शुक्रवार, 8 नवंबर 2019

नदी घाट के लिए तरसती बड़ी आबादी
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घाट पर तीखी ढलान के कारण इस साल भी मेरे गांव में
छठव्रतियों को भारी असुविधा हुई।
बिहार के सारण जिले के दरिया पुर अंचल के भरहा पुर गांव के निकट एक छोटी नदी बहती है।
कुछ साल पहले उस नदी के किनारे सुरक्षा बांध बना दिया गया।बांध ऊंचा है। 
बांध में तीखी ढलान है।
बांध बनने से पहले छठ करने में कोई खास दिक्कत नहीं थी।
क्योंकि तब ढलान तीखी नहीं थी।
  इस बिगाड़ दिए गए घाट को सुधार देने का कत्र्तव्य भी शासन का ही बनता है।
पर, आज कितने शासक अपने कत्र्तव्यों के प्रति जागरूक हैं ?
बचपन से ही उस घाट को देखता रहा हूं।
आसपास के गांवों के लोग भी वहां छठ करने आते रहे  हंै।
  इस बीच ग्रामीणों ने कुछ जन प्रतिनिधियों से संपर्क करके उनसे उनके फंड से घाट बनवाने का आग्रह किया।
पर यह काम नहीं हुआ।
दरअसल हमारा वह इलाका मिलीजुली आबादी वाला है।
अपवादों को छोड़ कर आम तौर पर जन प्रतिनिधि
किसी खास जाति -समुदाय की बड़ी आबादी वाले गांवों में ही अपने फंड के जरिए विकास  कामों को प्राथमिकता देते हैं ताकि थोड़ी लागत में ही थोक वोट संग्रह की गुंजाइश बन जाए।
पता नहीं, आम लोगों की खास जरुरतों पर कब ध्यान दिया जाएगा ?  

औरंगजेब ने जहांआरा को शाहजहां के साथ कैदखाने में रहने की इजाजत दे दी थी।
अंग्रेजों ने भी जेल में डा.लोहिया को जय प्रकाश नारायण के साथ रहने की अनुमति दी थी।
पर, इमरजेंसी में किसी मनपसंद राजनीतिक कैदी को जय प्रकाश नारायण के साथ रहने की इजाजत इंदिरा गांधी सरकार ने नहीं दी। --सु.कि.

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

 दोहरा मापदंड
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राजस्थान के मुख्य मंत्री अशोक गहलोत ने नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी सोसायटी से डा.कर्ण सिंह तथा अन्य कांग्रेसियों के निकाले जाने पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है।
इससे पहले खुद गहलोत साहब ने राजस्थान में सत्ता संभालते ही पहले से जारी जेपी सेनानी पेंशन को बंद कर दिया।
मध्य प्रदेश में कमलनाथ ने भी यही काम किया।
  यदि गहलोत को जय प्रकाश नारायण का नाम अच्छा नहीं लगता तो भाजपाइयों को नेहरू मेमोरियल में सिर्फ कांग्रेसियों का जमावड़ा अच्छा नहीं लगता।
30 एकड़ भूमि में स्थित नेहरू स्मारक यानी तीन मूत्र्ति भवन में यदि नेहरू सहित सभी पूर्व प्रधान मंत्रियों की स्मृतियां सहेजी जाएं तो देश के अधिकतर लोगों को अच्छा लगेगा।
पर, नेहरू-इंदिरा परिवार और कांग्रेस चाहते हैं कि 30 एकड़ पर सिर्फ एक ही परिवार का बौद्धिक कब्जा रहे।
  सत्ता में जो आएगा,वह अपनी नीतियों -रणनीतियों के अनुसार ही तो काम करेगा।
    

