मंगलवार, 7 नवंबर 2017

श्रीबाबू के टाइम से ही बिहार का प्रशासन खोने लगा था अपनी चमक



         

श्रीबाबू के टाइम से ही बिहार का प्रशासन खोने लगा था अपनी चमक  
         
आम धारणा के विपरीत बिहार के प्रशासन में 1957 से ही गिरावट शुरू हो गयी थी।हालांकि तब गिरावट की गति धीमी थी।
  वैसे आम धारणा यह है कि 1967 में जब राज्य में गैर कांग्रेसी सरकारों का दौर शुरू हुआ , तभी से गिरावट शुरू हुई।
  पर 1977-78 में बिहार के मुख्य सचिव रहे 
1951 बैच के आई.ए.एस. पी.एस.अप्पू ने अपने व्यक्तिगत अनुभवोंे के आधार पर लिखा है कि गिरावट की शुरूआत 1957 के आम चुनाव के बाद से  ही शुरू हो गयी थी।
  लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक रह चुके अप्पू हर दम संविधान और कानून के साथ खड़े रहने वाले अफसर थे। 1929 मेें जन्मे अप्पू का 2012 में निधन हो गया।
उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया था।
अपने सेवाकाल में अपनी कठोर ईमानदारी के लिए चर्चित अप्पू साहब देश की अखिल भारतीय सेवाआंे में गिरावट,अवमूल्यन और विनाश पर करीब एक दशक पहले साप्ताहिक ‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ में लंबा लेख लिखा था।
 बिहार की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा कि आजादी के बाद के शुरूआती वर्ष में लोक प्रशासन के सुविख्यात विद्वान प्रो.पाॅल एपलबी 
राज्य की यात्रा पर आए थे।उन्होंने बिहार के प्रशासन को उसी रूप में पाया जैसा किसी संसदीय लोकतंत्र में होना चाहिए।
इसलिए उहोंने बिहार के प्रशासन को विश्व के सर्वोत्तम प्रशासनों मेें एक की संज्ञा दी । 
  खुद के अनुभवोें की चर्चा करते हुए अप्पू ने लिखा कि 1953 में मेरी तैनाती तत्कालीन मुख्य मंत्री के जिले में हुई थी।तब कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि मुख्य मंत्री का जिला है।बहुत नाजुक पोस्टिंग है।मुख्य मंत्री के खास लोग आपको परेशान करेंगे।धमकी भी देंगे।
 इस पृष्ठभूमि  में मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंहा ने मुझे एक दिन बुलाया और कहा कि ‘ कई लोग आपके पास जाकर मेरा नाम लेंगे।आप उनको विनम्रतापूर्वक सुन लीजिए।पर जो उचित लगे,वही कीजिए।मैं आपको कभी कुछ नहीं कहूंगा।’
  अप्पू ने इस नियम का पालन किया।पर उनके अनुसार सभी नेता श्रीबाबू जैसे नहीं थे।
 खुद श्रीबाबू के शासन के आखिरी दिनों के बदलते अंदाज की भी चर्चा अप्पू ने विस्तार से की है।यह 1957 के चुनाव के समय की बात है।
अप्पू का मानना है कि प्रशासन में धीमी गिरावट उसी समय से शुरू हो गयी।
  अप्पू ने लिखा कि 1957 के चुनावों में कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई।अनुग्रह नारायण सिंह के समर्थकों ने उन्हें मनाया कि वे पार्टी में श्रीकृष्ण सिंह को चुनौती दें।एक दूसरे को मात देने की होड़ में यह प्रतियोगिता एक विषाक्त शत्रुता में बदल गयी जिसमें तमाम तरह के हथकंडे अपनाए गए।यहां तक कि आॅफिस और घूस का भी लालच दिया गया।कांग्रेस विधायक दल के नेता पद के चुनाव में श्रीकृष्ण सिंह साफ बढ़ते लेते हुए जीत गए।लेकिन इससे बिहार की राजनीितक प्रक्रिया को भारी नुकसान पहुंच चुका था।
नेता पद के मुकाबले की पूर्व संध्या पर किए गए वायदों को पूरा करना श्रीकृष्ण सिंह की बाध्यता थी।
कई समर्थकों को ,जिनमें कई अप्रभावी व जनाधारविहीन लोग थे, उप मंत्री बना दिया गया।
इनके पास बहुत कम शक्तियां थीं,पर जल्द ही ये प्रशासन की राह में रोड़े अटकाने लगे, खास कर ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में।
  तत्कालीन मुख्य सचिव एल.पी.सिंह के प्रशंसक  अप्पू ने लिखा कि ‘तब तक एल.पी.सिंह केंद्रीय नियुक्ति पर जा चुके थे।
आई.सी.एस.,एम.एस.राव ने उनका स्थान संभाला।
पर वे दक्ष मुख्य सचिव साबित नहीं हो सके।
राव मुख्य मंत्री के साथ वह करीबी सद्भाव नहीं बना पाए ,जो एल.पी.सिंह को हासिल था।
  इसके अलावा अपने आखिरी दिनों में श्रीकृष्ण सिंह चंद निहितस्वार्थी तत्वों के एक गुट के प्रभाव में आ गए।
अब बिहार के प्रशासन में धीमी ही सही, गिरावट आनी शुरू हो गयी।
 हालांकि अब भी जब मुख्य सचिव या कोई अन्य वरीय अधिकारी कोई अनुचित निर्णय मुख्य मंत्री की निगाह में लाता था तो वे हस्तक्षेप करते थे और उसे दुरूस्त कर देते थे।
अब मैं पीछे मुड़ कर इन चीजों की पड़ताल करता हूं तो पाता हूं कि उन दिनों मैं बिना पक्षपात के प्रभावी ढंग से काम कर पाया तो वह श्रीकृष्ण सिंह जैसे व्यक्ति  थे जिनकी वजह से यह संभव हो पाया।’
 श्रीबाबू के निधन के बाद के वर्षों की चर्चा करते हुए अप्पू ने लिखा है कि ‘कई अफसर शक्तिशाली मंत्रियों के साथ गुट बनाने लगे और उनके बेजा कामों में साथ देने लगे।अब बिहार का प्रशासन अपनी चमक खोता जा रहा था।’    
    @यह लेख 7 नवंबर, 2017 को मेरे ‘भूले बिसरे’ काॅलम के तहत लाइवबिहार.लाइव में प्रकाशित@
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

