सोमवार, 15 मार्च 2021

 एक पोस्ट जरा हट के !!

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आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज कहते हैं कि 

‘‘जीवन जीने के दो ही तरीके है-एक तो सोचो 

मेरा कोई अपना नहीं है।

या फिर सोचो सब अपने हैं।’’

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दुःख सबके जीवन में आता है।

सुख के पल हवा की तरह हैं।

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जीवन में दुःख के लिए सबको तैयार रहना चाहिए।

  दुनिया का सबसे बड़ा दुःख है बूढ़े मां-बाप के सामने जवान पुत्र का गुजर जाना।

लेकिन इससे भी बड़ा दुःख है पुत्र का कुपुत्र हो जाना।

 मां-बाप के जीवन में दो बार ही आंसू आते हैं।

एक जब बेटी विदा होती है।

दूसरा जब बेटा मुंह मोड़े तब।

 इन चार बातों के लिए मानव को सदा तैयार रहना चाहिए--

1.-दोस्त कभी धोखा दे सकता है।

2.-बेटा कभी भी मुंह मोड़ सकता है।

3.-किस्मत कभी भी रूठ सकती है।

4.-दुनिया कभी भी छूट सकती है।

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

--सुरेंद्र किशोर-13 मार्च 21


रविवार, 14 मार्च 2021

 


 ट्रैफिक पुलिस की कमियों,अतिक्रमण व ओवरटेकिंग के कारण जाम की समस्या-सुरेंद्र किशोर

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लगता है कि टै्रफिक जाम की समस्या लाइलाज बीमारी बन चुकी है।यदि शासन इस समस्या को अधिक गंभीरता से ले तो लोगों को राहत मिल सकती है।

 एक दूसरे से आगे निकल जाने यानी ओवरटेकिंग की होड़, जाम का बड़ा कारण है।

 दूसरा कारण सड़कों पर भारी अतिक्रमण है।

तीसरा व महत्वपूर्ण कारण अनेक टै्रफिक पुलिसकर्मियों की कत्र्तव्यहीनता है।

ट्रैफिक पुलिस की संख्या भी जरूरत के अनुपात में काफी कम है।

कारण और भी हैं।

किंतु शासन को चाहिए कि वह पहले इन तीन मुख्य समस्याओं पर कठोरता से काबू पाए।

टै्रफिक जाम की असली पीड़ा उन्हें ही मालूम है जो लगातार चार-पांच घंटे तक कहीं जाम की समस्या कभी झेल चुके हैं।

जो चिलचिलाती धूप में जाम में सपरिवार घंटों से फंसे हंै और बच्चों के दूध व पानी के बोतल खाली हो चुके हैं।या फिर गंभीर रूप से घायल या बीमार व्यक्ति अस्पताल के रास्ते में हैं।

जाम में फंसने की पीड़ा एक ऐसी पीड़ा है जिस ओर शासन ने  कभी जरूरत के हिसाब से गंभीरता नहीं दिखाई।

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  समस्या और निदान

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सब जानते हैं कि सड़कों पर अतिक्रमण जितने होते हैं,उससे अधिक कराए जाते हैं।

कराने में किसका हाथ रहता है,उसकी पहचान हो और कड़ी कार्रवाई हो।

इससे शासन के शीर्ष को जनता की वाहवाही मिलेगी।

  ओवरटेकिंग को कौन बढ़ावा देता है ?

क्यों देता है ?

क्या यह बात किसी से छिपी हुई है ?

दूसरा कारण सड़कों पर भारी अतिक्रमण है।

तीसरा व महत्वपूर्ण कारण अनेक टै्रफिक पुलिसकर्मियों की कत्र्तव्यहीनता है।

कारण और भी हैं।

किंतु शासन को चाहिए कि वह पहले इन तीन समस्याओं पर कठोरता से काबू पाए।

टै्रफिक जाम की असली पीड़ा उन्हें ही मालूम है जो लगातार चार-पांच घंटे तक कहीं जाम की समस्या कभी झेल चुके हैं।

 ट्रैफिक पुलिस की संख्या जरूरत की तुलना में कम है।

साथ ही टै्रफिक पुलिसकर्मियों,खासकर महिला पुलिस के लिए

कार्यस्थल पर शौचालय का कोई प्रबंध नहीं है।

इस समस्या का निदान कौन करेगा ?