बोफर्स में दलाली की खबर अंततः सच साबित हुई
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मंगलवार को आयकर विभाग ने मुम्बई स्थित विन चड्ढ़ा के फ्लैट को 12 करोड ़2 लाख रुपए में नीलाम कर दिया।
बोफर्स दलाल दिवंगत विन चड्ढ़ा के परिजन ने इस नीलामी का विरोध तक नहीं किया।
आयकार न्यायाधीकरण ने 2010 में ही कह दिया था कि बोफर्स की दलाली के मद में 41 करोड़ रुपए क्वात्रोचि और विन चड्ढ़ा को मिले थे।
उस पर भारत सरकार का आयकर बनता है।
आयकर महकमे ने सूद के साथ विन चड्ढ़ा पर 224 करोड़ रुपए का दावा ठोका था।
इस आयकर की वसूली के लिए मन मोहन सरकार ने दस साल में कुछ नहीं किया।
यहां तक कि उस सरकार ने बोफर्स से संबंधित मुकदमे को सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने तक नहीं दिया।
पर मोदी सरकार ने कदम उठाया और नीलामी भी हो गई।
  इस नीलामी के साथ यह  प्रचार गलत निकला कि बोफर्स सौदे में कोई दलाली नहीं ली गई थी।
याद रहे कि राजीव गांधी की सरकार के लोग लगातार क्वात्रोचि और विन चड्ढ़ा का बचाव करते रहे।मतदाताओं ने
राजीव गांधी व उनके समर्थकों की बातों पर अविश्वास किया।नतीजतन 1989 के लोस चुनाव में कांग्रेस हार गई। 

  

बुधवार, 6 नवंबर 2019

   जैसी समस्या,वैसा उपाय
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गुजरात आतंक विरोधी विधेयक, 2015 को अंततः राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई।
 इस संबंध में विधेयक गुजरात विधान सभा ने पहली बार 2004 में पास किया था।
 पर, राष्ट्रपति ने उसको अपनी मंजूरी नहीं दी।
यानी, मन मोहन सिंह सरकार ने अपने शासनकाल में उसकी मंजूरी के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश नहीं की।
  दुनिया के जिन -जिन देशों को आतंक की मार झेलनी पड़ रही है,उन देशों ने जरुरत के अनुसार अपने यहां कानून कड़े किए।
पर उसके विपरीत 2004 में मन मोहन सरकार के सत्ता में आने के बाद पहले से बने कड़े व कारगर कानून पोटा को समाप्त कर दिया गया।
   गुजरात विधान सभा ने 2004 में पारित इस विधेयक को 2015 में संशोधित रूप से पास किया।
  आतंकियों खासकर जेहादी आतंकियों के नए -नए 
खूंखार कारनामों  को देखते हुए गुजरात के इस कानून में जो प्रावधान किया गया है,उसके अनुसार  टेलिफोन पर हुई बातचीत को वैध साक्ष्य माना जाएगा।
आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमांे की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन होगा।
साथ ही, विशेष लोक अभियोजक बहाल होंगे।
संगठित अपराध के जरिए एकत्र संपत्ति की जब्ती हो सकेगी।
ऐसी संपत्ति के ट्रांसफर को रद भी किया जा सकेगा।
आशंका है कि इस देश में सक्रिय  आतंकवादियों के पक्षधर इस कानून को अदालत में चुनौती देंगे।
पर उम्मीद की जाती है कि सुप्रीम कोर्ट देशहित में ही निर्णय करेगा।
साथ ही, सरकार को चाहिए कि वह सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय को बदलने की गुहार करे जिसके तहत आरोपी की अनुमति के बगैर उसके नार्को व डी.एन.ए.टेस्ट की मनाही है। 


