मंगलवार, 10 नवंबर 2020

 राजद के दो सकारात्मक कदम

पर, अभी और भी कुछ करना पड़ेगा !!

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1.-चुनाव अभियान के दौरान राजद ने अपने पोस्टरों से लालू यादव -राबड़ी देवी की तस्वीरें हटा ली थी।

2.-राजद ने चुनाव नतीजों के बाद अनुचित नारेबाजी, हर्ष फायरिंग, प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अशिष्ट व्यवहार आदि नहीं करने का अपने कार्यकत्र्ताओं को सख्त निदेश दिया है।

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यदि चुनाव परिणामों के बाद राजद हुड़दंग को रोकने में सचमुच सफल रहा तो कल रात उन करोड़ों लोगों को अच्छी नींद आएगी जिन्होंने महा गठबंधन को वोट नहीं दिए हैं।

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  इस काम में सफल होने पर राजद की गिनती एक जिम्मेदार दल के रूप में होने लगेगी।

  हालांकि राजद को यदि सत्ता मिलती है तो उसे इन दो कदमों के अलावा भी अन्य कई कदम भी उठाने पड़ेंगे।

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कल की मतगणना के बाद जिस किसी

की भी सरकार बने, उसे कम से कम छह महीने तक निर्बाध ढंग से काम करने का मौका मिलना चाहिए।

यदि नीतीश कुमार की सरकार बनती है तो उन्हें अपनी पिछली कमियों-गलतियों को सुधारने का मौका मिले।

यदि तेजस्वी यादव की सरकार बनती है तो राजद को 15 साल के ‘जंगल राज’ के कलंक को धोने का अवसर मिले।

दोनों को प्रतिपक्ष व मीडिया ऐसा अवसर प्रदान करे।

वही राज्य हित में होगा।

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--सुरेंद्र किशोर-9 नवंबर 20


सोमवार, 9 नवंबर 2020

 जब मैं भी आ गया था इंदिरा के झांसे में !

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     --सुरेंद्र किशोर--

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   ‘‘क्या सुरेन ! तुम भी इंदिरा के झांसे में आ गए ?!!

तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।

 तुम कैसी-कैसी चिट्ठियां लोहिया जी को लिखा करते थे।

समझ लो।

बैंक राष्ट्रीयकरण करके इंदिरा गांधी लोगों को धोखा दे रही है।’’

   1969 में नई दिल्ली के ‘जन’ व मैनकाइंड के कार्यालय में ओम प्रकाश दीपक ने मुझे स्नेह भरी झिड़की के साथ यही बातें कही थीं।

डा.राम मनोहर लोहिया के इस साथी ने,जो लोहिया के विचारों को ठीक ढंग से समझते थे,ठीक कहा था।

  यह बात मुझे बाद समझ में आई।

मैं ही गलत था।

 तब मेरा युवा -मन बैंक राष्ट्रीयकरण के फैसले से अत्यंत प्रभावित हो गया था।

   इंदिरा गांधी ने तो ‘गरीबी हटाओ’ का भी नारा दे दिया।

उसी नारे पर उन्होंने 1971 का लोक सभा चुनाव बड़े बहुमत से जीत लिया।

  पर आम लोगों की गरीबी हटाने के बदले बाद में वह अपने पुत्र संजय के लिए मारूति कार  कारखाने की स्थापना के काम में मदद करने में लग गईं।

   जब 1974 में जेपी के नेतृत्व में बड़ा जन आंदोलन शुरू हुआ तो इमरजेंसी लगाने के बाद 14 अगस्त 1975 को प्रधान मंत्री ने कहा कि 

  ‘‘गरीबी तो जनता की कड़ी मेहनत से ही हटाई जा 

सकती है।मेरे पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं ।’’

   था न इंदिरा का झांसा !!!

