सोमवार, 18 जुलाई 2022

      कल और आज !

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(अपवादों को छोड़कर)पहले की नई पीढ़ियों कहती थीं--

‘‘मैं आज जो कुछ भी हूं ,वह माता-पिता 

और गुरुजन की कृपा से।’’

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(अपवादों को छोड़कर)आज की नई पीढ़ी कहती है कि मैंने सिर्फ अपने बल पर उपलब्धियां हासिल की हैं।

यदि माता-पिता का सहयोग मिल गया होता तो मैं अपने जीवन में और भी आगे बढ़ जाता।

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किसी ने ठीक ही कहा है कि आज की पीढ़ी(अपवादों को छोड़कर)

अपने बुजुर्ग माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से भागने के लिए ही यह कहती है कि उन्होंने मेरे लिए किया ही क्या था,मेरी उपेक्षा के सिवा !!

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सुरेंद्र किशोर

18 जुलाई 22  


सोमवार, 11 जुलाई 2022

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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नेताओं की सिफारिश पर अफसरों की महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती जनहित में नहीं

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बिहार के पिछले अनुभव बताते हैं कि नेताओं,विधायकों और मंत्रियों की सिफारिशों के आधार पर जिलों में छोटे-बड़े अफसरों की तैनाती उन राज्य सरकारों व आम लोगों के लिए हितकारी साबित नहीं हुई।

जाहिर है कि जिस नेता की सिफारिश पर कोई अफसर किसी महत्वपूर्ण पद पर तैनात होगा,वह सरकारी काम काज में उस नेता को तरजीह देगा।

 अपवादों को छोड़कर आम तौर पर किसी नेता का हित प्रतिस्पर्धी नेता के हित से टकराता रहता है।

कई बार तो नेता का हित आम जनता के हित से टकराने लगता है।

  वैसी स्थिति लोकतांत्रिक शासन के हक में कत्तई नहीं है।

क्या उससे सत्ताधारी दल को भी राजनीतिक लाभ होगा ?

क्या उससे राज्य सरकार की छवि जनता में बेहतर बनेगी ?

अंचल कार्यालयों और थानों के कार्यकलापों से किसी राज्य सरकार की छवि बनती या बिगड़ती है।

 बिहार में अंचल कार्यालयों और थानों की मौजूदा कार्य पद्धति में भारी से सुधार की जरूरत है।

इसके लिए जरूरी यह है कि सी.ओ. और थानेदारों की तैनाती में पेशेवर दक्ष और यथासंभव ईमानदार अफसरों को ही तरजीह मिले।

  कई बार जन प्रतिनिधियों को उन अफसरों की दक्षता-ईमानदारी का पता नहीं होता जिसकी वे सिफारिश कर रहे होते हैं।

  इसलिए किसी अफसर की दक्षता-ईमानदारी की जांच  निरपेक्ष,ईमानदार और पेशेवर सरकारी अफसरों की टीम से ही 

उनके सर्विस रिकाॅर्ड देखकर

कराई जानी चाहिए।

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        सिफारिश की परंपरा पुरानी

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  पिछले अनुभव बताते हैं कि  अपने मन लायक अफसर की तैनाती का लोभ विधायक से लेकर मंत्री तक संवरण नहीं कर पाते।

  1977 में बिहार सरकार के मुख्य सचिव रहे पी.एस.अप्पू ने अपना संस्मरण लिखा है।

 ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ अफसर रहे दिवंगत अप्पू ने लिखा कि ‘‘सन 1977 की बिहार सरकार के अधिकतर मंत्री अपनी जाति के अफसर को विभागीय सचिव बनाना चाहते थे। उनकी जाति के ईमानदार अफसर नहीं बल्कि सबसे बेईमान अफसर उन्हें चाहिए था।’’

   दूसरी ओर, सन 1977 की बिहार सरकार में दबंग मंत्री रहे एक नेता ने बाद में मुझे अपना अनुभव सुनाया था।

