मंगलवार, 16 जुलाई 2019

  --परंपरागत आॅटो उद्योग की जीत होगी या
  इलेक्ट्रिक वीकल समर्थक मोदी सरकार की ?--
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि हम अगले 6 साल में इस देश में पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रचलन का लक्ष्य पूरा करने की कोशिश करेंगे।
 पर्यावरण थिंक टैंक सी.एस.ई.की ताजा रपट में कहा गया है कि वायु प्रदूषण के कारण इस देश में हर साल एक लाख बच्चों की जान चली जाती है।
  अन्य की मौत अलग है।
वाहन से निकलने वाले प्रदूषण का इसमें बहुत बड़ा योगदान होता है।
  वित्त मंत्री की घोषणा के बाद बजाज आॅटो के एम.डी.राजीव बजाज ने कहा है कि‘क्या हम दुकान बंद कर घर बैठ जाएं ?’
 राजीव बजाज के पूर्वज जमुनालाल बजाज स्वतंत्रता सेनानी थे और आजादी की लड़ाई में उनका बड़ा योगदान था।
 अपने वंशज की इस प्रतिक्रिया पर जमुनालाल बजाज परलोक में क्या सोच रहे होंगे ?
क्या इसीलिए उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी कि उनके ही वंशज इस बात की भी परवाह न करे कि प्रदूषण से हर साल एक लाख तो सिर्फ बच्चे मर रहे हैं ?
 खैर, यह तो राजीव बजाज को सोचना है। पर क्या मोदी सरकार अंततः बच्चों की जिंदगी का ध्यान रखेगी या बजाज तथा दूसरे आॅटो उद्योग के रोजगार का ?
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन किसके दबाव में आता है। 


   कितनी योजनाएं कागजी !
   कितनी सरजमीन पर ?
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आम लोगों के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार अलग -अलग और मिलकर जन कल्याण व आम विकास की सैकड़ों योजनाएं चलाती रहती हैं।
   उनके लिए हर साल अरबों-अरब रुपए खर्च किए जाते हैं।
  कुछ योजनाएं दिखाई पड़ती हैं। उनके लाभ भी लोगों तक पहुंचते हैं।
पर,यह आरोप भी लगता रहता है कि अन्य अनेक योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही चलाई जाती  हैं । उन मदों के पैसों की बंदरबांट हो जाती है।
ऐसी योजनाओं के नाम भी कम ही लोगों को मालूम हो पाते हैं। 
   क्या यह सच है ?
इसकी सत्यता का पता आखिर कैसे चलेगा ?
 दोनों सरकारों की कुल योजनाओं के नाम अखबारों में विज्ञापन के रूप में छपवाए जाने चाहिए । इससे आसपास देख कर आम लोग यह जान सकेंगे कि उनके नाम पर पैसों की सिर्फ लूट हो रही है या उसे सरजमीन पर लगाया जा रहा है।
  

चेतन भगत ने लिखा है,
‘प्रिय कांग्रेस, आने वाले कुछ दिन आपके भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
नई वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए
एक ऐसे नेता को चुनिए जो आपको भविष्य में सुधार के लिए सबसे बेहतर अवसर प्रदान कर सके।’
  प्रिय चेतन,
अन्य कई बातों की आपकी समझ बेजोड़ है।
पर, पता नहीं आप मौजूदा कांग्रेस का डीएनए समझने में कैसे गलती कर बैठे !
 क्या आप कभी किसी वैसे डूबते हुए व्यापारिक घराने को यह सलाह दे सकते हैं कि आप अपनी कंपनी का नेतृत्व परिवार के बाहर किसी अन्य के हाथों में सौप दें ताकि कंपनी का पुनरुद्धार हो सके ?
 ऐसी सलाह आप देंगे भी तो वह नहीं मानेगा चाहे कंपनी डूब ही क्यों न जाए।
कौन अपनी संपत्ति दूसरे को यूं ही दे देता है ?