  ऐसे झांसेबाज नेताओं की न तो पहले कमी थी और न आज कोई कमी है।

तब इंदिरा जी के झांसे को मेरे जैसे युवा तो क्या, मधु लिमये जैसे प्रौढ़ नेता भी नहीं समझ सके थे।

   लिमये जी ने राष्ट्रपति के चुनाव में इंदिरा गांधी के उम्मीदवार वी.वी.गिरि को 

समाजवादियों से वोट दे-दिलवा कर जितवा दिया था।

इस तरह इंदिरा जी ने अपने ही दल के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को हरवा दिया था। 

बाद में लिमये जी को  अपनी गलती समझ में आई या नहीं,यह पता नहीं चल सका।

हां, इमरजेंसी में अन्य लोगों के साथ मधु जी को भी 19 महीने तक इंदिरा गांधी की जेल में रहना पड़ा था।

    डा. लोहिया का तो 1967 में ही निधन हो चुका था।

किंतु लोहिया के अत्यंत करीबी रहे बुद्धिजीवियों व राजनीतिक कर्मियों को मधु जी या संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का वह फैसला पसंद नहीं आया था।

  लोहिया के उन करीबियों को आप ‘‘कुजात लोहियावादी’’ कह सकते हैं।

    वी.वी.गिरि के पक्ष में मधु लिमये के फैसले के खिलाफ लोहिया जी की सहयोगी व मिरांडा हाउस की प्रोफेसर रमा मित्र ने लिखकर अपना कड़ा विरोध प्रकट किया था। 

     याद रहे कि इंदिरा सरकार ने 19 जुलाई, 1969 को 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया।

उसके बाद मैं भी इंदिरा गांधी के झांसे में आ गया था।

उसके बाद सुरेंद्र अकेला के नाम से उनके समर्थन में 27 जुलाई, 1969 के हिंदी साप्ताहिक ‘दिनमान’ में मेरी चिट्ठी छपी।

 तब दिनमान की चिट्ठयां भी पढ़ी जाती थीं।

दीपक जी ने मेरी वह चिट्ठी पढ़ ली थी।

  मेरी उस चिट्ठी में निम्नलिखित बातें थीं।

‘‘राष्ट्रपति --1972 की  संभावित

राजनैतिक अस्थिरता के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रपति -पद के लिए कांग्रेसी उम्मीदवार की प्रतीक्षा बड़ी उत्सुकता से की जा रही थी।

  पर इस दंगल में सिंडिकेट के हाथों प्रधान मंत्री की हार अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

 अब देश की सत्ता घनघोर प्रतिक्रियावादियों के हाथ में जाने की संभावना गहरी हुई है।

  अतः श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ कांग्रेस के अन्य प्रगतिशील तत्वों को चाहिए कि वे दल के संकुचित अनुशासन के दायरे से बाहर हो देश के व्यापक हित में दूसरे वामपंथी दलों को किसी अन्य नाम सहमत कराएं।

 यह प्रश्न कांग्रेस के प्रगतिशील धु्रवीकरण से अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है।

---सुरेंद्र अकेला,दिघवारा,सारण।’’

  विद्रोही उम्मीदवार के रूप में वी.वी.गिरि के राष्ट्रपति चुन लिए जाने के बाद 

प्रो. रमा मित्र ने लिखा था कि 

  ‘‘ ऐतिहासिक राष्ट्रपति चुनाव के वोट पड़ चुकने के बाद मैं अपना कहना कह रही हूं।

अब तक मैं इस भय से नहीं बोली थी कि मुझे किसी उम्मीदवार का विरोधी या समर्थक कहा जाएगा।

  सब ढोलकिए, इंदिरा गांधी,कम्युनिस्ट,सोशलिस्ट,युवा तुर्क, कृष्णमेनन पंथी,अरुणा आसफ अली पंथी तथा अन्य वामपंथियों के बैंड बाजे में शामिल हो गए हैं।

  औरों को तो हम समझ लें,लेकिन (लोहियावादी)समाजवादियों को  कैसे समझें ?

