सोमवार, 16 अगस्त 2021

 



विधायिकाओं में लगातार अशोभनीय दृश्यों 

से क्या सीख रहीं नई पीढियां !

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--सुरेंद्र किशोर--

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 विधायिकाओं में हंगामों व कामकाज ठप होने की समस्या इस देश में गंभीर होती जा रही है।

हाल में राज्य सभा के सभापति एम.वेंकैया नायडू को यह कहना पड़ा कि ‘‘हम दिन प्रति दिन असहाय होते जा रहे हैं।’’

उत्तर प्रदेश विधान सभा में कभी खून बहे थे तो केरल विधान सभा हुई तोड़फोड़ का मुकदमा अब भी अदालत में चल रहा है।

उस मुकदमे को हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी उचित ठहराया।

उससे पहले केरल सरकार विशेषाधिकार की आड़ में उस आपराधिक मुकदमे से आरोपी विधायकों को बचाना चाहती  थी।

आज भी संसद में क्या हो रहा है ?

बिहार विधान सभा में गत मार्च में क्या नहीं हुआ !

कुछ ही माह पहले कर्नाटका विधान परिषद के सभापति को जबरन उनके आसन से उठाकर कुछ सदस्यों ने अलग कर दिया।

ऐसी समस्या से देश के पीठासीन पदाधिकारीगण  

कैसे निपटें ?

समय-समय पर हुए पीठासीन पदाधिकारियों के सम्मेलनों के प्रस्तावों व सिफारिशों पर ध्यान दीजिए।

वे हंगामों से आजिज आ चुके मौजूदा पीठासीन पदाधिकारियों व सत्ताधारी दलों को राह दिखाते हैं।

  वे उनका अध्ययन करें।

उन्हें कड़ाई से लागू करें।

अन्यथा, इतिहास किसी को माफ नहीं करेगा।

आखिर मार्शल की बहाली होती ही क्यों है ?

कई दशक पहले राज्य सभा से समाजवादी नेता राजनारायण को बारी-बारी से कई बार मार्शल आउट किया गया था। 

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     एक वह भी समय था

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 कर्पूरी ठाकुर लंबे समय तक बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता रहे थे।

 वे कभी मार्शल से हाथापाई करते नहीं देखे गए ।

जब-जब पीठासीन पदाधिकारी सदस्यों को सदन से बाहर करने का मार्शल को निदेश देते थे, दिवंगत ठाकुर तथा अन्य अधिकतर प्रतिपक्षी विधायकगण खुद को मार्शल के हवाले कर देते थे।

   मार्शल उन्हें टांग कर सदन से बाहर कर देते थे।सदस्य भी हंसते हुए बाहर हो जाते थे।

किंतु आज ?

कई बार तो अत्यंत शर्मनाक स्थिति पैदा हो जाने पर भी आम तौर पर पीठासीन पदाधिकारी मार्शल का उपयोग नहीं करते।

यदि करते भी हैं तो कई माननीय सदस्य मार्शल के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करने लगते हैं।

यह सब देख -सुनकर इस देश की नई पीढ़ी के दिल ओ दिमाग पर हमारे लोकतंत्र की कैसी छाप पड़ती है ?

क्या ऐसी स्थिति में आज के स्कूली बच्चे खुद में जन प्रतिनिधियों व जनतंत्र के प्रति सम्मान का भाव पैदा करते हुए बड़े होते हैं ?

