गुरुवार, 18 नवंबर 2021

    पश्चिम बंगाल के एक तिहाई भूभाग कुछ मामलों 

   में अब ममता बनर्जी के कंट्रोल से बाहर

  केंद्र ने किया गंभीर बीमारी का होमियोपैथी इलाज 

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      सुरेंद्र किशोर

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सीमा सुरक्षा बल कानून (यानी बी एस एफ एक्ट) में ताजा संशोधन के साथ ही अब यह फोर्स पश्चिम बंगाल के एक तिहाई भूभाग पर तलाशी और गिरफ्तारी कर सकेगा।

  इसके लिए उसे स्थानीय पुलिस या प्रशासन से अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

अंतरराष्ट्रीय सीमा पर घुसपैठ व तस्करी रोकने के लिए केंद्र सरकार ने यह कदम उठाया है।

यह कदम पश्चिम बंगाल की ‘बीमारी’ का केंद्र द्वारा किया जा रहा ‘‘होमियोपैथ इलाज’’ है।

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याद रहे कि मुख्य मंत्री ममता बनर्जी कह चुकी हैं कि यदि पश्चिम बंगाल में सी ए ए और  एन आर सी लागू किया गया तो खून की नदियां बह जाएंगी।

ममता के भतीजे के खिलाफ कोयला तस्करी के आरोप में केंद्रीय एजेंसी इन दिनों जांच कर रही है।

  यानी, ममता बनर्जी नहीं चाहती हैं कि बड़ी संख्या में अवैध ढंग से रह रहे बांग्ला देशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से बाहर किया जाए।

कैसे चाहेंगी ?

वह तो उनके वोट बैंक का मुख्य आधार जो है !

ममता ने 2005 में इन्हीं घुसपैठियों के खिलाफ लोक सभा में आवाज उठाई थी। 

 जब उन्हें इस मुद्दे पर बोलने का मौका नहीं मिला तो ममता ने लोक सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

तब मतदाता बने घुसपैठिए वाम मोर्चा को वोट दे रहे थे।

 अब वे ममता के दल को वोट दे रहे है।

वोट के सामने राष्ट्र रक्षा की परवाह इस देश के अनेक नेताओं कत्तई नहीं रहती।

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18 नवंबर 21 


   शराब बंदी के बाद बिहार में 

  एक करोड़ लोगों ने शराब छोड़ी

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  क्या शराबबंदी के बाद ड्रग्स की 

  खपत राज्य में बढ़ गई ? !!

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 यदि यह सच है कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो

 को बिहार में भी सक्रिय किया जाना चाहिए

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   --सुरेंद्र किशोर-

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सन 2016 के पूर्वार्ध में बिहार में नीतीश सरकार ने शराबबंदी लागू कर दी।

तब से आज तक के अधिकृत आंकड़ों के अनुसार बिहार में एक करोड़ लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया है।

 स्वाभाविक है कि उनके परिवार पर इसका सकारात्मक असर पड़ा होगा।

खबर है कि पडा़ भी है।कुछ अन्य सकारात्मक असर भी पड़े हैं।

  यदि शराबबंदी से समाज को फायदा हो रहा है और आगे और फायदा होने की उम्मीद है तो शराबबंदी को समाप्त क्यों कर दिया जाए ? 

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अन्य लोगों की बातें और लोग करें, किंतु मैंने खुद पिछले कुछ दशकों में पत्रकारिता क्षेत्र के कई प्रतिभाशाली पत्रकारों को शराब-सिगरेट-गुटका-जर्दा पान का अति पान करके समय से पहले काल के गाल में समाते देखा है।

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महात्मा गांधी आबकारी राजस्व को पाप की आमदनी मानते थे।

उनके निदेश पर सन 1921 में लोगों ने शराब,गांजा आदि की दुकानों पर धरना दिया था।

नशा के विरोध में कांग्रेसी जेल भी गए थे।

उससे ब्रिटिश सरकार की आय आंदोलन के दौरान कम हो गई थी।

पर, गांधी जी को आजादी के बाद इस बात का अफसोस था कि वही कांग्रेसी नेता सत्ता में आने के बाद अब शराबबंदी को जरूरी नहीं मानते।

