शनिवार, 4 नवंबर 2017

 नये रेल मंत्री पीयूष गोयल से लोगों की उम्मीदें बढ़ी हैं।उनके कदम भी 
अच्छाई की ओर बढ़ते लग रहे हैं।
  पर महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जो निर्णय वह कर रहे हैं,उनका कार्यान्वयन कितना हो रहा है ! 
हाल में एक खबर आई थी कि करीब 50 हजार गैंगमैन बड़े रेल अफसरों की ‘निजी सेवाओं’ में हैं।उन्हें उनके असली काम पर लगाने का आदेश नये रेल मंत्री ने दिया है।पर क्या वह आदेश लागू हुआ ? कितना लागू हुआ  ?
खबर है कि अनेक मामलों में लागू करने की खानापूरी भर हुई है।
क्या बाॅयोमेट्रिक हाजिरी के बिना ऐसे आदेश को लागू किया जा सकेगा ?
उसी तरह रेल मंत्री का ताजा निर्णय रेलवे बोर्ड के  90 अधिकारियों को 
जोन-डिवीजन में भेजने का है।असल काम तो जोन और डिविजन में ही होता है। 
 उम्मीद है कि रेल मंत्री अपने इस निर्णय को जरूर लागू करेंगे।वैसे  किसी मुख्यालय से कुछ बड़े अफसरों को उनकी इच्छा खिलाफ हटा देने का काम इस देश में आसान नहीं रहा  है। 

    विश्व खाद्य भारत - 2017 सम्मेलन एवं प्रदर्शनी में 
11 अरब डालर के सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद जताते हुए संबंधित केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने कल कहा कि इस देश में खाद्य प्रसंस्करण उद्योेग के क्षेत्र में बेहतर निवेश की संभावना है।
    यह अच्छी बात है कि हमारे शासकों का ध्यान कृषि की ओर जा रहा है।
 पर अब भी इस मामले में सरकार के मौजूदा प्रयास  नाकाफी है।
 इस देश में करीब 70 प्रतिशत लोग खेती पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से निर्भर हैं।
 आजादी के तत्काल बाद ही सरकार को चाहिए था कि वह 
किसानों की  आय तत्काल बढ़ा देने के उपाय पहले करती।
 उससे होता यह कि अधिकांश आबादी की क्रय -शक्ति बढ़ जा़ती।
उनकी आय बढ़ती तो वे कारखानों के उत्पाद को खरीदने लायक बनते।
 पर ऐसा नहीं हुआ।
पर कोई बात नहीं। देर आए, दुरूस्त आए।यह अच्छी बात है कि अब सरकार का ध्यान जा रहा है।
पर, इस मामले में मोदी सरकार का प्रयास  अधूरा ही लग रहा है।यदि आज से भी पूरे देश में युद्ध स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का विकास होने लगे तो किसानों की आय बढ़ेगी।क्योंकि तब खेती घाटे का सौदा नहीं रह जाएगी।फिर तो अन्य तरह के कारखानों की संख्या भी खुद ब खुद बढ़ती जाएगी।
  

  

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

  भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने वाली नरेंद्र मोदी 
 सरकार सी.बी.आई.को सशक्त बनाने के प्रति जरूरत के अनुपात में  जागरूकता नहीं दिखा रही है।
   सी.बी.आई.में फिलहाल करीब एक तिहाई पद खाली हैं जिनमें 1152 पदों पर तो जांच अधिकारी तक नहीं हैं।कुल 7274 पद सृजित हैं।इतने बड़े देश में यह संख्या भी नाकाफी है ।इस संख्या को देख कर लगता है कि यदि सर्वव्यापी भ्रष्टाचार की समस्या पहाड़ जैसी है तो सी.बी.आई.कर्मियों की संख्या चीटियों जैसी हैं।
 केंद्र  सरकार ने हाल में सी.बी.आई. में 598 नये पदों के सृजन की प्रक्रिया जरूर शुरू की है,पर आज की जरूरत के अनुपात में  वे अत्यंत नाकाफी हैं।रोज ब रोज कहीं न कहीं से सी.बी.आई.की जांच की मांग आती रहती है।क्योंकि लोगों का राज्य पुलिस पर भरोसा कम होता जा रहा है।कई मामलों में तो अदालतें ही जांच का भार सी.बी.आई.को सौंप देती हंै।
हाल में  खबर आई है कि सी.बी.आई.से संबंधित मुकदमों में सजा का  प्रतिशत 3 प्रतिशत घटा है। क्या मानव संसाधन की कमी के कारण ऐसा हो रहा है ?
फिर भी याद रहे कि सी.बी.आई.जितने मुकदमों का अनुसंधान करती है,उनमें से करीब 70 प्रतिशत मुकदमों में आरोपितों को अदालतों से सजा मिल जाती है।
  इस देश का दुर्भाग्य है कि इस मामले में राज्यों की  पुलिस का औसत प्रतिशत मात्र 45 है।बिहार का प्रतिशत तो 10 ही है।
 सी.बी.आई.में पदों की संख्या बढ़ाने से सरकार को जो अतिरिक्त खर्च आएगा,उसे सी.बी.आई.अपने कामों के जरिए  सूद सहित सरकार को लौटा देगी।
यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी अधिक कार्रवाई,सरकार के पैसों की उतनी ही अधिक बचत ! पता नहीं , यह मामूली बात केंद्र सरकार को क्यों नहीं समझ में आती है ?