भ्रष्टाचार के बड़े मामलों  की सूचना  देने पर इनाम का  प्रबंध करे सरकार-सुरेंद्र किशोर  
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खबर है कि  बिहार के सरकारी  कार्यालयों में भ्रष्टाचार पर निगाह रखने के लिए राज्य का निगरानी विभाग वालंटियर तैयार कर रहा है।
  इससे बेहतर खबर कोई और नहीं हो सकती।
पर, यदि इसके साथ ही भ्रष्टाचार के बड़े मामलों  की सूचना देने पर संबंधित वालंटियर को राज्य सरकार की ओर से अच्छा-खासा इनाम देने का प्रावधान हो जाए तो यह अभियान और भी सफल होगा।
साथ ही,वालंटियर्स को आधुनिक तकनीकी से भी लैस किया जाना चाहिए।जैसे, छिपे हुए कैमरों का प्रबंध हो।
जरुरत पड़े तो पुलिस का सहयोग भी उन्हें मिले।
क्योंकि इन दिनों भ्रष्टाचारी कुछ अािक ही सीनाजोर हो गए हैं।
यदि जन समितियांें के प्रयास से  भ्रष्टाचार में कमी आए तो
आम लोगों को बड़ी राहत होगी।भ्रष्टाचार निरोधक अभियानों पर होने वाला कोई भी खर्च सार्थक ही होगा।
आज आम धारणा यह है कि सरकारी दफ्तरों में रिश्वत के बिना आम लोगों का कोई काम ही नहीं होता।
अधिकतर मामलों में यह सिर्फ धारणा नहीं बल्कि तथ्य भी है।
वैसे लगभग पूरे देश की भी यही हालत है।
इसीलिए तो केंद्र सरकार की विभिन्न एजेंसियां इन दिनों जितने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चला रही हैं,वह एक रिकाॅर्ड है।
 वैसे में बिहार सरकार का भी कुछ कत्र्तव्य बनता है।
लगता है कि उसने अपने कत्र्तव्य पालन की दिशा में ठोस कदम उठा लिया है।
बिहार में  कई लोग यह सवाल पूछते हैं कि जब इस राज्य में राजनीतिक कार्यपालिका के शीर्ष पर बैठे दो प्रमुख नेताओं की निजी संपत्ति एकत्र करने में कोई रूचि  नहीं है,तो फिर भी बिहार सरकार के दफ्तरों में रिश्वतखोरी कम क्यों नहीं हो रही है ?
इस सवाल का जवाब नहीं मिलता।इसका जो भी कारण हो,उसकी तलाश कर उसे दूर करना ही होगा।
  --कैसे बढ़े अदालती सजाओं का प्रतिशत--
आई.पी.सी.और सीआर.पी.सी.में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव का प्रस्ताव है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में यह संकेत दिया है।
सन 1860 में बने इन कानूनों में समय की जरुरतों के अनुसार बदलाव जरुरी भी है।
  अन्य जो बदलाव होने हैं  ,वे तो होंगे ही।
पर क्या एक खास संदर्भ
में इन कानूनों में बदलाव की सख्त जरुरत नहीं है ?
  सामान्य अपराधों के तहत आरोपितों की सजा का प्रतिशत इस देश में सिर्फ 46 है।
इतना ही नहीं,सिर्फ 6 प्रतिशत आरोपित राजनीतिक नेताओं को ही अभियोजन पक्ष अदालतों से सजा दिलवा पाता है।
  आखिर ऐसा क्यों होता है ?
क्या इसको ध्यान में रखते हुए इन कानूनों में संशोधन किया जा सकेगा ताकि सजा का प्रतिशत बढ़े ?
ऐसा क्यों है कि इसी देश के केरल राज्य में कुल आरोपितोें में 
से 77 प्रतिशत को सजा मिल जाती है ?केंद्र केरल की इस उपलब्धि का अध्ययन करे।
यह माना जा सकता है कि हम जापान और अमेरिका नहीं बन सकते जहां सजा का प्रतिशत 90 से भी अधिक है।
पर केेरल से तो कुछ सीखा ही जा सकता है।
     --भूली-बिसरी याद-- 
सन 1926 में लाल बहादुर शास्त्री अछूतोद्धार कार्यक्रम के सिलसिले में मेरठ प्रमंडल में रहते थे।
उस कार्यक्रम के सिलसिले में मुजफ्फर नगर  जनपद के भैंसी गांव के जसवंत सिंह से शास्त्री जी की घनिष्ठता हो गई।
 सन 1965 में जसवंत सिंह प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री से मिलने दिल्ली गए ।
मुलाकात नहीं हो सकी।निजी सचिव ने मिलने नहीं दिया।
लौटकर जसवंत सिंह ने शास्त्री जी को लिखा,
‘अब आपकी -हमारी मित्रता कैसी ?’
शास्त्री जी ने पत्र पढ़ा।
उन्हें बड़ा कष्ट हुआ।
दो -चार दिन बाद ही उन्होंने मुजफ्फर नगर क्षेत्र का कार्यक्रम बनाया।
हेलिकाॅप्टर से भैंसी गांव में उतरे।
सुरक्षाकर्मियों के तमाम बंधनों तथा प्रधान मंत्री पद की मर्यादाओं की चिंता किये बिना वे पुरानी पगडंडियों पर होते हुए सीधे जसवंत सिंह के घर जा पहुंचे।
 उन्होंने  पहंुचते ही अपने पुराने दोस्त से कहा,‘‘साग रोटी खाने का तो समय नहीं है।
एक गिलास मट्ठा पिलवाओ।
सुरक्षा अधिकारी के हिचकिचाने पर प्रधान मंत्री ने कहा कि ‘भाई, इस घर का मट्ठा हमेशा मेरे लिए अमृत के समान रहा है।
इस कमरे में बैठकर मैंने न जाने कितनी बार मट्ठे के साथ साग -रोटी खाई है।’
शास्त्री जी की सादगी देखकर जसवंत और उनके परिवार के सदस्यों की आंखों में आंसू आ गए।
      --और अंत में-- 
भाजपा ने महाराष्ट्र में गैर मराठा और हरियाणा में गैर जाट समुदाय से मुख्य मंत्री बना कर एक राजनीतिक प्रयोग किया था।
 भाजपा का यह प्रयोग महाराष्ट्र में तो सफल रहा,पर हरियाणा में विफल हो गया।
उम्मीद है कि आगे ऐसा प्रयोग करने से पहले भाजपा सावधानी बरतेगी।  
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25 अक्तूबर, 2019 के ‘प्रभात खबर,’पटना में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से ।



