मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

 आजाद भारत के अजब नेताओं 

की गजब कहानी

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सुरेंद्र किशोर

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मात्र 12 हजार रुपए का प्रबंध न हो पाने के कारण 

डा.लोहिया इलाज के लिए जर्मनी न जा सके और 

गुजर गए

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किंतु सोनिया गांधी के न्यूयार्क में इलाज के लिए 

एक बैंक के प्रमुख से 2 करोड़ रुपए वसूल लिए गए

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डा.राममनोहर लोहिया सन 1967 में प्रोस्टेट के आॅपरेशन के दौरान नई दिल्ली के वेलिंगटन अस्पताल (अब राम मनोहर लोहिया अस्पताल)में अकाल मौत मर गए।

वे जर्मनी में अपना आपरेशन करवाना चाहते थे।

जर्मनी के एक विश्वविद्यालय ने उन्हें भाषण देने के लिए आमंत्रित किया था।

आने-जाने का ख्र्च जर्मन विश्व विद्यालय दे रहा था।

पर वहां आॅपरेशन में 12 हजार रुपए लगने थे।

 1967 में बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें थीं।

उनमें से कई सरकारों में डा.लोहिया की पार्टी संसोपा के मंत्री भी थे।

बिहार में तो कर्पूरी ठाकुर उप मुख्य मंत्री,वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री थे।

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पर, डा.लोहिया ने अपने लोगों से कह दिया था कि जिन राज्यों की सरकारों में हमारे दल के मंत्री हैं,वहां से मेरे इलाज के लिए चंदा नहीं आएगा।

डा.लोहिया ने एक मजदूर नेता से कहा कि तुम बंबई के मजदूरों से मेरे इलाज के लिए चंदा एकत्र करो।

वह मजदूर नेता समय पर चंदा एकत्र नहीं कर सके।

इस बीच लोहिया की बीमारी बढ़ गई।

उन्हें दिल्ली के वेलिंगटन अस्पताल में तुरंत भर्ती होकर आपरेशन कराना पड़ा।

पता नहीं, जानबूझ कर,लापारवाही से या किसी षड्यंत्र के तहत लोहिया को इन्फेक्सन हो गया।

उन्हें बचाया नहीं सका।

सन 1977 की केंद्र सरकार ने उनके इलाज में हुई लापरवाही के आरोप की जांच कराई।

किंतु बाद में यह सुना गया कि जो डाक्टर कसूरवार ठहराया गया,वह मोरारजी सरकार की एक बड़ी हस्ती का करीबी निकल गया।

उसे बचा लिया गया।

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खैर, अब सोनिया गांधी के इलाज पर आइए।

आज के अखबारों में एक सनसनीखेज किंतु शर्मनाक खबर छपी है।

वह यह कि यस बैंक के पूर्व अध्यक्ष राणा कपूर को प्रियंका गांधी से (मकबूल फिदा हुसेन की) पेंटिंग 2 करोड़ रुपए में खरीदने के लिए विवश किया गया था।

कांग्रेस नेता व केंद्रीय मंत्री मुरली देवड़ा ने राणा से वायदा किया था कि पेंटिंग खरीदने पर उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित करने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

याद रहे कि राणा ने पेंटिंग खरीदी और उसी पैसे से सोनिया गांधी का न्यूयार्क में इलाज हुआ।

अब कांग्रेस यह नहीं कह रही है कि खरीदने की खबर गलत है।

बल्कि यह कह रही है कि यह बात पुरानी है।

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25 अप्रैल 22


   


 सांसद आदर्श ग्राम योजना

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सन 2014 में बिहार सहित पूरे देश में सांसद आदर्श ग्राम योजना शुरू की गई थी।

यह एक महत्वाकांक्षी योजना है।

पर, अपवादों को छोड़कर उसमें वांछित सफलता नहीं मिल सकी।

   इस योजना ने एक महत्वपूर्ण बात जगजाहिर कर दी।

वह यह कि केंद्र और राज्य सरकारों ने सरजमीन पर यानी गांव स्तर पर लागू करने के लिए जितनी योजनाएं बनाई हैं,उनमें से अनेक योजनाएं कागजों पर ही ‘कार्यान्वित’ हो रही हैं।

