बुधवार, 21 जुलाई 2021

 55 किलोमीटर की साइकिल यात्रा

साइकिल एक, सवार दो

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सुरेंद्र किशोर

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मैं आरा के महाराजा काॅलेज में प्री.-साइंस का छात्र था।

 सन 1963-64 के बैच में था।

मेरे मित्र राम कुमार गुप्त भी मेरे सहपाठी थे।

मित्र भी।

  वे आरा के एक बड़े व्यवसायी परिवार से आते थे।

 उनके पास चार चक्के वाली गाड़ी भी थी।

एक दिन तो हम लोग उस गाड़ी से आरा से कोइलवर आए और फिर बबुरा की ओर मुड़े।

किंतु बीच से ही लौट गए।

खुद राम कुमार गाड़ी चला रहे थे।

राम कुमार को गाड़ी चलाते देख कर मन ही मन तय किया था कि किसी दिन मैं भी ड्राइविंग

 सीखूंगा।

पर यह काम आज तक नहीं हो सका।

अब क्या होगा ?

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 किसी और दिन हमने तय किया कि हम साइकिल से ही आरा से पटना चलें।

  एक साइकिल और दो सवार।

आरा से पटना की दूरी 55 किलोमीटर है।

कभी मैं साइकिल चलाता तो राम कुमार बैठते।

कभी राम कुमार चलाते थे तो मैं बैठता।

  हम पटना पहुंचे।

पर्ल सिनेमा हाॅल में फिल्म देखी।

हम फिर साइकिल से ही 

आरा की ओर लौटे।

किंतु दानापुर पहुंचते-पहंुचते हम काफी थक चुके थे।

इसलिए दानापुर में ट्रेन में साइकिल रखी और आरा पहुंचे।

 राम कुमार गुप्त अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने पारिवारिक व्यवसाय में लग गए।

  2007 से पहले तक उनसे मुलाकात होती थी जब मैं हिन्दुस्तान,पटना में काम करता था।

बाद में हम नहीं मिले।

 पता नहीं, अब वे कहां हैं !

उनका मोबाइल नंबर भी मेरे पास नहीं।

 राम कुमार की एक तस्वीर पर नजर पड़ी तो सोचा कि अपनी उस साहसिक साइकिल यात्रा की याद कर लूं।

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20 जुलाई 21


  

  


मंगलवार, 20 जुलाई 2021

     2013 के अनंतमूत्र्ति के बाद 2021 के 

     मुन्नवर राणा की पीडा़ सुनिए !

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     --सुरेंद्र किशोर--

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखक डा.यू.आर.

अनंतमूत्र्ति ने 19 सितंबर, 2013 को कहा था कि 

‘‘मैं ऐसे देश में रहना पसंद नहीं करूंगा जिस देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी होंगे।’’

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उनकी इच्छा के खिलाफ मई, 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री बन गए।

उसके बाद भी अनंतमूत्र्ति जी इसी देश में रहे।

अगस्त, 2014 में बंगलुरू में उनका निधन हुआ।

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अब मुन्नवर राणा कह रहे हैं कि 2022 में यदि योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव जीत गए तो मैं यह राज्य छोड़कर कोलकाता में बस जाऊंगा।’’

  खैर ,राणा साहब देश नहीं छोड़ेंगे !

मुन्नवर राणा जैसे लोगों का ममता बनर्जी पर विश्वास तो देखिए !

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लेकिन सवाल है कि इस शायर महोदय के पुत्र को तो फिलहाल उत्तर प्रदेश में ही रहना पड़ेगा।

  क्योंकि उस पर आरोप है कि उसने अपने चाचा को फंसाने के लिए खुद पर गोलियां चलवाई थीं।

संपत्ति का झगड़ा जो न कराए !

 मुन्नवर इस बात पर नाराज हैं कि पुलिस उनके पुत्र की तलाश में रात में उनके घर क्यों गई थी ?

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दरअसल योगीराज ने यू.पी.के उन सारे ‘ऊंटों’ को पहाड़ के नीचे ला दिया है जो कभी समझते थे कि कानून के लंबे हाथ भी उनतक नहीं पहुंच सकते।

हां,यदि यू.पी.में राजपाट बदल गया तो वे सारे ऊंट एक बार फिर पहाड़ को रौंदने लगेंगे।

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--सुरेंद्र किशोर

20 जुलाई 21

  


 नेहरू के 13 साल तक निजी सचिव 

रहे एम.ओ.मथाई की संस्मरणात्मक 

किताबों पर से कब हटेगा प्रतिबंध ?

