मंगलवार, 13 नवंबर 2018

इन दिनों चुनावों के लिए टिकट बांटने के दौर चल रहे हैं।
2019 के लोक सभा चुनाव से पहले तो ऐसे दौर व्यापक तौर पर चलेंगे।
  आए दिन खबर आती रही है कि फलां नेता को अपनी पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो वे दूसरे दल के उम्मीदवार बन गए।
हां, इस बीच कुछ नेता टिकट कट जाने के बावजूद अपने ही दल में बने भी रहे।
  कोई स्वयंसेवी संगठन एक काम करे।
वह अगले लोक सभा चुनाव की प्रक्रिया समाप्त हो जाने के बाद एक समारोह करे।उस समारोह में उन नेताओं को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करे जिन्होंने टिकट कट जाने के बावजूद दल बदल नहीं किया।
हर चुनाव के बाद ऐसा होना चाहिए।
इससे दो बातें होंगी।एक तो लाॅयल पार्टी नेताआंे -कार्यकत्र्ताओं को बढ़ावा मिलेगा।
पर, ऐसे किसी सम्मान समारोह के बाद दूसरी ओर दल बदल  चुके नेतागण खुद अपने बारे में और लोगबाग उनके बारे में क्या सोचेंगे ?
आप खुद सोच कर देख लीजिए !

1.-दाना पुर के डी.आर.एम.आर.पी.ठाकुर ने पटना रेलवे
जंक्शन के सात टी.सी.को निलंबित करने का आदेश दे दिया है।
गत रविवार को डी.आर. एम. के औचक निरीक्षण के दौरान ये टिकट कलेक्टर्स अपनी ड्यूटी से गायब पाए गए थे।
2.-भारत सरकार के गैर आई.ए.एस.संयुक्त सचिव समय पर आॅफिस आ जाते हैं।
आई.ए.एस.संयुक्त सचिवों पर ऐसा कोई ‘आरोप’ नहीं है।
याद रहे कि 400 संयुक्त सचिवों में से गैर आई.ए.एस.संयुक्त सचिवों की संख्या बढ़कर अब 200 तक पहुंच चुकी  है।
2014 से पहले गैर आई.ए.एस.संयुक्त सचिवों की संख्या 10 प्रतिशत ही थी।
3.-यह बात छिपी नहीं है कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक शिक्षक बिना काम किए वेतन ले रहे हैं।अधिकतर सरकारी डाक्टर प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में जाने की जहमत नहीं उठाते।
4.-इसी साल फरवरी में यह खबर आई थी कि पटना जिले के 200 पुलिसकर्मी एक साल से ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं फिर भी उनका वेतन बनता जा रहा है।
5.-ऐसी घटनाओं की खबरें अक्सर आती रहती हैंं।
इस मामलें में इस देश के शासन की स्थिति बिगड़ती ही जा रही है।
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यदि बहुत बिगड़ गयी तो आखिर एक दिन उसका क्या नतीजा होगा ?
ऐसे मामले को लेकर जर्मनी की एक कहानी मैंने बहुत 
पहले कहीं पढ़ी या सुनी थी।यदि गलत हो तो जानकार मुझे सही कर देंगे।सही हो या गलत पर यह कहानी तार्किक तो लगती है। 
हिटलर-पूर्व जर्मनी में टे्रन के ड्रायवर किसी भी स्टेशन पर कभी भी ट्रेन रोक कर स्टेशन मास्टर के साथ बैठकर ताश खेलने लगते थे।यात्री गण भगवान भरोसे ! 
तानाशाह हिटलर जब सत्ता में आया तो उसने औचक निरीक्षण के दौरान कुछ ताश खेलते ड्रायवरों को वहीं गोली मार दी।
उसके बाद हर  ड्रायवर को लगने लगा कि हिटलर हाथ में रिवाल्वर लिए मेरी पीठ पर खड़ा है।
  ईश्वर न करे कि इस देश में कभी ऐसी नौबत आए।यहां अधिकतर लोगों का मिजाज लोकतांत्रिक बन चुका है।इसलिए शायद नौबत नहीं ही आएगी।
पर पावर-पोजिशन में बैठे हमारे ही अनेक लोग उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने में तो कोई कमी नहीं छोड़ रहे है !
इस कामचोरी की समस्या को भीषण सरकारी भ्रष्टाचार के कोढ़ से जोड़कर देखिए ! देश की कैसी तस्वीर बनती है ?
हालांकि देश के सिस्टम में शामिल कई लोग ईमानदार भी हैं।पर वे कई बार बेबस लगते हैं।



