गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

 अखबारों में छप रही कुछ गलतियां

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चुनाव के समय पिछले चुनावी आंकड़े

व विजयी-पराजित नेताओं के नाम छापने की परंपरा रही है।

पाठकों को यह सब जानने में रूचि भी रहती है।

इस सिलसिले में तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए।

शंका होने पर मूल स्त्रोत पर जाना चाहिए।

वह काम कम ही हो रहा है।

श्रमसाध्य जो है !

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बिहार विधान सभा के पूर्व स्पीकर दिवंगत राधानंदन झा ने एक बहुत 

अच्छा काम किया है।

उन्होंने ‘‘ओरिजिन एंड डेवलपमेंट आॅफ बिहार लेजिस्जेचर’’

नाम से एक पुस्तक संपादित की।

उसमें बहुत सारी सूचनाएं हैं।

उसकी काॅपी अब उपलब्ध नहीं है।

पत्रकारों को चाहिए कि वे अगले स्पीकर साहब से आग्रह करके 

उसका संशोधित संस्करण छपवाएं।

वह जानकारी का एक मूल स्त्रोत है।

अत्यंत थोड़ी सी गलतियां उसमें भी है।

जिन्हें अगले संस्करण में सुधारा जा सकता है।

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 हाल में बिहार के एकाधिक अखबारों ने यह लिख दिया कि सन 1972 में एक भी महिला बिहार विधान सभा चुनाव नहीं जीत सकीं।

जबकि 12 आम चुनाव में व एक उप चुनाव में विजयी हुई थीं।

मुझे लगा कि इस मामले में एक अखबार की गलती दूसरे ने उतार ली।

पहले ने तो भूल सुधार भी छापा।

पर दूसरे ने ? 

पता नहीं । 

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एक अखबार ने लिखा कि सत्येंद्र नारायण सिंह ने नबी नगर से विधान सभा का उप चुनाव जीता  था।

जबकि सच यह है कि उन्होंने गोपाल गंज से विधान सभा का उप चुनाव 1961 मंें जीता था।

डा.अनुग्रह नारायण सिंह के निधन से जो नबीनगर सीट खाली हुई थी,उसके उप चुनाव में 1957 में पी.एन.सिंह विजयी हुए थे।

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हाल की गलती

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1967 में गोपाल गंज से हरिशंकर सिंह विधायक बने थे न कि सिया बिहारी शरण।

शरण साहब उसी साल मीरगंज से विजयी हुए थे।

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ऐसी गलतियां इसलिए होती हंै क्योंकि हमारे अधिकतर अखबारों के पास कोई संदर्भालय नहीं है।

अनेक लेखक और पत्रकार भी सुनी -सुनाई बातों पर ही अधिक भरोसा करने लगे हैं।

जो व्यक्ति आपको बता रहा है,उसकी स्मरण शक्ति पर तो भरोसा कीजिए ही नहीं,अपनी पर भी नहीं।

मैं भी नहीं करता।

इसीलिए मैंने पिछले 50 साल से तिनका -तिनका जोड़कर 

अपना निजी पुस्तकालय-सह संदर्भालय बनाया है।

एक ने हाल में मुझे फोन किया।

कहा कि आपके पास तो बहुत अच्छा संदर्भालय है।

मैं उसका इस्तेमाल करना चाहता हूं।

मैंने उन्हें विनम्र्रतापूर्वक कहा कि वह तो है,पर मैं लाइब्रेरियन नहीं हूं।

 मैं खुद चीजें खोज-खोज कर देने लगूंगा तो अपना काम कब और कैसे कर पाऊंगा ?