 याद रहे कि सांसद आदर्श ग्राम योजना के लिए सरकार ने अलग से निधि का आबंटन नहीं किया था।

पहले से जो योजनाएं चल रही हैं,उन्हीें के पैसों से गंावों का विकास करना था।

  ग्राम योजना की विफलता के बाद सरकार को इस बात की जांच करानी चाहिए कि गांवों के लिए जितने पैसे जिस काम के लिए भेजे जाते हैं,उनमें से कितने पैसे वास्तव में उन कामों पर खर्च हो रहे हैं।

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प्रभात खबर

25 अप्रैल 22

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पुनश्चः 

केंद्र और राज्य सरकारों की लगभग 250 छोटी-बड़ी योजनाएं 

चलती रहती हैं।

कई योजनाएं तो नामी-गिरामी हैं।

किंतु कई अन्य योजनाओं के नाम भी लोगों को नहीं मालूम।

यदि सरकारें उन योजनाओं के नाम प्रकाशित करें या अंचल कार्यालयों और पंचायत भवनों के नोटिस बोर्ड पर नाम टंगवा   दंे तो कई जागरूक लोग उसे सरजमीन पर ढूंढ़ने की कोशिश कर सकते हैं।


     जब रक्षक ही बन जाए भक्षक !

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    सुरेंद्र किशोर

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प्रवर्तन निदेशालय ने एक पूर्व बी एस एफ अफसर सतीश कुमार को इसी सोमवार को गिरफ्तार किया है।

वह भारत-बांग्ला देश सीमा पर तैनात था।

बी एस एफ के 36 बटालियन के कमांडेंट रहे सतीश पर एक तस्कर से 12 करोड़ रुपए लेने का आरोप है।

तस्करों ने ये पैसे अफसर सतीश के पत्नी और ससुर के बैंक खातों में डाले ।

  इससे पहले केंद्रीय एजेंसी ने तस्कर मुहम्मद एनामुल हक, विनय मिश्र तथा अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया है।इन पर मनी लाउंडरिंग का भी आरोप है।

विनय मिश्र तृणमूल युवा कांग्रेस का पदाधिकारी है और टीएमसी एम.पी.अभिषेक बनर्जी का अत्यंत करीबी है।

विनय मिश्र यह देश छोड़कर भाग गया है।

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भारत -बांग्ला देश सीमा पर पशुओं से लेकर कोयला तक और बांग्ला देशी व रोहिंग्या घुसपैठियों तक की भी खुलेआम ‘तस्करी’ होती रही है।

तस्करों को पहले वाम मोर्चा तथा अब ममता सरकार का संरक्षण प्राप्त है।

घुसपैठियां इनके वोट बैंक रहे हैं।

बी.एस.एफ. के अनेक अफसरांे व सिपाहियों की उन तस्करों से साठगांठ रही है।

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मनमोहन सिंह सरकार ने संसद में बताया था कि पश्चिम बंगाल में 57 लाख घुसपैठिए हैं।

  बिहार में 5 लाख,असम में 50 लाख दिल्ली में साढ़े तीन लाख,त्रिपुरा सवा तीन लाख,नगालैंड में 50 हजार और देश के अन्य प्रांतों में करीब 50 लाख घुसपैठिए मौजूद हैं।

  चूंकि घुसपैठियों का आना अब भी जारी है, इसलिए इनकी ताजा संख्या का आप अनुमान लगा ही सकते हैं।

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ममता पहले घुसपैठियों के सख्त खिलाफ थीं।

अब उनके बचाव में हैं।ं

ऐसे-ऐेसेे नेता मिले हैं अपने इस अभागे देश को !

