गुरुवार, 8 नवंबर 2018

1999 में मैंने एक छोटी कार खरीदने के लिए पटना में एक बैंक से लोन लिया।
बैंक ने मेरी जमीन का कागज गिरवी रख लिया।
मेरे गारंटर ने मेरे लिए  एफ.डी.गिरवी रखी। 
  मैं हर महीने किस्त जमा कर ही रहा था कि एक दिन हमें वकील से नोटिस मिल गयी।आरोप था कि मैंने समय पर किस्त जमा नहीं की।
गारंटर को अधिक बुरा लगा।
मैंने बैंक मैनेजर को पत्र लिखा।कहा कि माफी मांगिए अन्यथा मैं आप पर केस करूंगा।उसने माफी मांगी।
 आज जब मैं देख रहा हूं कि लाखों करोड़ रुपए लोन लेकर बड़े- बड़े लोग डिफाॅल्टर हो रहे हैं और बैंक उनके नाम तक जाहिर करने के लिए तैयार नहीं हैं।
वास्तव में इस देश में दो तरह के ‘कानून’ हैं।

आज मेरे घर तीन बहनें लक्ष्मी,समृद्धि और शांति
आई थीं।वे मेरे फेसबुक फें्रड के पते पूछ रही थीं।
मैंने आप सबके पते उन्हें बता दिए। 
@7 नवंबर 2018@

बुधवार, 7 नवंबर 2018

गरमी के कारण उत्पन्न जल वाष्प ऊपर उठ कर 
आकाश में जाकर फैलता है।
फिर जब धरती को जरूरत होती है तो वह जल कणों में परिवत्र्तित होकर धरातल पर बरसता है। 
  कल्याणकारी सरकारों को भी चाहिए कि वे इसी तरह उचित  कराधान की गरमी पैदा कर ईमानदारी से राजस्व वसूले।
फिर जनता की जरूरतों के अनुसार उसे उसके राहत व विकास मदों में उदारतापूर्वक खर्च की बरसात करे ।
 चूंकि प्रकृति इस काम में ढिलाई नहीं करती,इसीलिए 
यह संसार चल रहा है।
उसी तरह सरकारें भी कोई कमजोरी न दिखाए अन्यथा एक दिन ..............।
  

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

एक शिखर सूना
-ओम थानवी-
दिल्ली की न्यू फ्रंेडस काॅलोनी की दस साल की रिहायश छोड़कर मैं गए साल गाजियाबाद की वसुंधरा बस्ती में चला आया तो उसकी एक वजह यह भी थी कि प्रभाष जी वहां बस चुके थे। बीस बरस उनके साथ काम किया,अब एक ही इमारत -जनसत्ता एपार्टमेंट्स-में साथ रहने का मौका मिलेगाःइससे खुशगवार अहसास किसी जनसत्ताई को दूसरा क्या हो सकता था !
  लेकिन वक्त की करवटें जब -तब बड़ी क्रूर होती हैं।सवा साल के साथ में जब लगने लगा कि  उनके साथ किसी नए रिश्ते का आविष्कार हो रहा है ,संपादक से अभिभावक बनते हुए वे बतरसी अंदाज में सामने आने लगे हैं,सहसा उन्होंने आंखें मूंद लीं।
 उनका निधन हिंदी समाज के लिए एक दुखद घटना है,मगर मेरे जैसे अनेकानेक शिष्यों के लिए एक हादसा ।
सहमति ही नहीं,असहमतियों में भी उनकी उपस्थिति हमारे लिए एक बड़ा संबल थी।एम्स के शव लेपन गृह से वसुधंरा के घर तक उनकी शिथिल देह ने जब उनके न रहने का संदेश पुख्ता कर दिया है,फिलहाल यह समझ पाना मुश्किल है कि ‘सांप्रदायिकता’ के मिजाज से लेकर शब्दों के भेद और कुमार गंधर्व या मल्लिकार्जुन मंसूर की तानों के अर्थ समझने के लिए अब कोई कहां जाएगा ?
