सोमवार, 2 मई 2022

  विकास के नये मंदिर ‘पूर्णिया इथेनाॅल कारखाने’

 को आशंकित बुरी नजरों से बचाने का प्रबंध करे 

 बिहार सरकार

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यदि कृषि आधारित और भी नए-नए कारखाने खुलेंगे तो

 बिहार का पिछड़ापन कम होगा

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सुरेंद्र किशोर

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पूर्णिया में इथेनाॅल कारखाने की स्थापना हुई है।

कृषि प्रधान बिहार में यह एक युगांतरकारी घटना है।

वहां मक्का और धान से इथेनाॅल तैयार होगा।

 अब किसानों को उनकी फसल की बेहतर कीमत मिलेगी।

खेती-किसानी वैसे लोगों के लिए भी लाभकारी पेशा बनेगी,जो मजदूरों से खेती करवाते हैं,खुद नहीं करते।

  मैं खुद किसान परिवार से आता हूं।

हमारे यहां मजदूरों से खेती कराई जाती है।

अनुभव बताते हंै कि खेती कुल मिलाकर घाटे का सौदा है।

क्योंकि अनाज ही एक ऐसा उत्पाद है जिसकी कीमत ग्राहक तय करता है, उत्पादक नहीं।

ग्राहक लागत खर्च का ध्यान तक नहीं रखते।

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आजादी के तत्काल बाद चैधरी चरण सिंह जैसे जमीन के नेताओं ने तत्कालीन केंद्र सरकार को यह सुझाव दिया कि पहले कृषि का विकास कीजिए।

उसी से उद्योग के विकास में भी मदद मिलेगी।

क्योंकि किसानों की आय जब बढ़ेगी तो किसान परिवारों की करखनिया माल खरीदने की क्षमता भी बढ़ेगी।

उसी से उद्योग बढं़ेगे।

किंतु केंद्र सरकार ने कृषि के बदले लोक उपक्रमों पर अधिक जोर दिया।

आरोप लगा कि अधिकतर स्वतंत्रता सेनानियों को अपने बाल-बच्चों ,रिश्तेदारों और लगुए-भगुए को ‘‘सफेदपोश नौकरियां’’ दिलवाने की जल्दीबाजी थी।

इसीलिए भी लोक उपक्रमोें पर अधिक ध्यान दिया गया।

सरकार की एक दूसरी गलतफहमी थी।

वह यह कि हम अपने कारखानों के माल विदेश भेजेंगे और उन्हीं पैसों से विदेश से अनाज खरीद कर यहां के लोगों को खिलाएंगे। 

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खैर, देर आए दुरुस्त आए।

कृषि आधारित उद्योग को सरकार अब बढ़ावा दे रही है।

कृषि विधेयक लागू हो गया होता तो खेती का और भी अधिक विकास होता।यदि मनमोहन सिंह सरकार ने नीतीश सरकार को इथेनाॅल कारखाने लगाने की अनुमति दे दी होती तो अब तक कई ऐसे कारखाने लग चुके होते।

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दो और काम सरकारें करें।

एक तो केंद्र सरकार मनरेगा को किसानों से जोड़ दे।

ऐसी मांग तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से की थी।

पर आरोप है कि तब की सरकार ने यह काम इसलिए नहीं किया क्योंकि मनरेगा के पैसों को लूटने में प्रभु वर्ग को भारी असुविधा होती।आश्चर्य है कि नरेंद्र मोदी सरकार का भी इधर ध्यान नहीं है।

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अमृतसर जैसे धार्मिक स्थलों के आसपास नशे करना मना है।

उसी तरह विकास के नए मंदिर यानी पूर्णिया इथेनाॅल कारखाने के पास से वैसे तत्वों को दूर रखने का राज्य सरकार पक्का प्रबंध कर दे जिन तत्वों को घूस और रंगदारी से पैसे कमाने का नशा है।

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 2 मई 22 

      


शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

 सिर में दर्द हो तो क्या सिर काट दोगे ?

राजद्रोह कानून का दुरुपयोग हो 

रहा है तो क्या इस कानून को ही खत्म कर दोगे 

जबकि देश में राजद्रोहियों की संख्या बढ़ती जा रही है ?     