जीवन छोटा है,काम अधिक।

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यह भी कहा कि आप रोज जो अखबार मंगाते हैं,उसमें से जो सामग्री विश्वसनीय लगे,उसकी कटिंग करके विषयवार लिफाफे में रखते  जाइए।

कुछ साल के बाद आपको कुछ बातें तो किसी से पूछनी ही नहीं पड़ेंगी।

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 यह सब मेरे लिखने का आशय यह है कि अनेक इतिहास लेखक भी ऐसे ही अखबारों से सूचनाएं उठाते हैं।

वे कई बार धोखा खा जाते हैं।

इस तरह वे अनजाने में अगली पीढियों को भी गलत इतिहास पढ़ाते हैं।

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--सुरेंद्र किशोर-7 अक्तूबर 20

 



रविवार, 4 अक्टूबर 2020

    दोहरा मापदंड

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हाथरस बलात्कार- सह-हत्याकांड के खिलाफ राहुल गांधी-प्रियंका वाड्रा के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने जोरदार प्रदर्शन किया।

अच्छा किया।हाथरस कांड जघन्य है।

  हालांकि यू.पी.पुलिस कह रही है कि बलात्कार का सबूत नहीं है।

पर, क्या हत्या कम जघन्य अपराध है ?

पर,राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के ही बलरामपुर दलित बलात्कार- सह -हत्याकांड पर

कोई प्रदर्शन नहीं किया।

क्या कोई बयान भी दिया ?

पता नहीं।

ऐसा दोहरा मादंड क्यों ?

राहुल गांधी के राजनीतिक विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि ‘‘क्योंकि बलरामपुर बलात्कार सह हत्याकांड कांड के आरोपी ऐसे समूह के सदस्य हैं जहां से कांग्रेस को वोट मिलने की उम्मीद रहती है।

याद रहे कि हाथरस कांड के आरोपी भाजपा के वोट बैंक समूह से आते हंै।

  क्या यह आरोप सच है ? 

हालांकि तथाकथित सेक्युलर दलों व बुद्धिजीवियों पर ऐसा आरोप पहली बार नहीं लग रहा है।

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--सुरेंद्र किशोर-2 अक्तूबर 20 


 


 मतदान केंद्रों पर इस बार कम मतदाता जुटने की आशंका निराधार--सुरेंद्र किशोर

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बिहार के विभिन्न हिस्सों से मिल रही सूचनाओं के अनुसार 

सड़कों,बाजारों तथा अन्य जगहों में अब भारी भीड़ देखी जा रही है।

 ऐसे में यह आशंका निर्मूल लग रही है कि मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की इस बार कमी रहेगी।

हां, कुछ दलों ने चुनाव आयोग से यह मांग की है कि वह मतदाताओं को अधिक से अधिक संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचाने का उपाय करे।

अधिक उम्मीद इसी बात की है कि  आयेाग अपनी वह भूमिका इस बार अधिक गंभीरता से  निभाएगा ।

किंतु राजनीतिक दलों के कार्यकत्र्ताओं की भी जिम्मेदारी इस बार बढ़ी हुई है।वे मतदाताआंे को मतदान केंद्रों तक जाने के लिए प्रेरित करें। 

 संकेत मिल रहे हैं कि जो मतदातागण इस चुनाव को ऐतिहासिक और निर्णायक मानते हैं,वे पहले की तरह इस बार भी मतदान करेंगे ही।

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  कमजोर पंखों से ऊंची उड़ान ?

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कमजोर पंखों से ऊंची उड़ान करने की जिद करने वाले कुछ नेतागण चुनावी मैदान में आए दिन धराशायी होते रहते हैं।

गत लोक सभा चुनाव में बिहार के वैसे ही कुछ नेताओं को हास्यास्पद पराजय का तीखा स्वाद चखना पड़ा था।

लगता है कि अब भी वे उस सदमे से उबर नहीं पाए है।

वैसे ही कुछ अन्य अति महत्वाकांक्षी नेतागण बिहार विधान सभा के इस चुनाव में मुंह की खाएंगे,राजनीतिक प्रेक्षक ऐसा अनुमान लगा रहे हंै।

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   मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार !

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कई साल पहले की बात है।

एक पूर्व केंद्रीय मंत्री से मैंने पूछा कि ‘क्या आप

बिहार में मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार हैं ?’

उन्होंने कहा कि ‘कत्तई नहीं।’

‘फिर आपकी पार्टी ऐसा प्रचार क्यों कर रही है ?’

मेरा दूसरा  सवाल था।

उन्हांेने कहा कि ‘‘मेरे बारे में जब यह प्रचार होगा कि मैं मुख्य मंत्री का उम्मीदवार हूं,तभी  मेरे ‘खास वोटर’ अधिक  उत्साह से हमारे उम्मीदवारों को वोट देंगे।’’

  बिहार विधान सभा के मौजूदा चुनाव में भी शायद इसी रणनीति के तहत कुछ नेता मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार बताए जा रहे हैं ।

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एक सलाह जो शायद ही मानी जाए !