पहले सुविधा दीजिए,फिर कस कर काम लीजिए।

जब कोई देखता है कि सड़कों पर खुलेआम ट्रैफिक पुलिस रिश्वत लेती है तो उससे शासन का इकबाल घटता है।

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 लाठी से अधिक कारगर स्टिंग आपरेशन

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हाल में एक नेता जी ने अपने लोगों से कहा कि भ्रष्ट सरकारी कर्मियों को लाठी से पीटो ।

  मेरी समझ से उस नेता को यह कहना चाहिए था कि आप लोग भ्रष्टों के खिलाफ स्टिंग आपरेशन करिए-कराइए।

पिछले कुछ महीनों में स्टिंग आपरेशन का सकारात्मक असर दिखाई पड़ा है।

एक मीडिया संगठन ने पटना लोअर कोर्ट में भ्रष्टाचार को लेकर स्टिंग आपरेशन किया था।

संबंधित कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त हो गईं।

एक अन्य मीडिया ने पटना कलक्टरी के पास जाली स्टाम्प को लेकर स्टिंग आपरेशन किया था ।इस मामले में भी कार्रवाई करने की प्रशासन ने कोशिश की है।

  दोनों मामलों में संबंधित मीडियाकमियों को सराहना मिली।

पर लाठियों से पीटनेवाली अपील पर न तो नेताजी का कोई मान बढ़ा और न ही किसी ने उनकी अपील पर किसी को लाठी से पीटा।

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   पहले आरक्षित कोटे को तो भरिए

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आरक्षण का प्रतिशत बढ़ा देने की मांग समय-समय पर होती रहती है।

किंतु क्या आरक्षण का पक्षधर कोई नेता यह मांग करता है कि निर्धारित कोटे को भरा क्यों नहीं जाता ?

केंद्र सरकार की नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित है।

इनमें से औसतन 15 प्रतिशत सीटें ही भर पाती हैं ?

इसके लिए कौन जिम्मेदार है ?

  1993 के बाद अनेक मंडल मसीहा सत्ता के शीर्ष पर रहे या फिर सत्ता को प्रभावित करने की स्थिति में रहे।

क्या उन लोगों ने पता लगाया कि किन कारणों से सीटें खाली रह जाती हैं ?

पता नहीं लगाया।

वैसे लोग भी सत्ता से हटने के बाद आरक्ष्ण का कोटा बढ़ाने की मांग करते रहते हैं।

कोटा जरूर बढ़वाइए,यदि अदालत अनुमति दे।किंतु जो कोटा उपलब्ध है,उसे तो भरने का उपाय कीजिए।

अन्यथा लोग समझेंगे कि कोटा बढ़ाने की आपकी मांग राजनीति से प्रेरित है।

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  उद्योग मंत्री के लिए अनुकूल अवसर

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बिहार के नए उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन के लिए अच्छा अवसर है।

उधर केंद्र सरकार ने गन्ना -मक्का से इथनाॅल उत्पादन की अनुमति दे दी और इधर शाहनवाज साहब नए उत्साह के साथ बिहार के उद्योग मंत्री बन गए।

  जानकार लोग बताते हैं कि इस ताजा अनुमति से,जिसकी मांग नीतीश सरकार वर्षों से कर रही थी,बिहार में नए -नए उद्योग खुलेंगे।

  हां,एक कमी फिर भी रह जाएगी ।उसे मुख्य मंत्री को पूरा करना होगा।

उद्योगों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए वे जरूरत के अनुसार नए -नए पुलिस थानों की स्थापना कराएं।

  महेंद्र सिंह धोनी तो आम तौर पर मैच के आखिरी दौर में चैके --छक्के लगात थे।

शाहनवाज को तो ऐसा अनुकूल अवसर मिल गया है कि वे शुरूआती दौर से ही उद्योग के चैके-छक्के लगा सकते हैं।

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 और अंत में

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केरल सी.पी.एम.ने अपने करीब तीन विधायकों के टिकट काट दिए हैं।

उधर,तृणमूल कांग्रेस ने भी अपने दो दर्जन विधायकों के टिकट काटे ।

अब देखना है कि टिकट कटने के बावजूद कितने विधायक सी.पी.एम.में बने रहते है !