क्योंकि उनको इंदिरा गांधी के बैंक राष्ट्रीयकरण के बावजूद तथाकथित प्रगतिवाद में और कांग्रेसी प्रतिक्रियावादी तत्वों में 

कोई अंतर नहीं करना चाहिए था।

  दोनों ही तत्कालीन जनमत के कठौते में उठी हुई लहरों पर तैरते हुए अवसरवादी हैं।

  कांग्रेस की सतही क्रांतिवादिता और गहरी प्रतिक्रियावादिता में से कोई एक चुनने लायक चीज नहीं हो सकती।

 एक बायें बोलता और दायें चलता है।

दूसरा दायें बोलता और दायें चलता है।

   समाजवादी दल के सदस्य के नहीं बल्कि राजनीति के विद्यार्थी के रूप में मेरा विश्लेषण यह है कि संजीव रेड्डी की विजय कांग्रेस में अनिवार्य फांट का कारण होती।

  कांग्रेस के विसर्जन  और शीघ्र संभव करती।

  हो सकता है कि मेरा विश्लेषण गलत निकले,किंतु मैं अपने उन नेताओं से क्षमा चाहती हूं जो समझते हैं कि गिरि की विजय कांग्रेस को बंाटेगी।

 मेरे विचार से गिरि की विजय कांग्रेसी प्रधान मंत्री के हाथ को और कांग्रेस संगठन पर उनकी गिरफ्त को और भी मजबूत करेगी।

  उस संगठन को एक नई जिंदगी ,चाहे कुछ ही दिन की हो, मिल जाएगी।

--रमा मित्र,’’

दिनमान,

31 अगस्त 1969

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--सुरेंद्र किशोर-6 अगस्त 2020

   

  




  


बुधवार, 4 नवंबर 2020

    दिनमान और इंडिया टूडे

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  साठ-सत्तर के दशकांे की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका का नाम है-‘दिनमान।’

  टाइम्स आॅफ इंडिया प्रकाशन समूह उसका प्रकाशक था।

आज के समय की श्रेष्ठ हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका ‘इंडिया टूडे’ है।

  किंतु जो बात दिनमान में थी,

वह इंडिया टूडे में नहीं।

तब आप महीने भर के दिनमान को पढ़कर जान सकते थे कि 

देश-प्रदेश-विदेश में क्या-क्या प्रमुख घटित हुआ।

  दिनमान मुख्यतः राजनीतिक पत्रिका थी।

पर,उसमें साहित्य,विज्ञान,चिकित्सा,धर्म दर्शन, फिल्म,रंगमच व खेल आदि से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां रहती थीं।

भाषा-शैली भी अनोखी और शालीन।

उसे पढ़ने से व्यक्तित्व का विकास होता था।

मेरी जानकारी के अनुसार दिनमान पर अब तक दो शोध कत्र्ताओं को पीएच.डी.की उपाधि मिल चुकी है।

 इंडिया टूडे के पास पर्याप्त साधन है।

खर्च करने के लिए दिनमान से अधिक।

  यदि ‘इंडिया टूडे’ का प्रबंधन चाहे तो अपनी इस स्तरीय पत्रिका को ऐसा बना सकता है जिसे महीने भर पढ़कर किसी को भी लगे कि दुनिया के किसी क्षेत्र की किसी प्रमुख जानकारी से वह वंचित नहीं रह गया।

  यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह हिन्दी भारत के साथ न्याय नहीं कर रहा।

साठ-सत्तर के दशकों में दिनमान ने उस पीढ़ी के साथ न्याय किया।

पर, जब टाइम्स आॅफ इंडिया  प्रबंधन के लिए मुनाफा ही सब कुछ हो गया,तो एक- एक कर के उसकी अच्छी- अच्छी हिन्दी पत्रिकाएं बंद कर दी गईं। 

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सुरेंद्र किशोर

-1 नवंबर 20 

 

  


   मनमोहन सिंह सरकार के रेल मंत्री लालू प्रसाद ने 2006 में कहा था कि मैं फारवर्ड कास्ट के बीच के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए शैक्षणिक संस्थानों में 5 से 10 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के पक्ष में हूं।

   पर, 2019 में जब केंद्र सरकार ने सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के लिए संसद में विधेयक लाया तो राजद ने उसका विरोध कर दिया।

  उसके तत्काल बाद हुए लोक सभा चुनाव में इसका विपरीत असर राजद के कुछ उम्मीदवारों पर पड़ा।

 यहां तक कि राजद के रघुवंश प्रसाद सिंह भी 2019 में लोस चुनाव हार गए।

   अब देखना है कि बिहार विधान सभा के मौजूदा चुनाव में इस विरोध का कितना असर पड़ता है।

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--सुरेंद्र किशोर-2 नवंबर 20

 


सोमवार, 2 नवंबर 2020

     बिहार के पिछड़ापन का जिम्मेदार कौन ?