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सम्मान की रक्षा के लिए 

कठोर कार्रवाई जरूरी   

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 यदि लोकतंत्र व जन प्रतिनिधियों के प्रति आम लोगों में सम्मान कायम रखना हो या बढा़ना हो तो इस देश की विधायिकाओं में जारी अराजकता को समाप्त करना ही होगा।

  यदि सही ढंग से देश-प्रदेश चलाने की जिम्मेदारी सरकारों की है तो सदन की गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी उसकी भी है।वैसे किसी भी सदन के ‘‘किंग आॅफ द किंग्स’’ पीठासीन पदाधिकारी ही होते हैं।

किंतु शासक दल के सक्रिय सहयोग के बिना वे सदन में अनुशासन कायम नहीं कर सकते।

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    डा.लोहिया और गैर कांग्रेसी सरकार

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सन 1967 में डा.राम मनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसी सरकारों को एक महत्वपूर्ण सलाह दी थी।

उन्होंने कहा था कि छह महीने के भीतर कुछ ऐसे -ऐसे काम करके दिखा दो कि लोगों को कांग्रेस की पिछली सरकार और तुम्हारी इस सरकार में फर्क साफ-साफ दिखाई पड़ने लगे।

  बिहार की नीतीश सरकार विपरीत परिस्थितियों में भी जनहित के ऐसे -ऐसे काम करती जा रही है जिनसे पिछली सरकार से उसका फर्क नजर आता रहता है।

  बिहार की सत्ता से राजद के हटने के बाद लालू प्रसाद ने कहा था कि इस कठिन प्रदेश बिहार में लगातार 15 साल तक राज चला लेना कोई आसान काम नहीं है।

  परोक्ष रूप से लालू जी, नीतीश कुमार को चुनौती दे रहे थे कि दम हो तो 15 साल तक राज चलाकर दिखाओ।

  नीतीश कुमार ने दिखा भी दिया।

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काम की गति बढ़ाइए

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करीब डेढ़ साल पहले नागरिक (संशोधन)विधेयक पास हुआ।

उस पर राष्ट्रपति की मुहर भी लग गई।

फिर भी उसे अभी लागू नहीं किया जा रहा है।

आखिर क्यों ?

इसलिए कि उसकी नियमावली अब तक नहीं बनी।

हाल में सरकार ने संसद को बताया कि अगले साल  जनवरी तक वह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।

  उधर रोहिणी आयोग का भी लगभग यही हाल है।

सन 2017 में रोहिणी न्यायिक आयोग बना था।

  आयोग को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वह छह माह में अपनी रपट दे ।आयोग को यह पता लगाना था कि आरक्षण का लाभ सभी जातीय समूहों को समरूप ढंग से मिल रहा है या नहीं।

आयोग के कार्यकाल का इस बीच कई बार विस्तार किया गया।

जानकार सूत्रों के अनुसार आयोग महत्वपूर्ण व मूल काम कर भी चुका है।

किंतु उसे फाइनल रपट तैयार करने में समय लग रहा है।     ..................

और अंत में

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पचास के दशक में इस देश के राष्ट्रपति का वेतन दस हजार रुपए मासिक था।

मुद्रा स्फीति को ध्यान में रखा जाए तो आज उनका वेतन उस हिसाब से करीब साढ़े आठ लाख रुपए होना चाहिए था।

किंतु राष्ट्रपति 

को आज हर माह वेतन मद में सिर्फ 5 लाख रुपए ही मिलते हैं।

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साप्ताहिक काॅलम ‘कानोंकान’

आज के ‘प्रभात खबर’ के बिहार संस्करणों में प्रकाशित 

  


    अभी से तय होने लगे हैं 2024 के 

  लोक सभा चुनाव के मुद्दे और नारे

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जिन्ना के ‘डायरेक्ट ऐक्शन डे’ के दिन ममता का ‘खेला होबे दिवस’ बनाम नरेंद्र मोदी का ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’

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--सुरेंद्र किशोर--

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    लगता है कि पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी का सन 2024 के लोस चुनाव के लिए भी चुनावी युद्ध घोष होगा-- 

‘खेला होबे।’

पर इसमें कुछ अलग ढंग का भावनात्मक तत्व भी होगा।

यह संयोग नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस ‘खेला होबे’ दिवस