  प्रभाष जी के काम,उनके योगदान का मूल्यांकन आने वाले वक्त में होगा।
पर विदाई की घड़ी में उनके व्यक्तित्व की कुछ छवियां बरबस याद आती हैं।
मेरे नजदीक सबसे अहम रहा है भाषा के प्रति उनका सरोकार।उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की खांचों में बंधी भाषा को तोड़ा।
उनका प्रयोगधर्मी रुख ‘प्रजानीति’ और ‘आसपास’ के दिनों में भी दिखाई देता था,लेकिन ‘जनसत्ता’ उन्होंने एक नए भाषाई तेवर के साथ शुरू किया।
सहयोगियों को उन्होंने सहज, सीधी और मारक भाषा में लिखने की बाकायदा दीक्षा दी।
कभी -कभी उनके कुछ प्रयोग चर्चा का विषय भी बने।लेकिन इसमें शायद ही किसी को शक हो कि ‘उल्लेखनीय है’ जैसे एकरस जुमलों वाली हिंदी आज की पत्रकारिता में हर तरफ ‘मालूम हो-खयाल रहे’ का स्वीकार अर्जित कर चुकी है। 
  उस सरल,बोलचाल वाली हिंदी में उन्होंने पत्रकारिता में विचार की जगह बनाई ः यह उनका भाषा के खाते में दूसरा यश।
 वे भवानी बाबू के मुरीद थे ,कविता की कवि लोग जानें,पत्रकारिता में वे वही भाषा लिखते और लिखवाते थे,जो हम बोलते हैं।
जिन्होंने उन्हें सभाओं में बोलते हुए सुना है,वे जानते हैं कि उनके बोले हुए को कागज पर हू ब हू उतार कर छापा जा सकता था।और तो और,उनकी हस्तलिपि में भी एक सुघड़ लय थी।
  सहज हिंदी में यह सार्थक -पत्रकारिता का आगाज था।
अफसोस यही है कि हिंदी में यह सिलसिला कायम न हो सका। अरसे तक अखबारों में वही नीरस और कागजी हिंदी बनी रही।@जारी@     
--5 नवंबर, 2009 को निधन के तत्काल बाद ओम थानवी ने प्रभाष जोशी को इन शब्दों में श्रद्धांजलि दी।               

एक शिखर  सूना 
-ओम थानवी-
फिर प्रभाष जी के देखते- देखते, हिंदी में अंग्रेजी घालमेल वाली ऐसी फूहड़ भाषा दाखिल हो गई जो लिखने वालों को रास आती थी और टी.वी.रेडियो पर बोलने वालों को भी।
इस भाषा में विचार भरी पत्रकारिता हो सकती है,इसमें संदेह करने की हजारहां वजहें हैं।यह अकारण नहीं है कि भाषाई फूहड़ता के साथ पत्रकारिता में नैतिक पतन का मुद्दा उन्हें आखिरी दिनों में सबसे ज्यादा सालता रहा।
  मुझे अच्छी तरह याद है एक दफा स्व.राजेंद्र माथुर ने मुझे अपने घर ले जाते वक्त रास्ते में मुस्कराते हुए कहा था-मैं अपने अखबार में वह काम करना चाहता हूं जो जनसत्ता कर रहा है।
उस वक्त मैं राजस्थान पत्रिका में काम करता था और माथुर साहब मुझे दिल्ली आने का न्योता दे रहे थे।मैं उनके साथ नहीं जुड़ पाया ,इसकी अलग दास्तान है।लेकिन हिंदी के और अखबारों में व्याप्त बेचैनी की इशारा करने वाला यह प्रसंग मुझे मौके -बेमौके याद आता है और कचोटता है।
   भाषा के साथ विचार के हलके में प्रभाष जी के अनूठे काम का एक श्रेष्ठ उदाहरण सांप्रदायिकता की राजनीति पर उनकी लोहार वाली चोटें हैं।हिंदुत्व के नाम पर हुए खून खराबे और वोट की राजनीति पर जितना साफ और बेलौस उन्होंने लिखा,किस और पत्रकार ने लिखा होगा ?