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बिहार के पिछड़ेपन के लिए जो जिम्मेदार रहे,

उनके ही राजनीतिक उत्ताधिकारी

आज सवाल उठा रहे हैं।

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          --सुरेंद्र किशोर--

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बिहार में चुनाव का अवसर हो और इस राज्य के पिछड़ापन का मुद्दा नहीं उछले, ऐसा भला कैसे हो सकता है ?

हर चुनाव में यह होता है।

इस बार भी यह मुद्दा उछल रहा है।

किंतु विडंबना यह है कि जो राजनीतिक शक्तियां इस राज्य के पिछड़ेपन के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार रही हंै,वही इस मामले में आज अधिक मुखर हैं।

अविभाजित बिहार में देश का करीब 40 प्रतिशत खनिज पदार्थ पाया जाता है।

बिहार की भूमि भी काफी उर्वर  है।

राज्य में कई सदानीरा नदियां बहती हैं।

फिर भी आजादी के बाद इस राज्य में न तो कृषि का अपेक्षित विकास हुआ और न उद्योग का।

 आजादी से पहले टाटा नगर यानी जमशेद पुर बसा।

सोन नहर का भी निर्माण अंग्रेजों ने ही कराया था।

उससे वहां खुशहाली आई।

पर आजादी के बाद कोई नया ‘टाटा नगर’ नहीं बसा।

सरकारी क्षेत्र में लोक उपक्रम लगे,पर उनमें से अधिकतर सफेद हाथी ही सबित हुए।

  सार्वजनिक क्षेत्र के लिए जिस तरह की ईमानदारी व कार्यकुशलता की जरूरत थी,उसे सुनिश्चित नहीं किया जा सका। 

    रेल भाड़ा समानीकरण ने अविभाजित बिहार में बड़े उद्योग का विकास रोक दिया।

उधर बिहार में कृषि-सिंचाई पर अपेक्षाकृत कम सरकारी खर्च के कारण खेती का भी अपेक्षित विकास नहीं हो सका।

  दरअसल कृषि प्रधान राज्य में खेती के विकास से ही किसानों की क्रय शक्ति बढ़ती । 

उससे उद्योगों का भी विकास होता।

पर ऐसा नहीं हो सका।

जब अधिकांश आबादी की क्रय शक्ति बढ़ी ही नहीं तो कारखानों के माल को कौन खरीदता ?

यदि कोई नहीं खरीदेगा तो कारखाने विकसित कैसे होंगे ? 

नतीजतन बिहार को पिछड़ा रहना ही था।

पिछड़ेपन के मामले में सन 1970 में बिहार का देश के राज्यों में नीचे से दूसरा स्थान था।

तब सर्वाधिक पिछड़ा राज्य ओड़िशा था।

1993 तक बिहार आर्थिक मामलों में उसी स्थिति में था जिस स्थिति में शेष भारत उससे 15-20 साल पहले था।

  यानी, अन्य राज्यों की तरक्की होती गई,पर बिहार अन्य राज्यों से पिछड़ता गया। 

इसके लिए कौन जिम्मेदार थे ?

जो जिम्मेदार रहे,उनके राजनीतिक उतराधिकारी आज बिहार के चुनाव में कैसी -कैसी बातें कर रहे हैं ?

  सन 1951 से 1990 तक का हाल जानिए।

कृषि व इससे संबंधित क्षेत्र में केंद्र सरकार ने बिहार में प्रति व्यक्ति  172 रुपए खर्च किए।

उसी अवधि में पंजाब में 594 रुपए खर्च किए ।

 आंतरिक संसाधन जुटाने में भी बिहार सरकार लगभग विफल रही।

सन  1999-2000 वित्तीय वर्ष में बिहार सरकार ने आंतरिक स्त्रोत से कुल 1982 करोड़ रुपए जुटाए।

