रविवार, 3 मई 2020

  धारावाहिक ‘रामायण’ की अपार 
लोकप्रियता यानी मर्यादा का संदेश !!
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धारावाहिक ‘रामायण’ ने दर्शकों की संख्या 
के मामले में
विश्व रिकाॅर्ड बना लिया।
आखिर ऐसा क्यों हुआ ?
दरअसल एक मर्यादा पुरुषोत्तम की कहानी देखने 
में लोगों की इतनी अधिक रूचि क्यों है ?
क्यों न हो ? !
आज लोक जीवन में मर्यादा की ही तो कमी
होती जा रही है।
हर तरह की मर्यादा की कमी !
जब हम आसपास मर्यादा कम देखते हैं तो उसकी 
कमी टी.वी. पर देख कर फिलहाल संतोष कर लेना चाहते हैं।
  ‘रामायण’ के दर्शकों की रिकाॅर्ड तोड़ संख्या तरह -तरह के ‘शासकों’ को भी संदेश दे रही है।
  लोक जीवन में भरसक मर्यादा कायम करने, बनाए रखने और मर्यादा का आदर्श हासिल करने की कोशिश कीजिए।
अन्यथा, आपकी खैर नहीं !
तरह -तरह के शासक का क्या अर्थ है ?
जिनके भी हाथों में किसी का भला करने या नुकसान करने की किसी तरह की ताकत है,उन सबको ‘शासक’ माना जाना चाहिए।बड़े -बड़े पदों पर आसीन लोग तो शासक हैं ही।
       ---सुरेंद्र किशोर-3 मई 2020
  

कहते हैं कि जिन पर ईश्वर प्रसन्न होते हैं,
उन्हें वे समय से पहले ही बुला लेते हैं !
मुझे नहीं मालूम कि इस कहावत में कितनी 
सच्चाई है।
किंतु जस्टिस अजय कुमार त्रिपाठी में ऐसे कई 
गुण जरुर थे जिनके कारण लोगबाग उन्हें पसंद 
करते थे।
  ईमानदारी और कत्र्तव्यनिष्ठता आज किसी भी 
क्षेत्र में विरल गुण हैं।
  त्रिपाठी जी इन गुणों के लिए जाने जाते थे।
मेरा उनसे कोई परिचय तक नहीं था।
पर, मैंने पटना हाईकोर्ट के कई ऐसे वकीलों से उनकी 
तारीफ सुनी है जिनकी बातों पर विश्वास किया जा 
सकता है।
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  --सुरेंद्र किशोर-3 मई, 20