1.-बिक्रेता सब्जियों की ताजगी बरकरार रखने अथवा उनके परिरक्षण के लिए उन्हें कीटनाशकों में डूबोते हैं।
तेलों और मिठाइयों में वर्जित पदार्थों की मिलावट की जाती है।
2.-सब्जियों और दूसरे खाद्य पदार्थ को धोना फायदेमंद है।लेकिन पकाने से विषैले अवशेष बिरले ही खत्म होते हैं।निगले जाने के बाद छोटी आंत कीटनाशकों को सोख लेती हैं।
3.-शरीर भर में फैले बसायुक्त उत्तक इन कीटनाशकों को जमा कर लेते हैं।इनसे दिल,दिमाग,गुर्दे और जिगर सरीखे अहम अंगों को नुकसान पहुंच सकता है।
--इंडिया टूडे हिंदी-15 जून, 1989
4.-कई साल पहले भारत की  संसद में यह कहा गया कि अमेरिका की अपेक्षा हमारे देश में तैयार हो रहे कोल्ड ड्रिंक में 
रासायनिक कीटनाशक दवाओं का प्रतिशत काफी अधिक है ।इस पर  सरकार ने कह दिया कि यहां कुछ अधिक की अनुमति है।
5.-यह तब की बात है जब प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी  थे।पटना हवाई अड्डे पर  जो बोतलबंद पानी उन्हें परोसा जाने वाला था,वह अशुद्ध पाया गया था।ऐसी ही घटना  मनमोहन सिंह के साथ कानपुर में हुई थी जब वे प्रधान मंत्री के रूप में वहां यात्रा पर गए थे।
यानी प्रधान मंत्री भी नहीं बच पा रहे हैं।
  हाल की खबर है कि इस देश में बिक रहे 85  प्रतिशत दूध मिलावटी है।जितने दूध का उत्पादन नहीं है,उससे अधिक की आपूत्र्ति हो रही है।  
6.-सवाल है कि इस देश में अन्य कौन सा खाद्य व भोज्य पदार्थ कितना शुद्ध है ?
यह जानलेवा समस्या बहुत पुरानी है।
विभिन्न सरकारें लोक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए क्या -क्या करती हंै ? कितने दोषियों को हर साल सजा हो पाती है ?
मिलावट का यह कारोबार जारी रहा तो कुछ दशकों के बाद हमारे यहां कितने स्वस्थ व कितने अपंग बच्चे पैदा होंगे ?
पीढि़यों के साथ इस  खिलवाड़ को आप क्या कहेंगे ?क्या सबके मूल मंे भष्टाचार नहीं है ?   



सोमवार, 12 नवंबर 2018

आज के ‘टेलिग्राफ’ में प्रकाशित एक खबर के अनुसार धुबरी 
@असम@और फुलबाड़ी@मेघालय@ के बीच ब्रह्मपुत्र नद पर 20 किलोमीटर लंबा पुल बनने जा रहा है। धुबरी जिले के प्रशासन ने पहुंच पथ के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू भी कर दी है।
 इतनी दूर की यह  खबर मेरे लिए महत्वपूर्ण कैसे हो गयी ?
दरअसल मैं इमरजेंसी में फुलबाड़ी में कई महीनों तक अज्ञातवास में था।
इस खबर के साथ वहां की अनेक बातें व यादें एक साथ दिमाग में कौंध गयीं।
 मैंने तब फकीरा ग्राम रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतर कर 
 धुबरी के लिए बस पकड़ी थी।
धुबरी में स्टीमर पर सवार होकर फुलबाड़ी गया था।घंटों लगे थे।कई बार तो पता नहीं चल रहा था कि स्टीमर नद की लंबाई में चल रहा है या चैड़ाई में।
स्टीमर के मालिक सोन पुर @बिहार@के ही बाबू साहब थे।उनका स्टाफ भोजपुरी में बातें कर रहे थे।पर मैं अपना परिचय नहीं दे सकता था।
खैर, मैं फुलबाड़ी में महीनों रहा।हर सप्ताह मैं कठिन यात्रा तय करके फुलबाड़ी से धुबरी पहुंचता था-दिनमान और ब्लिट्ज खरीदने।
 आश्चर्य है कि तब से अब तक यानी 42 साल में किसी शासक को यह नहीं सूझा कि धुबरी के पास पुल बनाना जरूरी है।
 लगता तो नहीं कि मैं अब फिर कभी वहां जा पाऊंगा।पर जा पाता तो पुल बन जाने के बाद यह देखना दिलचस्प होता कि एक पिछड़े इलाके में पुल के पहले और पुल के बाद की स्थिति में कितना व क्या फर्क आता है।   