16 अगस्त को मनाने जा रही है।

‘खेला होबे’ दिवस बंगाल तथा कुछ अन्य राज्यों में भी मनाया जाएगा।

देश के विभाजन को सुनिश्चित करने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को ‘सीधी कार्रवाई दिवस’ मनाया था।

उसके कारण बंगाल में चार दिवसीय हिंसा में 10 हजार लोग मारे गए थे। 

15 हजार लोग घायल हुए थे।

उस नर संहार ने देश के बंटवारे के लिए नेताओं को बाध्य कर दिया था।

दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी ने हर साल 14 अगस्त को ‘‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’’ मनाने का निर्णय किया है।

    याद रहे कि 14 अगस्त, 1947 को भारत से काटकर अलग पाकिस्तान की स्थापना हुई थी।

  बंटवारा जनित हिंसा में 10 लाख लोग मरे और डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए थे।

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विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने वाले 

यह जान चुके हैं कि कुछ लोग एक और विभाजन की पृष्ठभूमि इस देश में तैयार कर रहे हैं।

वे अंततः सफल होंगे या नहीं,यह और बात है।

वैसे विभाजनकारी लोगों को कई वोटलोलुप नेता व दल भी साथ दे रहे हंै।

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खैर जो हो !

जो होगा,देखा जाएगा।

किंतु अगले लोक सभा चुनाव का चुनावी युद्ध घोष अभी से तय होता जा रहा है।

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तृणमूल कांग्रेस का तर्क है कि 16 अगस्त 1980 को कलकत्ता में ईस्ट बंगाल फुटबाॅल क्लब और मोहन बगान एथलेटिक क्लब के समर्थकों के बीच बड़ी हिंसा हुई थी।

एक दर्जन से अधिक दर्शक मारे गए थे।

उस अवसर को याद करने के लिए 16 अगस्त को ‘खेला होब’े 

दिवस मनाया जा रहा है।

पर,तृणमूल के इस तर्क पर कौन विश्वास करेगा।

फुटबाॅल के इतिहास में किसी बड़ी उपलब्धि वाले दिवस को खेला होबे दिवस के रूप में मनाया जा सकता था।

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संकेत हैं कि ऊपर लिखे दोनों मुद्दों पर देश के लोग दो धु्रव पर रहेंगे।

 प्रेक्षकों के अनुसार सन 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव और अगले लोक सभा चुनाव में भी ऐसा ही होगा।

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15 अगस्त 21

   

 



  क्या कानून तोड़ना भारत में  

 सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है ?

राहुल गांधी की ताजा टिप्पणी 

का आशय तो यही है !

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--सुरेंद्र किशोर--

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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि ट्विटर भारत की राजनीतिक प्रक्रिया में दखल दे रहा है।

    कांग्रेस व राहुल गांधी के अनुसार भारत की राजनीतिक प्रक्रिया क्या है ?

क्या यही है कि कानून तोड़कों के खिलाफ कोई कार्रवाई न हो ?

 राहुल गांधी ट्विटर व मोदी सरकार 

पर नाराज क्यों हैं ?

  एक शिकायत के बाद राहुल गांधी व उनके कुछ पार्टी जन के ट्विटर अकाउंट बंद कर दिए हैं।

  शिकायत क्या है  ?

शिकायत यह है  कि राहुल ने दिल्ली में कथित दुष्कर्म की पीड़िता नौ साल की बच्ची के माता-पिता की तस्वीर पोस्ट की।

 उनके अनेक पार्टीजन ने भी उसे शेयर किया।

जबकि वैसा पोस्ट करना पाॅक्सो और आई.पी.सी.की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध है।

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    जब राहुल गांधी ने यह आरोप लगाया है कि ट्विटर  मोदी सरकार के इशारे पर उनका अकाउंट बंद कर भारत की राजनीतिक प्रक्रिया में दखल दे रहा है तो उसका क्या अर्थ लगाया जाए ?