उन्होंने कहा कि ‘‘जब मैं मंत्री था और फाइल पर कोई नोट लिखता था तो बड़े अफसर कहते थे कि सर, आपकी टिप्पणयों में श्रीबाबू (बिहार के प्रथम मुख्य मंत्री) की नोटिंग का स्तर देखने को मिलता है।’’

किंतु जब मैं मंत्री नहीं रहा और उन्हीं अफसरों को फोन करता था तो वे कभी फोन पर नहीं आते थे।’’

   याद रहे कि अस्सी और नब्बे के दशकों में कई मामलों में स्थानीय विधायकों और मंत्रियों की पसंद के डी.एम. और एस.पी.उनके जिलों में जाते थे।

  पर,उसका नतीजा उन सरकारों के लिए अच्छा नहीं हुआ।

  ऐसी पोस्ंिटग व पक्षपातपूर्ण शासन के कारण भी जनरोष बढ़ा और वे सत्ताधारी पार्टियां चुनाव हारती चली गईं। 

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रक्षा निर्यात में वृद्धि

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वित्तीय वर्ष 2021-22 में भारत ने करीब 13 हजार करोड़ रुपए के गोल-बारुद विदेशों को निर्यात किए।

सन 2014 की अपेक्षा छह गुनी रक्षा -सामग्री का निर्यात 

हुआ है। 

इसमें करीब 70 प्रतिशत योगदान निजी क्षेत्रों का है।बाकी सार्वजनिक क्षेत्र का।

जानकार सूत्रों के अनुसार सन 2025 तक 36 हजार 500 करोड़ रुपए की रक्षा सामग्री के निर्यात का लक्ष्य रखा गया है।

हथियारों के उत्पादन व निर्यात के मामलों में मजबूत होते जाने से अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत का महत्व इधर बढ़ा है।

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  आरक्षण के वर्गीकरण में देरी

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रोहिणी आयोग का कार्यकाल एक बार फिर बढ़ा दिया गया है।

उसका गठन 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार ने किया  था।

इस बीच रोहिणी आयोग ने भी पाया कि कुल 2633 पिछड़ी जातियों में से करीब 1000 जातियों को तो आज तक आरक्षण का कोई लाभ मिला ही नहीं।

इसलिए 27 प्रतिशत आरक्षण को चार हिस्सों में बांट दिया जाना चाहिए।

  याद रहे कि मंडल आरक्षण का अधिक लाभ उन पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों का मिल जाता है जो अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध हैं।

  इस सिफारिश के बाद रोहिणी आयोग के जिम्मे अब कौन सा काम बाकी है,यह पता नहीं चल सका है।

केंद्र सरकार ने चार हिस्सों में बांटने वाली सिफारिश पर अब तक कोई निर्णय नहीं किया है।

  2017 के आंकड़े के अनुसार केंद्र सरकार की नौकरियों में पिछड़ी जातियों का औसतन कुल 20.26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है।

जबकि 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं।

जानकार बताते हैं कि उप वर्गीकरण के बाद शायद सीटें भरने लगेंगी।

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भूली-बिसरी याद

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कई बार कुछ लोग यह पूछ देते हैं कि सन 1950 में केंद्र

सरकार के कौन -कौन मंत्री थे ?

पुरानी पीढ़ियों के कुछ लोग तो बता भी देते थे।

पर,आज की पीढ़ी ?

उनसे यह जानने की क्यों उम्मीद की जाए ?

किंतु सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए यहां उनके नाम दिए जा रहे हैं।

वे थे-जवाहरलाल नेहरू(प्रधान मंत्री),सरदार वल्लभ भाई पटेल(उप प्रधान मंत्री),बी.आर.आम्बेडकर,रफी अहमद किदवई,सरदार बलदेव सिंह,अबुल कलाम आजाद,जाॅन मथाई,जगजीवन राम,राजकुमारी अमृत कौर,श्यामा प्रसाद मुखर्जी,खुर्शीद लाल,आर. आर. दिवाकर,मोहनलाल सक्सेना,एन.गोपाल स्वामी अयंगार,एन.वी.गाडगिल,के.सी.नियोगी,जयरामदास दौलतराम,के.संथानम,सत्यनारायण सिन्हा,