उन्हीं दिनों आंध्र प्रदेश सरकार की सालाना आय करीब 6 हजार करोड़ रुपए होती थी।

 केंद्रीय आर्थिक सहायता, राज्य के आंतरिक राजस्व के अनुपात में ही मिलनी थी।

     अब आप ही बताइए कि बिहार के ‘बीमारू’ राज्यों (बिहार,मध्य प्रदेश,राजस्थान और उत्तर प्रदेश)की श्रेणी में ला देने के लिए कौन -कौन से दल प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जिम्मेदार रहे।

   2005 के बाद स्थिति में सुधार होना शुरू हुआ।

पर धीमी गति से ही।लेकिन तब तक तो देर हो चुकी थी।

 इस बीच आबादी बढ़ी।

खर्च बढ़ा।लोगों की जरूरतें बढ़ी।

फिर बिहार के लिए  विशेष दर्जे की मांग शुरू हुई।

अंततः केंद्र सरकार ने कह दिया कि यह संभव नहीं है।

फिर तो बिहार सरकार को खुद ही राज्य का विकास करना है।

हांलाकि 2014 के बाद बिहार को मिल रही केंद्रीय सहायता में काफी वृद्धि हुई है।

 पर,वह जरूरतों को देखते हुए वह भी नाकाफी है।

 बेहतर प्रशासन व  वित्तीय प्रबंधन के कारण अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार सरकार की

अपनी आय 38 हजार 606 करोड़ रुपए होगी।

  2004-05 में बिहार सरकार का सालाना बजट करीब 25 हजार करोड़ रुपए का था।

अब वह बढ़कर करीब दो लाख करोड़ रुपए का हो गया है।

  सरकारी खर्चे में ‘लीकेज’ पहले बहुत अधिक था,अब कम हुआ है।

पर बंद नहीं हुआ है।

चुनाव के बाद बनने वाली सरकार को लीकेज रोकने पर ध्यान देना होगा।

तभी बिहार का विकास और भी तेज गति से संभव है।

 आजादी के पहले रेल भाड़ा समानीकरण नीति नहीं  थी।

पर बाद में समानीकरण लागू कर दिया गया ।

फिर तो  रेलगाड़ी के जरिए धनबाद से खनिज पदार्थ पटना पहुंचाने में जितना भाड़ा लगता था,उतना ही भाड़ा मुम्बई पहुंचाने में लगता था।

इसका परिणाम यह हुआ कि बाहर के उद्योगपतियों के सामने बिहार आकर उद्योग लगाने की मजबूरी नहीं रह गइ्र्र।

आजादी से पहले ऐसी मजबूरी थी।इसीलिए जमशेदजी टाटा ने बिहार आकर टाटानगर में औद्योगिक नगरी बसाई।

  रेल भाड़ा समानीकरण की नीति बनाते समय तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, 

‘‘राष्ट्र को सबल बनाना है तो क्षेत्रीय विषमता मिटानी होगी।इसके लिए रेलभाड़ा समानीकरण जरूरी  है।’’

 इस काम में नेहरू जी के मुख्य सलाहकार थे-सी.डी.देशमुख,टी.टी.कृष्णमाचारी और प्रताप सिंह कैरो।

 पर कैरो साहब ने कृषि पर होने वाले केंद्रीय खर्च में से सर्वाधिक हिस्सा अपने राज्य पंजाब के लिए ले लिया।

उस पैसों से भांखड़ा नांगल बना।

उससे पंजाब की खेती चमकी।

   बिहार के किसी नेता ने जब जवाहरलाल नेहरू  से कोसी नदी पर बांध बनाने के लिए आर्थिक मदद मांगी तो उन्होंने कहा कि उसके लिए लोगों से श्रमदान की अपील कीजिए। 

 यदि गंडक सिंचाई योजना और कोसी नदी योजना पर आजादी के बाद से ही ठोस काम हुआ होता तो खेती के मामले में बिहार तभी विकसित राज्य हो गया होता।

   जब रेल भाड़ा समानीकरण की नीति से क्षेत्रीय विषमता घटने के बदले बढ़ी तो पिछली सदी के अंतिम दशक में उसे समाप्त कर दिया गया।

पर एक अनुमान के अनुसार तब तक अविभाजित बिहार को करीब 10 लाख करोड़ रुपए से वंचित हो जाना पड़ गया था।