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4 अगस्त, 2005 को ममता बनर्जी ने लोक सभा के स्पीकर के टेबल पर कागज का पुलिंदा फेंका।

उसमें अवैध बांग्ला देशी घुसपैठियों को  मतदाता बनाए जाने के सबूत थे।

उनके नाम पश्चिम बंगाल में गैरकानूनी तरीके से मतदाता सूची में शामिल करा दिए गए थे।

वह काम वाम मोर्चा सरकार ने किया था।

ममता ने संसद में गुस्से में कहा कि घुसपैठ की समस्या राज्य में महा विपत्ति बन चुकी है।

याद रहे कि इन घुसपैठियों के वोट का लाभ तब वाम मोर्चा उठा रहा है।

ममता ने उस पर सदन में चर्चा की मांग की।

चर्चा की अनुमति न मिलने पर ममता ने सदन की सदस्यता

 से इस्तीफा भी दे दिया था।

 चूंकि एक प्रारूप में विधिवत तरीके से इस्तीफा तैयार नहीं था,इसलिए उसे मंजूर नहीं किया गया।

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जब घुसपैठियों के वोट ममता 

बनर्जी को मिलने लगे

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3 मार्च 2020

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पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि 

‘‘जो भी बांग्ला देश से यहां आए हैं,बंगाल में रह रहे हैं ,

चुनाव में वोट देते रहे हैं, वे सभी भारतीय नागरिक हैं।’’

इससे पहले सी ए ए,एन पी आर और एन आर सी के विरोध में ममता ने कहा कि इसे लागू करने पर 

गृह युद्ध हो जाएगा । 

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एक बार पश्चिम बंगाल से भाजपा सांसद ने संसद में कहा 

कि पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में हिंदुओं को त्योहार मनाने के लिए अब स्थानीय इमाम से अनुमति लेनी पड़ती है।

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कई साल पहले ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक खबर छपी थी।

उसमें पश्चिम बंगाल के एक गांव की कहानी थी।

वह गांव बंाग्ला देशी मुस्लिम घुसपैठियों के कारण

 मुस्लिम बहुल बन चुका था।

वहां हिंदू लड़कियां हाॅफ पैंट पहने कर 

हाॅकी खेला करती  थी।

पर, अब मुसलमानों ने उनसे कहा कि फुल पैंट 

पहन कर ही खेल सकती हो।

खेल रुक गया है।

बंगाल के गावों में जाकर अब ऐसी रिपोर्टिंग करने की हिम्मत मुख्य धारा की मीडिया को नहीं है।

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यह बात तब की है जब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्य मंत्री थे।

उनका एक बयान ‘जनसत्ता’ में छपा।

उन्होंने कहा था कि घुसपैठियों के कारण सात जिलों में 

सामान्य प्रशासन चलाना मुश्किल हो गया है।

बाद में उन्होंने उस बयान का खुद ही खंडन कर दिया।

पता चला कि पार्टी हाईकमान

के दबाव में उन्होंने कह दिया कि मैंने वैसा कुछ कहा ही नहीं था।

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कई दशक पहले मांगने पर वाम मोरचा सरकार ने केंद्र

 सरकार को सूचित किया था कि 40 लाख अवैध बंाग्ला देशी पश्चिम बंगाल में रह रहे हैं।

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अगले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल और केरल में क्या-क्या होने जा रहा है,इसका पूर्वानुमान लगाने के लिए इन प्रदेशों के भीतरी इलाकों का अध्ययन  करना पड़ेगा।

वैसे देश के बाहर से जाकिर नाइक कुछ संकेत देता रहता हैं

 देश के भीतर के कतिपय अतिवादी मुस्लिम नेता यहां के टी.वी.चैनलों पर बैठकर बंगाल-केरल के बारे में अपने भावी मंसूबे का इशारों-इशारों में एलान करते रहते हैं।

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26 अप्रैल 22


  




    


रविवार, 17 अप्रैल 2022

 त्रिदोष ग्रस्त पार्टी की दवा, हकीम 

लुकमान के पास भी नहीं

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1.-एक परिवार के अयोग्य मुखिया के 

    हाथों में पार्टी गिरवी 

2.-धार्मिक अतिवाद की लगातार तुष्टि

3.-कुछ अपवादों को छोड़ अधिकतर नेतागण भ्रष्टाचार-परिवारवाद में लिप्त

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 कफ,पित्त और वात यानी त्रिदोष से पीड़ित

किसी व्यक्ति का इलाज तो संभव है,किंतु किसी राजनीतिक दल.का नहीं।

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मैंने किसी दल का नाम नहीं लिखा।