पति-पत्नी यदि आपस में लड़ना चाहें तो उन्हें सुबह से शाम तक इसके लिए दर्जनों बहाने मिल जाएंगे।
  पर,यदि अपनी  और अपने परिवार की तरक्की के लिए शांतिपूर्वक रह कर अपने काम में लगे रहना चाहें तो वे दिन भर में इसके लिए कई उपाय खोज ले सकते हैं।
  टी.वी.धारावाहिक देख कर बड़े होते छोटे बच्चे भी कई बार यह बता देते हैं कि उनके लड़ते-झगड़ते माता-पिता में से कौन कब गलती पर होता  है।
   बेहतर हो कि कभी अपने बच्चे को ही पंच बना कर झगड़ा शांत कर लेेने का बहाना ढूंढ़ लिया जाए।
  मैं यह दावा नहीं करता कि 45 साल के दाम्पत्य जीवन में हम कभी लड़े नहीं।पर हां, इसकी नौबत कभी नहीं आई कि पत्नी ने कहा कि मैं मैके चली जाऊंगा या मैंने कहा हो कि मैं घर छोड़कर चला जाऊंगा।
  हां, अघोषित समझौते के तहत हमने एक उपाय जरूर किया।मैं गुस्से में रहा तो पत्नी मौन हो गयीं और पत्नी गुस्से में रहीं तो मैं शांत रहा।