   यानी टाटा नगर की तरह अन्य उद्योग बिहार में लगते  तो 10 लाख करोड़ रुपए का लाभ बिहार को मिल जाता और वह  पिछड़ा नहीं रहता।

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दैनिक जागरण,30 अक्तूबर 20


 पब्लिक सेक्टर के बारे में एक जरूरी विमर्श

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लोक उपक्रम के संचालकों को ईमानदार व 

कत्र्तव्यनिष्ठ बनाए बिना आप विनिवेश नहीं रोक सकते।

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    --सुरेंद्र किशोर--

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सन 1977-78 की बात है।

तब मैं पटना के लोहिया नगर में, जिसे लोग अब भी कंकड़बाग ही कहते हैं, रहता था।

  राज्य परिवहन निगम की बस यानी सरकारी बस से पटना जंक्शन तक जाया-आया  करता था।

उन दिनों मैं दैनिक आज में काम करता था।

50 पैसे लगते थे।

अधिकतर यात्री 25 पैसे देकर बस में बैठ जाते थे।

उनके लिए टिकट नहीं कटते थे।

मैं उन अत्यंत थोडे़ लोगों में था जो पूरे 50 पैसे देकर टिकट लेने की जिद करता था।

मुझे देखते ही कंडक्टर की भृकुटि तन जाती थी।उसे 25 पैसे का नुकसान जो हो जाता था !

पर, वह जान गया था कि मैं अखबार में काम करता हूं,इसलिए मन मसोस कर टिकट फाड़ कर मुझे  दे देता था।

  अब आप ही बताइए कि सरकारी बसें लंबे समय तक कैसे चलेंगी ?

राज्य सरकार कितने दिनों तक कितना घाटा उठाएगी ?

बाद में बस बंद हो र्गइं।

आॅटो रिक्शे का चलन शुरू हो गया।

तब तक मैंने साइकिल खरीद ली थी।

  जब में ‘जनसत्ता’ ज्वाइन किया तो बिहार राज्य पथ परिवहन निगम के एक अफसर मुझसे मिले।

 उन्होंने मुझे देर तक समझाया कि एक खास कंपनी का बस  खरीदना क्यों जरूरी है।

 दरअसल उनका वरीय अधिकारी ईमानदार था और टाटा कंपनी से  ही बस खरीदने की जिद पर अड़ा था।

टाटा कंपनी बस-ट्रक बेचने के लिए खरीददार को दलाली नहीं देती थी।

किंतु एक दूसरी कंपनी खूब देती थी।

  जिस तरह बोफोर्स कंपनी दलाली देती थी,पर सोफ्मा तोप कंपनी नहीं देती थी।

जबकि सोफ्मा तोप, बोफोर्स से बेहतर थी।वैसे बोफोर्स भी खराब नहीं है।

  खैर, यह तो परिवहन निगम के राज्य मुख्यालय स्तर के भ्रष्टाचार की कहानी रही।

  ऐसे में बिहार के सरकारी पथ परिवहन निगम का जो हाल होना था,वह हुआ।

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अब जरा एयर इंडिया पर नजर दौड़ाएं।

पिछले वित्तीय वर्ष में एयर इंडिया को 8556 करोड़ रुपए का घाटा हुआ।

पिछले दस साल में कुल घाटा 69,575 करोड़ रुपए हुआ है।

घाटे का मुख्य कारण हैं भ्रष्टाचार और कार्य कुशलता में कमी।

साथ ही, कमीशन के लिए जहाजों की गैर जरूरी व महंगी खरीद।

 क्या जनता के टैक्स के पैसों में से अरबों रुपए इसका घाटा पाटने में लगाया जाना चाहिए या एयर इंडिया का विनिवेश करना चाहिए ?

