मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

 भवन विहीन विद्यालयों से भी 

शत प्रतिशत मैट्रिक रिजल्ट। 

कैसे होता है यह चमत्कार ?

 कोई हमारा ज्ञानवर्धन तो करे !

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    --सुरेंद्र किशोर--

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दैनिक हिन्दुस्तान की खबर है कि इस साल पटना जिले के 20 भवन विहीन माध्यमिक विद्यालयों के सभी परीक्षार्थी मैट्रिक पास कर गए।

यह बात मुझे थोड़ी अविश्वसनीय लगती है।

मैं ओल्ड माॅडल (1963) का परीक्षार्थी जो ठहरा !!

क्या परीक्षा में कदाचार के बिना ऐसा चमत्कार संभव हुआ ?

क्या पढ़ाई का स्तर आसमान छू रहा है ?

  ऐसे ही एक स्कूल के कुल 155 छात्रों में से 75 छात्र प्रथम श्रेणी में इस साल मैट्रिक पास हुए।

(हम एकमा स्कूल से 1963 में 14 लोग प्रथम श्रेणी में आए थे तो जिले में उस स्कूल का भी नाम हुआ था)  

 पर आज के रिजल्ट तो कुछ अधिक ही अविश्वसनीय लगते हंै।

कोई मुझे समझाए कि हाल के वर्षों में ऐसा कैसे होने लगा 

है ?

हमारे जमाने में तो सबसे कम प्रथम श्रेणी और उससे अधिक द्वितीय श्रेणी में परीक्षार्थी पास होते थे।

तृतीय श्रेणी की संख्या तो बहुत बड़ी हुआ करती थी।

 क्या अब यह असंभव नहीं लगता कि कुल परीक्षार्थियों में

सर्वाधिक परीक्षार्थी प्रथम श्रेणी में पास कर जाए !

उससे कम द्वितीय श्रेणी में और सबसे कम तृतीय श्रेणी में ?

मेधा की जांच का कौन सा नया फार्मूला आया है ?

ऐसी स्थिति पर चिंता और चिंतन स्वाभाविक है।

इस मामले में ऐसे चमत्कारिक रिजल्ट

देने वाले संबंधित अफसरों व शिक्षकों से मैं अपना ज्ञानवर्धन करने को तैयार हूं।

शायद वे ही सही हों।

मैं गलत साबित हो जाऊं !

कोई हर्ज नहीं।

मेरी चिंता यह है कि आज राज्य में शिक्षा का हाल कैसा है ?

क्या रिजल्ट उसके समानुपातिक आते हैं ?

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8 अप्रैल 21

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सोमवार, 12 अप्रैल 2021

 जो व्यक्ति प्रकृति और प्राकृतिक जीवन शैली

से जितना अधिक करीब है,

वह सामान्यतः कोरोना से भी उतना ही ज्यादा दूर है।

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---सुरेंद्र किशोर

12 अपैल 21

 


रविवार, 11 अप्रैल 2021

     चुनाव या बंगलादेशियों के लिए युद्ध !

        --सुरेंद्र किशोर-- 

यदि चुनावी मुकाबला मुख्यतः बंगलादेशी घुसपैठियों के समर्थकों और विरोधियों के बीच हो तो रिजल्ट क्या होगा ?

आप खुद ही अनुमान लगा लीजिए।

इसके लिए किसी प्रशांत किशोर की गवाही की जरूरत ही क्या है ! 

 14 जुलाई, 2004 को गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद को बताया था कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों की संख्या 57 लाख है।

  पिछले 17 साल में वाम मोर्चा व ममता बनर्जी सरकारों के कार्यकाल में घुसपैठियों की संख्या बढ़ा-बढ़ाकर अपने वोट बैंक में वृद्धि करने के अलावा और क्या -क्या काम हुए हैं ?

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--सुरेंद्र किशोर--11 अप्रैल 21


   ममता बनर्जी वर्षों से नरेंद्र मोदी को

   सरेआम गुंडा कहती आ रही हैं।

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 आजादी के बाद ममता बनर्जी इस देश की संभवतः पहली 

मुख्य मंत्री हैं जो लगातार अपने देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को सार्वजनिक रूप से गुंडा कहती रहती हैं।

   (22 दिसंबर, 2016 के दैनिक ‘‘द पायनियर’’ 

की संबंधित कटिंग की स्कैन काॅपी प्रस्तुत है।)

  इसके बावजूद कुछ अन्य बड़े नेता यह आरोप

लगाते रहते हैं कि इस देश में बोलने की आजादी नहीं है।

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इस देश के किसी चैक-चैराहे पर किसी मजबूत आदमी को आप जरा गुंडा कह कर देख लीजिए,आपका क्या 

हाल होता है !!