  

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

सब्सिडी में लूट बंद,पर विकास योजनाओं में जारी !


 प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा है कि सब्सिडी के पैसे 
सीधे लाभुकों के बैंक खातों में भेजने से इस मद में 57 हजार करोड़ रुपए की सालाना लूट अब बंद हो गयी है।
 स्वाभाविक है कि इस लूट में पहले नीचे से ऊपर तक जो 
ताकतवर लोग हिस्सेदार थे, उन्हें मोदी का शासन इमरजेंसी की तरह ही लगेगा।
 पर मोदी जी, आपके साढ़े तीन साल के शासन के बावजूद खबर है कि सरकारी निर्माण और विकास योजनाओं में लूट कमोवेश  अब भी जारी है।
उसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अपवादों को छोड़ दें तो आपकी मनपसंद सांसद ग्राम विकास योजना बुरी तरह फेल हो गयी है।
 दरअसल सांसद ग्राम विकास योजना पहले से ही जारी तरह -तरह की सरकारी  योजनाओं के फंड से ही पूरी होनी थी।अलग से फंड नहीं दिया गया था।
पर पहले से जारी योजनाओं के उस फंड में से लगता है कि अधिकांश अब भी लूट लिए जाते हैं अन्यथा सांसद ग्राम विकास योजना में उन में से कुछ फंड तो  लगते ! कुछ काम तो दिखाई पड़ता।
  याद रहे कि केंद्र और राज्य सरकारों की  करीब दो सौ योजनाएं देश में चलती हैं।
 पर इस देश का दुर्भाग्य है कि प्रधान मंत्री द्वारा खास तौर पर रूचि लेने के बावजूद उन योजनाओं का कोई लाभ सांसद ग्राम विकास योजना को नहीं मिल सका।
  एक तरह से यह अच्छा हुआ।कम से कम मोदी सरकार को ‘जन्नत की हकीकत’ तो मालूम हो गयी होगी।
 अब मोदी जी चाहें तो सांसद ग्राम विकास योजनाओं की विफलता के कारणों की जांच के लिए पेशेवर और गैर राजनीतिक विशेषज्ञों की एक जांच टीम बना सकते हैं।
इस बहाने पहले से जारी योजनाओं में दशकों से जारी लूट की वास्तविक तस्वीर उन्हें मिल जाएगी।यदि कारणों का पता चल जाए तो जिस तरह सब्सिडी की लूट बंद की गयी ,उसी तरह उन योजनाओं के पैसों की लूट बंद करने के लिए भी मोदी सरकार कोई उपाय सोच सकती है।यदि वह चाहे तो !
  डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम चालू करने की सलाह संभवतः 2001 में ही एन.सी.सक्सेना ने दी थी।तब वे केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के सचिव थे।उन्होंने सब्सिडी में भारी लूट खुद अपनी आंखों से  देखी थी।उसे रोकने में सक्सेना भी खुद को लाचार मान रहे थे।क्योंकि उस लूट की छूट देने वाले उनके भी ऊपर के ‘प्रभु’ लोग थे। 
  जाहिर है कि  बीच की किसी भी केंद्र सरकार ने सक्सेना की सलाह नहीं मानी।भला कौन सरकार बिल्ली के गली में घंटी बांधती !प्रभु वर्ग द्वारा सालाना 57 हजार करोड़ रुपए की लूट को रोकना 
कोई मामूली बात तो थी नहीं।चलिए मोदी सरकार ने यह काम कर दिया।अच्छा किया।
 पर क्या मोदी जी विकास  योजनाओं में लूट बंद करने का भी साहस भी दिखा पाएंगे ?
यदि वैसा साहस दिखा देंगे तो वह एक दिन सांसद क्षेत्र विकास फंड भी बंद कर सकते हैं।इस फंड को मैं भ्रष्टाचारी रावण की नाभि का अमृत कुंड मानता हूंं।
राजनीति और उच्चस्तरीय प्रशासन को भ्रष्ट करने में सांसद क्षेत्र विकास योजना का बहुत बड़ा हाथ रहा है।
   