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विनिवेश का विरोध कम्युनिस्ट लोग अधिक करते हैं।दूसरे वे लोग हैं जो ऐसे उपक्रमों को जारी रखना चाहते हैं ताकि उसकी खरीद में कमीशन मिले।

हाल तक अनेक लोक उपक्रमों की दर्जनों गाड़ियां  केंद्रीय मंत्रियों व बड़े अफसरों की निजी सेवा में लगी रहती थीं।

सुना है कि मोदी सरकार ने उसे रोका है।

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दरअसल सार्वजनिक उद्यम को ठीक से चलाने के लिए अफसरों -कर्मचारियों में कठोर ईमानदारी की जरूरत रहती है।

वह भारत में आजादी के बाद से ही नहीं थी।

वैसे प्रभावशाली लोग अपने लोगों को इसमें आसानी से काम जरूर दिलवा देते थे।

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चीन में भी लोक उपक्रमों में जब भ्रष्टाचार नहीं रोका जा सका तो वहां की सरकार  निजीकरण की ओर मुड़ी।

चीन सरकार ने तर्क दिया कि ‘‘हम समाजवाद को मजबूत करने के लिए पूंजीवाद अपना रहे हैं।’’

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कलकत्ता के सार्वजनिक क्षेत्र के मशहूर होटल, ग्रेट ईस्टर्न होटल में जब घाटा बढ़ने लगा तो ज्योति बसु सरकार ने उसे एक विदेशी कंपनी के हाथों बेच देने का सौदा किया।

  पर सी.पी.एम.से जुड़े मजदूर संगठन सीटू के सख्त विरोध के कारण उन्हें अपना फैसला वापस लेना पड़ा।

पर जब राज्य की आर्थिक स्थिति और बिगड़ी तो बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने उस होटल को बेच दिया।

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पर मोदी सरकार विनिवेश करती है तो कम्युनिस्ट और वे नेता जो महंगी व अनावश्यक खरीद के जरिए पैसे बनाते रहे हैं,विरोध करने लगते हैं।   

   ऐसा कब तक चलेगा ?

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हां,एक बात और।

जब तक कोई लोक उपक्रम लाभ में हैं।यदि उसका लाभ बढ़ता जा रहा है,तब तक विनिवेश न करंे।

लेकिन यदि लाभ निरंतर घटता जा रहा है तो कर दीजिए।

अन्यथा घाटा होने लगेगा तो उसे फिर खरीदेगा कौन ?

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--सुरेंद्र किशोर-21 सितंबर 20


    जनसरोकार के पत्रकार हरिवंश

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राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश जी ने 2009 में ही यह कह दिया था कि 

‘‘ मैं असंतुष्ट,निराश बेचैन रहनेवाला आदमी हूं।

रिटायर होकर चैन से नहीं रह सकता।

मैं बहुत साफ-साफ,दो टूक बात करता हूं।

पत्रकारिता मेरे लिए नैतिक कर्म है।

और मुझे संतोष है कि नैतिक पत्रकारिता करने की मैंने कोशिश की।

अनेक भूलें हुईं हैं।

गलतियां हुईं हैं।

पर एक भी ऐसा काम नहीं किया,जिसके लिए पश्चात्ताप हुआ हो या कोई उंगली उठा सके।’’

    सिताब दियारा की गंवई पृष्ठभूमि से निकल कर पत्रकारिता के शीर्ष से गुजरते हुए हरिवंश जी आज एक अत्यंत सम्मानजनक जगह पर हैं।

  यह सब इस बात के बावजूद हुआ है कि वे किसी राजनीतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि से नहीं आते।

   सुपठित और प्रभावशाली वक्ता हरिवंश जी की जब डा.आर.के.नीरद लिखित जीवनी आई तो मुझे लगा कि इसकी हम थोड़ी चर्चा कर लें।

  कोई व्यक्ति दियारे के एक गांव से निकल कर दिल्ली

में राज्य सभा के उप सभापति पद तक पहुंचता है तो कई निरपेक्ष लोग उसके बारे में यह जानना चाहेंगे कि यह सब कैसे संभव हुआ ?

 यानी, इस अर्थ युग में ऐसा भी संभव है।

  देश के मशहूर प्रकाशक प्रभात प्रकाशन ने ‘‘जन सरोकार के पत्रकार हरिवंश’’ नाम से उनकी जीवनी छापी हैं।

जाहिर है कि उसमें उनके योगदान व उपलब्धियों का विस्तृत विवरण है। 

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--सुरेंद्र किशोर-1 नवंबर 20