शनिवार, 2 मई 2020



 कृषि आधारित उद्योग के विकास से बदल सकती है गांवों की तस्वीर-सुरेंद्र किशोर
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जो काम आजादी के तत्काल बाद से ही शुरू हो जाना चाहिए था,वह अब होने जा रहा है।
 बिहार के कृषि मंत्री डा.प्रेम कुमार के अनुसार राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित लघु उद्योग लगाने के लिए राज्य सरकार 90 प्रतिशत अनुदान देगी।
 वैसे कृषि आधारित मध्यम और बड़े उद्योग भी लगने चाहिए।
पर, खैर जितना हो रहा है,पहले उसका स्वागत हो।उसे सफल बनाने की कोशिश हो।
यदि  सफलता मिली तो किसानों की भी आय बढ़ेगी।
साथ ही, बेरोजगारों को काम मिलेगा।पलायन घटेगा।
किसानों की क्रय शक्ति बढ़ने से करखनिया माल भी अधिक बिकेंगे।इस तरह अन्य उद्योगों का भी विकास होगा।
  इस देश का दुर्भाग्य रहा कि आजादी के तत्काल बाद के हमारे हुक्मरानों ने खेती के बदले उद्योग को प्राथमिकता दी।
इस संबंध में चैधरी चरण सिंह जैसे जमीन से जुड़े नेताओं की राय अलग थी जिसे नजरअंदाज किया गया।
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उद्योग की राह की बाधाओं 
   को भी दूर करे सरकार
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  यदि बिहार सरकार उद्योग के विकास में बाधक तत्वों को
दूर करे तो उसकी यह महत्वाकांक्षी योजना बहुत हद तक सफल होगी।
जानकार लोग बताते हैं कि छोटी सी औद्योगिक इकाई  को लेकर भी कम से कम 15 नियम-कानूनों का पालन करना पड़ता है।
  उन नियम-कानूनों को लागू करने वाले अधिकतर सरकारी सेवकों का उद्योगपतियों के प्रति वैसा रवैया नहीं रहता जैसा गुजरात जैसे राज्यों के सरकारी कर्मियों का रहता है।
  इस स्थिति में परिवत्र्तन कैसे लाया जाए,इस पर भी राज्य सरकार को विचार करना होगा।
  जिस राज्य के अधिकतर सरकारी सेवक अपने ‘कत्र्तव्य’ को   को अपना ‘अधिकार’ समझ लेते हैं,वहां उत्साही व्यक्ति भी निराश हो जाता है।
इस स्थिति से नए उद्यमी कैसे बच पाएंगे ?
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   असामान्य दिनों में घूसखोरों के 
  खिलाफ असामान्य कार्रवाई जरुरी
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बिहार सरकार ने गत फरवरी में यह घोषणा की कि
‘‘घूसखोरों को पकड़वाने पर 50 हजार रुपए का इनाम मिलेगा।
 भ्र्रष्टाचार मिटाने की मुहिम में आम लोगों को भी जोड़ने के उद्देश्य से यह सब किया जा रहा है।’’
 पर, किसी ने किसी घूसखोर को पकड़वा कर 50 हजार रुपए हासिल किए,ऐसी कोई खबर अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि वह खबर भी देर-सवेर मिलेगी ही।
  पर, लगता है कि इनाम की यह राशि कम है।
 राशि बढ़ने से सूचकों में उत्साह बढ़ सकता है।
 दरअसल अभी कोरोना वायरस को लेकर असामान्य स्थिति पैदा हो गई है।इसके बावजूद भ्रष्ट लोग जहां -तहां सक्रिय हैं।
इस विपत्ति से निकलने के बाद तेज विकास व पुनर्निर्माण की जरुरत पड़ेगी।
उनमें असामान्य धनराशि लगेगी।
उस धनराशि को गिद्धों से बचाना एक बड़ी समस्या होगी।
उसका उपाय पहले से सोच लेना होगा।
इनाम की राशि को एक खास दूसरी राशि से जोड़ देना चाहिए।
जब कोई रिश्वतखोर पकड़ा जाता है तो कई दफा यह भी पता चलता है कि उसने अपनी जायज आय से काफी अधिक संपत्ति भी बना ली है।
यदि सूचकों को मिलने वाली इनाम राशि को उस अवैध संपत्ति की कुल राशि से जोड़ दिया जाए तो सूचकों का उत्साह बढ़ेगा।
  यानी, जब्त अवैध धन राशि का कम से कम दस प्रतिशत सूचक को मिले।
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पुण्य तिथि पर दिनकर की याद 
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24 अप्रैल, 1974 को रामधारी सिंह दिनकर के निधन के
बाद भवानी प्रसाद मिश्र ने लिखा था,
‘‘दिनकर कम से कम 50 वर्षों से देश के हृदय की वाणी गुंजाते रहे हैं।
ऐसे दर्द और रोष के साथ कि ब्रितानी सरकार भी उन पर तमकी।
जवाहरलाल ने भी ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ काव्य लिखने के लिए दिनकर को माफ नहीं किया।
चीन के हमले के बाद उन्होंने यह काव्य लिखा था।
दिनकर उन दिनों भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार थे।
गांठ बंाध ली गयी कि ऐसे कवि को आस्तीन में पालना तो गलत ही होगा।
इस तरह दिनकर हिन्दी सलाहकार नहीं रहे।
परशुराम की प्रतीक्षा के बाद सरकार ने उन्हें किसी प्रकार का सम्मान नहीं दिया।’’
   भवानी बाबू लिखते हैं
‘‘यों तब तक सरकारी और अर्द्ध सरकारी तमाम सम्मान उन्हें प्राप्त हो चुके थे,किंतु दिनकर ऐसे सहज सम्मानित व्यक्तित्व
का नाम था सम्मान जिसके चरणों की ओर उमड़ कर आता था।दिनकर एक जादू था जो सिर पर चढ़कर बोलता था।’’
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  धारावाहिक महाभारत और 
  राही मासूम रजा
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डा.राही मासूम रजा के 1992 में निधन के तत्काल बाद 
किसी ने ठीक ही कहा था कि 
‘‘अपनी जिंदगी के 
महाभारत को राही ने छोटे परदे के ‘महाभारत’ में बदल दिया और आज उसी की बदौलत राही पूरे हिंदुस्तान के लिए एक घरेलू नाम हो गया है।
‘महाभारत’ धारावाहिक जितना व्यास है,उतना ही राही का।
अपने इस ‘समय’ को राही ने बड़े जतन से आत्मा के कोने में अंत तक बचाए रखा,संजोए रखा--इस तरह कि उसे बंबई का फिल्मी बाजार भी न खरीद  सका।’’
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   और अंत में
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सुप्रीम कोर्ट ने गत साल  चुनाव आयोग को एक
खास निदेश दिया था।
वह निदेश आपराधिक रिकाॅर्ड वाले उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाने को लेकर था।
इस संबंध में याचिका अदालत में है।
अदालत ने कहा कि आयोग इस संबंध में सुविचारित आदेश पारित करे कि ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने की अनुमति देना सही है या गलत। पर आयोग ने इस पर अब तक क्या किया, यह पता नहीं चल सका है।
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कानोंकान, 24 अप्रैल 20 प्रभात खबर,पटना 