आम धारणा के विपरीत बिहार के प्रशासन में 1957 से ही गिरावट शुरू हो गयी थी।हालांकि तब गिरावट की गति धीमी थी।
  वैसे आम धारणा यह है कि 1967 में जब राज्य में गैर कांग्रेसी सरकारों का दौर शुरू हुआ , तभी से गिरावट शुरू हुई।
  पर 1977-78 में बिहार के मुख्य सचिव रहे 
1951 बैच के आई.ए.एस. पी.एस.अप्पू ने अपने व्यक्तिगत अनुभवोंे के आधार पर लिखा है कि गिरावट की शुरूआत 1957 के आम चुनाव के बाद से  ही शुरू हो गयी थी।
  लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक रह चुके अप्पू हर दम संविधान और कानून के साथ खड़े रहने वाले अफसर थे। 1929 मेें जन्मे अप्पू का 2012 में निधन हो गया।
उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया था।
अपने सेवाकाल में अपनी कठोर ईमानदारी के लिए चर्चित अप्पू साहब देश की अखिल भारतीय सेवाआंे में गिरावट,अवमूल्यन और विनाश पर करीब एक दशक पहले साप्ताहिक ‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ में लंबा लेख लिखा था।
 बिहार की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा कि आजादी के बाद के शुरूआती वर्ष में लोक प्रशासन के सुविख्यात विद्वान प्रो.पाॅल एपलबी 
राज्य की यात्रा पर आए थे।उन्होंने बिहार के प्रशासन को उसी रूप में पाया जैसा किसी संसदीय लोकतंत्र में होना चाहिए।
इसलिए उहोंने बिहार के प्रशासन को विश्व के सर्वोत्तम प्रशासनों मेें एक की संज्ञा दी । 
  खुद के अनुभवोें की चर्चा करते हुए अप्पू ने लिखा कि 1953 में मेरी तैनाती तत्कालीन मुख्य मंत्री के जिले में हुई थी।तब कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि मुख्य मंत्री का जिला है।बहुत नाजुक पोस्टिंग है।मुख्य मंत्री के खास लोग आपको परेशान करेंगे।धमकी भी देंगे।
 इस पृष्ठभूमि  में मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंहा ने मुझे एक दिन बुलाया और कहा कि ‘ कई लोग आपके पास जाकर मेरा नाम लेंगे।आप उनको विनम्रतापूर्वक सुन लीजिए।पर जो उचित लगे,वही कीजिए।मैं आपको कभी कुछ नहीं कहूंगा।’
  अप्पू ने इस नियम का पालन किया।पर उनके अनुसार सभी नेता श्रीबाबू जैसे नहीं थे।
 खुद श्रीबाबू के शासन के आखिरी दिनों के बदलते अंदाज की भी चर्चा अप्पू ने विस्तार से की है।यह 1957 के चुनाव के समय की बात है।
अप्पू का मानना है कि प्रशासन में धीमी गिरावट उसी समय से शुरू हो गयी।
  अप्पू ने लिखा कि 1957 के चुनावों में कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई।अनुग्रह नारायण सिंह के समर्थकों ने उन्हें मनाया कि वे पार्टी में श्रीकृष्ण सिंह को चुनौती दें।एक दूसरे को मात देने की होड़ में यह प्रतियोगिता एक विषाक्त शत्रुता में बदल गयी जिसमें तमाम तरह के हथकंडे अपनाए गए।यहां तक कि आॅफिस और घूस का भी लालच दिया गया।कांग्रेस विधायक दल के नेता पद के चुनाव में श्रीकृष्ण सिंह साफ बढ़ते लेते हुए जीत गए।लेकिन इससे बिहार की राजनीितक प्रक्रिया को भारी नुकसान पहुंच चुका था।
नेता पद के मुकाबले की पूर्व संध्या पर किए गए वायदों को पूरा करना श्रीकृष्ण सिंह की बाध्यता थी।
कई समर्थकों को ,जिनमें कई अप्रभावी व जनाधारविहीन लोग थे, उप मंत्री बना दिया गया।
इनके पास बहुत कम शक्तियां थीं,पर जल्द ही ये प्रशासन की राह में रोड़े अटकाने लगे, खास कर ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में।
  तत्कालीन मुख्य सचिव एल.पी.सिंह के प्रशंसक  अप्पू ने लिखा कि ‘तब तक एल.पी.सिंह केंद्रीय नियुक्ति पर जा चुके थे।
आई.सी.एस.,एम.एस.राव ने उनका स्थान संभाला।
पर वे दक्ष मुख्य सचिव साबित नहीं हो सके।
राव मुख्य मंत्री के साथ वह करीबी सद्भाव नहीं बना पाए ,जो एल.पी.सिंह को हासिल था।
  इसके अलावा अपने आखिरी दिनों में श्रीकृष्ण सिंह चंद निहितस्वार्थी तत्वों के एक गुट के प्रभाव में आ गए।
अब बिहार के प्रशासन में धीमी ही सही, गिरावट आनी शुरू हो गयी।
 हालांकि अब भी जब मुख्य सचिव या कोई अन्य वरीय अधिकारी कोई अनुचित निर्णय मुख्य मंत्री की निगाह में लाता था तो वे हस्तक्षेप करते थे और उसे दुरूस्त कर देते थे।
अब मैं पीछे मुड़ कर इन चीजों की पड़ताल करता हूं तो पाता हूं कि उन दिनों मैं बिना पक्षपात के प्रभावी ढंग से काम कर पाया तो वह श्रीकृष्ण सिंह जैसे व्यक्ति  थे जिनकी वजह से यह संभव हो पाया।’
 श्रीबाबू के निधन के बाद के वर्षों की चर्चा करते हुए अप्पू ने लिखा है कि ‘कई अफसर शक्तिशाली मंत्रियों के साथ गुट बनाने लगे और उनके बेजा कामों में साथ देने लगे।अब बिहार का प्रशासन अपनी चमक खोता जा रहा था।’    
    @यह लेख 7 नवंबर, 2017 को मेरे ‘भूले बिसरे’ काॅलम के तहत लाइवबिहार.लाइव में प्रकाशित@
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