  यहां तक कि बिहार के आबकारी मंत्री जगलाल चैधरी ने,जो स्वतंत्रता सेनानी थे, जब राज्य में नशाबंदी लागू की तो उन पर कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इतना नाराज हुआ कि उन्हें बाद में कभी मंत्री तक नहीं बनने दिया था।

जबकि जगलाल चैधरी इतने बड़े नेता थे कि सन 1937 के बिहार मंत्रिमंडल के सिर्फ चार कैबिनेट मंत्रियों में एक थे।

अन्य थे--प्रधान मंत्री--डा.श्रीकृष्ण सिंह,डा.अनुग्रह नारायण सिंह और डा.सैयद महमूद।

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खबर है कि शराबबंदी के बाद बिहार में ड्रग्स की खपत बढ़ी है।

यदि यह खबर सही है तो नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को बिहार में भी सक्रिय किया जाना चाहिए।

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17 नवंबर 21

   


सोमवार, 15 नवंबर 2021

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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पार्कांे के बिना सड़कों पर टहल कर दुर्घटनाग्रस्त होते रहेंगे लोग

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एक बार फिर सुबह में टहलने वालों की जानें र्गइं हैं।

भोजपुर जिले के पीरो थाना क्षेत्र में हाल में यह घटना हुई।

स्कोर्पियो से कुचल कर चार महिलाओं की मौत हो गई।

आए दिन ऐसी खबरें जहां- तहां से आती रहती हैं।

टहलने की जगह के अभाव में लोगबाग सड़कों पर टहलने को विवश हैं।

बिहार के अधिकतर छोटे-बड़े शहरों का भी यही हाल है।

 बिहार सरकार ने मुहल्ले बसाना छोड़ दिया है।

व्यवस्थित ढंग से मुहल्ले बसते तो उनमें पार्क आदि का प्रावधान रहता।

निजी क्षेत्र के अधिकतर बिल्डर्स और डेवलपर्स पार्कों के लिए स्थान छोड़ने का वादा तो करते हैं ,पर अपवादों को छोड़कर बाद में वे उसे भी बेच देते हैं।  

  अब सवाल है कि सुबह-शाम में सैर करने वालों की जान कैसे बचे ?

फिलहाल एक उपाय ध्यान में आता है।

 जहां भी जमीन उपलब्ध हो सके,वहां राज्य सरकार पार्क बनवाए।

कुछ जगह तो इस काम के लिए सरकारी जमीन भी मिल जा सकती है।

 एक ऐसी संभावित जगह की चर्चा प्रासंगिक होगी।

प्रारंभिक योजना के अनुसार बक्सर-आरा-पटना  नेशनल हाईवे पटना एम्स तक जाने वाला था।

पर, अब उसकी जगह दानापुर-बिहटा एलिवेटेड रोड बनेगा।

यानी दानापुर-बिहटा मार्ग से निकलकर एम्स की तरफ जाने 

वाले  प्रस्तावित एन.एच.के लिए अधिग्रहीत जमीन अब बिहार सरकार को मिल जाएगी,ऐसी खबर आई है।

यदि यह खबर सही है तो बिहार सरकार उस जमीन पर क्यों न लंबा पार्क बना दे ?

पटना महानगर वहां तक फैलता जा रहा है।

वहां जो मुहल्ले बस रहे हैं,उनमें भी पार्क कहीं नजर नहीं आ रहा है।

यदि सड़क के लिए अधिग्रहीत जमीन को पार्क बना दिया जाए तो उस इलाके के लोग सड़क पर टहलते हुए जान नहीं गंवाएंगे !

हां, एक खास उद्देश्य से अधिग्रहीत जमीन का इस्तेमाल दूसरे काम के लिए किया जा सकता है ?