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विधायिकाओं में पांच प्रतिशत सीटें ऐसे लोगों के लिए रिजर्व 

होनी चाहिए जिन्होंने इस देश का संविधान ध्यान से पढ़ा हो।

जिन्होंने  विधायिकाओं की कार्य संचालन नियमावली का अध्ययन किया हो।

जो  स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास जानते हांे।

जिन्होंने विभिन्न विचारधाराओं के राष्ट्रीय नेताओं की जीवनियां पढ़ी हों।

जिन्हें देश के मुख्य कानूनों का मोटा-मोटी ज्ञान हो।

ऐसा नहीं कि ऐसे जानकार लोग खोजने पर आज नहीं मिलेंगे।

हां,उनकी तलाश राजनीतिक क्षेत्र से बाहर भी करनी पड़ेगी।

यह सब मैं क्यों कह रहा हूं ,वह बात तो समझ में आ ही गई होगी।

  यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि संसद और विधान मंडलों में अभी ऐसे जानकार लोग नहीं हैं।

अब भी हैं।

पर उनकी संख्या बढ़नी चाहिए। 

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  सड़कों पर टहलना जानलेवा !

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गत सोमवार को कन्हैया पांडेय पटना के दीघा-एम्स एलिवेटेड रोड पर टहल रहे थे।

मोटर साइकिल पर स्टंट कर रहे युवकों ने उन्हें टक्कर मार दी।

वे बुरी तरह घायल हो गए।

अंततः वे बच नहीं सके।

कई साल पहले भागल पुर में बिहार विधान सभा के पूर्व

स्पीकर प्रो. शिवचंद्र झा भी इसी तरह उदंड मोटर साइकिल चालक के शिकार हो गए थे।

  वे सड़क पर टहल रहे थे।

इस तरह की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं।

  दरअसल नगरों और महा नगरों में टहलने की जगहों का नितांत अभाव होता जा रहा है।

  लोगबाग सड़कांे पर टहलने को मजबूर हैं।

पार्कों की संख्या सीमित हैं।

बड़े पार्क और मैदान हैं भी तो अधिकतर लोगों के आवासों से दूर हंै।

  पटना के आसपास अनेक बस्तियां विकसित हो रही हैं।

अपवादों को छोड़कर कोई ‘डेवलपर’ पार्क के लिए जगह नहीं छोड़ता।

अपने नक्शे में भले डेवलपर पार्क का स्थान ग्राहकों को दिखा देता है।

किंतु अंततः वे पार्क की जमीन भी बेच देते हैं।

   सरकारी एजेंसी यदि इस मामले में डेवलपर्स पर नकेल कसे तो भविष्य में कन्हैया पांडेय जैसे लोगों की जानें बचाई जा सकती हैं।

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भूली बिसरी याद

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सन 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान 

प्रमुख नेताओं की कुछ उक्तियां यहां प्रस्तुत हैं।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने दरभंगा में कहा कि आतंक के तार महा स्वार्थ बंधन के नेताओं के घर तक पहुंचने लगे थे।

प्रधान मंत्री पुणे-मुम्बई धमाकों के सिलसिलमें में दरभंगा माॅड्यूल का जिक्र कर रहे थे।   

कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि आपलोग मोदी जी से कहें कि जाएं और दिल्ली में काम देखें।

  राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने कहा कि बिहार में अगर जंगल राज है तो मोदी नहीं, लालू यहां का शेर है।

जंगल में एक ही शेर रहता है।मोदी को लालू के जंगल में नहीं आना चाहिए।

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि हमने तो 10 साल का हिसाब दे दिया है।मोदी जी 17 महीनों का हिसाब दें।

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     और अंत में

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 कुछ दलों व नेताओं को उम्मीदवारों से ‘चंदे’ की अच्छी-खासी राशि मिलती रही है।इस बार भी मिल रही है।

वह राशि राजनीतिक,चुनावी और गैर -राजनीतिक खर्चों के लिए इन दिनों कुछ अधिक ही उपयोगी साबित हो रही है।