चेतन की कल्पना के अनुसार जो नेता कांग्रेस का सुधार कर देगा,वह खुद कांग्रेस का सुप्रीमो नहीं बन जाएगा ! ?
ऐसा मौका ‘प्रथम परिवार’ किसी अन्य को क्यों देगा ?
वह तो मोदी सरकार के अलोकप्रिय होने का इंतजार भर करेगा। भले उसके इंतजार के साल लंबे हो जाएं।
   यानी, कांग्रेस नामक निजी पारिवारिक कंपनी का नेतृत्व वैसे व्यक्ति को सौंपने का सुझाव आप कैसे दे सकते हैं जो कांग्रेस को सुधार दे ?
  प्रथम परिवार कांग्रेस की कमान यदि किसी बाहरी व्यक्ति को  सौंपेगा भी तो वह व्यक्ति ‘एक और मन मोहन ंिसंह’ ही होगा।वह  मोदी के अलोकप्रिय होने तक सीट गरम करता रहेगा।भले वह दिन आने से पहले ही कांगे्रस का इतिश्री हो जाए।हालांकि लोकंतत्र के लिए यह अच्छा नहीं होगा।
सरकारें तो बदलती ही रहनी चाहिए।
 प्रथम परिवार को भी हार के कारणों का पता है।पर उसने सुधार की इच्छा,सामथ्र्य  और शक्ति खो दी  है।प्रथम परिवार का तो एजेंडा ही गैर राजनीतिक है।
   2014 की लोस हार के बाद पूर्व रक्षा मंत्री ए.के.एंटोनी ने हार का कारण प्रथम परिवार को साफ- साफ बता दिया था।
एंटोनी ने अपनी रपट में साफ -साफ कह दिया था कि ‘2014 के  लोक सभा चुनाव में हमारी हार इसलिए हुई क्योंकि लोगों में यह धारणा बनी कि कांग्रेस 
धार्मिक अल्पसंख्यकों के पक्ष में पूर्वाग्रहग्रस्त है।
इसलिए बहुमत मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर हुआ।
एंटोनी के अनुसार भ्रष्टाचार, मुद्रास्फीति  और दल में  अनुशासनहीनता हार के अन्य कारण थे।’
  पर 2014 के बाद कांग्रेस ने एंटोनी समिति की रपट पर कोई ध्यान ही नहीं दिया।
बल्कि उसी गलत दिशा में कांग्रेस आगे बढ़ती चली गई।
उसकी ओर हाल में आनंद शर्मा ने इशारा किया है।
 2019 की हार के कुछ कारण प्रमोद जोशी -राष्ट्रीय सहारा- 
के अनुसार कांग्रेस दुलारा नेता आनंद शर्मा ने बता दिया है।
दरअसल प्रथम परिवार को छोड़कर बाकी नेता व कार्यकत्र्ता कंपनी के छोटे -बड़े अफसर या कर्मचारी मात्र हैं।वे जब तक पार्टी में हैं, तब तक वही बात बोलेंगे जो प्रथम परिवार चाहता है।
  देश के लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है कि एक महत्वपूर्ण बड़ी पार्टी को, जिसमें संभावनाएं थीं,बिखर रही है। वंश तंत्र अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह अंततः उसे  बर्बाद ही कर रहा है।
   अब कांग्रेस नेता आनंद शर्मा की ताजा उक्तियां पढि़ए--
‘पार्टी घोषणा पत्र में देशद्रोह के कानून को खत्म करने और आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट में भारी बदलाव करने वाली बातों को शामिल करना गलती थी।कांग्रेस के घोषणा पत्र में यह भी कहा गया था कि कश्मीर में सेना कम करनी है।
आनंद शर्मा के अनुसार इन बातों का वोटरों पर विपरीत प्रभाव पड़ा।
  आनंद जी,यह गलती नहीं, बल्कि वंश तंत्र पर आधारित अधिकतर राजनीतिक दलों की रणनीति का यह हिस्सा रहा  है।
 जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक बनाओ,कुछ दलों से चुनावी तालमेल करो। सत्ता पाओ और सत्ता भोगो।
इस बीच कुछ जनहितकारी काम हो जाए, तो हो जाए।
अपने वंश-परिवार  और आधार वोट बैंक वाली जाति के लोगों को सबसे महत्वपूर्ण पदों पर बैठाओ।लाभ कमाओ और कमआओ।
सांप्रदायिक वोट बैंक की धार्मिक भावनाओं को सहलाओ और उनके धार्मिक एजेंडा को आगे बढ़ाने में मदद करो।
जहां ऐसी राजनीति चलेगी, वहां भाजपा सत्ता में नहीं आएगी तो कौन आएगा ! ?