शनिवार, 10 नवंबर 2018

--राजनीति में वंशवाद की कमजोरियों में उलझ गया है चैटाला परिवार--



 किसी भी राजनीतिक परिवार में उत्तराधिकार की लड़ाई कठिन व दिलचस्प होती है।पर, यदि वह ‘युद्ध’ किसी हरियाणवी परिवार में हो तो उसमें महाभारत का पुट होना स्वाभाविक है।
इंडियन नेशनल लोक दल के सुप्रीमो  व पूर्व मुख्य मंत्री ओम प्रकाश चैटाला इन दिनों  इसी परेशानी से जूझ रहे हैं।
 उन्होंने अपने पुत्र अभय चैटाला को अपना उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय  कर लिया।पर अजय चैटाला के पुत्र द्वय अपने दादा का आदेश नहीं मान रहे हैं।याद रहे कि ओम प्रकाश जी के एक  पुत्र अजय चैटाला अपने पिता ओम प्रकाश चाटाला के साथ सजा काट रहे हैं।
पर अजय का कहना है कि ‘इंडियन नेशनल लोक दल न तो मेरे बाप की पार्टी है और न ही किसी और के बाप की।’
 अजय ने महाभारत शैली में यह भी कहा है कि ‘अब याचना नहीं,रण होगा,जीवन या मरण होगा।’ 
यह कार्यकत्र्ताओं की पार्टी है,वही निर्णय  करंेगे।अजय गुट के कार्यकत्र्ताओं की बैठक होने वाली है।जेल से पेरोल पर निकल कर अजय चैटाला अपने पुत्र की मदद में जुट गए हैं।
  इस बीच अजय के पुत्र ने भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत से भी संपर्क साधा है।
 यानी हरियाणा के राजनीतिक समीकरण के बदलने के भी संकेत मिल रहे हैं।
  याद रहे कि  अभय सिंह चैटाला हरियाणा विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता है।अजय चैटाला के पुत्र दुष्यंत चैटाला सांसद हैं।
दुष्यंत के छोटे भाई दिग्विजय चैटाला पार्टी के छात्र संगठन के प्रमुख थे।अब नहीं हैं।
दुष्यंत के साथ -साथ दिग्विजय को भी  ओम प्रकाश चैटाला के दल ने इसी माह अपनी पार्टी से निकाल दिया । 
दुष्यंत कहते हैं कि मेरे पिता ने 40 साल तक पार्टी की सेवा की है।
गत 7 अक्तूबर को दुष्यंत चैटाला के समर्थकों ने पार्टी रैली में अभय के भाषण के दौरान उपद्रव किया था।उस कारण उन्हें निलंबित किया गया था।उनके भाई दिग्विजय के खिलाफ भी पार्टी ने कार्रवाई की थी।
  इस बीच एक बार फिर मेल जोल की कोशिश भी हो रही है।पर समझौता कठिन माना जा रहा है।
देवीलाल द्वारा खड़ी की गयी इस पार्टी का हरियाणा में अच्छा- खासा जनाधार रहा है।पर लगता है कि पारिवारिक झगड़े का लाभ अगले चुनाव में भाजपा या कांग्रेस को मिल सकता है।
राजनीति में वंशवाद की कई बुराइयां हैं।पर उत्तराधिकार की समस्या को हल कर पाना किसी भी सुप्रीमो के लिए सबसे कठिन काम होता है।
ऐसे झगड़े में कई बार कुछ दल अपने मूल उद्देश्य से भटक जाते हैं। सर्वाधिक नुकसान उन आम लोगों को होता है जो लोग ऐसे दलों से अपने भले की बड़ी उम्मीद लगाए बैठे होते हैं।
वंशवाद जो न कराए ! 
   ---स्ट्रीट फूड बेहतर--
लोक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के अनुसार सड़क और गलियों में ठेले
पर  बिक रहे आहार अपेक्षाकृत बेहतर हैं।
उनका तर्क है कि ऐसे आहार बासी नहीं होते।रोज बनते हैं,रोज बिक जाते हैं।इसके विपरीत कई बड़ेे होटलों के फ्रिज में एक -दो दिनों से रखे आहार दुबारा गर्म करके खिलाए जाते हैं।वे स्वास्थ्य के लिए हानिकर होते हैं।
   विशेषज्ञ की यह राय तो स्ट्रीट वेंडर को खुश कर देने वाली  है।
पर उन ठेले वालों की भी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं।वे आम तौर से साफ-सफाई पर ध्यान नहीं देते।अपवादों की बात और है।
उन्हें चाहिए कि वे आहार बनाने और बत्र्तन धोने में गंदे पानी का इस्तेमाल न करें।
यदि वे सड़े आलू समोसे में न डालें,तो उनका बड़ा नाम होगा।आदि.... आदि....।
   --राष्ट्र कवि दिनकर के लिए--
राष्ट्रकवि राम धारी सिंह दिनकर की स्मृति में सिमरिया में 
अगले माह एक सप्ताह का कार्यक्रम प्रस्तावित है।
 उस अवसर पर बेगूसराय जिले
के उस गांव में राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री के कार्यक्रमों की स्वीकृति लेने की कोशिश भी की जा रही है।
यहां मिल रही खबर के अनुसार उस कोशिश में