मजदूरों का पलायन रुकेगा यदि देश का समरूप विकास हो

कोरोना महामारी के समय एक बात फिर खुल कर सामने आई है। वह यह कि कितनी बड़ी संख्या में बिहार के मजदूरों को हर साल दूसरे राज्यों में रोजी-रोटी के लिए जाना पड़ता है! अपुष्ट आकलन 30 लाख मजदूरों का है।

आजादी के बाद यदि देश का समरूप विकास हुआ होता तो शायद बिहार से मजदूरों का असामान्य पलायन हर साल नहीं होता। आजादी के बाद के वर्षों में विकास की असमान नीति के कारण कुछ राज्य उन्नत तो हुए। पर, बिहार जैसे कुछ राज्य पिछड़ गए।

बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान को तो ‘बीमारू’ राज्य कहा गया। बेहतर जीवन के लिए किसी अन्य देश या प्रदेश में किसी का जाना चिंता की बात नहीं। पर, बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए घर-द्वार-परिवार से लाखों लोगों को कोसों दूर जाना पड़े तो यह स्थिति जरूर चिंताजनक हो जाती है। उस चिंता को कोरोना जैसी विपत्ति कई गुणा बढ़ा देती है। कोई नहीं कह सकता कि यह आखिरी विपत्ति है।

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अविभाजित बिहार में इसलिए बसा टाटा नगर 
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आजादी से पहले अविभाजित बिहार के खनिज बहुल हिस्से में जमशेदजी नौसरवान जी टाटा ने उन्नीसवीं सदी में बड़ा उद्योग लगाया। उस जगह का नाम पड़ा जमशेदपुर। खनिज पदार्थों के मामले में देश संपन्न राज्य होने के कारण टाटा को गुजरात से बिहार आना पड़ा था।

रेल भाड़ा को लेकर यदि पहले की स्थिति बनी रहती तो आज भी क्या होता! जमशेदपुर की तरह अन्य अनेक बड़े आद्योगिक केंद्र बनते। लोगों को रोजगार मिलते। इस राज्य का पिछड़ापन कम होता। पर, पचास के दशक में केंद्र सरकार ने बिहार से वह बढ़त छीन ली। रेल भाड़ा समानीकरण नीति, 1952 ने अविभाजित बिहार की आर्थिक प्रगति रोक दी।

पंजाब की तरह यहां खेती का विकास हुआ होता तो एक हद तक क्षतिपूर्ति होती। पर वह भी नहीं होने दिया गया। कोसी और गंडक सिंचाई योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं।

रेल भाड़ा समानीकरण नीति के तहत खनिज पदार्थों की ढुलाई का रेल भाड़ा पूरे देश के लिए एक समान कर दिया गया था। नियम बना कि धनबाद से सौ टन कोयला रांची पहुंचाने का जितना रेल भाड़ा लगेगा, उतना ही रेल भाड़ा उसे मद्रास या बंबई पहुंचाने में लगेगा। फिर बंबई का कोई उद्योगपति बंदरगाह के पास का इलाका छोड़कर बिहार में उद्योग क्यों लगाता?