यह भी गौर करने लायक बात होगी कि तृणमूल कांग्रेस के कितने विधायक पार्टी छोड़ते हैं।

इस देश की राजनीति के ऐसे दौर में यह सवाल मौजूं है जब कहा जाता रहा है कि 

‘‘टिकट कर्मा,टिकट धर्मा, धर्मा-कर्मा टिकट -टिकट !!’’  

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कानोंकान

प्रभात खबर 

पटना

12 मार्च 21


 


   सरकार मोबाइल जैमर और बुलेटप्रूफ 

   जैकेट की खरीदारी सी.एस.आर.के पैसों से 

   मुकेश अंबानी के जरिए कराए

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    ---सुरेंद्र किशोर--  

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उद्योगपति मुकेश अंबानी को चाहिए कि वह इस देश के जेलों में मोबाइल जैमर मशीन लगवाने का काम अपने हाथ में ले लें।

  सरकार इसकी सहमति दे।

इसमें खुद न सिर्फ अंबानी की भलाई है,बल्कि आम जन की भी।

 यदि उपलब्ध जैमर मशीन 4 -जी पर काम नहीं कर पा रहा है तो अंबानी कारगर जैमर मशीनों के निर्माण की दिशा में काम करें।

  याद रहे कि पुलिस को आशंका है कि हाल में मोबाइल फोन का इस्तेमाल एक टेलीग्राम चैनल बनाने के लिए किया गया।

फिर उस चैनल का इस्तेमाल जैश उल हिंद नामक समूह ने गत 25 फरवरी 2021 को मुकेश अंबानी के दक्षिण मुंबई स्थित घर के बाहर से जिलेटिन की छड़ों से लदी एस यू वी खड़ी करने की जिम्मेदारी लेने के लिए किया।

कहा जा रहा है कि जिम्मेदारी लेने का काम तिहाड़ जेल से हुआ।   

   इस देश के जेलों में जैमर लगाने की सरकारी कोशिश

 अब तक विफल रही है।

कभी शिकायत आई कि मशीन की खरीद में कमीशनखोरी के कारण घटिया जैमर लगे।

कभी यह कि जानबूझ कर जैमर बंद-खराब  कर दिए गए।

कारण सब को मालूम है।जैमर के रख रखाव का काम भी अंबानी के अफसर -कर्मचारी करें।

  अब जब जेल में बंद आतंकवादी व खंूखार अपराधी देश की अर्थ व्यवस्था नष्ट करने के लिए उद्योगपति को निशाना बना रहे हैं तो उसका उपाय सरकारी अनुमति व  सहयोग से खुद उद्यागपति करें। 

 व्यापारियों को  कंपनी सोशल जिम्मेदारी यानी सी.एस.आर. के तहत अपने मुनाफा का 2 प्रतिशत खर्च करने ही हैं।

  अंबानी के दो प्रतिशत जैसी बड़ी राशि का अंदाज कर लीजिए।

वे तो देश के सारे जेलों में आधुनिकत्तम मोबाइल जैमर लगवाने के साथ- साथ एक और काम कर सकते हैं।

 इस मद से वे सेना- पुलिस के लिए गुणवत्ता वाले बुलेट प्रूफ जैकेट की खरीद भी करवा सकते हैं।

  अपने देश के भ्रष्ट सरकारी-गैर सरकारी राक्षस बुलेट प्रूफ की खरीद में भी घोटाला कर देते रहे हैं,ऐसी जानकारियां मिलती रही हंै।

   26 नवंबर 2008 को आतंकवादियों ने मुंबई के ताज होटल आदि पर हमला किया।

  अन्य लोगों के साथ ए.टी.एस.प्रमुख हेमंत करकरे भी शहीद हो गए।

बाद में पता चला कि जो बुलेटप्रूफ जैकेट हेमंत ने पहन रखा था ,वह घटिया जैकेट बुलेट को नहीं रोक सका था।