केंद्रीय राज्य मंत्री गिरिराज सिंह के अलावा कुछ अन्य दलों के  कुछ नेता भी लगे हुए हैं। 
देखना है कि वे नेता सफल हो पाते हैं या नहीं।वैसे दिनकर के महत्व को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भी स्वीकार करते  हैं।
 -- आठ साल पहले की वह खुली चिट्ठी-- 
जनवरी, 2011 में विप्रो के अजीम प्रेम जी और महेंद्रा ग्रूप के के. महेंद्र सहित इस देश की 14 प्रमुख हस्तियों ने एक खुली चिट्ठी लिखी थी।
चिट्ठी इस देश के नेताओं के नाम थी।
चिट्ठी में कहा गया था कि वे भ्रष्टाचार पर काबू पाएं और 
जांच एजेंसियों को स्वायत्त बनाएं।
वह चिट्ठी जिन चर्चित हस्तियों की ओर से लिखी गई थी,उनमें जमशेद गोदरेज,अनु आगा,दीपक पारीख,अशोक गांगुली,विमल जालान और बी.एन.श्रीकृष्णा शामिल थे।
  अब सवाल यह है कि इन हस्तियों  की नजर में  भ्रष्टाचार के मामले में देश की आज हालत कैसी है ?
क्या ये हस्तियां ताजा हालात पर भी कोई टिप्पणी करेंगी  ?
हालांकि यह महत्वपूर्ण है कि इस बीच उन लोगों ने तो कोई अगली चिट््ठी लिखी और न कोई बैठक की।कम से कम ऐसी कोई खबर सार्वजनिक नहीं हुई है।  
     -भूली बिसरी याद-
अयोध्या और श्रीराम की चर्चा के बीच कामिल बुल्के को याद करना भी अप्रासंगिक नहीं होगा।
  बेल्जियम में सन 1909 में जन्मे फादर कामिल बुल्के ने इलाहाबाद विश्व विद्यालय से ‘राम कथा उत्पत्ति व विकास’ विषय पर पीएच.डी.किया था।
खास बात यह है कि उनका शोध पत्र हिंदी में था।ऐसा पहली बार हुआ।इसके लिए इलाहाबाद विश्व विद्यालय के तत्कालीन वी.सी.डा.अमरनाथ झा ने नियम बदल दिया था।
‘बाबा बुल्के’की जिद थी कि ‘मैं अपनी थिसिस हिंदी में ही तैयार करूंगा।’ उससे पहले यह नियम था कि सारे शोध पत्र अंग्रेजी में ही देने होंगे। 
तब किसी ने कहा था कि बुल्के साहब राम कथा संबंधित समस्त सामग्री के विश्व कोष हैं।
इसाई धर्म का प्रचार करने भारत आने के बाद उन्हंे यह देख कर दुःख हुआ कि यहां के पढ़े -लिखे लोग भी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से अनजान थे।
 खुद फादर कामिल बुल्के सन 1950 में भारत के नागरिक बन गए और यहां के समाज में रच -बस गए।
 वे अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, लैटिन, ग्रीक भाषाओं में सहज थे। उनका संस्कृत पर पूरा अधिकार था।
उनका तैयार किया हुआ अंग्रेजी -हिंदी कोश प्रामणिक है जो मेरे टेबल पर भी रहता है।
उन्होंने कई अन्य पुस्तकें भी लिखीं।
सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके कामिल बुल्के ने सन 1930 में जेसुइट मिशन में दीक्षा ली थी।
वे रांची के सेंट जेवियर काॅलेज में संस्कृत और हिंदी पढ़ाते थे। उन्हें 1974 में पद्म भूषण सम्मान भी मिला था।
उनका सन 1982 में निधन हो गया।
राम कथा के एक विदेशी शोध कत्र्ता को  याद करना अपने आप में एक खास अनुभव है। 
बुल्के साहब इलाहाबाद के चर्चित साहित्यिक समूह ‘परिमल’ के सदस्य थे और धर्मवीर भारती को वे गुरु भाई कहते थे ।भारती जी  बाद में धर्मयुग के संपादक बने थे। 
    -और अंत में-
कौन सी विद्या कहां काम आ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। एक भारतीय की ज्योतिष विद्या पाकिस्तानी जेलों में काम आ गई।
पाकिस्तानी जेल में 27 साल बिता कर स्वदेश लौटे रूप लाल का संस्मरण मैं पढ़ रहा था।पाकिस्तानी सुरक्षा कर्मियों ने जासूसी के आरोप में सन 1974
में उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। 
 रूप लाल के  अनुसार, ‘ मैं वहां जेल में कैदियों की हस्त रेखाएं पढ़कर उनका भविष्य बताता था।उसके बदले वे मुझे कुछ पैसे देते थे।उन पैसों के जरिए  मैं जेल के बाहर से धार्मिक पुस्तकें मंगाता था।इसके लिए जेल कर्मियों को रिश्वत देनी पड़ती थी।चलिए,इस मामले में भारत और पाकिस्तान का एक ही हाल है।यहां भी जेल कर्मियों को रिश्वत देकर आप कुछ भी बाहर से मंगवा सकते हैं, ऐसी
 खबरें अक्सर छपती रहती हैं।  
@9 नवंबर 2018 को प्रभात खबर-बिहार में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@
    