और बी.वी.केसकर(सभी मंत्री)।

याद रहे कि उससे पहले की अंतरिम केंद्र सरकार में डा.राजेंद्र प्रसाद और सी.राजगोपालाचारी भी कैबिनेट मंत्री रह चुके थे।

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और अंत में

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धरती के पास जितने साधन उपलब्ध हैं,उनसे वह करीब दो अरब लोगों की ही जरुरतों को पूरा कर सकती है।

किंतु दुनिया की आबादी बढ़कर करीब साढ़े सात अरब हो चुकी है। बढ़ती ही जा रही है।

अब कल्पना कर लीजिए कि हम अंततः 

अपने वंशजों के लिए क्या और कितना छोड़कर जाएंगे ?

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कानोंकान

प्रभात खबर

पटना

11 जुलाई 22


      श्रीलंका की घटनाओं से सबक लेने का वक्त

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       सुरेंद्र किशोर

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 राजनीति मंें परिवारवाद-भ्रष्टाचार  ने श्रीलंका को बर्बाद कर दिया।

पांच राजपक्षे भाइयों ने मिलकर देश को लूटा।

इस परिवार के पास देश की सरकार का 70 प्रतिशत बजट था।

वित मंत्री को ‘‘मिस्टर टेन परसेंट’’कहा जाता था।

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इस उदाहरण को देखते हुए भारत के परिवारवादी-वंशवादी राजनीतिक परिवारों का एक दिन क्या हाल होगा ?!!

यहां तो अब अत्यंत थोड़े से अपवादों के छोड़कर सिर्फ 10 प्रतिशत से तो किसी को संतोष ही नहीं है-चाहे नेता  परिवारवादी हो या नहीं हो।

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राजनीति का परिवारवाद यहां भी ढह रहा है।पर बहुत धीरे -धीरे ।

क्या पूरी तरह ढह जाने के पहले उन्हें कुछ और कारनामा करना है ?

पहले ही परिवारवाद-वंशवाद-भ्रष्टाचार से यह देश व खुद कुछ दल एक हद तक बर्बाद हो चुके हैं।

यहां भी किसी दल को जब जातीय-धार्मिक वोट बैंक की ताकत मिल जाती है तो वह सरकार में आने पर लूटने लगता है।

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अब जरा श्रीलंका पर आएं

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 श्रीलंका सरकार में एक ही परिवार(राजपक्षे परिवार) के पांच सदस्य शीर्ष पदों पर विराजमान थे।

वे थे--

1.-गोटाबाया राजपक्षे-राष्ट्रपति 

( रक्षा मंत्रालय इन्हीं के पास ।)

2.-महेंद्र राजपक्षे--प्रधान मंत्री

3.-बासिल राजपक्षे-वित्त मंत्री-

  (इन्हें बी. बी. सी. ने एक बार ‘मिस्टर 10 परसेंट’ कहा था।)

4.-चमल राजपक्षे-सिंचाई मंत्री

5.-नमल राजपक्षे--युवा व खेल मंत्री

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अब वे कहां हैं ? !!

भागे-भागे फिर रहे हैं।

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10 जुलाई 22


सोमवार, 4 जुलाई 2022

 किसी भाषा से दुराव क्यों ?

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शेखर गुप्त और ए.जे.फिलिप की यादें

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सुरेंद्र किशोर

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दैनिक ‘जनसत्ता’ की बैठक के लिए मैं दिल्ली गया हुआ था।

हमारे संपादक अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि आपसे शेखर गुप्त मिलना चाहते हैं।

आप जाकर मिल लीजिए।

शेखर जी तब इंडियन एक्सपे्रस के संपादक थे।

   मैं उनसे मिला।

उन्होंने अन्य बातों के अलावा मुझसे यह भी कहा कि मैं अन्य किसी अंग्रेजी पत्रकार की अपेक्षा इस देश को बेहतर जानता हूं क्योंकि मैं हिन्दी अखबार भी पढ़ता हूं।