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कानोंकान,प्रभात खबर,पटना,2 अक्तूबर 20


   पटना में नागरिक सुविधाएं उपलब्ध

  कराने और टैक्स वसूलने का भार केंद्र 

  सरकार की किसी नवरत्न कंपनी को 

  सौंप दिया जाना चाहिए।

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ग्राम पंचायतों की तरह नगर निगम भी फेल

भ्रष्टाचार मुख्य कारण

ग्राम स्वराज की महात्मा गांधी की कल्पना को भ्रष्टों 

ने विफल कर दिया

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--सुरेंद्र किशोर--

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नागरिक सुविधाओं के मामले में पटना की नारकीय स्थिति

रही है।

पिछले साल तो जलप्लावन से पटनावासी बेहाल रहे।

 इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने गत साल 

यह सलाह दी थी कि पटना नगर में नागरिक सुविधाओं की देखरेख का भार केंद्र सरकार की किसी नवरत्न कंपनी को सौंप दिया जाना चाहिए।

 जमशेद पुर में नागरिक सुविधाएं उपलब्ध करने का काम टाटा कंपनी करती है।

   पुराने लोहियावादी समाजवादी नेता और सामाजिक कार्यकत्र्ता रवींद्रनाथ चैबे का एक लेख हाल में प्रभात

खबर के जमशेद पुर संस्करण में पढ़ा।

उन्होंने लेख में जमशेद पुर और पास के आदित्यपुर की तुलना की है।याद रहे कि चैबे जी ईमानदार नेता हैं।

चैबे जी ने लिखा है कि जमशेदपुर स्वच्छ नगर है।

जबकि आदित्यपुर की स्थिति नारकीय है।

आदित्यपुर में उसी तरह नगर निगम कार्यरत है जिस 

तरह पटना में।

पिछले दिनों मैंने पटना के एक मुहल्ले में नगर निगम द्वारा निर्माणधीन सड़क को देखा था।

सड़क एक तरफ से बन रही थी और दूसरी तरफ से टूट रही थी।

स्थानीय लोगों ने बताया कि समय के साथ नजराना-शुकराना की दरें बढ़ती ही जा रही हैं।

  इस परिस्थिति में रवींद्रनाथ चैबे का लेख पठनीय और

विचारणीय है।

लेख यहां प्रस्तुत है।

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सुरेंद्र किशोर-2 अक्तूबर 20

     


   भ्रष्टाचार को लोकतंत्र की अपरिहार्य 

  उपज नहीं बनने दिया जाना चाहिए

  --महात्मा गांधी

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भ्रष्टों के खिलाफ हर नागरिक को सुप्रीम 

कोर्ट ने 2012 में ही थमा रखा है बड़ा हथियार

उसका इस्तेमाल तो करिए 

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सुप्रीम कोर्ट ने सन् 2012 में ही भ्रष्ट लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए अदालत में शिकायत करने का अधिकार हर नागरिक को दे दिया था।

वह अधिकार अब भी नागरिकों के पास है।

याद रहे कि मंत्री, सांसद, विधायक और आला अधिकारी लोक सेवक हैं।

यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि इस वर्ग के सारे लोग भ्रष्ट ही हैं।

किंतु सारे ईमानदार भी नहीं हैं।

  सबसे बड़ी अदालत ने तब यह भी कहा था कि मुकदमा चलाने की अनुमति देने का निर्णय शासन को एक समय सीमा के भीतर कर लेना चाहिए।अधिकत्तम चार महीने में।

  डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी की इस संबंध में दायर याचिका को मंजूर करते हुए न्यायमूत्र्ति जी.एस.सिंघवी और न्यायमूत्र्ति ए.के.गांगुली के पीठ ने कहा कि 

‘‘भ्रष्टाचार से पूरे प्रजातंत्र की बुनियाद खतरे में पड़ जाती है।’’

  सुप्रीम कोर्ट की राय थी कि

 ‘‘भ्रष्टाचार आज हमारे देश में न सिर्फ संवैधानिक शासन के लिए खतरा बन गया है,बल्कि लोकतंत्र और कानून के शासन की बुनियाद के लिए नुकसानदेह बन चुका है।’’

  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 

‘‘ भविष्य में अगर कोई नागरिक 

लोक सेवक के खिलाफ अभियोजन की अनुमति मांगता है तो सक्षम अधिकारी विनीत नारायण के मुकदमे में तय समय सीमा और केंद्रीय सतर्कता आयोग के दिशा निदेशों का पालन करेंगे।’’

   कितने लोगों को पता है कि सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक धन के लुटेरों से लड़ने के लिए इतना कारगर हथियार आम नागरिक को दे रखा है ?