पूना पैक्ट के जरिए हुआ था अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण






          
महात्मा गांधी और डा.आम्बेडकर के बीच हुए पूना पैक्ट के जरिए अनुसूचित जाति के लिए विधायिका में आरक्षण की राह खुली थी।
 इन दोनों महान नेताओं के लिए वह पैक्ट बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आया था।
  यह पैक्ट यानी समझौता 24 सितंबर 1932 को पूना के यरवदा जेल में महात्मा गांधी और डा.आम्बेडकर के बीच हुआ था।आजादी की लड़ाई के दौरान उन दिनों महात्मा गांधी जेल में थे।
   उससे पहले ब्रिटिश सरकार ने  दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव दिया था।महात्मा गांधी ने यह कहते हुए उसका विरोध कर दिया था कि इससे हिंदू समाज टूट जाएगा।महात्मा गांधी ने 20 सितंबर 1932 को जेल में ही आमरण अनशन शुरू कर दिया ।दरअसल  ब्रिटिश सरकार ने पृथक निर्वाचक मंडलों के बारे में डा.आम्बेडकर का सुझाव मान लिया था।यह सुझाव गोलमेज सम्मेलन में डा.आम्बेडकर ने दिया था।
  डा.आम्बेडकर नहीं चाहते थे कि महात्मा गांधी इस सवाल पर आमरण अनशन करें।डा.आम्बेडकर ने तब कहा था कि ‘मैं विश्वास करता हूं कि महात्मा जी अपने जीवन और हमारे लोगों के अधिकारों में से किसी एक को पसंद करने के लिए मुझे नहीं खींचेंगे।क्योंकि मैं अपने लोगों को आने वाली पीढि़यों में हिंदुओं के लिए उनके हाथ -पैर बांध कर उन्हें कभी न सौंप सकूंगा।’ डा. आम्बेडकर का यह बयान बहुत कड़ा था।पर जब महात्मा गांधी ने अनशन शुरू कर दिया तो डा.आम्बेडकर पिघले।उन्होंने कहा कि ‘अनशन से समस्या उत्पन्न हो गई और वह समस्या थी कि गांधी जी के प्राण कैसे बचाएं जाएं।उनके प्राण बचाने का केवल एक ही उपाय था ,वह यह कि ‘कम्युनल एवार्ड’ को बदल दिया जाए जिसे गांधी जी कहते थे कि उससे उन्हें बड़ा आघात पहुंचा है। ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने इसे बहुत बार स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटिश मंत्रिमंडल अब उसे वापस नहीं लेगा न उसमें कोई परिवत्र्तन करेगा।बल्कि वे किसी ऐसे सिद्धांत जो सवर्ण हिंदुओं और अछूतों को मान्य हो,उसमें जोड़ने को थे।’
   डा.आम्बेडकर ने कहा कि ‘ यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि मैं ऐसी स्थिति में पड़ गया कि वैसी सांप -छछूंदर की स्थिति में शायद कोई न पड़ा होगा।बहुत घबराने की स्थिति थी।मुझे दोनों में से किसी एक विकल्प को चुनना था।मेरे सामने कत्र्तव्य था जो मानवता का बड़ा अंग था गांधी जी के प्राणों की रक्षा करना।दूसरी ओर मेरे सामने समस्या थी अछूतों के उन अधिकारों की रक्षा करने की जिन्हें प्रधान मंत्री ने दिए थे।
मैंने मानवता की पुकार का वरण किया और महात्मा गांधी के प्राणों की रक्षा की और कम्युनल एवार्ड में ऐसे परिवत्र्तन करने पर मैं सहमत हो गया जिस पर गांधी जी सहमत थे।’
    पूना  पैक्ट के नाम से चर्चित इस समझौते का मूल स्वरूप इस प्रकार से थाः
1. प्रातीय विधान सभाओं में सामान्य निर्वाचित सीटों में से दलित वर्गों के लिए सीटें सुरक्षित की जाएंगी जो निम्न प्रकार से होंगी।
मद्रास -30 ,बम्बई और सिंध -15 ,पंजाब-8 , बिहार और उडी़सा-18 ,सेंट्रल प्रोविंस -20 ,आसाम - 7 ,बंगाल - 30 ,यू.पी.- 20  यानी कुल 148  ।
 2. इन सीटों के लिए चुनाव संयुक्त निर्वाचन प्रणाली द्वारा किया जाएगा।
3. केंद्रीय व्यवस्थापिका में दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व समझौते के उपर्युक्त पारा- दो के अनुसार होगा जो संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के सिद्धांत पर होगा।
4.  केंद्रीय व्यवस्थापिका में दलित वर्गों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या 18 प्रतिशत होगी और उनका चुनाव भी उपर्युक्त पद्धति से होगा।
5 . अभ्यर्थियों के पैनल की प्राथमिक चुनाव व्यवस्था कें्रद्रीय तथा प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं के लिए -जिनका ऊपर उल्लेख किया गया है-प्रथम दस वर्षों के बाद समाप्त हो जाएगी।
इसके अलावा भी कुछ प्रावधान किए गए थे।
   पूना पैक्ट के नतीजे के बारे में डा.आम्बेडकर ने 1937 के चुनाव के बाद  लिखा कि प्रश्न है कि पूना समझौता करने से अस्पृश्यों को क्या लाभ मिला ?
इसे समझने के लिए हमें विधान मंडलों के लिए हुए चुनाव परिणमों की निरख-परख करनी होगी।भारत सरकार अधिनियम 1937 की व्याख्या के अनुसार नये विधान मंडलों के लिए चुनाव हुए।जहां तक अस्पृश्यों कव संबंध है,फरवरी 1937 में जो चुनाव हुए,वे पूना समझौते के अनुसार हुए।संयुक्त प्रांत में आरक्षित कुल 20 सीटों में से 16 सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों की जात हुई।
कुल मिलाकर देश की 151 सीटों में 78 सीटें कांग्रेस को मिलीं।’
 @ लाइवबिहार.लाइव में प्रकाशित मेरा लेख@