पर,चंडूखाने को छोड़ दें तो राजनीति ही ऐसी जगह है जहां आप किसी को कुछ भी कह कर बच सकते हैं।

क्या इसीलिए कुछ लोग राजनीति में नहीं जाना चाहते ?

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सुरेंद्र किशोर

9 अप्रैल 21   


       बिजनेसमैन भी अपनी संतान को 

      शिक्षित व काबिल बनाते हैं।

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किंतु इस देश के वंशवादी-परिवारवादी 

दलों की अगली पीढ़ियों को कमान देने से पहले 

कितना शिक्षित किया जाता है ?

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--सुरेंद्र किशोर-- 

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  टूव्हीलर श्रेणी में हीरो दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है।

उसका इंश्योरेंस डिस्टीब्यूशन बिजनेस भी देश का सबसे बड़ा है।

   ऐसा कैसे संभव हुआ ?

इसका कारण बताते हैं कंपनी चेयरमैन सुनीलकांत मुंजाल।

 उन्होंने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा कि 

‘‘हमने कोशिश की कि हम हर पीढ़ी को अच्छी शिक्षा दें।

मुंजाल इस बात से सहमत थे कि आम तौर पहली पीढ़ी बिजेनस तैयार करती है।दूसरी पीढ़ी उसे एक मुकाम पर ले जाती है।

ज्यादातर मामलों में तीसरी पीढ़ी उसे बर्बाद कर देती है।

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अब इसकी तुलना इस देश की वंशवादी-परिवारवादी  राजनीतिक पार्टियों से कीजिए।

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आजादी के लड़ाई के दिनों और बाद के कुछ वर्षों तक राजनीति, ‘सेवा’ थी।

1972 में जब स्वतंत्रता सेनानियों के लिए और 1976 में पूर्व सांसदों के लिए पेंशन का प्रावधान किया गया,तो मान लिया गया कि राजनीति ‘नौकरी’ है।

सन 1992 में जब सांसद फंड की व्यवस्था हुई तो राजनीति का व्यावसायिक रूप सामने आया।

    राजनीति में निरंतर गिरावट के कारण अब स्थिति यह है कि राजनीति को ‘‘उद्योग का दर्जा’’ मिल चुका है।

जब भी किसी बड़े नेता की संपत्ति की जांच होती है तो अनेक मामलों में यह पाया जाता है कि उसके पास अरबों की अघोषित संपत्ति है।

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राजनीति में सक्रिय कुछ नेता व दल इसके अपवाद जरूर हैं।

किंतु अधिकतर वंशवादी-परिवारवादी दलों को देखकर लगता है कि वे राजनीति के नाम पर निजी उद्योग चला रहे हैं।

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किंतु उन्होंने मुंजाल की तरह अपने वंशजों को शिक्षित किया होता तो तीन-चार पीढ़ियां बीतते -बीतते उनके दुबले होते जाने की नौबत नहीं आती।

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हालांकि वंशवादी-परिवारवादी दलों में उत्तराधिकारी के रूप में कुछ ऐसे अपात्र नेता भी सामने आए हैं जिन्हें शिक्षित करने से भी कोई फायदा नहीं होने वाला था।

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--सुरेंद्र किशोर-11 अप्रैल 21  


 भैरव लाल दास का नाम उन चंद लेखकों में शामिल 

हो गया है जो खोजपूर्ण व तथ्यपरक लेखन करते हैं।

  उनकी नई पुस्तक पंडित राज कुमार शुक्ल पर आई है।

पुस्तक का नाम है -‘‘महात्मा गांधी के तीसरे गुरु पं.राजकुमार शुक्ल।’’

प्रकाशक है आदित्य इंटरप्राइजेज,पटना।

  नाम से ही विषय वस्तु की एक झलक मिल जाती है।

वैसे भी जो चम्पारण के गांधी को जानते हैं,वे राजकुमार शुक्ल की भूमिका से भी अवगत हैं।

  भैरव लाल दास की अन्य पुस्तकें हैं 

गोत्राध्याय,

कैथी लिपि का इतिहास,

विप्लवी बटुकेश्वर दत्त,

गदर आंदोलन का इतिहास,

महात्मा गांधी के चम्पारण आंदोलन के सूत्रधार -राजकुमार शुक्ल की डायरी,

चम्पारण में गांधी की सृजन यात्रा

तिनकठिया,

क्रांतिकारी गांधीवादी: देवशरण सिंह

और विन्घ्येश्वरी प्रसाद वर्मा-एक संत राजनेता।

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‘आशा और विश्वास एक यात्रा’