  

  आज मैंने पैथो तकनीशियन को बुला कर अपने और अपनी पत्नी के रक्त  के नमूने उसे दिए।
  सुगर, कोलोस्ट्राॅल ,लीवर, किडनी तथा एक अन्य  तरह की जांच करानी  है।उसने चार हजार रुपए लिए।ऐसा मैंने इस बात के बावजूद किया कि इस जांच से संबंधित  किसी रोग के लक्षण अभी प्रकट नहीं हुए हैं।
कल जांच रपट मिल जाएगी।उससे पता चल जाएगा कि कोई   रोग  चुपके -चुपके हमारे शरीर में ‘गृह प्रवेश’ कर चुका है  है या फिर शरीर के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है ! या फिर हम अब भी रोगमुक्त है ? वैसे तो कहा जाता है कि बुढापा भी अपने आप में एक बीमारी है।
यदि जांच रपट प्रतिकूल आएगी तो चोर की दवाई यथा संभव समय रहते कर दी जाएगी।
  कई बार रोग के लक्षण तो तब प्रकट होते हैं,जब देर हो चुकी होती है।
 दशकों से मैं नियमित रूप से ऐसी ही जांच करवाता
रहता हूं।पिछले साल जांच में जब कोलोस्ट्राॅल  बोर्डर लाइन पर दिखाई पड़ा तो उसके लिए मैंने आयुर्वेदिक दवांएं लीं - हृदयामृत और अर्जुनारिष्ट।
कुछ महीनों में तब नार्मल हो गया था।पता नहीं, अब क्या हाल है !
  मेरे कुछ मित्र-रिश्तेदार  इसे पैसे की बर्बादी बताते हैं।मुझे भी कहते हैं कि जब रोग का कोई लक्षण दिखाई पड़े तभी जांच कराइए।
मैं उनसे  कहता हूं कि पैसे का यही तो सदुपयोग है।
  समय -समय पर  कई लोगों ने मुझसे कहा कि फलां को तो कोई बीमारी  थी ही नहीं ,पर पता नहीं अचानक कैसे वह चल बसा ! मैंने जब उनसे पूछा कि क्या उसने  ब्लड प्रेसर की भी कभी जांच करवाई थी ? इस पर उन्होंने नकारात्मक जवाब दिया।@30 अक्तूबर 2017@
  