   यहां ऐसा भी होता है !
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2001 में विश्व व्यापार केंद्र पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने अपने कानूनों को और भी कड़ा कर लिया था।सुरक्षा जांच कठोर बना दी।
 इन दिनों चीन भी अपने देश में सक्रिय जेहादी तत्वों का एक खास तरह से ‘इलाज’ कर रहा है।
अन्य देश भी अपने देश की सुरक्षा के लिए 
जरूरत के अनुसार कठोर कदम उठाते रहते हैं।
पर, दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति सिर्फ भारत के साथ है।
  यहां अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 2002 में  
कारगर ‘पोटा’ कानून बनाया।
  उससे आतंकवादियों से निपटने में सुविधा मिल रही थी।
पर, उससे कांग्रेस तथा कुछ अन्य दलों के वोट बैंक को तकलीफ हो रही थी।
2004 में जब मन मोहन की सरकार बनी तो पोटा को समाप्त कर दिया गया।
  नतीजतन 2004 से 2008 तक आतंकी गतिविधियां काफी बढ़  गईं।
2008 में तो मुम्बई पर भारी आतंकी हमला हो गया।मजबूर होकर मन मोहन सरकार को एन.आई.ए.बनाना पड़ा।
पर, अब जब एन.आई.ए.नाकाफी साबित हो रहा है तो मोदी सरकार ने एन.आई.ए.संशोधन विधेयक, 2019 लोक सभा से आज पास कराया।
  स्वाभाविक ही था कि ओवैसी जैसे नेता किसी न किसी बहाने उसका विरोध करें।
पर कांगेेस के सदस्य ने भी आज लोक सभा में उस बिल के खिलाफ भाषण क्यांे किया ?कहा कि इस कानून से पुलिस
राज कायम हो जाएगा। 
उसने तो यह भी कहा कि गुवाहाटी हाईकोर्ट  सी.बी.आई.को असंवैधानिक घोषित कर चुका है।
  दरअसल कांग्रेस के अनेक नेतागण इन दिनों सी.बी.आई. और अदालत की गिरफ्त में हैं।लगता है कि वे चाहते हैं कि सी.बी.आई.अपना काम रोक दे।
  2014 की हार के बाद ए.के. एंटोनी ने कांग्रेस की हार का कारण भ्रष्टाचार व मुस्लिम तुष्टिकरण बताया था।
2019 की हार के भी वही कारण रहे।
फिर भी लगता है कि कांग्रेस अपने चाल, चरित्र और चिंतन में कोई परिवत्र्तन करने वाली नहीं है चाहे उसके अच्छे दिन कभी आएं या नहीं !
 भारत के अलावा दुनिया में ऐसा और कौन सा देश है जहां के कुछ नेतागण जाने अन जाने या वोट के लिए ऐसे- ऐसे काम करते रहते हैं जिनसे  देसी -विदेशी आतंकवादियों को उस देश को क्षत -विक्षत करने मेें मदद मिले ? 