यह एक कानूनी सवाल है।

यदि इसमें कानूनी बाधा हो तो उसे दूर करने की कोशिश भी राज्य सरकार कर सकती है। 

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प्रयोजन बताए बिना 

बिना विदेशी फंड नहीं

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सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही कहा है कि विदेशी दानकत्र्ता की तरफ से प्रयोजन बताए जाने के बाद यहां के एन.जी.ओ.  विदेश से फंड लेने के हकदार होंगे।

   जिस उद्देश्य से गैर सरकारी संगठन यानी एन.जी.ओ.का गठन हुआ है ,उस उद्देश्य की पूत्र्ति के लिए ही बाहर से पैसे मंगाए जा सकते हैं।

  आम तौर पर सामामजिक,सांस्कृतिक और धार्मिक उद्देश्यों के लिए विदेशी फंड भी इस्तेमाल होते हैं। 

लेकिन हाल के दिनों में भारत सरकार के खुफिया संगठन ने यह जानकारी दी कि विदेशी फंड का दुरुपयाग हो रहा है।

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मधु दंडवते जिनकी 

आज पुण्य तिथि है

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सन 1977 में जब उन्हें मंत्री बनाए जाने की खबर लेकर अफसर बिट्ठल भाई पटेल भवन पहुंचे तो उस समय मधु दंडवते बाथरूम में अपने कपड़े धो रहे थे।

  वे अपने कपड़े खुद ही धोते थे।

  उससे पहले तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने मधु लिमये से कहा था कि मैं मधु दंडवते,जार्ज फर्नांडिस और तुम में से किन्हीं दो को मंत्रिमंडल में लेना चाहता हूं।

  लिमये ने उनसे  कहा कि आप मधु दंडवते और जार्ज को मंत्री बना दीजिए।

इस तरह दंडवते रेल मंत्री बने।

  उन्होंने मंत्री बनते ही यह घोषणा की कि ‘‘मैं नहीं चाहता कि मंत्री, राजा -महाराजा की तरह चलें।

यह सामंती प्रथा खत्म होनी चाहिए।’’

    उन्होंने रेलवे में पहले से जारी विशेष कोटा को समाप्त कर दिया।

साथ ही, उन्होंने जनरल मैनेजरों को एक परिपत्र भेजा।

उसमें मंत्री ने लिखा  था कि अगर कोई अपने को मेरा मित्र या रिश्तेदार बताकर विशेष सुविधा चाहे तो उसे

 ठुकरा दिया जाए।

मधु दंडवते कहते थे कि कई बार जो गलत काम होते हैं, भ्रष्टाचार हो या अपने रिश्तेदारों के प्रति पक्षपात हो,वे ऊपर से शुरू होते हैं और नीचे तक जाते हैं।इसलिए जरूरी है कि ऊपर भ्रष्टाचार नहीं हो।

दंडवते ने ही रेलगाड़ी के स्लिपर दर्जे में उस समय तक उपलब्ध लकड़ी के तख्त पर गद्दे लगवाए।

   स्वभाव से विनम्र और मधुरभाषी मधु दंडवते स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता थे जिनका लोगबाग सम्मान करते थे।

 1924 में महाराष्ट्र के अहमद नगर में जन्मे मधु जी का 2005 में निधन हो गया।वे महाराष्ट्र के राजा पुर से पांच बार लोक सभा के लिए चुने गये थे।

वी.सिंह मंत्रिमंडल मंे वित्त मंत्री रहे मधु दंडवते 1951 से 1971 तक  मुम्बई विश्व विदयालय में नाभकीय भौतिकी के अध्यापक थे।

जो व्यक्ति राजनीति के काजल की कोठरी से बेदाग बाहर निकल आता है,उसे आने वाली पीढ़ियां याद रखती हैं।

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और अंत में

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ड्रग्स या मदिरा पान करने वालों को किसी तरह के सरकारी सम्मान या पुरस्कार के योग्य नहीं माना जाना चाहिए।

इससे राज्य में शराबबंदी लागू करने वाली सरकार को नैतिक बल मिलेगा।

  केंद्र सरकार इस मामले में जो करे,किंतु जिन राज्य  सरकारों  ने शराब बंदी लागू की है,कम से कम वे सरकारें तो  शराब पीने वालों को पुरस्कृत न करें।