सोमवार, 6 नवंबर 2017

  मैं सुनता था कि ईश्वर की तरह इस देश में भ्रष्टाचार भी
सर्वव्यापी है।पहले यह बात मुझे एक कहावत भर लगती
थी।
लगता था कि किसी को  अपनी
बात को दमदार बनाना होता है तो वह ऐसा कह देता है।
पर, हाल के कुछ अनुभवों से अब लग रहा है कि वह सिर्फ  कहावत नहीं बल्कि  हकीकत है।हालांकि अपवाद तो सब जगह होते हैं।
बिहार के देहाती इलाके से मेरे एक रिश्तेदार ने एक माह पहले  फोन पर सूचना दी थी कि ‘ स्थानीय बैंक शाखा में  खाता खोलने के लिए  बैंक कर्मी ने मुझसे रिश्वत मांगी है।क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता ! कैसी सरकार है यह ?’
  एक परिचित कल पटना स्थित मेरे आवास पर आए।वह राजस्व कर्मचारी के यहां से लौट रहे थे।
मैंने उनसे कहा कि पहले तो  मालगुजारी  बहुत कम लगती थी। महंगी के अनुपात में उसमें बढ़ोत्तरी हुई है या नहीं ?
उन्होंने बताया कि बढ़ोत्तरी भी हुई है,पर एक नया खेल भी चल रहा है।
अब राजस्व कर्मचारी को रसीद काटने के लिए प्रत्येक रसीद पर सौ रुपए की रिश्वत भी देनी पड़ती है।उसके बिना वह रसीद काटेगा ही नहीं। 
  इसे ही कहते हैं लहर गिन कर पैसे कमाना ।
मेरी जानकारी के अनुसार बैंक खाता खोलने और मालगुजारी की रसीद कटवाने में रिश्वतखोरी की परंपरा संभवतः हाल में शुरू हुई है।
यानी जहां भी पहले काम मुफ्त में हो जाता था,वहां भी भ्रष्टाचार पहुंच चुका है।लगता है कि घूसखोर लोग पिछले  जन्म में कवि थे।कहा ही जाता है कि ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां जाए  कवि !’ कृपया कवि जी बुरा न मानेंगे।मैंने सिर्फ पहंुच
के मामले मेें यह तुलना की।अन्य मामलों में कत्तई नहीं।