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    --सुरेंद्र किशोर--

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  जनवरी, 2020 में दैनिक भास्कर के स्तम्भकार 

डा.भारत अग्रवाल ने अपने काॅलम में एक महत्वपूर्ण जानकारी दी थी।

  उन्होंने लिखा था कि एम.ओ.मथाई की जवाहरलाल नेहरू पर लिखी पुस्तकों पर से प्रतिबंध जल्द ही हटा लिया जाएगा।

पर, वह काम आज तक नहीं हुआ।

अब अग्रवाल साहब को यह पता लगाना चाहिए कि प्रतिबंध हटाने में बाधा क्या है ?

   मेरी समझ से यदि नरेंद्र मोदी सरकार ने ऐसा करने की हिम्मत की तो वह व्यापक देशहित में ही होगा।

भले वह परिवार, दल और कतिपय ‘भक्त’ बुद्धिजीवियों के खिलाफ जाए।

  मैंने मथाई की दोनों किताबें छिटपुट पढ़ी हैं।

मैं यह कहता रहा हूं कि यदि किसी को जानना हो कि आजादी के बाद देश को कैसे गलत रास्ते पर ले जाया गया तो वह मथाई की दोनों किताबें पढं़े।

इसी तरह यदि बिहार की तब की ‘‘राजपाट शैली’’ की असली

कहानी जाननी हो तो अय्यर कमीशन की रपट-1970-पढं़े।

   संभवतः यह रपट पटना के गुलजारबाग स्थित सरकारी प्रेस में बिक्री के लिए अब भी उपलब्ध हो !

  मथाई ने नेहरू ,उनकी सरकार व उनके अनेक महत्वपूर्ण समकालीनों की कमियां लिखी हैं तो अच्छाइयां भी।

  यानी, यह धारणा गलत है कि सिर्फ बुराइयां ही लिखी हैं। 

मथाई ने एक जगह तो यह भी लिख दिया है कि नेहरू की आलोचना करने की हैसियत जार्ज फर्नांडिस में कत्तई नहीं।

  जार्ज तो नेहरू के जूते का फीता बांधने लायक योग्यता भी नहीं रखता।

  खैर, आजादी के तत्काल बाद की हमारी सरकारों ने यह सिखाया कि महाराणा प्रताप और शिवाजी की अच्छाइयां -वीरता न लिखो और न पढ़ो।

हां, अकबर की महानता जरूर पढ़ो।

इसीलिए आज यदि आप महाराणा व शिवाजी के शौर्य -स्वाभिमान की चर्चा करते हुए कोई पोस्ट लिखेंगे तो दस-बीस लाइक मुश्किल से ही मिल पाएंगे।

हां, अकबर पर अधिक मिल सकते हैं।

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  एक नहीं, दो अप्रकाशित अध्याय 

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अब तक आपने सुना होगा कि मथाई की किताब में ‘सी’ यानी ‘वह’ चैप्टर शामिल नहीं किया गया।

पर, यह आधा सच है। 

मथाई ने एक और चैप्टर शामिल नहीं किया।

मथाई ने लिखा कि पात्र के जीवनकाल में ये नहीं छपेंगे।

  दूसरे चैप्टर का शीर्षक था-

‘एक फिल्म की कहानी।’

मथाई के अनुसार,

 ‘‘इसमें बहुत सनसनीखेज मसाला था।

राष्ट्रपति भवन के द्वारिका कक्ष में 1966 में एक दिन तीसरे पहर के समय क्या हुआ,यह उस फिल्म में दिखाया गया है।

.........फिल्म में जिस व्यक्ति की करतूत दिखाई गई है,उसे अपने भाग्य को सराहना चाहिए कि फिल्म मेरे हाथ लग गई है और सुरक्षित है।’’

    मेरा मानना है कि इन अध्यायों को छोड़कर भी यदि मथाई की किताबों को फिर से प्रकाशित करने  की अनुमति मिल जाए तो भी कुछ लोग उसे एक बार फिर प्रतिबंधित कर देने की कोर्ट से मांग कर सकते हैं।