  2012 के बाद कितने लोगों ने इस अधिकार का प्रयोग किया है ?

डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने तो जरूर इसका इस्तेमाल किया है।

 जो लोग अपने ड्राइंग रूम बैठकर रोज यह चर्चा कर रहे हैं कि देश में बहुत भ्रष्टाचार है,वे क्यों नहीं अदालत प्रदत्त इस हथियार का प्रयोग करते ?

  प्रतिपक्ष के अनेक बड़े नेता तो चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई निर्णायक लड़ाई न हो।

सिर्फ जुबानी जंग हो।

  पर जो लोग देश हित  में सोचने वाले हैं वे तो पहल कर ही सकते हैं।

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क्यों जरूरी है इस ‘‘हथियार’’ का प्रयोग !

मौजूदा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कोई नहीं कहता कि उनकी रूचि नाजायज तरीके से निजी संपत्ति बढ़ाने में है।

  इस देश में एकाधिक मुख्य मंत्री भी वैसे ही हैं।

मोदी ने कहा भी था कि ‘‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा।’’

फिर भी देश में भ्रष्टाचार पर कारगर अंकुश क्यों नहीं लग रहा है ?

ईमानदार प्रधानमंत्री व कतिपय मुख्य मंत्री भ्रष्ट लोगों के समक्ष लाचार क्यों नजर आ रहे हैं ?

क्या भ्रष्टों के खिलाफ कार्रवाई के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत है ?

उसके लिए तो अभी राज्य सभा मंे शासक दल को बहुमत नहीं है।

  जब होगा तो देखा जाएगा।

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पर उससे पहले उपर्युक्त हथियार का प्रयोग करके इस देश के कुछ सौ लोग यह दिखा दे सकते हैं  कि भ्रष्टाचार ने कितनी अपनी जड़ें जमा रखी हैं।

फिर कार्रवाई के लिए देश में माहौल बनेगा।

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सुरेंद्र किशोर-1 अक्तूबर 20


  

  

   


 एक विश्लेषणकत्र्ता ने कहा  है--

‘‘हंगामा करने के लिए हाथरस तो बहाना है !

असल में योगी सरकार के चंगुल से माफियानुमा खूंखार अपराधियों और टुकड़े -टुकड़े गिरोह के जेहादियों को बचाना है।

अन्यथा, बलरामपुर दलित महिला बलात्कार कांड की खोज खबर लेने भी तथाकथित सेक्युलर दलों व बुद्धिजीवियों के दस्ते वहां जाते।

पर कैसे जाएंगे ?

 बलरामपुर जाने पर उनके खास वोट बैंक के नाराज होने का खतरा जो है !

यहां यह दुहराने की आवश्यकता नहीं कि हाथरस वाली घटना के आठ दिन बाद दुष्कर्म का आरोप लगा था।

पर बलरामपुर में इस सवाल पर कोई मतभेद है ही नहीं।’’

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यह सब ठीक उसी तर्ज पर हो रहा है जिस तरह गुजरात में हुआ था।या,अन्य जगह होता रहा है।

गोधरा ट्रेन में 58 कार सेवकों को पेट्रोल छिड़कर जिंदा जला दिया गया था।

 किसी सेक्युलर नेता ने उस सामूहिक मानव दहन की निंदा का बयान तक नहीं दिया।

पर जैसे ही प्रतिक्रियास्वरूप गुजरात में बहुसंख्यकों ने दंगे शुरू कर दिए तो ‘‘सेक्युलर’’ दल और बुद्धिजीवी जोर -जोर से चिल्लाने लगे।

यानी तथाकथित सेक्युलर जमात ने अब भी अपनी राह नहीं बदली है।हालांकि इस राह पर चलने से उनको लगतार चुनावी नुकसान हो रहा है। 

