह लाभ कांग्रेस को अगली बार शायद नहीं मिल सकेगा क्योंकि सुषमा गैर ब्राह्मण नहीं हैं।

यह अकारण नहीं था कि गत विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कम सीटें व वोट मिले जबकि लोकसभा चुनावों में उसे अधिक सीटें व वोट मिल गये। बिहार में भी लगभग यही हुआ।

   बाल ठाकरे ने यदि सुषमा स्वराज का नाम सुझाया था तो इसलिए नहीं कि सुषमा ठाकरे की विचार धारा के करीब हैं। बल्कि ठाकरे को देश के चुनावी गणित और भाजपा के भीतर की गुटबंदी का अधिक ज्ञान था। कई बार दिल्ली से दूर बैठा व्यक्ति ऐसे मामले में निरपेक्ष ढंग से बेहतर निर्णय करने की स्थिति में होता है।

(जनसत्ता ः20 नवंबर 2012 से साभार)

बुधवार, 21 नवंबर 2012

कुनबापरस्ती में सबको पछाड़ा मुलायम ने

(जनसत्ता ः 17 नवंबर 2012 से साभार)


  राजनीति में परिवारवाद के मामले में मुलायम सिंह यादव ने नेहरू-इंदिरा परिवार को भी पीछे छोड़ दिया। लोकसभा के अगले चुनाव में मुलायम परिवार के चार सदस्य उम्मीदवार होंगे।

55 सीटों के उम्मीदवारों की सूची सामने आ जाने के बाद यह पता चला है। उत्तर प्रदेश की अस्सी में से 25 सीटों पर अभी समाजवादी पार्टी ने उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। संभव है कि उनमें से भी कुछ सीटें मुलायम परिवार के किसी सदस्य को मिल जाए। बड़े परिवार के कुछ सदस्यों को आप राजनीति में आगे बढ़ाएंगे तो अन्य बचे सदस्य भी कुछ पाने के लिए जिद कर देते हैं।

   नेहरू परिवार केंद्र की सत्ता में रहा है। कल्पना कीजिए कि मुलायम सिंह किसी दिन देश के प्रधानमंत्री बन जाएं तो फिर क्या होगा ? क्या चुनावी टिकट या फिर सत्ता की मलाई पाने से मुलायम परिवार का कोई सदस्य तब वंचित रहेगा ?

सबसे शर्मनाक बात यह है कि मुलायम सिंह यादव खुद को लोहियावादी कहते हैं। डा. राम मनोहर लोहिया राजनीति में परिवारवाद के भी घोर विरोधी थे। नई पीढ़ी के जो लोग डा. लोहिया को नहीं जानते हैं, वे लोहिया के बारे में क्या सोचेंगे जिनका नाम लेते मुलायम नहीं थकते? नई पीढ़ी के कुछ लोग यह सवाल कर सकते हंै कि क्या डा. लोहिया भी मुलायम सिंह यादव की तरह ही थे? याद रहे कि मुलायम सिंह यादव ने लोहिया के नाम पर उत्तर प्रदेश में अनेक स्मारक बनवाये हैं। बेहतर होगा कि वह और उनकी पार्टी की सरकार अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर ही स्मारक बनवाना अब शुरू कर दें। नेहरू-इंदिरा परिवार महात्मा गांधी से अधिक अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर ही स्मारक बनवा रहे हैं और सरकारी कार्यक्रम घोषित करवा रहे हैं। कांगेस पार्टी ने गांधी जी के चरित्र व विचार को ही कौन कहे, उनकी नीतियों उनके सपनों के भारत को भी भुला दिया है। यह एक अच्छी बात है। कम से कम आज के कांग्रेसियों को देखकर नई पीढ़ी यह सवाल तो नहीं करेगी कि क्या गांधी जी आज के कांग्रेसियों की तरह ही थे ?

क्या मुलायम सिंह यादव डा. लोहिया का नाम लेना अब भी बंद करेंगे जिन्होंने लोहिया की नीतियों को कूड़ेदान में डाल दिया है ?

सपा की ताजा सूची के अनुसार मुलायम सिंह यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव लोकसभा के लिए सपा उम्मीदवार होंगे। मुलायम सिंह, डिंपल यादव और धर्मेंद्र यादव मौजूदा लोकसभा के भी सदस्य हैं। अक्षय यादव राम गोपाल यादव के पुत्र हैं। राम गोपाल यादव राज्यसभा के सदस्य हैं। धर्मेंद्र मुलायम के भतीजे और डिम्पल पतोहू हैं।

   यदि मुलायम परिवार के चारों उम्मीदवार चुनाव जीत जाएं तो वह एक रिकार्ड होगा। नेहरू-इंदिरा परिवार के भी इतने सदस्य संभवतः एक साथ कभी दल, संसद व सत्ता के पद पर नहीं थे। हालांकि बारी-बारी से नेहरू-इंदिरा परिवार के जितने सदस्य विभिन्न पदों पर रहे, वह भी एक रिकार्ड ही है। पर वैसे भी केंद्र की राजनीति में गुंजाइश अधिक होती है।

एक राज्य का नेता होकर भी मुलायम सिंह ने राजनीति में परिवारवाद का इतना अधिक विस्तार किया है जो एक रिकार्ड है। उनकी इच्छा प्रधानमंत्री बनने की भी है। यह बात वह छिपाते भी नहीं हैं। पता नहीं अगले चुनाव में क्या होगा! खंडित जनादेशों के इस दौर में पता नहीं कौन कब प्रधानमंत्री बन जाए।

   यह बात सही है कि इस आजाद देश की राजनीति में परिवारवाद की शुरुआत जवाहर लाल नेहरू ने 1959 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवा कर की थी। तब वह खुद प्रधानमंत्री थे। लालू प्रसाद ने जब बिहार में परिवारवाद शुरू किया तो वह कहा करते थे कि हमारा परिवार बिहार का नेहरू परिवार है। अब तो देश में हर जगह परिवारवाद की धूम है। परिवारवाद की सबसे बड़ी बुराई यह है कि उत्तराधिकरियों में गुण नहीं बल्कि सिर्फ वंश वृक्ष देखा जाता है। इससे राजनीति और शासन को भारी नुकसान पहुंचता है। कल्पना कीजिए कि कल राहुल गांधी इस देश के प्रधानमंत्री बन जाएं। फिर इस देश का क्या होगा जिन्हें न तो देश की समझ है और न ही राजनीति या प्रशासन की ? अब तक के उनके भाषणों और कामों से तो कांग्रेसियों को छोड़कर किसी और को उनमें उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती।

   इसी तरह कल्पना कीजिए कि मुलायम परिवार के अधिकतर सदस्य एक दिन देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठ जाएं। फिर क्या होगा ? उत्तर प्रदेश में आज क्या हो रहा है जहां उनके पुत्र अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हैं ? उत्तर प्रदेश से आने वाले लोग कोई अच्छी बात नहीं बताते। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि राजनीति का परिवारवाद पता नहीं इस देश को कहा ले जाएगा!

इस पर अब मतदाताओं को ही विचार और फैसला करना होगा।

(जनसत्ता ः 17 नवंबर 2012 से साभार)