यदि किसी के बारे में यह पता चले कि मदिरा पान के कारण ही उनका निधन हुआ है तब तो उन्हें मरणोपरांत भी कोई पुरस्कार-सम्मान न मिले। 

  कांग्रेस की सदस्यता पाने के लिए भी आज यह एक जरूरी शत्र्त है कि वह व्यक्ति  मदिरा पान नहीं करता हो।जाहिर है कि स्वतंत्रता सेनानियों ने यह नियम बनाया था।

 आज की राजनीतिक पीढ़ी को उन स्वतंत्रता सेनानी की अच्छी मंशा को ध्यान में रखना चाहिए। 

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शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

 शराबी जब पार्टी का सदस्य 

नहीं बन सकता तो उसे कोई 

पुरस्कार या सम्मान क्यों ?

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--सुरेंद्र किशोर--

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ड्रग्स या मदिरा पान करने वालों को किसी तरह के सरकारी सम्मान या पुरस्कार के योग्य नहीं माना जाना चाहिए।

इससे राज्य में शराबबंदी लागू करने वाली सरकार को नैतिक बल मिलेगा।

  केंद्र सरकार इस मामले में जो करे,किंतु जिन राज्य  सरकारों ने शराब बंदी लागू की है,कम से कम वे सरकारें तो  शराब पीने वालों को पुरस्कृत न करें।

यदि किसी के बारे में यह पता चले कि मदिरा पान के कारण ही उनका निधन हुआ है तब तो उन्हें मरणोपरांत भी कोई पुरस्कार-सम्मान न मिले। 

  कांग्रेस की सदस्यता पाने के लिए  आज भी यह एक जरूरी शत्र्त है कि वह व्यक्ति मदिरा पान नहीं करता हो।

  जाहिर है कि स्वतंत्रता सेनानियों ने यह नियम बनाया था।

 आज की राजनीतिक पीढ़ी को उन स्वतंत्रता सेनानी की अच्छी मंशा को ध्यान में रखना चाहिए। 

--कानोंकान ,प्रभात खबर

पटना-12 नवंबर 21

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हाल में इकाॅनामिक्स टाइम्स में छपी एक खबर के अनुसार कांग्रेस उपर्युक्त शत्र्त से अपने भावी सदस्यों को मुक्त कर देना चाहती है।

  उसके अनुसार जमाना बदल गया है।

इसके लिए वह शायद कोई समिति भी बनाने वाली है।

कांग्रेस जो करे ,पर बाकी लोग जिनके दिल में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए सम्मान बचा है,वे तो ऊपर लिखी मेरी सलाह को सकारात्मक ढंग से लेंगे,ऐसी उम्मीद है। 

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गुरुवार, 11 नवंबर 2021

 


   कर्पूरी ठाकुर की सादगी 

   उनके स्वभाव में थी,कोई 

   दिखावा नहीं 

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     --सुरेंद्र किशोर--

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  अस्सी के दशक तक भी कर्पूरी ठाकुर के पास निजी कार नहीं थी।

जब अपने दल के एक विधायक से उन्होंने कुछ घंटों के लिए जीप मांगी तो विधायक ने नोट लिखा कि 

‘‘कर्पूरी ठाकुर दो बार मुख्य मंत्री रहे,कार क्यों नहीं खरीदते ?’’

अपने जीवन के अंतिम समय में कर्पूरी जी ने जरूर कार खरीदी थी किंतु शायद सेकेंड हैंड।

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यह कर्पूरी ठाकुर की कोई दिखावटी या बनावटी मुद्रा नहीं थी।

कार वे अपनी जायज आय से नहीं खरीद सकते थे।

हां, सेकेंड हैंड कार भी जब खरीदी होगी तो संभवतः चंदा से ही।

चंदा व घूस में तब अंतर होता था।

कुछ लोग थोड़ा ही सही,पर कर्पूरी जी को बिना किसी रिटर्न की उम्मीद के आदर वश कुछ पैसे दे देते थे।