अफसर जीवन काल में ही बन गए थे लोक चर्चाओं के विषय



         
  यह घटना उस समय की है जब 1951 बैच के आई.ए.एस.अफसर पी. एस. अप्पू लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक थे।
  एक प्रशिक्षु आई.ए.एस.अफसर ने सह प्रशिक्षु लड़कियों के साथ दुव्र्यवहार किया।इतना ही नहीं उन पर रिवाल्वर  भी तान दी।
  निदेशक ने उस उदंड प्रशिक्षु को बर्खास्त कर देने की सिफारिश कर दी।पर केंद्र सरकार ने अप्पू की सिफारिश को नहीं माना।
  इसके विरोध में अप्पू ने सेवा से इस्तीफा दे दिया।उन्हें साढ़े तीन साल बाद रिटायर होना था।
याद रहे कि अप्पू 2 अगस्त, 1980 से 1 मार्च, 1982 तक निदेशक पद पर रहे।
  न सिर्फ सेवा के अंतिम दिनों में बल्कि पूरे सेवा काल में अप्पू कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर बने रहे।
 इस्तीफे के बाद वह बंगलुरू  जाकर बस गए क्योंकि उस शहर के पास जमीन सस्ती थी।उन्होंने कोई दूसरा काम स्वीकार करने के बदले अपने आवास के अहाते में एक सौ तरह के गुलाब के पौधे लगाए।माचर्, 2012 में उनका निधन हो गया।
  बिहार काॅडर के आई.ए.एस. अफसर अप्पू ने दो किस्तों में कुल इक्कीस वर्षों तक बिहार की सेवा की।उनका सबसे अच्छा अनुभव डा.श्रीकृष्ण सिंहा के मुख्य मंत्रित्व काल के प्रारंभिक वर्षों का रहा।पर 1957 के बाद अप्पू ने श्रीबाबू के शासन काल में भी गिरावट देखी थी।
 अप्पू ने अपने संस्मरण में संविधान सभा में दिए गए सरदार पटेल के भाषण को याद किया है।सरदार साहब ने कहा था कि ‘ आज मेरा सचिव मेरे विचार के खिलाफ कोई नोट लिख सकता है।मैंने सभी साथियों को यह आजादी दी है।मैंने उन्हें बता दिया है कि यदि वे अपनी ईमानदार और सही राय इस आधार पर नहीं देते कि मंत्री साहब नाराज हो जाएंगे तो बेहतर होगा कि वे इस्तीफा दे दें।और मैं कोई दूसरा सचिव खोज लूंगा।’
  अप्पू ने सरदार पटेल के दिशा निदेश के तहत एक कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर की तरह पूरे सेवाकाल में  कत्र्तव्य निभाने की कोशिश की।
 पर सत्तर के दशक में तत्कालीन  मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर के साथ अप्पू के जो अनुभव रहे ,वे बिहार की शासन -व्यवस्था की पोल खोल देते हैं। 
अप्पू के शब्दों में ही जानिए तब के बिहार शासन का हाल !
‘कर्पूरी ठाकुर मुझे तब से जानते थे जब मैं उनके जिला दरभंगा का कलक्टर था।1967 में जब वे वित्त मंत्री थे तो मैंने उनके तहत वित्त सचिव का काम किया था।
 हम दोनों एक दूसरे का सम्मान करते थे। 1977 में मुख्य मंत्री पद संभालने के तत्काल बाद कर्पूरी जी ने मुझे बताया कि वे मुझे मुख्य सचिव बनाना चाहते हैं।