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मशहूर चिकित्सक और पूर्व केंद्रीय मंत्री डा.सी.पी.ठाकुर ने इसी नाम से किताब लिखी है।

दैनिक प्रभात खबर के अनुसार 

‘‘डा.ठाकुर की पुस्तक में उनके पटना मेडिकल काॅलेज में प्रवेश से लेकर ब्रिटेन में उच्च शिक्षा हासिल करने और राजनीति में आने तक के प्रसंगों की जीवंत चर्चाएं हैं।’’ 

इसे मशहूर ‘प्रभात प्रकाशन’ ने प्रकाशित किया है।

  डाक्टर साहब एक सफल चिकित्सक व सफल राजनेता रहे हैं।

उनकी पुस्तक तो मेरे सामने नहीं है।

किंतु मैं अनुमान लगा सकता हूं कि पुस्तक में अनेक ऐसे प्रसंग होंगे जो दोनों क्षेत्रों के लोगों को प्रेरित करेंगे।

    इस देश के बड़े नेतागण अब आम तौर पर अपने संस्मरण खुद नहीं लिखते।अपवादों की बात और है।

आजादी की लड़ाई के दौर के अनेक नेताओं ने लिखे हंै।

  डा.ठाकुर को धन्यवाद कि उन्होंने लिखा।

ऐसी पुस्तकों से न सिर्फ उस हस्ती के बारे में बल्कि उस समय के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारियां मिल जाती हैं।

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सुरेंद्र किशोर--10 अप्रैल 21


शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

 


 भ्रष्टाचार-अपराध के ऊंटों को पहाड़ के नीचे लाने के लिए धन्यवाद--सुरेंद्र किशोर

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चर्चित गैंगेस्टर मुख्तार अंसारी जैसा अपराध जगत का ऊंट अब पहाड़ के नीचे आ गया है।

उधर भ्रष्टाचार जगत के ऊंटों के ‘‘आदेशपालक’’ पुलिस अफसर सचिन वाझे भी 

जांच एजेंसी के मजबूत शिकंजे में हैं।

  यह इस देश की अदालतों की महिमा है कि इतने बड़े -बड़े ‘‘ऊंट’’ भी पहाड़ के नीचे आते जा रहे हैं। अब इनके आका और  लगुए-भगुए भी देर -सवेर कठघरों में होंगे।

 कतिपय शीर्ष नेताओं की मदद से मुख्तार अंसारी दशकों से उत्तर प्रदेश में अपनी बादशाहत चला रहे थे।

  कोई उन्हें छूने वाला नहीं था।

छूने वाले अफसर ही शीर्ष सत्ता द्वारा छूमंतर कर दिए जाते थे।अब स्थिति बदल रही है।

उन्हें दिन में तारे देखने होंगे।

 इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का, शांतिप्रिय लोग,न्यायपालिका 

 के शुक्रगुजार रहेंगे।

उधर सचिन वाझे की स्वीकारोक्तियों के कारण महाराष्ट्र के बड़े- बड़े नेताओं के असली चेहरे जल्द ही सामने आएंगे।

  अदालतों की सक्रियता के कारण ही इस देश के कई विवादास्पद नेता व माफिया विभिन्न राज्यों के जेलों में पहले से कैद हैं। 

कुछ अन्य गंभीर आरोपों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं।

उनमें से कई जेल के रास्ते में हैं। 

  अदालतें इसी तरह भेदभावरहित होकर सक्रिय रहीं तो सार्वजनिक धन के  बाकी बचे अन्य लुटेरों को भी इसी तरह बुरे दिन देखने पड़ेंगे।

सार्वजनिक धन, आमजन से प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से वसूले गए टैक्स के पैसों से ही, एकत्र होता है।

सार्वजनिक धन में से अपार राशि शासकों की मदद से कुछ थोड़े लोग यदि लूट लें तो देश का विकास कैसे होगा ?

गरीबों की गरीबी दूर कैसे होगी ?

आंतरिक और बाह्य सुरक्षा बल को मजबूत करने के लिए साधन कैसे जुटेगा ?