क्योंकि उनमें भी सनसनीखेज सामग्री भरी पड़ी है। 

देखना है कि डा.अग्रवाल की सूचना या अटकल अंततः सही साबित होती है या नहीं।

अब तक तो सही साबित नहीं हुई है।

  किसी ने ठीक ही कहा है कि 

‘‘जो लोग अपने भूतकाल को याद नहीं रखते,वे उसे दुहराने को अभिशप्त होते हैं।’’

न सिर्फ मध्यकालीन भारत के इतिहास के साथ भारी छेड़छोड़ हुई बल्कि आजादी के बाद के इतिहास को भी गोदी मीडिया व गोदी लेखकों गोल कर दिया।

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कुछ साल पहले प्रगतिशील लेखक की मोटी किताब मैंने पढ़ी थी।

उन्होंने लिखा कि इस देश की राजनीति में  वंशवाद-परिवावाद की नींव ग्वालियर के सिंधिया परिवार ने डाली।

 जबकि सच्चाई यह है कि यह काम 1928-29 में मोतीलाल नेहरू ने गांधी पर दबाव डाल कर किया था।सन 1928 में मोतीलाल कांग्रेस अध्यक्ष थे और 1929 में जवाहरलाल।

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हाल में एक लेखक ने मुझे सूचित किया कि वह भागलपुर दंगे पर किताब लिख रहे हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि उनके शोध से यह पता चला है कि 

एस.पी.की जीप पर किसने बम फेंका था,उसकी अब तक पहचान नहीं हुई है।

 जबकि पूरा भागलपुर सच्चाई जानता है।

याद रहे कि जीप पर बम फेंकने के बाद ही दंगा भड़का था।

यह और बात है कि उस दंगे को रोकने के बदले बढ़ाने में पुलिस का योगदान रहा।

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 हमारे देश की समस्या यह है कि इतिहास लिखते समय उसमें अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार भारी छेड़छाड़ कर दी जाती है।

  मथाई के आंखों देखे -भोगे ‘इतिहास’ को तो प्रतिबंधित ही कर दिया गया।

याद रहे कि एम.ओ.मथाई 1946 से 1959 तक प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के विशेष सहायक रहे।

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पुनश्चः

अपनी पहली पुस्तक के बारे में अपनी दूसरी पुस्तक में 

मथाई ने लिखा है कि 

‘‘अज्ञानी,पूर्वाग्रही व अशिक्षित आलोचकों ने जो कुछ लिखा हो,उसके बावजूद एक गैर सरकारी संस्थान ने मेरी पुस्तक को भारतीय प्रशासनिक सेवा ,भारतीय विदेश सेवा तथा अन्य केंद्रीय सेवाओं की परीक्षाओं के लिए आवश्यक रूप से पढ़ने की पुस्तकों में शामिल किया।

  जिन अन्य लेखकों की पुस्तकों को इसमें शामिल किया गया है वे हैं डा.एस.राधाकृष्णन, के.एम.पणिकर, हक्सले, वी.एस.नाईपाल और आर्थर कोइसलर।

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--सुरेंद्र किशोर--18 जुलाई 21

   


     


सोमवार, 19 जुलाई 2021

 मत बताइए खबर का स्रोत 

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--सुरेंद्र किशोर--

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अस्सी के दशक की बात है।

कर्पूरी ठाकुर ने लोक दल विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दिया था।

 वह अपने ही दल के कुछ विधायकों के व्यवहार से दुखी रहा करते थे।

इस्तीफे की खबर छपी नहीं थी।

किंतु लोकदल खेमे में इस बात की दबे स्वर में

चर्चा हो रही थी।

पहले मैंने इस्तीफे की चिट्ठी की काॅपी हासिल कर ली।

 उन दिनों मैं दिल्ली के एक दैनिक अखबार(जनसत्ता) का बिहार संवाददाता था।

मैंने वह खबर भेजी।

 वह पहले पेज पर छप गई।

कर्पूरी जी ने उस खबर का खंडन कर दिया।

उसके बाद मैंने वह इस्तीफा पत्र भी छपवा दिया।

फिर क्या था !