यानी राहुल के अनुसार उनकी ‘राजनीतिक प्रक्रिया’ में कानून तोड़ना और उसके लिए किसी तरह सजा अस्वीकारना शामिल है।

हां,राहुल का यह आरोप विचारणीय है कि ट्विटर ऐसे अपराध के लिए भाजपा नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता।

यदि यह आरोप सही है तो कांग्रेस व राहुल गांधी को उन भाजपा नेताओं के खिलाफ अदालत की शरण लेनी चाहिए।

कांग्रेस के पास एक से एक दिग्गज वकील मौजूद हैं।

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14 अगस्त 21


 जेपी नड्डा अपने छात्र जीवन में पटना में थे।

वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में थे।

वे परिषद की गतिविधियों से संबंधित प्रेस विज्ञप्तियां 

भी पटना के अखबारों के दफ्तरों में पहुंचाते थे।

मैं तब दैनिक ‘आज’ में मुख्य संवाददाता का काम देखता है।

इसलिए मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं।

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उधर नरेंद्र मोदी कभी नई दिल्ली में अपनी पार्टी के प्रेस कंाफ्रेंस में आने वाले संवाददाताओं के लिए कुर्सियां भी सजा देते थे।

दोनों आज शीर्ष पदों पर हैं।

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इस देश में अब ऐसे कितने राजनीतिक दल हैं जिनके सरजमीनी कार्यकत्र्ता आज शीर्ष पदों पर पहुंचने की उम्मीद रखते हैं ?

वैसे कई दलों में तो एमपी-विधायक फंड के ठेकेदार ही कार्यकत्र्ता की भूमिका में हैं।

वैसे जन प्रतिनिधियों  के लिए यह अनुकूल स्थिति है जो अपने परिजन को ही अपनी जगह टिकट दिलवाना चाहते हैं और दिलवाते भी हैं।

यदि उनके क्षेत्र में कोई अच्छी मंशा वाला कार्यकत्र्ता उभरेगा तो वह टिकट का दावेदार भी बन सकता है।

 ऐसी स्थिति क्यों आने दिया जाए !!!

 इसलिए अंगुली पर गिने जाने लायक जन प्रतिनिधि ही सांसद -विधायक फंड की समाप्ति के पक्ष में हैं।

जबकि, नरेंद्र मोदी सांसद फंड बंद करने के पक्ष में हैं।

पर नहीं कर पा रहे हैं।

नीतीश कुमार ने तो कुछ साल पहले विधायक फंड बंद भी कर दिया था।

पर फिर उन्हें शुरू करना पड़ा।

इन फंडों की अपार महिमा तो देखिए !

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--सुरेंद्र किशोर

9 अगस्त 21


 स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर

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आज भी याद आते हैं ‘फिरंगिया’ 

के लेखक प्रिंसिपल मनोरंजन बाबू

मैंने जब छपरा के राजेंद्र काॅलेज में सन 1964 में 

बी.एससी.-पार्ट-वन में अपना नाम 

लिखवाया,उससे करीब तीन या चार साल पहले ही मनोरंजन बाबू उस काॅलेज के प्राचार्य पद से रिटायर हो चुके थे।

  पर, बाद में भी  कालेज में अक्सर उनका नाम बहुत आदर से लिया जाता था।

 कोई उनके एक गुण की चर्चा करता तो कोई उनकी  दूसरी  उपलब्धियों की।

उनकी मशहूर रचना ‘फिरंगिया’ तो अनेक लोगों की जुबान पर थीं।

  वे मूलतः अंग्रेजी के शिक्षक थे,पर वे भोजपुरी बहुत सहजता से बोलते-लिखते  थे ।

‘फिरंगिया’ भोज पुरी में ही है।

 एक बार कालेज परिसर में  कुछ छात्र किसी बात पर शोर कर रहे थे।

मनोरंजन बाबू उनके पास गए।

 उन्होंने छात्रों से भी कविता में बात कर  ली।

‘ हड़बड़ कइले, गड़गड़ होई,

बढ़-चढ़ बात करे ना कोई !’