नरेंद्रदेव को सम्मान देने में विफल रहे नेतागण


     
देश में समाजवादी आंदोलन के भीष्म पितामह आचार्य नरेंद्र देव को इतिहास में उचित जगह दिलाने में कांग्रेस के साथ-साथ समाजवादी नेतागण भी विफल रहे।
  बाल गंगाधर तिलक और अरविंद घोष से प्रभावित होकर 1915 में सार्वजनिक जीवन में आए आचार्य नरेंद्र देव का कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना में प्रमुख योगदान था।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आचार्य जी जवाहर लाल नेहरू के साथ लगभग चार साल विभिन्न जेलों में रहे ।‘डिस्कवरी आॅफ इंडिया’ लिखने में आचार्य जी ने नेहरू की बड़ी मदद की थी।
  डा.राम मनोहर लोहिया की मशहूर पुस्तक ‘इंतिहास चक्र’ भी तभी लिखा जा सका था जब आचार्य जी ने यह काम लोहिया से जबरन करवाया।उन दिनों लोहिया जी आचार्य जी के आवास में ही रहते थे।चर्चा थी कि पुस्तक लिखने के लिए आचार्य जी ने लोहिया को  अपने घर के एक कमरे में कैद कर दिया  था।किताब पूरी होने पर ही उन्हें कहीं बाहर जाने दिया।
 इसके बावजूद बाद के वर्षों में जब  डा.लोहिया ने आचार्य जी की तीखी आलोचना कर दी,फिर भी आचार्य जी ने उसे बुरा नहीं माना ।हां,आचार्य जी के परिवार वालों को बहुत बुरा लगा था। 
इसके बावजूद आचार्य जी ने 1954 में आस्ट्रेलिया से पी.डी.टंडन को भेजे अपने पत्र में लिखा कि ‘डा.लोहिया के मुकदमे में क्या हुआ ?जब उन्हें तुम मिलना तो मेरी स्नेहमयी शुभकामनाएं देना।’
  उत्तर प्रदेश के सीता पुर में 30 अक्तूबर 1889 को जन्मे आचार्य जी के राजनीतिक शिष्यों में पूर्व प्रधान मंत्री चंद्र शेखर भी थे।आचार्य जी का 19 फरवरी 1956 को निधन हो गया।
  जवाहर लाल नेहरू ने अपने नातियों के नाम  आचार्य जी की सलाह पर ही राजीव और संजय रखे थे।
  पर जब 1988 में समाजवादियों ने यह प्रयास किया कि उनका जन्म शताब्दी समारोह राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाए तो केंद्र सरकार ने पूर्व समाजवादी सांसद गंगा शरण सिंह को लिखा कि ‘इस संबंध में केंद्र सरकार कुछ नहीं कर सकेगी।उत्तर प्रदेश सरकार इसमें रूचि लेगी।’
तब राजीव गांधी देश के प्रधान मंत्री थे।
   माक्र्सवाद और कम्युनिस्ट शासित देशों के बारे में  युगद्रष्टा आचार्य जी की भविष्यवाणी सटीक साबित हुई।
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की बिहार शाखा के गया अधिवेशन में 1955 में आचार्य जी ने कहा था कि ‘यांत्रिक आर्थिक प्रगति के साथ -साथ सोवियत नागरिक राजनीतिक बंधनों को अस्वीकार करने लगेंगे और सोवियत संघ लोकतंत्र की ओर बढ़ेगा। ’ उनका मत था कि  मानव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति  लोकतंत्र ही है।वे लोकतांत्रिक समाजवाद पर जोर देते थे।
आचार्य जी भारतीय संस्कृति और बौद्ध दर्शन के प्रकांड विद्वान थे और माक्र्सवाद के अध्येता भी ।
उन्होंने भारतीय प्राचीन परंपरा को माक्र्सवादी चिंतन से जोड़ा।पर, आचार्य जी ने यह भी कहा था कि ‘माक्र्सवाद कोई अटल सिद्धांत नहीं है। जीवन की गति के साथ वह भी बदलता रहता है।इसकी विशेषता क्रांतिकारी होना है।माक्र्सवाद की शिक्षा में हेरफेर करना उस समय तक संशोधनवाद नहीं है,जब तक इस परिवत्र्तन में आप उसके क्रांतिकारी तत्व को सुरक्षित रखते हैंं।’
  आचार्य  जी न तो उग्र थे और न ही अशिष्ट।
वे उन लोगों से अलग थे जो उग्र भाषा से अपनी क्रांतिकारिता का प्रदर्शन करते थे।
  वे नैतिक आचरण और शिष्टता को राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं के लिए जरूरी मानते थे।
आचार्य जी उत्तर प्रदेश विधान सभा, विधान परिषद और राज्य सभा के सदस्य रहे।वे 1954 में  प्रजा समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे।वे बी.एच.यू.सहित कई विश्व विद्यालयों के कुलपति भी रहे।
 पर उनके लिए पद को कोई खास महत्व नहीं था।
 1934 से 1947 तक ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ कांग्रेस के भीतर ही रहकर स्वतंत्रता की लड़ाई में सक्रिय थी।
  पर आजादी के बाद कांग्रेस ने  कहा कि कहा कि वे अपने संगठन को कांग्रेस में मिला दें क्योंकि यहां दोहरी सदस्यता नहीं चलेगी।
 आचार्य जी और उनके साथी कांग्रेस में मिलने के लिए  राजी नहीं हुए।
 वे लोग  कांग्रेस से अलग हो गए।
तब आचार्य नरेंद्र देव के संगठन के एक दर्जन सदस्य उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य थे।
 उन लोगों ने तय किया कि हम विधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा  दे देंगे क्योंकि हम कांग्रेस के टिकट पर जीते थे और अब उस दल में हम नहीं है।
  कुछ लोगों ने उन्हें समझाने की कोशिश की  कि अभी कांग्रेस की हवा है।आपके इस्तीफे के कारण फिर चुनाव होंगे और उसमें आप जीत नहीं पाएंगे।
  आचार्य जी आज के नेताओं जैसे तो थे नहीं।उन्होंने कहा कि चाहे हम हार जाएं, पर इस्तीफा देंगे ही।उन्होंने इस्तीफा दिया भी ।उप चुनाव हुए।एक को छोड़कर 11 पूर्व विधायक हार गए।अपराजित होने वालों में खुद आचार्य जी भी थे।
 आचार्य जी के क्षेत्र में कांग्रेस ने जानबूझ कर एक कट्टर हिंदूवादी को उम्मीदवार बना दिया था।उसने प्रचार किया कि आचार्य नरेंद्र देव नास्तिक हैं।इस प्रचार का भी असर हुआ।
इसके बावजूद आचार्य जी आजीवन अपने सिद्धांतों पर कायम रहे।
 ऐसे महा पुरूष को लोगों ंने लगभग भुला ही दिया।
----सुरेंद्र किशोर   
@ ‘फस्र्टपोस्ट’ हिंदी पर 30 अक्तूबर 2017 को प्रकाशित@   
    