इस नीति का जब भारी विरोध हुआ तो नब्बे के दशक में केंद्र सरकार ने इसे समाप्त किया। पर एक अनुमान के अनुसार उस नीति से अविभाजित बिहार को इस बीच 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान पहुंच चुका था। उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी। विशेष राज्य के दर्जे की मांग उसी क्षतिपूर्ति के लिए होती रही है। नतीजतन बिहार से मजदूरों का पलायन अवश्यंवी हो गया।

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अब नहीं होगी खेती के लिए मजदूरों की कमी
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बाहर से आए और आ रहे मजदूरों में से अनेक लोग अब बिहार में ही रहकर कुछ काम -धंधा करना चाहते हैं। यदि ऐसा हुआ तो खेती के लिए मजदूरों की अब पहले जैसी कमी नहीं रहेगी। पर, इसके साथ ऐसे उपाय भी किए जा सकते हैं जिनसे मजदूर और किसान दोनों पहले की अपेक्षा बेहतर स्थिति में रहें। 

एक उपाय तुरंत दिखाई पड़ रहा है। यदि मनरेगा मजदूरों को किसानों की खेती से जोड़ दिया जाए तो दोनों फायदे में रहेंगे। किसान के खेत में काम के लिए मजदूरों को मनरेगा फंड से भी यदि अलग से कुछ पैसे मिलने लगे तो खेती के काम तेजी से आगे बढ़ेंगे।

तब मनरेगा का बजट भी थोड़ा कम हो जाएगा और किसानों को भी कम मजदूरी देनी पड़ेगी।इसके बावजूद दोनों को मिलाकर पहले की अपेक्षा मजदूरों को अधिक मजदूरी मिलेगी। इन दिनों खेती में लागत अधिक और आय कम है। नतीजतन कई किसान अपनी कुछ ही जमीन पर खेती  कर पा रहे हैं। यदि मजदूरी कम देने पड़ें तो किसान जमीन परती नहीं छोड़ेगा। 

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 भूली-बिसरी याद
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आज मधु लिमये का जन्म दिन है। इस अवसर पर उनके बारे में कुछ बातें! वे बिहार से बारी -बारी से चार बार लोकसभा सदस्य चुने गए थे। उनके बारे में बिहार के अनेक लोग कई बातें तो पहले से ही जानते हैं। पर, कुछ जिज्ञासु लोग एक सवाल अक्सर करते हैं। वह यह कि सन 1977 में मधु लिमये मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल में शामिल क्यों नहीं हुए? क्या मोरारजी ने उनके नाम पर एतराज किया था ?

इस सवाल का जवाब दिया था उनकी पत्नी चंपा लिमये ने। चंपा जी के अनुसार, ‘‘मोरारजी देसाई ने मधु जी से कहा था कि ‘तुम, जार्ज और मधु दंडवते में से दो लोग मुझे चाहिए अपने मंत्रिमंडल में। पर मधु लिमये ने मोरारजी से कहा कि आप जार्ज फर्नांडिस और मधु दंडवते को  मंत्रिमंडल में शामिल कर लीजिए।’ वे शामिल हुए भी।

लिमये ने इसका यह कारण बताया था, ‘‘ जार्ज पर बड़ौदा डायनामाइट केस चल रहा है। एक मानी में वह केस उस पर टंगी हुई तलवार है। और बाहर रह कर वह रेल हड़ताल आदि कामों से जनता सरकार को परेशानी में डाल देगा। इसलिए जार्ज को मंत्रिमंडल में शामिल करके उसे रचनात्मक काम करने देना चाहिए।’’

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और अंत में
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जानकार सूत्रों के अनुसार बिहार सहित देश के 17 राज्यों में केंद्रीय सचिवालय की शाखाएं खुलेंगी। इस पर केंद्र सरकार ने प्रारंभिक काम भी शुरू कर दिया है। राज्य मुख्यालयों में स्थित केंद्र सरकार के सारे कार्यालय एक जगह रहेंगे। उसके लिए 140 एकड़ जमीन की जरूरत पड़ेगी।

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(1 मई 2020 के प्रभात खबर, पटना में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम ‘कानोंकान’ से।)

  



शुक्रवार, 1 मई 2020

उनके जन्मदिन पर मधु लिमये की याद में

इस अवसर पर उनके बारे में कुछ बातें!

वे बिहार से बारी -बारी से चार बार लोकसभा सदस्य चुने गए थे। उनके बारे में अनेक लोग कई बातें तो पहले से ही जानते हैं। पर, कुछ जिज्ञासु लोग अब भी एक सवाल अक्सर करते हैं। वह यह कि सन 1977 में मधु लिमये मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल में शामिल क्यों नहीं हुए ? क्या मोरारजी ने उनके नाम पर एतराज किया था ?