मैंने उनसे कहा कि अभी बिहार काॅडर में कार्यरत पांच अधिकारी मुझसे सिनियर हैं।उनमें से किसी को बना दीजिए।
पर एक सप्ताह बाद उन्होंने मुझे सूचित किया कि कैबिनेट की राय है कि मैं ही मुख्य सचिव बनूं।
 मैंने कहा कि एक अनुशासित सिविल सर्वेंट के रूप में उनकी आज्ञा मानने के अतिरिक्त मेरे पास कोई रास्ता नहीं है।
हालांकि मैंने यह भी जोड़ा कि प्रशासन बदतर हालत में है और तब ही मैं सक्षम होऊंगा ,जब वे यानी कर्पूरी ठाकुर कुछ शत्र्तें मानने को तैयार हों।शत्र्तें ये थीं कि वे मेरे द्वारा चुने हुए कुछ बेहतर अफसरों को कुछ प्रमुख पदों पर तैनात  करें।प्रचूर मात्रा में शक्तियां मातहत अधिकारियों को सौंपें।
उनके काम मेें किसी तरह का बेजा हस्तक्षेप न हो।
कर्पूरी जी ने सारी शत्र्तें मान लीं।
पर मुख्य सचिव का पद संभालने के कुछ ही दिन बाद मैंने पाया कि मुख्य मंत्री उन शत्र्तों को पूरा नहीं कर सकते थे।मैंने यह भी पाया कि वस्तुपरकता के आधार अफसरों की पोस्टिंग के लिए कैबिनेट को राजी करना कर्पूरी जी के लिए संभव नहीं था।
 अप्पू ने लिखा कि खास -खास पदों के लिए लाॅबिंग उन दिनों जोरों पर थी।मंत्री वैसे अफसरों की ताक में रहते थे जो या तो उनकी जाति का हो या फिर उनकी हर वाजिब-गैर वाजिब मांगों को पूरा करने में किसी तरह का ना -नुकूर न करे।
मंत्रियों द्वारा प्रायः दक्ष और बेहतर रिकाॅर्ड वाले अफसरों की अन देखी कर दी जाती थी।
भ्रष्ट और अकुशल अफसरों को पसंद किया जाता था।
कई अफसर लाॅबिंग के बूते मनचाही पोस्टिंग या तबादला पाने में कामयाब हो गए।
समय- समय पर जारी कई चेतावनियों के बावजूद दिन प्रति दिन  के प्रशासन में खास कर पोस्टिंग- ट्रांसफर से जुड़े मामलों में गैर जरूरी हस्तक्षेप बेरोकटोक बढ़ता गया।
प्रशासन का आत्म विश्वास पहले ही से गिरा हुआ था अब और गिरने लगा।
जब मैंंने यह महसूस किया कि प्रशासन में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रह गयी है तो अप्रैल 1978 में मैंने बिहार छोड़ दिया।
अखिल भारतीय सेवाओं में क्रमिक गिरावट, अवमूल्यन और विनाश का संक्षिप्त इतिहास लिखते हुए  अप्पू ने यह भी लिखा है कि किसी मंत्री या नौकरशाह ने इमरजेंसी का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटाई।साथ ही उन्होंने यह भी लिखा है कि अगर केवल डीजीपी, मुख्य सचिव और चंद पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने निडरता दिखाई होती तो गुजरात में नरमेध यज्ञ को रोका जा सकता था।’
@फस्र्टपोस्ट हिंदी  के मेरे साप्ताहिक काॅलम ‘दास्तान ए सियासत’ में 6 नवंबर 2017 को प्रकाशित मेरा लेख @