गांधी जी के अनुयायी वे इस अर्थ में भी थे कि आस्थावान धार्मिक थे ,पर धर्म की राजनीति के जैसे जानी दुश्मन।
इसके खिलाफ उन्होंने जमकर लिखा।कभी इस तेवर की वजह से उन्हें सशंकित या भयभीत नहीं देखा।
उन्होंने कभी सुरक्षाकर्मी नहीं रखे,न किसी जलसे में यह कहने से हिचके जो वे लिखते भी थे।
   उनके निडर अंदाज का एक अनुभव याद करना मौजूं होगा।तब मैं जनसत्ता के चंडीगढ़ संस्करण का संपादक था।
आतंकवाद चरम पर था।
आतंकवादियों ने पत्रकारों के लिए तानाशाही की एक आचार संहिता घोषित की।
मैंने दिल्ली आकर प्रभाष जी से बात की।उन्होंने ‘द ट्रिब्यून’ के प्रधान संपादक की राय जानने के लिए फोन मिलवाया।
उधर से यह सुनने को मिला कि आचार संहिता लागू करने की आखिरी तारीख भले दूर हो ,वे उसे लागू कर चुके हैं।
पंजाब के सबसे बड़े अखबार के इस समर्पण पर प्रभाष जी कुछ देर तक मौन रहे।फिर बोले,‘इन @आतंकवादियों@ की ऐसी तैसी।जब हम वहां चंडीगढ़ से अखबार निकाल रहे हैं तो कीमत चुकाने को भी तैयार रहना चाहिए।’
और आचार संहिता उन्होंने बगल की रददी की टोकरी के हवाले कर दी।
  जैसा कि महान शख्सियतों में होता है,प्रभाष जी में कुछ चीजों को लेकर दीवानापन था और कुछ अंतविरोध भी थे।
संगीत और क्रिकेट के लालित्य को उन्होंने दिल से पहचाना था।कुमार गंधर्व को वे कार से लेकर रसोई तक में डूब कर सुन सकते थे।
स्वभाव से भावुक थे।अक्सर आंखें छलछला आती थीं।बाइपास सर्जरी के बाद यह भावुकता बढ़ी।पर,वे कहते थे-यार,रोएंगे नहीं तो जीएंगे कैसे !
सुनते हैं कि ,गुरुवार की रात सचिन तेंदुलकर के आउट होने पर उनके दिल की धड़कन गड़बड़ा गई।हालांकि उनके अजीज दोस्त हरिकृष्ण दुआ ने ऐसा नहीं माना।उन्होंने कहा कि सचिन की पारी देखकर वे खुश ही हुए होंगे,आहत नहीं।
असल तनाव लगातार हो रहे सफर का रहा होगा।
  सफर सचमुच उन्हें आराम की जगह नहीं देता था।
चार रोज पहले पटना में जसवंत सिंह की किताब के हिंदी संस्करण का लोकार्पण किया ।फिर लखनऊ गए।वहां से बनारस।वहां दिल में हलचल महसूस की।पर दिल्ली लौटकर कल मणि पुर जाने वाले थे।
  यह उनके जीवट का उदाहरण है।और कुछ लापारवाह तबीयत का भी।
कहते थे,अभी बहुत कागद कारे पचहत्तर की उम्र तक करूंगा,बाद में बचा हुआ काम।
लेकिन इसके लिए जरूरी अनुशासन उनमें कहां था ।
अक्सर रेल या विमान आखिरी घड़ी में ही पकड़ते थे।
कार्यक्रमों में देर से पहंुचते थे।
मगर ललित तबीयत के धनी शख्स से हम नीरस अनुशासन की उम्मीद ही क्यों कर सकते हैं !
  जो हो, हिंदी की दुनिया आज वैसी नहीं रही जैसी कल थी।
उनका जाना सचमुच एक शिखर का सूना करके जाना है।
कद्दावर संपादक हिंदी के इतिहास में बहुत हुए हैं।पर प्रभाष जी हमारे दौर की हिंदी पत्रकारिता का कद आप थे ।
@समाप्त@
--5 नवंबर, 2009 को निधन के तत्काल बाद ओम थानवी ने प्रभाष जोशी को इन शब्दों में श्रद्धांजलि दी।               








बी.वाई.राघवेंद्र,
मधु बंगरप्पा,
और महिमा पटेल।
ये तीन नाम हैं।
तीनों में क्या समानताएं है ?