रविवार, 29 अक्टूबर 2017

 चर्चित जाली स्टाम्प घोटाले के सजायाफ्ता कैदी अब्दुल करीम तेलगी का गुरूवार को बंगलुरू के अस्पताल में निधन हो गया।
गत तीस साल से वह  जेल में सजा काट रहा था।हाल में  जब बीमार पड़ा तो उसे अस्पताल लाया गया था।
 तेलगी पर आयकर विभाग के 190 करोड़ रुपए बकाया हंै।
  तेलगी का यह हश्र उसकी अपार धनलोलुपता के कारण हुआ।
   आय से अधिक संपत्ति एकत्र करने के आरोप में जे.जयललिता जब जेल में थीं तो उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया कि जेल से छूटने के बाद भी उसमें सुधार नहीं हो सका।और, गत साल दिसंबर में उनका असामयिक निधन हो गया।उनकी सारी धन -संपत्ति उनके पीछे रह गयी।क्योंकि कफन में तो जेब  होती नहीं।
  बिहार के चर्चित चारा घोटाले के एक अभियुक्त और कमिश्नर स्तर के अफसर रांची अदालत के बरामदे में दीवार से पीठ सटाये नीचे ही बैठे थे। रद्दी अखबार पर रखकर  भंुजा  खा रहे थे।उनकी देह पर  कपड़े भी ठीक -ठाक नहीं थे।चारा घोटाले से संबंधित मुकदमे की सुनवाई के सिलसिले में वे वहां गए थे।जब उनसे एक पत्रकार ने हालचाल पूछा तो उन्होंने रूंआसा होकर कहा कि ‘मेरी दुनिया में तो अंधेरा छा गया।’हाल में उनका भी विपन्नता में  निधन हो गया। 
  इस तरह के अन्य अनेक उदाहरण इस देश में भरे पड़े हैं।फिर भी इस गरीब देश में हर क्षेत्र में फैले प्रभु वर्ग की अपार धनलोलुपता कम नहीं हो रही है। घोटालेबाजों की धनलोलुपता का सीधा प्रतिकूल असर इस गरीब देश की अर्थ व्यवस्था पर पड़ रहा है।
नतीजतन 70 साल की आजादी के बाद भी इस देश की गरीबी का हाल यह है कि  20 करोड़ लोगों को हर रात भूखे सोना पड़ता है।
इसके  कारण  और निदान क्या हैं ?
कुछ तो मेरी समझ में आता है ।बाकी आप बताएं।