   
  

शनिवार, 4 नवंबर 2017

 नये रेल मंत्री पीयूष गोयल से लोगों की उम्मीदें बढ़ी हैं।उनके कदम भी 
अच्छाई की ओर बढ़ते लग रहे हैं।
  पर महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जो निर्णय वह कर रहे हैं,उनका कार्यान्वयन कितना हो रहा है ! 
हाल में एक खबर आई थी कि करीब 50 हजार गैंगमैन बड़े रेल अफसरों की ‘निजी सेवाओं’ में हैं।उन्हें उनके असली काम पर लगाने का आदेश नये रेल मंत्री ने दिया है।पर क्या वह आदेश लागू हुआ ? कितना लागू हुआ  ?
खबर है कि अनेक मामलों में लागू करने की खानापूरी भर हुई है।
क्या बाॅयोमेट्रिक हाजिरी के बिना ऐसे आदेश को लागू किया जा सकेगा ?
उसी तरह रेल मंत्री का ताजा निर्णय रेलवे बोर्ड के  90 अधिकारियों को 
जोन-डिवीजन में भेजने का है।असल काम तो जोन और डिविजन में ही होता है। 
 उम्मीद है कि रेल मंत्री अपने इस निर्णय को जरूर लागू करेंगे।वैसे  किसी मुख्यालय से कुछ बड़े अफसरों को उनकी इच्छा खिलाफ हटा देने का काम इस देश में आसान नहीं रहा  है। 