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प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महा मंत्री की हैसियत 

 डा.राम मनोहर लोहिया ने समाजवादी विधायकांे के नाम 12 जून 1954 को पत्र लिखा था।

   डा.लोहिया ने अपने दल के विधायकों से कहा था कि समाजवादी विधायकों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि वे अपना सामान्य जीवन स्तर नहीं बढ़ाएं और पार्टी सदस्यों को भी चाहिए कि अपनी जिम्मेदारी कारगर ढंग से निभाने के लिए विधायकों को  मिलने वाली जरूरी उपयुक्त सुविधाओं के लिए वे शिकायत न 

करें।

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1954 में कर्पूरी ठाकुर उसी दल के विधायक थे।

वैसे भी विधायकों को वेतन ही कितना मिलता था ?

1972 में आते हैं।

तब बिहार के विधायकांे का वेतन 300 रुपए मासिक था।

कमेटी की बैठक के दिन के लिए 15 रुपए भत्ता।

  इतने में कितना जीवन स्तर उठेगा ?

कर्पूरी जी की पारिवारिक जिम्मेदारी भी थी।

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यदि 1977 में मुख्य मंत्री बन गए तो क्या उन्हें अचानक अपना जीवन स्तर बढ़ा लेना चाहिए था ?

दरअसल सादगी उनके स्वभाव में थी।

उससे  गरीबों के साथ खुद को जोड़ लेने में सुविधा भी थी।गरीब उनमें अपना आदमी देखते थे।

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खुद लोहिया ने सांसद बनने के बाद भी अपने लिए निजी कार नहीं खरीदी।कहिए कि वे खरीद नहीं सके।उनकी आय उतनी नहीं थी।

क्या वह लोहिया का दिखावा था ?

नहीं।

कार मेंटेन लायक उनकी आय नहीं थी सांसद होने के बावजूद। 

हालांकि उन्हीें दिनों करीब 60 सांसद एक व्यापारिक घराने के ‘पे रोल’ 

पर थे।

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10 नवंबर 21


 आज के दैनिक अखबार ‘नया इंडिया’ में प्रकाशित

हरिशंकर व्यास के ‘‘पंडित’ का जिन्दगीनामा’’

काॅलम से

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  ‘‘.........प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के स्टाफ सेलेक्सन का 

काम मुझ पर छोड़ा।

.......मेरी राजेंद्र माथुर से होड़ हुई।

राजेंद्र माथुर भी नवभारत टाइम्स में भर्ती के लिए अच्छे पत्रकारों को तलाश रहे थे।

  मैं पटना के सुरेंद्र किशोर को नई दुनिया (इन्दौर )

में लिखते रहने के कारण जानता था।

  मैंने ‘जनसत्ता’ के लिए उससे संपर्क किया

तो मालूम पड़ा कि राजेंद्र माथुर उसे पटना संवाददाता बनाना चाह रहे हैं।

  मैंने उसे जनसत्ता का मतलब समझाया,पटाया और जनसत्ता ज्वाइन कराया।

  ध्यान रहे कि सुरेंद्र किशोर घोर समाजवादी ,जार्ज फर्नांडिस के बड़ौदा डायनामाइट के साथी थे।

  लेकिन नईदुनिया में सुरेंद्र किशोर की पटना रिपोर्ट देख मैं उससे प्रभावित था तो मैंने जनसत्ता में लेने की ठानी।.........।’’

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9 नवंबर 21

 

  


बुधवार, 10 नवंबर 2021

   बेटी मांगने की परंपरा

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बचपन से ही मैं यह छठ गीत सुनता रहा हूं।

‘‘रुनकी झुनकी बेटी मांगी ला,

पढ़ल पंडित दामाद।’’

यानी, स्त्रियां गाती हैं--

रौनकदार, हंसने -बोलने वाली बेटी और पढ़ा -लिखा दामाद मांग रही हूं।

  बेटी मांगने की यह परंपरा लगता है कि सिर्फ बिहार में ही है।

या, कहीं और भी है ?

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सुरेंद्र किशोर

10 नवंबर 21