यानी, उसकी खरीद में घोटाला था।

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--सुरेंद्र किशोर-

14 मार्च 21

  


शनिवार, 13 मार्च 2021

 ‘‘..........स्थानीय मीडिया की मानें ,तो वह (ममता बनर्जी) गाड़ी

में बैठी थीं और उनका पैर बाहर था,जिसके कारण दरवाजा 

बंद करते वक्त उन्हें चोट लग गई।

मगर तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि चार-पांच लोगों ने उन्हें 

धक्का दिया है.........।’’

   --ज्येतिप्रसाद चटर्जी

पश्चिम बंगाल विशेषज्ञ

सी.एस.डी.एस.

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हिन्दुस्तान --12 मार्च, 2021  


गुरुवार, 11 मार्च 2021

 इमरजेंसी में सरकारी आतंक 

का एक नमूना यह भी 

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--सुरेंद्र किशोर-

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  आजकल कुछ लोग यदा -कदा यह कहते रहते हैं कि इन दिनों देश में इमरजेंसी जैसे हालात हैं।

  उन्हें एक छोटी सी ‘इमरजेंसी कथा’ सुनाता हूं।

कर्पूरी ठाकुर इमरजेंसी में फरार थे।

पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित उनके सरकारी आवास 

से शासन ने उनका सारा सामान बाहर फेंक दिया।

 ऐसा करने का शासन को पूरा हक था।

क्योंकि तब तक वे किसी सदन के सदस्य नहीं रह गए थे।

  पर, उसके बाद की कहानी जानिए।

उनके परिजन के समक्ष यह समस्या थी कि उस सामान को कहां रखा जाए ?  

  उनकी पार्टी के एक ऐसे एम.एल.सी.से संपर्क किया गया जो कर्पूरी जी की मेहरबानी से एम.एल.सी.बने थे।

   पर,उस एम.एल.सी.साहब ने अपने लंबे-चैड़े सरकारी आवास में उस सामान को रखने से साफ मना कर दिया।

  फिर सामने आए एक कांग्रेसी विधायक।

वीरेंद्र कुमार पांडेय ने (मांडु से कांग्रेसी विधायक थे।) ने अपने घर में वह सब सामान रखा।

 पता नहीं, पांडे जी अब कहां हैं ?

मैं उनसे अक्सर मिलता था।

एक प्रतिष्ठित परिवार से आते थे।

बहादुर व स्वतंत्र चेता नेता थे।

  जिस समाजवादी एम.एल.सी.ने कर्पूरी जी का सामान रखने से मना कर दिया था,वे फिर भी कर्पूरी जी प्रशंसक -समर्थक थे।

  पर, वे भी एक खास स्थिति में डर गए थे।

 उन्हें लगा था कि सामान रखने के कारण ही उनकी गिरफ्तारी भी हो सकती है।

  1977 में जब कर्पूरी जी मुख्य मंत्री बने तो वे एक बार फिर ‘‘ठाकुर कृपा’’ से एम.एल.सी.बन गए।

मुख्य मंत्री कर्पूरी जी की किसी गलत नीति के खिलाफ जब मैंने दैनिक ‘आज’ में कुछ लिखा तो वह एम.एल.सी.साहब काॅफी हाउस में मुझसे झगड़ बैठे थे।

मैंने झगड़ने वाला यह प्रकरण इसलिए लिखा

कि आप जानें कि वे कर्पूरी जी के प्रति वे कितना ‘लाॅयल’ थे।

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इमरजेंसी में सरकार का ऐसा  आतंक था !

आज मौजूदा सरकार का कितना आतंक है,इसका अनुमान निष्पक्ष लोग आसानी से लगा सकते हैं।

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--सुरेंद्र किशोर--11 मार्च 2021 

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मंगलवार, 9 मार्च 2021

    उनके बयान की बात कौन 

   कहे, इमरजेंसी में जेपी के कहीं 

   आने -जाने की खबर भी नहीं 

   छपने दी जाती थी

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    --सुरेंद्र किशोर--

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16 जुलाई, 1976 को भारत सरकार ने इस देश के अखबारों को यह निदेश दिया था कि 

‘‘जयप्रकाश नारयण के कहीं आने-जाने से संबंधित कोई समाचार न छापा जाए।’’

  आज कुछ लोग कह रहे हंै कि इस देश में इमरजेंसी (1975-77) जैसे हालात हैं।

क्या आज केंद्र सरकार ऐसा कोई आदेश मीडिया

को दे रही है ?