 तीन मुख्य समानताएं हैं।
तीनों कर्नाटका के हैं।
ये तीनों, तीन पूर्व मुख्य मंत्रियों के पुत्र हैं।
तीनों सिमोगा लोक सभा चुनाव क्षेत्र में एक दूसरे 
के खिलाफ उप चुनाव लड़ रहे हैं। 
3 नवंबर को वोट डाले जा चुके हैं।
6 नवंबर को मतों की गिनती होगी।
इनके पिता के नाम हैं क्रमशः
बी.एस.येदियुरप्पा-भाजपा,
एस.बंगरप्पा-जेडी एस.
 और जे.एच.पटेल-जे.डी. यू।
इस देश में संभवतः ऐसा दूसरी बार हो रहा है कि तीन पूर्व मुख्य मंत्रियों के पुत्र एक ही लोक सभा चुनाव क्षेत्र में एक दूसरे के खिलाफ  लड़ रहे हैं।
इससे पहले 2004 में हरियाणा के  भिवानी लोक सभा क्षेत्र में 
भजन लाल,बंसी लाल और ओ.प्र.चैटाला के पुत्र आपस में भिड़े थे।उनके नाम थे क्रमशः कुलदीप बिशनोई,सुरेंद्र सिंह और अजय चैटाला।
अब सवाल है कि सिमोगा क्षेत्र का कोई राजनीतिक कार्यकत्र्ता किस उम्मीद में उस क्षेत्र में सक्रिय होगा ?
उसे तो अब लोक सभा का टिकट मिलेगा नहीं।
  हां,एक उम्मीद में कार्यकत्र्ता जरूर इन दलों से जुड़ सकते हंै।
उन्हें सांसद फंड की ठेकेदारी जरूर मिल सकती है।
पर, आखिर इस उपाय से  कितने कार्यकत्र्ता मिलेंगे ?
 फंड की रकम तो अभी सालाना 5 करोड़ रुपए मात्र  है।
कोई बात नहीं,केंद्र में जब अगली सरकार बनेगी तो केंद्र सरकार 5 से बढ़ा कर 25 करोड़ तो कर ही सकती है।ऐसी सिफरिश संसदीय समिति कर भी  चुकी है।हालांकि कुछ हलकों से मांग 50 करोड़ रुपए की भी उठी है।
फिर तो ठेकेदार-सह कार्यकत्र्ता-सह-बाहुबली की भला कहां कमी रह जाएगी ! ? 
कुछ लोग पूछते हैं कि क्या किसी नेता के पुत्र को चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है ?
अब तो सवाल यह है कि क्या आम राजनीतिक कार्यकत्र्ता को चुनाव लड़ने का अधिकार बचा हुआ है ? कम से कम सिमोगा में ?
डायनेस्टिक डेमोक्रेसी जिंदाबाद !


रक्षा मंत्री मुलायम सिंह ने क्यों गायब करा दी थी बोफर्स सौदे की फाइल ?
         ----सुरेंद्र किशोर
संयुक्त मोर्चा सरकार के मंत्री मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि ‘मैं जब रक्षा मंत्री था तो बोफर्स मामले की फाइल गायब करा दी थी।’
  इसका कारण बताते हुए उन्होंने  कहा कि 
‘राजनीतिक लोगों पर बदले की भावना से कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।सियासी लोग जेल जाएंगे तो राजनीति कैसे होगी ?’
  18 अगस्त, 2016 को श्री यादव लखनऊ में डा.राम मनोहर लोहिया नेशनल लाॅ विश्व विद्यालय के स्थापना समारोह में बोल रहे थे।
  अब सवाल है कि यदि वह फाइल गायब नहीं होती तो बोफर्स मामले में कुछ प्रभावशाली लोग जेल जाते ?कौन -कौन जाते ?
एक अन्य प्रसंग में मुलायम सिंह यादव ने यह भी कहा था कि अमर सिंह ने मुझे जेल जाने से बचा लिया था।
क्या अमर सिंह कोई अदालत हैं ?
क्या किसी रक्षा मंत्री को किसी संवदेनशील सरकारी फाइल को गायब करा देने की छूट मिलनी चाहिए ?