इस पर वे हंसते हुए अपने -अपने क्लास में चले गए।

दरअसल उनकी नैतिक धाक का कमाल था।

 मनोरंजन बाबू ने इलाहाबाद विश्व विद्यालय में  एम.ए.अंग्रेजी में टाॅप किया था। 

मदन मोहन मालवीय उन्हें बी.एच.यू. में ले गए।

 वहां कुछ दिनों तक उन्होंने अंग्रेजी पढ़ाई।

 बाद में राजेंद्र कालेज में प्राचार्य होकर आ गए।

असहयोग आंदोलन के समय मनोरंजन बाबू ने ‘फिरंगिया’ नाम से  देशभक्ति का गीत लिखा।

बाद में वह गीत स्वतंत्रता सेनानियों की जुबान पर था।

 एक शिक्षक,एक प्रशासक व एक साहित्यकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया था।

हालांकि उनके प्रशंसकों को यह अफसोस रहा कि उन्होंने अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने के कारण अधिक लेखन नहीं किया।

जबकि उनमें लेखन प्रतिभा अद्भुत थी।

हालांकि उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखी थीं।

1942 में वे बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के मोतिहारी अधिवेशन के अध्यक्ष हुए थे। 

 वैसे राजेंद्र काॅलेज को एक बेहतर काॅलेज बनाने में उनका योगदान अतुलनीय रहा।

उन दिनों भी बिहार में ऐसे कम ही काॅलेज थे जहां आर्ट,साइंस और काॅमर्स तीनों की पढ़ाई होती थी।

राजेंद्र कालेज में भी ऐसा था।

राजेंद्र काॅलेज के विस्तृत परिसर और बड़े -बड़े क्लास रूम और समृद्ध प्रयोगशालाओं को तो मैंने एक छात्र के रूप में खुद भी देखा और उपयोग किया था। 

 मुझे भी इस बात का अफसोस रहा कि मैं उन्हें वहां काम करते नहीं देख सका था।

पर उनके नाम की सुगंध तब भी मौजूद थी।

फिलहाल देश प्रेम जगाने वाली उनकी ऐतिहासिक रचना ‘फिरंगिया’ यहां प्रस्तुत है।

संभव है कि मुझसे उसकी एक- दो पंक्तियां छूट गयी हों।--

--सुरेंद्र किशोर 

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      --फिरंगिया--

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 संुदर सुघर भूमि भारत के रहे रामा,

आज उहे भइल मलीन रे फिरंगिया।

अन्न-धन-जन -बल बुद्धि सब नास भइल,

कवनो  के ना रहल निसान रे फिरंगिया।

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जहवां थोड़े ही दिन पहिले होत रहे,

लाखों मन गल्ला और धान रे फिरंगिया।

उंहवे पर आज रामा मथवा पर हाथ धके,

बिलखी के रोवे ला, किसान रे फिरंगिया।

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घिउवा आ दूधवा के नदिया बहत जहां,

उहवां बहेला रक्तधार रे फिरंगिया।

जहवां के लोग सब खात ना अघात रहे,

रुपया से रहे मालामाल रे फिरंगिया।


उहें आज जेने जेने अखियां घुमा के देखीं,

तेने तेने देखबे कंगाल रे फिरंगिया।

हमनी के पसु से रे हालत खराब कइले,

पेटवा के बल रेंगवउले रे फिरंगिया।

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एको जो रोऊवा निरदोसिया के कलपी ते,

तोर नास होई जाई सुन रे फिरंगिया।

दुखिया के आह तोर देहिया के भसम कै देई,

जरि भुनि होई जइबे रे फिरंगिया।

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स्वाधीनता हमनी के नामो के रहल नाहीं,

