शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

प्रफुल्ल पटेल- इकबाल मिर्ची व्यावसायिक 
संबंध की खबर के बीच याद आई 
वोहरा कमेटी की रपट
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प्रफुल्ल पटेल और इकबाल मिर्ची के बीच संपत्ति से संबंधित कांट्रेक्ट का जांच एजेंसी को पता चला है।
इस खबर के साथ ही मुझे वोहरा कमेटी की  रपट की याद आ गई।
दाउद इब्राहिम ने 1993 में बंबई में 12 स्थानों में भीषण विस्फोट करवाए थे।
करीब सवा तीन सौ लोगों की जानें गईं थीं। 
तब भारतीय जांच एजेंसी को दाउद के साथ-साथ उसके अत्यंत करीबी सहयोगी इकबाल मिर्ची की भी तलाश थी।
उस घटना के बाद माफिया से नेताओं आदि के संबंधों की जांच के लिए वोहरा कमेटी बनी।
उसने विस्फोटक रपट दी।सिफारिशें भी कीं।
पर, आज तक उसे न तो केंद्र सरकार ने सार्वजनिक किया और न ही उसे लागू ही किया ।
रपट को भी गुप्त रखा गया।बल्कि दबा दिया गया।
उस रपट की कुछ पंक्तियों पर  एक नजर डालें। 
वह रपट माफिया-नेता-तस्कर-अफसर गंठजोड़ पर है।
उस रपट की एक फोटो काॅपी मेरे पास भी है।
   वोहरा समिति ने 1993 में अपनी सिफारिश केंद्र सरकार को दे दी थी।
सिफारिश आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय लाॅबियों,तस्कर गिरोहों ,माफिया तत्वों के साथ नेताओं और अफसरों के बने गंठबंधन  को  तोड़ने के ठोस उपायों से संबंधित है।
   पर तब की या फिर उसके बाद की किसी भी केंद्र सरकार ने उस पर अमल नहीं किया ।
  पांच दिसंबर, 1993 को तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव  एन.एन.वोहरा ने अपनी सनसनीखेज रपट गृह मंत्री को सौंपी थी।
रपट में कहा गया  कि ‘ इस देश में अपराधी गिरोहों,ं हथियारबंद सेनाओं, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले माफिया गिरोहों,तस्कर गिरोहों,आर्थिक क्षेत्रों में सक्रिय लाॅबियों का तेजी से प्रसार हुआ है।
इन लोगों ने विगत कुछ वर्षों के दौरान स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों, सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों, राजनेताओं,मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा गैर सरकारी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ व्यापक संपर्क विकसित किये हैं।
इनमें से कुछ सिंडिकेटों की विदेशी आसूचना एजेंसियों के साथ- साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय सबंध भी हैं।’
गोपनीयता बरतने के लिए इस रपट की सिर्फ तीन ही काॅपियां तैयार करवाई गयी थीं।
इस रपट की सनसनीखेज बातों को देखते हुए ही, मेरी जानकारी के अनुसार,केंद्र  सरकार ने उसे सार्वजनिक नहीं किया।
उसे लागू करने की हिम्मत बाद की भी किसी सरकार में नहीं रही।
क्योंकि उससे  सिस्टम नंगा हो जाता।
अब जब यह कहा जा रहा है कि मोदी है तो मुमकिन है तो फिर उसे लागू करो।
आज जब इस देश के खिलाफ देसी-विदेशी शक्तियों व जेहादियों ने अघोषित युद्ध छेड़ रखा है तब तो वोहरा कमेटी की रपट पर से धूल झाड़ना देशहित में और भी जरुरी लगता है। 

कभी -कभी जब मैं किसी बात पर अटकता था तो रविरंजन बाबू को फोन करता था।
वे बिहार की राजनीति के बारे में काफी जानकारी रखते थे।
वे संभवतः सबसे पुराने सक्रिय पत्रकार थे।
हाल में तो फेसबुक ने हमलोगों को उनसे जोड़ा था।
उनके प्रति पत्रकारों में भी आदर का भाव रहा।
वे कभी विवादों में नहीं रहे।
संवाद संकलन के लिए कई बार उनके साथ राज्य के भ्रमण का अवसर मुझे मिला था।
वे किसी के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त भी नहीं थे ।
  वे याद आएंगे।
उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !

 राम जन्मस्थान पर मस्जिद का होना दुर्भाग्यपूर्ण है।
केवल एक विदेशी -विधर्मी विजेता के अहंकार व प्रजा के मनोवैज्ञानिक दमन, अपमान का चिन्ह है।
मुसलमान इसे अहंकार व राजनीति का मुद्दा ना बनाकर सहर्ष हिन्दुओं को सौंप देते तो अद्भुत हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द कायम होता।
यह मेरी निजी राय है।
           ---जनसत्ता के पूर्व संपादक राहुल देव

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

फासीवादी,हत्यारे,अराजकतावादी और जिहादी ही कश्मीर के असल दुश्मन हैं।
हम उनकी कायरता के आगे नहीं झुकेंगे ।
उन्होंने 1990 के दशक से चले आ रहे उन्मादी छद्म युद्ध में हजारों लोगों का कत्ल किया।
हम तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक इनके सताए सभी लोगों को इंसाफ नहीं दिलाएंगे।
ये हमसे कभी नहीं जीत पाएंगे।
           ----इम्तियाज हुसैन,दैनिक जागरण
यह तो ठीक बात है।
पर इस छद्म युद्ध में लगे जेहादियों के साथ हमारी अदालतें और सरकार सामान्य अपराधियों जैसा ही व्यवहार करती हैं।
आज जरुरत इस बात की है कि हमारी सरकार ऐसे कानून बनाए ताकि वास्तविक युद्ध और छद्म युद्ध में लगे देसी-विदेशी राष्ट्रद्रोहियों के बीच कानून की दृष्टि से अंतर मिट जाए।
क्या युद्ध भूमि में इस बात की मनाही है कि जब तक दुश्मन गोली न चलाए,तब तक हमारी सेना गोली नहीं चलाएगी ?