    

मंगलवार, 5 नवंबर 2019


भ्रष्टाचार में कमी और सद्व्यवहार से मजबूत होंगे सार्वजनिक उपक्रम--सुरेंद्र किशोर
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पिछले दिनों मैं पटना स्थित दूर संचार आॅफिस गया था।
वहां  अपने बड़े साइज के मोबाइल सीम को छोटे साइज में बदलवाना था।
   जरुरी था,इसलिए गया अन्यथा किसी सरकारी दफ्तर में जाने से अक्सर बचता रहा हूं।
  क्योंकि अधिकतर सरकारी आॅफिस खराब व्यवहार के लिए जाने जाते हैं।कुछ और के लिए भी।
  पर,उस दिन नजारा बदला हुआ था।
मुख्य गेट से प्रवेश करते ही छोटे-छोटे शामियाने के नीचे  बैठे कई लोग मिले।
बी.एस.एन.एल.ने अपने कुछ काम उन्हें ‘आउटसोर्स’ कर
दिए  हंै।
  देखते ही वे मुझे भइया-चाचा कहने लगे।
उन्होंने मेरा काम भी तुरंत कर  दिया।
   मेरे पास 1983 से टेलीफोन रहा।अब नहीं है।
कुछ समय के लिए मैंने ब्राॅडबैंड सेवा भी ली थी।
पर बी.एस.एन.एल.से मेरा अनुभव बहुत खराब रहा।
एक- एक कर सब छूटता गया।
पर, उसका मोबाइल फोन अब भी मेरे पास है।
 ऐसे ही कारणों से यह जरुरी सार्वजनिक सेवा भी घाटे में चली गई।
अब सरकार 80 हजार कर्मचारियों को वी.आर.एस.देने की तैयारी में हैं।सैलरी बिल आधा जो करना है।
एम.टी.एन.एल.और बी.एस.एन.एल.को घाटे से उबारने की यह भी एक कोशिश है।दोनों का विलय हो रहा है।
 देश की सुरक्षा के हित में भी संचार सेवा सरकार के हाथों में ही रहे ,इसके लिए जरुरी है कि इसके अफसर और कर्मचारी   अपनी कार्य शैली बदलें ।  
  वे अपनी ‘ड्यूटी’ को अपनी ‘जमींदारी’ न समझें।
निजी संचार सेवाओं के कर्मियों की  व्यवहार कुशलता से सीखें।
हालंाकि बी.एस.एन.एल. और एम.टी.एन.एल.के सारे अफसर और कर्मी रुखे व्यवहार वाले ही नहीं हैं।
कई अन्य सार्वजनिक उपक्रमों पर भी यह बात लागू होती है।
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  ज्यादतियों के साथ-साथ 
पुलिस की पीड़ा भी देखिए
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में कहा कि इस देश के 90 प्रतिशत पुलिसकर्मियों को रोज 12 घंटे से अधिक ड्यूटी करनी पड़ रही है।
उनकी अधिकतर साप्ताहिक छुट्टियां भी रद हो जाया करती हैं।
 पुलिसकर्मियों की संख्या में भारी कमी के कारण ऐसा हो रहा है।
पर गृहमंत्री ने आश्वासन दिया कि उनकी समस्याएं हल की जाएंगी।
 अच्छा हुआ कि उन्होंने अपने कार्यकाल के शुरुआती महीनों  में ही ऐसा आश्वासन दे दिया।
अब अगले साढ़े चार साल तक लोग उन्हें उनके इस आश्वासन की याद दिलाएंगे।उम्मीद की जानी चाहिए कि यह वादा पूरा होगा।
हो सकता है कि  पुलिसकर्मियों की चिरपरिचित समस्या और बेहतर सेवा शत्तों की चिर लंबित मांग पूरी हो जाए।
  पुलिसकर्मियों का एक ही पक्ष आम लोगों के बीच आता है।
वह नकारात्मक पक्ष है।पर उनकी समस्याओं को गृहमंत्री ने समझा है।