कर्पूरी जी चाहते तो कह सकते थे कि चिट्ठी जाली है।

किंतु उन दिनों के कुछ नेता आज जैसे नहीं थे।

कर्पूरी जी ने मुझे बुलवाया।

मैं बिहार विधान सभा स्थित उनके कमरे में पहुंचा।  

उन्होंने अन्य सारे लोगों को बाहर निकल जाने के लिए कहा।

कमरे में सिर्फ हम दोनों थे।

मैं अपनी पृष्ठभूमि बता दूं।

1972-73 में मैं लोहियावादी समाजवादी कार्यकत्र्ता की हैसियत से उनके बुलावे पर कर्पूरी जी का निजी सचिव बना था।

  कर्पूरी जी को लगता था कि मैं उन्हें यह बता दूंगा कि उस चिट्ठी को किसने लीक किया।

  उन्होंने आग्रह के साथ पूछा कि आपको मेरी चिट्ठी किसने दी ?

वह बहुत ही विनयी स्वभाव के नेता थे।

उनके व्यक्तित्व के प्रभाव मंे आकर एक क्षण तो मुझे लगा कि मैं बता दूं।

पर, तुरंत ही मैं संभल गया।

मैंने उनसे कहा कि यदि बता दूंगा तो एक संवाददाता के रूप में मेरी साख समाप्त हो जाएगी।

  मैंने नहीं बताया।

वह भी मेरी मजबूरी समझ कर मान गए।

इस घटना की सीख यह है कि ऐसी खबर छापने से पहले उसका सबूत अपने पास रख लेना चाहिए।

वैसे सही सबूत को भी जाली करार दे देने का खतरा आज अधिक है।       

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कानोंकान

प्रभात खबर

पटना

16 जुलाई 21



 डा.राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि 

जो व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में रहना चाहते हैं 

उन्हें अपना घर नहीं बसाना चाहिए।

याद रहे कि लोहिया ने न तो शादी की और न ही अपने लिए कहीं भी कोई एक कमरा भी बनवाया।

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  मैं इसमें एक और बात जोड़ता हूं।

किसी भी क्षेत्र में कार्यरत जो व्यक्ति ईमानदार जीवन जीना चाहता है, उसे भी अपना परिवार खड़ा नहीं कर चाहिए।

यदि खड़ा करता है तो वह जोखिम मोल लेता है।

उनमें से वे थोड़े लोग सौभाग्यशाली होते हैं जो ऐसे जेखिम से बच पाते हैं।

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इस देश के एक पूर्व मुख्य मंत्री को अपनी संतान की गलत महत्वाकांक्षा के खिलाफ लड़ते और अपनी जान गंवाते देखा है।

लोकलाज का ख्याल रखने वाले एक अन्य बड़े नेता के राजनीतिक कैरियर में विराम लग गया क्योंकि उन्होंने अपने एक करीबी रिश्तेदार का कैरियर संवारना चाहा था।

  तीसरा उदाहरण भी एक नेता का ही है।

अपने विवादास्पद पुत्र को केस से बचाने के क्रम में उन्हें खुद लंबी जेल यातना सहनी पड़ी।

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यह तो हुई बड़ी हस्तियों की बात।

इस अर्थ युग में ,जिसमें स्वार्थी व संयमी लोगों की संख्या निरंतर घटती जा रही है,असंख्य सामान्य लोग संतान सुख की जगह ‘‘संतान प्रदत्त पीड़ा’’ अकेले ही झेलने को अभिशप्त हैं।

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आप चाहे जिस क्षेत्र में काम कर रहे हों,यदि आप अपनी सिर्फ जायज आय पर संतोष कर लेते हैं तो आप भी एक तरह से सार्वजनिक जीवन में ही हैं।

क्योंकि उस तरह आप परोक्ष रूप से देश का ही भला कर रहे होते हैं।

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--सुरेंद्र किशोर

19 जुलाई 21 

 

 


बुधवार, 14 जुलाई 2021

 


केंद्र में बिहार के मंत्रियों से राज्य के विकास को गति देने की उम्मीद -सुरेंद्र किशोर

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केंद्र सरकार में बिहार के मंत्रियों से एक खास उम्मीद है।

वे अपने मंत्रालयों के काम के अलावा बिहार के लिए कुछ खास भी करें।

वे इस राज्य के विकास को गति देने में अपना विशेष योगदान दें।

  देश के अन्य हिस्सों के साथ- साथ बिहार में भी हाल के वर्षों में विकास के काफी काम हुए हैं।