अइसन कानून के बा जाल रे फिरंगिया।

प्रेस एैक्ट ,आम्र्स ऐक्ट,इंडिया डिफंेस एैक्ट,

सब मिली कइलस ई हाल रे फिरंगिया।

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भारत के छाती पर भारत के बचपन के,

बहल रक्तवा के धार रे फिरंगिया।

घरे लोग भूख मरे गेहुंआ विदेस जाए,

कइसन बा विधि के विधान रे फिरंगिया।

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मरदानापन अब तनिको रहल नाहीं,

ठकुरसुहाती बोले रे फिरंगिया।

रात दिन करेले खुसामद सहेबवा के,

सहेले विदेसिया के लात रे फिरंगिया।

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चेति जाउ,चेति जाउ भैया रे फिरंगिया तें,

छोड़ दे अधरम के पंथ रे फिरंगिया।

छोड़ के कुनीतियां सुनीतिया के बांह गहु,

भला तोर करी भगवान रे फिरंगिया।

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14 अगस्त 21

 


 अफगानी सेना में फैले भ्रष्टाचार ने 

तालिबानियों की जीत आसान कर दी

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काश ! अफगानी सेना व वहां के पिछले शासक 

ने सन 1962 के भारत से सबक सीखा होता !

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--सुरेंद्र किशोर--

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  सन 1962 का चीनी हमला और हमारी सैनिक तैयारी 

का हाल तब के एक युद्ध संवाददाता के शब्दों में पढ़िए-

 देश के प्रमुख पत्रकार मनमोहन शर्मा के अनुसार,

‘‘एक युद्ध संवाददाता के रूप में मैंने चीन के हमले को कवर किया था।

  मुझे याद है कि हम युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे।

 हमारी सेना के पास अस्त्र,शस्त्र की बात छोड़िये,कपड़े तक नहीं थे।

 नेहरू जी ने कभी सोचा ही नहीं था कि 

चीन  हम पर हमला करेगा।

एक दुखद घटना का उल्लेख करूंगा।

अंबाला से 200 सैनिकों को एयर लिफ्ट किया गया था।

उन्होंने सूती कमीजें और निकरें पहन रखी थीं।

उन्हें बोमडीला में एयर ड्राप कर दिया गया

जहां का तापमान माइनस 40 डिग्री था।

वहां पर उन्हें गिराए जाते ही ठंड से सभी बेमौत मर गए।’’

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1962 युद्ध से पहले सेना ने जरूरी सामान खरीद के लिए भारत सरकार से एक करोड़ रुपए मांगे थे।

नेहरू सरकार ने नहीं दिए।

दूसरी ओर,जीप घोटाला,धर्मतेजा शिपिंग घोटाला व न जाने और कैसे -कैसे घपले-घोटाले हो रहे थे !

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दूसरी ओर, तब भी सरकारी पैसे किस तरह भ्रष्टाचार के जरिए लूटे जा रहे थे,उसका हाल 1963 में खुद कांग्रेस अध्यक्ष डी.संजीवैया ने इंदौर के एक भाषण ने इन शब्दों में बताया था,

‘‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।’’

गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने  यह भी कहा था कि ‘‘झोपड़ियों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’’

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चीन-भारत युद्ध का नतीजा क्या हुुआ था,यह दुनिया जानती है।

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मोदी राज में स्थिति थोड़ी बदली है।

आज हमारी सरकार में भ्रष्टाचार अपेक्षाकृत कम है।

हालांकि देश को बचाने के लिए उसे और कम होना चाहिए।

सैनिक तैयारी की दृष्टि से भी इस देश की स्थिति आज बेहतर है।

फिर भी इन दोनों मामलों में हमारी सरकार को अभी बहुत कुछ करना चाहिए ।

तभी हम बाहरी व भीतरी दुश्मनों का मुकाबला सफलतापूर्वक कर पाएंगे।

  बाहरी से अधिक भीतरी दुश्मन अधिक खतरनाक इरादे वाला है।

उसके इरादों को जानने-समझने-मानने के लिए इस देश के अधिकतर ‘बुद्धिजीवी’ तथा नेतागण तैयार ही नहीं हैं।