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019


पहले मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने जेपी सेनानी पेंशन योजना बंद की।
अब वही काम राजस्थान की गहलोत सरकार ने कर दिया।
अब राजस्थान के उन मीसा बंदियों को पेंशन राशि का भुगतान बंद हो जाएगा जो आपातकाल--1975-77 में जेल में थे।

राष्ट्रीय राजधानी को पंजाब-हरियाणा से दूर ले जाइए !
अन्यथा, फसल अवशेष के मारक धुएं से अपनी और अपने बाल -बच्चों की आयु कम करते जाइएगा
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यदि पंजाब और हरियाणा के किसानों को फसल अवशेष को
खेतों में जलाने से आप नहीं रोक सकते तो कम से कम देश की राजधानी अन्यत्र ले जाने के बारे में सोच-विचार तो कर ही सकते हैं।
 वैसे भी दिल्ली-नई दिल्ली की सड़कें अब बढ़ते टै्रफिक को संभाल नहीं पा रही है।
आने वाले दिनों में स्थिति और भी बदतर होगी।
राष्ट्रीय राजधानी वैसी जगह ले जाइए जहां दूर -दूर तक भी हरियाणा-पंजाब जैसे ढीठ व अन्य लोगों के प्रति असंवेदनशील किसान नहीं बसते हों।
वोट लोलुप सरकारें तो लाखों लोगों को जहरीले धुएं  से मरते देखना पसंद करेगी ,पर धुएं पर अंकुश नहीं लगाएगी।  


रविवार, 13 अक्टूबर 2019

डा.राम मनोहर लोहिया के जीवन और उनकी राजनीति पर एक नजर
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यह जानकारी खास तौर पर उनके लिए जिन्होंने 
कल उनकी पुण्यतिथि मनाई और जो लोहिया के नाम का सिर्फ तोतारटंत करते हैं।
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1.-लोहिया ने शादी नहीं,घर नहीं बसाया।
क्योंकि उनका मानना था कि जिन्हें सार्वजनिक जीवन में 
जाना है,उन्हें शादी नहीं करनी चाहिए।
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आज राजनीति में वंशवाद-परिवारवाद की महामारी को देखने से लगता है कि लोहिया यह जान गए थे कि एक दिन यही सब होने वाला है।
इन दिनों तो इन बुराइयों के कारण राजनीतिक दल एक -एक कर मुरझाते जा रहे हैं।
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2.-संसद सदस्य रहने के बावजूद उन्होंने कार नहीं खरीदी।
वे कहते थे कि कार को मेन्टेन करने लायक मेरी आय नहीं है।
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यह भी जान गए थे कि नेताओं को आय से अधिक खर्च करने 
की आदत पड़ जाएगी तो देश घोटालों-महा घोटालों में डूब जाएगा ।
आज कितने छोटे -बड़े नेता भ्रष्टाचार के आरोपों में मुकदमे झेल रहे हैं,उनकी गिनती की है आपने ?
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3.-उनका नारा था-‘पिछड़े पावें सौ में साठ।’
पर, वे ऊंची जातियों के विरोधी नहीं थे।
बारी-बारी से उनके जितने भी निजी सचिव हुए,
सब के सब ब्राह्मण थे।
यह बात बहुत मायने रखती है कि कोई नेता किसे अपना निजी सचिव रखता है।
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याद रहे कि जातीय-साम्प्रदायिक वोट बैंक के किले में सुरक्षित हो जाने के कारण इस देश के नेताओं ने जितने भ्रष्टाचार व अनर्थ किए,वह एक रिकाॅर्ड है।
यह आजादी के बाद ही शुरू हो गया था।
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4.-लोहिया ने एक बार एक ऐसे व्यक्ति को पार्टी छोड़ देने को कहा था कि जिसकी दुकान में शराब बिकती थी।
रांची के उस व्यक्ति ने शराब का व्यापार छोड़ दिया,पर पार्टी नहीं छोड़ी। 
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इस देश में आज कितने नेता हैं जो शराब नहीं पीते ?
उसका युवा पीढ़ी पर कैसा असर पड़ता है ?
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5.-लोहिया ने 1967 के चुनाव से ठीक पहले कहा कि मैं सामान्य नागरिक संहिता के पक्ष में हूं।
इस पर उनके एक सहकर्मी ने कहा कि यह आपने क्या कह दिया ?!!
आप तो अब चुनाव हार जाएंगे।
उस पर डा.लोहिया ने कहा कि मैं सिर्फ चुनाव जीतने के लिए राजनीति नहीं करता।देश बनाने के लिए राजनीति करता हूं। 
उस बयान के बाद वे चुनाव हारते -हारते जीते थे।
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सामान्य नागरिक संहिता संविधान के नीति निदेशक तत्वों वाले चैप्टर में है।
आज कितने नेता राजनीतिक स्वार्थ के कारण संविधान या उसकी भावना की उपेक्षा नहीं करते हैं ?
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ये तो बानगी भर हैं।उनके बारे में और
 बहुत सारी बातें हैं।
जयंती व पुण्यतिथि के अवसरों पर मंच से उनके ऐसे गुणों की चर्चा करते आपने किसी को सुना ?
मैंने तो नहीं सुना।
अधिकतर नेता लोहिया के बहाने उनकी तस्वीर लगाकर मंचों से अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करते हैं।