 अजय अग्रवाल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जब बोफर्स मामले की सुनवाई करेगा तो इन बिन्दुओं पर क्या विचार होगा ?
इस देश के प्रभावशाली नेता लोग एक दूसरे को जेल जाने से बचाते रहेंगे और सुप्रीम कोर्ट उस पर विचार नहीं करेगा ?
इस देश के असंख्य लोगों की उम्मीद के आखिरी केंद्र सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद रखना लाजिमी ही है कि वह ऐसी स्थिति न आने दे जिसमें कानून का शासन गायब हो जाए।
 सुप्रीम कोर्ट ने बोफर्स मामले की जांच की मांग वाली सी.बी.आई.की याचिका  शुक्रवार को ठुकरा दी।
इससे अनेक लोगों को निराशा हुई है।पर साथ ही सुप्रीम कोर्ट 
ने यह  कह कर उम्मीद जगाई है कि  है कि बोफर्स मामले पर अधिवक्ता अजय अग्रवाल की याचिका लंबित है,उस पर सुनवाई के दौरान सी.बी.आई. सारे बिन्दु उठा सकता है।
याद रहे कि सी.बी.आई.की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के बंद मुकदमे को फिर से खोलने का आदेश गत साल दिया था।
इससे यह उम्मीद जगी थी कि बोफर्स मामला भी फिर से खुल सकता है।
   16 जनवरी, 2018 को मुख्य न्यायाधीश  दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाले पीठ ने कहा था कि ‘यदि किसी आपराधिक मामले में किसी असंबद्ध व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई होने लगे तो यह एक खतरनाक परंपरा कायम हो जाएगी।’
 अब देखना है कि अगली बार जब सुनवाई होगी तो सुप्रीम कोर्ट ‘असंबद्ध व्यक्ति’यानी अजय अग्रवाल  की याचिका पर क्या रुख अपनाता है।
 वैसे इस केस को लेकर कई सवाल व कुछ  उलझनें हंै जो अगली पीढि़यों को भी परेशान करते रहंेगे यदि इससे संबंधित कुछ सवालों का माकूल जवाब इस बीच नहीं आ गया।
 जवाब आने से इस बोफर्स तोप खरीद कांड से संबंधित कई सवाल सुलझ सकते हैं।वैसी स्थिति में नाहक कोई  राजनीतिक या गैर राजनीतिक हस्ती किसी तरह के शक के दायरे में नहीं रहेगी।
सवाल है कि जब फ्रांस की तोप सोफ्मा, बोफर्स तोप से भी अच्छी तोप थी तो फिर बोफर्स क्यों खरीदी गयी ?क्या इसलिए कि सोफ्मा वाले किसी को ‘कमीशन’ नहीं देते थे ?
भारत सरकार की घोषित नीति रही है कि रक्षा सौदे में दलाली या कमीशन का प्रावधान नहीं रहेगा।फिर बोफर्स तोप खरीद में दलाली क्यों दी गयी ?
क्या बिहार के पूर्व कांग्रेसी विधायक भरत प्रसाद सिंह का यह कहना सही है कि बोफर्स सौदे की दलाली के पैसे का इस्तेमाल हेवी वाटर और परिष्कृत यूरेनियम खरीदने में किया गया ताकि इस देश में परमाणु बम बन सके ?
यह बात व्यक्तिगत रूप से राजीव गांधी ने इस पूर्व विधायक को 1989 में बताई थी । यह बात श्री सिंह ने इस पर लिखी अपनी एक पुस्तिका में दर्ज की  है।क्या यह बात सही है कि लीगल चैनल से तब पर्याप्त हेवी वाटर आयात करना असंभव था ?
श्री सिंह ने 6 नवंबर 1999 को तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखे पत्र में यह सवाल उठाया था,‘क्या यह सही नहीं है कि बोफर्स दलाली के नाम से प्रचारित पैसे से हेवी वाटर की खरीद की गयी ? इस चिट्ठी की काॅपी सोनिया गाधी को भी भेजी गयी थी।
क्या अजय अग्रवाल की याचिका पर विचार करते समय सुप्रीम कोर्ट इस सनसनीखेज जानकारी की सत्यता की भी जांच नहीं करवाएगा ?