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        सुरेंद्र किशोर

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   राजद्रोह कानून के औचित्य पर भारत का सुप्रीम कोर्ट इन दिनों विचार कर रहा है।

इस कानून के दुरुपयोग की खबरों से सुप्रीम कोर्ट का भी चिंतित हो जाना लाजिमी है।

किंतु उम्मीद है कि अंततः सुप्रीम कोर्ट इस कानून को जारी रखने के पक्ष में ही अपनी राय देगा।

सुप्रीम कोर्ट से यह भी उम्मीद की जाती है कि वह इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने का सख्त निदेश सरकार को देगा।

यदि इस कानून को रद करने के पक्ष में राय देगा तो संभव है कि सुप्रीम कोर्ट को वैसे किसी आदेश पर देर- सबेर पुनर्विचार करना पड़ेगा।

क्योंकि इस देश में राजद्रोहियों की संख्या बढ़ रही है। 

 राजद्रोह कानून के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट सन 1962 में ही अपना दिशा -निदेश दे चुका है।

शासन यह सुनिश्चित करे कि 

1962 के उस ऐतिहासिक जजमेंट की धज्जियां नहीं उड़ाई जाएं।

हाल के वर्षों में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम इस संबंध में 1962 के अपने निर्णय पर कायम हैं।

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वैसे यह बात सभी पक्षों को समझ लेनी चाहिए कि जो शक्तियां इस देश में राजद्रोही गतिविधियां चला रही हैं,या जो किसी लाभ-लोभ के तहत उनके समर्थक हैं, वे चाहते हैं कि राजद्रोह कानून रद कर दिया जाए।

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   1962 के जजमेंट की कहानी

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26 मइर्, 1953 को बिहार के बेगूसराय में एक रैली हो रही थी।

फाॅरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के नेता केदारनाथ सिंह रैली को संबांधित कर रहे थे।

रैली में सरकार के खिलाफ अत्यंत कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कहा कि 

‘‘सी.आई.डी.के कुत्ते बरौनी में चक्कर काट रहे हैं।

कई सरकारी कुत्ते यहां इस सभा में भी हैं।

जनता ने अंगे्रजों को यहां से भगा दिया।

कांग्रेसी कुत्तों को गद्दी पर बैठा दिया।

इन कांग्रेसी गुंडों को भी हम उखाड़ फकेंगे।’’

   ऐसे उत्तेजक व अशालीन भाषण के लिए बिहार सरकार ने केदारनाथ सिंह के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दायर किया।

केदारनाथ सिंह ने पटना हाईकोर्ट की शरण ली।

हाईकोर्ट ने उस मुकदमे की सुनवाई पर रोक लगा दी।

बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई।

सुप्रीम कोर्ट ने आई.पी.सी.की राजद्रोह से संबंधित धारा  

को परिभाषित कर दिया।

  20 जनवरी, 1962 को मुख्य न्यायाधीश बी.पी.सिन्हा की अध्यक्षता वाले संविधान पीठ ने कहा कि

 ‘‘देशद्रोही भाषणों और अभिव्यक्ति को सिर्फ तभी दंडित किया जा सकता है,जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़े।’’

 चूंकि केदारनाथ सिंह के भाषण से ऐसा कुछ नहीं हुआ था,इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ सिंह को राहत दे दी।

   देशद्रोह के हाल के कुछ मामलों को अदालतें 1962 के उस निर्णय की कसौटी पर ही कसे।

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राजद्रोह का ताजा मामला 9 फरवरी 2016 को जे एन यू कैम्पस में सामने आया था।

तब वहां कश्मीरी जेहादी अफजल गुरू की बरखी मनाई जा रही थी।

उस अवसर पर खुलेआम नारे लगे--

‘‘भारत की बर्बादी तक,कश्मीर की आजादी तक,

जंग रहेगी,जंग रहेगी।

भारत तेरे टुकड़े होंगे,

इंशाअल्लाह,इंशा अल्लाह।

अफजल हम शर्मींदा हैं,

तेरे कातिल जिंदा हैं।’’

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कौन कहेगा कि 2016 के बाद वैसे लोगों की संख्या इस देश में घट गई है जो 

इस लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं कि ‘‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’’ ?

क्या ऐसे लोगों का मुकाबला शासन किसी हल्के कानूनों के जरिए कर सकता है ?