सड़क और बिजली के मामले में बिहार अब पहले जैसा पिछड़ा नहीं है।

हां,उद्योग के क्षेत्र में अब भी बहुत काम करने बाकी हैं।

लगता है कि बिहार के नए उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसेन एकाग्र चित्त से इस काम में लगे हुए हैं।

  कोरोना काल में भी मंत्री के अनुसार करीब 34 हजार करोड़ रुपए के निवेश का प्रस्ताव बिहार आया है।

  बिहार से केंद्र में मंत्रियों के बीच दो पूर्व आई.ए.एस अफसर भी हैं।

आर.के सिंह ने अपनी ईमानदारी व कार्य कुशलता के कारण प्रधान मंत्री का ध्यान आकृष्ट किया ।

इसीलिए उन्हें पदोन्नति भी दी गई।

  आर.के.सिंह नवीकृत ऊर्जा के क्षेत्र में बिहार जैसे पिछड़े राज्य में विशेष कार्य करा सकते हैं।

  यह तो उनका ही मंत्रालय है।

  किंतु पूर्व आई.ए.एस. अफसर द्वय यानी आर.सी.पी.सिंह और आर.के.सिंह केंद्र सरकार के अन्य मंत्रालयों में बिहार की लटकी योजनाओं को क्लीयर करवाने में अनौपचारिक रूप से मदद कर सकते हैं।

  कभी सुना था कि केंद्रीय सचिवालय में पदस्थापित केरल मूल के आई.ए.एस.अफसर अपने राज्य की योजनाओं को लटकने नहीं देते।

केरल के विकास का यह एक बड़ा कारण रहा।

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 नगरों के पास बेतरतीब बसावट 

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पहुंच पथ और जल निकासी व्यवस्था के बिना ही 

जहां -तहां मकान बना लेने का क्या परिणाम हो सकता है ?

बाद में लोग कई बार रास्ते के लिए पड़ोसी से झगड़ते हैं।

मुकदमेबाजी होती है।

यदाकदा हिंसा भी हो जाती है।

पुलिस का काम बढ़ जाता है।

भारी जल जमाव होता है।

जल जमाव को लेकर पीड़ित लोग व प्रतिपक्षी राजनीतिक दल शासन पर टूट पड़ते हैं। 

बरसात में यह समस्या अधिक दिखाई पड़ती है।

मुख्य पटना के आस-पास के ग्रामीण इलाकों में यह हो रहा है।

बिहार के अन्य नगरों के आसपास की स्थिति भी यही है।

   ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि सुव्यवस्थित बसावट सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी से राज्य सरकार ने आम तौर पर खुद को अलग कर लिया है। 

अधिकतर डेवलपर्स व जमीन की खरीद-बिक्री के काम में लगे लोग सड़क-नाली की उपलब्धता का कम ही ध्यान रखते हैं।

ऐसे में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

या तो सरकार खुद जमीन विकसित करके इच्छुक लोगों के बीच  भूखंड बांटे ।या, डेवलपर्स पर अंकुश लगाकर बेतरतीब मुहल्लों को बसने से रोके। 

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    मोदी सरकार में ओ.बी.सी.की संख्या 

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नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में ओ.बी.सी.मंत्रियों की संख्या बढ़ाने  

पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आई हैं।

कुछ लोगों को एतराज भी है।

वैसे उनके बहाने अलग- अलग हैं।

पर, जब ‘‘गंगा उल्टी दिशा’’ में बह रही थी तो ऐसे लोगों को  एतराज नहीं था।

इस संबंध में चैधरी चरण सिंह की एक टिप्पणी आज भी मौजूं लगती है।

खुद पर जातिवाद का आरोप लगने पर चरण सिंह ने 1981 में कहा था कि ‘मेरा दोष केवल यही है कि मैं जाट के घर पैदा हो गया हूं।

   अगर अपने को ऊंचा समझने वाली बिरादरी में पैदा हो गया होता तो ऐसा इल्जाम नहीं कोई लगाता।’’

उन्होंने कहा था कि मेरे मंत्रिमंडल में केवल एक जाट मंत्री था। जबकि, पूर्व के प्रधान मंत्री के मंत्रिमंडल में उनकी जाति के दस मंत्री थे।