उन्होंने कहा कि आप हमारे एक्सप्रेस के लिए भी लिखिए।

मैंने कहा कि मैं अंग्रेजी जानता जरूर हूं किंतु मुझे लिखने का अभ्यास नहीं है।

 उन्होंने कहा कि मैं अनुवाद करवा लंूगा।

आप हिन्दी में ही लिखें।

मैंने पहले तो हिन्दी में ही लिखा।

पर,बाद में अंग्रेजी में लिखकर भेजने लगा।

एक्सप्रेस में मेरी कई रपटें छपी थीं।

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एक अन्य सम्मानित अंग्रेजी पत्रकार की हिन्दी के बारे में राय आपको उनकी इस चिट्ठी से मिल जाएगी जिसकी स्कैन काॅपी इस पोस्ट के साथ दी जा रही है।

 वे हैं द हिन्दुस्तान टाइम्स(पटना) के पूर्व सहायक 

संपादक ए.जे.फिलिप।

 बाद में तो वे बड़े -बडे़ अखबारों में बड़े पदों पर भी रहे।

पटना के ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में वे एक बहुत रोचक व पठनीय साप्ताहिक काॅलम लिखते थे।

 मैं उस काॅलम को जरूर पढ़ता था। 

 उन दिनों मैं दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में मुख्य संवाददाता के रूप में काम कर रहा था।

1980 की बात है।

  मैंने फिलिप साहब को यह सलाह दी कि  आप अपने काॅलम में रेणु जी पर कभी लिखिए।

उन्होंने न सिर्फ लिखा,बल्कि मुझे हिन्दी में इस संबंध में पत्र भी लिखा।

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फिलिप साहब के भी व्यवहार में न तो अंग्रेजी भाषा में पत्रकारिता करने का कोई अतिरिक्त गुमान था और न ही यह बात थी कि किसी 

‘‘वर्नेक्युलर जनर्लिस्ट’’ की सलाह को सम्मान देने की भला क्या जरूरत है !  

फिलिप साहब का वह पत्र मुग्ध कर देने वाला था।

इसीलिए तो पिछले 42 साल से मेरे पास हैै।

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3 जुलाई 22

 



 



कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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विस्फोट की घटना ने बता दी बेहतर पुलिस प्रशिक्षण की जरूरत 

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पटना सिविल कोर्ट में गत शुक्रवार को बम विस्फोट हो गया।

विस्फोट किसी अपराधी ने नहीं किया।

अभियोजन आॅफिस के टेबल से गिर कर बम ब्लास्ट कर गया।विस्फोट से पुलिसकमर्मी सहित कई लोग

घायल हो गए।

पुलिस जिन्दा बम लेकर कोर्ट चली गई थी।

यानी पुलिस को इस बात का प्रशिक्षण नहीं मिला था कि कोर्ट ले जाने से पहले उस बम को डिफ्यूज कर या करा लेना चाहिए था।

यह बुनियादी सावधानी वह पुलिसकर्मी क्यों नहीं बरत सका जो बम लेकर कोर्ट गया था ?

इसका एक ही जवाब है कि कई स्तरों पर असवाधानी बरती जाती है।

 यदाकदा यह खबर भी आती रहती है कि गार्ड आॅफ आॅनर देते समय राइफल से फायर ही नहीं हो पाता।

यदि ऐसी गलती एक बार हो गई तो क्षम्य है।

 किंतु फायर न हो पाने की गलती बार-बार क्यों होती है ?

ऐसी गलतियों के बारे में संबंधित अधिकारियों को गंभीर रूप से सोचना-विचारना चाहिए। 

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    कार्रवाई में सावधानी जरूरी 

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केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि वे अनुसूचित जाति और जनजाति के खिलाफ अपराध के मामलों में एफ.आई.आर.दर्ज करने में देरी नहीं करे।

  केंद्र सरकार की यह पहल अच्छी है।

किंतु इसमें एक सावधानी की जरूरत है।

क्योंकि एस.सी.-एस.टी.(अत्याचार निवारण)कानून के दुरुपयोग की खबरें आती रहती हैं।

 मायावती जी जब उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री थीं, तो उन्होंने दुरुपयोग रोकने के कुछ उपाय किए थे।