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याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने आपात काल में दिए गए अपने एक मशहूर जजमेंट को खुद ही कुछ साल पहले गलत बताया।

वह निर्णय बंदी प्रत्यक्षीकरण को लेकर था।

तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आपातकाल में नागरिक अपने मौलिक अधिकारों की मांग नहीं कर सकता।

नागरिक अधिकारों में जीने का अधिकार भी शामिल है। 

उससे ठीक पहले केंद्र सरकार के वकील नीरेन डे ने सबसे बड़ी अदालत से   

कहा था कि यह इमरजेंसी (1975-77)ऐसी है जिसके दौरान यदि शासन किसी की जान भी ले ले तो उस हत्या के खिलाफ अदालत की शरण नहीं ली जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने तब नीरेन डे की बात पर अपनी मुहर लगा दी थी।

याद रहे कि इमरजेंसी में पूरे देश मेें शासन ने भय और आतंक का माहौल खड़ा कर दिया था।

पर,जब वैसा माहौल नहीं रहा तो सुप्रीम कोर्ट को बाद में अपने उस पुराने निर्णय पर पछतावा हुआ था।

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     डा.लोहिया भी समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे

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       सुरेंद्र किशोर

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डा.राम मनोहर लोहिया समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे।

इसलिए भी कि भारत के संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले अध्याय में लिखा हुआ है कि 

‘‘राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता, यानी यूनिफार्म सिविल कोड लागू करने का प्रयास करेगा।’’

  गृह मंत्री अमित शाह ने कल भोपाल में जो कुछ कहा ,  वह न सिर्फ संविधान सम्मत है,बल्कि डा.लोहिया के विचार के अनुकूल भी है।

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 डा.लोहिया सन  1967 में उत्तर प्रदेश के कन्नौज से लोक सभा चुनाव लड़ रहे थे।

किसी पत्रकार ने पूछ दिया, ‘‘आप सामान्य नागरिक संहिता के पक्ष में हैं ?

लोहिया ने कहा कि ‘‘हां, मैं पक्ष में हूं।’’

दूसरे दिन अखबार में प्रमुखता से लोहिया की यह टिप्पणी छप गई।

उसपर डा.लोहिया के एक प्रमुख साथी ने उनसे कहा कि ‘‘डाक्टर साहब,यह आपने क्या कह दिया ?

कन्नौज में मुसलमान वोटर की अच्छी-खासी आबादी है।अब तो आप चुनाव नहीं जीतिएगा।’’

उस पर डा.लोहिया ने जवाब दिया,‘‘मैं सिर्फ चुनाव जीतने के लिए राजनीति नहीं करता।देश बनाने के लिए राजनीति करता हूं।’’

  इस बयान के कारण डा.लोहिया करीब 400 मतों से विजयी हुए जबकि उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस विरोधी हवा थी।

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यानी, आज भी इस देश में दो तरह के नेता व दल हैं।

 एक चुनाव जीतने वाले और दूसरे देश बनाने वाले।

देखना है कि आने वाले वर्षों में कौन विजयी होता है।  

  


 मोरारजी देसाई सरकार के कैबिनेट मंत्रियों के नाम निम्नलिखित हैं।

इनमें बताइए कि संगठन कांग्रेस घटक के कौन -कौन थे ?

आपने लिखा है कि अधिकांश संगठन कांग्रेस के थे।

1.-मोरारजी देसाई

2-.चरण सिंह

3.-जगजीवन राम

4-एच.एम.पटेल (रिटायर आई.सी.एस.)

5-अटल बिहारी वाजपेयी

6-एल.के. आडवाणी

7-जार्ज फर्नाडिस

8-प्रकाश सिंह बादल

9-सिकंदर बख्त

10-पी.रामचंद्रन

11-पी सी चुंदर

12-शांतिभूषण

13-बृजलाल वर्मा

14-मधु दंडवते

15-राजनारायण

16-हेमवतीनंदन बहुगुणा

17-रवींद्र वर्मा

18-मोहन धारिया

19-बीजू पटनायक

20-पुरुषोत्तम कौशिक 

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हां,मोरारजी देसाई के दो निर्णयों की जरूर आलोचना हुई।

एक तो उन्होंने राज्यपाल अधिकतर संगठन कांग्रेस के लोगों को ही बनाए।

दूसरी आलोचना मधु लिमये ने यह की कि उत्तर भारत की  दो मजबूत जातियों राजपूत और यादव में से कोई कैबिनेट में नहीं था।

बाद में 1980 में संजय गांधी ने उस असंतोष का फायदा उठाकर चार राज्यों में राजपूत मुख्य मंत्री बनवाए।

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प्रमोद जी, कभी-कभी आपकी जानकारीपूर्ण टिप्पणियों से मैं भी अपनी जानकारी बढ़ाता हूं।

मेरी इस टिप्पणी के जरिए आप भी चाहें तो अपनी जानकारी बढ़ा सकते हैं।


     जब रक्षक ही बन जाए भक्षक !