आप भी न लिखें।

यदि समझ गए तो सिर्फ मुस्कराइए

यदि यह दल बीमार रहेगा तो देश को स्वस्थ बने रहने में मदद मिलेगी

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16 अप्रैल 22


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

 आतंकियों के खिलाफ युद्ध जीतना हो तो सरकारी 

भ्रष्टाचार के खिलाफ महा युद्ध करिए

अन्यथा, यह देश नहीं बचेगा

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सुरेंद्र किशोर

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महाराष्ट्र के मंत्री नवाब मलिक जेल जाने के बावजूद मंत्री पद पर बने हुए हैं। 

किंतु आरोप लगने पर कर्नाटका के मंत्री के.एस.ऐश्वरप्पा ने कहा है कि मैं मंत्री पद से इसी शुक्रवार को इस्तीफा दे दूंगा।

  यह तो भिन्नता हुई।

पर, भ्रष्टाचार के विस्तार व गंभीरता के मामले में दोनों राज्यांे में कितनी समानता है ?

जो लोग इन राज्यों से आने वाली खबरों पर नजर रखते हैं,वे कहते हैं कि उनमें कोई खास भिन्नता नहीं है।

काफी समानताएं हैं।

हालांकि महाराष्ट्र, कर्नाटका से अब भी आगे है।

एक दूसरे को बचाने की कोशिश के मामले में तो महाराष्ट्र के कुछ नेताओं का किसी से कोई मुकाबला ही नहीं।

 भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप से सने एक नेता को बचाने की सिफारिश करने शरद पवार हाल में प्रधान मंत्री के पास चले गए।

हालांकि पी एम ने उन्हें कोई आश्वासन नहीं दिया।

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कर्नाटका के ठेकेदार का आरोप है कि वहां के मंत्री ने उससे 40 प्रतिशत कमीशन मांगा।

ठेकेदार ने आत्म हत्या कर ली।

जानकार लोग बताते हैं कि सांसद फंड का कमीशन भी इतना ही है।

हालांकि कई सांसद आज भी कमीशन नहीं लेते।

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बताया जाता है कि सांसद फंड में कमीशन के अनुपात में ही सरकारी काम में कमीशन बढ़ता जा रहा है।

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बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण भी देश की आंतरिक व बाह्य सुरक्षा को भारी खतरा पहुंच सकता है।

टुकड़े-टुकड़े गिरोह के सदस्य हमारी पूरी सिस्टम को ही एक दिन खरीद ले सकते हैं।

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यदि आपको इस बात में शक हो तो नब्बे के दशक के जैन हवाला कांड को याद कर लीजिए।

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जैन हवाला कांड के लाभुकों में भारत के एक पूर्व राष्ट्रपति ,दो पूर्व प्रधान मंत्री, कई पूर्व मुख्य मंत्री व पूर्व-वत्र्तमान केंद्रीय मंत्री स्तर के अनेक नेता शामिल थे।

  पैसे पाने वालों में  खुफिया अफसर सहित  15 बड़े -बड़े अफसर भी  थे ।

कुल 55 लाभार्थी थे।(याद रहे कि इनमंे से एक हस्ती को 2 करोड़ रुपए मिले थे।)

  कश्मीरी आतंकियों के लिए पैसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. हवाला कारोबारियों के जरिए भिजवाती रही।

उन्हीं पैसों में से काफी पैसे 55 बड़ी हस्तियों को मिले थे।

तब के ‘इंडिया टूडे’ के अनुसार कुछ लाभुकों ने अपने प्रभाव  का इस्तेमाल करके आतंकियों को बचाए भी थे। 

जिस घोटाले में लगभग सभी प्रमुख दलों के बड़े नेता

शामिल हों तो उसमें सजा किसे होगी ?

केस चला,पर सजा नहीं हुई।

इस जैन हवाला केस में सजा से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पर भारी दबाव पड़ा।

 तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस.वर्माने खुली अदालत में खुद पर भारी दबाव की चर्चा की थी।(भयवश वर्मा साहब ने दबाव डालने वालों को नाम सार्वजनिक नहीं किया।)

  याद रहे कि उन 55 में से शरद यादव व राजेश पायलट सहित कुछ लाभुकों ने स्वीकार किया था कि किसी जैन ने आकर हमें पैसे दिए थे।

क्या कोई भी व्यक्ति आकर भारी राशि दे देगा और आप उसे स्वीकार कर लेंगे,उसका कुल -गोत्र- मंशा जाने बिना ?