उस संबंध में राज्य मुख्यालय से एक निदेश राज्य के सारे आरक्षी अधीक्षकों को भेजा गया गया था।

उस निदेश की काॅपी अन्य राज्यों के पास भी होने चाहिए।

वह ऐसा निदेश था जिससे न तो उस कानून के दुरुपयोग की भरसक आशंका थी और न किसी अत्याचार के बच जाने की गुंजाइश थी।

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जिनके घर शीशे के हांे 

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इन दिनों एक खास बात कुछ अधिक ही देखी जा रही है।

प्रतिपक्षी दलों के जिन नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लंबित हैं,वे सत्ताधारी दल के समक्ष डट कर खड़ा नहीं हो पा रहे हंै।

ऐसी बात पहले भी छिटपुट होती थी।

 किंतु अब कुछ अधिक ही हो रही है।क्योंकि राजनीति में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है।

  हाल के उप चुनावों में एक चर्चित दल ने अपने उम्मीदवार खड़ा करने में एक खास बात का ध्यान रखा ।

वह यह कि उसने अपने उम्मीदवारों का फैसला इस तरह किया ताकि उससे सत्ताधारी दल को चुनावी लाभ मिल सके।

लाभ मिला भी।

नुकसान उस विवादास्पद दल को और उसके नेतृत्व को हुआ।  

ठीक ही कहा गया है कि जिनके घर शीशे के हों,वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारते। 

  इस कहानी का सबक यह है कि यदि राजनीति में किसी नेता को अपनी साख बढ़ानी या जमानी है तो उसे भरसक भ्रष्टाचार से दूर रहना चाहिए।

अन्यथा दबे-दबे रहना पड़ेगा।

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 प्रोन्नति से पदावनति तक 

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राजनीति में भी कभी प्रोन्नति होती है तो कभी उसी व्यक्ति की पदावनति हो जाती है।

हाल में पूर्व मुख्य मंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ भी यही हुआ।

बिहार में तो बहुत पहले यह सब हो चुका है।

दारोगा प्रसाद राय सन 1970 में बिहार के मुख्य मंत्री थे।

सन 1973 में अब्दुल गफूर मंत्रिमंडल गठित हुआ तो दारोगा बाबू उस सरकार में वित्त मंत्री बनाए गए।

  केदार पांडेय सन 1972 में बिहार के मुख्यमंत्री  थे।

 किंतु पांडेय जी भी गफूर मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री बने थे।

 दारोगा बाबू से किसी ने इस पर सवाल किया था।उसके जवाब में उन्होंने कहा कि मान लीजिए कि मुझे जनता के काम के लिए दिल्ली जाना है।

उस दिन दिल्ली के लिए पटना से जहाज उपलब्ध नहीं है।

तो मैं ट्रेन से ही क्यों नहीं दिल्ली चला जाऊंगा ? 

हाल में महाराष्ट्र में एक पूर्व मुख्य मंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शिंदे मंत्रिमंडल में उप मुख्य मंत्री पद स्वीकार कर लिया,तो इस मामले पर देश में चर्चा शुरू हो गई।

पर,ऐसा तो महाराष्ट्र में भी पहले हो चुका है।

 पर,सबसे बड़ा उदाहरण तो चक्रवर्ती राज गोपालाचारी का है।

वह पहले देश के गवर्नर जनरल थे।

बाद में वे मद्रास प्रदेश के मुख्य मंत्री बने थे।

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विधायिकाओं में हंगामा चिंताजनक 

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कुछ खास सदस्यगण ही संसद या विधान सभा की कार्यवाही को बाधित करने के लिए आए दिन बाध्य कर देते हैं।

यदि किसी सदस्य के कारण एक साल में दस दिन सदन की कार्यवाही स्थगित हुई हो तो उस सदस्य के कुल कार्यकाल में से एक महीना घटा देना चाहिए।