फिर भी उन पर जातिवाद का आरोप नहीं लगा।’’

  याद रहे कि नेशनल सेम्पुल सर्वे के अनुसार इस देश में ओ.बी.सी.की संख्या कुल आबादी का 41 प्रतिशत है।

   लोकतंत्र का अर्थ यही है कि सत्ता संचालन में सभी लोगों की सहभागिता हो।

हां, यह जरूर सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ओ.बी.सी.सहित किसी भी समुदाय के भरसक योग्य व ईमानदार लोगों को ही मंत्री सहित कोई भी महत्वपूर्ण सरकारी पद मिलना चाहिए।

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 गोली पैर में मारने की सलाह

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   असम के मुख्य मंत्री हिमंत बिश्व शर्मा ने कहा कि ‘‘यदि किसी पर बलात्कार का आरोप है और वह पुलिस से राइफल छीन कर भाग रहा है तौभी उसे पैर में ही गोली मारी जानी चाहिए न कि सीने पर।’’

  खबर है कि उत्तर प्रदेश के बाद अब असम में भी अपराधियों को गोली मारे जाने की घटनाएं बढ़ी हैं।

यह काम पुलिस कर रही है।

किंतु यह पता नहीं कि जरूरत पड़ने पर उत्तर प्रदेश में पैर में ही गोली मारने का काम हो रहा है या नहीं।

   हां, अपवादों को छोड़कर उत्तर प्रदेश के आम लोग पुलिस की कार्रवाइयों से इन दिनों खुश नजर आते हैं।

  अब सवाल है कि ऐसी नौबत क्यों आ रही है ?

 पुलिस के सामनेे गोली मारने के अलावा और कितने विकल्प हैं ?

अपराधियों को त्वरित सुनवाई के जरिए अदालतों से सजा दिलवा देना एक बढ़िया विकल्प है।

किंतु राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण के कारण यह विकल्प सीमित होता जा रहा है।

  बिहार सरकार ने क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए हाल में कुछ उपायों पर काम करना शुरू किया है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस प्रयास को सफलता भी मिलेगी।

  वैसे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को बेहतर करने के लिए केंद्र सरकार राज्यों की मदद करे। 

वह कुछ ठोस उपाय करे ।

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और अंत में

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महाकवि कालिदास के अनुसार 

‘‘सज्जन से निष्फल याचना करना अच्छा है।

पर,दुर्जन से सफल याचना भी उचित नहीं।’’

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कानोंकान

प्रभात खबर

पटना 9 जुलाई 21


मंगलवार, 6 जुलाई 2021

        ममता बनर्जी ने हाल में दिलाई 

       हवाला कांड की अधूरी याद

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          --सुरेंद्र किशोर--

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कई बार यह आरोप सामने आता है कि कई पत्रकार कुछ खास नेता पर तो आरोप लगा देते हैं,किंतु उसी तरह के कसूरवार दूसरे नेता को बख्श देते हैं।

यह आरोप एक हद तक सही भी है।

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वैसे कुछ पत्रकार ऐसे भी मौजूद हैं जो किसी पक्ष को नहीं बख्शते।

किंतु इस देश में हमेशा से ही ऐसे नेता नहीं मिलते जो सभी पक्षों के दोषियों के दोष को समान रूप से उजागर करें।

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पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने पिछले दिनों 

यह आरोप लगाया कि राज्यपाल जगदीप धनकड़ भ्रष्ट हैं क्योंकि उन्होंने हवाला कारोबारियों से पैसे लिए थे।

धनकड़ ने उस आरोप का खंडन किया।

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इस तरह ममता बनर्जी अपने राज्यपाल को अपमानित करने के क्रम में अपने दल के उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा को भी अनजाने में कठघरे में खड़ा कर दिया।

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ममता जी को नहीं मालूम कि हवाला कारोबारियों से पैसे स्वीकारने वाले नेताओं में सूची में यशवंत सिन्हा भी शामिल थे।उनके नाम 21 लाख 18 हजार दर्ज हंै जबकि जगदीप  धनकड़ के नाम के आगे सिर्फ सवा पांच लाख रुपए दर्ज हैं।