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  देश में धन का केंद्रीकरण

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इस देश में अरबपतियों की संख्या बढती जा रही है।

यह संख्या एक साल में 102 से 140 हो गई।

दुनिया के अरबपतियों की सूची में भारत का स्थान तीसरा है।

यानी, इस विकासशील देश में धन का संकेंद्रीकरण हो रहा है।

संविधान निर्माताओं को इस स्थिति का अंदेशा था।

इसीलिए संविधान के नीति निदेशक तत्वों वाले अध्याय में इसकी चर्चा की गई है।

   अनुच्छेद-39 (ग)में यह कहा गया है कि 

देश की ‘‘आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन ओर उत्पादन के साधनों का अहितकारी संकेंद्रण न हो।’’

 अधिकतर सार्वजनिक उपक्रमों की विफलता के कारण भी पूंजीवाद मजबूत हुआ है।

पूंजीवाद धीरे -धीरे एकाधिकार पूंजीवाद में बदलने लगा है।

 आजादी के बाद केंद्र सरकार ने मिश्रित अर्थ -व्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश की थी।

  इसलिए एक तरफ जहां अनेक निजी उपक्रमों का सरकारीकरण हुआ,वहीं सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों की बड़े पैमाने पर स्थापना की।

 इनमें से कई सार्वजनिक उपक्रम अब भी बढ़िया काम कर रहे हैं।

पर अधिकतर उपक्रम भ्रष्टाचार और काहिली के शिकार हो गए।

   दरअसल जब राजनीति में सदाचार का लोप होने लगा तो उसका कुपरिणाम सार्वजनिक उपक्रमों पर पड़ना ही था।

  यदि अब से भी भ्रष्टाचार और काहिली के खिलाफ सरकारें कठोर हो जाएं तो सार्वजनिक उद्यम बढ़ेंगे।

मिश्रित अर्थ व्यवस्था विकसित होगी । आज जैसा धन का संकेंद्रण नहीं होगा।

क्या ऐसा हो पाएगा ?

पता नहीं।

जिस देश के अधिकतर नेताओं और अफसरों के बीच ‘‘पैसे से  सत्ता और सत्ता से पैसे बनाने की होड़ मची हो,उस देश में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के विकास की संभावना कम ही है।

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  पश्चिम बंगाल का चुनाव बाद परिदृश्य

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पश्चिम बंगाल के साथ -साथ केरल से भी चुनावी हिंसा की खबरें आती रही हैं।

आरोप लगा कि कोझिकोड में मंगलवार को सी.पी.एम.कार्यकत्र्ताओं ने मुस्लिम लीग के एक कार्यकत्र्ता की हत्या कर दी।

  पश्चिम बंगाल से तो आम दिनों में भी अनेक हत्याओं की खबरें आती रही हैं।

पर दोनों हत्याओं में अधिक नहीं तो थोड़ा फर्क जरूर है।

2012 की मई में केरल सी.पी.एम. के इडुकी जिला सचिव एम.एन.मणि ने कहा था कि ‘‘हम अपने राजनीतिक विरोधियों की हत्या करवा देते हैं।’’

उनका यह बयान देश भर के अखबारों में छपा था।

  पर, पश्चिम बंगाल की चुनावी हिंसा उसी तरह की है जिस तरह की हिंसा बिहार में अस्सी-नब्बे के दशकों में हुआ करती थी।

   अभी तो रिजल्ट आना बाकी है।इसलिए यह कहना संभव नहीं है कि बंगाल में अगली सरकार किसकी बनेगी।

मिल रहे अनुमानों के अनुसार किसी पक्ष की सरकार बन सकती है।

ममता बनर्जी की सरकार यदि फिर बन जाए तब तो हिंसा के मामले में भी किसी परिवत्र्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती।

किंतु भाजपा की बनी तो कुछ उम्मीद की जा सकती है।

  हालांकि नजर आने लायक परिवत्र्तन तभी होगा जब पिछली सत्ता से जुड़े बाहुबली, अगली सत्ता के हिस्सा न बन जाएं।

 पिछले दशकों में यही होता रहा है।

पश्चिम बंगाल में 1972 -77 की कांग्रेस सरकार ने नक्सलियों  के सफाए के लिए बाहुबली दस्ते तैयार किए थे।

पर जब 1977 में वाम मोर्चा की सरकार बनी तो उनमेंसे अनेक बाहुबली वाम मोर्चा में शामिल हो गए।

बाद में वही लोग ममता बनर्जी की पार्टी की शोभा बढ़ाने लगे। 

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और अंत में

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बिहार के ताजा मैट्रिक रिजल्ट की मेधा सूची देखी।

92 टाॅपरों में से सिर्फ 14 विद्यार्थियों के नाम के साथ जाति सूचक उपनाम हैं।

खैर, नाम तो उनके अभिभावक ने रखे हैं।

यह किस बात का संकेत है कि अधिकतर लोग जातीय पहचान का प्रदर्शन अब नहीं चाहते।

ऐसा पहले नहीं था।

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कानोंकान,प्रभात खबर

पटना-9 अप्रैल 21