इसके लिए कोई कानून बने।

एक महीना पहले उन्हें सदन की सदस्यता से रिटायर कर दिया जाए।

  इस कानून का लाभ हर दल को किसी न किसी राज्य में होगा।क्योंकि अधिकतर दल कहीं न कहीं सत्ता में हैं।हंगामे तो प्रतिपक्षी दल ही करते हैं।

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और अंत में 

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यह खबर गत जून महीने की है।

बिहार विधान सभा की कार्यवाही चल रही थी।

एक दिन कुल 5 घंटे की कार्यवाही में चार घंटे 9 मिनट तक हंगामा होता रहा।

विधान परिषद में भी वही दृश्य था।

सभापति ने कहा कि विपक्ष का रवैया सदन का अपमान माना जाएगा।

  हालांकि ऐसे दृश्य संसद से लेकर देश की विधान सभाओं तक में आए दिन देखे जाते हंै।

इसका कोई अंत नजर नहीं आता।

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कानोंकान

प्रभात खबर

पटना 

4 जुलाई 22


शनिवार, 2 जुलाई 2022

    ऐसे किसी ‘राजनीतिक अनुमान’ को 

   क्यों दुहराना जो वर्षों से लगातार

   गलत साबित हो रही है !

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सुरेंद्र किशोर

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इन दिनों देश के अलग-अलग हिस्सों से मेरे मित्रों और परिचितों के फोन आते रहते हैं।

उनका एक ही सवाल होता है।

क्या नीतीश कुमार की सरकार जा रही है ?

महाराष्ट्र की ताजा राजनीतिक घटना के बाद आज भी मुझे 

एकाधिक फोन आए।

  मैंने सोचा कि मैं इस मीडिया के जरिए इस संबंध में अपना

आकलन बता दूं।

सबके फोन के जवाब देना मुश्किल होता है।

वह भी एक ही बात कहने के लिए।

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बिहार में मौजूदा सरकार रहेगी या जाएगी,उसके बारे में सिर्फ तीन व्यक्तियों में से कोई एक पक्के तौर पर बता सकते हैं।

वे हैं-नरेंद्र मोदी, अमित शाह और नीतीश कुमार।

इन तीनों में से किसी ने परिवर्तन का कोई संकेत नहीं दिया है।

उल्टे केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गत 29 जून को पटना में कहा कि 2025 का बिहार विधान सभा चुनाव राजग, नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ेगा।

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मेरा ‘राजनीतिक एंटेना’ भी यही कहता है कि नीतीश सरकार पर फिलहाल कोई खतरा नहीं है।

यदि मीडिया के एक हिस्से के पास चैंकाने वाली खबर नहीं मिल रही है तो मेरी राय है कि वह सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके बिहार में चल रहे विकास व कल्याण से संबंधित सरकारी खबरें निकाले।

 वे न सिर्फ जनहित में हांेगी, बल्कि चैंकाने वाली भी होंगी।

ऐसा करने पर उसे पेशेवर संतुष्टि भी मिलेगी।

 उसकी जगह वर्षों से ऐसी एक खबर प्रसारित-प्रचारित करने से क्या फायदा जो लगातार गलत साबित हो रही हो !

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1 जुलाई 22 

   


    संपादित करके ही डिबेट्स 

   चैनलों पर दिखाए जाएं

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     सुरेंद्र किशोर

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नूपुर शर्मा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से

मेरी एक पुरानी मांग को बल मिलता है।

  एक दर्शक-श्रोता के नाते मेरी यह मांग रही है कि किसी डिबेट को संपादित करने के बाद ही टी.वी.चैनलों पर दिखाया जाना चाहिए।

  मेरी यह सलाह संसद की कार्यवाहियों के लिए भी रही है।

किंतु अभी मैं सिर्फ टी.वी.डिबेट्स पर ही खुद को सीमित रखता हूं।

  यदि संपादित नहीं होगा तो नूपुर शर्मा प्रकरण की पुनरावृति 

को रोका जाना मुश्किल होगा।

बेहतर तो यही होगा कि सुप्रीम कोर्ट ही संपादित करने के लिए चैनलों को देशहित में बाध्य कर दे।

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2 जुलाई 22

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