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मैंने आज सुबह से पटना -दिल्ली के 11 दैनिक अखबार  पलटे।

किसी अखबार में यह खबर नहीं मिली कि कोई ‘सेक्युलर’ राजनीतिक नेता बलरामपुर गया था।

संभव है कि जल्दी- जल्दी इतने अखबार पलटने में खबर छूट गई हो।

 आपकी नजर में ऐसी कोई खबर आई हो तो जरूर बताइएगा।

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--सुरेंद्र किशोर-3 अक्तूबर 20

 


शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

     विरोधियों के दोहरा मापदंड 

    से बढ़ रही है भाजपा

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सन 2002 में गुजरात के गोधरा में ट्रेन में 58 कार सेवकों को पेट्रोल डाल कर जिंदा जला दिया गया था।

 आपने इस देश के कितने तथाकथित सेक्युलर नेता व बुद्धिजीवियों -लेखकों को उस जघन्य नर संहार की निंदा करते सुना ?

  हां,गोधरा कार सेवक दहन कांड की प्रतिक्रिया में जो बड़े पैमाने पर गुजरात दंगा हुआ,उसके खिलाफ जरूर वे जोर -जोर से आवाज उठाने लगे थे।

अच्छा किया जो उन लोगों आवाज उठाई।

पर गलत किया कि वे कार सेवक दहन कांड अपनी सुविधा के अनुसार भुला गए।

दोनों घटनाओं की समान रूप से निंदा करते तो भाजपा आगे नहीं बढ़ती।

  उल्टे मनमोहन सरकार के कार्यकाल में रेल मंत्रालय ने एक ऐसी बनर्जी जांच कमेटी बैठाई जिसकी यह रपट आई कि ट्रेन के भीतर ही स्टोव में आग लग गई और वे सब जल मरे।

जबकि बाद में सी.बी.आई.अदालत ने गोधरा कार सेवक दहन कांड के लिए फारूख और इमरान को आजीवन कारावास की सजा दी है।

  जिन्होंने गोधरा कार सेवक कांड तक की निंदा नहीं की,वही लोग बाबरी विध्वंस कांड मुकदमे के आरोपितों के कल रिहा हो जाने पर अदालत की घोर आलोचना कर रहे हैं।

हां, मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि से ईदगाह हटाने की मांग के लिए जो याचिका दायर की गई थी,उसे कोर्ट ने हाल ही में खारिज कर दिया।

क्या इसके लिए किसी ‘सेक्युलर’ ने मथुरा कोर्ट की 

तारीफ की ?

   इसी तरह जहां बहुसंख्यक समाज के गुंडे किसी कमजोर वर्ग या अल्पसंख्यक की लड़की के साथ जघन्य अपराध करते हैं, वहां तो बडे़ -बड़े ‘सेक्युलर’ दल व नेता जोर- जोर से आवाज उठाने लगते हैं।

  ठीक ही है।

जरूर उठाइए।

किंतु जहां अल्पसंख्यक समुदाय का कोई समाजविरोधी तत्व बहुसंख्यक समाज की किसी महिला के साथ जघन्य कांड करता है, तो वहां ‘सेक्युलर’ नेताओं व बुद्धिजीवियों की बोलती बंद हो जाती है।

  तथाकथित सेक्युलर दलों व बुद्धिजीवियों के इसी दोहरे मापदंड के कारण भाजपा इस देश में बढ़ रही है।

वे बौद्धिक व राजनीतिक रूप से बेईमान लोग  कब यह बात स्वीकार करेंगे कि अपराधी व सांप्रदायिक तत्व किसी खास समुदाय या जाति में ही नहीं पाए जाते ?

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हत्यारा और बलात्कारी जिस किसी समुदाय या जाति का हो,उसके खिलाफ सब मिलकर समान रूप से जोरदार आवाज उठाओ।

उन्हें कठोर सजा दिलवाओ।

यदि यह काम ‘सेक्युलर’ दल व बुद्धिजीवी करने लगें तो भाजपा नहीं बढ़ेगी।

पर क्या कभी वे ऐसा करेंगे ?

लगता तो नहीं है।

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--सुरेंद्र किशोर-1 अक्तूबर 20