शुक्रवार, 1 मई 2020

उनके जन्मदिन पर मधु लिमये की याद में

इस अवसर पर उनके बारे में कुछ बातें!

वे बिहार से बारी -बारी से चार बार लोकसभा सदस्य चुने गए थे। उनके बारे में अनेक लोग कई बातें तो पहले से ही जानते हैं। पर, कुछ जिज्ञासु लोग अब भी एक सवाल अक्सर करते हैं। वह यह कि सन 1977 में मधु लिमये मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल में शामिल क्यों नहीं हुए ? क्या मोरारजी ने उनके नाम पर एतराज किया था ?

इस सवाल का जवाब दिया था उनकी पत्नी चंपा लिमये ने। चंपा जी के अनुसार, ‘‘मोरारजी देसाई ने मधु जी से कहा था कि तुम, जार्ज और मधु दंडवते में से दो लोग मुझे चाहिए अपने मंत्रिमंडल में। पर मधु लिमये ने मोरारजी से कहा कि आप जार्ज फर्नांडिस और मधु दंडवते को शामिल कर लीजिए।’ वे शामिल हुए भी।

मधु लिमये ने इसका यह कारण बताया था, ‘‘ जार्ज पर बड़ौदा डायनामाइट केस चल रहा है।
एक मानी में वह केस उसपर टंगी हुई तलवार है। और बाहर रहकर वह रेल हड़ताल आदि कामों से जनता सरकार को परेशानी में डाल देगा। इसलिए जार्ज को मंत्रिमंडल में शामिल करके उसे रचनात्मक काम करने देना चाहिए।’’


1 मई, 2020 के प्रभात खबर, पटना में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से।

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मधु लिमये के बारे में कुछ अन्य जानकारियां -

1.-मधु जी दो बार मुंगेर और दो बार बांका से लोकसभा के सदस्य चुने गए थे।

दो बार उप चुनाव में जीते और दो बार जनरल चुनाव में।

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2.-बिना हंगामा किए और सदन के वेल में गए बिना मधु लिमये ने लोकसभा में जितनी कारगर भूमिका निभाई थी, वह एक रिकाॅर्ड है। जब वे सदन में बोलने के लिए खड़े होते थे तो सत्ताधारी बेंच में सिहरन होने लगती थी-- पता नहीं आज किस मंत्री की बारी है ! 

3.-मधु लिमये ने जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया था। वे पार्टी के महासचिव थे।

जब उन्होंने देखा कि भारतीय मजदूर संघ और विद्यार्थी परिषद जनता पार्टी के क्रमशः मजदूर संगठन और छात्र-युवा संगठन की बैठकों में शामिल नहीं हो रहे हैं तो उन्होंने इस सवाल को उठाने की अधिक जरूरत महसूस की।

वैसे 1976 में ही चौधरी चरण सिंह ने दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया था जब कई दलों को मिलाकर जनता पार्टी का गठन हो रहा था।

4.-यह कहना सही नहीं है कि दोहरी सदस्यता के सवाल पर ही जनता पार्टी की मोरारजी सरकार गई और पार्टी का विभाजन हुआ। यह भी कहना सही नहीं है कि चौधरी चरण सिंह के कारण देसाई सरकार गई। दरअसल इतनी राजनीतिक ताकत चरण सिंह में तब तक रह भी नहीं गई थी।

मोरारजी सरकार तब गई जब जनता पार्टी ने 1979 के फरवरी से लेकर जून तक तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को उनके पदों से हटा दिया। वे मुख्यमंत्री थे राम नरेश यादव-उत्तर प्रदेश, कर्पूरी ठाकुर-बिहार और देवी लाल-हरियाणा। उससे पहले मोरारजी ने चरण सिंह को मंत्री पद से अगस्त, 1978 में ही हटा दिया था। राज नारायण भी मंत्रिमंडल से बाहर कर दिए गए। इसके बावजूद देसाई सरकार नहीं गिरी।

फिर चरण सिंह देसाई मंत्रिमंडल में जनवरी, 1979 में शामिल भी हो गए। जबकि चरण सिंह को इस दफा गृह जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय के बदले वित्त दे दिया गया। फिर भी सरकार नहीं गिरी।उधर राज नारायण जी को फिर से मंत्री बनाने की मांग भी मोरारजी ने नहीं मानी थी। फिर भी देसाई सरकार नहीं गिरी।

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हां, जब तीन मुख्यमंत्रियों को हटाया गया तो संबंधित राज्यों के वे जनता सांसद भी विद्रोही हो गए जो तब तक नहीं हुए थे। हां, उसका लाभ जरूर चरण सिंह को मिला और वे इंदिरा गांधी की मदद से प्रधानमंत्री बन गए।

पर, चरण सिंह अपने ढंग के नेता थे। उनपर ‘चेयर सिंह’ होने का आरोप मुझे सही नहीं लगता है। उन्होंने इंदिरा गांधी के दबाव में आकर मुकदमे उठाने से साफ इनकार कर दिया। नतीजतन उनकी गद्दी जल्दी ही चली गई। कांग्रेस की कठपुतली बनकर कुछ और दिन तो पद पर बने ही रह सकते थे। हालांकि उधर इंदिरा जी भी जल्दीबाजी में ही थीं। याद रहे कि पहले के अनेक नेता ‘उद्धव ठाकरे’ जैसों से साफ अलग थे।

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कुछ मामलो में मधु लिमये का तो कोई मुकाबला ही नहीं था। मधु जी पूर्व सांसद और स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन के हकदार थे। पर, वे जिस तरह राज्यसभा में जाने के खिलाफ थे, उसी तरह पेंशन के भी। इसलिए अखबारों में लेखन से जो पारिश्रमिक उन्हें मिलता था, उसी से उनका खर्च चलता था। वे दिल्ली की गर्मी और सर्दी में भी बिना ए.सी. के रहते थे।

उनके पास कोई कार नहीं थी। आटो से कहीं जाते थे। उनके पास कोई जाता था तो वे खुद ही काॅफी बना कर पिलाते थे। शाम में ही लोगों से मिलते थे। सुबह में कोई जाता था तो वे हाथ जोड़ लेते थे--कहते थे, ‘अभी मेरे लिखने का समय है। शाम में आइएगा।’

सक्रिय राजनीति से अलग इसलिए भी हुए क्योंकि कलही समाजवादी नेताओं के लगातार आपसी झगड़े फरियाने के काम से वे ऊब चुके थे। एक संपादक ने मुझे बताया था कि जब देरी होती थी तो मधु जी पारिश्रमिक के लिए फोन भी कर दिया करते थे।

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सुरेंद्र किशोर
1 मई 2020

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