  मेरी जानकारी में तो कोई अन्य देश नहीं है।
आपकी नजर में हो तो जरूर बताइएगा।

सोमवार, 15 जुलाई 2019

वृद्धाश्रम में मां बाप को छोड़कर वो पलटा ही था 
कि बाप ने आवाज देकर कहा,
बेटा, अपने मन मेें किसी प्रकार का बोझ मत रखना।
तुझे पाने के लिए 
दो बेटियों की हत्या की थी,
सजा तो मिलनी ही थी।
उन्हीं बेटियों ने बहू बन कर बदला लिया है। 

जेपी और आर.एस.एस.
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जय प्रकाश नारायण ने 6 मार्च, 1975 को दिल्ली
में आयोजित विशाल प्रदर्शन के अवसर पर अपने भाषण में कहा था कि 
‘अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ फासी है तो मैं भी फासी हूं।’
 जेपी के निजी सचिव रहे सच्चिदानंद ने 13 अप्रैल 1980 के दिनमान में लिखे अपने लेख में यह ऐतिहासिक तथ्य दर्ज किया है।
सच्चिदानंद लिखते हैं कि अपने आंदोलन में संघ को शरीक करने के कारण कांग्रेस और माकपा के लोग जेपी की कटु आलोचना करते थे।
वे कहते थे कि संघ एक फासी संगठन है और जेपी इस संगठन को बढ़ावा देकर फासीवाद की मदद कर रहे हैं।
जेपी उनकी आलोचना
का उस दिन जवाब दे रहे थे।
  पर सच्चिदानंद जी ने इतना ही भर नहीं लिखा।
उन्होंने यह भी लिखा कि अपने आंदोलन के दौरान जेपी अनेक बार संघ के शिविरों में शामिल हुए।
ऐसा ही एक शिविर 13 मई 1975 को कालीकट में हुआ था।
शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए जेपी ने कहा था कि 
मैं तो वह दिन देखना चाहता हूं कि आर.आर.एस. में मुसलमान
युवक भी होंगे और ईसाई युवक भी होंगे।
आज भी जहां -तहां शायद हों, मैं नहीं कह सकता।
अधिक संख्या में वे हों और उनको लगे कि जैसे हिन्दू युवकों को ,बालकों को संघ की शिक्षा प्राप्त करने का ,कवायद सीखने का अधिकार है, वैसे ही उनको भी हो।
समय आएगा,जब संघ निर्णय करेगा कि हमारे दरवाजे सबके लिए खुले हैं।
आज भी आपके उपर के लोगों से मेरी बातें होती हैं तो मुझे कुछ आशा होती है कि मानस इस प्रकार का बन रहा है,और वह दिन मैं बहुत जल्द देखना चाहता हूं।’   
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प्रभाष जोशी के जन्म दिन के अवसर पर
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बहु आयामी व्यक्तित्व व प्रतिभा के संपादक प्रभाष जोशी
का अपने अधीनस्थ पत्रकारों के साथ भी स्नेहिल व्यवहार रहता था।
 उन अधीनस्थों में सौभाग्यवश मैं भी शामिल था।
इस बात का पता तो मुझे पहले से ही था।
पर, उसकी गहराई उनकी पत्नी ने उनके नहीं रहने बाद मेरी पत्नी को बताई।
  प्रभाष जी के गुजर जाने के बहुत बाद एक दफा मैं सपरिवार दिल्ली गया था।
उषा भाभी से मिलने पुत्र के साथ मेरी पत्नी रीता जनसत्ता अपार्टमेंट गई थी।
बहुत सारी बातों के साथ -साथ उषा जी ने यह भी बताया कि वे यही पास का फ्लैट सुरेंद्र जी को दिलवाना चाहते थे।
वे चाहते थे कि इन दोनांे फ्लैटों के एक -एक कमरे को मिला कर उसे लाइब्रेरी बना दिया जाए।
उसमें हम दोनों की पुस्तकें व संदर्भ सामग्री रहें।