अपनी स्वीडन यात्रा से ठीक पहले राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने 26 मई 2015 को क्यों कहा था कि चूंकि कोई अदालती निर्णय नहीं है, इसलिए आधिकारिक रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि बोफर्स में कोई घोटाला हुआ है ? क्या उनके पास कोई और खास जानकारी है ?
2013 में सी.बी.आई. के पूर्व निदेशक ए.पी.मुखर्जी की एक चर्चित किताब आई थी।पुस्तक में राजीव गांधी,ज्योति बसु और इंद्रजीत गुप्त के बारे में बातें लिखी हुई हैं।मुखर्जी ने उस पुस्तक में बोफर्स सौदे के बारे में भी एक रहस्योद्घाटन किया है।मुखर्जी लिखते हैं कि राजीव गांधी ने मुझे  बताया था कि रक्षा सौदे के कमीशन के पैसों का इस्तेमाल पार्टी फंड के लिए होना चाहिए।मुखर्जी का कथन सच है या नहीं ?ंक्या इस बात की जांच के बिना ही बोफर्स मामले को कालीन के नीचे दबा देना चाहिए ?
 1991 में नरसिंह राव सरकार के विदेश मंत्री माधव सिंह सोलंकी ने भारत सरकार की ओर से स्विस सरकार से गुप्त रूप से यह आग्रह किया था कि बोफर्स दलाली की जांच नहीं होनी चाहिए।यह खबर जब बाहर आ गयी तो सोलंकी को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा  था।क्या इस प्रकरण की जांच करने की जरूरत नहीं है कि जांच की मनाही क्यों की गयी थी ? 
 इसी देश के आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण ने 2010 में यह कहा था कि ‘क्वात्रोच्चि और बिन चड्ढा को बोफर्स की दलाली के 41 करोड़ रुपए मिले थे।ऐसी आय पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।’
न्यायाधिकरण ने यह भी कहा था कि ‘बोफर्स कंपनी को कमीशन की राशि सौदे के मूल्य से कम करना चाहिए था।लेकिन भारत सरकार ने  41 करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि का भुगतान किया ।उसे करना पड़ा।’ 
ऐसा कहने के बावजूद भारत सरकार ने आयकर की वसूली क्यों नहीं की ? क्या इस सवाल का जवाब इस पीढ़ी को कभी नहीं मिल पाएगा ? यदि नहीं मिलेगा तो बोफर्स की दलाली को लेकर अनंत काल तक कई हस्तियां  शक के घेरे में बनी रहेंगी। 
राव सरकार ने अर्जेंटिना स्थित भारतीय मिशन को यह निदेश क्यों दिया था कि वह बोफर्स दलाल क्वात्रोचि के प्रत्यार्पण की कोशिश न करे ? जिस व्यक्ति पर भारत में केस चल रहा हो,उसके प्रति ऐसी नरमी क्यों ?सुप्रीम कोर्ट यह तथ्य नजरअंदाज कर देगा ?
कांग्रेसी और कांग्रेस समर्थित सरकारों ने समय -समय पर बोफर्स दलाली मामले की जांच मंंे कदम -कदम पर रोड़े अटकाए ? क्यों संबंधित मुकदमे को उसकी तार्किक परिणति नहीं पहुंचने दिया गया ? क्यों क्वात्रोचि को इस देश से भाग जाने दिया गया ? क्यों लंदन स्थित उस जब्त खाते को यहां से अफसर भेज कर खोलवा दिया गया ताकि क्वोत्रोचि उससे पैसे निकाल सके ?
याद रहे कि दलाली के पैसे स्विस बैंक की लंदन शाखा में जमा थे। 
क्या ये सवाल जन मानस में अनंत काल तक बने रहने चाहिए ? बोफर्स सौदे में दलाली को लेकर इस तरह के अन्य कई सवाल भी अनेक लोगों के दिल ओ दिमाग में हैं।उनके जवाब खोजने की कोशिश सुप्रीम कोर्ट नहीं करेगा तो आखिर कौन करेगा ?
@फस्र्टपोस्ट हिंदी मेंें 5 नवंबर 2018 को प्रकाशित@