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    सुरेंद्र किशोर

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प्रवर्तन निदेशालय ने एक पूर्व बी एस एफ अफसर सतीश कुमार को इसी सोमवार को गिरफ्तार किया है।

वह भारत-बांग्ला देश सीमा पर तैनात था।

बी एस एफ के 36 बटालियन के कमांडेंट रहे सतीश पर एक तस्कर से 12 करोड़ रुपए लेने का आरोप है।

तस्करों ने ये पैसे अफसर सतीश के पत्नी और ससुर के बैंक खातों में डाले ।

  इससे पहले केंद्रीय एजेंसी ने तस्कर मुहम्मद एनामुल हक, विनय मिश्र तथा अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया है।इन पर मनी लाउंडरिंग का भी आरोप है।

विनय मिश्र तृणमूल युवा कांग्रेस का पदाधिकारी है और टीएमसी एम.पी.अभिषेक बनर्जी का अत्यंत करीबी है।

विनय मिश्र यह देश छोड़कर भाग गया है।

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भारत -बांग्ला देश सीमा पर पशुओं से लेकर कोयला तक और बांग्ला देशी व रोहिंग्या घुसपैठियों तक की भी खुलेआम ‘तस्करी’ होती रही है।

तस्करों को पहले वाम मोर्चा तथा अब ममता सरकार का संरक्षण प्राप्त है।

घुसपैठियां इनके वोट बैंक रहे हैं।

बी.एस.एफ. के अनेक अफसरांे व सिपाहियों की उन तस्करों से साठगांठ रही है।

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मनमोहन सिंह सरकार ने संसद में बताया था कि पश्चिम बंगाल में 57 लाख घुसपैठिए हैं।

  बिहार में 5 लाख,असम में 50 लाख दिल्ली में साढ़े तीन लाख,त्रिपुरा सवा तीन लाख,नगालैंड में 50 हजार और देश के अन्य प्रांतों में करीब 50 लाख घुसपैठिए मौजूद हैं।

  चूंकि घुसपैठियों का आना अब भी जारी है, इसलिए इनकी ताजा संख्या का आप अनुमान लगा ही सकते हैं।

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ममता पहले घुसपैठियों के सख्त खिलाफ थीं।

अब उनके बचाव में हैं।ं

ऐसे-ऐेसेे नेता मिले हैं अपने इस अभागे देश को !

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4 अगस्त, 2005 को ममता बनर्जी ने लोक सभा के स्पीकर के टेबल पर कागज का पुलिंदा फेंका।

उसमें अवैध बांग्ला देशी घुसपैठियों को  मतदाता बनाए जाने के सबूत थे।

उनके नाम पश्चिम बंगाल में गैरकानूनी तरीके से मतदाता सूची में शामिल करा दिए गए थे।

वह काम वाम मोर्चा सरकार ने किया था।

ममता ने संसद में गुस्से में कहा कि घुसपैठ की समस्या राज्य में महा विपत्ति बन चुकी है।

याद रहे कि इन घुसपैठियों के वोट का लाभ तब वाम मोर्चा उठा रहा है।

ममता ने उस पर सदन में चर्चा की मांग की।

चर्चा की अनुमति न मिलने पर ममता ने सदन की सदस्यता

 से इस्तीफा भी दे दिया था।

 चूंकि एक प्रारूप में विधिवत तरीके से इस्तीफा तैयार नहीं था,इसलिए उसे मंजूर नहीं किया गया।

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जब घुसपैठियों के वोट ममता 

बनर्जी को मिलने लगे

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3 मार्च 2020

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पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि 

‘‘जो भी बांग्ला देश से यहां आए हैं,बंगाल में रह रहे हैं ,

चुनाव में वोट देते रहे हैं, वे सभी भारतीय नागरिक हैं।’’

इससे पहले सी ए ए,एन पी आर और एन आर सी के विरोध में ममता ने कहा कि इसे लागू करने पर 

गृह युद्ध हो जाएगा । 

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एक बार पश्चिम बंगाल से भाजपा सांसद ने संसद में कहा 

कि पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में हिंदुओं को त्योहार मनाने के लिए अब स्थानीय इमाम से अनुमति लेनी पड़ती है।

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कई साल पहले ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक खबर छपी थी।

उसमें पश्चिम बंगाल के एक गांव की कहानी थी।

वह गांव बंाग्ला देशी मुस्लिम घुसपैठियों के कारण

 मुस्लिम बहुल बन चुका था।

वहां हिंदू लड़कियां हाॅफ पैंट पहने कर 

हाॅकी खेला करती  थी।

पर, अब मुसलमानों ने उनसे कहा कि फुल पैंट 

पहन कर ही खेल सकती हो।

खेल रुक गया है।

बंगाल के गावों में जाकर अब ऐसी रिपोर्टिंग करने की हिम्मत मुख्य धारा की मीडिया को नहीं है।