 हालांकि अपने जीवन काल में प्रभाष जी ने कभी मुझसे यह इच्छा नहीं बताई थी।
यदि बताई होती तो मैं उनसे कहता कि मेरे पुस्तकालय-संदर्भालय में जो कुछ आपको पसंद हो ,उसे मैं मुफ्त में आपको भिजवा दूंगा।
 एक बार उन्होंने पटना के मेरे घर में उसे देख कर कहा था कि देश के किसी पत्रकार के पास ऐसा पुस्तकालय-संदर्भालय  नहीं है।
उषा भाभी से उनकी इच्छा जानने के बाद मैंने महसूस किया कि इस पुस्तकालय-सह -संदर्भालय का प्रभाष जी से बेहतर कोई भी अन्य व्यक्ति इसका सदुपयोग नहीं कर सकता था।मैं तो कत्तई नहीं।
   पर, लगता है कि जिस फूल को ईश्वर अधिक पसंद करता है,उसे समय से पहले ही चुन लेता है।
 प्रभाष जी के गुजर जाने की कोई उम्र नहीं थी।
उनके नहीं रहने के बाद मेरे सहित देश के अनेक पत्रकार  अनाथ से हो गए।
  बिहार के एक दबंग नेता ने एक बार किसी से कहा था कि सुरेंदर का रक्षक जोशी जी हैं।इसलिए उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
जोशी जी के नहीं रहने पर उस नेता ने मेरा बिगाड़ भी दिया था।
 खैर, प्रभाष जी मेरे पीछे में यह कहा करते थे कि धीरेंद्र श्रीवास्तव और सुरेंद्र किशोर के लिए कुछ और करना चाहता हूं।
चूंकि पटना में विशेष संवाददाता से बड़ा पद मुझे नहीं दे सकते थे,इसलिए उन्होंने 1998 में लखनउ से हेमंत शर्मा के साथ-साथ पटना से मेरा भी तबादला दिल्ली करवा दिया था।
  मैंने कभी खुद को दिल्ली के अनुकूल नहीं पाया।इसलिए उनसे विनती करके एक महीने बाद ही फिर पटना लौट आया।
  मेरी बदली के पीछे उनका उद्देश्य मेरा प्रमोशन था जिसका हकदार वे मुझे समझते थे।
अपने कार्यकाल में राहुल देव भी मुझे दिल्ली बुलाकर बड़ा पद देना चाहते थे।मैं उनका भी आभारी हूं।
   मैं जो भी बन पाया हूं ,उसमें प्रभाष जी का सबसे बड़ा योगदान रहा  है।
उन्होंने खुद पर खतरा व नुकसान उठाकर भी अन्य सहकर्मियों के साथ -साथ हमेशा ही मेरा भी बचाव किया।
यहां तक कि सती प्रथा वाले चर्चित संपादकीय की जिम्मेवारी भी प्रभाष जी ने खुद पर ले ली थी जबकि उसके लेखक कोई और थे।
याद रहे कि अदमनीय अखबार जनसत्ता के संवाददाताओं पर सत्ताधारी नेताओं का तरह -तरह से भारी दबाव रहा करता  था।
दबाव डालने वालों में गोयनका जी के मददगार नेता भी शामिल थे।
पर जोशी जी ने उनकी भी कभी परवाह नहीं की।इसके लिए रामनाथ गोयनका भी धन्यवाद के पात्र थे। 
 कुल मिलाकर इस संक्षिप्त विवरण में यही कहा जा सकता है कि प्रभाष जोशी के बाद कोई प्रभाष जोशी पैदा नहीं हुआ।
आज जो माहौल है,उसमें संभवतः होगा भी नहीं।
होने नहीं दिया जाएगा।
बाबरी मस्जिद को ढाहे जाने के बाद प्रभाष जी भावुक हो उठे थे।
उसके बाद उन्होंने कुछ खास संगठनों के खिलाफ खूब लिखे।
पर उसमें उनकी भावना थी न कि उनका कोई एजेंडा।
इसीलिए फिर भी संघ से जुड़े कई लोगों का उनके प्रति आदर कम नहीं हुआ। 
   राजेंद्र माथुर के साथ-साथ उन्हें भी हाल के वर्षों की पत्रकारिता का युग पुरुष ही कहा जाएगा।