ऐसे हैं हमारे देश के कुछ लोभी लाभुक नेतागण। 

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निखिल चक्रवर्ती संपादित ‘मेनस्ट्रीम’ पत्रिका(12 नवंबर 1994) में मधु लिमये ने पैसे पाने वालों की सूची छपवा दी थी।

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कालचक्र के जरिए इस कांड का भंडाफोड़ करने वालों में एक विनीत नारायण ने तो इस पर करीब 300 पेज की किताब ही लिख दी।वह किताब मेरे सामने है।

‘जनसत्ता’ में राम बहादुर राय ने भी इस कांड पर लिखा था।

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कोई भी यह मानेगा कि नब्बे के दशक की अपेक्षा (सांसद फंड की शुरूआत के बाद)इस देश में भ्रष्टाचार काफी बढ़ गया है।

साथ ही लोभी नेताओं की संख्या व उनका ओहदा भी।

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जिस देश की बड़ी -बड़ी हस्तियों को कोई भी व्यक्ति आकर  पैसे दे देगा और वे ले लेंगे ?

यदि ऐसा है तो उनके हाथों अपना देश कितना सुरक्षित है ?

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अच्छी मंशा वालों से अपील है कि यदि आप आतंकियों-राष्ट्रद्रोहियों-टुकड़े -टुकड़े गिराहों के खिलाफ जारी युद्ध में अंततः जीतना चाहते हैं तो सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ भी महा युद्ध छेड़ दीजिए।सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर।

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बुधवार, 13 अप्रैल 2022

  एक ‘अनोखे’ राज्यपाल के प्रति 

प्रधान मंत्री की अभूतपूर्व सहिष्णुता !

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सुरेंद्र किशोर

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‘‘.....आने वाले चुनावों में मैं पूरी ताकत लगाकर, पूरे उत्तर भारत में अभियान चलाऊंगा और उनको(यानी, मोदी सरकार को दिल्ली से) भगाऊंगा।’’

  --  मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक

   (इंडियन एक्सपे्रस-7 मार्च 22)

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माननीय मलिक की इस टिप्पणी के एक माह से अधिक हो गए।

फिर भी वे अपने पद पर बने हुए हैं।

क्या आजाद भारत के किसी अन्य राज्यपाल के अपने ही प्रधान मंत्री के खिलाफ ऐसे ‘भाषण’ आपने इससे पहले

 सुने हैं ? 

इंदिरा गांधी यदि आज प्रधान मंत्री होतीं तो मलिक के साथ क्या सलूक करतीं ?

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कुछ लोग नरेंद्र मोदी को अब तक का सबसे बड़ा असहिष्णु प्रधान मंत्री बताते हैं।

हां,प्रधान मंत्री असहिष्णु जरूर हैं।

 किंतु घोटालेबाजों,वंशवादियों और आतंकियों के प्रति।

यहां मिल रही जानकारियों के अनुसार ,शरद पवार ही नही,ं बल्कि मोदी कई अपने लोगों की भी मदद नहीं कर रहे हैं जो घोटालेबाजों को बचाने के लिए प्रधान मंत्री से यदाकदा अपील करते रहते हैं।

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13 अप्रैल 22


मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

 ओमप्रकाश चैटाला की पेंशन राशि 2 लाख 22 हजार 

रुपए तो पी.एफ.पेंशनर की राशि मात्र 1231 रुपए मासिक

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ऐसे देश में रहते हैं हम !!!!!

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सुरेंद्र किशोर

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पी.एफ.से जुड़ी मेरी पेंशन राशि सन 2005 में 1046 रुपए रिपीट 1046 रुपए तय की गई थी।

  सन 2022 में वह राशि बढ़कर 1231 रुपए रिपीट 1231 रुपए हो गई है।

 इस राशि को हासिल करने के लिए पी.एफ.फंड में मेरा भी थोड़ा योगदान रहा,जब मैं रेगुलर सेवा में था।

ध्यान रहे कि यह सब केंद्र सरकार द्वारा संचालित होता है।

हरिवंश जी जब उप सभापति नहीं थे तो उन्होंने राज्य सभा में 

इस दयनीय पेंशन राशि की ओर केंद्र सरकार का ध्यान खींचा था।(पर, भला कौन सुनता है पंेशनर्स के बीच के इन ‘दलितों’ की पीड़ा !!)