इस सवाल का जवाब दिया था उनकी पत्नी चंपा लिमये ने। चंपा जी के अनुसार, ‘‘मोरारजी देसाई ने मधु जी से कहा था कि तुम, जार्ज और मधु दंडवते में से दो लोग मुझे चाहिए अपने मंत्रिमंडल में। पर मधु लिमये ने मोरारजी से कहा कि आप जार्ज फर्नांडिस और मधु दंडवते को शामिल कर लीजिए।’ वे शामिल हुए भी।

मधु लिमये ने इसका यह कारण बताया था, ‘‘ जार्ज पर बड़ौदा डायनामाइट केस चल रहा है।
एक मानी में वह केस उसपर टंगी हुई तलवार है। और बाहर रहकर वह रेल हड़ताल आदि कामों से जनता सरकार को परेशानी में डाल देगा। इसलिए जार्ज को मंत्रिमंडल में शामिल करके उसे रचनात्मक काम करने देना चाहिए।’’


1 मई, 2020 के प्रभात खबर, पटना में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से।

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मधु लिमये के बारे में कुछ अन्य जानकारियां -

1.-मधु जी दो बार मुंगेर और दो बार बांका से लोकसभा के सदस्य चुने गए थे।

दो बार उप चुनाव में जीते और दो बार जनरल चुनाव में।

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2.-बिना हंगामा किए और सदन के वेल में गए बिना मधु लिमये ने लोकसभा में जितनी कारगर भूमिका निभाई थी, वह एक रिकाॅर्ड है। जब वे सदन में बोलने के लिए खड़े होते थे तो सत्ताधारी बेंच में सिहरन होने लगती थी-- पता नहीं आज किस मंत्री की बारी है ! 

3.-मधु लिमये ने जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया था। वे पार्टी के महासचिव थे।

जब उन्होंने देखा कि भारतीय मजदूर संघ और विद्यार्थी परिषद जनता पार्टी के क्रमशः मजदूर संगठन और छात्र-युवा संगठन की बैठकों में शामिल नहीं हो रहे हैं तो उन्होंने इस सवाल को उठाने की अधिक जरूरत महसूस की।

वैसे 1976 में ही चौधरी चरण सिंह ने दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया था जब कई दलों को मिलाकर जनता पार्टी का गठन हो रहा था।

4.-यह कहना सही नहीं है कि दोहरी सदस्यता के सवाल पर ही जनता पार्टी की मोरारजी सरकार गई और पार्टी का विभाजन हुआ। यह भी कहना सही नहीं है कि चौधरी चरण सिंह के कारण देसाई सरकार गई। दरअसल इतनी राजनीतिक ताकत चरण सिंह में तब तक रह भी नहीं गई थी।

मोरारजी सरकार तब गई जब जनता पार्टी ने 1979 के फरवरी से लेकर जून तक तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को उनके पदों से हटा दिया। वे मुख्यमंत्री थे राम नरेश यादव-उत्तर प्रदेश, कर्पूरी ठाकुर-बिहार और देवी लाल-हरियाणा। उससे पहले मोरारजी ने चरण सिंह को मंत्री पद से अगस्त, 1978 में ही हटा दिया था। राज नारायण भी मंत्रिमंडल से बाहर कर दिए गए। इसके बावजूद देसाई सरकार नहीं गिरी।

फिर चरण सिंह देसाई मंत्रिमंडल में जनवरी, 1979 में शामिल भी हो गए। जबकि चरण सिंह को इस दफा गृह जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय के बदले वित्त दे दिया गया। फिर भी सरकार नहीं गिरी।उधर राज नारायण जी को फिर से मंत्री बनाने की मांग भी मोरारजी ने नहीं मानी थी। फिर भी देसाई सरकार नहीं गिरी।

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हां, जब तीन मुख्यमंत्रियों को हटाया गया तो संबंधित राज्यों के वे जनता सांसद भी विद्रोही हो गए जो तब तक नहीं हुए थे। हां, उसका लाभ जरूर चरण सिंह को मिला और वे इंदिरा गांधी की मदद से प्रधानमंत्री बन गए।

पर, चरण सिंह अपने ढंग के नेता थे। उनपर ‘चेयर सिंह’ होने का आरोप मुझे सही नहीं लगता है। उन्होंने इंदिरा गांधी के दबाव में आकर मुकदमे उठाने से साफ इनकार कर दिया। नतीजतन उनकी गद्दी जल्दी ही चली गई। कांग्रेस की कठपुतली बनकर कुछ और दिन तो पद पर बने ही रह सकते थे। हालांकि उधर इंदिरा जी भी जल्दीबाजी में ही थीं। याद रहे कि पहले के अनेक नेता ‘उद्धव ठाकरे’ जैसों से साफ अलग थे।