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8 मार्च 21

   


1975-77 के आपातकाल में देश भर के 253 पत्रकार भी हुए थे गिरफ्तार-सुरेंद्र किशोर

 


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  जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 का बिहार आंदोलन  मार्च में ही शुरू हुआ था।

  बाद में वह देशव्यापी हुआ।

अंततः 1975 के जून में देश में आपातकाल लगा।

आपातकाल मार्च, 1977 तक रहा।

आपातकाल कितना दमनकारी व भयावह था ?

उसका अनुमान इस बात से लगाइए।

 उस दौरान करीब सवा लाख राजनीतिक नेताओं व कार्यकत्र्ताओं के अलावा देश भर के 253 पत्रकार भी गिरफ्तार व नजरबंद हुए थे।

उन्हें आंतरिक सुरक्षा कानून(मीसा) व भारत रक्षा कानून (डी.आइ.आर.)के तहत पकड़ा गया था।

   यानी, तब की केंद्र सरकार ने 253 पत्रकारों को भी देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक माना था।

   इन दिनों अक्सर यह कह दिया जाता है कि देश में अब इमर्जेंसी जैसे हालात हैं।

क्या कभी 19 महीने की कालावधि में किसी सरकार ने करीब 253 पत्रकारों को गिरफ्तार किया है ?

कभी नहीं।

  सन 1975-77 के आपातकाल में सरकार ने न सिर्फ सवा लाख नेताओं व राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को ,बल्कि 253 पत्रकारों को भी जेलों में ठूंस दिया, उन्हें अदालत जाने से भी वंचित कर दिया था।

  इतना ही नहीं,देश के 50 पत्रकारों की सरकारी मान्यता भी रद कर दी गई थी।उनमें कई नामी -गिरामी पत्रकार व कार्टूनिस्ट थे।

 18 पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद करा दिया गया था।

कुछ नेता लोग आज जब यह कहते हैं कि देश में आपातकाल जैस स्थिति है तो उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि दमन के उपर्युक्त संक्षिप्त आंकड़ों पर आपकी क्या राय है ?

याद रहे कि इमर्जेंसी का दमन इससे अधिक व्यापक था। 

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    आपातकाल के पीड़ितों 

    की पेंशन बंद क्यों ?

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राहुल गांधी ने कहा है कि 1975 में देश में इमर्जेंसी लगाना गलत था।ठीक ही कहा है।

क्योंकि सन 1977 के चुनाव में आम जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर करके इमर्जेंसी को गलत साबित कर भी दिया था।

याद रहे कि इमर्जेंसी के दौरान हजारों निर्दोष लोगों को जेलों में ठूंस कर कांग्रेस सरकार ने उनके साथ नाहक अत्याचार किया था।

बाद में कई गैर कांग्रेसी राज्य सरकारों ने पीड़ितों के लिए लोकतंत्र सेनानी -जेपी सेनानी पेंशन का प्रावधान किया।

पर मध्य प्रदेश ,महाराष्ट्र और राजस्थान की कांग्रेसी सरकारों ने बारी बारी से उस पेंशन को बंद कर दिया।

  यदि राहुल गांधी सचमुच यह मानते हैं कि इमर्जेंसी लगाना गलत था तो वे उस पेंशन को फिर से शुरू करवाएं।

वे तत्काल राजस्थान और महाराष्ट्र सरकारों से कहें कि वे लोकतंत्र सेनानी पेंशन फिर से शुरू करें।

यदि राहुल गांधी ऐसा नहीं करते हैं तो यह माना जाएगा कि इमर्जेंसी को लेकर उनका ताजा बयान मात्र दिखावा है।  

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 सरकारी योजनाओं की जानकारी 

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भारत सरकार की 115 योजनाएं हैं।