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

 3 नवंबर, 2018 को अपने फेसबुक वाॅल पर देश के वरीय पत्रकार शम्भू नाथ शुक्ल ने लिखा कि ‘
‘मेरे संपर्क में जितने भी हिंदी पत्रकार आए,उनमें से सबसे ज्यादा गंभीर,डेड आॅनेस्ट,विचारवान और विचार धारा के प्रति दृढ पत्रकार एक ही मिले।
वे हैं पटना के श्री सुरेंद्र किशोर।
कोई शंकालु सवाल उठा सकता है कि ‘आप क्या ईमानदार नहीं हो ?’
तो मेरा जवाब होगा-‘कत्तई नहीं,क्योंकि मुझे मौका ही नहीं मिला।इसलिए मैं ‘न जुरे तो महात्यागी’ का तमगा नहीं लेना चाहता।’
खैर, असली बात यह है कि 73 वर्षीय पटना के इस ‘सिंह’ ने लिखा था कि जाड़े भर नथुनों में नहाने के पूर्व सरसों का तेल डालने वाले को जुकाम नहीं होता।साथ ही नाभि पर भी यही तेल लगाना चाहिए।
आज से मैंने यही प्रयोग शुरू कर दिया है।सुरेंद्र जी का अनुभव काम का होगा।सुरेंद्र जी की ईमानदारी पर फिर लिखूंगा।’
सुरेंद्र किशोर का जवाब--
 शुक्ल जी, आपकी एक पंक्ति मेरे लिए ‘भारत रत्न’ के समान है।
मैंने पत्रकारीय जीवन में कई न्यूज ब्रेक किए।मेरी रपटों पर बारी-बारी से तीन बार संसद भी स्थगित हो चुकी है।
पर, मुझे पत्रकारिता का कोई पुरस्कार नहीं मिला।हालांकि नहीं मिला,कहना सही नहीं होगा ।दरअसल  मैंने  लिया नहीं ।
 मैंने कई बार प्रांतीय व राष्ट्रीय पुरस्कार के आॅफर को विनम्रतापूर्वक  अस्वीकार कर दिया।
मुझे उसी पुरस्कार की प्रतीक्षा थी जो आप जैसे बड़े पत्रकार ने एक लाइन में मुझे दे दिया।
मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि किसी पत्रकार का सबसे बड़ा पुरस्कार यही है कि उसके बारे में आम पाठक क्या राय रखते हैं।‘खास पाठकों’ की मैं चिंता नहीं करता।खास पाठकों को हर पत्रकार  संतुष्ट नहीं कर सकता।दरअसल  मैं देश- संविधान-कानून-सदाचार को किसी भी विचारधारा की अपेक्षा अधिक तरजीह देता हूं।
  पर, आपसे मेरी एक विनती है।आपने अपने  पोस्ट की  अंतिम लाइन में जो अपनी योजना बताई है,उसे टाल दीजिए।किसी व्यक्ति के बारे में उसके निधन के बाद ही ऐसी बातंें लिखी जानी चाहिए जो आप मेरे बारे में लिखना चाहते हैं।अन्यथा, मुझे लेने के देने पड़ सकते हंै।
अधिक लिखने पर कुछ लोग मेरे बारे में ऐसी -ऐसी नकारात्मक बातों का आविष्कार  कर देंगे जिनका मुझे भी पता नहीं होगा।जीवन काल में समकालीनों में ईष्र्या-द्वेष-प्रतियोगिता अधिक रहती है।निधन के बाद भी रहती है,पर काफी कम।
निधन के बाद आप लिखेंगे तो कम से कम मेरे रिश्तेदार-मित्र-परिजन-बाल -बच्चे यह तो जान पाएंगे कि मैं किसी काम का आदमी तो था !
  अभी लिखेंगे तो कुछ लोग यह भी समझ सकते हैं कि ऐसे लेखन से मुझे कोई पद पाने में सुविधा होगी।हालांकि हकीकत यह है कि सिर्फ ईमानदारी का गुण पद पाने के लिए अब कोई अर्हता नहीं है।