याद रहे कि जगदीप धनकड़ की तरह ही यशवंत सिन्हा ने भी इस आरोप को गलत बताया था।

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हवाला घोटाले की शर्मनाक कहानी

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जब देश के अति ताकतवर लाभुकों के समक्ष 

सुप्रीम कोर्ट भी हो गया था लाचार

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नब्बे के दशक में चर्चित व घृणित जैन हवाला कांड हुआ था।

जो जैन बंधु भारत विरोधी विदेशी ताकतों से पैसे लेकर 

कश्मीर के आतंकियों को पहुंचाते थे,उसी जैन बंधुओं ने 

उसी पैसों में से इस देश के 115 बड़े नेताओं और नौकरशाहों को भी भारी रकम तब दी थी।

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  लाभुकों में भारत के एक पूर्व राष्ट्रपति ,दो पूर्व प्रधान मंत्री, कई पूर्व मुख्य मंत्री व पूर्व-वत्र्तमान केंद्रीय मंत्री स्तर के अनेक नेता शामिल थे।

वह बहुदलीय घोटाला था।

  पैसे पाने वालों में खुफिया अफसर सहित  15 बड़े -बड़े अफसर भी  थे ।

 आरोप लगा था कि पैसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई.ने भिजवाए थे।

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जिस घोटाले में लगभग सभी प्रमुख दलों के बड़े नेता लिप्त हों,उन्हें सजा कैसे होगी ?

नहीं हुई।

 जबकि इन लाभुक नेताओं में से कुछ ने इसके एवज में देशद्रोहियों की मदद भी की थी।

ऐसा विवरण ‘इंडिया टूडे’( 15 फरवरी 1996) में तब छपा भी था।

   अब बताइए कि कश्मीर के आतंकियों ने इस देश की राजनीति की नैतिकता पर कितना मारक असर डाला।

  जिन नेताओं ने पैसे लिए थे,वे तब की राजनीति के हू इज हू थे।

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हवाला कांड के किसी आरोपित का कुछ नहीं बिगड़ा। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जे.एस.वर्मा ने दुखी मन से तब कहा था कि ‘‘सी.बी.आई.ने इस कांड की ठीक से जांच ही नहीं की।’’

उन्होंने यह सनसनीखेज बात कोर्ट में ही कह दी थी कि  मुझ पर इस केस को रफा दफा करने का दबाव डाला जा रहा है।

  हां, इस कांड में नाम आने पर जिन कुछ नेताओं ने अपने पद से इस्तीफा दिया था ,उनमें यशवंत सिन्हा भी थे।

तब वे बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे।

आडवाणी खेमा उन्हें मुख्य मंत्री बनाना चाहता था।

दबंग मुख्य मंत्री लालू प्रसाद के समक्ष सदन की चर्चा

व हंगामा में यशवंत सिन्हा लालू प्रसाद से दबते नहीं थे।

यानी, उनकी भूमिका प्रभावकारी थी। 

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इस हवाला कांड का भंडाफोड़ करने वाले मशहूर पत्रकार विनीत नारायण ने हवाला रिश्वत कांड पर जो पुस्तक लिखी है,उसका नाम है-

‘‘हवाला के देशद्रोही’’

उस पुस्तक से कुछ पंक्तियों यहां उधृत हैं--

‘‘असल में तो यह आतंकवाद का मामला है जिसे हवाला कांड कह कर हल्का करने की साजिश की गई।

  मामला बहुत ही गंभीर है।

क्योंकि देश के 115 सबसे ताकतवर लोगों को दुबई और लंदन के जिस गैर कानूनी हवाला स्रोतों से पैसे मिलने का आरोप है,वही स्रोत कश्मीर के आतंकवादियों को भी पैसे देता था।

  फिर भी इस मामले में आज तक ठीक से जांच नहीं हुई।आतंकवादियों को पैसे देने वाले स्रोत तक नहीं पहुंचा जा सका।

  नतीजतन आतंकवादी देश में फैलते जा रहे हैं।’’

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मेरा मानना है कि हवाला कांड व अपवादों को छोड़कर सांसद फंड में व्यापक कमीशनखोरी ने तब तक राजनीति में बचे-खुचे शर्म को भी खत्म कर दिया।

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--सुरेंद्र किशोर

6 जुलाई 21