ऐसा कुछ गैर जानकारी तो कुछ स्वार्थवश है।

यह स्थिति और भी खतरनाक है।

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16 अगस्त 21  



 


   टुकड़ों में संभव नहीं राजनीति के अपराधीकरण का इलाज

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       --सुरेंद्र किशोर--

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  सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही कहा है कि ‘‘इस देश की राजनीतिक प्रणाली में दिन प्रति दिन अपराधीकरण बढ़ रहा है।

राजनीति को स्वच्छ करने के लिए विधायिका को चिंतित होना चाहिए।’’

  पर, सवाल है कि क्या सिर्फ विधायिका के बूते की यह बात है ?

दरअसल इस समस्या के हल के काम में विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका को साथ- साथ लगना होगा।

अब तक अपराधीकरण के खिलाफ कुछ ठोस कदम न्यायपालिका व चुनाव आयोग ने ही उठाए हैं।

आगे भी निर्णायक भूमिका उन्हीं की होगी।

विधायिका से अधिक उम्मीद मत कीजिए।

 सन 2002 में यदि सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख नहीं अपनाया होता तो उम्मीदवारों के आपराधिक रिकाॅर्ड और संपत्ति का विवरण भी लोग आज नहीं जान पाते।

  लेकिन यह तो इस समस्या को टुकड़ों में देखना हुआ।

राजनीति में अपराधीकरण की समस्या क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की विफलता से जुड़ी हुई है।

इसकी और अधिक पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट को कोई कदम उठाना चाहिए।

 जब पुलिस व प्रशासन किसी पीड़ित की मदद नहीं करते तो वह किसी स्थानीय बाहुबली के पास जाता है।

उसे यदि वहां से मदद मिल जाती है तो वह बाहुबली धीरे -धीरे अपने इलाके में लोकप्रिय होने लगता है।

उनमें से कुछ बाहुबली चुनाव भी लड़ते हैं और जीत भी जाते हैं।हर बाहुबली सिर्फ जोर-जबर्दस्ती से ही नहीं जीतता।

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   आपराधिक न्याय व्यवस्था को बेहतर 

   बनाने की जरूरत 

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   अदालती सजाओं का प्रतिशत बढ़ने से बाहुबलियों का समाज और राजनीति पर से असर कम होगा।

अभी आई.पी.सी.के तहत दर्ज मुकदमों में सजाओं की दर इस देश में करीब 50 प्रतिशत है।

यानी जितने भ्रष्ट व अपराधी आरोपित होते हैं,उनमें से आधे लोग अदालतों से सबूत के अभाव में छूट जाते हैं।या फिर गवाह बदल जाते हैं।

  पुलिस इनमें से कई मामलों में आरोपियों का पुलिस थानों में टार्चर करके ही अन्य आरोपी व सबूत तक पहुंच पाती है।

किंतु सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ऐसे टार्चर के खिलाफ अपनी सख्त राय प्रकट की है।

  अदालत ने ठीक कहा है।टार्चर अमानवीय भी है।

  किंतु किसी केस के अनुसंधान में एक अन्य तरीके से भी मदद मिल सकती है।

  वह है नार्को टेस्ट,डी एन ए टेस्ट,पालीग्राफिक टेस्ट और   ब्रेन मैपिंग ।   

सी.बी.आई.ने करीब 13 हजार करोड़ रुपए के घोटाले के आरोपी बैंक अफसर के नार्को टेस्ट के लिए  

कोर्ट से अनुमति मांगी।

कोर्ट ने नहीं दी।

 सन 1999 में पटना में गौतम और शिल्पी जैन की हत्या कर दी गई।

हत्या से पहले शिल्पी के साथ बलात्कार हुआ था।

आरोपी ने डी.एन.ए.टेस्ट के लिए अपने खून का नमूना देने से साफ मना कर दिया।

इस केस में किसी को सजा नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने ही यह आदेश दे रखा है कि किसी की इच्छा के खिलाफ उसका डी.एन.ए.आदि जांच नहीं हो सकती।

फिर तीसरा उपाय क्या है जिसके जरिए जांच एजेंसियां सबूतों व अन्य आरोपियों तक पहंुच सके ?

सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह जांच एजेंसियों का इस दिशा

में मार्ग दर्शन करे।साथ ही क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की बेहतरी की राह के रोड़ों को  भी अदालत हटाए। 

अन्यथा,पीड़ित लोग बाहुबलियों के पास जाते रहेंगे और अपराधीकरण बढ़ता रहेगा।


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  आचार संहिता को लागू करने

    से लौटेगी सदन की गरिमा 

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विधायिकाओं में अनुशासन और मर्यादा बनाए रखने के उपायों पर विचार करने के लिए सन 2001 में एक राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया गया था।

 लोक सभा के स्पीकर जी.एम.सी.बालयोगी ने सम्मेलन बलाया था।

 सम्मेलन में पीठासीन पदाधिकारी ,प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी,लोक सभा में प्रतिपक्ष की नेता सोनिया गांधी,मुख्य मंत्री तथा अन्य संबंधित गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए।

सबने संसद व विधान मंडलों की कार्यवाही में बढ़ती अनुशासन हीनता व घटती मर्यादा को फिर से कायम करने की जरूरत बताई।

  इसके लिए सर्वसम्मति से 29 सूत्री आचार संहिता तैयार की गई।

  उसमें अन्य बातों के अलावा यह भी तय किया गया कि यदि कोई सदस्य सदन की कार्यवाही में बाधा पहुंचाएगा या अपनी सीट छोड़कर वेल में जाएगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

उसे एक दिन या पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया जाएगा।

आश्चर्य है कि सदनों में बढ़ते हंगामों व अशोभनीय दृश्यों

के बावजूद उस आचार संहिता पर अमल नहीं किया जा रहा है।

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 आरक्षण पर कांग्रेस का

 बदला-बदला  रुख

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राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग की है।

 उन्होंने आरक्षण की अधिकत्तम सीमा यानी 50 प्रतिशत को बढ़ा देने की भी जरूरत बताई है।

जरा देखिए !

कांग्रेस कहां से चलकर कहां पहुंच गई !

 मंडल आरक्षण की रपट 1980 में ही आ गई थी।

किंतु  कांग्रेस सरकार ने उसे लागू नहीं किया।

1990 में वी.पी.सिंह सरकार ने लागू किया।

उस पर तब के प्रतिपक्ष के नेता राजीव गांधी ने संसद में ऐसा गोलमटोल भाषण किया जिससे पिछड़ों को लगा कि कांग्रेस आरक्षण के पक्ष में नहीं है।

  इसका चुनावी नुकसान कांग्रेस को हुआ।

काश ! 1980 और उसके बाद के वर्षों में कांग्रेस के नेतृत्व ने इस मामले में दूरदर्शिता दिखाई होती।

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 और अंत में

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उसी दल की सरकार देश या प्रदेश को बेहतर बना सकती है जिसे अगले चुनाव में हारना मंजूर हो।

विभिन्न हलकों में निहितस्वाथियों की ताकत देखते हुए

ही यहां यह कहा जा रहा है।

लेकिन एक बार हार जाने के बाद अगले चुनाव में लोगबाग उसी दल को फिर से सत्ता में लाएंगे जिसने पिछली बार अच्छी मंशा के साथ देश-प्रदेश को बेहतर बनाने की कोशिश की थी।

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13 अगस्त 2021 के दैनिक ‘‘प्रभात खबर,’’पटना में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम कानोंकान से

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