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यह बात तब की है जब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्य मंत्री थे।

उनका एक बयान ‘जनसत्ता’ में छपा।

उन्होंने कहा था कि घुसपैठियों के कारण सात जिलों में 

सामान्य प्रशासन चलाना मुश्किल हो गया है।

बाद में उन्होंने उस बयान का खुद ही खंडन कर दिया।

पता चला कि पार्टी हाईकमान

के दबाव में उन्होंने कह दिया कि मैंने वैसा कुछ कहा ही नहीं था।

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कई दशक पहले मांगने पर वाम मोरचा सरकार ने केंद्र

 सरकार को सूचित किया था कि 40 लाख अवैध बंाग्ला देशी पश्चिम बंगाल में रह रहे हैं।

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अगले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल और केरल में क्या-क्या होने जा रहा है,इसका पूर्वानुमान लगाने के लिए इन प्रदेशों के भीतरी इलाकों का अध्ययन  करना पड़ेगा।

वैसे देश के बाहर से जाकिर नाइक कुछ संकेत देता रहता हैं

 देश के भीतर के कतिपय अतिवादी मुस्लिम नेता यहां के टी.वी.चैनलों पर बैठकर बंगाल-केरल के बारे में अपने भावी मंसूबे का इशारों-इशारों में एलान करते रहते हैं।

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26 अप्रैल 22


  




    


 मिलिए एक और ‘पी.एम.

मेटेरियल’ मायावती जी से

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सुरेंद्र किशोर

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प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवारों की 

अस्थायी सूची

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राहुल गांधी,

ममता बनजीर्,

के. चंद्रशेखर राव,

अरविंद केजरीवाल, 

और अब मायावती !

सन 2024 के लोस चुनाव से पहले और भी कुछ 

नेता खुद को पी एम मेटेरियल घोषित कर 

सकते हैं।या घोषित हो सकते हैं।

ऐस क्यों न हो  ?

जो व्यक्ति मुख्य मंत्री रह चुका है, यदि वह 

अपनी प्रोन्नति चाहता है तो उसमें आश्चर्य की कौन सी बात है ?

हर मुख्य सचिव चाहता है कि वह कैबिनेट सचिव बने। 

जब देवगौड़ा और और इंदर कुमार गुजराल प्रधान मंत्री बन सकते हैं तो वे क्यों नहीं जिनकी चर्चा ऊपर की गई है।

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जो भी क्षत्रीय नेता प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार हैं,या होंगे,वे चाहेंगे कि उनके प्रभाव क्षेत्र से अधिक से अधिक सांसद जीत कर जाएं।

इसके लिए वे यह कोशिश करेंगे कि बिना तालमेल के अधिक से अधिक लोक सभा चुनाव क्षेत्रों से उनके दल चुनाव लड़े।

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इस पृष्ठभूमि में इतने अधिक पी एम मेटेरियल्स की खबर सुन कर मौजूदा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को खुश होना चाहिए या चिंतित ? !!!

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29 अप्रैल 22   


बुधवार, 27 अप्रैल 2022

    कृषि कानून 

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निजी प्रतिष्ठान पंजाब में गेहूं खरीदने से परहेज कर रहे हैं।

क्योंकि वहां अधिक मंडी शुल्क है।

   दूसरी ओर ,अन्य राज्यों के किसानों को उनकी फसल का मूल्य एम एस पी से भी अधिक मिल रहा है।

  वहां खुले बाजार में न्यूनत्तम समर्थन मूल्य से अधिक पैसे किसानों को मिल रहे हैं।दैनिक जागरण की यही खबर है।

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कृषि कानूनों को वापस करा देने के लिए किसानों ने करीब एक साल तक दिल्ली के पास धरना दिया।

  जन जीवन अस्त व्यस्त कर दिया।

 कानून वापस हो गया।

वापसी से पंजाब के अढ़तिए और मंडी के दलाल अधिक खुश हुए।क्योंकि मंडियों का वर्चस्व बना रहा।

पर, वहां के किसानों को क्या मिला ?

उन्हें अपनी फसल को अन्य राज्यों की अपेक्षा कम कीमत पर बेचना पड़ रहा है।  

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आंदोलन के दिनों यह कहा जाता था कि आंदोलन किसानोें का नहीं बल्कि अढ़तिए और मंडी के दलालों का है।वह बात बाद में सच साबित हुई।

याद करें आंदोलनकारी धरना स्थल पर ए.सी.लगे टेंट में रहते थे और टी.वी.पर काजू- किसमिस खाते नजर आतेे थे।

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सुरेंद्र किशोर

27 अप्रैल 22