 इस बीच समस्तीपुर से यह खबर आई कि छठ पूजा करने के   लिए छुट्टी हेतु एक पुलिकर्मी को छठी मैया के नाम पर शपथ 
लेनी पड़ी।
 बेचारा अफसर भी क्या करें ?
छुट्टी मांगने वाले बहुत हैं,पर सबको छुट्टी दे दे तो आखिर ड्यूटी किससे करवाए।
कम ही लोगों का इस ओर ध्यान होगा कि पुलिस थाने में कभी ताला नहीं लगता।
      वायु प्रदूषण के लिए 
    कौन कितना जिम्मेवार !
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वायु प्रदूषण के कारण भारत में 2017 में 12 लाख 40 हजार लोगों की जानें गई थीं।
यह संख्या बढ़ती ही जा रही है।
क्योंकि प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है।
ताजा खबर के अनुसार अब दिल्ली में सांस लेना मुश्किल हो रहा है ।क्योंकि प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।
इस विषम स्थिति से निपटने के लिए  दिल्ली सरकार लोगों के बीच 50 लाख मास्क बांटने जा रही है।
उधर हर साल सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारत में मरने वालों की संख्या लगभग डेढ़ लाख है।
इन दोनों तरह की मौतों के कई कारण हैं।
पर,इस बात पर भी सोच-विचार होना चाहिए कि इसके लिए खुद हम कितने जिम्मेवार हैं।
जितना सुधार हम खुद में कर सकते हैं,उतना तो हो जाए !
भारी वर्षा से गांवों की 
नई सड़कें भी क्षतिग्रस्त
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इस बार की भारी वर्षा ने शहरों में तबाही मचाई ही,गांवों की सड़कों को भी तहस-नहस कर दिया।
उनमें से कुछ सड़कों काम तो मरम्मत से ही चल जाएगा,पर कुछ अन्य का संभवतः पुनार्निर्माण करना पड़ेगा।उम्मीद है कि केंद्र सरकार इस मद में राज्य सरकार को जरुरी आर्थिक मदद मुहैया कराएगी।
  ऐसी ही एक सड़क है -दिघवारा-भेल्दी स्टेट हाईवे।
सारण जिले के उस इलाके के पिछड़ापन को देखते हुए कुछ ही साल पहले मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने उसे आर.ई.ओ. से हटा कर स्टेट हाईवे का दर्जा दिया था।उसका निर्माण भी ठीकठाक ही हुआ था।
पर इस बरसात ने उसे भारी क्षति पहुंचाई।उसकी दुर्दशा का एक बड़ा कारण यह रहा कि शीतलपुर पट्टी पुल के बंद होने के कारण उसी सड़क पर टै्रफिक का भारी बोझ पड़ गया।
अब देखना है कि राज्य की अन्य क्षतिग्रस्त सड़कों के साथ- साथ इस सड़क की मरम्मत का काम कितनी तेजी से हो पाता है।   
       और अंत में
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निर्माणाधीन खगौल - दानापुर आठ लेन सड़क को दरअसल आम लोगोंे के लिए छह लेन ही मानना चाहिए।
क्योंकि किनारे के दो लेन तो पार्किंग में ही निकल जाएंगे।
इस सड़क की दोनों ओर जो बहुमंजिली इमारतें बनी हैं या बन रही हैं,उनमें पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं की जा रही है।अपवादों की बात और है।ं