वे विकास और कल्याण आदि की योजनाएं हैं।

इनमें से कुछ योजनाओं के नाम तो बहुत चर्चित हैं।

उनके नाम अधिकतर लोगों को मालूम भी हैं।

उन पर हो रहे खर्चे भी नजर आते रहते हैं।

पर क्या आम लोगों को उन सारी 115 योजनाओं के बारे में पता है ?शायद नहीं।

  इसी तरह राज्य सरकारों की भी अनेक योजनाएं हैं।

उनमें से कुछ के बारे में लोग जानते हैं।पर यहां भी वही हाल है।अन्य अनेक योजनाओं के बारे में अधिकतर लोगों को कुछ नहीं मालूम।

  दोनों सरकारों की इन सारी योजनाओं के बारे में लोगों को पता हो जाए तो इनके कार्यान्वयन की स्थिति के बारे में लोग पता कर लेंगे।

  सूचना में बड़ी शक्ति होती है। 

उस शक्ति का लाभ अततः लोगों को ही मिलेगा।

सरकारों का यह कत्र्तव्य है कि अपनी योजनाओं के बारे में लोगों को बताए।

 समाज में ऐसे जागरूक लोग अब भी मौजूद हैं जो वैसी योजनाओं के लाभ लोगों तक पहुंचाने में सरकार की मदद कर सकते हैं जो सिर्फ कागजों पर हैं।

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   प्रशासन में नई प्रतिभाएं

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  केंद्र सरकार  संयुक्त सचिव स्तर के पदों पर निजी क्षेत्रों  से आमंत्रित कर विशेषज्ञों व नई प्रतिभाओं को बहाल करा रही है।

चयन का काम यू.पी.एस.सी. के जरिए ही हो रहा है।

ऐसी बहुत सारी बहालियां हो चुकी हैं।

निजी क्षेत्रों के अफसरों में आम तौर अपने कत्र्तव्यों के प्रति अधिक निष्ठा देखी जाती है।संविदा पर रहने के कारण भी उनमें सक्रियता की कभी कमी नहीं होती।

इससे आई.ए.एस.-आई.पी.एस.की कमी की समस्या भी कम हो रही है।

इसे ‘‘लेटरल इंट्री’’ कहा जा रहा है।

बिहार सहित दूसरे राज्यों में भी केंद्रीय सेवा के अफसरों की भारी कमी है।

इससे सरकारी काम-काज पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

  केंद्र सरकार को चाहिए कि वह लेटरल इंट्री के जरिए राज्यों में भी अफसरों की कमी को भी पूरा करे।

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 डूबते जहाज से भागते चूहे 

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जहाज डूबने लगता है तो चूहे भी भाग खड़े होते हैं।

उसी तरह जिस राजनीतिक दल में सत्ता पाने की ताकत नहीं रह जाती,उसके सत्ताकांक्षी सदस्य दल का साथ छोड़ देते हैं।

इन दिनों इस देश में यही हो रहा है।

कई दलों से उनके नेता-कार्यकत्र्ता अलग होते जा रहे हैं।

हालांकि कुछ दलों ने अपनी गलत नीतियों-रणनीतियों-कार्य नीतियों के कारण ही जाने-अनजाने अपनी ताकत घटाई है। 

यदि वे खुद में सुधार लाएं तो उनकी ताकत बढ़ सकती है।

फिर तो वही सत्ताकांक्षी लोग उनके साथ होंगे।यही इन दिनों की राजनीति का  आम चलन  है।स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छा संकेत नहीं है।  

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और अंत में

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पटना स्थित एक सरकारी अस्पताल के निबंधन और बिल बनाने वाले काउंटरों को निजी क्षेत्र के हवाले कर 

दिया गया है।

इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों के कुछ काउंटरों को भी ‘आउटसोर्स’ कर देना चाहिए।

यानी, ऐसे काउंटर जहां पैसे का लेनेदन नहीं है,उन्हें निजी क्षेत्र को सौंपने से कार्य 

-कुशलता बढ़ेगी।   

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.कानोंकान

प्रभात खबर,

 पटना,5 मार्च 21