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कुछ मामलो में मधु लिमये का तो कोई मुकाबला ही नहीं था। मधु जी पूर्व सांसद और स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन के हकदार थे। पर, वे जिस तरह राज्यसभा में जाने के खिलाफ थे, उसी तरह पेंशन के भी। इसलिए अखबारों में लेखन से जो पारिश्रमिक उन्हें मिलता था, उसी से उनका खर्च चलता था। वे दिल्ली की गर्मी और सर्दी में भी बिना ए.सी. के रहते थे।

उनके पास कोई कार नहीं थी। आटो से कहीं जाते थे। उनके पास कोई जाता था तो वे खुद ही काॅफी बना कर पिलाते थे। शाम में ही लोगों से मिलते थे। सुबह में कोई जाता था तो वे हाथ जोड़ लेते थे--कहते थे, ‘अभी मेरे लिखने का समय है। शाम में आइएगा।’

सक्रिय राजनीति से अलग इसलिए भी हुए क्योंकि कलही समाजवादी नेताओं के लगातार आपसी झगड़े फरियाने के काम से वे ऊब चुके थे। एक संपादक ने मुझे बताया था कि जब देरी होती थी तो मधु जी पारिश्रमिक के लिए फोन भी कर दिया करते थे।

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सुरेंद्र किशोर
1 मई 2020

कोटा स्थित कोचिंग संस्थान

कोरोना महामारी के कारण पूरी तरह बदली हुई परिस्थिति में कोटा स्थित कोचिंग संस्थानों को बिहार की ओर अब रुख करना चाहिए।

यदि वहां के नामी-गिरामी मूल संस्थान खुद यहां नहीं आ सकते तो उन्हें पूरी गुणवत्ता की गारंटी के साथ पटना में स्थानीय शाखा खोलने के लिए प्रामाणिक फ्रेंचाइजी की तलाश करनी चाहिए।

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--सुरेंद्र किशोर-

अप्रैल 2020

अर्नब --गोस्वामी--के खिलाफ डेढ़-दो सौ एफआइआर

‘‘....... अर्नब --गोस्वामी--के खिलाफ जो डेढ़-दो सौ एफआइआर दर्ज हुई हैं, वे इसीलिए दर्ज हुईं कि सोनिया जी का नाम लेने की हिम्मत की। जो सोनिया जी का नाम लेगा उसकी हिम्मत तोड़ना और सबक सिखना जरूरी है। वास्तव में दरबारी कांग्रेसियों की आंखें सोनिया जी की विराटता देखने की इतनी आदी हो चुकी हैं कि कि उन्हें सूक्ष्म दिखता ही नहीं। उन्हें सोनिया के जन्म के देश और शादी के पूर्व का नाम लेना नाकाबिले बर्दाश्त लगता है।

अर्नब ने वह किया जो पहले किसी ने नहीं किया। उन्होंने इस तिलिस्म को तोड़ दिया कि ‘परिवार’ के बारे में कोई कुछ व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं कर सकता। आप इस देश के प्रधानमंत्री को गाली दीजिए। संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बारे में कुछ भी बोलिए, वह सब संविधान में मिली वाणी की स्वतंत्रता के दायरे में आता है।

आप चाहें तो इस देश के खिलाफ भी बोल सकते हैं। इसे आपका मौलिक अधिकार माना जाएगा,जिसे कोई छीन नहीं सकता। पर कांग्रेस की नजर में भारतीय संविधान का एक अलिखित अनुच्छेद है जो लिखे हुए संविधान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है और वह यह कि ‘परिवार’ संवैधानिक व्यवस्थाओं और कानून से ऊपर है।

आज जिस तरह की पत्रकारिता और खास कर टीवी पत्रकारिता हो रही है उसमें कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उसकी कमीज दूसरे से ज्यादा सफेद है। कोई लुटियन मीडिया की बात करता है तो कोई गोदी मीडिया की। अपना -अपना एजेंडा बेचने का समय है।

पत्रकारिता का प्रमाणपत्र बांटने का धंधा तेजी पर है। क्षण भर में घोषणा हो जाती है कि फलां पत्रकार को तो मैं पत्रकार मानता ही नहीं। समर्थन -विरोध की एक मुहिम चल पड़ती है। मुहिम चलाने वाले कभी अपने गिरेबां में नहीं झांकते।...........।’’

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आज के दैनिक जागरण में प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह के लेख का एक अंश।

30 अप्रैल 2020