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  अब इससे उलट एक उदाहरण देखिए।

आपातकाल में इंदिरा गांधी की सरकार ने पूर्व सांसदों के लिए पेंशन का प्रावधान किया।

  बाद में विधायकों के लिए भी ऐसी व्यवस्था की गई।

तब की सरकार ने अनेक रिटायर संासदों की दयनीय आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह प्रावधान किया था।

उन दिनों तक अनेक संासद व विधायक ऐसे हुआ करते थे जिन्होंने सेवा भाव से राजनीति में कदम रखा था व निजी खर्चे के लिए (येन केन प्रकारेण धनोपार्जन) पर ध्यान नहीं दिया।

हालांकि कुछ अपवाद तब भी थे।

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पर,उस पेंशन का ताजा हाल जानिए।

हरियाणा से यह खबर आई है कि पूर्व मुख्य मंत्री ओमप्रकाश चैटाला को हर माह 2 लाख 22 हजार रुपए रिपीट 2 लाख 22 हजार रुपए पेंशन मिलती है।

उनसे भी अधिक पेंशन पाते हैं कैप्टन अजय सिंह यादव।उनकी मासिक राशि 2.लाख 38 हजार रुपए है।

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    जनता के उन महान नेताओं से भला मेरी तुलना ही क्या है !!!

फिर भी मैं यहां किसी की न्यूनत्तम आवश्यकता की बात तो कर ही सकता हूं।

नब्बे के दशक में जब पी.एफ.से जुड़ी पेंशन की कल्पना केंद्र सरकार ने की तो उसे न्यूनत्तम आवश्यकता का भी ध्यान नहीं रहा।

भारत सरकार ने मनरेगा में न्यूनत्तम मजदूरी कितनी तय कर

रखी है ? !!

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देश में पी.एफ.से जुड़े पेंशनर्स की कुल संख्या 23 लाख है।

श्रमजीवी पत्रकार भी इसमें शामिल हैं।

मैं तो अखबारों व वेबसाइट के लिए लिखकर इतने पैसे अब भी कमा लेता हूं कि उससे मेरा खर्च चल जाता है।

किंतु 23 लाख में से कितने पेंशनर्स हैं जिनका रिटायर होने के बाद अपनी अन्य आय से खर्च आराम से चल पाता है ?

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  केंद्र सरकार व राज्य सरकारों पर यह निर्भर है कि वे ओम प्रकाश चैटाला और अजय सिंह यादव जैसों के लिए जितनी राशि मन करे, तय करें।

किंतु समय मिले तो कभी यह भी सोचें कि इस पी.एफ.पेंशनर्स का काम 1231 रुपए मासिक से कैसे चलेगा जिस दिन  

उसका शरीर लिखने-पढ़ने के लायक नहीं रहेगा ?

मैंने अपना उदाहरण देकर 23 लाख पेंशनर्स की पीड़ा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की है।  

अन्यथा, अनेक लोग इसे अविश्वसनीय ही मानते कि किसी को सिर्फ 1231 रुपए भी पेंशन मिलती है।

यह भी कि 17 साल में सिर्फ 185 रुपए की बढ़ोत्तरी हुई है।

यानी, औसतन साल में करीब 10 रुपए की बढ़ोत्तरी !

हालांकि नियमित बढ़ोत्तरी का इसमें कोई प्रावधान ही नहीं है। 

ऐसी पेंशन योजना दुनिया में कहीं और भी हो तो मेरा आप जरूर ज्ञानवर्धन करें।

(पूर्व सांसदों और अन्य राज्यों के पूर्व विधायकों की पेंशन राशि का कोई सटीक आंकड़ा मेरे पास नहीं है।इसीलिए नमूने के तौर पर हरियाणा का दे दिया।यह आज के ‘द हिन्दू’ में छपा है।) 

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12 अपैल 22