    विश्व खाद्य भारत - 2017 सम्मेलन एवं प्रदर्शनी में 
11 अरब डालर के सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद जताते हुए संबंधित केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने कल कहा कि इस देश में खाद्य प्रसंस्करण उद्योेग के क्षेत्र में बेहतर निवेश की संभावना है।
    यह अच्छी बात है कि हमारे शासकों का ध्यान कृषि की ओर जा रहा है।
 पर अब भी इस मामले में सरकार के मौजूदा प्रयास  नाकाफी है।
 इस देश में करीब 70 प्रतिशत लोग खेती पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से निर्भर हैं।
 आजादी के तत्काल बाद ही सरकार को चाहिए था कि वह 
किसानों की  आय तत्काल बढ़ा देने के उपाय पहले करती।
 उससे होता यह कि अधिकांश आबादी की क्रय -शक्ति बढ़ जा़ती।
उनकी आय बढ़ती तो वे कारखानों के उत्पाद को खरीदने लायक बनते।
 पर ऐसा नहीं हुआ।
पर कोई बात नहीं। देर आए, दुरूस्त आए।यह अच्छी बात है कि अब सरकार का ध्यान जा रहा है।
पर, इस मामले में मोदी सरकार का प्रयास  अधूरा ही लग रहा है।यदि आज से भी पूरे देश में युद्ध स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का विकास होने लगे तो किसानों की आय बढ़ेगी।क्योंकि तब खेती घाटे का सौदा नहीं रह जाएगी।फिर तो अन्य तरह के कारखानों की संख्या भी खुद ब खुद बढ़ती जाएगी।
  

  

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

  भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने वाली नरेंद्र मोदी 
 सरकार सी.बी.आई.को सशक्त बनाने के प्रति जरूरत के अनुपात में  जागरूकता नहीं दिखा रही है।
   सी.बी.आई.में फिलहाल करीब एक तिहाई पद खाली हैं जिनमें 1152 पदों पर तो जांच अधिकारी तक नहीं हैं।कुल 7274 पद सृजित हैं।इतने बड़े देश में यह संख्या भी नाकाफी है ।इस संख्या को देख कर लगता है कि यदि सर्वव्यापी भ्रष्टाचार की समस्या पहाड़ जैसी है तो सी.बी.आई.कर्मियों की संख्या चीटियों जैसी हैं।
 केंद्र  सरकार ने हाल में सी.बी.आई. में 598 नये पदों के सृजन की प्रक्रिया जरूर शुरू की है,पर आज की जरूरत के अनुपात में  वे अत्यंत नाकाफी हैं।रोज ब रोज कहीं न कहीं से सी.बी.आई.की जांच की मांग आती रहती है।क्योंकि लोगों का राज्य पुलिस पर भरोसा कम होता जा रहा है।कई मामलों में तो अदालतें ही जांच का भार सी.बी.आई.को सौंप देती हंै।
हाल में  खबर आई है कि सी.बी.आई.से संबंधित मुकदमों में सजा का  प्रतिशत 3 प्रतिशत घटा है। क्या मानव संसाधन की कमी के कारण ऐसा हो रहा है ?
फिर भी याद रहे कि सी.बी.आई.जितने मुकदमों का अनुसंधान करती है,उनमें से करीब 70 प्रतिशत मुकदमों में आरोपितों को अदालतों से सजा मिल जाती है।
  इस देश का दुर्भाग्य है कि इस मामले में राज्यों की  पुलिस का औसत प्रतिशत मात्र 45 है।बिहार का प्रतिशत तो 10 ही है।
 सी.बी.आई.में पदों की संख्या बढ़ाने से सरकार को जो अतिरिक्त खर्च आएगा,उसे सी.बी.आई.अपने कामों के जरिए  सूद सहित सरकार को लौटा देगी।
यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी अधिक कार्रवाई,सरकार के पैसों की उतनी ही अधिक बचत ! पता नहीं , यह मामूली बात केंद्र सरकार को क्यों नहीं समझ में आती है ?